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मंगलवार, 13 मार्च 2012

जापान का भूकंप -२ :सुनामी की प्रक्रिया , संतोरिणी द्वीप के ज्वालामुखी


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जापान में आये भयंकर भूकंप और सुनामी के प्रकोप को एक साल बीत चुका है । इस के सन्दर्भ में मैंने यह श्रंखला शुरू की है जिसमे पिछले भाग में हमने देखा की भूकंप कैसे आते हैं  । "टेक्टोनिक" प्लेटें एक दूसरे से जुडी होती हैं , और इस जोड़ पर काफी लम्बे अरसे तक अलग दिशा में/ अलग गति से  हिलने के प्रयास करती रहती हैं । किन्तु अत्यंत शक्तिशाली और महाविशालकाय पत्थरों पर अत्यधिक भार है ।(सातों महाद्वीपों और महासागरों के समुद्रतल इन्ही टेक्टोनिक प्लेटों पर "रखे" हुए है, उन सब का भार इन्ही प्लेटों पर टिका है) । इस अत्यधिक भार के कारण फ्रिक्शन बहुत अधिक है । फ्रिक्शन के कारण हिल पाने में असफल होती प्लेटों पर समयावधि में दबाव इतने अधिक बढ़ जाते हैं कि इस फौल्ट लाइन पर जहां भी पत्थर कुछ कमज़ोर पड़ जाएँ , वहां अचानक टूट जटी हैं, और प्लेटें या तो सरक जाती हैं , या एक दुसरे के ऊपर या नीचे खिसक जाती हैं । इसी से भूकंप आते हैं । 
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इस भाग में हम सुनामी के आने की प्रक्रिया , और संतोरिणी द्वीप के भयंकर ज्वालामुखी को जानने का प्रयास करते हैं । माना जाता है कि यहाँ आया भयंकर विस्फोट तब की Atlantis सभ्यता का विनाशक साबित हुआ था । यहाँ आज भी डर है कि किसी दिन बड़ा भूकंप / ज्वालामुखी विस्फोट हुआ , तो यहाँ से उठी सुनामियां अमेरिका के तटीय शहरों का विनाश कर देंगी । लाखों की संख्या में लोग मारे जायेंगे, क्योंकि ये सुनामी की लहरें ध्वनी तरंगों से बहुत तेज़ गति से सिर्फ छः घंटे में ही अमेरिका पहुँच जायेंगी, इसलिए तटीय क्षेत्रों को खाली करने का समय नहीं होगा  ।
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सुनामी (१)सागर तल में आये भूकंप से, (२)या ज्वालामुखी विस्फोट से, (३)या समुद्र के नीचे हुए अत्यधिक शक्तिशाली परमाणु विस्फोट से , (४)या समुद्र में किसी उल्कापिंड के गिरने से, (५)या फिर या समुद्र के किसी तट पर हुए भूस्खलन से (जिससे भूमि का एक बड़ा हिस्सा समुद्र में गिर गया हो ) शुरू हो सकती है । अधिकतर ये भूकंप से शुरू होती हैं, जैसा कि पिछले साल जापान में हुआ था ।

जब भूकंप का फोकस भूभाग के नीचे हो, तो ऊपर के भूतल पर भूचाल आता है, और वहां के भवन आदि गिर जाते हैं । लेकिन यह फोकस यदि समुद्रतल के नीचे हो, तब उसके ऊपर कोई भवन तो होते नहीं, परन्तु पानी की बहुत बड़ी मात्रा कम्पित हो जाती है ( सिर्फ सागर की उस जगह की गहराई जितना ही आयतन नहीं, बल्कि जितना शक्तिशाली भूकंपन हुआ हो, उतने ही फैले हुए क्षेत्र के जल भाग का सागर तल हिल उठता है , और उसके ऊपर का पानी भी ) । इसके अलावा, समुद्र तल में टनों पानी से दबे हुए sedimentary rocks अत्यधिक दबाव से कभी कभी अचानक ही बदल कर metamorphic में बदलते हैं, जिनका आयतन पहले से बहुत ही कम होता है  ।अचानक आयी इस परिमाण के कमी के कारण भी सागर तल में भूचाल आ सकते हैं ।
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अब सोचिये - जैसे हम पानी में कंकर / या बड़े पत्थर फेंकते हैं, तो वहां से उठती तरंगे गोलाकार में सब दिशाओं को बढती हैं । जितना बड़ा पत्थर - उतनी शक्ति शाली तरंगे, क्योंकि पानी की इलास्टिसिटी हलके पत्थर की छोटी सी ऊर्जा को जल्द ही सोख लेती है । ठीक इसी तरह की तरंगे भूकंप से भी उठती हैं, किन्तु फर्क यह है कि ये तरंगे ऊपर से कंकर गिरने से नहीं , बल्कि नीचे से तले के हिलने से आई हैं, तो इन की शक्ति एक छोटे कंकर के गिरने से बहुत अधिक है । (चित्र विकिपीडिया से साभार )
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सागर तल की टेक्टोनिक प्लेट १ 
सागर तल की टेक्टोनिक प्लेट -२ - बढ़ता दबाव 

नीचे पत्थर टूटने से जल का कम्पन, लहर की शुरुआत 
लहरों का दोनों ओर बढ़ना 



अब ये तरंगे सब दिशाओं में गोल आकर में बढती हैं, जैसे किसी झील में फिंके पत्थर से झील की सतह पर उठी  लहरें हों । लेकिन ये लहरें सिर्फ सतही नहीं हैं, बल्कि पानी का पूरा गहरा कॉलम (स्तम्भ) ही कम्पित है । (एक ऊपर तक भरी बाल्टी को तले से हिला कर देखिये, और दूसरी वैसे ही बाल्टी में ऊपर से कंकर फेंक कर देखिये - किस में से ज्यादा पानी गिरता है ?) ये उठती हुई लहरें कहाँ जायेंगी ? जाहिर है सागर के किनारों की ओर । और कितनी शक्ति के साथ किनारे को चोट पहुंचाएंगी ? जितना वह क्षेत्र भूकंपन के फोकस के नज़दीक होगा । 

ये लहरें गहरे समुद्र में बहुत ऊंची नहीं होतीं , बल्कि इनकी ऊंचाई इतनी कम होती है , कि [आपको आश्चर्य होगा,] एक छोटी सी नाव भी इनके ऊपर आसानी से ride कर सकेगी । उस नाव का कुछ नहीं बिगड़ेगा । लेकिन जैसे जैसे ये किनारे के उथले पानी की ओर आती हैं, तो इतनी बड़ी गहराई की पानी की अत्याधिक मात्रा की जितनी ऊर्जा है, वह अब कम गहरे में कम मात्रा को धकेल रही है । किनारे तक आते हुए तरंग दैर्ध्य (wavelength ) कम होती जाती है और ऊंचाई (amplitude ) बढ़ता है) तो किनारे के उथले पानी पर इनकी उग्रता बहुत बढ़ जाती है, और एक tide (ज्वार भाटा ) की तरह पानी ऊंचा हो जाता है , और ये ऊंची लहरें भूभाग में बहुत भीतर तक , बड़ी ऊंची होकर, और बड़े वेग से घुस आती हैं । इसीलिए इन्हें tsunami या tidal waves भी कहा जाता है ।

एक बड़ी परेशानी यह है की लहर के बढ़ने के सिद्धांत के अनुसार, तट पर पहले लहर का निचला भाग पहुँचता है । इसे "drawback " कहते हैं - पानी जैसे तट से दूर खिंच जाता है, और तल काफी दूर तक दिखने लगता है । जो लोग यह नहीं जानते की यह क्यों हुआ, वे कौतूहल के कारण वहीँ खड़े रहते हैं, और जब पीछे से ऊंची लहर आती है, तब किसी को भागने का स्थान / समय नहीं मिलता । सुनामी की मार दोहरी होती है - एक तो इतने वेग से पानी की जो लहर अति है उसकी मार, ऊपर से यह ऊंचा पानी शहरों के शहर काफी समय के लिए डुबा देता है । यह चित्र देखिये (विकिपीडिया से साभार) । 



यूरोप और अफ्रीका के बीच के सागर में "santorini " नाम की जगह है (ग्रीस )। यह जगह न ही सिर्फ fault line पर है , बल्कि यहाँ सक्रिय शक्तिशाली ज्वालामुखी भी हैं । सदियों पहले यहाँ हुए ज्वालामुखी विस्फोटों के तब की सभ्यता को अचानक समाप्त कर देने का जिम्मेदार भी माना जाता है । कई लोग इसे "Atlantis " की सभ्यता का विनाशक मानते हैं, कि इस महान ज्वालामुखी के विस्फोट से पहाड़ जो ऊपर उठा हुआ था, वह धंस गया, और उस खाली caldera में समुद्र का पानी भर गया। कुछ लोग यह भी कहते हैं कि इसी सुनामी के drawback ने फ़ारो से बच कर भागते इजराइलियों को निकलने का रास्ता दिया, और पीछे करते हुए सैनिक बाद में आती सुनामी में घिर गए । कुछ लोगों का कहना है कि रेड सी का अचानक चौड़ा हो जाना भी इसी भयंकर ज्वालामुखी , या फिर उससे सम्बंधित भूकंप से हुआ । सच क्या है, यह तो कोई नहीं जानता ।

यह तस्वीर (विकिपीडिया से साभार) देखिये इस द्वीप की - ये जो द्वीप के भीतर घुसा हुआ पानी दिख रहा है - यह ज्वालामुखी का भीतरी भाग है - जिसे caldera कहते हैं । यह ऊपर आकाश की ओर तना हुआ पर्वत विस्फोट के बाद land failure होने से धंस गया, और उस नए बने विशाल caldera (ज्वालामुखी के पीछे छूता विराट गड्ढा ) में समुद्र का पानी घुस आया । अलग अलग गहराई पर अलग अलग तरह के पत्थर हैं (लावा से बने igneous पत्थर) । माना जाता है की इस land failure और समुद्र में इतनी अधिक मात्रा में भूमि के गिरने से उठी भयंकर सुनामी ने ही atlantis सभ्यता को नष्ट किया । [परन्तु वैज्ञानिकों का मानना है के यह दोनों तारीखें आपस में मेल नहीं खातीं !] यह एक oval द्वीप था, जो आज से करीब ३६०० साल पहले आये (धरती के इतिहास के  भयानकतम) ज्वालामुखी विस्फोट से ऐसा हो गया जैसा इस तस्वीर में दिखता है । लिन्क   ३  ४ देखिये


   

यहाँ कई ज्वालामुखी आज भी सक्रिय हैं, ऊपर से यह एक टेक्टोनिक फॉल्ट लाइन पर भी है । [ हर वह जगह जहां ज्वालामुखी आयें, आवश्यक नहीं की वह भूकंप का केंद्र भी हो ही ]। किन्तु दुर्भाग्य से यह द्वीप ऐसी जगह है कि दोनों ही प्राकृतिक आपदाएं इसके लिए अनपेक्षित नहीं हैं । अभी भी यहाँ इस तरह के घटनाएं चल ही रही हैं - २६ जनवरी को यहाँ ५.३ स्केल का भूकंप आया । यह लिंक देखिये  । ऊपर से बड़ी परेशानी यह है, कि यदि कोई बड़ा हादसा हो, तो चट्टान का एक बड़ा भाग भूस्खलन हो कर सागर में गिर जाएगा । इस इतनी बड़ी चट्टान के समुद्र में गिरने से जो लहरें उठेंगी, उनकी शुरूआती peak to peak ऊंचाई होगी २ किलोमीटर !!!! ये लहरें १००० किमी प्रति घंटे की रफ़्तार से दौड़ेंगी और एक घंटे में अफ्रीका, साढ़े तीन घंटे में इंग्लैंड, और छः घंटे में अमेरिका के पूर्वी तट पर पहुंचेंगी । तब तक ये "छोटी" हो कर करीब ६० मीटर की हो गयी होंगी । (एक एक-मंजिले घर की ऊंचाई करीब ६ मीटर होती है - तो सोचिये - ६० मीटर ऊंची सुनामी !!!) ये बोस्टन आदि शहरों को तबाह कर सकती हैं । यह लिंक देखिये । माना जाता है की ये करीब २५ किलोमीटर तक भूभाग के भीतर घुस सकती हैं । ऐसा डर है कि अमेरिका के बोस्टन आदि (पूर्वी तटीय) शहरों में शायद करोडो लोग इस त्रासदी में हताहत हो जाएँ,  ।

जहां अमेरिकिय महाद्वीप का पूर्वी तट इस santorini से कारण सुनामी के खतरे में रहता है, वहीँ दूसरी तरफ  पश्चिमी तट जापान के साथ दूसरी फौल्ट लाइन पर है, तो सुनामी का खतरा वहां भी बना रहता है ।

अगले भाग में हम ज्वालामुखियों पर बात करेंगे ।

रविवार, 11 मार्च 2012

एक सितारे की जीवन यात्रा ३


दोस्तों - पिछली पोस्ट में हम सितारे के जीवन के आखरी स्टेजेस पर थे - अब आगे ... कैसे अलग अलग तारे रेड जायंट, व्हाय्ट ड्वार्फ , ब्लैक ड्वार्फ , नियुट्रोन स्टार या ब्लैक होल बनते हैं ....

सितारों के भीतर आणविक संलयन (nuclear fusion) के लिए ईंधन (फ्युएल) चाहिए .... और सितारे बनते ही हैं हायड्रोजन  से - जो ईंधन के रूप में फ्यूज़न (आणविक संलयन) से हीलिअम बनती है फिर हीलिअम से कार्बन, ओक्सिजन आदि बनते हैं - यह चित्र फिर दिखा रही हूँ |


 क्योंकि हर पदार्थ का आणविक भार अलग है - तो गुरुत्वाकर्षण के सिद्धान्तों के अनुसार वह अलग अलग लेयर में - होगा - और अलग प्रेशर पर फ्यूज़ होगा | अब स्थिति यह आ पहुँचती है की जो हलके वजन के पदार्थ हैं - वे बाहर की लेयर में हैं , और गहराई में भारी पदार्थ हैं | बदलाव कभी तो बहुत ही धीरे होते हैं - तो कभी विस्फोटक रूप में | यह सब खरबों वर्षों की समयावधि में होता है |

यह याद रखना ज़रूरी है की सबसे भीतर जो लोहा ( iron - Fe) है - वह हमारी धरती की तरह ठोस रूप में नहीं है - क्योंकि दबाव और तापमान इतना अधिक है - सभी पदार्थ पांचवी स्थिति में हैं - जिसे प्लाज्मा (न सोलिड, न लिक्विड, न गैस) कहा जाता है | यह लोहा अभी फ्यूज़न (संलयन)नहीं कर सकता - जिसके लिए अभी दबाव और तापमान (हमारे दृष्टिकोण से बहुत - बहुत - बहुत अधिक हो कर भी ) कम है - सो यह भीतरी परत सिर्फ गुरुत्वाकर्षण बढ़ा रही है - विस्फोट यहाँ हो ही नहीं रहे ...

अब ईंधन की कमी के चलते (हलके पदार्थ बाहर हैं - और कम हैं ) तारे के भीतरी भाग में विस्फोटिकीय शक्तियां कमज़ोर हो जाती हैं और गुरुत्वाकर्षण की ताकतवर - तो संतुलन गड़बड़ाने लगता है | अब तारे का कोर (मर्म) भीतर गिरता है और उसकी मृत्यु किस रूप में हो - यह इस पर निर्भर है की वह किस वजन का था | 
छोटे तारे : हायड्रोजन ख़त्म होने पर जिन तारों का शुरुआती मास (द्रव्यमान) हमारे सूर्या के ०.५ गुणे से कम रहा हो, वे हीलियम जलाने के योग्य प्रेशर नहीं बना पाते - जो थोड़ी बहुत हीलिअम , ओक्सिजन आदि बनी है - वह भीतरी परत में है - लेकिन जल नहीं पा रही (हम यहाँ कभी भी केमिकल बर्निंग की नहीं , हमेशा ही आणविक जलने की बात कर रहे हैं ) | तो यह तारे ऊपर दिए चित्र तक तो पहुँच ही नहीं पाते - इनमे भीतरी दिखाए पदार्थ बनते ही नहीं ! यह "रेड ड्वार्फ" बनते हैं - और सूर्या से १००० गुना लम्बा जीवन है इनका | जिनका वजन सूर्या के ०.१ गुणा से भी कम हो - वे तो में सीक्वेंस में कई हज़ार ख़राब वर्षों तक रहते है - उसके बाद भी इन्हें रेड ड्वार्फ से व्हाय्ट ड्वार्फ बनने में कोई सौ खरब वर्ष लगते हैं | 

एक सफ़ेद बौना 
                  इससे कुछ बड़े सितारे, अब, इस स्थिति में हैं की , जो थोड़ी बहुत हायड्रोजन बची है - वह बाहरी लेयर में है - और विस्फोटक शक्ति के कारण फैलती जाती है | सितारे का बाहरी आकार इतना बढ़ जाता है की सितारा धरती या मंगल गृह की कक्षा (ऑर्बिट) जितना फ़ैल जाता है - अन्दर भारी ईंधन जल ही नहीं रहे, तो गुरुत्वाकर्षण से कोलैप्स जारी है | तारा फ़ैल कर अब एक "रेड जायंट" बन जाता है - बाहरी परत और अधिक उज्जवल हो जाती है | सतह का तापमान ५००० से ६००० डिग्री फेरेंहाईट होता है - जो तारों के लिहाज से बहुत ही ठंडा (???) कहलाता है [  :)  ] तो भीतरी और बाहरी तापमान के फर्क के चले शक्तिशाली सौर्य तूफ़ान / आंधी उठती है - जो बाहरी हायड्रोजन को बहा ले जा कर दूर दूर अंतरिक्ष में बिखेर देती है | जो बचा है भीतर, वह मृत तारा है - यह कहलाता है -long period variable star (दीर्घ कालीन बदलता सितारा)... और, जो बाहर बिखर गया (हायड्रोजन) - वह एक बार फिर से   planetary nebula बन जाता है , और एक प्रकाश वर्ष तक बड़ा हो सकता है | (आकार में - प्रकाश वर्ष आकार दर्शाता है - समय नहीं | जानकारी के लिए - प्रकाश एक सेकण्ड में ३ लाख किलोमीटर की दूरी तय करता है - तो एक मिनट में इसका साठ गुणा , फिर एक घंटे में इसका साठ गुणा, फिर एक दिन में इसका चौबीस गुणा और एक वर्ष में इसका भी तीन सौ पैसठ गुणा
               आणविक अभिक्रियाएँ करीब करीब चुक गयी है - परन्तु तापमान अभी भी कई लाख डिग्री है | कुछ अरब सालों में यह  (सफ़ेद बौना) white dwarf बनेगा , और ठंडा होने के बाद यह चमकना बंद हो कर black dwarf.(काला बौना )बन जाएगा |
        यह बौना हीलिअम और ओक्सिजन से बना है .... और बहुत ही घना है | इसका आकार तो करीब करीब पृथ्वी जितना है, किन्तु इसमें पदार्थ का मास (द्रव्यमान) करीब करीब सूर्य जितना है - धरती से हज़ार गुना से भी अधिक भारी !!
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बड़े सितारे :   यदि शुरूआती मास (द्रव्यमान) सूर्य के आठ गुणे से कम था - तब तो उसकी समाप्ति रेड जायंट पर हो जायेगी | किन्तु अधिक मास (द्रव्यमान) के तारे यहाँ नहीं रुकते | -वे आगे भी जलते हैं | उनमे भार अधिक है - तो गुरुत्वाकर्षण भी अधिक है - इसलिए दबाव और भी बढ़ता जाता है - तो भार के प्रभाव से दबाव इतना बढ़ जाता है की, भीतर ओक्सिजन और कार्बन भी संलयन (फ्यूज़न) करने लगते हैं | कार्बन से नीओन और मग्नीशीऍम  बनता है , और ओक्सिजन से सिलिकोन और सल्फर !! यह सिलिकोन और सल्फर अब फ्यूज़ हो कर लोहे को जन्म देते हैं | और जैसा मैंने पहले भी कहा है - लोहा अभी  फ्यूज़न नहीं करेगा - उसे अभी की स्थिति से कहीं अधिक दबाव चाहिए!!! - (यहं आणविक रिएक्शन हो रहे हैं और पदार्थ एक से दूसरे में परिवर्तित हो रहे हैं - केमिकल जलने की बात नहीं हो रही जिसमे धातु नहीं बदल सकती) 

तो अब एक बार फिर बैलेंस बिगड़ गया है -
सितारा फिर से भीतर को गिर रहा है - और भीतरी लेयर का लोहा विस्फोट के लिए अभी तैयार नहीं है |  यही नहीं, क्योंकि लोहा भारी है तो इसकी गुरुत्व शक्ति दूसरे पदार्थों से बहुत ही अधिक है - तो दोनों बातें एक साथ हो रही है - गुरुत्वाकर्षण बढ़ रहा है, विस्फोट कमज़ोर हो रहे हैं |


इस सबसे भीतरी पर्त - जिसमे लोहा है -जब इस पर्त का निजी द्रव्यमान १.४ सौर्य द्रव्यमान तक पहुँच जाता है - तब  बैलेंस इतना बिगड़ जाता है कि जो कोर (मर्म) है - जहाँ भारी लोहे का गुरुत्वाकर्षण तो है - लेकिन विस्फोट हैं ही नहीं - वह अचानक ही कोलैप्स होता है | क्षण भर में ही (१ सेकंड से भी कम समय में ) इस कोर का आकार करीब ५००० मील से घाट कर करीब बारह मील रह जाता है !!!!

यह इतना तेज़ बदलाव - और इतना अधिक मोमेंटम - कई प्रतिक्रियाओं को शुरू करता है | "प्रोटोंस" और "इलेक्ट्रोंस" जुड़ कर "न्यूट्रोंस" बनाते हैं | इन "उप-परमाणविक" कणों में बहुत ही अधिक ऊर्जा होती है (याद कीजिये - जून २०११ में जापान के भूकंप से आणविक रिएक्टर के खतरे को - और वह ईंधन तो सितारे के हिसाब से धूल भी नहीं है ) इस एक पल में इतनी ऊर्जा बनती है जैसे कि कई सौ सितारे दस ख़रब वर्षों में बनाते हैं -यह एक पल का विस्फोट भीतरी से बाहरी परत को फैलता है और supernova explosion. http://www.youtube.com/watch?v=RgfbjHz_UTo&feature=related होता है |
इस झटके की लहर भीतर से बाहर की और बढती है और उन परतों को अत्यधिक गर्म कर देती है | हर परत में आणविक अभिक्रियाएँ और भी पुरजोर हो उठती हैं | बाहरी परत १० अरब मील प्रति घंटे से भी अधिक रफ़्तार से अंतरिक्ष में फिंक जाती हैं | इस दबाव में अब लोहा भी संलयन (फ्यूज़न) करने लगता है - और अधिक भारी पदार्थ प्रकट होते हैं | एक या दो दिनों में यह तारा कई खरब सूर्यों से भी अधिक प्रज्ज्वलित हो कर चमकता है | दो हफ्ते गुज़रते गुज़रते यह विस्फोट तो कमज़ोर पड़ जाता है - परन्तु, यह चमक अंतरिक्ष में महीनों या वर्षों तक बनी रहती है | जो भीतर बच गया - वह नियुट्रोन स्टार या ब्लैक होल  है | यह विडीयो देखें - http://www.youtube.com/watch?v=vLaoT611i4Y&feature=related




नियुट्रोन सितारे :
यदि बचा हुआ भाग १.४ सौर्य द्रव्यमान से कम है (मूल द्रव्यमान नहीं -सिर्फ बचा हुआ भाग) - तो यह नियुट्रोन सितारा  होगा | इसका द्रव्यमान तो इतना अधिक है - परन्तु व्यास (डायामीटर) सिर्फ करीब १२ मील का है | छोटा आकार और अधिक द्रव्यमान के कारण यह बहुत घनीभूत है | आणविक विस्फोट तो नहीं हैं - परन्तु गुरुत्वाकर्षण बहुत शक्तिशाली है | यह बड़ी तेज़ी से अपनी धुरी पर घूमता है - अंदाज़न एक सेकण्ड में ३० बार!!!
जैसा कि हम सब जानते ही हैं - लोहा एक चुम्बकीय पदार्थ है - जब इतनी तेज़ी से घूमता है - तो विद्युत्-चुम्बिकीय लहरें उठती हैं - और यह "पल्सर"  कहलाता है|


ब्लैक  होल्स :

यदि द्रव्यमान इससे भी अधिक हो - सौर्य द्रव्यमान से ४० गुणा तक - तो यह गुरुत्वाकर्षण इतना अधिक मजबूत होगा कि तारा सिकुड़ता ही चला जाएगा, सिकुड़ता ही चला जाएगा, सिकुड़ता ही चला जाएगा, ....|

तब तक सिकुड़ेगा - जब तक कि यह एक बिंदु बन जाए | यह इतना घनीभूत बिंदु है कि इसका गुरुत्वाकर्षण प्रकाश को तक बाहर नहीं जाने देता - इसीलिए यह "ब्लैक होल" कहलाता है | यह अपने पास पहुँचने वाले तारों को "खा" जाता है !!!! यह विडीयो देखिये - कैसे खा लेता है -- http://www.youtube.com/watch?v=ou3TukauccM

सभी गैलेक्सी (आकाश गंगा) के बीचों बीच एक  super massive black hole.  होता है - जिसके आकर्षण से अरबों तारे उस गैलेक्सी में घूमते हैं - जैसे हमारा सूर्य हमारी आकाश गंगा में) - !! http://www.youtube.com/watch?v=0yMca0bFAdQ&NR=1&feature=fvwp

पडोसी गैलेक्सियों के आधार ब्लैक होल भी एक दूसरे को आकर्षित करते हैं - किन्तु दूरी इतनी अधिक है कि यह प्रभाव उतना शक्तिवान नहीं | फिर भी - गैलेक्सियां एक दूसरे की और आकृष्ट होती हैं - जैसे हमारी आकाश गंगा और हमारी पड़ोसी आकाश गंगा एक दूजे की और बढ़ रही हैं - जब मिलेंगी तो जो तबाही होगी - उसकी कम्प्युटराय्ज्ड झलक आप यहाँ देख सकते हैं --  http://www.youtube.com/watch?v=OxtsUNA1tk8&feature=related

किसी और पोस्ट में हम बात करेंगे कि यह वैज्ञानिक भाषा की यह बातें कितनी मिलती हैं हमारे पुराणों की ब्रह्मा - विष्णु - और महेश की बातों से....

शेष फिर ....

जानकारी ली गयी है विकीपेडिया , थिन्क्स्पेस , यूट्यूब से ....... साभार ........
यु ट्यूब पर बेहतरीन विडीओज़ हैं - सभी लिंक यहाँ हैं - और पोस्ट के चलते हुए भी यह लिंक आयेगे - लेकिन  यदि आप पोस्ट के साथ देखें - तो ज्यादा एन्जॉय करेंगे ...


शनिवार, 10 मार्च 2012

एक सितारे की जीवन यात्रा २

पिछला भाग 

पुनः प्रस्तुति

 संशोधन एवं तकनीकी शब्दों के अनुवाद ::: आभार - गिरिजेशराव  जी .... साभार  

पहले भाग में हमने देखा की अन्तरिक्षीय धूल सितारों को जन्म देती है | अब आगे ... यह धूल क्या है ? किस चीज़ से बनी है ? 
जैसा हम अपने आस पास देखते हैं , प्रकृति में हर चीज़ की "रीसाईकलिंग" होती है | तो - जब सितारे "मरते हैं" तो उनसे हायड्रोजन के कण ब्रह्माण्ड में धूल बन कर बिखर जाते हैं | यही धूल फिर अन्तरिक्षीय धूल बन कर बिखरती है - यही नेबुला पिछली पोस्ट  में होती है - जिससे नए सितारों का पुनः पुनः जन्म होता रहता है | जैसा मैंने इस विषय की पिछली पोस्ट में कहा था - किसी डिस्टर्बेंस से गोलिया बनती हैं -जो सघन होती जाती हैं - बढ़ते "मास" (द्रव्यमान ) के कारण - और अधिक अणु   इकट्ठे होते हैं - जिससे और गुरुत्वाकर्षण बढ़ जाता है - जिससे और अणु इकट्ठे होते हैं ....  | यह प्रक्रिया चलती जाती  है - और गुरुत्वाकर्षण का दबाव इतना अधिक बढ़ जाता है कि गर्मी और तापमान करीब 10,000,000 K (18,000,000 °F)  तक पहुच जाती है | अब परमाणु अभिक्रिया शुरू हो जाती है - दो हायड्रोजन के कण मिल कर आणविक फ्यूजन  ( संलयन )द्वारा हीलियम के एक अणु को जन्म देते हैं | यह जो नया नया तारा बना है - इसकी विस्फोटक प्रतिक्रयाओं के कारण बड़ी तेजी से वाष्प (पानी की नहीं - अभी पानी नहीं बना है) बाहर फूटती है और तारा तेज़ी से घूमने लगता है | इस वजह से जिस धूल के विशाल बादल ने इस तारे को बनाया था - वह हट जाता है - तारा "माँ" की कोख से बाहर आ जाता है | http://www.youtube.com/watch?v=4elLkaeLqZQ&feature=related  यहाँ आप देख सकते हैं - तारे की जीवन यात्रा |


यह एक "बालक" सितारा है | अब - गुरुत्वाकर्षण इसे अपने ही अन्दर गिराने की कोशिश कर रहा है - व परमाणु विस्फोट इसे फोड़ डालना चाहते हैं | इन दोनों विरोधी प्रक्रियाओं के बैलंस (संतुलन) से सितारा स्थिर स्थिति में रहता है | अन्दर हायड्रोजन का "फ्यूज़न " (संलयन ) चल रहा है | नीचे दिए पीरियोडिक टेबल आवर्त सारिणी ) में आप देख सकते हैं कि पहले  पदार्थ  हायड्रोजन में एक प्रोटोन है - तो दूसरे पदार्थ  हीलियम  में दो | तो दो हायड्रोजन के कण मिल कर आणविक फ्यूजन (संलयन )  द्वारा हीलियम के एक अणु को जन्म देते हैं | यह फ्यूजन रिएक्शन "न्युक्लीअर फिजन (आणविक विखंडन) " से बहुत अधिक ऊर्जा देता है (जो आणविक बम हिरोशिमा और नागासाकी में गिरे थे - उससे बहुत अधिक शक्तिशाली प्रतिक्रिया) और जो बम हम इंसान बनाते हैं - वे बहुत ही कम वजन के हैं - जिससे कहा जाता है कि धरती पल भर में नष्ट हो सकती है| सितारे के भीतर धरती  के कुल वजन से भी करोडो गुना भारी फ्युएल (ईंधन)  है - जो करोडो वर्षों तक अभिक्रियारत रहता है| हमारा सूर्य एक मध्यम आकर व् मध्यम उम्र का सितारा है - साइंटिस्ट्स के हिसाब से भी (1010 वर्ष - अर्थात १०,००,००,००,००० वर्ष ) - - और धार्मिक पुराणों के हिसाब से भी |




यह "बालक सितारे" की स्थिति कई करोड़ वर्षों तक रहती है | इसे "मेन सीक्वेंस " (मुख्या अनुक्रम) कहते हैं | यह आयु निर्भर होती है - सितारे के शुरुआती मास (द्रव्यमान) और डेंसिटी (घनत्व) पर | 


कई करोड़ वर्षों के बाद अब हायड्रोजन कम होने लगती है - तो विस्फोट कमजोर पड़ने लगते हैं | जब विस्फोटों की शक्ति क्षीण होती है - तो सितारे को बाहर की और फोड़ती ताकतें कमज़ोर और गुरुत्वाकर्षण का प्रभाव प्रबल हो जाता है | एक बार फिर बैलेंस बिगड़ गया है अब - और सितारा फिर कोलैप्स होने लगता है - यानी अपने ही अन्दर गिरने लगता है | सितारे के भीतरी भाग में अब हीलियम (जो भारी है) की बहुतायत है - जिसके फ्यूज़न के लायक प्रेशर अभी नहीं बना है |  बाहरी लेयर (पर्त) में अब भी हायड्रोजन है - लेकिन क्योंकि यह बाहर है - तो वहां "वोल्यूम" ज्यादा है - और पदार्थ कम - तो घनत्व बहुत कम है | हायड्रोजन फ्यूज़न अब भी जारी है - किन्तु कम घनत्व अर्थात कम गर्मी (सितारे के हिसाब से तापमान कम है - हमारे हिसाब से नहीं :) तापमान अभी भी  करोड़ों डीग्री सेल्सिअस ही है )


बड़े सितारे बहुत तेज़ी से अपनी फ्युएल (ईंधन) जलाते हैं (रेडिओ धर्मिता के नियमों के अनुसार - जितनी भी मात्रा में पदार्थ हो - उसे अपने से आधा होने के लिए एक ही बराबर वक्त चाहिए - इसे हाफ लाइफ पीरीअड़ कहा जाता है  - यदि एक घंटे में २०० किलो १०० किलो बन रहा है, तो इतने ही समय में १०० किलो से ५० और ५० से २५ , ... आदि ...)- और जल्दी मर जाते हैं - छोटे तारे धीरे जलते हैं  - और अंत में "रेड ड्वार्फ" या "वाईट ड्वार्फ "बनते हैं - जो की करीब १३.७ बिलीयन (अरब) सालों बाद होता है | क्योंकि हमारे इस ब्रह्माण्ड की आयु इससे कम है - तो अभी तक यहाँ - हमारे इस ब्रह्माण्ड में - रेड ड्वार्फ नहीं हैं | दूसरे ब्रह्माण्ड - और यह ब्रह्माण्ड भी - कैसे बने (विज्ञानं के अनुसार - धार्मिक ग्रंथों के अनुसार नहीं ) - यह मैं एक और सिरीज़ में डिस्कस करूंगी |


 अब हम सितारे के प्रौढ़ जीवन पर हैं | जिन तारों का वजन हमारे सूर्य से ०.४ गुना तक हो - वे रेड ड्वार्फ बनेंगे | हमारा सूर्य एक माध्यम वजन का तारा है - यह रेड जायंट बनेगा | जब हमारा सूर्य ऐसा होगा - तो वह अपने अभी के आकार से २५० गुना बढ़ जाएगा - जिसका रेडिअस १५०० लाख कि.मी. होगा |  जो रेड जायंट सूर्य से २.२५ गुना भारी तारों से बनें - वे "रेड सुपर जायंट " बन जाते हैं |

जब प्रौढ़ सितारे का बैलेंस बिगड़ता है - तो विस्फोटक शक्तियां गुरुत्वाकर्षण की शक्तियों से हारने लगती हैं - और तारा अपने ही वजन से ही अन्दर गिरने लगता है | भीतर का दबाव फिर बढ़ने लगता है | जब दबाव इतना बढ़ जाए - की अब "हीलियम" का फ्यूज़न (संलयन) शुरू हो सके - तो फिर नए बैलेंस (संतुलन) की स्थिति हो जाती है | ऊपर दिए पीरियोडिक टेबल आवर्त सारिणी )में देखें - हीलियम में दो प्रोटोन हैं तो कार्बन में छह - तो तीन अणु हीलियम के मिल कर कार्बन का एक अणु बनाते हैं | इसी तरह ओक्सिजन, नीओन, सिलिकोन आदि भारी पदार्थ बनते जाते हैं ....|

जितना भारी पदार्थ होगा - उस के ऊपर गुरुत्वाकर्षण उतना अधिक प्रभाव डालेगा , और वह उतनी अंदरूनी पर्त में होगा | वह उतनी गहराइ  में फ्यूज़ हो कर अपने से अधिक  भारी पदार्थ को जन्म देगा - जो उससे भी अन्दर की पर्त बनाएगा - कुछ प्याज़ के छिलकों की तरह | एक लेयर्ड स्ट्रक्चर बन जाता है - जैसा यहाँ दिखाया गया है | इस स्थिति में - सबसे अन्दर लोहा - आयरन है - जो फ्यूज़न (संलयन) नहीं कर सकता - इसका फिजन (विखंडन) होगा - जो तारे की मृत्यु होगी - इस पर अगली पोस्ट में बात करेंगे | यहाँ यह ध्यान देने की बात है - की पदार्थ चाहे हायड्रोजन हो या लोहा (आयरन) यहाँ कुछ भी सोलिड (ठोस), या लिक्विड (तरल) नहीं है - सब ही गैस (वायु रूप )में हैं - क्योंकि तापमान करोड़ों डीग्री सेल्सिअस है |  इस स्थिति में - सबसे अन्दर जो लोहा - आयरन है, वह भी वाष्प है - तो वह फैल या दब सकता है - जबकि धरती पर तापमान कम होने से लोहा ठोस है - जो न फैल सकता है , न दब सकता है | 


अगली पोस्ट में - तारे की मृत्यु, सुपरनोवा एक्सप्लोजन, नीयुट्रोन  स्टार, ब्लैक होल आदि पर चर्चा करेंगे ....

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अधिक जानकारी के लिए -
http://en.wikipedia.org/wiki/Life_of_a_star
Information from wikipedia,  burro.astr.cwru.edu, csep10.phys.utk.edu, youtube.... credits and thanks ....

शुक्रवार, 9 मार्च 2012

जापान का भूकंप - १ : भूकंप आने की प्रक्रिया


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जापान के भयंकर भूकंप को एक साल पूरा हो रहा है । यह दुनिया में अब तक का सबसे शक्तिशाली भूकंप के रूप में दर्ज है, जबसे हम भूकम्पों की तीव्रता का आकलन कर के उसे दर्ज करने लगे हैं । न सिर्फ भूकंप, किन्तु उसके कारण आई सुनामी ने जापान को बुरी तरह से प्रभावित किया , और फिर न्यूक्लियर पावर रिएक्टर में भी कण्ट्रोल फेल हुए - जिससे स्थिति और भी बिगड़ गयी । भूकंप आते क्यों हैं ? इनके पीछे कौन से प्राकृतिक तंत्र काम करते हैं ? सुनामी कैसे आती है ? "न्यूक्लियर मेल्ट डाउन " क्या होता है ? इन सब पर एक नज़र डालते हैं ।

सबसे पहले ( इस भाग में ) भूकंप आने की प्रक्रिया देखते हैं । 

हम सब जानते हैं  कि धरती के भीतर इतनी गर्मी है की वहां कुछ भी ठोस नहीं है । पिघला हुआ शैल्भूत (magma ) हमेशा उबलता रहता है । विज्ञान की theories के अनुसार माना जाता है  कि पहले धरती शायद सूर्य से फिंका हुआ एक जलता पुंज थी जो किसी तरह एक कक्षा में स्थापित हो कर सूर्य की परिक्रमा करने लगी और करोड़ों वर्षो तक घूमते हुए ठंडी होती होती तरल रूप में आई । {आप जानते होंगे कि satellites कैसे भेजे जाते हैं - कि पहले rocket  धरती से "फेंका" जाता है । उसकी शुरूआती गति के अनुसार वह उतने radius (त्रिज्या) की कक्षा में स्थापित हो जाताहै । }फिर जिस तरह उबले दूध पर ऊपरी सतह पर ठंडी होने से मलाई पड़ने लगती है, उसी तरह इस पिघले शैल्भूत पर भी ऊपर "मलाई" सी पड़ने लगी, अर्थात ऊपर की सतह ठोस होने लगी । परन्तु यदि आपने कभी दूध उबाला है, तो आप जानते होंगे कि यह मलाई एक अभंग इकाई (unbroken entity ) नहीं होती, बल्कि अलग अलग मलाई के भाग होते हैं, जिनके बीच में दरारें होती हैं । ( नहीं देखा, तो आज देखिएगा - चाय या दूध उबलने के बाद उसे दो मिनट ठंडा होने दीजियेगा, फिर ध्यान से मलाई को देखिएगा ।)

यह धरती के शैल्भूत की ऊपरी पथरीली सतह धीरे धीरे मोटी होती गयी । हमारी धरती की ४ मुख्य परतें हैं - inner core , outer core , mantle and crust । यह चित्र देखिये । 
layers of earth (courtesy :

धरती का जो crust  है, यह एक पतली खाल की तरह है, जो mantle का ऊपरी हिस्सा है । यह (दूध की मलाई ही की तरह) एक नहीं है, बल्कि अलग अलग टुकड़े हैं - जिन्हें tectonic plates कहते हैं । ये टेक्टोनिक प्लेट्स पिघले हुए magma के ऊपर तैरती हैं । (यदि आप यह सोच रहे हों कि ठोस तरल से भारी होता है तो इन्हें भीतर होना चाहिए - तो याद करें - आपकी car के tyres में high pressure air है, जो कार से "हलकी" होती है - परन्तु अत्यधिक दबाव की वजह से हवा भरे टायर्स कार का भार उठा सकते हैं । इसी तरह धरती के भीतर का पिघला भाग अत्यधिक दबाव वाला है, क्योंकि magma उबल रहा है लगातार । इससे धुआं और भाप (सिर्फ पानी ही की नहीं, बल्कि उबलते हुए कई पदार्थ जिनमे लोहा और कई दूसरे खनिज भी हैं, इन सभी के उबलने से बनता धुआं और भाप अत्यधिक दबाव लिए है ) बनती रहती है और उठने की कोशिश करती रहती है । लेकिन ऊपर जो ठोस परत बन चुकी है - यह उसे बाहर जाने का रास्ता नहीं देती । जब कहीं कोई कमज़ोर स्थान अपनी सहने की सीमा (breaking limit ) तक जा कर टूट जाता है - तो वहां से यह धुआं / भाप / पिघले पत्थर आदि बाहर फूट निकलते हैं - जिसे हम ज्वालामुखी का फूटना कहते हैं । यह magma ठंडा नहीं हो पाता क्योंकि ऊपर की पथरीली ठोस परत ताप (heat ) का bad conductor है । यह भी ध्यान देना होगा कि धरती यदि सच ही में सूर्य से फिंक गया कोई पुंज थी, तब तो भीतर कई तरह के विस्फोट शायद अब भी होते हों ? वैज्ञानिक भी ठीक से नहीं जानते कि भीतर क्या है, क्योंकि भीतर कोई जा तो पाया नहीं है, न ही उपकरण उस पत्थरों को पिघला देने वाली गर्मी में उतारे जा सकते हैं ) इन टेक्टोनिक प्लेट्स के ऊपर ही सारे समुद्रों के तल (sea beds ) और महाद्वीपों (continents ) के भूतल हैं । ये टेक्टोनिक प्लेट्स कुल सात हैं, और जिन दरारों पर ये आपस में जुडी हैं, उन्हें "line of fault " कहा जाता है । ये प्लेट्स कितनी बड़ी और कितनी भारी होंगी, आप अंदाजा कर सकते हैं, क्योंकि ये सारी धरती के surface area के base हैं, और इनके ऊपर ही सारे महादीप और सारे समुद्र स्थापित हैं । भौतिकी (physics ) के अनुसार friction रगड़ खाते हुई सतहों के बीच relative movement (चाल, गमनागमन ) का विरोध करने वाली शक्ति / force होती है । और यह friction उतना अधिक होता है , जितना द्रव्यमान (mass ) अधिक हो । तो इन टेक्टोनिक प्लेट्स के बीच आपस में बहुत अधिक friction है । 

जब धरती घूमती है (- अपनी धुरी पर भी और सूर्य के आस पास भी -) तो ये प्लेट्स भी घूमते हैं ( ज़रा दूध की भगोनी को संडसी से पकड़ कर घुमाइए ) इन प्लेट्स के घूमने से इनमे relative  motion का भी सतत प्रयास होता रहता है, क्योंकि अलग अलग भार और अलग अलग composition ( संयोजन या बनावट ) होने से इन पर अलग अलग magnetic और gravitational pulls काम करते हैं । अर्थात ये प्लेट्स एक दूसरे के साथ स्थिर नहीं रहना चाहतीं, बल्कि कोई प्लेट तेजी से आगे जाना चाहती है जबकि दूसरी प्लेट कुछ कम तेजी से । तो इनमे आपस में स्थिरता नहीं होनी चाहिए, एक प्लेट आगे बढ़नी चाहिए, जबकि दूसरी पीछे छूटनी चाहिए । परन्तु अत्यधिक friction के कारण ऐसा हो नहीं पाता । ये प्लेट्स आगे पीछे होना तो चाहती हैं, परन्तु हो नहीं पातीं । साल दर साल दर साल दर साल इनके बीच में pressure (दबाव) बढ़ता जाता है, बढ़ता जाता है । फिर एक स्थिति आती है जब , जहां इन प्लेट्स के बीच के जोड़ पर थोड़ी कमजोरी हो (line of fault ) वहां की दरार के बराबर बराबर के पत्थर (छोटे मोटे नहीं - बड़े ही विराट पत्थर) टूट जाते हैं - और ये टूटने से ये परतें अचानक सरक जाती हैं / एक परत दूसरी के ऊपर चढ़ जाती है / एक परत दूसरी के नीचे घुस जाती है । यह तस्वीर देखिये :


जहां पत्थर टूटे वह "focus " होता है, और उसके ठीक ऊपर की धरती की सतह को "epicentre "कहते हैं । जितने force से यह movement हुई, उसका माप रिचर स्केल (ritcher scale ) पर नापा जाता है (अब यह बदल रहा है ) इस अचानक हुई चाल के कारण धरती काँप जाती है और भूकंप आता है ।

एक और बात - स्केल के बारे में । आप सोचते होंगे शायद कि "magnitude 4 " (माप ४ ) का भूकंप बड़ा ही साधारण माना जाता है , लोगों को पता तक नहीं चलता कई बार , जबकि ७ का भयंकर - ऐसा क्यों ? तो इसका उत्तर यह है कि ritcher scale  एक logarithmic scale है, अर्थ १ = १०^१, २-१०^२ . इसी अनुपात में मान ७ का एक भूकंप है १०^७ और मानक ९ का अर्थ है १०^९ । इसका एक अंदाज़न अर्थ यह हुआ कि यह २०११ का जापान का ९ मानक वाला भूकंप लातूर के १९९३ के ६.४ मानक वाले भूकंप से करीब करीब ७०० गुना ज्यादा शक्तिशाली था !!!

अगले भाग में सुनामी की प्रक्रिया पर बात करेंगे ।

References : 



शनिवार, 3 मार्च 2012

हे सूर्यदेव, तुम्हे नमन...

पुनः प्रस्तुति



 हे सूर्यदेव - तुम्हे शत शत नमन |

तुम्हारे शुभागम को नमन
 - तुम्हारे विगम को नमन |

उषा की पूर्वी ललाई को ,
    सांझ की गरिमामई ढलन को नमन 






हजारों गेंदों में लुकते छिपते
        तुम्हारे नटखट बचपन को नमन









आसमानों की हथेलियों पर सजते
रत्नित छल्लों की हर इक किरण को नमन




गृह नक्षत्रों की ओट से फूट उठती
     तुम्हारी उर्मियों की तपन को नमन             
          








किसी धनुर्धर के धनु से उछालें लेती
    शक्तियों की त्वरित तरंगन को नमन



कभी धीर गंभीर शांत - तो कभी ....      
   छितरी बदरी से अठखेली करती
लश्कारे भरी नटखट किरण को नमन








रंग की अनदेखी फहराती चुनरी की ---
अन्तरिक्षी चमन में
अनंत उड़न को नमन ......                                                                                                        















गुलाबी पंखडियों पर सोती ओंस की बूंदों से
स्फटिक किरणों की इन्द्रधनुषी बिखरन को नमन




घुप्प अन्धकार की चादर को चीरती
          तुम्हारी विहंगम भोर की उठन को नमन .........            

हे सूर्यदेव, तुम्हे शत शत नमन, नमन, नमन, नमन....