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शनिवार, 31 मई 2014

श्रीमद भागवतम सुखसागर -२ : महाभारत युद्ध का अंत, अश्वत्थामा, पांडवों का वनगमन

भाग १ 

महाभारत युद्ध अपने अंतिम क्षणों की तरफ अग्रसर था।  दुर्योधन भीम के अनुचित आघातों से घायल मृत्यु के इंतज़ार मे लाचार पड़ा हुए थ।  अश्वत्थामा के लिए  यह सब असह्य था -  उसे अपने पिता की अन्यायपूर्ण हत्या और दुर्योधन की पीड़ा सहन नहीं हो रही थी।  सो रात के समय वह पांडवों के नामोंनिशान को समाप्त करने उनके शिविर आया , लेकिन वह नहीं जानता था कि वहाँ पाँडव नहीं , बल्कि द्रौपदीपुत्र सो रहे हैं।

सोते हुए धृष्टद्युम्न को मारने के बाद उसने  पांडवों को (असलियत मे द्रौपदी के बेटों को) मार दिया और वापस आकर वन को चला गया।  इधर इस अनपेक्षित हत्याकांङ  से पीड़ित द्रौपदी को हत्यारे क सर लाने का वचन दे कर पाँडव उसकी खोज मे पीछे आये।

वेदव्यास जी के निकट खड़ा अश्वत्थामा अपने प्रायश्चित और संन्यास का मार्ग पूछ रहा था कि पांडव वहां पहुंचे।  उन्हें मृत समझ छोड़ आया अश्वत्थामा उन्हें देख क्रोधित हुआ और उन्हें समाप्त करने के लिए ब्रह्मास्त्र का संधान किया।  यह देख कृष्ण ने अर्जुन को भी आज्ञा दी कि वह भी यही करे - और अर्जुन ने भी यही किया।

यह देख वेदव्यास जी को क्षोभ हुआ और उन्होंने कहा कि तुम दोनों मूर्ख हो - इस तरह दुनिया समाप्त हो जाएगी - इन्हे वापस लो।  कृष्ण और वेदव्यास की आज्ञा से अर्जुन ने तो अपना ब्रह्मास्त्र लौटा लिया किन्तु अश्वत्थामा को यह करना नहीं आता था - सो उसने अपने क्रोध के कारण अपने अस्त्र को पांडवों की अगली संतति के अकेले वारिस - उत्तरा की कोख में पल रहे अभिमन्यु के अंश - की ओर प्रेषित किया।  ब्रह्मास्त्र की अग्नि से उत्तरा तड़प उठी और तभी कृष्ण ने लघु (अंगूठे सा) रूप धरा और उत्तरा की कोख में प्रवेश कर अभिमन्यु पुत्र की रक्षा की।  कोख में पल रहे बालक ने अपने पास उस दिव्य पुरुष को देखा जो अग्निकुंज रुपी ब्रह्मास्त्र से उसकी रक्षा कर रहे थे।

कोख में ही बालक की परम परीक्षा हो जाने से बालक "परीक्षित" हुए ; और उस दिव्य पुरुष को वे आजीवन न भूल सके और उनकी प्रतीक्षा में रहे - इसलिए वे "प्रतीक्षित" भी कहलाये।

इधर अश्वत्थामा के नीच कर्म के परिणाम स्वरुप कृष्ण ने उसके माथे पर चमकती तेज मणि ले ली और उसे चिरकाल तक इसी अवस्था में मुक्ति के लिए इंतज़ार में भटकने के लिए त्याग दिया।

बाद में कृष्ण और पांडव राजभवन पहुंचे।  समयक्रम में बड़ों (धृतराष्ट्र, विदुर, गांधारी (कुंती जी के बारे में जानकारी पूर्ण नहीं है)) ने सन्यास लिया

और कृष्ण द्वारका लौटे। युधिष्ठिर महाभारत युद्ध की भयावहता के लिए अपने को जिम्मेदार मानते थे और अचल साम्राज्य के स्वामी हो कर भी सुख से न रह पाते थे।

इधर व्यासदेव और अन्य जनों ने युधिष्ठिर को अश्वमेध यज्ञ की सलाह दी।  अश्वमेध के लिए कृष्ण भी आये।  उनके साथ अर्जुन भी द्वारका गए।  अर्जुन द्वारका से लौटे तो तेजहीन हो कर।  उन्होंने बताया कि श्रीकृष्ण अपने धाम लौट चुके हैं, और द्वारिका जलमग्न हो चुकी है। इस पर युधिष्ठिर आदि अति दुखित हुए।  कुंती ने प्राण त्याग दिए और अपने आराध्य कृष्ण के धाम चली गयीं। इधर वन में रह रहे विदुर जी को भी यह घटनाएं पता चलीं।  कृष्ण के बालकाल के संगी उद्धव जी से उन्होंने भागवद कथा जाननी चाही।  तब उद्धव जी ने उन्हें मैत्रेय ऋषि के पास जा कर कथा सुनने की सलाह दी।

[
विदुर तीर्थयात्रा पर थे। पहले वे धृतराष्ट्र को नीतिगत सलाह देते थे जो धृतराष्ट्र अनसुनी करते रहते थे।  एक बार जब मंत्री के कर्त्तव्य अनुसार विदुर महाराज धृतराष्ट्र को युद्ध टालने के लिए समझा रहे थे - तब दुर्योधन ने अति क्रुद्ध होकर उन्हें अपमानित कर निकल जाने को कहा, और विदुर ने जब महाराज की तरफ देखा तो वे मौन रहे।  तब विदुर निर्लिप्त मन से अपने पद को त्याग कर तीर्थ करने चले गए थे।  

अपनी यात्रा के दौरान ही उन्हें युद्ध के हालात पता चलते रहे। बाद में उन्हें उद्धव जी से ज्ञात हुआ कि कैसे श्रीकृष्ण का पूर्ण यादव वंश , गांधारी के श्राप वश  और साम्ब एवं युवा यादवों के अपमान से मिले श्राप से आपस में ही लड़ कर समाप्त हो गए, और कैसे श्रीकृष्ण जी भी अपने धाम लौट गए ) युद्ध के बाद ही वे वापस आये और उन्होंने धृतराष्ट्र को समझाया कि अब आपको संन्यास ले लेना चाहिए क्योंकि आपने अपने राजकाल में हमेशा अपने अनुज पुत्रों के साथ अन्याय किया, और अब उन्हीकी कृपा पर जी रहे हैं।  युधिष्ठिर कर्तव्यशील हैं और आपको ससम्मान रखेंगे।  किन्तु आपको यह शोभा नहीं देता।  इसके बाद वे, धृतराष्ट्र और गांधारी वन को चले गए। ]

युधिष्ठिर राज्य काज परीक्षित को विधिपूर्वक सौंप कर हिमालय की तरफ चल पड़े, और उनके पीछे उनके चारों प्रिय भाई , और द्रौपदी भी , चल पड़े।

परीक्षित ने कई वर्षों तक धर्मपूर्वक शासन किया।

जारि…


life and commitments

यह पोस्ट सलिल वर्मा जी के फेसबुक स्टेटस पर एक कमेन्ट में लिखी थी । फेसबुक तो क्षणभंगुर है - सोचा यहाँ सहेज लूँ --


आप या मैं कहीं जाते नहीं।
एक एक एस्केलेटर पर है हर कोई - 
कई एस्केलेटर उलझे हुए गोलों में घूम रहे हैं । 

कभी किसीकी पटरी साथ हो जाए,
तो चंद घुमावों तक -
साथ आते - जाते - दिखते - मिलते,
 लगाव सा हो जाता है । 

बार बार मिलते देखते ,
कुछ सम्हाल कुछ साज ,
कुछ अपनापन कुछ नाराजगियाँ,
होती जातीं हैं । 

फिर कोई एस्केलेटर ,
इन उलझी पटरियों से -
आगे की राह पकड़ ,
अलग हो जाते हैं उनसे -
जो अभी उलझी पटरियों पर हैं । 

जिनसे बनी थीं नजदीकियाँ - 
वे याद करते हैं कुछ देर । 
अलग राह चल पड़े एस्केलेटर वाला -
पता नहीं किसे याद रखता है किसे नहीं? 


ज्यादा याद आती हो तो -
शायद फिर लौट आता हो -
इसी घूमती भूलभुलैया में? 
या निकल पड़ता हो आगे की राहों पर? 

कौन जाने 
किस किस के ,
किस किस से -
कितने कमिटमेंट -
अधूरे रहे -
कितने हुए पूरे? 

किसी अधूरे कमिटमेंट में -
पीछे छूटा कोई -
कितनी देर सिसकता रहा ?
या बेहद लगाव होने से -
अपनी पटरी बदल -
पीछे दौड़ा ?

सिर्फ यह जानने को -
कि आगे पटरियां -
अनंत तक नहीं मिलतीं? 

कौन जाने कितने कमिटमेंट ,
बनते टूटते रहे -
और रहेंगे । 
अनंत से अनंत तक । 
कितनी उलझी पटरियां -
कितने चक्रव्यूह भंवर ,
कितनी लम्बी सूनी राहें?

शिक्षा स्नातक ग्रेजुएट की डिग्री और नरेंद्र मोदी जी की मानव संसाधन मंत्री स्मृति ईरानी

स्मृति जी पर जो विवाद हुआ - फेसबुक पर कई चर्चाएँ हुईं । अपने versions यहाँ सहेज रही हूँ -

1. Most will choose to ignore this post. I am not asking you to comment either - just read it through with an open mind and think it over with an open mind. And let us leave smriti, modi, and congress (and their leaders' degrees) out of this. 

Of our population of about 100 crores (2001 census) meaning approximately 50 crore women, only about 12 million women are educated to graduate level. ONLY such women (12 millions = 1.2 crore out of about 100 crore people !!! ) can be ministers? Right?

So much for equality provided by the constitution irrespective of sex 

So much for the advocates of equality saying that despite her being "eligible" as per the CONSTITUTION, she should not get the post. And SHE here does NOT mean smriti irani - it means 48.8 crore women 

And don't say i am saying this because i am a woman - because i happen to be in the favored tinyyyyyyu bracket. Just think it over.

Also think why constitution writers did not give voting rights/ government forming rights only to higher education certified people. 






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2. 
When will our indian mentality learn to accept beautiful women as successful without throwing lot of mud disguised as concern about this and that? 


oh , she topped ?? - ohh the male teacher gave her more practical marks.oh , she got a promotion - ohhh she must have made the boss happy...

because, she can't have achieved anything on her own - because of course she has this and that limitations.... any man with similar qualifications would not be objected to - but how can SMRITI become the minister? 

i am really saddened. WHY do we have this mentality?

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3. अभी तक तो फेसबुक मित्र यह भी नहीं जानते कि मानव संसाधन मंत्रालय का सिर्फ एक हिस्सा है शिक्षा । सिर्फ शिक्षा मंत्रालय नहीं है वह । और यह किसी एक मित्र नहीं बल्कि कई कई वाल्स पर पढ़ रही हूँ की "शिक्षा मंत्रालय". सम्पूर्ण मानव संसाधन और "शिक्षा" में फर्क तक न जानने वाले एलिट पढ़े लिखे लोग भारत की 95% जनसंख्या (जो ग्रेजुएट नहीं है) से उनका संवैधानिक अधिकार छीन लेना चाहती है और चाहती है कि सिर्फ 5% एलिट पढ़ी लिखी जनसंख्या 95% पर मंत्री बन कर शासन करती रहे । और स्त्रियों में तो यह प्रतिशत और बुरा है 2% & 98%.

संविधान निर्माताओं ने सोच समझ कर ही मंत्री पद के साथ एजुकेशनल क्वालिफिकेशन लिंक नहीं की थी

जो भी इससे सहमत न हों वे संवैधानिक बदलाव की डिमांड लेकर पेटीशन शुरू कर सकते हैं । विपक्ष तो आपके साथ है ही (या होने की एक्टिंग तो कर ही रहा है) तो वह भी क्लियर हो ही जाएगा ।



4. 

5. 


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6. उच्च पढ़ाई की डिग्री सिर्फ और सिर्फ उस क्षेत्र में काबिलियत की परिभाषा है जिसमे काम करना हो । 
इंजीनियरिंग में डॉक्टरेट होना प्राथमिक स्कुल में पढ़ाने की काबिलियत नहीं देता । इकोनोमिक्स में पीएचडी कर के भी छठवी कक्षा में केमिस्ट्री पढ़ाने की काबिलियत नहीं आती ।

ऐसे ही मिनिस्टर बनने के लिए कोई "डिग्री" क्वालिफिकेशन नहीं होती, बल्कि प्रक्टिकल काम करने की रूचि और अभ्यास चाहिए । ग्रेजुएट होने न होने का किसी भी मिनिस्ट्री से कोई भी सम्बन्ध नहीं । मिनिस्टर या मंत्री बनने की न्यूनतम योग्यता है 
अ. भारतीय होना 
ब. लोकसभा या राज्य सभा का सदस्य होना (या ६ महीने में हो जाना)
स. तत्कालीन चुने गए प्रधानमन्त्री द्वारा चयनित होना। 

बस - इसके अलावा कुछ भी नहीं। अधिकाँश बहुत अच्छे और सक्सेसफुल राजनीतिज्ञ कोई बहुत डिग्रीधारी नहीं हैं । न ही इसका उलट है । दुनिया का सर्वश्रेष्ठ डांसर आवश्यक नहीं कि अच्छा पेंटर भी हो ।

हमारे देश में पढ़े लिखे लोगों को यह गलतफहमी हो गयी है कि कोई भी कार्यक्षेत्र हो, किसी भी क्षेत्र में योग्यता सिर्फ और सिर्फ "अकादमिक" डिग्रियां है । जबकि यह सच नहीं ।

इस दुनिया में सतरंगी प्रतिभाएँ हैं । हर प्रतिभा सिर्फ शैक्षणिक डिग्री की मोहताज नहीं । अधिकाँश डिग्रीधारी अच्छे राजनीतिज्ञ नहीं होते । साथ ही अधिकाँश अच्छे राजनीतिज्ञ आवश्यक नहीं कि डिग्रीधारी हों । आप डाटा चेक कर लीजिये चाहें तो ।

यदि आप गलत अफिदवित पर शिकायत करें/ करना चाहें, तो यह आपका नागरिक अधिकार है , यदि आपने उस उम्मीदवार को उस डिग्री के कारण वोट दिया हो ।

लेकिन सिर्फ इसलिए कि कोई व्यक्ति डिग्रीधारी नहीं तो उसकी काबिलियत और कार्य को पूर्णतः नकार देना और उस के संवैधानिक अधिकार पर हमले करना पूर्वग्रह के अतिरिक्त कुछ नहीं । यदि वे काम नहीं करें तो आपका पूर्ण अधिकार है आलोचना का । लेकिन सिर्फ डिग्रीधारी न होने से उन्हें काम करने देने से पहले ही नाकाबिल निकम्मा घोषित कर देना अनुचित है ।

लिटरेसी , एजुकेशन, और इंटेलिजेंस और काबिलियत सब की अलग अलग परिभाषाएं हैं मानव संसाधन मेनेजमेंट में । पढ़े लिखे डिग्री धारी लोग इतना तक नहीं समझ पा रहे की "hrd" का अर्थ "मानव संसाधन" है "शिक्षा" नहीं । न यह समझ पा रहे हैं कि मंत्री क्लास नहीं पढाता है, बल्कि योजनायें बनाता है । जो शिक्षा इतनी सहज बातें भी न सिखला सकी, उस शिक्षा को आप हर एक क्षेत्र में काबिलियत का कॉमन पैमाना समझ रहे हैं । शिक्षा इतना गुरूर लाती है क्या?

क्या आप लोग बाकी 95% पोपुलेशन को मानव संसाधन नहीं मानते? उनके कोई योगदान ही नहीं हैं? क्या आज़ादी की लड़ाई सिर्फ डिग्रीधारियों ने लड़ी? क्या मानव संसाधन सिर्फ डिग्रीधारी होते हैं? बाकियों का कोई योगदान नहीं होता ?

"शिक्षा" मानव संसाधन का एक बहुत बहुत महत्वपूर्ण भाग अवश्य है - किन्तु "सिर्फ" शिक्षा (या शिक्षित लोग) ही मानव संसाधन नहीं होता । न योजनाएँ सिर्फ शिक्षा या शिक्षितों के लिए बनती हैं । 




7. अधिकाँश लोग यही समझ रहे हैं कि यह सब मैं सिर्फ स्मृति जी से सम्बंधित लिख रही हूँ । हां वह भी एक कंसर्न अवश्य है । मुझे वे पसंद हैं - लेकिन वह मेरी निजी चोइस होगी । लेकिन यह स्टेटस जनरल है ।

हमारे मन में यह बात बहुत गहरी बैठ गयी है कि कोई हमसे कम पढ़ा है तो वह हमसे कमतर है । इस लायक नहीं और उस लायक नहीं । यह सच नहीं है - और यह एक नई जाती व्यवस्था को जन्म दे रहा है । मेरी कंसर्न यह है

शनिवार, 24 मई 2014

मोदी जी की होलोग्राफिक रैलियाँ - कैसे बनते हैं होलोग्राम ?


चुनावों के दौरान हमने देखा और सुना कि नरेंद्र मोदी जी ने "होलोग्राफिक रैली" की। इस आलेख में समझाने का प्रयास करती हूँ कि यह किस तरह काम करता है। विस्तृत जानकारी के लिए विकिपीडिया देखियेगा  :)

होलोग्राफी एक ऐसी तकनीक है जिससे त्रि-आयामी तस्वीरें बनती हैं।  इन तस्वीरों को होलोग्राम कहते हैं।  ये बनाने के लिए लेज़र, इंटरफेरेंस (प्रकाश की दो किरणों के एक दुसरे को काटने पर उनका एक फेज़ में होने से जुड़ कर बढ़ना या उलटे फेज़ में होने से घटना), डिफ्रैक्शन (विवर्तन), और लाइट इंटेंसिटी (प्रकाश की तीव्रता या मात्रा) को इस्तेमाल कर के रिकॉर्डिंग होती है।  

जिस प्रकार हम किसी को असलियत में देखते हुए अपने स्थान से दूसरी और जाते हुए उस व्यक्ति को अलग कोण से देखें तो वह हमें अलग दीखता है, उसी तरह या तस्वीर भी दूसरी तरफ से (दुसरे कोण से) देखि जाए तो उसी प्रकार अलग दृश्य देती है।  अर्थात तस्वीर और असल व्यक्ति जहाँ जो कर रहा है / था रिकॉर्डिंग के वक़्त - इन दोनों में कोई फर्क नहीं होता।  ये दो चित्र देखिये - एक ही ऑब्जेक्ट की एक ही होलोग्राफिक तस्वीर के एक ही समय लिए गए दो (साधारण २-डायमेंशनल) चित्र - जो अलग अलग कोण से लिए गए हैं - अलग अलग दिख रहे हैं : 




होलोग्राफिक रिकॉर्डिंग अपने आप में इमेज नहीं होती।  यह प्रकाश की बदलती घटती तीव्रता का , उसके घनत्व का और उसके अलग अलग कोण से दीखते प्रोफाइल (पार्श्व चित्र) का एक स्ट्रक्चर (संरचना) होती है।  

इस तकनीक की खोज का श्रेय जाता है हंगरी / ब्रिटिश फिजिसिस्ट डेनिस गाबोर को।  इन्हे इसके लिए नोबल प्राइज भी मिला था।  इसकी शुरुआत एक्स-रे मायक्रोस्कोपि की नींव पर हुआ।  

पहले ये तस्वीरें स्ट्रक्चर पर लेज़र फेंक कर बनती थीं अब या साधारण सफ़ेद रौशनी से उजागर (illuminate) की जाती हैं।  इसे "रेनबो ट्रांसमिशन: इंद्रधनुषी प्रसारण या प्रकटन" कहा जाता है।  ये क्रेडिट कार्ड सेक्युरितु आदि में भी उपयोग होता है। एक और आम तौर पर इस्तेमाल किया जाने वाला होलोग्राम है डेंसियुक होलोग्राम, जिस पर देखने वाली दिशा से ही प्रकाश गिरता है और सतरंगी तस्वीर (गहराई लिए) उभरती है - ऐसे देवी देवताओं वाले चित्र आपने मंदिरों के आस पास कई दुकानों पर बिकते देखे होंगे।  

आरम्भ में यह सोचा गया कि हम एक्सरे से मॉलेक्युल्स के होलोग्राम बना कर उन्हें स्टडी कर सकेंगे, किन्तु यह अब तक नहीं हो पाया है।  

स्पेकुलर होलोग्राफी में दो आयामी सतह पर तीन आयामी चित्र उभारे जाते हैं (लिंक एक, लिंक दो ) . स्पेक्युलर रिफ्लेक्शन का अर्थ होता है अलग अलग ऑब्जेक्ट्स को प्रकाश बिंदु से जब प्रकाशित किया जाता है तो उसके अलग अलग curved सतहों से अलग अलग प्रतिबिम्बन होते हैं जिससे वह हमें तीन आयामी दिखता है - इसी तरह के प्रतिबम्बन इस तस्वीर में भी देखने मिलते हैं।  यह चित्र देखिये :

File:Specular highlight.jpg

अधिकाँश होलोग्राम स्थिर या अचल विषयवस्तु के भिन्न भिन्न दिशा और कोनों से ली गयी तस्वीरों को संघटित और संगठित कर के बनाए जाते हैं।  यानी जैसे आप साधारण टीवी देखते हैं तो आपके टीवी स्क्रीन पर किसी भी एक समय पर जो चित्र है वह एक कैमरा ने लिए है - लेकिन यहां अनेक कैमरा हैं सब ओर और सब की बाइनरी इमेज संघटित कर एक त्रि-आयामी इमेज (तस्वीर ) आपको दिख रही है।  होलोग्राम 

होलोग्राम प्रकाशिक जानकारी के भंडारण ; संसाधन और पुनः-प्रतिस्थापन ; के लिए भी इस्तेमाल होते हैं।  

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होलोग्राम कैसे बनते हैं ? : आइये एक नज़र देखते हैं :)

एक प्रकाश क्षेत्र को (सिर्फ उसमे स्थित वस्तुओं भर का नहीं बल्कि उनसे बिखरे प्रकाश का भी) रिकॉर्ड किया जाता है , और बाद में तस्वीर में संघटित कर त्रि आयामी चित्रण किया जाता है। 

रिकॉर्डिंग की विधि :


दोबारा संघटन की विधि 


 इसे आप आवाज़ की रिकॉर्डिंग की तरह समझ सकते हैं - जैसे एक स्रोत से प्रेषित ध्वनि तरंगों को हम रिकॉर्ड करते हैं और कहीं और (जहाँ वह स्रोत नहीं है) उन्ही तरंगों को दोबारा उत्पन्न करते हैं, उसी तरह यहां प्रकाश तरंगों के साथ होते है।  
होलोग्राम रिकॉर्ड करने के लिए लेज़र प्रकाश सीन पर फ़्लैश किया जाता है और रिकॉर्डिंग मीडियम पर इसका इंप्रिंट (छाप) ले ली जाती है - जैसे कोई चित्र लिया जाता है।  किन्तु एक फर्क है।  वह यह कि प्रकाश की बीम के एक भाग को भी को सीधे भी रिकॉर्डिंग मीडियम पर सीधे चमकाया जाता है - उसी समय।  इस दूसरी बीम को रिफरेन्स बीम (सन्दर्भ किरण) कहते हैं।  लेज़र प्रकाश इसलिए प्रयुक्त होता है क्योंकि उसमे वेवलेंथ (तरंगदैर्घ्य) नियंत्रित की जा सकती है जबकि साधारण प्रकाश (जैसे सूर्य का) में वेवलेंथ मिली जली रहती हैं। शटर टाइम को कड़ाई से नियंत्रित किया जाना आवश्यक है (जैसा साधारण केमेरा में भी होता है) . बाहरी रौशनी दखल न दे इसलिए होलोग्राफिक रिकॉर्डिंग या तो अँधेरे कमरे (डार्क रूम) में होती है या फिर लेज़र के रंग से बहुत अलग तरंगदैर्घ्य के हलके प्रकाश में।  

रिकॉर्डिंग माध्यम के लिए कई विकल्प उपलब्ध हैं।  एक है टोफ़ोटोग्राफिक फिल्म (सिल्वर हैलाइड) जो साधारण फोंटोग्राफी में भी प्रयुक्त होती है किन्तु इसमें प्रकाश से प्रतिक्रिया करने वाले ग्रेन्स अधिक  कॉन्सेंट्रेटेड होते हैं।  इससे रेज़ल्यूशन बढ़ जाता है।  

जब ये दोनों लेज़र किरणें माध्यम पर पड़ती हैं तो एक दुसरे को काटती हैं और interfere करती हैं।  इससे जो पैटर्न बनता है , वही माध्यम पर छप जाता है।  

यह प्रतिच्छाया देखने में एकदम ही अनियमित दीखता है और इसमें मूल वास्तु से कोई भी साम्य नहीं दीखता। जैसे ऊपर यह प्रतिच्छाया एक खिलौना वैन की है जो किसी भी तरह से एक वन नहीं लग रही। किन्तु जब दूसरी ओर यह सीन फिर से बनाना हो , तब वहां पहले वाले लेज़र जैसा ही (ठीक वैसा ही) प्रकाश सोर्स चाहिए होता है, और जब यह प्रकाश उस होलोग्राफिक (डेवलप्ड) चित्र पर चमकाया जाता है तब ठीक पहले जैसा प्रकाश सीन बन जाता है जो भ्रम देता है कि त्रि-आयामी विषय वस्तु यहीं मौजूद है।