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शनिवार, 9 जनवरी 2016

रामायण 22 - बारात का अवध में आगमन , उत्सव

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शुभ विवाह का - मधुमय विवरण ले ,
घुड़ सवार पहुंचे हैं - अवध प्रांगण में ।
मिथिला की बातें - बढ़ बढ़ सुना रहे ,
पी पी करणामृत - जन बहु हर्षा रहे ।।

जितने मुख हैं - उतनी ही फिर बातें ,
सुन कह नर नारी - विभोर हुए जाते ।
पुलकित जनमानस , आसीसें बहतीं ,
जीवित तो सजीव , अजीव वस्तुएं जीतीं।
ठिठके वृक्ष सुनते , झूमती पत्तियाँ कहतीं ,
तालों लहरों पर , उर्मियाँ गातीं लहकतीं  ।।

मार्ग ठहर गए - लोग कह रहे ,
सभी सुन रहे, सभी गुन रहे ।
जनक जी का शिवधनु - जानो हो कैसा था ?
महाभारी कैलास - पर्वत के जैसा था !!!!

सुनो सुनो ओ - प्रिय मोरे भाई ,
राम ने कैसे - महाधनु था उठाई ।
बड़े बड़े अभिमानी - राजे थे आये ,
निज मुख अपनी - महिमा गाये ।
शिवधनु उठाने बहु - भुज बल लगाए,
बढ़ चढ़ बाहुबल पर - गाल बजाए ।।

और जाते जब वे - धनु को उठाने ,
दृढ़ रहता धनु जैसे - उनको मुंह चिढाने ।
मुनिवर के आदेश से - फिर कुंवर राम ने
पल में उसे तोडा - ज्यों खिलौना सामने ।

धनु भंग पर जानो - गर्जना यूँ हुई थी,
लगा जैसे उस पल में - परलय हुई थी ।
बहूरानी की माला जब - कुंवर ग्रीवा में पड़ी  ,
देवों ने तब नभ से तब - पुष्पवर्षा की बड़ी ।।

फिर आये क्रुद्ध गरजते - परशुराम जी ,
भीषण गर्जन ने सब की - सांसें थाम दीं ।
बेसुध हो गए थे - सब राजे महाराजे ,
थमीं साँसे सब की - शिव शिष्य के आगे ।
तनिक विचलित नहीं हुए  , "हमारे" राजकुंवर ,
परनाम किया कौशलनंदन ने - विनम्र बहु होकर ।।

प्रिय राम की नम्रता से - अहो वे ना पसीजे,
बड़े बोल रहे बोल ते - सुन लखन बड़े खीजे ।
लखन बोले तब उन - जमदाग्नि राम से ,
जीर्ण धनु है टूटा - भैया के स्पर्श परिणाम से ।।

क्रोधित मुनि को लखन ने - बड़ा तब छेड़ा ,
और राम ने विनम्र हो , समझाया बहुतेरा ।
क्रोध से उन्मत्त - मुनि कोई बात न मानें ,
दूजा धनु दिया उन्होंने - राम को आजमाने ।।

सुनो भाई प्यारे मोरे - अहो सुनो भौजाई ,
कुंवर ने कैसे उनको - निज शक्ति दिखाई ।
पल में धनु को धारा - प्रत्यंचा चढ़ाई ,
कब धारा शर धनु पर - दिया भी न दिखाई ।।
पहचाने जमदाग्नि सुत - रघुवर को तब ,
किन्तु शर धनु पर - चढ़ चुका राम का अब ।।

राम ने पूछा - जमदाग्नि पुत्र से
आपकी कौनसी - शक्ति हम हर लें ?
तब परशुराम ने - कहा विनम्र बहु होकर
आवागमन शक्ति - ना लें मोरी रघुवर ।
अर्जित सारे - लोक आप हर लें ,
और मुझे धाम को - लौटन की आज्ञा दें ।

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हर मुख पर है - विवाह की बस बातें ,
प्रेमाकुल अवध जन - नगर द्वार को ताकें ।
कब आयेंगे - चहुँ वधुओं संग राजन ?
कब झूमेगा - अवध का यह आँगन ?

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अब ढोल नगाड़े , लगे देत सुनाई ।,
वधुओं संग बारात , नगर निकट है आई ।
शुभ लहरें तरंगित , शुभागमन की दिशा से ।
उषा किरणें सुहानी , झाँक रही ज्यों निशा से ।

आ ही पहुंची - आ ही पहुंची -
आ पहुंची बस - बारात बहुओं को लेकर ,
गुबार धूल का - आभासता क्षितिज पर ।

विवाह मंडली हौले हौले - बढती आती ,
जन मन की व्यग्रता - बढती ही जाती ।

आ पहुंचे हैं - लो आ पहुंचे 
राजनंदिनियों को ले
- देखो राजाजी 
राजमार्ग पर अब 
सिय चरणरज है लागी 
अयोध्या के जन हम
 - हैं कितने बडभागी 
क्या भाग विधाता
- से लाये लिख्वाहीं । 

बरात पहुंची - राजप्रासाद आवास में , 
प्रवेश बहुओं का - होवे रनिवास में ।
नाम लेवन की प्रथा - थाली कंकरी
जाने कितनी रस्मे ,
लजाती सकुचाती वधुएँ
 - पहुँचीं आवास में ।।

अयोध्या में चहुँ दिस
- अमृत बह रहा 
पी पी जनमानस
आनंदित रह रहा। 
दशरथ जी के मन 
ख़ुशी ना समाये 
दैवीय सुख उनका 
समेटा ना जाए ।

अति उच्छाह है, कितना उल्लास है ,
स्वार्गिक अवध में - देवों का वास है ।
सुंदरी, सुकुमारी, सौभाग्यवतियाँ आने से ,
सब और छिटकता - वैभव विलास है ।।

उत्सव निरंतर - मने घर-द्वार में ,
नृप चहुँ पुत्रों संग - शोभें राज दरबार में ।
और राज गृह में भी - उमंग लहरें तरंगित ,
शोभा अवध की - विस्तारित हैं असीमित ।।

जारी ...

बालकाण्ड यहाँ समाप्त होता है । अगले भाग से अयोध्या काण्ड प्रारम्भ होगा ।
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13 टिप्‍पणियां:

  1. आ ही पहुंची - आ ही पहुंची -
    आ पहुंची बस - बारात वधुओं को लेकर ।
    दूर गुबार धूल का - आभास रहा है क्षितिज पर ,
    हौले हौले विवाह मंडली - बढती आती ,
    जनमान की व्यग्रता तो - बढती ही जाती ।

    वाह ! कितना मनभावन वर्णन है राम सीता के ब्याह का..पढ़ना शुरू किया तो पढ़ती ही चली गयी..बधाई इस अनुपम प्रस्तुति के लिए..

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  2. आपका कार्य प्रेरणादायक है, मंगल कामनाएं आपके लिए !

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  3. हर बारीक भावों भावों और दृश्य को आपने अपनी अमृतधार लेखनी से मानो साकार सा कर दिया -साधुवाद!

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  4. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति आज शुक्रवार के चर्चा मंच पर ।।

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  5. आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा शनिवार (9-2-2013) के चर्चा मंच पर भी है ।
    सूचनार्थ!

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  6. बहुत सुन्दर वहा वहा क्या बात है अद्भुत, सार्थक प्रस्तुति
    मेरी नई रचना
    खुशबू
    प्रेमविरह

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  7. अति सूंदर।
    और अच्छा होता यदि आप चौपाईयोँ को लिखकर उनकी व्याख्या हिंदी में डिटेल में करते।

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