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गुरुवार, 25 अक्तूबर 2012

फेसबुक और ब्लॉगिंग

उफ़ यह फेसबुक
यह निखट्टू ब्लोगिंग
काम धरे रह जाते सारे
हो न पाती जॉगिंग :( :(

कंप्यूटर पर आते
करने को दो काम
फेसबुक अपडेट देखते
जाने कब हो जाती शाम

काम धरे रह जाते सारे
कुर्सी से फेविकोल का जोड़
फेसबुक और ब्लोगिंग ने
बना लिया गठजोड़

ट्रेडमिल बुला रही
बीप - बीप आवाजें मार
हम उसको कह रहे
तनिक ठहरो न यार  :)

"प्रोग्राम" काम का आधा ही बस
टाईप हुआ धरा है
रोज़ लगे कल पूरा होगा
बचा बस ज़रा ज़रा है

फिर आती सिस्टम पर
बैठकी लगाने
और समय बर्बाद करती
फेसबुक के बहाने ....
:) :)
:( :(

मंगलवार, 23 अक्तूबर 2012

नवरात्र : श्री दुर्गा सप्त शती और मधु कैटभ कथा

सभी को महानवमी की शुभकामनायें 

श्री दुर्गा सप्तशती हिंदी में - गीतापेस - पढने के लिए लिंक क्लिक करें 


आज महानवमी के शुभ दिन एक और कथा बांचते हैं  :)

प्राचीन समय में सुरथ नाम के एक राजा थे । ये राज्य के प्रति उदासीन थे, जिसका लाभ उठा कर शत्रुओं ने इनके राज्य पर हमला किया । लोभवश राजा के विश्वासपात्र मंत्री भी शत्रुओं से मिल गए, और राजा सुरथ की पराजय हुई । राज का मन अपने मंत्रियों के इस विश्वासघात से बहुत खिन्न था, और वे तपस्वी वेश में वन में वास करने लगे, किन्तु उनका मोह उन्हें कष्ट देता रहा ।

वन में उनकी भेंट समाधि नामक एक वणिक से हुई, जो अपने स्त्री और पुत्रों के दुर्व्यवहार से दुखी हो वहां रह रहा था । दोनों का परस्पर परिचय हुआ और एक दूसरे को उन्होंने अपनी कथा सुनाई । तब दोनों आपस में चर्चा करने लगे कि जिनके लिए मानव इतना मरता खपत है, जब वे ही अपने न हुए, तो मन को शान्ति कैसे मिलेगी ?

वे दोनों महर्षि मेधा की शरण में गए । महर्षि मेधा ने उनसे आने का कारण पूछा और उन्होंने अपने मन के अशांत होने के और इसके कारणों के विषय में उन्हें बताया । उन्होंने कहा कि हमारे स्वजनों ने हमें अपमानित किया, धोखा दिया फिर भी हमारा उनकी और मोह नहीं छूट पाटा - इसका कारण या है ? तब ऋषिवर ने उन दोनों को माता की आराधना करने को कहा और उनको माँ के वैभव की अनेक गाथाएं सुनाईं ।

इनमे से कई कथाएं पिछले नौ दिनों में हम सब पढ़ते आये हैं । आज मधु कैटभ वध की कथा पढ़ते हैं ।
"
राजा सुरथ ने पूछा : भगवन ! वह देवी कौन हैं जिन्हें आप महामाया कहते हैं ? उनके बारे में विस्तार से हमें बताइये प्रभु ।
महर्षि मेधा ने कहा " राजन ! वे तो नित्यस्वरूपा हैं, जिनसे संसार रचा गया है । फिर भी उनकी उत्पत्ति बारम्बार अनेक कारणों से प्रकार से होती है ।
एक बार भगवान् विष्णु क्षीर सागर शेष शैया पर योगनिद्रा में थे । संसार विलीन हो चूका था और धरती आदि सब कुछ चिर जल में जलमग्न हो चुका था । तब मधु कैटभ नामक दो दैत्य उनके कर्ण कुहरों से प्रकट हुए । वे श्री विष्णु के नाभि कमल पर स्थित ब्रह्मा जी को मारने दौड़े । ब्रह्मा जी जानते थे कि इन दोनों महाबलवान दैत्यों से सिर्फ विष्णु जी ही मुझे बचा सकते हैं । तब ब्रह्मा जी ने विष्णु जी की आँखों में बसने वाली योगनिद्रा से प्रार्थना की, तो वे स्त्री रूप में श्री विष्णु की आँखों से बाहर आ गयीं । मधु कीटाभ की मृत्यु सिर्फ श्री विष्णु के हाथों ही होनी थी । उन्होंने वर माँगा की यह जल में / जल पर न हो , क्योंकि सब और जल था, तो उन्होंने सोचा कि इस तरह हम बच जायेंगे । लेकिन श्री विष्णु ने उन्हें जाँघों पर लेकर उनका वध किया ।
फिर श्री महर्षि मेधा ने महिषासुर, चंड मुंड, रक्तबीज, और शुम्भ निशुम्भ वध की कथाएँ सुनाईं ।

यह सब उपाख्यान सुनकर सुरथ और वणिक  के मन शांत हुए, तब महर्षि ने उन्हें माँ की उपासना विधि बताईं । वे दोनों नदी के तट पर जाकर तपस्या करने लगे । तीन वर्ष बाद देवी ने उन्हें दर्शन और आशीर्वाद दिए । वणिक ने सांसारिक मोह से मुक्त हो कर आत्मचिंतन में मन लगाया और राजा सुरथ ने शत्रुओं को हरा कर अपना खोया राज्य वापस प्राप्त कर लिया । 

सोमवार, 22 अक्तूबर 2012

देवी कथाएँ 6 महिषासुर, शुम्भ निशुम्भ वध

पिछले भागो से आगे । अन्य भाग पढने के लिए ऊपर "पुराणों की कथाएँ" tab क्लीक करें ।

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महिषासुर वध 

रम्भासुर नामक दैत्य का महिषासुर नामक पुत्र था, जिसने अथक तपस्या कर ब्रह्मा जी को प्रसन्न किया, और उनसे वरदान लिए कि वह सिर्फ एक स्त्री के ही हाथों से मारा जा सकेगा । वरदान प्राप्त करने के बाद वह सभी देवताओं को परास्त कर इन्द्रासन पर चढ़ बैठा । देवता ब्रह्मा जी और विष्णु जी सहित शिव जी के पास आये । सब सुन कर शिव जी क्रोधित हुए  । शिव के क्रोधित मुखमंडल से एक तेज निकला, और तब ब्रह्मा जी और विष्णु जी सहित सब देवताओं से तेज उत्पन्न हुआ, जिसने स्त्री वेश धारण किया , जो दुर्गा देवी थीं ।  देवताओं ने अति हर्षित हो कर उन महाकाली को आयुध एवं आभूषण आदि प्रदान किये । शिव जी ने उन्हें अपना त्रिशूल दिया, विष्णु जी ने चक्र तो इंद्र ने वज्र ।

आयुध व् आभूषणों से सुसज्जित चंडिका ने परम अट्टहास किया जिसकी गर्जना सुन महिषासुर अपनी सेना ले युद्ध करने पहुंचा । राक्षसों ने वाण चलाने आरम्भ किये तो माँ ने सांस छोड़ी जिससे असंख्य सैनिक प्रकट हो राक्षसों से युद्ध करने लगे । माँ का वाहन सिंह गरज गरज कर सब और असुरों को मारने लगा । देवी ने असंख्य सैनिक संहार दिए और महिषासुर के दैत्य सेनापति भी मारे गए । तब महिषासुर भैंसे और फिर सिंह के रूप में परिवर्तित हुआ । देवी ने उसका गला काट दिया, तो असुर फिर अपने रूप में आकर दौड़ा । फिर वह हाथी में बदला, जिसकी माँ ने सूंड काट दी । आखिर फिर से भैसा बन कर जब महिषासुर हमला करने आया तो माँ उस के ऊपर चढ़ गयीं और इस बार गर्दन काटने पर जब वह भैसे के मुंह से निकलने लगा तो देवी ने उसकी ग्रीवा में त्रिशूल मार कर उसे संहारा ।

बची हुई असुर सेना भाग गयी और देवताओं गन्धर्वों ने देवी की विनयपूर्वक महादुर्गा जी की स्तुति की ।
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चंड , मुंड, धूम्राक्ष , रक्तबीज , शुम्भ - निशुम्भ वध 

एक बार शुम्भ निशुम्भ नामक पराक्रमी दैत्यों से त्रिलोक कम्पायमान था । दुखी देवता जगज्जननी के पास पहुंचे, और उनकी स्तुति की । भवानी महेश्वरी ने उनसे आगमन का कारन पूछा , तब उन्होंने अपनी व्यथा कही । तब गौरी के शरीर से एक कुमारी प्रकट हुई जो शरीर कोष से निकली होने से कौशिकी भी कहलाई , और माता के शरीर से प्रकट होने से मातंगी भी कहलाई । देवताओं को आश्वस्त कर उग्रतारा देवी सिंह पर स्वर हो कर हिमालय के शिखर पर स्थित हुईं ।

शुम्भ निशुम्भ के दो सेवकों - चंड और मुंड ने उस सुन्दर देवी अम्बिका को देखा तो अपने स्वामियों को जाकर कहा की हे महाराज, हिमालय पर अद्वितीय सुन्दर कन्या सिंहारूढ़ है - और वह आप के योग्य है ।

मदांध असुरों ने सुग्रीव नामक दैत्य को उसे लिवा लाने भेजा, तो देवी ने कहा की हे दूत, मैं प्रतिज्ञाबद्ध हूँ की मैं सिर्फ उससे ही विवाह करूंगी जो मुझे युद्ध में परास्त कर सके । जब दूत ने यह बात अपने स्वामियों को बताई तो क्रोधित हो उन्होंने धूम्राक्ष से युवती को बाँध कर घसीट लेन की आज्ञा दी । किन्तु वहां आने पर महोग्रतारा ने सिर्फ "हम्म" स्वर भर से उसे राख कर दिया ।सैनिक भागने लगे । चंड , मुंड फिर आये तो माँ ने भृकुटी टेढ़ी की, जिसमे से महाकालिका प्रकट हुईं । चंड और मुंड का वध करने से महाकालिका चामुंडी कहलाईं । यह हो जाने के उपरांत शुम्भ निशुम्भ स्वयं युद्ध भूमि में आये  ।

तब श्री ब्रह्मा जी के शरीर से ब्राह्मी, विष्णु से वैष्णवी , महेश से महेश्वरी, और अम्बिका से चंडिका प्रकट हुईं। पल भर में सारा आकाश असंख्य देवियों से आच्छादित हो उठा । ब्राह्मणी ने अपने कमंडल से जल छिड़का जिस से राक्षस तेजहीन होने लगे, वैष्णवी अपने चक्र , महेश्वरी अपने त्रिशूल से, इन्द्रानी वज्र से और सभी देवियाँ अपने अपने आयुधों से  आक्रमण कर रही थीं । राक्षस सेना भागने लगी ।

तब रक्तबीज ने राक्षसों को धिक्कारा कि वे स्त्रियों से डर कर भाग रहे हैं ? रक्तबीज हमला करने आया, तो इन्द्राणी ने उस पर शक्ति चलाई जिससे उसका सर कट गया और रक्त भूमि पर गिरा । किन्तु पूर्व वरदान के प्रभाव से उस रक्त से फिर एक रक्तबीज उठ खडा हुआ और अट्टहास करने लगा । जैसे ही शक्तियां उसे मारतीं, उसके रक्त से और असुर उठ खड़े होते । जल्द ही असंख्य रक्तबीज सब और दिखने लगे ।

श्री चंडिका ने श्री काली से कहा कि इसका रक्त भूमि पर इरने से रोकना होगा, जिससे और रक्तबीज न जन्में । देवी काली ने कहा की आप सब इन्हें मारें, मैं एक बूँद रक्त भी भूमि पर न पड़ने दूँगी । और ऐसा ही हुआ भी, जल्द ही सारे नए रक्तबीज युद्ध में मारे गए । तब रक्तबीज समझ गया की काली उसे पुनर्जीवित नहीं होने दे रही हैं, तो वह चंडिका को मारने दौड़ा । तब चंडिका ने उसे मार दिया और काली ने रक्त को भूमि पर न गिरने दिया । देवता चंडिका की जयजयकार करने लगे । जयकार सुन कर शुम्भ ने निशुम्भ को हमले की आज्ञा दी ।

 निशुम्भ देवी से बोला , की हे मालती के पल्लव सी सुकोमल तन्धारिणी, तुम यह विकट युद्ध क्यों कर रही हो ? तब देवी ने उसे वाचालता छोड़ कर युद्ध को ललकारा । निशुम्भ पर उन्होंने वाण वर्षा की , और निशुम्भ ने उन पर । काली देवी ने करोडो दैत्य संहार दिए, तब निशुम्भ उन पर लपका । उसके सभी आयुधों को काट कर देवी ने उसका वध कर दिया ।

भाई को गिरता देख शुम्भ देवी से युद्ध करने बढ़ा , तब चंडिका ने उसे भी त्रिशूल से संहारा । देवताओं ने पुष्पवर्षा करते हुए माँ की बड़ी स्तुति की ।

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जय माता दी  

रविवार, 21 अक्तूबर 2012

कथा 5 : शिव पार्वती विवाह


पिछले भाग से आगे
(बाकी भाग पढने के लिए ऊपर "पुराणों की कहानियाँ " tab क्लिक करें )

देवी रति को कामदेव के प्रद्युम्न रूप में लौटने के बारे में बता कर शिव जी वहां से अंतर्ध्यान हो गए । पार्वती बहुत दुखी हुईं और उन्होंने शिव जी को प्राप्त करने के लिए पंचाक्षरी नाम जाप के साथ तपस्या करना शुरू किया । माता ने उन्हें "उमा" कह कर रोका- जिससे उनका नाम उमा हुआ ।

उमा ने बड़ी कठिन तपस्या की , पहले भोजन त्यागा, फिर फल आदि भी त्याग दिए और बाद में पत्र पुष्प भी । पर्ण भी त्याग देने से उनका नाjम "अपर्णा" हुआ । 3 हज़ार साल से अधिक होने पर भी शिव प्रसन्न न हुए, तब पार्वती जी और भी लगन के साथ अपनी साधना में लग गयीं ।

उनके तप ताप के तेज से पृथ्वी संतप्त हो उठी और प्राणियों को अत्यंत पीड़ा होने लगी  । उधर ताड़कासुर ने सब और अपना राज्य विस्तारित किया और इन्द्रासन पर भी आसीन हो गया । तब देवगण विष्णु जी और ब्रह्मा जी सहित शिव जी के पास गये और पार्वती से ब्याह करने को कहा, । शिव जी ने कहा कि  मैं योगी हूँ, मुझे विवाह में कोई रूचि नहीं, और फिर से ध्यान मग्न हो गए । देवताओं ने उन्हें फिर पुकारा और धरा पर मची हाहाकार से मुक्ति के लिए उनसे तप स्वीकारने की प्रार्थना की । तब शिव जी ने कहा कि यद्यपि विवाह में हमारे रूचि नहीं है, तथापि आओ सब के लिए हम यह स्वीकार कर सकते हैं , आप सब प्रसन्न मन से प्रस्थान कीजिये ।

देवताओं के जाने के बाद शिव जी ने सप्तर्षियों से काली के प्रेम और समर्पण की परीक्षा लेने को कहा, जिन्होंने उमा के आगे आ कर शिव जी के अवगुणों की बातें  कहीं। भवानी ने तनिक भी विचलित हुए बिना अपनी तपस्या जारी राखी ।

फिर शिव जी खुद वृद्ध ब्राह्मण वेश में उनके पास आये और माँ ने उनका आदर सत्कार किया । उन्होंने पूछा की हे सुन्दर राजकुमारी, आप यह किस उद्देश्य से इतना कठोर तप कर रही हैं । उमा के कारण बताने पर वे शिव जी की बड़ी भर्त्सना करने लगे और कहा की ऐसे वर से विवाह करने से तो अच्छा हो की तुम कुंवारी ही रहो । शिव जी की बुराई पर माता भवानी क्रोधित हो गयीं और ब्राह्मण को वहां से जाने का आदेश दिया, अपनी सखी से कहा कि इसे यहाँ से दूर रखो और चुप रखो  । जितना पाप श्री महादेव की बुराई करने में है, ऐसा ही पाप उसे सुनने में भी है । मैं लज्जित हूँ कि मैंने इस शिवद्रोही का स्वागत सत्कार किया, और यह कह कर शिवा वहां से जाने लगीं  । इस पर शिव अपने निज रूप में आये और शिव का सारा क्लेश जाता रहा  । शिव जी ने कहा कि हे देवी, आपसे हम अति प्रसन्न हैं, और आपसे असीमित प्रेम भी करते हैं । आपके बिना अब हम भी नहीं रहना चाहते। आपको जो चाहिए है, मांग लीजिये । तब गिरिजा ने उनसे पिता हिमवान से अपना हाथ मांगने को कहा ।

शिव जी बोले , की मांगने में समर्थ पुरुष का तेज घट जाता है । जैसे ही "देहि" (मांगने के लिए संस्कृत शब्द - दो / दीजिये) शब्द मुंह से निकले, पुरुष भिक्षुक की तरह हीन हो जाता है  । किन्तु माता भवानी ने कहा कि पिता से पुत्री को स्त्री रूप में मांगना पुरुष का अपनी स्व प्रकृति को प्राप्त करने का कर्म है, और शास्त्र सम्मत है ।  तब शिव उन्हें पिता के घर प्रसन्न मन से लौट जाने को कह कर चले गए और गिरिजा प्रसन्नचित्त से घर आ गयीं ।

शिव नट रूप में डमरू लेकर हिमवान के घर आये और अत्यंत दिव्य नृत्य किया । अति प्रसन्न होकर राजा रानी ने उन्हें जो चाहें लेने को कहा, तो उन्होंने देवी काली का नाम लिया । राजा रानी नट की उद्दंडता पर अति क्रोधित हुए और सैनिकों से उसे बाहर निकालने को कहा, किन्तु उनके दिव्य तेज से कोई भी उनके सम्मुख न पहुँच सका  । नटराज ने फिर उमा का हाथ स्वयं को सौंपने को कहा, किन्तु मैना और हिमवान के न करने पर वे वहां से अंतर्ध्यान हो गए ।

फिर गिरिजेश वैष्णव ब्राह्मण रूप में हिमवान के घर गए और शिव जी की इतनी तीव्र निंदा की कि मैना और हिमवान ने कहा कि हम अपनी बेटी को कुंवारी भले ही रखेंगे, किन्तु ऐसे वर को उसे न सौंपेंगे । बाद में शंकर जी की प्रेरणा से सप्तर्षि वहां गए और हिमवान को मनाया । मैना देवी फिर भी न मानें, तो उन्हें अरुंधती जी ने समझाया (अरुंधती जी ब्रह्मा पुत्री संध्या हैं, जो कामदेव के साथ ही ब्रह्मा के ह्रदय में से उत्पन्न हुईं थीं  । ब्रह्मा की अनुमति पा कर कामदेव ने बाण संधान किया, जिससे सभा में उपस्थित सभी देवों की दृष्टि काम्पूर्ण हो उठी और संध्या पर सकाम दृष्टि पडी । इससे संध्या का मन व्यथित हुआ और वे पित्राज्ञा से श्री वशिष्ठ जी से मन्त्र ले कर तपस्या को चली गयीं । संध्या को सूर्य ने प्रातः और सायं संध्या में विभक्त किया था । बाद में वे तपस्या करने वे चंद्रभाग पर्वत पर चली गयीं, जहां से चंद्रभागा नदी उत्पन्न हुईं । अगले जन्म में वे ऋषि मेधातिथि की पुत्री अरुंधती हुईं, और उनका ब्याह वशिष्ठ जी से हुआ )

बरात आई तो शिव जी ने मैना जी के अहंकार को नष्ट करने के लिए इतना भयंकर वेश धारण किया कि मैना उन्हें देख कर बेहोश हो गयीं  । चेतना लौटने पर बेटी से कहा कि ऐसे कुलक्षणी अशुभ से मैं तुम्हे नहीं बांधूंगी ।
वे अपनी बेटी उमा, नारद, सप्तर्षियों, सबको अपशब्द कहने लगीं की धिक्कार है कि मेरी कोमलांगी पुत्री को ऐसे अमंगल दूल्हा चुना गया । उसी समय मेरा गर्भ नष्ट हो जाता तो भला होता । मैं उमा को अपने हाथों से विष दे दूँगी परन्तु इस से उसे न ब्याहूंगी । नारद ने उन्हें समझाया की शिव रूप सर्व शुभ है , यह रूप तो उन्होंने कौतुकवश धारण किया है । किन्तु वे न मानीं और नारद को कहा कि तुम दुष्टों और अधर्मियों के शिरोमणि हो कि तुमने हमारी बेटी का जीवन खराब कर दिया । देवताओं और सप्तर्षियों के समझाने पर भी मैना अपनी बात पर अड़ी रहीं । हिमवान स्वयं भी समझाने गए तो मैना ने कहा की वे सहर्ष बेटी को गले में रस्सी बाँध कर पर्वत से लटका दें , किन्तु वे उसका ब्याह शिव से न होने देंगी ।

अब पार्वती ने कहा कि "हे माते, तुम्हारी वाणी और बुद्धि तो सदैव मंगलकारी हुआ करती थी । आज यह धर्म का अवलंब न कर भटक गयी है । हे माँ, रूद्र सर्वोत्पत्ति के कारण और साक्षात इश्वर हैं । मनोहारी रूप धारी, कल्याणकारी महेश्वर परमेश्वर हैं । विष्णु ब्रह्मा द्वारा सेवित हैं और देवता गण इनकी आराधना करते हैं । ये निर्विकार, अविनाशी और सनातन हैं । शिव जी के ही कारण आज आपके द्वार पर ब्रह्मा विष्णु और समस्त देवगण और ऋषि मुनि जन पधारे हैं । मैं मन वचन कर्म से उन्हें पति मान चुकी हूँ, और आप मेरा विवाह न भी करेंगे, तो भी मैं आजीवन उनकी ही पत्नी बन कर कुंवारी रहूंगी " पुत्री की इन बातों से मैना देवी अति क्रोधित हुईं और उसे (निर्लज्जता के लिए ) डांटने लगीं । विष्णु जी भी मैना के पास आये और उन्हें समझाया , कि पितरों की कन्या और शैलप्रिया होने से उम्का सम्बन्ध ब्रह्मा जी के कुल से है । विष्णु जी के समझाने से मैना का आवेश कम तो हुआ, किन्तु उन्होंने जिद न छोड़ी । किन्तु जब शिव जी ने अपनी माया हटाई, तो मैना ने उन्हें उत्तम स्वीकार किया और नारायण से प्रार्थन की कि शिव जी से निज रूप में आने को कहें । तब शिव अपने स्वरुप में आये और उस रूप में अति सुन्दर प्रकट हुए  । मैना ने अपने व्यवहार पर क्षमा मांगी और फिर शिव और शिव का विवाह संपन्न हुआ ।

नव दंपत्ति के दर्शनों को सोलह श्री नारियां आयीं : सरस्वती, लक्ष्मी सावित्री, गंगा, अदिति, लोपामुद्रा, अरुंधती, अहल्या, तुलसी, स्वाहा, रोहिणी, पृथ्वी, शतरूपा, संज्ञा और रति । फिर और भी अनेक दिव्य देवपत्नियाँ, नाग कन्याएं, मुनि कन्याएं आदि वहां आईं   । रति ने कामदेव की भस्म को शिव के आगे किया और विवाह के शुभ अवसर पर अपने पति को पुनर्जीवित करने को कहा, और बहुत रोने लगीं । उनके रोने से अन्य देवपत्नियाँ भी रोने लगीं और प्रभु की दयादृष्टि पड़ते ही भस्म से कामदेव अपने पूर्व रूप में आ अगये और रतिकाम ने शिव शिव की मधुर स्तुतियाँ की । विदाई के समय माँ ने पुत्री को पतिव्रता नारी के धर्म समझाए । फिर गिरिजकुमारी अपने पति के साथ हिमवान के देश से विदा हो गयीं ।

शिव पार्वती सुत कार्तिकेय जन्म की गाथा 
शम्भु शक्ति सुत  श्री गणेश गाथा 


शिवरात्रि की शुभकामनाएं







शनिवार, 20 अक्तूबर 2012

देवी कथाएँ 4

पिछले भाग से आगे (पढने के लिए ऊपर पुरानों की कहानियाँ tab क्लिक करें )

दक्ष दत्त (सती का) शरीर त्याग कर माता भवानी स्वधाम को लौट गयीं । शिव बड़े संतप्त हुए और कैलाश पर तप को चले गए । समय गुज़रता गया ।

इधर देवतागण ब्रह्मा जी के पास गए, जहाँ उन्होंने बताया कि कुछ आसुरी शक्तियों का नाश विष्णु अवतार करेंगे, कुछ का शिव अवतार, तो कुछ और आसुरी शक्तियों का विनाश सिर्फ जगदम्बिका के अवतारों और शिव भवानी की संतति द्वारा ही हो सकता है । आदिशक्ति जगदम्बिका अब हिमवान और मैना जी के घर अवतार लेंगी । तब देवता गण मैना जी के परिवार ( पितरों ) के पास गए और उनसे मैना जी और हिमवान के विवाह का अनुरोध किया । विवाह के उपरांत मैना जी और हिमवान ने माता की कठोर तपस्या की । ताप फलित हुआ और माता जी ने मैना रानी को दर्शन दिए और वर मांगने को कहा ।

मैना जी ने कहा की हे मातेश्वरी, यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं तो मुझे वर दीजिये की मेरे सौ अत्योत्तम पुत्र हों, और स्वयं आप मेरी पुत्री के रूप में पधारें । माता ने वरदान दिया और अंतर्ध्यान हो गयीं । समयचक्र में मैना जी ने सौ बलवान पुत्रों को जन्म दिया । उमा महेश्वरी अपने पूर्ण अंश के साथ हिमालय के शरीर में प्रविष्ट हुईं , जिससे वे अद्वितीय आभा से संपन्न हो गए । फिर यथोचित समय पर गिरिराज हिमालय ने, शिवा के इस पूर्णांश को, अपनी प्रिया मैना जी के उदर में स्थापित किया ।जगदम्बा के गर्भ में होने से मैना अत्यंत तेजोमय हो उठीं और सभी देवताओं, ने विष्णु सहित उनकी स्तुति की । गर्भकाल पूर्ण होने पर जगदीश्वरी ने शिशु रूप में मैना जी के घर जन्म लिया । उनका शरीर नील श्याम कान्तियुक्त था । हिमवान जी ने अपनी पुत्री का नामकरण किया, और उन्हें काली इत्यादि सुन्दर नामों से बुलाया गया । सुशीलता के कारण परिवारजन उन्हें "पार्वती" भी बुलाते थे । माँ ने तप को रोकते हुए "उमा" कहा - जिससे उनका नाम उमा भी हुआ ।

दैवीय प्रेरणा से नारद हिमालय जी के घर आये और पुत्री का हाथ देख कर बोले की इनका विवाह ऐसे वर से होगा जो योगी, नंग-धडंग, निर्गुण, निष्काम, मात-पिता रहित , निस्पृह और अमंगल वेशधारी होगा । यह सुन कर भवानी मन ही मन प्रसन्न हुईं, किन्तु माता पिता चिंतित हो गए । उनके उपाय पूछने पर नारद ने कहा कि ब्रह्म लेख झूठा तो हो नहीं सकता, किन्तु अशुभ को शुभ करने का एक उपाय है , कि आपकी पुत्री का ब्याह महेश्वर के साथ हो - क्योंकि उनमे ये सब गुण अवगुण नहीं, बल्कि भव्यता के रूप में वास करते हैं । हिमालय ने कहा कि वे तो निर्मोही और तपरत हैं, वे कैसे मेरी कन्या से विवाह करेंगे, तब नारद ने भवानी को शिव आराधना करने की सलाह दी , और कहा की तुम्हारी पुत्री आदिशक्ति है । शिव इनके अतिरिक्त किसी से विवाह न करेंगे । इनसे संगम होकर ही वे अर्धनारीश्वर कहलायेंगे ।

जब उमा 8 वर्ष की आयु को पहुंची तब शिव को उनके अवतरण के विषय में समाचार आया, और वे अति प्रसन्न हुए, (वे जानते तो पहले ही थे) और लौकिक रीति निभाते हेतु अपने पार्षद गणों सहित गंगावतरण तीर्थ पर जा कर समाधिस्थ हो रहे ।

पुत्री को लेकर पर्वतराज वहां पहुंचे और उन्हें नमन कर के अपनी पुत्री को आगे कर के भगवान् से बोले, हे प्रभु , आप हमारे यहाँ उपस्थित हुए, यह आपकी हम पर असीम कृपा है । हम अपनी कन्या को आपकी सेवा में समर्पित कर रहे हैं, यह सखियों सहित यहीं रहेगी और आपकी सेवा करेगी । कृपया आज्ञा दें ।

महाप्रभु बोले, हे हिमवान शैलराज, आप हमारे दर्शन कर सकते हैं । किन्तु अपनी पुत्री को घर ही में छोड़ आइये , कि हम तो तपस्वी हैं, हमें इससे क्या सेवा लेनी है ? वेद पारंगत विद्वान् ऐसी अत्यंत सुन्दर, तन्वंगी,चंद्रमुखी और शुभ लक्षना युवास्त्री को मायारूपिणी कहते हैं । हे गिरिश्रेष्ठ, मैं योगी हूँ, और माया से सदा दूर रहता हूँ  ।इस पर हिमवान अत्यंत उदास हो उठे ।

अब पार्वती बोलीं, हे आप योगी और ज्ञान विशारद हैं, फिर भी हमारे पिता से ऐसी बात कही ? सभी कर्मो को करने की शक्ति, सर्व प्राकट्य प्रकृति (nature ) ही है । प्रकृति से ही सृष्टि , पालन, और संहार होता है ( जो ब्रह्मा, विष्णु और महादेव के अधीनस्थ लोक कर्म हैं )। प्रकृति बिना आप लिंग रूप महेश्वर कैसे हो सकते हैं ? आप प्राणीमात्र के वन्दनीय और चिंतनीय हैं, किन्तु आपके मूल में आपकी प्रकृति ही है ।

महेश जी हंस पड़े और बोले ,  मैं तप द्वारा प्रकृति का नाश करता हूँ और तत्वरूप प्रकृति रहित शम्भू रूप में स्थित और विद्यमान रहता हूँ । सत्पुरुष कभी प्रकृति के अधीन नहीं होते । 

माता महाकाली ने कहा, हे प्रभु । अभी जो आपने कहा, वह भी "वाणी" से कहा, और वाणी प्रकृति प्रदत्त है । तब आप प्रकृति से परे कैसे रहे ? जो आप प्रकृति से परे हैं, तो न आप को बोलना चाहिए, न कर्म करना, कि कर्म का किया जाना भी प्रकृति (nature ) है । जो आप प्रकृति से परे हैं, तो हिमालय पर तपस्या क्यों और  कैसे? प्राणियों की इन्द्रियों से सम्बंधित हर वास्तु प्रकृतिजन्य ही है । अधिक कहने से क्या प्रयोजन ? मैं प्रकृति हूँ, और आप पुरुष हैं । आप निराकार निर्गुण हैं और मेरे अनुग्रह से ही आप साकार सगुण होते हैं । आप इन्द्रियों को जीत कर जितेन्द्रिय कहलाते हैं, किन्तु इन्द्रियां मुझसे हैं । प्रकृति अधीन ही आप सब लीलाएं करते हैं । यदि आप प्रकृति से परे हैं, तो मेरे यहाँ रहने से आपको भय कैसा ?

इससे आगे शंकर जी तर्क न कर सके । उन्होंने हिमवान को घर जाने की अनुमति दे दी , और बोले कि हे गिरिजे, यदि तुम ऐसा कहती हो, तो प्रतिदिन मेरी शास्त्र सम्मत विधि से पूजा करो । हिमवान प्रतिदिन वहां आते और पार्वती शंकर जी की विधिसम्मत रूप से आराधना पूजा करतीं ।

इसी बीच ब्रह्मा जी की आज्ञा से इंद्र ने कामदेव को (दक्ष की पुत्री रति कामदेव की पत्नी हैं) शिव के पास भेजा, किन्तु जब कामदेव के वाण से शिव का ध्यान टूटा तो उनकी क्रोधमयी तीसरी दृष्टि से कामदेव पल में भस्म हो गए । रति ने शिव जी की बड़ी स्तुति की और कहा कि मेरे पति यहाँ अपने किसी स्वार्थ वश नहीं आये थे । वे तो देवताओं के कल्याण हेतु आपके और पार्वती जी के ब्याह के लिए अपना धर्म पूर्ण करने आये थे  ।तब शिव जी ने कहा कि भले ही मंतव्य शुभ हो, किन्तु कर्म तो अशुद्ध था, और मन भी उस समय अपने "काम्वेग के बाण" की शक्ति पर गर्वित था । इसलिए कामदेव कोयाह दैहिक क्षति हुई । लेकिन शुभ लक्ष्य होने से उन्होंने बड़ा सौभाग्य भी अर्जित किया है कि वे साक्षात श्री कृष्ण को अपने पिता के रूप में प्राप्त करेंगे । रति की प्रार्थना और निवेदन पर शिव जी ने वचन दिया की अब से कामदेव अनंग रहेंगे, और कृष्णावतार के समय कृष्ण और रुक्मिणी के पुत्र प्रद्युम्न के रूप में फिर से शरीर प्राप्त करेंगे ।

जारी ...

शुक्रवार, 19 अक्तूबर 2012

देवी कथाएँ 3


ब्रह्माण्डों  के होने से पूर्व , और ब्रह्माण्डों की समाप्तियों के बाद , जो दैवी शक्ति है (या रहती है) , वैष्णव इसे नारायण / नारायणी या राधकृष्ण का नाम देते हैं, तो शैव इन्हें सदाशिव और आदिशक्ति । ये सत चित और  आनंद हैं,  अव्यक्त, अचिन्त्य, अविकार्य हैं ।

जब शिव और शिवा के मन में यह इच्छा आई कि  सञ्चालन को एक और पुरुष हो, तो एक सत्त्वगुणी पुरुष का प्रादुर्भाव हुआ, जो व्यापक होने से "विष्णु" कहलाये ।वे तपस्या में विलीन हो गए, और उनके शरीर से अनेक जलधाराएं (जल = नीर) फूटीं और आकाश जलमय हो गया । विष्णु ने (स्वयं) नीर में स्वयं के शेष (भाग) पर शयन किया , जिससे उनका नाम शेषशायी या नारायण भी हुआ । उनसे ही सभी तत्त्व,गुण , त्रिविध अहंकार तन्मात्राएँ,  पञ्च भूत, ज्ञानेन्द्रियाँ और कर्मेन्द्रियाँ प्रकटीं ।

फिर शेषशायी नारायण की नाभि से कमल उगा, जिसपर ब्रह्मा का प्राकट्य हुआ ।ब्रह्मा के तप पर चतुर्भुज विष्णु प्रकटे, जिन्होंने उन्हें ज्ञान दिया । बाद में किसी तर्क के समाधान के लिए उन दोनों के बीच महान ज्योतिर्लिंग प्रकट हुए, जिन के आदि अंत का पता वे दोनों न लगा सके । दोनों की प्रार्थना पर ज्योतिर्लिंग से उमाशिव प्रकटे । ब्रह्मा को सृष्टि करने और विष्णु को सृष्टि पालने का कर्म मिला ।

ब्रह्मा ने अंजुली भर कर जल उछाला जो अंडे की आकृति में फ़ैल गया और ब्रह्माण्ड उत्पन्न हुआ, किन्तु चेतन न हुआ । फिर श्रीविष्णु ने उस अंड में अनंत रूप में प्रवेश किया जिस से वह चेतन हुआ । किसी बात पर क्रुद्ध होकर रोते हुए ब्रह्मा के माथे से रूद्र प्रकट हुए ।

ब्रह्मा के शरीर से (दायें अंगूठे से) दक्ष प्रजापति प्रकट हुए, जिनकी संगिनी हुईं प्रसूति 

ब्रह्मा के कहने पर (रूद्र की अर्धांगिनी बनने के लिए)  दक्ष ने सदाशिव की चिर संगिनी आदिशक्ति, की 3 हज़ार  वर्षों तक, तपस्या और आराधना की और जब माँ प्रकट हुईं तो उनसे कहा "हे जगन्माते, हे जगदम्बिके । सदाशिव ने ब्रह्मा पुत्र के रूप में (रूद्र) अवतार लिए है  । उनकी संगिनी होने के लिए आप मेरे घर पुत्री रूप में पधारें" । माँ ने उन्हें वरदान दिया की मैं तुम्हारी पुत्री तो बनूंगी, किन्तु यदि तुमने कभी भी मुझे अप्रसन्न किया, तो मैं तुरंत तुम्हारी दी हुई देह त्याग दूँगी । दक्ष ने यह शर्त स्वीकार की , और समय के साथ उनके घर में माँ ने सती के रूप में जन्म लिया ।

पति को पाने के लिए ताप करने के बाद सती का ब्याह शिव से हुआ , और एक बार शिव जी के साथ विहार करते सती ने श्री राम को सीता की खोज में पागलों की तरह रोते बिलखते देखा । सती माँ के मन में आया की मेरे पति जिन राम को ईश्वर मानते हैं, वे स्त्री के लिए ऐसे मोहित हैं ? और उन्होंने समयक्रम में श्री राम की परीक्षा लेने के लिए सीता का रूप लिया और उनके सामने गयीं । श्री राम उन्हें तुरंत पहचान गए और पूछा कि हे माते, आप यहाँ वन में अकेली क्या कर रही हैं , शम्भू कहाँ हैं । इसपर सती ने राम की सत्यता जान ली किन्तु दिव्य दृष्टि से यह सब जान लेने पर शिव शम्भू अपने आराध्य की पत्नी का रूप ले चुकी सती को पत्नी रूप में न देख पाए । सती मन में यह जान गयीं और उदास रहने लगीं ।

समयक्रम में  दक्ष ने एक यज्ञ आयोजित किया, जिसमे उन्होंने शिव को नहीं बुलाया । बिना बुलाये भी सती वहां जाना चाहती थीं और शिव जी के समझाने के बाद भी वे गयीं । वहां उन्हें बड़ा अपमानित महसूस हुआ, पिता और बहनों ने उन्हें मान न दिया,  और सिर्फ माँ ने ही उन्हें प्रेम और सम्मान दिया । यज्ञ में सब देवताओं के भाग थे, किन्तु शिव जी का न था, जिस पर सती माँ ने आपत्ति की और दक्ष ने शिव जी के लिए बड़े अपशब्द कहे । इससे कुपित होकर सती वहीं योगाग्नि में दक्ष से जन्मी अपनी देह को त्याग दिया ।

यह जान लेने पर शिव जी ने वीरभद्र को वहां भेजा, जिन्होंने यज्ञ ध्वंस कर दिया और दक्ष की गर्दन काट दी । शिव जी सती के जले हुए शरीर को हाथों में उठाये यहाँ वहां भटकने लगे  ।उनके मोह को तोड़ने के लिए विष्णु जी ने सुदर्शन चक्र से सती माँ के शरीर के टुकड़े कर दिए , जो धरती पर अलग अलग जगह गिरे ।

जिस जगह माँ की "जीभ" गिरी, वहां से अग्नि की जिव्हायें हमेशा निकलती रहती हैं, और वह स्थान ज्वालादेवी के नाम से प्रसिद्द है । मुग़ल सम्राट अकबर ने इस आग को बुझाने के लिए कई प्रयास किये, वहां मोटे मोटे लोहे ले ढक्कन भी ठोके गए, जिन सब को पिघला कर ज्वाला फिर ऊपर आ गयी । बाद में अकबर ने समझा, और प्रायश्चित्त के रूप में वहां सोने का छत्र चढ़ाया ।

किन्तु माना जाता है की माँ ने यह स्वीकार नहीं किया, क्योंकि वह एक अनजानी धातु में परिवर्तित हो गया ।

जय माता दी ।

गुरुवार, 18 अक्तूबर 2012

देवी की कथाएँ 2


नवरात्र पर्व के तीसरे दिन माँ को मेरा प्रणाम पहुंचे ।

आज वैष्णो देवी धाम से जुडी दो कथाएँ कहती हूँ । फिर एक बार दोहरा दूं, कि कथा मेरी नहीं है । जो जानती हूँ, बड़ों से सुना है - बस दोहरा भर रही हूँ ।

1.
कहते हैं कि त्रेता युग में दुष्ट राक्षसों से परेशान देवताओं की रक्षा के लिए एक दैवीय कन्या का अवतरण हुआ, जो "त्रिकुटा" कहलाई । उस कन्या ने वैष्णव धर्म का प्रसार किया , और कालान्तर में "वैष्णो" कहलाई । बाद में पिता की आज्ञा लेकर वे तपस्या को चली गयीं, और श्री विष्णु जी की आराधना करने लगीं । 

तब रामावतार का समय था । श्री राम अपनी पत्नी श्रीसीता जी की खोज में वहां पहुंचे, और उन्होंने त्रिकुटा से अपना नाम और तपस्या का उद्देश्य पूछा । तब उन्होंने श्री राम को बताया कि वे उन्हें मन से पति रूप में स्वीकार कर चुकी हैं , और उन्हें प्राप्त करने के लिए तपस्या कर रही हैं । श्री राम ने उस अवतार में एक पत्नीव्रत धारण किया था । फिर भी, उनके ताप को निरुद्देश्य न जाने देने के भाव से, श्री राम ने उन्हें कहा कि वे बदले रूप में उनके सम्मुख आयंगे और यदि वे उन्हें पहचान सकीं, तो उन्हें स्वीकार कर लेंगे । 

बाद में श्रीलंका से लौटते हुए श्री राम त्रिकुटा के आगे एक वृद्ध सन्यासी के रूप में आये, जब वे उन्हें न पहचान सकीं  । तब अपने असल रूप में आकर श्री राम ने उन्हें आशीर्वाद दिया कि वे कलियुग में कल्कि अवतार के रूप में प्रकट होंगे, और तब उनसे विवाह करेंगे । तब तक वे हिमालय के त्रिकूट पर्वत पर रहें , और भक्त जनों की मनोकामनाएं पूर्ण करें ।

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2.
श्रीधर नामक एक ब्राह्मण, श्री वैष्णो देवी के बहुत बड़े भक्त थे । वह कटरा के पास हंसाली नामक गाँव में रहते थे । एक बार माँ ने उन्हें एक सुन्दर कन्या के रूप में दर्शन दिए, और "भंडारा" करवाने के लिए कहा । ( भंडारा का अर्थ है भक्तों को भोजन करवाना) । श्रीधर धनवान नहीं थे, न ही उनमे भोज करवाने की आर्थिक क्षमता थी । किन्तु माँ के आदेश को सर माथे पर लेकर उन्होंने गाँव के सभी वासियों को आमंत्रित किया । 

उस समय वहां भैरवनाथ नामक एक तांत्रिक वास करते थे । श्रीधर जी ने उन्हें भी बुलाया, और उन्होंने चेतावनी दी कि उन्हें संतुष्ट न कर सकने का परिणाम बुरा होगा । श्रीधर के पास धन तो था नहीं , वे भोज को लेकर बड़े चिंतित थे । तब माँ उनके सामने फिर से प्रकट हुईं, और कहा कि वे चिंतित न हों, वे स्वयं सारा प्रबंध करेंगी । और ऐसा ही हुआ भी । श्रीधर जी की छोटी सी झोपडी में माँ ने 360 व्यक्तियों को बैठाया भी, और भरपेट भोजन भी परोसा । 

भोज में भैरवनाथ ने कहा कि  वे तो तांत्रिक हैं, और निरामिष भोजन उन्हें स्वीकार्य नही। उन्हें तो मांस आदि ही चाहिए। किन्तु कन्या ने इनकार करते हुए कहा कि वैष्णव भोज में सिर्फ सात्विक भोजन ही परोसा जाएगा, तामसिक भोजन नहीं । इस पर क्रोधित होकर तांत्रिक ने अपनी चेतावनी याद दिलाते हुए श्रीधर को डराया , और उसकी रक्षक कन्या पर हमला किया ।

ध्यान देने की बात है कि कई सम्प्रदायों में देवी के आगे पशुबलि का प्रचालन है - जिसका हम पुरजोर विरोध करते हैं । यहाँ माँ का भैरवनाथ को मांसाहार के लिए इनकार उसी विरोध का प्रामाणीकरण है मेरी नज़र में । भैरंव्नाथ तांत्रिक पद्धति के अनुगामी थे और देवी के आगे पशु बली के समर्थन की बात है यह मांसाहार की मांग ।

देवी जानती थीं कि भैरवनाथ एक भक्त है, और वे उसका वध नहीं करना थीं । वे वहां से त्रिकूट पर्वत की तरफ चली गयीं । भैरंव उनका पीछा करने लगा । 

** माँ ने उसकी तरफ एक बाण चलाया, जो धरती में धंस गया और वहां से "बाणगंगा" प्रकट हुई । कहते हैं कि बाणगंगा में स्नान करने वाले भक्त के सारे पाप धुल जाते हैं । नदी के किनारे पर माँ की "चरणपादुका" के निशान हैं ।

** फिर माँ यहाँ से आगे बढीं, और अर्धक्वारी के पास "गर्भ गुफा" में छुप गयीं । यहाँ वे नौ महीने तक रहीं । कहा जाता है कि इस बीच रामभक्त श्री बजरंगबली गुफा के बाहर पहरा देते रहे । 

[** इससे कुछ ऊपर और बढ़ने पर "सांझी छत" आता है , और आखिर में माँ की टेकरी आती है । ]

** यहाँ से निकल कर माँ और ऊपर को बढीं, और भैरंव के हमले करते रहने से उन्हें महा काली का रूप लेना पडा, और माँ ने भैरंव का वध कर दिया । 

सर कट जाने पर कटे हुए सर ने माँ से कहा कि वे जानते थे की माँ कौन हैं, और उन्होंने यह सब इसलिए किया , जिससे माँ के हाथों से मृत्यु होने पर उन्हें मोक्ष मिल जाए । किन्तु उन्होंने दुःख प्रकट किया कि माँ के भक्त उन्हें हमेशा इस शैतानी रूप के ही लिए याद करेंगे । 

इस पर माँ ने उन्हें वचन दिया , कि जो भक्त मेरे दर्शन को आयेंगे, उनके दर्शन तभी सम्पूर्ण माने जायंगे जब वे भैरंवनाथ के स्थान पर भी जाकर दर्शन करेंगे । आज भी भक्त वैष्णो माँ के दर्शनों के बाद भैरंवानाथ के दर्शनों को जाते हैं । 

फिर माँ पिंडियों के रूप में परिवर्तित होकर तपस्यारत हो गयीं । इधर माँ के इंतज़ार में अधीर श्रीधन ने स्वप्न में देखे हुए रास्ते पर उन्हें खोजना शुरू किया, और आखिर पिंडियों तक पहुँच गए । तब से श्रीधर पंडित और उनके वंशज यहाँ पूजा आराधना करते हैं ।
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आभार । जय माता दी ।

बुधवार, 17 अक्तूबर 2012

नवरात्र व्रत कथा : देवी कथाएँ 1


यह कहानी मेरी नहीं है ।

यह नवरात्र व्रत कथा व्रत करने वाले लोग आपस में एक दूसरे से कहते हैं । कहते हैं कि यह कथा बृहस्पति जी के पूछने पर ब्रह्मा जी ने उन्हें सुनाई थी

पीठत नाम के गाँव में अनाथ नामक एक ब्राह्मण रहता था । अवह भगवती दुर्गा का भक्त था और रोज़ उनकी पूजा मिया करता था । उस ब्राह्मण की सुमति नामक एक बेटी थी , जो रोज़ पिता की पूजा में शामिल होती थी।

एक दिन अपनी सहेलियों से खेलने लगी और समय का भान न होने से पूजा में नहीं आई । इस बात पर पिता अत्यधिक क्रुद्ध हुए, और उसे कहा, की हे दुष्ट पुत्री, तूने आज भगवती का पूजन नहीं किया, जिसके लिए मैं किसी कुष्ठी दरिद्र से तेरा ब्याह करूंगा ।

सुमति को बहुत दुःख हुआ, और उसने कहा, हे पिताजी, आपकी कन्या होने से मैं सब तरह से आपके अधीन हूँ । आप जिससे चाहें मेरा ब्याह कर सकते हैं, किन्तु होगा वही जो मेरे भाग्य में लिखा होगा । यह सुन कर पिता का क्रोध और बढ़ गया , जैसे आग में सूखे तिनके पड रहे हों  हो । उसने बेटी का ब्याह एक दरिद्र कुष्ठ रोगी से कर दिया ( यह कथा में है ) ।

वह रात उन दोनों ने जंगल में बड़े दुःख तकलीफ से गुजारी । उसकी ऐसी दशा देख भगवती पूर्व कर्म प्रताप से प्रकट हुईं , और उस से कहा, कि हे दीन ब्राह्मणी, मैं तुझ पर प्रसन्न हूँ, जो माँगना हो मांग ले । सुमति के पूछने पर देवी ने बताया की मैं ही आदि शक्ति माँ हूँ, ब्रह्मा, विद्या और सरस्वती हूँ । तुझ पर मैं पूर्व जन्म के पुण्य से प्रसन्न हूँ ।

पिछले जन्म में तू निषाद की स्त्री थी, और अति पतिव्रता थी । एक दिन तेरे पति निषाद ने चोरी की , और सिपाहियों ने तुम दोनों को जेलखाने में बंद कर दिया । वहां उन्होंने तुम दोनों को खाने को भी न दिया । तब नवरात्र  के दिन थे , और तुम दोनों का नौ दिन का व्रत हो गया। उस व्रत के प्रभाव से मैं तुम्हे मनोवांछित वास्तु दे रही हूँ, मांगो । तब सुमति ने अपने पति को स्वस्थ्य करने की कामना की । देवी ने उसे एक दिन के व्रत के प्रभाव को अर्पित करने को कहा, और सुमति ने "ठीक है" कहा । तुरंत ही उसका पति निरोगी हो गया और उन दोनों ने देवी की अत्यधिक स्तुति की । इसके पश्चात "उदालय"नामक पुत्र शीघ्र प्राप्त होने का आशीष देकर और व्रत विधि बता कर देवी अंतर्ध्यान हो गयीं ।