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शनिवार, 10 मार्च 2012

एक सितारे की जीवन यात्रा २

पिछला भाग 

पुनः प्रस्तुति

 संशोधन एवं तकनीकी शब्दों के अनुवाद ::: आभार - गिरिजेशराव  जी .... साभार  

पहले भाग में हमने देखा की अन्तरिक्षीय धूल सितारों को जन्म देती है | अब आगे ... यह धूल क्या है ? किस चीज़ से बनी है ? 
जैसा हम अपने आस पास देखते हैं , प्रकृति में हर चीज़ की "रीसाईकलिंग" होती है | तो - जब सितारे "मरते हैं" तो उनसे हायड्रोजन के कण ब्रह्माण्ड में धूल बन कर बिखर जाते हैं | यही धूल फिर अन्तरिक्षीय धूल बन कर बिखरती है - यही नेबुला पिछली पोस्ट  में होती है - जिससे नए सितारों का पुनः पुनः जन्म होता रहता है | जैसा मैंने इस विषय की पिछली पोस्ट में कहा था - किसी डिस्टर्बेंस से गोलिया बनती हैं -जो सघन होती जाती हैं - बढ़ते "मास" (द्रव्यमान ) के कारण - और अधिक अणु   इकट्ठे होते हैं - जिससे और गुरुत्वाकर्षण बढ़ जाता है - जिससे और अणु इकट्ठे होते हैं ....  | यह प्रक्रिया चलती जाती  है - और गुरुत्वाकर्षण का दबाव इतना अधिक बढ़ जाता है कि गर्मी और तापमान करीब 10,000,000 K (18,000,000 °F)  तक पहुच जाती है | अब परमाणु अभिक्रिया शुरू हो जाती है - दो हायड्रोजन के कण मिल कर आणविक फ्यूजन  ( संलयन )द्वारा हीलियम के एक अणु को जन्म देते हैं | यह जो नया नया तारा बना है - इसकी विस्फोटक प्रतिक्रयाओं के कारण बड़ी तेजी से वाष्प (पानी की नहीं - अभी पानी नहीं बना है) बाहर फूटती है और तारा तेज़ी से घूमने लगता है | इस वजह से जिस धूल के विशाल बादल ने इस तारे को बनाया था - वह हट जाता है - तारा "माँ" की कोख से बाहर आ जाता है | http://www.youtube.com/watch?v=4elLkaeLqZQ&feature=related  यहाँ आप देख सकते हैं - तारे की जीवन यात्रा |


यह एक "बालक" सितारा है | अब - गुरुत्वाकर्षण इसे अपने ही अन्दर गिराने की कोशिश कर रहा है - व परमाणु विस्फोट इसे फोड़ डालना चाहते हैं | इन दोनों विरोधी प्रक्रियाओं के बैलंस (संतुलन) से सितारा स्थिर स्थिति में रहता है | अन्दर हायड्रोजन का "फ्यूज़न " (संलयन ) चल रहा है | नीचे दिए पीरियोडिक टेबल आवर्त सारिणी ) में आप देख सकते हैं कि पहले  पदार्थ  हायड्रोजन में एक प्रोटोन है - तो दूसरे पदार्थ  हीलियम  में दो | तो दो हायड्रोजन के कण मिल कर आणविक फ्यूजन (संलयन )  द्वारा हीलियम के एक अणु को जन्म देते हैं | यह फ्यूजन रिएक्शन "न्युक्लीअर फिजन (आणविक विखंडन) " से बहुत अधिक ऊर्जा देता है (जो आणविक बम हिरोशिमा और नागासाकी में गिरे थे - उससे बहुत अधिक शक्तिशाली प्रतिक्रिया) और जो बम हम इंसान बनाते हैं - वे बहुत ही कम वजन के हैं - जिससे कहा जाता है कि धरती पल भर में नष्ट हो सकती है| सितारे के भीतर धरती  के कुल वजन से भी करोडो गुना भारी फ्युएल (ईंधन)  है - जो करोडो वर्षों तक अभिक्रियारत रहता है| हमारा सूर्य एक मध्यम आकर व् मध्यम उम्र का सितारा है - साइंटिस्ट्स के हिसाब से भी (1010 वर्ष - अर्थात १०,००,००,००,००० वर्ष ) - - और धार्मिक पुराणों के हिसाब से भी |




यह "बालक सितारे" की स्थिति कई करोड़ वर्षों तक रहती है | इसे "मेन सीक्वेंस " (मुख्या अनुक्रम) कहते हैं | यह आयु निर्भर होती है - सितारे के शुरुआती मास (द्रव्यमान) और डेंसिटी (घनत्व) पर | 


कई करोड़ वर्षों के बाद अब हायड्रोजन कम होने लगती है - तो विस्फोट कमजोर पड़ने लगते हैं | जब विस्फोटों की शक्ति क्षीण होती है - तो सितारे को बाहर की और फोड़ती ताकतें कमज़ोर और गुरुत्वाकर्षण का प्रभाव प्रबल हो जाता है | एक बार फिर बैलेंस बिगड़ गया है अब - और सितारा फिर कोलैप्स होने लगता है - यानी अपने ही अन्दर गिरने लगता है | सितारे के भीतरी भाग में अब हीलियम (जो भारी है) की बहुतायत है - जिसके फ्यूज़न के लायक प्रेशर अभी नहीं बना है |  बाहरी लेयर (पर्त) में अब भी हायड्रोजन है - लेकिन क्योंकि यह बाहर है - तो वहां "वोल्यूम" ज्यादा है - और पदार्थ कम - तो घनत्व बहुत कम है | हायड्रोजन फ्यूज़न अब भी जारी है - किन्तु कम घनत्व अर्थात कम गर्मी (सितारे के हिसाब से तापमान कम है - हमारे हिसाब से नहीं :) तापमान अभी भी  करोड़ों डीग्री सेल्सिअस ही है )


बड़े सितारे बहुत तेज़ी से अपनी फ्युएल (ईंधन) जलाते हैं (रेडिओ धर्मिता के नियमों के अनुसार - जितनी भी मात्रा में पदार्थ हो - उसे अपने से आधा होने के लिए एक ही बराबर वक्त चाहिए - इसे हाफ लाइफ पीरीअड़ कहा जाता है  - यदि एक घंटे में २०० किलो १०० किलो बन रहा है, तो इतने ही समय में १०० किलो से ५० और ५० से २५ , ... आदि ...)- और जल्दी मर जाते हैं - छोटे तारे धीरे जलते हैं  - और अंत में "रेड ड्वार्फ" या "वाईट ड्वार्फ "बनते हैं - जो की करीब १३.७ बिलीयन (अरब) सालों बाद होता है | क्योंकि हमारे इस ब्रह्माण्ड की आयु इससे कम है - तो अभी तक यहाँ - हमारे इस ब्रह्माण्ड में - रेड ड्वार्फ नहीं हैं | दूसरे ब्रह्माण्ड - और यह ब्रह्माण्ड भी - कैसे बने (विज्ञानं के अनुसार - धार्मिक ग्रंथों के अनुसार नहीं ) - यह मैं एक और सिरीज़ में डिस्कस करूंगी |


 अब हम सितारे के प्रौढ़ जीवन पर हैं | जिन तारों का वजन हमारे सूर्य से ०.४ गुना तक हो - वे रेड ड्वार्फ बनेंगे | हमारा सूर्य एक माध्यम वजन का तारा है - यह रेड जायंट बनेगा | जब हमारा सूर्य ऐसा होगा - तो वह अपने अभी के आकार से २५० गुना बढ़ जाएगा - जिसका रेडिअस १५०० लाख कि.मी. होगा |  जो रेड जायंट सूर्य से २.२५ गुना भारी तारों से बनें - वे "रेड सुपर जायंट " बन जाते हैं |

जब प्रौढ़ सितारे का बैलेंस बिगड़ता है - तो विस्फोटक शक्तियां गुरुत्वाकर्षण की शक्तियों से हारने लगती हैं - और तारा अपने ही वजन से ही अन्दर गिरने लगता है | भीतर का दबाव फिर बढ़ने लगता है | जब दबाव इतना बढ़ जाए - की अब "हीलियम" का फ्यूज़न (संलयन) शुरू हो सके - तो फिर नए बैलेंस (संतुलन) की स्थिति हो जाती है | ऊपर दिए पीरियोडिक टेबल आवर्त सारिणी )में देखें - हीलियम में दो प्रोटोन हैं तो कार्बन में छह - तो तीन अणु हीलियम के मिल कर कार्बन का एक अणु बनाते हैं | इसी तरह ओक्सिजन, नीओन, सिलिकोन आदि भारी पदार्थ बनते जाते हैं ....|

जितना भारी पदार्थ होगा - उस के ऊपर गुरुत्वाकर्षण उतना अधिक प्रभाव डालेगा , और वह उतनी अंदरूनी पर्त में होगा | वह उतनी गहराइ  में फ्यूज़ हो कर अपने से अधिक  भारी पदार्थ को जन्म देगा - जो उससे भी अन्दर की पर्त बनाएगा - कुछ प्याज़ के छिलकों की तरह | एक लेयर्ड स्ट्रक्चर बन जाता है - जैसा यहाँ दिखाया गया है | इस स्थिति में - सबसे अन्दर लोहा - आयरन है - जो फ्यूज़न (संलयन) नहीं कर सकता - इसका फिजन (विखंडन) होगा - जो तारे की मृत्यु होगी - इस पर अगली पोस्ट में बात करेंगे | यहाँ यह ध्यान देने की बात है - की पदार्थ चाहे हायड्रोजन हो या लोहा (आयरन) यहाँ कुछ भी सोलिड (ठोस), या लिक्विड (तरल) नहीं है - सब ही गैस (वायु रूप )में हैं - क्योंकि तापमान करोड़ों डीग्री सेल्सिअस है |  इस स्थिति में - सबसे अन्दर जो लोहा - आयरन है, वह भी वाष्प है - तो वह फैल या दब सकता है - जबकि धरती पर तापमान कम होने से लोहा ठोस है - जो न फैल सकता है , न दब सकता है | 


अगली पोस्ट में - तारे की मृत्यु, सुपरनोवा एक्सप्लोजन, नीयुट्रोन  स्टार, ब्लैक होल आदि पर चर्चा करेंगे ....

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अधिक जानकारी के लिए -
http://en.wikipedia.org/wiki/Life_of_a_star
Information from wikipedia,  burro.astr.cwru.edu, csep10.phys.utk.edu, youtube.... credits and thanks ....

2 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी सरल लेखन शैली में गंभीर विषय भी आसान हो जाता है.
    अच्छा ज्ञानवर्धन हुआ.
    आभार.

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  2. यह पोस्ट भी पढ़ ली। बहुत अच्छा लगा। इसे पढ़कर!

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