समर्थक

शुक्रवार, 4 मई 2012

जापान का भूकंप 4 : ज्वालामुखी

इस श्रुंखला के अन्य भाग देखने के लिए ऊपर "विज्ञान" tab पर क्लिक करें |

इस श्रुंखला का यह आखरी भाग है । इसके पहले के भागों में हमने (, , 3 ) भूकंप आने की प्रक्रिया () और सुनामी आने की प्रक्रिया ( ) देखी, संतोरिणी द्वीप के भयंकर विस्फोट ( ) , और न्यूक्लियर मेल्ट डाउन पर ( 3 ) बात की । इस आखरी भाग में हम ज्वालामुखियों (volcanoes) पर बात करते हैं ।

इस पोस्ट में तीन मुख्य भाग हैं - ज्वालमुखी बनने / फूटने की प्रक्रिया; विस्फोट के प्रभाव; और ज्वालामुखियों के प्रकार ।
सभी चित्र गूगल इमेजेस से साभार ।-------------------------
ज्वालामुखी की प्रक्रिया :

ज्वालामुखी मूल रूप में धरती की ऊपरी सतह crust में टेक्टोनिक प्लेटों तक गहरे उतारे हुए क्रेक्स होते हैं , (देखिये पहला भाग) जिसमे से भीतर का उबलता हुआ मेग्मा अपने अत्यधिक दबाव की वजह से बाहर आ जाता है । यह मैंने पहले भाग मे दूध की मलाई का उदहारण लेकर बताया था ।
[
 चाहें तो इस नीले भाग को छोड़ कर आगे बढ़ जाएँ - यह पहले भाग का संक्षिप्त सार है (सिर्फ ज्वालामुखी के सन्दर्भ में ):


चित्र गूगल इमेजेस से साभार ।

धरती के भीतर अत्यधिक गर्मी और दबाव है, जिसकी वजह से सब कुछ पिघला हुआ है । पिघले हुए द्रव्य को धरती के हज़ारों वर्षों तक लगातार घूमने से ठंडा होने का मौका मिला , और ऊपर की सतह ठंडी हो कर मलाई की तरह जम गयी । परन्तु मलाई ही की तरह - यह एक टुकड़े में नहीं जमी बल्कि इस के अलग अलग सात मुख्य टुकड़े हैं - जिन्हें हम टेक्टोनिक प्लेट्स कहते हैं। ये टेक्टोनिक प्लेटें सख्त पत्थर जैसी थीं, जो हजारों वर्षों धूप की गर्मी से फैलने और सिकुड़ने की प्रक्रिया से पहले क्रैक हुई, फिर टूट कर छोटे (?) आकार में परिवर्तित हुई । हवा, धूप, बारिश आदि के लगातार प्रभाव से धीरे धीरे रेत और मिटटी आदि बने । परन्तु हम जो भी ऊपर देखते हैं, यह सिर्फ कुछ ही किलो मीटर गहरा है । नीचे सब कुछ इन टेक्टोनिक प्लेटों पर ही "रखा" हुआ है । सारे समुद्रों के सागरतल भी, और सारे महाद्वीपों के भूतल भी - इन्ही टेक्टोनिक प्लेटों पर टिके हैं । और ये टेक्टोनिक प्लेटें तैर रही हैं भीतर के पिघले मेग्मा पर । जब ये टेक्टोनिक प्लेटें एक दूसरे से आगे/ पीछे आदि खिसकना चाहती हैं, तो अत्यधिक भार (ऊपर महाद्वीप और समुद्रों का भार है ) के कारण अत्यधिक फ्रिक्शन होता है - और ये सरक नहीं पातीं । जब कई सौ साल गुज़रते हुए दबाव बहुत बढ़ जाए - तो कमज़ोर पड़ जाने वाले जोड़ पर पत्थर टूट जाते हैं और प्लेटें अचानक सरक जाती हैं । इसी से भूकंप आते हैं ।
]

कहीं कही इन टेक्टोनिक प्लेटों के बीच में क्रेक्स भी हैं, जहां से नीचे का माग्मा कभी कभी बाहर उबल आता है । यही ज्वालामुखी का रूप लेता है । परन्तु यह तीन तरह के कॉम्बिनेशन हो सकते हैं

1, सिर्फ भूकंप - कहाँ ? जहां टेक्टोनिक प्लेटें खिसकें, परन्तु मेग्मा बाहर न आये ।

2. सिर्फ ज्वालामुखी - जहां मेग्मा बाहर आने योग्य क्रैक तो हो, परन्तु दबाव इतना न हो की प्लेट खिसक सके। यहाँ, या तो एक प्लेट दूसरी के नीचे को खिसकती है ( और नीचे के मैंटल की गर्मी से पत्थर पिघल कर मेग्मा बनने लगते हैं ) या फिर प्लेटें एक दुसरे से दूर खिसकती हैं, जिससे क्रैक बनते हैं और चौड़े हो जाते हैं - जिनसे नीचे का लावा बाहर आने का रास्ता पा जाता है ।

3. सबसे डेंजरस है वह कोम्बिनेशन जहां ये दोनों एक साथ होने की संभावना बने - इन्हें "thermal plume" कहा जाता है । शायद ये क्रैक इतने मोटे हैं / इनकी झिर्रियाँ किसी कुँए की झिर्रियों की ही तरह आस पास फ़ैली हुई है, जिससे पिघला हुआ मेग्मा इधर उधर फ़ैल कर टेक्टोनिक प्लेटों के जोड़ों को लुब्रिकेट कर रहा है । इससे टेक्टोनिक प्लेटों के बीच फ्रिक्शन कम होता है । तो ज्वालामुखी और भूकम्प दोनों ही आते है ऐसी जगहों पर । भाग दो मे हमने जिस सेंटोरिनी के बारे में बात के - ऐसा ही "thermal plume" है ।

------------------------
ज्वालामुखियों के प्रभाव :

आम तौर पर ऐसा लगता है की ज्वालामुखी उतने विनाशकारी न होते होंगे जितने भूकंप - क्योंकि उनका असर सिर्फ उस भूभाग तक होता होगा- जितने में लावा बह कर जाए । परन्तु ऐसा है नहीं ।

1.
ज्वालामुखी से सिर्फ लावा ही नहीं निकलता, साथ ही भीतर की जहरीली गैस, एसिड (जिससे काफी बड़े क्षेत्र में एसिड रेन का भय होता है ), राख और धुआं आदि भी वातावरण में बड़े ही उच्च चाप से फिंकते हैं (poisonous gases, acid, ash and smoke)। यह सब वातावरण में फ़ैल जाता है । जो पिघले पत्थर हैं - वे एक नदी की तरह बह निकलते हैं । साथ ही (- जैसे दूध उबल कर गिरे तो सिर्फ दूध बहता ही नहीं, बल्कि दूध की नन्ही नन्ही महीन सी बूँदें भी उछलती हैं हवा में, जो इतनी छोटी होती हैं की दिखती नहीं - किन्तु होती तो हैं, और पूरे प्लेटफोर्म पर दूध के छीटें दिखने लगते हैं ) पिघले माग्मा (magma) की महीन बूंदे भी बड़े वेग से आसमान में फिंक जाती हैं । ये इतनी छोटी हैं कि बड़ी जल्दी जम जाती हैं और हवा में ही धूल बन जाती हैं ।




चित्र गूगल इमेजेस से साभार ।

2.
जो कुछ मोटी हों - वे धूल / मिटटी (dust) के मोटे कण बनाती हैं - जो अपने वजन की वजह से धीरे धीरे नीचे बैठ जाती हैं । परन्तु अत्यधिक छोटे धूल के कण बैठते नहीं - वातावरण में ही रहते हैं । ये इतने महीन हैं - की ये हवाई जहाज़ों के air conditioning filters के पार निकल जाते हैं । इससे हवाई जहाज़ों के संयंत्र फेल हो कर क्रैश हो सकता है । इसके अलावा यह फैली हुई धूल कई महीनों तक आस पास के बहुत बड़े क्षेत्र में लोगों को सांस की तकलीफ (दमा आदि) और किडनी की भी - क्योंकि यह धुल हमारी साँसों से फेफड़ों से होकर खून तक पहुँच सकती है । 2010 में आइसलैंड में जो ज्वालामुखी फूटा था - उसकी वजह से महीने से ज्यादा वक़्त ता यूरोप पर से हवाई उड़ानें डिस्टर्ब हो गयी थीं । indoneshia में विस्फोट के बाद बरसों तक इस धूल ने दुनिया को रंग बिरंगे सूर्योदय और सूर्यास्त दिखाए ।

3.
कई बार ज्वालामुखी फटने से भीतर का मेग्मा बाहर निकलने से भीतर खोखलापन आ जाता है - और उस पहाड़ की (या आस पास की ) धरती धंस (volcanic collapse )जाती है । इसे caledra कहते हैं । कई बार इस गड्ढे में लावा भर जाता है और जम जाता है ।

4.
यदि पहाड़ ऊंचा था और उस पर बर्फ जमी थी - तो पिघले गर्म पत्थर जब टनों बर्फ से मिलते हैं - तो क्षण भर में बर्फ पिघल जाती है, और लावा ठोस मिटटी में बदल जाता है । इससे लावा की छोटी नदी के बजाये सारे ही पिघली बर्फ की कीचड भरी गर्म नदी बाढ़ की तरह अचानक ही आ जाती है - और रास्ते में आये हर गाँव और शहर को नेस्तनाबूत कर देती है । इसे mud slide कहते हैं ।


चित्र गूगल इमेजेस से साभार ।

5.
लावा का बहाव तो खैर सब जानते ही हैं की विनाशकारी है ही ।


चित्र गूगल इमेजेस से साभार ।

ये सभी वजहें इतिहास में महाविनाश का कारण बनी हैं ।
-----------------------
ज्वालामुखियों के प्रकार :

चार मुख्य तरह के ज्वालामुखी होते हैं - cinder cones, composite volcanoes, shield volcanoes, और lava domes. ज्वालामुखियों को active (जो लगातार फूटते रहते हैं ) , intermitent (जो फूटता रहता है परन्तु लगातार नहीं ) dormant (जो काफी समय से नहीं फूटा, लेकिन फूटने की अपेक्षा है ) और extinct (मृत - जो जबसे इतिहास की जानकारी है तब से अब तक कभी नहीं फूटा, इसलिए मान लिया गया कि अब न फूटेगा ) मानते हैं - लेकिन कुछ ऐसे भी हैं जिन्हें "मृत" घोषित किया जा चुका था - परन्तु ये फिर से फट पड़े!!

समुद्र के तल में कई जगह ऐसे क्रैक हैं जो भूभाग के ज्वालामुखी की तरह अचानक नहीं फटते , बल्कि लगातार थोडा थोडा रिसते रहते हैं । इनसे निकला लावा जमता रहता है और नए सागरतल का निर्माण होता रहता है । कई द्वीप भी ऐसे बने हैं ।

यहाँ एक सारिणी है - इतिहास के सबसे विनाशकारी ज्वालामुखी विस्फोटों की । कुछ विशेषज्ञ मानते हैं की अटलेटिस सभ्यता का सर्वनाश वोल्कनिक इरप्शन से हुआ । ऊंचे बर्फ से दबे ज्वालामुखी में विस्फोट से टनों बर्फ पिघली और कीचड की बहती नदी (बाढ़) ने पूरे शहरों को ढँक दिया । जो जहां जैसे था - जम गया उस कीचड के नीचे । परन्तु यह सच है या नहीं इसका कोई प्रमाण नहीं है । इंडोनेशिया के krakatoa ज्वालामुखी के भयंकर विस्फोट से वह पूरा द्वीप धंस गया और समुद्र में डूब गया - यहाँ के निवासी तो खैर समुद्र की भेंट चढ़ ही गए, साथ ही इससे उठी सुनामी ने और भी कई द्वीपों पर भयंकर तबाही की ।

6 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत ही विस्तृत जानकारी ... विज्ञान न जानने वाले भी समज्ख पा रहे होंगे ...

    उत्तर देंहटाएं
  2. प्रकृति की विनाशकारी लीला की विस्मयकारी जानकारी के लिये धन्यवाद! कुछ कभी पढा था, कुछ शायद कभी नहीं। अब पढकर कुछ तो समझा ही है। आशा है ऐसी अन्य लाभकारी आलेख श्रंखलायें पढने को मिलती रहेंगी।

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. thanks smart indian ji .

      जी - अभी तो बहुत सी पुरानी अधूरी श्रुंखलाएं हैं - उन्हें पूरा कर लूं | यह मैंने observe किया है की बड़े जोश से शृंखला शुरू कर देती हूँ - फिर अधूरी छोड़ देती हूँ | इसे सुधारने का प्रयास कर रही हूँ |

      हटाएं
  3. नयी जानकारी और महत्वपूर्ण लेख के लिए आभार आपका !

    उत्तर देंहटाएं
  4. नयी जानकारी और बहुत सुन्दर प्रस्तुति .

    उत्तर देंहटाएं