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मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः |
आगमापायिनोSनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत || १४ ||
मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः |
आगमापायिनोSनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत || १४ ||
मात्रा स्पर्षास्तु (इन्द्रिय संज्ञान के असर(स्पर्श) से (मन भी इन्द्रियों का राजा ही माना गया है) ) कौन्तेय (हे कुन्तीपुत्र(अर्जुन)) शीत उष्ण (सर्दी, गर्मी) सुख दुःख (सुख और दुःख) दाः (देते हैं, आभास कराते हैं) आगम (आने वाले, प्रकट होने वाले ) अपायिनो (जाने वाले, अप्रकट होने वाले ) अनित्य (अस्थायी) तां (इन्हें) तितिक्षस्व (सहन करना, उपेक्षा करना, ध्यान ही में न लेना) भारत (हे भारत (अर्जुन))
इन्द्रिय अनुभूति (और मन की भी ) - गर्मी, सर्दी,सुख और दुःख की अनुभूति कराती हैं । जैसे ये मौसम के असर आने जाने वाले हैं, स्थायी नहीं, वैसे ही सुख दुःख भी आने जाने वाले हैं । हे भारत, इनसे प्रभावित हुए बिना इन्हें सहन करना (अनुभव करते हुए भी उपेक्षा करना) सीख ।
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DISCLAIMER :
I am not able to implement all this in real life. I am a student of the Geeta, and just as normal a human being with as normal circumstances as most of the readers here (not all - saome readers may be very high level ideal persons). I am just trying to read / understand / share the Geeta's message NOT claiming to be a person with the high ideal characteristics intended in the Geeta. I am not a hippocrite, and I do know that I have my limitations and weaknesses. I know many atheist persons who present the verses of the vedas perfectly. Please do not associate me with the perfection of the Geeta (or hippocricy ) just because I am trying to share the nectar I received from it) Krishna says elsewhere in the geeta that four types of persons try to get into this study - and only the highest category are the "gyaani" category. I am not one of them.
मेरे निजी जीवन में गीता जी में समझाए गए गुण नहीं उतरे हैं । मैं गीता जी की एक अध्येता भर हूँ, और साधारण परिस्थितियों वाली उतनी ही साधारण मनुष्य हूँ जितने यहाँ के अधिकतर पाठक गण हैं (सब नहीं - कुछ बहुत ज्ञानी या आदर्श हो सकते हैं) । गीता जी में कही गयी बातों को पढने / समझने / और आपस में बांटने का प्रयास भर कर रही हूँ , किन्तु मैं स्वयं उन ऊंचे आदर्शों पर अपने निजी जीवन में खरी उतरने का कोई दावा नहीं कर रही । मैं पाखंडी नहीं हूँ, और भली तरह जानती हूँ की मुझमे अपनी बहुत सी कमियां और कमजोरियां हैं । मैं कई ऐसे इश्वर में आस्था न रखने वाले व्यक्तियों को जानती हूँ , जो वेदों की ऋचाओं को भली प्रकार प्रस्तुत करते हैं । कृपया सिर्फ इस मिल बाँट कर इस अमृतमयी गीता के पठन करने के प्रयास के कारण मुझे विदुषी न समझें (न पाखंडी ही) | कृष्ण गीता में एक दूसरी जगह कहते हैं की चार प्रकार के लोग इस खोज में उतरते हैं, और उनमे से सर्वोच्च स्तर है "ज्ञानी" - और मैं उस श्रेणी में नहीं आती हूँ ।
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पिछले श्लोक में श्री कृष्ण ने कहा कि जैसे जीव बदलते हुए शरीर में (पहले एक बालक शरीर , फिर युवा शरीर और फिर बूढा शरीर - शरीर तो तीनो अलग अलग हैं, परन्तु उनमे रहने वाला जीव एक ही है, समय के साथ सिर्फ शरीर बदल रहे हैं । विज्ञान के अनुसार भी हमारा शरीर हर सात वर्ष में पूरी तरह बदल जाता है ) में स्थायी रूप से (बिना किसी बदलाव के ) - अपरिवर्तित रहता है (हम आज भी वही व्यक्ति हैं जो शायद दस-पंद्रह साल पहले थे, हमारी इच्छाएं, आशाएं, प्रेम, क्रोध आदि करीब करीब वही हैं )
उसी तरह से मृत्यु पर भी वह जीव अपरिवर्तित ही रहता है, बस शरीर बदलता है, जैसे यह शरीर इस जीवन में लगातार बदलता रहा था । इसमें धीर जन मोहित नहीं होते (disclaimer : मैं धीर नहीं हूँ, कृष्ण कह रहे हैं कि धीर मोहित नहीं होते)) । अगले श्लोक में वे कहते हैं कि जो अपने जीवन में इस अस्पृश्य भाव को आत्मसात कर ले, वह पुरुषों में पुरुषर्षभ है - अर्थात उच्च श्रेणी का है ।
उसी तरह से मृत्यु पर भी वह जीव अपरिवर्तित ही रहता है, बस शरीर बदलता है, जैसे यह शरीर इस जीवन में लगातार बदलता रहा था । इसमें धीर जन मोहित नहीं होते (disclaimer : मैं धीर नहीं हूँ, कृष्ण कह रहे हैं कि धीर मोहित नहीं होते)) । अगले श्लोक में वे कहते हैं कि जो अपने जीवन में इस अस्पृश्य भाव को आत्मसात कर ले, वह पुरुषों में पुरुषर्षभ है - अर्थात उच्च श्रेणी का है ।
अब वे कह रहे हैं की जैसे सर्दी गर्मी के मौसम के साथ ठण्ड और गर्मी के अहसास आते जाते रहते हैं, उसमे दुखी या सुखी होने की कोई बात नहीं है , उसी तरह से जीवन में सुख और दुःख की अनुभूति कराने वाली परिस्थितियाँ आती जाती रहती हैं - उनमे हमें निर्लिप्त ही रहना चाहिए ।
पार्थ शिष्य है - वह सुन रहा है । सुन तो रहा है, परन्तु यह उसके जीवन के सत्य नहीं बने हैं अभी । वह कृष्ण नहीं है, नारायण नहीं, सिर्फ नर है । नारायण कह रहे हैं, नर सुन रहे हैं । न पार्थ गीता से पहले मात्रा स्पर्श से अस्पृश्य था, न इसके उपरांत हुआ । हाँ, वह इस गीता अमृत के बाद अपने कर्म पथ पर चलने पर ज़रूर अडिग हो गया था, परन्तु जीवन मृत्यु के सुख दुःख से
अस्पृश्य (अनछुआ) नहीं । न पार्थ, न उसकी माता ही ।
तो गीता पाठ का अर्थ यह नहीं की उसके सारे उच्च आदेशों का हम अपने जीवन में पूर्ण सामंजस्य ला ही पायेंगे, या न ला सके तो हम नीच हो जाएँगे । किन्तु इस पठन-पाठन और श्रवण से हमारे जीवन की अशुद्धियों से शुचिता की ओर अग्रसर होने की राह अवश्य खुलती है, सुपथ पर कुछ प्रगति तो होती ही है । आगे गीता में कई जगह इस पर बात-चीत है ।
अर्जुन कई तरह से पूछते हैं की हम इन सब बातों के प्रयास करें और बीच में मार्गच्युत हो जाएँ - तो क्या ? हर बार कृष्ण कहते हैं - तुम्हारे प्रयास महत्वपूर्ण हैं । सफलता या असफलता, पूर्ण लक्ष्य प्राप्ति की लिप्सा या अपूर्ण यात्रा में राहच्युत हो जाने के भय न करो - that is not your department ,it is not your worry,it is mine . तुम्हारे "योग्य" कर्म तुम्हारा धर्म हैं, परन्तु वे कर्म सफल हों या नहीं,इससे तुम्हारे कर्म का महत्त्व कम नहीं होता।
जारी ।
Good Ma'm..
प्रत्युत्तर देंहटाएंNice Explanation of Lord Krishna's Voice Geeta.
Please keep Continue this..I am also a great Fan of "Geeta".
http://yayavar420.blogspot.in/
thanks. i read your post about the "abla kaun" and i liked the approach. true, if the hens / girls are not taught and conditioned to beleive that they are weaker than the cats/ boys, they won't be. psychology does play a lot of role.... thanks.
हटाएंबहुत खूबसूरत विश्लेषण है हम मे से कोई भी पूर्ण नही है जो पूर्ण हो गया उसे खोजने को कुछ न रहा और हम सभी अभी इसी राह मे अग्रसर हैं और सिर्फ़ कर्म करने के लिये स्वतंत्र हैं और जो कर्म किये यदि उन्हे मनसा वाचा और कर्मणा कृष्णार्पण करते चलो तो वो कर्म ही हमारा भागवत धर्म बन जाता है जिस दिन पूर्ण समर्पण करना आ गया फिर सारा कार्यभार उसी का हो जाता है तभी तो उन्होने गीता के 18 वें अध्याय के 66 वें श्लोक मे कहा है
प्रत्युत्तर देंहटाएंतज धर्म सारे एक मेरी ही शरण को प्राप्त हो
मै मुक्त पापों से करूँगा तू ना चिन्ता व्याप्त हो
aabhaar vandana ji | aap to khud hi krishn bhakt hain, aapse kya kahoon ? :)
हटाएं@ तज धर्म सारे एक मेरी ही शरण को प्राप्त हो
मै मुक्त पापों से करूँगा तू ना चिन्ता व्याप्त हो
- so true. thanks
फल के लिए अधीर मनुष्य यहीं चुक करता है, जब नतीजा अनुकूल नहीं देखता, सद्कर्मों से विचलित हो जाता है। प्रभु नें इसी प्रवृति पर नियंत्रण लाने के उद्देश्य से "कर्मयोग" का सिद्धांत प्रतिपादित किया। किन्तु इसका तात्पर्य यह नहीं कि बुरे कर्म भी करते ही चले जाओं क्योंकि कर्म आवश्यक है फल की इच्छा रहित। मैं समझता हूँ प्रभु का आशय स्पष्ट है, कि वाकई किसी कर्म को समझना दुर्लभ हो जाय, तुम दुविधाग्रस्त हो जाओं उसी अवस्था में उचित के पक्ष को विवाद मुक्त कर दो।
प्रत्युत्तर देंहटाएंउपरोक्त श्रलोक वाकई कल्याणकारी है।
प्रत्युत्तर देंहटाएंसुख और दुःख से निर्लिप्त रहकर सम भाव से निर्वाह करने का उपदेश है।
क्योंकि सुख दुःख दोनों का ही आना जाना शाश्वत है लेकिन अस्थायी है। आभासी है। ज्ञानी जन फिर क्यों इनसे आर्त या अतिशय प्रसन्न हो?
आदरणीय सुज्ञ जी, आप की बातें ज्ञान और विवेक से हमेशा परिपूर्ण होती हैं | आभार |
हटाएंये तो एक ही श्लोक है ... ऐसे कितना ज्ञान बस एक ही किताब में है ... गीता के इस श्लोक की विस्तृत व्याख्या के लिए आभार ...
प्रत्युत्तर देंहटाएंसच कह रहे हैं दिगंबर जी आप - गीता तो अपरिमित ज्ञान का स्रोत है ही |
हटाएंआपने सही कहा है आदर्श हमें राह दिखाने के लिये होते हैं,जब हम उन पर चलने का प्रयत्न करते हैं इतने भर से ही जीवन उच्चतर दिशा की ओर बढ़ने लगता है, सार्थक पोस्ट !
प्रत्युत्तर देंहटाएंसच है अनीता जी - राह सही हो, दिशा सही हो, तो प्रगति तो उच्च लक्ष्य की और ही होगी |
हटाएंपुरुषर्षभ से निरामिष पर ऋषभ और वृषभ पर हुए कुछ विमर्श याद आ गये, धन्यवाद!
प्रत्युत्तर देंहटाएं@ पुरुषर्षभ से निरामिष पर ऋषभ और वृषभ पर हुए कुछ विमर्श
हटाएंपुरुषर्षभ = पुरुषों में श्रेष्ठ |
ऋषभ कंद = कंदों में श्रेष्ट ?
जाकी रही भावना जैसी - प्रभु मूरत देखि तिन तैसी |
"
जिन्हें जीभ का स्वाद मांसाहार के लिए स्वप्नबाग दिखाए,
क्या अचरज कि उन्हें कंद में भी वृषभ (मांस) नज़र आये ?
उन्हें तो वेदों में जीवहत्या और हिंसा के आदेश दीखते हैं,
और जीवप्रेमी जन कुरआन में भी दयाभाव खोज लेते हैं |
"
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अन्य पाठक इस बारे में पढना चाहें तो लिंक ये हैं, जहां "मांसाहार समर्थक" वेदों को आदर देने का ढोंग और पाखण्ड रचाते हुए अर्थ के अनर्थ कर के उनमे गौ हत्या , बैल ह्त्या आदि साबित करने के प्रयास करते हैं, और इन सब दुष्प्रचारों का वहां अनावरण किया गया है |
1. http://niraamish.blogspot.in/2011/11/mass-animal-sacrifice-on-eid.html?showComment=1321818966002#c7702800743691484139 - पशु-बलि : प्रतीकात्मक कुरीति पर आधारित हिंसक प्रवृति -प्रस्तुतकर्ता :- सुज्ञ
2. http://niraamish.blogspot.in/2012/02/blog-post.html - ऋषभ कंद - ऋषभक का परिचय ।। वेद विशेष ।। - प्रस्तुतकर्ता :- अमित शर्मा
3. http://niraamish.blogspot.in/2011/11/blog-post.html - वैदिक यज्ञों में पशुबलि---एक भ्रामक दुष्प्रचार - प्रस्तुतकर्ता :- पं.डी.के.शर्मा"वत्स"
4. http://niraamish.blogspot.in/2011/12/blog-post.html - यज्ञ हो तो हिंसा कैसे ।। वेद विशेष ।। - प्रस्तुतकर्ता :- अमित शर्मा
5. http://niraamish.blogspot.in/2011/11/roots-of-vegetarianism-in-india.html - भारतीय संस्कृति में मांस भक्षण? - प्रस्तुतकर्ता :- Smart Indian - स्मार्ट इंडियन
6. http://niraamish.blogspot.in/2011/12/blog-post_09.html ( - वैदिक संस्कृति और माँसाहार ??? - प्रस्तुतकर्ता :- पं.डी.के.शर्मा"वत्स")
7 . http://niraamish.blogspot.in/2012/01/vegnon-veg-food-comparative-study.html - अन्न / फल / फूल / कंद / मूल आदि पर आधारित आहार , और चल प्राणियों से प्राप्त आहारों में मूल फर्क क्या है ? - शिल्पा मेहता , प्रस्तुतकर्ता :- निरामिष
8 . http://niraamish.blogspot.in/2012/01/no-violence-in-vegetarian-food.html शाकाहार में भी हिंसा? एक बड़ा सवाल!! (उतरार्ध) - प्रस्तुतकर्ता :- सुज्ञ
साधुवाद!!, वेदों के अनर्थ पर इन सूत्रों को पाठकों समक्ष रखने के लिए!!
हटाएंबहुत बढ़िया!!
हटाएंशिल्पाजी,
प्रत्युत्तर देंहटाएंइस पोस्ट के अंतिम दो पैरा बहुत महत्वपूर्ण हैं| सही राह प्रशस्त होना, ये कम नहीं| फल मिले न मिले, जल्दी मिले या देर से मिले, निस्पृहता से कर्म करने की प्रेरणा जिस स्पष्टता से गीता देती है, वह दुर्लभ है| अपने स्कूली दिनों में किसी पुरस्कार में गीता की एक प्रति मिली थी| सच कहूँ तो बहुत रोचक नहीं लगी थी उस समय, लेकिन जो थोड़ा बहुत समझ पाया उसने आने वाले समय में बहुत साथ दिया|
यह श्लोक मैंने पहली बार ध्यान से पढ़ा-जाना है, इसके लिए आपका धन्यवाद| हाँ, इससे मिलता जुलता एक और श्लोक 'सुखदु:खे समेकृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ' मेरे पसंदीदा श्लोकों में से एक है|
आभार संजय जी |
हटाएं@ "सुख दुखे समे कृत्वा ..." मेरे भी पसंदीदा श्लोकों में से एक श्लोक है यह, परन्तु इसे जीवन में उतार पाना मेरे बस से बाहर ही है (कम से कम अभी तक तो )
वह तो मेरा भी पसन्दीदा श्लोक है :)
हटाएंस्मार्ट जी - आपने तो शायद इसे काफी हद तक अपने जीवन में उतार भी लिया होगा :)
हटाएंक्या कहूँ, "मो सम कौन ..." संजय जी हुए, "आलसी" का खिताब राव साहब के पास चला गया, अपना क्या है:
हटाएंजेब सदियों से मेरी खाली थी
मेरा क्या था जो अब गंवाना था
वैसे तो आपकी खाली जेब ऐसी है तो भरी जेब कैसी रही होगी, इस विषय पर भी सोचा जा सकता है लेकिन फिलहाल आपने जो कहा, उस पर
हटाएं'अभी अभी मेरे दिल में, ख्याल आया है'
कि जेब में क्या है, उससे ज्यादा मायना ये रखता है कि 'और क्या चाहिए?'
एक बहुत बड़े फक्कड ने इशारा भी किया था, 'जिसको कछु न चाहिए, वो ही शहंशाह|' अब बताया जाए कि जेब खाली होना अफ़सोस का विषय है या उसमें ये संतोष छिपा है कि खोने का डर नहीं|
@ सुख दुखे समे कृत्वा
हटाएंसंजय जी, अनुराग जी - दरअसल मैं इस श्लोक पर अभी ही लिखना चाहूंगी - परन्तु क्योंकि मैं क्रमवार चल रही हूँ, इसलिए यह श्लोक आने में अभी देर है | सो यहीं टिपण्णी में सही |
श्लोक है :
सुख दुखे समे कृत्वा (सुख दुःख को समान मान कर)
लाभ- अलाभौ , जय - अजयौ (लाभ और हानि, जीत और हार)
ततो युद्धाय युज्यस्व (तब युद्ध के (कर्त्तव्य के) लिए युद्ध कर)
न इवं पापं वाप्यासी (इस तरह (युद्ध करने से) तू पाप को प्राप्त नहीं होगा )
अब - युद्ध में कई लोगों के प्राण जाते हैं - तो पाप कैसे नहीं ? कृष्ण कह रहे हैं, पाप युद्ध में नहीं, योद्धा के मन में होता है | योद्धा किस उद्देश्य से युद्ध कर रहा है - यह तय करता है की वह पाप करता है, पुण्य करता है, या फिर निष्काम कर्म |
अर्जुन युद्ध करने आया था निजी प्रतिशोध (पत्नी का अपमान) और निजी लाभ (बड़े भाई का राज्याभिषेक) के लिया | पांडवों और कौरवों में कोई भी निष्काम नहीं है | सब अपने अपने लक्ष्य, selfish (self-ish) interests ले कर आये हैं, धर्म की रक्षा का सिर्फ दिखावा हो रहा है, सब अपने आप को (और दूसरों को) मूर्ख बना रहे हैं | लोग कहते हैं की वे सत्य के साथ हैं -(इस पर एक कविता लिखी थी मैंने "सच कड़वा होता है - सचमुच?" यहाँ है - http://shilpamehta1.blogspot.in/2012/02/is-truth-bitter.html |
हम सच के साथ नहीं होते | यदि सच ही हम सच के साथ हैं, तो हम होते ही नहीं, तब सिर्फ सच होता है | पाप पुण्य तब रह ही नहीं जाता क्योंकि सत्य वह catalyst (शायद यह catalyst गीता की व्याख्या में विकर्म कहलाता है) है जो कर्म को अकर्म बना देता है | यदि हम कह रहे हैं की "मैं सच के साथ हूँ" तो इसका अर्थ ही है की हमें अपने सच के "सत्य" - the all powerful truth - होने में संदेह है, उसके स्व-सशक्त न होने के वजह से हमने कोई छोटा सा टुकड़ा चुन लिया है सच का, जो हमारे अहंकार के पोसे लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए suitable है ) | और कई लोग जो कुरुक्षेत्र में नहीं लड़ रहे - ध्रितराष्ट्र, गांधारी, कुंती, द्रौपदी .... ये सब भी अपने मन के लक्ष्यों को लेकर युद्ध लड़ ही रहे हैं | शायद निष्काम के सबसे करीब इस युद्ध में आये हैं अभिमन्यु और घटोत्कच - जो अपने लिए नहीं, बल्कि पुत्रधर्म के लिए युद्ध कर रहे हैं | नहीं तो अधिकतर योद्धाओं के तो निहित स्वार्थ ही जुड़े हैं इस युद्ध में | इसी तरह से राम रावण युद्ध में शायद कुम्भकर्ण निष्काम के करीब पहुंचे थे | भगत सिंह जी, आज़ाद जी, वोहरा जी - ये इसके करीब पहुंचे थे |
अदा जी ने कुछ दिन पहले लिखा था - लोग धर्म पर अधर्म की विजय कहते हैं, किन्तु मुझे तो अधर्म पर अधर्म की विजय ही दख रही है | ऐसा ही कुछ मुझे भी लगता है |
continued ...
continued ...
हटाएं@ मोसम, आलसी, स्मार्ट इंडियन
आभासी दुनिया है यह ब्लॉग जगत - सब माया | जो खुद को "मोसम कौन" कहते हैं, वे कुटिल खल कामी नहीं हैं :) जो खुद को आलसी कहते हैं वे सरकारी बगीचे की देखरेख और मोहल्ले की साफ़ सफाई के बीड़े उठाते हैं :) | - सब माया है :) | याद आता है की हे प्रसिद्द पातकी में गिरिजेश जी ने स्मार्ट जी को "भारतीय" जी कहा | यह ज़रूर suitable लगा है, क्योंकि देशप्रेम और हमारे अमर सेनानियों की जितनी बातें आपके ब्लॉग पर पढने मिलीं, उससे आपका नाम भारतीय जी बिलकुल सटीक लगता है | भारतीयता की नदी बहती है वहां |
@ खाली जेब
कहते हैं, कमरे में ताजी हवा तभी हो सकती है जब cross ventilation हो | हवा आने की खिड़की खुली हो और जाने की नहीं, तो बासी हवा ठहरी ही रहती है कमरे में | जेब खाली होने के कारण अलग अलग हो सकते हैं | नहीं तो जेब यदि बार बार खाली न की जाए - तो भर ही जाती है, पुराने बिजली के बिल, tailor का फोन नंबर लिखा नोट, किरणे के सामन की लिस्ट - कितनी चीज़ें routinely जाती रहती हैं जेब में | इन से ही जेब भर जाती है | जेब तो जेब - बड़े बड़े handbags भी भर जाते हैं, तिजोरियां भी , महल भी :) |
और अक्सर जेबें ऐसी ही चीज़ों से भरी मिलती हैं की अचानक अभी बुलावा आ जाए और जाना पड़े, और जेब से जानना हो की जीवन में क्या खोया क्या पाया, तो कचरा ही ले जायेंगे acheivement के नाम पर :( | बड़ा ध्यान रखना पड़ता है, यदि आइना साफ़ रखना है तो उसे रोज़ साफ़ करना होता है | जिसकी जेब में रुपयों { डॉलरों :) } के कंकर पत्थर भरे हों, वह ज्ञान के हीरे मोती मिस कर जाएगा ही | कीचड से पूरी भरी गगरी में अमृत नहीं उतरता , उल्टा पात्र हो तो लाख वर्षा होती रहे, वह खाली ही रह जाएगा | सागर में भी उल्टा उतर जाए पात्र, - तो भी भर तभी पायेगा - जब सीधा हो, और भीतर भरी हवा को बाहर निकाल कर खाली हो पाए | अब जेब खाली रखना या भरी रखना - यह हर एक का निजी निर्णय है, निजी पसंद है | ऐसी खाली जेब को मेरा प्रणाम है |
मैं अभी भी महभारत के युद्ध से कन्विंस नहीं हूँ...
हटाएंयुद्ध का उद्देश्य क्या था ?
राज्य की प्राप्ति...इसलिए ये कहना कि यह निष्काम था, मुझे सही नहीं लगता...
गलतियाँ दोनों ओर से हुई थी, फिर कृष्ण का एक का पक्ष लेना भी उचित नहीं लगा मुझे कभी भी...कभी-कभी तो ये भी लगता है, कृष्ण ने शायद ख़ुद के किसी बात का बदला ले लिया हो, अर्जुन को हथियार बना कर...क्योंकि अर्जुन युद्ध के लिए कभी तैयार नहीं था..उसके हाथों अपने बड़े-बुजुर्गों, गुरुओं को हर तरह के छल का उपयोग करके मारना और उसे उचित ठहराना, बिल्कुल ग़लत है, मैं नहीं मानती ऐसी बातों को....वैसे भी पांडवों का कोई हक़ नहीं था उस राज्य पर, वो सिर्फ़ नाम के पाण्डव थे, पांडू-पुत्र नहीं थे, फिर कौरव इतने समय से राज कर ही रहे थे....आज भी भारत का संविधान कहता है अगर किरायेदार १२ साल तक आपके घर में रह रहा है, तो उस घर पर किरायेदार का अधिकार हो जाता है...इसलिए, न रक्त के हिसाब से न ही कब्ज़ा के हिसाब से, पाण्डव राज्य के अधिकारी थे....शायद इसीलिए अनधिकृत रूप से और कृष्ण के बहकावे में आकर, राज्य जीत कर भी पाण्डव ख़ुद को माफ़ नहीं कर सके, और राज्य नहीं कर पाए...
अगर यही बात है तो फिर तालेबान क्या ग़लत कर रहे हैं, हमारे अपने तर्क हैं, तो उनके अपने हो सकते हैं...
हमारी नज़र में भगत सिंह एक शहीद हैं, लेकिन ब्रिटिश कि नज़र में एक आतंकवादी....
मुझे तो महभारत में सबकुछ गड़बड़ ही नज़र आता है....
सच कहूँ तो, आज जो भी हो रहा है, भारत में, अधिकतर बातें, इस पुस्तक से मेल खातीं हैं...
लोगों को बुरा लगेगा, लेकिन मैं हिन्दू हूँ सिर्फ़ इसलिए अन्याय और अनुचित बात मान लूँ , मुझसे ये नहीं होगा...
अदा जी - मेरी टिपण्णी पढ़िए please |
हटाएं@
अर्जुन युद्ध करने आया था निजी प्रतिशोध (पत्नी का अपमान) और निजी लाभ (बड़े भाई का राज्याभिषेक) के लिया | पांडवों और कौरवों में कोई भी निष्काम नहीं है | सब अपने अपने लक्ष्य, selfish (self-ish) interests ले कर आये हैं, धर्म की रक्षा का सिर्फ दिखावा हो रहा है, सब अपने आप को (और दूसरों को) मूर्ख बना रहे हैं | लोग कहते हैं की वे सत्य के साथ हैं -(इस पर एक कविता लिखी थी मैंने "सच कड़वा होता है - सचमुच?" यहाँ है - http://shilpamehta1.blogspot.in/2012/02/is-truth-bitter.html |
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अदा जी ने कुछ दिन पहले लिखा था - लोग धर्म पर अधर्म की विजय कहते हैं, किन्तु मुझे तो अधर्म पर अधर्म की विजय ही दख रही है | ऐसा ही कुछ मुझे भी लगता है |
आपकी कई बातों से मैं खुद भी सहमत हूँ, सब नहीं पर अधिकतर बातों से |
अदा जी, शिल्पा जी,
हटाएंइस तरह तो गीता आध्यात्म-दर्शन ग्रंथ से निष्कासित हो जाएगी। क्या इसे कलह और युद्ध का उक्सावा मात्र मानें?
यदि उपरोक्त श्रलोक में युद्ध को वास्तविक हिंसक युद्ध न मानकर अन्तरात्म में इन्द्रिय सुखों के साथ संघर्ष युद्ध मानें तो श्रलोक आध्यात्मिक उपदेश हो सकता है।
श्रीमद्भगवद्गीता सदियों से अनेक महापुरुषों और संतो का प्रेरणा ग्रन्थ रहा है.
हटाएंआदि गुरु शंकराचार्य जी ,संत ज्ञानेश्वर जी ,स्वामी विवेकानन्दजी,बाल गंगाधर तिलक,
महर्षि अरविंदो,सुभाष चंद्र बोस,महात्मा गांधी,डॉ. राधा कृष्णन और न जाने
कितने और अनेकानेक महापुरुष.
४० वर्ष पूर्व मैंने श्रीमद्भगवद्गीता को पढ़ने की कोशिश की.समझ नही
आई,फिर कोशिश की,बार बार कोशिश से और प्रभु की कृपा से अब मैं
इतना समझ पाया हूँ कि श्रीमद्भगवद्गीता को माँ का दर्जा यूँ ही नही प्राप्त
हुआ है.
भेद दृष्टि से कुछ भी समझ आने वाला नही.यहाँ तक कि विज्ञान
के सूत्र भी नही.विज्ञान में भी सर्वप्रथम 'assume'करना पड़ता है,फिर
श्रद्धा पूर्वक प्रयोग करते रहने पर प्रयोगशाला में सिद्ध हो पाता है.
श्रद्धा,विश्वास,निरंतर लगन और अभ्यास से जो आपको
मिलेगा उसे आप शब्दों में व्यक्त नही कर पायेंगे.जीवन की
प्रयोगशाला में संतो और महापुरुषों ने गीता के सूत्रों को सिद्ध
किया है.हम सब भी कोशिश कर सकते हैं.
श्रीमद्भगवद्गीता के अनेक सूत्रों में एक सूत्र है 'श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं'
बिना श्रद्धा के किसी भी विषय के ज्ञान को आत्मसात करना कठिन है.
फिर श्रीमद्भगवद्गीता का ज्ञान तो अध्यात्म ज्ञान है.जिसकी लेश
मात्र भी समझ बिना श्रद्धा के असंभव है.
आप गुणी और ग्यानी हैं.
किसी भी मतभेद के लिए क्षमा चाहता हूँ.
@ कितनी भी श्रद्धा और कितना भी विश्वास मैं रख लूँ...अपने गुरुजनों की हत्या (द्रोणाचार्य), अपने घर के बड़े बुजुर्गों की हत्या (भीष्म), अपने से छोटों की हत्या (अभिमन्यु) सिर्फ राज्य पाने के लिए...वो भी छल से, कभी किन्नर के पीछे छुप कर, कभी अश्वस्थामा (हाथी) मारा गया जैसे झूठे सन्देश देकर....इन बातों में श्रद्धा रखूं..? हरगिज़ नहीं ...
हटाएंसुज्ञ जी, मैं मूढ़मति हूँ, सीधी सादी बात समझती हूँ, घुमा कर कान पकड़ने की आदत नहीं है, मुझे तो सीधा-सादा प्रसंग पसंद है, और फिर भारत की अधिकतर आबादी मेरी ही जैसी है, ऐसे देश में इस तरह के उपदेशों का क्या काम, जो सर के ऊपर से ही निकल जाए, और लोग अटकल ही लगाते रह जाएँ की शायद इसका मतलब ये होता होगा...इतना भी गूढ़ सन्देश क्यों देना जिसको कोई समझ ही न पाए...होंगे यहाँ बड़े ज्ञानी-ध्यानी लोग, जिन्होंने अपने सम्पूर्ण इंदियों पर विजय पा राखी होगी...लेकिन हम ऐसी नहीं हूँ, और मेरे जैसे करोड़ों ऐसे नहीं हैं...हमेशा हमारे धार्मिक किताबों के लिए यही सब कहा जाता है...जो किताब समझ में ही ना आये उसको क्या अपने सर पर मारना है...?
आपकी ही बात लेती हूँ, अगर ये खुद के इन्द्रियों पर विजय की ही बात हैं तो फिर, द्रोण, भीष्म, अभिमन्यु और न जाने कौन-कौन किन-किन इन्द्रियों को यहाँ पर दर्शा रहे हैं....जिनको मार डाला गया ??
एक तरफ तो, हर गलत बात को सही करारने की कोशिश की गयी है, कुंती की गलतियों को ढांपने की कोशिश, द्रौपदी की गलतियों को ढांपने की कोशिश, यहाँ तक की युधिष्ठिर की महागलती, जुए पर अपनी पत्नी को दांव पर लगाने की घटना को भी सही बताने की बेमतलब की कोशिश है....गलत को जबदस्ती सही बनाने की क्यों कोशिश की जाती है...???
और फिर हम ये क्यों भूलते हैं कि 'जो जीता वही सिकंदर' होता है....जीत पांडवों की हुई, वो राजा हुए, उनके शासन में जो लिखा गया वही मान्य भी हो गया...
इतिहास कभी भी जनता नहीं लिखती, इतिहास हमेशा राजा लिखते हैं, और वही लिखते हैं जो उनको पसंद आता है...
@ शिल्पा जी आपकी टिप्पणी पढ़ी, जान कर बहुत ख़ुशी हुई कि आपके और मेरे विचार बहुत हद तक मिलते हैं...
हटाएंआँख बन्द करके भेड़ चाल में चलने की आदत है हम भारतीयों को, आदर्श ऐसे होने चाहिए जिनको हम अपने जीवन में अपना सकें,
युधिष्ठिर ने जूआ खेला,कोई बात नहीं, अपनी पत्नी तक को दाँव पर लगा दिया, जैसे किसी ने हाथ पकड़ का कहा था लगा दो दाँव पर, इतना घटिया काम तो दुर्योधन ने भी नहीं किया. उसकी भी पत्नी रही होगी, कितनी जगह दोर्योधन कि पत्नी का ज़िक्र है महाभारत में ??? कोई बता देवे ...
युधिष्ठिर का अपनी पत्नी को दाँव पर लगाना, किस हिसाब से उसका अपनी पत्नी के प्रति आदर दिखाता है ?? और अगर पांचाली का पति ही उसको सम्मान नहीं दे रहा तो दूसरे क्या देंगे भला ?? इसे किसी ने ग़लत नहीं कहा, कोई दोष नहीं है युधिष्ठिर का, क्योंकि वो धर्मराज थे..आदर्श थे, लेकिन हम उनके जैसा नहीं बन सकते क्योंकि ये सही नहीं होगा...कोई मुझे ये बताये कि उन्होंने ऐसा क्या किया है जिसको हम अपने जीवन में लागू कर सकते हैं...?? आख़िर किस बात के लिए वो आदर्श हैं ???
हर पात्र से अगर चुन-चुन कर ही आदर्श लेना है...तो फिर वो आदर्श पुरुष नहीं हैं...एक तरफ तो हम कहते हैं कुंती महान स्त्री है, वह पूजा योग्य है, दूसरी तरफ हम उसके बताये हुए रास्ते पर चल नहीं सकते, अगर चले तो खाप पंचायत या फिर ओनर किलिंग...
क्यों भाई ??? ये कैसा आदर्श है..???...अभी ही आ जायेंगे लोग कहने...अदा जी आपको जो जी में आए कीजिये, लेकिन ये कोई नहीं मानेगा...कि हम अपने आदर्श पात्रों को सिर्फ़ एक कम्पार्टमेंट में रखते हैं, उनके तथाकथित आदर्शों से हमें कोई लेना-देना नहीं होता...क्योंकि उन आदर्शों को हम अपने जीवन में लागू करते ही नहीं है....उसका उपयोग सिर्फ़ श्रद्धा दिखाने के लिए ही करते हैं...उन आदर्शों को अपनाने के लिए नहीं....
मतभेद का प्रश्न ही नहीं उठता, यह तो विमर्श है, समझने का प्रयास!!
हटाएंबडे बडे ज्ञानी और श्रद्धान्मत भी मिमांसा तो करते ही है, तभी तो ज्ञान की थाह ले पाते है।
हम सब तो साधारण से विद्यार्थी है, प्रयोजन ज्ञानोर्पार्जन
ग़लती सुधार ..
हटाएं'संविधान' नहीं भारत का 'कानून'
क्षमाप्रार्थी हूँ..
राकेश जी,
हटाएं४० साल लग गए आपको कुछ-कुछ समझने में, जबकि आपने कोशिश की है समझने की..
हमारे जैसे लोग जो भारत की ९९% आबादी से आते हैं...कितना समझ लेंगे और क्या समझ लेंगे ??? अगर ४०-४० साल लगते हैं समझने में, फिर तो हो लिया कल्याण...
जबकि अभी तक हम यही नहीं समझे किस धर्म की रक्षा के लिए ये लड़ाई हुई थी...
बस सुनते हैं अधर्म पर धर्म की विजय हुई थी...बाकी मेरे हिसाब से तो दोनों पार्टी में, अधर्म ही अधर्म था...
@ अदा जी, सुज्ञ जी, राकेश जी
हटाएं"महाभारत" और "गीता" दो अलग अलग ग्रन्थ हैं | गीता सिर्फ महाभारत के युद्ध तक ही सीमित नहीं है |
@महाभारत
मुझे और अदा जी और अनेकों को यह लगता है की महाभारत युद्ध में दोनों ही पक्ष अधर्म की ही और थे - कम ज्यादा अधर्म का फर्क हो सकता है | उदाहरण के तौर पर , द्रौपदी के उस अपमान के लिए मैं सबसे अधिक जिम्मेदार युधिष्ठिर को मानती हूँ - दुर्योधन, दु:शासन और कण आदि से भी अधिक युधिष्ठिर को | आप गहराई में जाकर उनके "गलत कर्म" की व्याख्याएं ढूंढ कर उसे justify कर सकते हैं, किन्तु मैं न तो युधिष्ठिर को न ही उस सभा में मौजूद एक भी कापुरुष को माफ़ कर सकती हूँ | यही बात और भी कई बातों पर लागू होती है | lekin हाँ, उस सभा में जो हुआ उसके लिए अगणित जनों का खून बहाया जाना सही नहीं हो सकता था | यह लड़ाई यदि द्रौपदी के "पतियों" और उसके अप्मान्कर्ताओं के बीच थी, तो वे आपस में (शायद द्वंध युद्ध से) इसे तय कर सकते थे |
दूसरी बात यह की - आवश्यक रूप से यह स्थापित है, शारीरिक रूप से दु:शासन अधिक सशक्त था, तो वह द्रौपदी के साथ अपनी जबरदस्ती में सफल हो ही जाता | किन्तु मुझे द्रौपदी पर इस बात के लिए गर्व है की वह सिर्फ अपने "पति" या "श्वसुर" आदि से सायं की "रक्षा" करने की अपेक्षा लेकर बैठी नहीं रही , बल्कि अपनी शक्ति के अनुवार उसने खुद को बचाने के पूरे प्रयास किये | न ही उसने कभी भी अपने पतियों को उनकी उस निर्लज्जता की बात conveniently "भूल" जाने दी |
@ गीता
मैं गीता के किसी एक भी श्लोक को कहीं भी कभी भी अधर्म के रूप में नहीं देख पाती | लेकिन यह चर्चा गीता नहीं, बल्कि महाभारत पर हो चली है | इसीलिए मैंने गीता की श्रंखला के साथ ही अलग से महाभारत श्रंखला भी शुरू की थी | यह चर्चा मैं प्रार्थना करूंगी की वहां जारी राखी जाए - तो बेहतर | अदा जी - आपके प्रश्नों के (मेरे अपने) उत्तर मैं अगली टिपण्णी में दे रही हूँ | सिर्फ इसलिए की मुझे महाभारत युद्ध में दोनों ही पक्ष गलत लगते हैं, मैं गीता के संदेशों को नज़रंदाज़ नहीं कर सकती | गीता सिर्फ महाभारत तक ही सीमित नहीं है |
आदरणीय अदा जी,
हटाएंआपकी भावनाओं और विचार भेद का मै सम्मान करता हूँ.
आप जैसे लोग ९९% आबादी से हैं,और मैं १% आबादी से,
ऐसा आपका कहना निराधार है.हर व्यक्ति के अपने अपने
विचार हो सकते हैं.उससे वह यह नही कह सकता कि उस
जैसे विचार वाले लोग ही ९९% आबादी से आते हैं.
जीवन की मूलभूत बातों को समझने के लिए यदि पूरा जीवन भी लग जाए तो कम है,
यदि आपको और समाज को उससे संतुष्टि और आनन्द मिल जाए तो.
आपने आपने अपने जीवन में क्या सीखा व उससे क्या खोया
क्या पाया यह आप ही जाने.पर मैं संतुष्ट हूँ जो मैंने श्रीमद्भगवद्गीता
से सीखा,पाया और पा रहा हूँ.
वैज्ञानिक यदि अपना पूर्ण जीवन समर्पित कर निरंतर अनुसंधान और सीखने का
प्रयास कर तरह तरह की जीवनोपयोगी उपलब्धियां प्राप्त न करते रहते तो जो
आज जीवन में उन वैज्ञानिक उपलब्धियों का लाभ हम ले रहे हैं
वह संभव न होता.हमारे संतो और महापुरुषों का जीवन मेरे लिए अनुकरणीय है जिन्होंने
समय समय पर समाज का मार्गदर्शन कर आनन्द और कल्याण का विस्तार किया है.
@अगर ४०-४० साल लगते हैं समझने में, फिर तो हो लिया कल्याण...
एक नही अनेक वैज्ञानिकों,संतो महापुरुषों ने ४० साल क्या अपना पूर्ण जीवन आहूत
किया है समझ समझ कर लोक कल्याण करने के लिए.मेरे लिए वे सभी आदरणीय
और अनुकरणीय हैं.Research की प्रक्रिया निरंतर सीखने के लिए ही होती है.
@बस सुनते हैं अधर्म पर धर्म की विजय हुई थी...बाकी मेरे हिसाब से तो दोनों पार्टी में, अधर्म ही अधर्म था.
हर सुनी सुनाई बात पर यकीन कर लेना भी भ्रम उत्पन्न कर सकता है,
जब तक कि उसमें प्रमाणिकता न हो और यदि प्रामाणिक हो, तो भी उसको ठीक से न
समझना भी भ्रम का कारण हो सकता है.भ्रम के निवारण होते रहने पर हिसाब भी बदलता
रहता है.
'धर्म' और 'अधर्म' की व्याख्या आपके हिसाब से आप कुछ भी कर
सकतीं हैं, मुझे कोई आपत्ति नही है.
@ Mahabharat mein hi Dharm kya hai aur Adharm kya hai iski vyakhya aap hi kar dijiye..maine to apne hisaab se pramaan bhi de diya hai..
हटाएं@ हमेशा हमारे धार्मिक किताबों के लिए यही सब कहा जाता है...जो किताब समझ में ही ना आये उसको क्या अपने सर पर मारना है...?
हटाएंअदा जी,
धार्मिक किताबों का सबसे उजला विशिष्ट या चमत्कारिक पक्ष कहें तो यही है कि यह आश्चर्यपूर्ण ढंग से विचारको, चिंतकों मिमांसको के लिए गूढ़ दर्शन बन जाती है तो सरल सामान्य ॠजु मन के लिए सहज जीवन-ध्येय उपदेश॥
समस्या शायद हम जैसे लोगों के साथ ही आती है, जो न तो सरल ॠजु रह पाते है न गहन चिंतक!! हां हमारे जैसे लोगों की संख्या अधिक है, और यह हर युग में अधिक ही रही है। शायद इसी लिए मूल साहित्य से कहीं अधिक मिमांसाएं, प्रश्नोत्तरियां,भावार्थ टीका-समिक्षा का साहित्य उपलब्ध है।
शिल्पा जी,
श्रीमद्भगवद्गीता , महाभारत के अनुसार कुरुक्षेत्र युद्ध में श्री कृष्ण ने गीता का सन्देश अर्जुन को सुनाया था। यह महाभारत के भीष्मपर्व के अन्तर्गत दिया गया एक उपनिषद् है । वस्तुतः महाभारत ही श्रीमद्भगवद्गीता का उपदेश देने के लिए पूर्व भूमिका की कथा ही तो है।
महाभारत कथा का चरम भयानक युद्ध ही है। गीता को कैसे युद्ध क्षेत्र, गुण-अवगुण देखे बिना संहार,और युद्ध प्रेरणा से अलग कर पाती है। युद्धक्षेत्र में कर्मयोग कौनसा? 'परिणामों की चिंता बिन युद्ध कर'? युद्ध के बहाने आध्यात्मिक संदेश हो सकते है किन्तु सर्वथा युद्ध से विलग कैसे किया जाता है?
अदा जी,
हटाएंइस पोस्ट में शिल्पा जी ने श्रीमद्भगवद्गीता के जिस श्लोक की व्याख्या प्रस्तुत की है
उसपर मैंने अपने विचार भी प्रस्तुत किये हैं.उसी को केन्द्र
बिंदु बनाए रखें तो ज्यादा अच्छा रहेगा.विषयान्तर से कोई लाभ नही.
@ अदा जी - मैंने नीचे कुछ उत्तर देने के प्रयास किये हैं- आवश्यक नहीं की आप सहमत हों - परन्तु मैंने प्रयास किये हैं |या - शायद आप राकेश जी से कह रही हैं ? ऐसे इस चर्चा के लिए मेरी महाभारत श्रंखला बेहतर होगी, यहाँ विषयांतर हो रहा है |
हटाएं@ सुज्ञ जी - यह आमतौर पर माना जाता है की गीता सिर्फ महाभारत का एक अंश है - जो पूरी तरह गलत है | आपका विरोध करना मुझे निजी तौर पर अच्छा नहीं लगता किन्तु यहाँ यह बताना आवश्यक है है |
@ श्रीमद्भगवद्गीता , महाभारत के अनुसार कुरुक्षेत्र युद्ध में श्री कृष्ण ने गीता का सन्देश अर्जुन को सुनाया था। यह महाभारत के भीष्मपर्व के अन्तर्गत दिया गया एक उपनिषद् है । वस्तुतः महाभारत ही श्रीमद्भगवद्गीता का उपदेश देने के लिए पूर्व भूमिका की कथा ही तो है।
१. निस्संदेह यह वहां सुनाया गया था, किन्तु यह सिर्फ यहाँ ही नहीं सुनाया गया था - इससे पहले भी था - जैसा नीचे कृष्ण कह रहे हैं | यह सिर्फ भीष्मपर्व के अंतर्गत आया एक उपनिषद भर नहीं है |
२. वेदव्यास जी ने भागवतम पुराण लिखा, और उसकी शरुआत में यह कहा (नारद जी se ) कि "मैंने गीता सन्देश लिपिबद्ध किये (मैंने कहे नहीं, सिर्फ existing को लिपिबद्ध किया) और उसे popularize करने के लिए उसके आसपास महाभारत लिपिबद्ध की | किन्तु लोग महाभारत में ही उलझ गए, गीता तक पहुँच ही नहीं पाते , यह मुझे परेशां करता है |" इस पर नारद जी ने उन्हें भागवतम लिपिबद्ध करने की सलाह दी | बहुत कम लोग जानते हैं कि नहाभारत लिखी गयी थी इस पूरे प्रकरण से बरसों पहले, जब पांडव कौरव तो क्या, भीष्म भी नहीं जन्मे थे | परन्तु यहाँ यह विषय नहीं है | इस पर चर्चा मैं महाभारत श्रंखला में ही करूंगी, यहा नहीं |
३. माँ के गर्भ में रहता बालक माँ नहीं होता, अलग होता है | उस बालक के शरीर में जो जीवात्मा होती है, उसके अनंत जन्मों के संस्कार उस माँ के शरीर में वास करती जीवात्मा से अलग होते हैं | इसी तरह , गीता का "यह वाला उपदेश" महाभारत युद्ध भूमि में फिर से कहा अवश्य गया, किन्तु यह है पुरातन | यह महाभारत का भाग नहीं है |
४. गीता के चौथे अध्याय के पहले श्लोक से ही श्री कृष और अर्जुन के संवाद में यह है :
* इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम् ।
* विवस्वान्मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत् ॥
* एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः ।
* स कालेनेह महता योगो नष्टः परन्तप ॥
* स एवायं मया तेऽद्य योगः प्रोक्तः पुरातनः ।
* भक्तोऽसि मे सखा चेति रहस्यं ह्येतदुत्तमम् ॥
कृष्ण कहते हैं की यह गीता मैंने इस (सिर्फ इस) सृष्टि के आरम्भ में सूर्या से कही थी, जिन्होंने अपने पुत्र को यह कही और ऐसे परंपरा से यह आगे बढ़ी | किन्तु अब यह समय के प्रभाव से लोपप्रायः सी हो गयी है, और मैं इसे फिर से तुझे कह रहा हूँ | तब अर्जुन कहते हैं कि आप तो आज आये, जबकि सूर्य और सृष्टि की शुरुआत पुराणी है, तब कृष्ण कहते हैं कि इससे पहले मैं कई बार आया गया, तुम भी | बस तुम भूलते हो, मैं नहीं भूलता |
तो यह जाना जाए की यह गीता सन्देश सिर्फ महाभारत का एक अंश मात्र नहीं है |
@ राकेश जी - जी | यहाँ चर्चा गीता पर रहे तो बेहतर है |
यह सच है कि हर चीज़ में तीन classes होती हैं, निम्न, मध्य, उच्च | उच्च (१% ? ) लोग गूढ़ अर्थ समझते हैं, तो जो अधिक बुद्धि नहीं लगाते वे कृष्ण और राम को इश्वर मान कर उनकी हर बात को सर आँखों पर लेते हैं | कठिनाई मध्य वर्ग को आती है, जो मीमांसा करना तो चाहते हैं, किन्तु सिर्फ सतही | इसे समझने के या तो प्रयास ही न किये जाए, इश्वर वाक्य मान कर शिरोधार्य किया जाए, या फिर पूरी गहराई में उतरा जाए - ४० साल तो बहुत कम हैं - कई जन्म कम पद जाते हैं इसके लिए |
शिल्पा जी,
हटाएंमन्तव्य रखना विरोध करना नहीं होता, और विरोधी मन्तव्य किसी भी व्यक्ति का विरोध नहीं होता। मुझे खुशी होगी जब मेरी जानकारी से भी परस्पर विरोधी विचार प्रस्तुत होंगे। ऐसे विचार, कम से कम मैं तो विचारों को परिष्कृत करने अवसर के रूप में देखता हूँ।
राकेश जी से भी सविनय निवेदन करना चाहुंगा कि श्रद्धावंत रहते हुए भी श्रद्धा की भावुकता में न बहते विमर्श को समृद्ध करें। आप स्वयं चिंतक है। सत्यवाणी का किसी भी तरह की चर्चा से कोई हानि नहीं जब वह शाश्वत है।
@१.निस्संदेह यह वहां सुनाया गया था, किन्तु यह सिर्फ यहाँ ही नहीं सुनाया गया था - इससे पहले भी था……२.वेदव्यास जी ने (वर्तमान) भागवतम पुराण(गीता) लिपिबद्ध की……३.गीता का "यह वाला उपदेश" महाभारत युद्ध भूमि में फिर से कहा अवश्य गया, किन्तु यह है पुरातन | यह महाभारत का भाग नहीं है|……४.कृष्ण कहते हैं की यह गीता मैंने इस (सिर्फ इस) सृष्टि के आरम्भ में सूर्या से कही थी, जिन्होंने अपने पुत्र को यह कही और ऐसे परंपरा से यह आगे बढ़ी|
निस्संदेह भगवदवाणी हर सृष्टि के आदि में कही गई होगी। इस प्रवर्तमान सृष्टि के प्रारम्भ में भी कही गई थी, किन्तु वह वाणी लुप्तप्रायः हो गई। उपलब्ध श्रीमद्भगवद्गीता भगवान श्री कृष्ण उपदेशित वेदव्यास जी कृत-लिपिबद्ध महाभारत युद्ध काल में प्रवर्तित है। जो कि आज प्रवर्तमान है। जो प्रवर्तमान है हम उसी को केन्द्र में रखकर बात कर सकते है। क्योंकि लुप्त साहित्य से विशाल मात्रा में ज्ञान लुप्त हो जाता है। इस वास्तविकता से कैसे इन्कार करें कि अर्जुन को प्रेरित करने के उद्देश्य से कही गई गीता में उसी ज्ञान को भगवान द्वारा चुना गया हो जो अर्जुन को प्रेरित करने और उसके संशयों का समाधान करने के लिए ही कहा गया। गैर जरूरी उपदेश रह भी गए हों, यदि गीता में ही इस बात का समाधान हो तो अवश्य करें।
जी - मैं सिर्फ यह स्थापित करना चाहती थी की गीता सिर्फ महाभारत का एक भाग भर नहीं है | गीतोपदेश, महाभारत के युद्ध में रत लोगों के परिवार का इतिहास और उनके धर्मयुक्त / अधर्म्युक्त कर्म और आचरण, और भागवतम महापुराण तीनों अलग अलग इकाइयां हैं, जो आपस में जुडती हुई भी भिन्न भिन्न हैं |
हटाएंसिर्फ इसलिए की हमें कोई पक्ष (या दोनों पक्ष) गलत / सही लगते हैं, इसलिए गीता से मुंह मोड़ लेना उचित नहीं | अपनी निजी dislike हो भी युधिष्ठिर आदि के प्रति, तो भी गीता या गीतोपदेशक के प्रति दुर्भावना उचित नहीं | क्योंकि यह दुर्भावना हम रखें या न रखें, इससे कृष्ण के समदर्शी होने पर तो कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा, हाँ, हमारी अपनी निजी प्रगति अवश्य बाधित होगी |
विषय से अलग बात है, पर यहाँ कहती हूँ | मेरी एक कलीग हैं - जो हमेशा कहती हैं "I dont like Rama - he is too ideal behavioristic. and he himself did wrong things by my viewpoint " साथ ही यह भी कहती हैं "I don't like Krishna - he was so cunning - he fooled everyone and did what he wanted and justified it" अब देखिये, एक extreme यह है, किर राम तो मर्यादा निभाने के कारण रिजेक्ट, कृष्ण मर्यादा न पालने के लिए :) | और जीता कौन ? मेरा अपना viewpoint :)
उस दिन किसी ने (आपने? ) मोसम जी के ब्लॉग पर लिखा था की बात कोई भी चल रही हो, अक्सर हम वही कहते / करते हैं जो हम कहना चाहते हैं | ऐसा ही कुछ हम सब के साथ है | बात राम की हो, कृष्ण की हो, युधिष्ठिर की हो, या जीज़स की - हम गलतियाँ ढूंढ ही लेते हैं, क्योंकि उनकी बातें हमें नहीं माननी हैं, तो कोई बहाना तो चाहिए न - न मानने के लिए ? एक दिन मैंने अपनी उन कलीग को कहा "look, it doesn't matter whether YOU like Rama / Krishna or not, whether YOU approve of their actions or not...... What actually matters is, whether Rama / krishna approve of you / your chosen actions or not" | दुखद है के हम स्व-परिमार्जन करने के प्रयास न कर के दूसरों की कमियां खोजने में अपना (बहुत ही सीमित) समय व्यर्थ करते हैं | यह कमियों के खोज भी, यदि अपने मित्र के सुधार के लिए हो, तब तो फिर भी उचित है | किन्तु अक्सर यह सुधरवाने के प्रयास के लिए नहीं, बल्कि अपने अहंकार के पोषण के लिए (वह मुझसे नीच है, मैं उससे उच्च हूँ) होती है | हमें कृष्ण से लेना देना नहीं होता अक्सर, किन्तु उन्हें रिजेक्ट करने से अपने व्यक्तित्व को सही ठहराने और ज्यों का त्यों बने रहना हमेशा ज्यादा convenient होता है, बजाय की उन्हें सही मान कर स्वयं में बदलाव लाने के प्रयास करने के | inertia इसी को तो कहते हैं न ? (newton - a body continues in existing state till forced to change by external force - this property is inertia) inertia सिर्फ पदार्थ का गुण ही नहीं - यह हमारा भी गुण है |
तो फिर निष्कर्ष क्या है?
हटाएंआपने अदा जी की बात का समर्थन करते लिखा था……
"अदा जी ने कुछ दिन पहले लिखा था - लोग धर्म पर अधर्म की विजय कहते हैं, किन्तु मुझे तो अधर्म पर अधर्म की विजय ही दिख रही है | ऐसा ही कुछ मुझे भी लगता है|"
तो……… "अधर्म पर अधर्म की विजय" ?? जो कि दुनिया में होता था, होता है, होता रहता है। तो फिर सही मार्ग का उपदेश क्या है?
ठीक है गीता या गीतोपदेशक के प्रति कोई दुर्भावना नहीं, हमारे गलत सही होने से कृष्ण के समदर्शी होने पर कोई अन्तर नहीं पड़ेगा, किन्तु उनके समदर्शन के बाद हमारे लिए संदेश क्या है?
हमारे लिए सन्देश तो गीता में भरे ही हुए हैं | यह जो मैंने कहा वह मेरी महाभारत के बारे में धारणा है, गीता के बारे में नहीं | गीता के सन्देश पर तो लगातार बात कर ही रही हूँ इस श्रंखला में |
हटाएंइस श्लोक का सन्देश भी क्लियर लगता है मुझे - जो चीज़ें हमें सुख / दुःख दाई लगती हैं, उनमे समदर्श रहने का सन्देश है |
वैसे गीता का सबसे प्रचलित सन्देश तो यही है की "कर्मण्ये ..." .... फल के लिए नहीं, " "स्वयं" के लिए फल" की अभिलाषा से निष्काम हो कर, कर्त्तव्य के लिए कर्म करे मानव | कर्त्तव्य का निर्धारण हर व्यक्ति को अपनी परिस्थितियों के अनुसार स्वयं लेना है | यह निर्णय लेने में उसकी सहायता के लिए उस समय के समाज की नीतियां / परिवार के दिए संस्कार / उसकी एजुकेशन / धार्मिक background आदि करते हैं | ( जैसे उदाहरण के लिए - आपको जीवहिंसा रोकना अपना कर्त्तव्य लगता है, तो आप निरामिष ब्लॉग चलाते हैं | मुझे सही लगता है गीता को साधारण भाषा में मुझ जैसे साधारण लोगों तक पहुंचाना / उस पर मंत्रणा करना, तो मैं कर रही हूँ | रामदेव और अन्ना को सही लगता है भ्रष्टाचार से लड़ने की मुहीम चलाना - वे कर रहे हैं | जो आपको अपना कर्त्तव्य लगे (इसलिए नहीं की इससे बिजनेस में फायदा होगा, इसलिए नहीं की इससे आपको "महान" कहा जाएगा, बल्कि इसलिए की आपको लगता है की यह सही है और यह किया जाना चाहिए ) वह करना ही गीता का सन्देश है | और वह ऐसे करना की उसका अनुकूल फल निकले तो बढ़िया, और न निकले तो इश्वर की मर्जी मेरी समझ से बेहतर ही होगी मान कर उसे स्वीकार कर लेना - यह गीता का "निष्काम कर्म" का सन्देश है | मैं कर्म तब ही करून जब मुझे यह अनुकूल फल मिलने की ग्यारंटी हो, यह कर्म तो है, किन्तु निष्काम नहीं - यह गीता का सन्देश है | मेरी अपनी समझ से तो यही मुख्य सन्देश है |
सत्य वचन!! :))
हटाएंगीतामृत -आभार!
प्रत्युत्तर देंहटाएंआभार :)
हटाएंअति सुन्दर व्याख्या की है आपने शिल्पा बहिन.
प्रत्युत्तर देंहटाएंआत्मावस्थित होने के लिए तीन स्तरों पर सहन
करने का उपदेश भगवान श्रीकृष्ण दे रहे हैं.
मात्रास्पर्शास्तु-- इन्द्रियों के स्तर पर विषयों से संयोग
को सहन करना.
शीतोष्ण--- शरीर के स्तर पर गर्मी सर्दी को सहन करना
सुख दुःख --- मन के स्तर पर सुख और दुःख को सहन
करना.
इन्द्रियां,शरीर और मन अमूल्य उपकरण हैं जो प्रकृति/ईश्वर
ने हमें दियें हैं.यदि उपरोक्त तीनों स्तरों पर सहन करने की क्षमता
हममें विकसित हो जाए,तो ही हम मुक्ति के योग्य हो सकेंगें.
मुक्ति का अर्थ है हम अपनी इच्छानुसार अपने शरीर,
मन और इन्द्रियों का सदुपयोग आत्मावस्थित होने
के लिए कर पावें. क्यूंकि आत्मावास्थित होना
'सत्-चित-आनन्द' की प्राप्ति की ही स्थिति है.
सुन्दर प्रस्तुति के लिए बहुत बहुत आभार.
वाह राकेश भैया | कितनी अच्छी बात कही है - सच ही - एक ही श्लोक में तीन तरह के self restraints समझाए गए हैं | अनुग्रहित हूँ - आपने जो कहा, इस तरह से तो मैंने सोचा ही नहीं था | सच ही - गीता जी के हर श्लोक में पूरे पूरे ग्रन्थ छुपे हैं | कल फेस बुक पर रंजना जी ने लिखा था - कि मानस में ही गीता है और यह उद्धरण दिया था
हटाएं" गीता में कहा गया -
यदा यदा ही धर्मस्य ग्लानिः भवति भारत, अभ्युत्थानं अधर्मस्य....
रामचरित में देखिये-
जब जब होहिं धरम के हानी, बढ़हिं असुर अधम अभिमानी....
"
ऐसी बातें पढ़ती हूँ , तो अभिभूत हो जाती हूँ |
@ अदा जी
प्रत्युत्तर देंहटाएं१. मैं अभी भी महभारत के युद्ध से कन्विंस नहीं हूँ... - मैं भी नहीं हूँ |लेकिन आप उसके होने से कन्विंस नहीं हैं शायद, और मुझे लगता है की वह बहुत पहले होना चाहिए था, लाक्षागृह के बाद ही |
२. युद्ध का उद्देश्य क्या था ?
हर एक के अलग उद्देश्य थे | युधिष्ठिर के लिए अपना इन्द्रप्रस्थ, अर्जुन भीम के लिए भाई का "अधिकार" और पत्नी के अपमान का प्रतिशोप्ध, शिखंडी के लिए भीष्म की मृत्यु, ध्रितराष्ट्र के लिए अपने पुत्र का मोह, दुर्योधन के लिए अपना अधिकार (युधिष्ठिर और दुर्योधन दोनों ही अपने अपने आप को सही अधिकारी मानते थे, और दोनों ही अपनी जगह justified थे), भीष्म के लिए अपनी पितृ अंध प्रेम में ली गयी एक औचित्यहीन (मेरी नज़र में मूर्खतापूर्ण) प्रतिज्ञा की पूर्ती, ड्रोन के लिए अपने ऊपर हस्तिनापुर के अहसान को उतारना जिससे वे "अगले जन्म" में इससे मुक्त रहे, कर्ण के लिए अपनी पुराणी नफरत और दुर्योधन का अहसान .... the list is unending ....)
@ राज्य की प्राप्ति...इसलिए ये कहना कि यह निष्काम था, मुझे सही नहीं लगता... - मुझे भी नहीं लगता की कोई भी यहाँ निष्काम आया था | अर्जुन के बारे में जो मैं कहना चाहती हूँ, पुराने भागों में खूब कह चुकी हूँ | अब कहने से विषयांतर और अधिक होगा |
@ गलतियाँ दोनों ओर से हुई थी, फिर कृष्ण का एक का पक्ष लेना भी उचित नहीं लगा मुझे कभी भी... हाँ - गलतियाँ दोनों और से हुई थीं |किन्तु कृष्ण का पक्ष मुझे उचित लगता है |युद्ध में बलराम ने भाग नहीं लिया - और अंत में कृष्ण ने कहा उनसे की ऐसे युद्ध में निष्पक्ष रहना भी अपराध ही है |
@ कभी-कभी तो ये भी लगता है, कृष्ण ने शायद ख़ुद के किसी बात का बदला ले लिया हो, अर्जुन को हथियार बना कर...क्योंकि अर्जुन युद्ध के लिए कभी तैयार नहीं था..- नहीं - मुझे ऐसा नहीं लगता |
@ उसके हाथों अपने बड़े-बुजुर्गों, गुरुओं को हर तरह के छल का उपयोग करके मारना और उसे उचित ठहराना, बिल्कुल ग़लत है, मैं नहीं मानती ऐसी बातों को.... मुझे बिलकुल सही लगता है | जब अपने परिअवर जन अधर्म के साथ खड़े हों, और उन्हें मारे बिना अधर्म को नहीं हराया जा सकता हो, और छल के बिना उन्हें मारना संभव ही न हो, तो मुझे यह करना बिलकुल justified लगता है | आपको क्या लगता है - फिल्म mother india में नर्गिस जी को अपने पुत्र सुनील दत्त जी को गोली नहीं मारनी चाहिए थी - क्योंकि वह उनका "परिवार जन" था ?
continued
continued
हटाएं@ वैसे भी पांडवों का कोई हक़ नहीं था उस राज्य पर, वो सिर्फ़ नाम के पाण्डव थे, पांडू-पुत्र नहीं थे - नहीं | फिर तो आप यह भी मानिए की लक्ष्मी बाई जी ने ओने पुत्र को राज्य दिलाने के लिए अंग्रेजों से जो युद्ध किया -वह भी गलत था ? क्योंकि राजा के अपने पुत्र तो वे भी नहीं थे - तो अँगरेज़ सही थे फिर ? झांसी अंग्रेजों की थी ?
@ फिर कौरव इतने समय से राज कर ही रहे थे.... २०० साल से अधिक हम पर अंग्रेजों ने राज्य किया न ? तो फिर इस रासों से तो उनका ही अधिकार है भारत पर | या उससे भी पीछे जाएँ - तो मुग़लों को राज्य वापस दे दिया जाना चाहिए था आज़ादी पर ? नहीं ? - नहीं - सिर्फ कब्जे में लम्बे समय तक लिए रहना ही अधिकार को जन्म नहीं देता |
@ इसलिए, न रक्त के हिसाब से न ही कब्ज़ा के हिसाब से, पाण्डव राज्य के अधिकारी थे.... यह युद्ध हस्तिनापुर नहीं इन्द्रप्रस्थ के लिए शुरू हुआ था |
@ शायद इसीलिए अनधिकृत रूप से और कृष्ण के बहकावे में आकर, राज्य जीत कर भी पाण्डव ख़ुद को माफ़ नहीं कर सके, और राज्य नहीं कर पाए... ऐसा मुझे नहीं लगता की वे अपने आप को माफ़ नहीं कर पाए आदि |
@ मुझे तो महभारत में सबकुछ गड़बड़ ही नज़र आता है.... सब कुछ तो नहीं, परन्तु बहुत कुछ मुझे भी गड़बड़ लगता है |
@ सच कहूँ तो, आज जो भी हो रहा है, भारत में, अधिकतर बातें, इस पुस्तक से मेल खातीं हैं...
लोगों को बुरा लगेगा, लेकिन मैं हिन्दू हूँ सिर्फ़ इसलिए अन्याय और अनुचित बात मान लूँ , मुझसे ये नहीं होगा... - नहीं - आपको जो अनुचित लगे, वह आप अनुचित ही मानिए |
@ कितनी भी श्रद्धा और कितना भी विश्वास मैं रख लूँ... यह बात "bias " या पूर्वाग्रह के अंतर्गत आती है | विषयांतर हो जाएगा, इसलिए मैं यह बात (श्रद्धा / विश्वास / bias आदि पर बात मैं अपनी neuron वाली पोस्ट पर जारी रखूंगी )
@ अपने गुरुजनों की हत्या (द्रोणाचार्य), अपने घर के बड़े बुजुर्गों की हत्या (भीष्म), अपने से छोटों की हत्या (अभिमन्यु) सिर्फ राज्य पाने के लिए...वो भी छल से, कभी किन्नर के पीछे छुप कर, कभी अश्वस्थामा (हाथी) मारा गया जैसे झूठे सन्देश देकर....इन बातों में श्रद्धा रखूं..? हरगिज़ नहीं ... हत्या ? हत्या युद्ध में नहीं होती, युद्ध में वीरगति होती है | यदि व्यक्ति युद्ध कर रहा है, तो वह मन में तो अपने ही लक्ष्य को दुसरे से अधिक धर्म पूर्ण मान ही रहा है , चाहे वह दुर्योधन हो या अर्जुन | तब सिर्फ इसलिए की दूसरी और अपने प्रिय जन हैं, और वे इतने शक्तिशाली / समर्थ है की उन्हें छल के बिना नहीं मारा जा सकता, और उन्हें मारा न जाए तो युद्ध जीता ही नहीं जा सकता, तब उन्हें छल से मारना मुझे बिलकुल गलत नहीं लगता | अंधा क़ानून फिल्म में रजनीकांत ने जो किया, अपनी दीदी को भी धोखे देकर अपनी बड़ी दीदी के rapists को छल से मारा - मुझे बिलकुल सही लगा | सिर्फ इसलिए की रपिस्ट मेरा भाई हो, उसे बचाने मेरे प्रिय पितामह और गुरु खड़े हों, तो मैं छल को गलत कहूं ?
continued
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हटाएं@ सुज्ञ जी, मैं मूढ़मति हूँ, सीधी सादी बात समझती हूँ, घुमा कर कान पकड़ने की आदत नहीं है, मुझे तो सीधा-सादा प्रसंग पसंद है, और फिर भारत की अधिकतर आबादी मेरी ही जैसी है, ऐसे देश में इस तरह के उपदेशों का क्या काम, जो सर के ऊपर से ही निकल जाए, और लोग अटकल ही लगाते रह जाएँ की शायद इसका मतलब ये होता होगा...इतना भी गूढ़ सन्देश क्यों देना जिसको कोई समझ ही न पाए...होंगे यहाँ बड़े ज्ञानी-ध्यानी लोग, जिन्होंने अपने सम्पूर्ण इंदियों पर विजय पा राखी होगी...लेकिन हम ऐसी नहीं हूँ, और मेरे जैसे करोड़ों ऐसे नहीं हैं...हमेशा हमारे धार्मिक किताबों के लिए यही सब कहा जाता है...जो किताब समझ में ही ना आये उसको क्या अपने सर पर मारना है... ?
सुज्ञ जी का उत्तर तो वे ही बेहतर देंगे, किन्तु मुझे लगता है की , हर तरह के level के लोग हैं, और हर level के सन्देश दिए जाने आवश्यक हैं | हर एक अपने स्तर के अपनाएगा | सिर्फ इसलिए की अधिकतर population सिर्फ BA पढ़ सकती है, क्या surgery की गूढ़ बातों की किताबें लिखी ही नहीं जानी चाहिए ?
@ एक तरफ तो, हर गलत बात को सही करारने की कोशिश की गयी है, कुंती की गलतियों को ढांपने की कोशिश, द्रौपदी की गलतियों को ढांपने की कोशिश, यहाँ तक की युधिष्ठिर की महागलती, जुए पर अपनी पत्नी को दांव पर लगाने की घटना को भी सही बताने की बेमतलब की कोशिश है....गलत को जबदस्ती सही बनाने की क्यों कोशिश की जाती है...??? कोशिश इसलिए की जाती है की हम पूरा packege ही चाहते हैं | हम गीता को नहीं अपनाना चाहते, क्योंकि हमें महाभारत के पात्र गलत दीखते हैं | इसी से समग्र को सही ठहराने के प्रयास शुरू होते हैं | अब, मैं रामदेव के आन्दोलन को सही मानती हूँ , अन्ना का मुद्दा मुझे सही लगता है | परन्तु उनकी हर बात मुझे सही नहीं लगती | तो मैं क्या करून ? यदि मैं आन्दोलन भर में भाग लूं, तो मुझे गवर्नमेंट rss का पिट्ठू कहती है, यदि rss को जुस्तिफ्य करने जाऊं तो .... बस - इसी चक्र में उलझने से बचने के लिए मैं या तो मुद्दे से किनारा कर लूं, या फिर रामदेव की हर बात की अंध समर्थक बन जाऊं ? यह justification हमारी इसी मानसिकता से आते हैं |
@ फिर हम ये क्यों भूलते हैं कि 'जो जीता वही सिकंदर' होता है....जीत पांडवों की हुई, वो राजा हुए, उनके शासन में जो लिखा गया वही मान्य भी हो गया... इतिहास कभी भी जनता नहीं लिखती, इतिहास हमेशा राजा लिखते हैं, और वही लिखते हैं जो उनको पसंद आता है...
यहाँ आप गलत हैं - माफ़ कीजिये | महाभारत ग्रन्थ लिखा है वेदव्यास जी ने जो न जीतने वाले पक्ष से डरते थे, न हारने वाले | आखिर में अश्वत्थामा, अर्जुन दोनों के ब्रह्मास्त्र उन्होंने ही रोके थे | वे किसी भी एक पक्ष के बारे में biased लिखते, तो ये सब जो विरोधाभास हम देख और सुन रहे हैं, वे हम जान ही नहीं पाते | no , I DO NOT AGREE WITH YOU IN THIS .
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हटाएं@ शिल्पा जी आपकी टिप्पणी पढ़ी, जान कर बहुत ख़ुशी हुई कि आपके और मेरे विचार बहुत हद तक मिलते हैं... सब विचार नहीं मिलते - कुछ हाँ, कुछ ना |
@ आँख बन्द करके भेड़ चाल में चलने की आदत है हम भारतीयों को, आदर्श ऐसे होने चाहिए जिनको हम अपने जीवन में अपना सकें,
युधिष्ठिर ने जूआ खेला,कोई बात नहीं, अपनी पत्नी तक को दाँव पर लगा दिया, जैसे किसी ने हाथ पकड़ का कहा था लगा दो दाँव पर, इतना घटिया काम तो दुर्योधन ने भी नहीं किया. उसकी भी पत्नी रही होगी, कितनी जगह दोर्योधन कि पत्नी का ज़िक्र है महाभारत में ??? कोई बता देवे ... दुर्योधन राजा का बेटा था, और पांडव सज्जन थे, इसलिए उसकी पत्नी के अपमान नहीं होते थे | उल्लेख इतिहास में क्यों हो ? जोधाबाई और अनारकली - किसके साथ अन्याय हुए - बताइये ? यदि पांडवों ने भी उसकी पत्नी के साथ ऐसी ओछी हरकतें की होतीं, तो उनका जिक्र अवश्य होता |
@ युधिष्ठिर का अपनी पत्नी को दाँव पर लगाना, किस हिसाब से उसका अपनी पत्नी के प्रति आदर दिखाता है ?? और अगर पांचाली का पति ही उसको सम्मान नहीं दे रहा तो दूसरे क्या देंगे भला ?? इसे किसी ने ग़लत नहीं कहा, कोई दोष नहीं है युधिष्ठिर का, क्योंकि वो धर्मराज थे..आदर्श थे, लेकिन हम उनके जैसा नहीं बन सकते क्योंकि ये सही नहीं होगा...कोई मुझे ये बताये कि उन्होंने ऐसा क्या किया है जिसको हम अपने जीवन में लागू कर सकते हैं...?? आख़िर किस बात के लिए वो आदर्श हैं ??? - किसने गलत नहीं कहा अदा जी ? हर कोई इसे गलत कहता है, द्रौपदी भी, कृष्ण भी, दुर्योधन भी, ध्रितराष्ट्र भी, कुंती भी ... सिर्फ उन्होंने गलत नहीं कहा जिन्होंने अपने अंधे मतों के चलते युधिष्ठिर की हर बात को सही ठहराना अपना कर्त्तव्य बना लिया था | और भीष्म ने सही कहा क्योंकि उन्हें स्त्री सिर्फ पति की property भर लगती थी |भीष्म के पूरे चरित्र में हर जगह यही बात दिखती है मुझे - स्त्रियों के लिए उनका अपना कोई सम्मान नहीं है | सिर्फ यही के - ये मेरी माँ हैं तो सम्मान, ये रानी हैं तो सम्मान | अम्बा आदि को उठा लाने से पहले उन्होंने उनके अधिकार सोचे थे ? नेरे लिए तो सबसे अधर्मी वही हैं |
@ हर पात्र से अगर चुन-चुन कर ही आदर्श लेना है...तो फिर वो आदर्श पुरुष नहीं हैं...एक तरफ तो हम कहते हैं कुंती महान स्त्री है, वह पूजा योग्य है, दूसरी तरफ हम उसके बताये हुए रास्ते पर चल नहीं सकते, अगर चले तो खाप पंचायत या फिर ओनर किलिंग... नहीं - आदर्श पात्र नहीं हैं महाभारत में | मर्यादा पुरुषोत्तम कहलाने वाले राम भी हमारी देफ़िनितिओन्स से कई आदर्श बातों के विरुद्ध खड़े हैं | definitions change with time - उनकी बातें उनके परिपेक्ष्यों में ही तुली जानी चाहिए |
@ क्यों भाई ??? ये कैसा आदर्श है..???...अभी ही आ जायेंगे लोग कहने...अदा जी आपको जो जी में आए कीजिये, लेकिन ये कोई नहीं मानेगा...कि हम अपने आदर्श पात्रों को सिर्फ़ एक कम्पार्टमेंट में रखते हैं, उनके तथाकथित आदर्शों से हमें कोई लेना-देना नहीं होता...क्योंकि उन आदर्शों को हम अपने जीवन में लागू करते ही नहीं है....उसका उपयोग सिर्फ़ श्रद्धा दिखाने के लिए ही करते हैं...उन आदर्शों को अपनाने के लिए नहीं.... अदा जी - वैसे भी कौन किसकी मानता है ? हम वाही मानते हैं, जो हम मानना चाहते हैं |
@ राकेश जी, ४० साल लग गए आपको कुछ-कुछ समझने में, जबकि आपने कोशिश की है समझने की.. हमारे जैसे लोग जो भारत की ९९% आबादी से आते हैं...कितना समझ लेंगे और क्या समझ लेंगे ??? अगर ४०-४० साल लगते हैं समझने में, फिर तो हो लिया कल्याण...
जबकि अभी तक हम यही नहीं समझे किस धर्म की रक्षा के लिए ये लड़ाई हुई थी... बस सुनते हैं अधर्म पर धर्म की विजय हुई थी...बाकी मेरे हिसाब से तो दोनों पार्टी में, अधर्म ही अधर्म था...
यदि कोई super specialized surgeon बनना चाहे - तो उसे बहुत साल लगते हैं पढ़ाई करने में |उसे उसकी study से इसलिए नहीं रोका जाना चाहिए की अधिकतर (९९%) लोग तो सिर्फ BA कर के १० साल की उम्र में पढ़ाई छोड़ चुके हैं |
oopar ke tippani repeat kar rahi hoon - kyonki jo sirf yah padhein ve samajh paayein ki ham yahaan mahabhaarat kee baat kar rahe hain, jo geeta se alag hai :
हटाएं@ अदा जी, सुज्ञ जी, राकेश जी
"महाभारत" और "गीता" दो अलग अलग ग्रन्थ हैं | गीता सिर्फ महाभारत के युद्ध तक ही सीमित नहीं है |
@महाभारत
मुझे और अदा जी और अनेकों को यह लगता है की महाभारत युद्ध में दोनों ही पक्ष अधर्म की ही और थे - कम ज्यादा अधर्म का फर्क हो सकता है | उदाहरण के तौर पर , द्रौपदी के उस अपमान के लिए मैं सबसे अधिक जिम्मेदार युधिष्ठिर को मानती हूँ - दुर्योधन, दु:शासन और कण आदि से भी अधिक युधिष्ठिर को | आप गहराई में जाकर उनके "गलत कर्म" की व्याख्याएं ढूंढ कर उसे justify कर सकते हैं, किन्तु मैं न तो युधिष्ठिर को न ही उस सभा में मौजूद एक भी कापुरुष को माफ़ कर सकती हूँ | यही बात और भी कई बातों पर लागू होती है | lekin हाँ, उस सभा में जो हुआ उसके लिए अगणित जनों का खून बहाया जाना सही नहीं हो सकता था | यह लड़ाई यदि द्रौपदी के "पतियों" और उसके अप्मान्कर्ताओं के बीच थी, तो वे आपस में (शायद द्वंध युद्ध से) इसे तय कर सकते थे |
दूसरी बात यह की - आवश्यक रूप से यह स्थापित है, शारीरिक रूप से दु:शासन अधिक सशक्त था, तो वह द्रौपदी के साथ अपनी जबरदस्ती में सफल हो ही जाता | किन्तु मुझे द्रौपदी पर इस बात के लिए गर्व है की वह सिर्फ अपने "पति" या "श्वसुर" आदि से सायं की "रक्षा" करने की अपेक्षा लेकर बैठी नहीं रही , बल्कि अपनी शक्ति के अनुवार उसने खुद को बचाने के पूरे प्रयास किये | न ही उसने कभी भी अपने पतियों को उनकी उस निर्लज्जता की बात conveniently "भूल" जाने दी | nor she ever blamed herself the way the raped / molested girl in today's society is made to beleive - you were raped because you wore revealing dress / you excited the boys / you challenged the boys (andhe ka putr andha ...) you were drunk / you wer out at night .... and so on and on and on . remember rapes and molestations take pace not because the girl is doing something, but because the people doing it consider that they have a rigth to do it and the girl is just an object to prove their own self worth.
@ गीता
मैं गीता के किसी एक भी श्लोक को कहीं भी कभी भी अधर्म के रूप में नहीं देख पाती | लेकिन यह चर्चा गीता नहीं, बल्कि महाभारत पर हो चली है | इसीलिए मैंने गीता की श्रंखला के साथ ही अलग से महाभारत श्रंखला भी शुरू की थी | यह चर्चा मैं प्रार्थना करूंगी की वहां जारी राखी जाए - तो बेहतर | अदा जी - आपके प्रश्नों के (मेरे अपने) उत्तर मैं अगली टिपण्णी में दे रही हूँ | सिर्फ इसलिए की मुझे महाभारत युद्ध में दोनों ही पक्ष गलत लगते हैं, मैं गीता के संदेशों को नज़रंदाज़ नहीं कर सकती | गीता सिर्फ महाभारत तक ही सीमित नहीं है |
मैं जो कहने जा रहा हूँ, वो गीता और महाभारत दोनों से अलग है|
प्रत्युत्तर देंहटाएंमेरी उम्र उस समय शायद अट्ठाईस-उनतीस साल हो चुकी थी| एक कुलीग ने रामचरित मानस की किसी एक बात का विरोध किया| मैंने उसी दिन घर लौटने से पहले गीता प्रेस से वह ग्रन्थ खरीदा और पहली बार पढ़ा| उस दिन से मैं उस मित्र का आभारी हूँ, न वो शंका प्रकट करता और न मैं इसे पढ़ने के लिए प्रेरित होता| बहस द्वारा तो खैर मैं आज भी किसी को परास्त नहीं कर पाता लेकिन ऐसा अवसर आने पर खुद कुछ जरूर सीखने लायक पा जाता हूँ|
अब बात गीता की, बेशक 'गीता' पढ़ने में वैसी रोचक न हो, लेकिन जिसने इस महान सन्देश का अंश भर भी समझ लिया और साध लिया, वो मेरी नजर में स्तुत्य है| किसी ने 'गीता' को भारत की तरफ से मानवता के लिए सबसे बड़ा उपहार कहा है, मेरा धार्मिक गर्न्थों का अध्ययन न के बराबर है लेकिन मुझे ये बात सही ही लगती है|
bahas aur tark mein shayad antar hota hai...
हटाएंmain to vaise bhi karm parjyada yakeen rakhti hun, logon ke paandity par unki stuti krne se jyada main khud kuch seekhne, samajhne mein yakeen kati hun...varna mere is tark ka kya avchity...dunia bhari padi hai panditon se, unse mujhe koi laabh nahi...mere liye 'main kya hun' aur main hindutv ke liye apne tareeke se kya kar sakti hun wo jyada maayne rakhta hai...varna karmkand, aur geetapaath, ramaayan paath karne ke liye ottawa ke hindu mandir waale bula hi lete hain mujhe...
mere aashankaaon ko aaplog bahas kyun samajhte hain...aisa bhi nahi ki maine kisi mahapandit ko challenge kar diya..mere bahut logical aur saadharan se sawaal hain, aapko bahas lagi, to ii maan hamra kaa kasoor hai :):)
kal meri flight hai...ab bahas nahi kar paaungi..:):)
गलती हुई मुझसे, मैंने बहस समझ लिया था| सब कसूर मेरा ही है जी:)
हटाएंआप फ्लाईट लीजिए, शुभ यात्रा|