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गुरुवार, 29 जनवरी 2015

शिव पुराण १० - केदारनाथ ज्योतिर्लिंग


एक कथा है कि विष्णु जी के अवतार नर और नारायण (लिंक) ने बदरीनाथ धाम में शिव जी का शिवलिंग स्थापित कर, उनकी उपासना की थी। लम्बी और कठिन तपस्या के बाद शिव जी प्रकट हुए , और उन्हें कहा कि आप तो स्वयं ही पूज्य हैं, आप यह कठिन तप क्यों  कर रहे हैं। फिर भी जब आपने हमारा ध्यान करते हुए तप किया है , तो आप जो भी हमसे चाहें वह मांगें।

इस पर श्री नर और नारायण ने शिव जी से प्रार्थना की , कि वे ज्योतिर्लिंग के रूप में सदा ही केदारनाथ धाम में बसे रहें।  जो भी मनुष्य आपके दर्शन करे वह समस्त दुखों से मुक्त हो जाए।  शिव जी उनकी इस प्रार्थना को सहर्ष स्वीकारते हुए ज्योतिर्लिंग रूप में वहीँ रहने लगे ।

एक और कथा विख्यात है इस धाम के बारे में। कहते हैं कि महाभारत युद्ध में कौरवों पर विजय प्राप्त करने के बाद पांडव बड़े दुखी रहने लगे थे । अपने ही बांधवों को मार कर प्राप्त राज्य उन्हें कोई सुख न दे पाता था।  वे प्रायश्चित्त के लिए शिव जी के दर्शन करने गए।

आयु हो जाने पर पांडव द्रौपदी सहित हिमालय जाकर शिव जी की आराधना करने गए।  रुद्रप्रयाग में उन्हें ऐसा लगा मानो कि शिव जी उन्हें दिखे हैं । लेकिन जब वे उनकी तरफ जाने लगे तो शिव जी भैंस का रूप लेकर वहां से तेज़ी से भागने लगे। यह जानकार कि प्रभु हमसे क्रोधित हैं और हमसे मिलना ही नहीं चाहते, पांडव दुखी हुए।  वे उनके पीछे दौड़े और आखिर केदारनाथ धाम में उन तक पहुँच पाये।  किन्तु प्रभु शिव भैंस के रूप में धरती में प्रविष्ट हो गए।  सिर्फ भैंसे का पिछला भाग दिखता था - जिसे खींच कर बाहर निकालने का भीम ने बहुत यत्न किया , किन्तु खींच न सके।  यही आगे शिवलिंग में परिवर्तित हो गया। और भी पांच हिस्से अलग अलग शिवलिंगों में बदले - जो पंच केदार कहलाते हैं।  ये सभी गढ़वाल (उत्तराखंड) के हिमालयी क्षेत्र में हैं।




शनिवार, 24 जनवरी 2015

शिव पुराण ९ : ओम्कारेश्वर अमरेश्वर मामलेश्वर ज्योतिर्लिंग



ओंकारेश्वर और मामलेश्वर दो मंदिर हैं जो नर्मदा नदी के एक छोटे से टापू पर स्थिर हैं।  इस टापू को मन्धाता या शिवपुरी भी कहते हैं।  इसका आकार "ॐ" अक्षर जैसा कहा जाता है। यहां से जुडी अनेक कथाएं हैं।

शिव पुराण के अनुसार, एक बार नारद जी विंध्य पर्वत आये। विंध्य बहुत अहंकारी था क्योंकि वह विराट और शक्तिवन्त था।  तब नारद जी ने कहा कि तुमसे श्रेष्ठ और बड़े सुमेरु पर्वत हैं, उनपर देवगण वास करते हैं।  तब विंध्य ने शिव जी को प्रसन्न करने के लिए पार्थिव लिंग बना कर कठिन तप किया।  शिव जी प्रकट हुए और वरदान मांगने को कहा।  तब विंध्य ने उन्हें वहीँ रहने का आग्रह किया।  वहां पहले से विद्यमान ओम्कारेश्वर महादेव ने स्वयं को तब दो हिस्सों में विभाजित किया - एक अमरेश्वर कहलाये और दुसरे मामलेश्वर।

शिव जी ने विंध्य पर्वत को बढ़ने का वरदान दिया और कहा कि तुम बढ़ोगे अवश्य लेकिन भक्तों को परेशान न करना। शिव जी अंतर्ध्यान हो गए।  विंध्य बढ़ने लगा और अपना वचन भूल कर सुमेरु से महान होने की इच्छा से बढ़ता ही चला गया।  जब उसके कारण सूर्य और चन्द्र का रास्ता अवरुद्ध होने लगा तब देवगण महर्षि अगस्त्य के पास गए।  अगस्त्य जी विंध्य के पास गए और उसे कहा कि मेरे लौटने तक नहीं बढ़ना।  तब विंध्य रुका।  अगस्त्य जी अपनी पत्नी के संग श्रीशैले पर रहने चले गए और कभी न लौटे।  विंध्य पर्वत वैसे ही रुका रहा।

एक और कथा है कि मन्धाता और उसके पुत्रों ने यहाँ कठिन तप किया था जिस वजह से यहां ये स्थल स्थापित हुआ।  एक तीसरी कथा देव दानवों के युद्ध से जुडी है कि युद्ध में पराजित होते देवताओं ने यहां प्रार्थना कर के फिर से बल प्राप्त किया था।


शुक्रवार, 23 जनवरी 2015

शिव पुराण ८ : महाकालेश्वर उज्जैन


उज्जैन (म.प्र.) में तीसरे ज्योतिर्लिंग विद्यमान हैं - महाकालेश्वर।

अवन्ति नगरी में क्षिप्रा तट पर वेदप्रिय नामक ब्राह्मण रहते थे।  वे शिवभक्त थे और प्रतिदिन शिव लिंग की अर्चना करते थे। उनके चार पुत्र थे - देवप्रिय, प्रियमेध, सुवृत (धर्मबाहु), और सुकृत।  ब्राह्मण की ही  पुत्र भी बड़भागी थे और  शिवभक्त थे।  समय आने पर ब्रह्मण  ने देहत्याग किया और उनके पुत्र उन्ही की तरह शिव भक्ति में लगे रहे।

इधर रत्नाक नामक पहाड़ पर दूषण नामक दैत्य वास करता था । उसने कठिन तप कर ब्रह्मा जी से वर प्राप्त किया था और अत्यधिक  बल शाली था। उसने आसपास सब तरफ  साम्राज्य स्थापित किया था और सिर्फ इन चार ब्राह्मणों के अलावा सब तरफ  उसका भय था।  वेद स्थापित जीवन जीने की किसी को अनुमति न थी ।

जब उसे पता चला कि चार ब्रह्मण शिव आराधना करते हैं तो वह बड़ा क्रोधित  हुआ।  उसने सैनिक भेजे कि उन्हें पकड़ लाओ।   इन दैत्यों ने वहां आकर उत्पात शुरू  किया और ब्राह्मणों को आज्ञा सुनाई।  किन्तु वे  पूजन करते रहे और बात ही न सुनी। क्रुद्ध दैत्य उन्हें मारने को चढ़ दौड़े। तब भी वे पूजा करते रहे।

तभी तीव्र गर्जना हुई एवं धरती में पड़ी दरारों में से अग्निसमान शिव जी प्रकट हुए।  उन्होंने दैत्यों को मार  दिया और पर्वत  पर जा कर दूषण  का भी वध कर दिया। लौट कर उन्होंने ब्राह्मण बंधुओं से वरदान मांगने को कहा।  ब्राह्मणों ने मोक्ष माँगा और यह भी कि शिव जी सदैव उस स्थल पर रहें।  तबसे यह शिवलिंग उज्जैन में स्थित है।






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बुधवार, 21 जनवरी 2015

शिव पुराण ६ : मल्लिकार्जुन स्वामी - श्रीशैले mallikarjuna shrishaila

                

शिव और शिवा के दो पुत्र हैं - कार्तिकेय और गणेश।  जब दोनों पुत्रों के विवाह की बातें चलीं तो दोनों ही कहने लगे कि उनका विवाह पहले हो।  तब शिव और पार्वती जी ने कहा , कि जो संसार की परिक्रमा कर के पहले लौट आये - उसका विवाह पहले होगा।

कार्तिकेय जी अपने वाहन मोर पर बैठ कर प्रदक्षिणा को निकल पड़े किन्तु गणेश जी ने यह नहीं किया।  उन्होंने अपने माता पिता को अपने आसन पर बैठाया और उनकी परिक्रमा कर ली ।  तब गणेश जी ने कहा कि अब आप मेरे विवाह का प्रबंध करें।  माता पिता ने कहा कि प्रिय पुत्र, कार्तिकेय आगे चले गए हैं - तुम भी जल्दी जाओ और पहले लौटने पर ही तुम्हारा विवाह पहले होगा।  इस पर गणेश जी बोले कि वेद वाणी के अनुसार मैंने संसार की परिक्रमा कर ली है , क्योंकि वेद कहते हैं कि माता पिता की परिक्रमा संसार की परिक्रमा जैसा ही है।  क्या वेदवाणी झूठी है ?

शिव और शिवा वेदवाणी को नहीं झुठला सकते थे, तो उन्होंने  गणेश जी का विवाह करा दिया (विश्वरूप जी की पुत्रियों , ऋद्धि , और सिद्धि से। उनके पुत्र हुए क्षेम और लाभ। (कहीं लिखा आता है बुद्धि और सिद्धि से विवाह हुआ और पुत्र हुए लक्ष्य और लाभ ) जब कार्तिकेय वापस आये तो यह सब पता चलने पर बहुत क्रोधित हुए , और कभी विवाह न करने का व्रत लेकर कैलाश त्याग कर क्रौंच पर्वत पर तप करने चले गए।  पुत्र के यूँ रूठ कर जाने से माता पार्वती बहुत दुखी हुईं।

शिव जी पार्वती जी सहित बेटे को मनाने गए किन्तु कुमार कार्तिकेय न माने और वह स्थान भी छोड़ कर जाने लगे।  देवगणों के समझाने पर वे वहीँ रहे , किन्तु माता पिता के साथ नहीं।  तब शिव जी और पार्वती जी ने वहीँ समीप ही श्रीशैले में रहने का  निर्णय किया और वहां स्वयं को स्थापित किया।  कहते हैं कि शिव जी अमावस्या के दिन और पार्वती माता पूर्णिमा के दिन अपने पुत्र को मिलने आते हैं।

यहीं पास ही एक शक्तिपीठ भी है।  जब माता सती ने अपने पिता दक्ष के अपने पति के प्रति अपमानजनक व्यवहार से क्रुद्ध होकर योग-अग्नि में स्वयं को भस्म कर लिया था , तब शिव जी उनका जलता मृत शरीर उठाये संसार भर में घूमते रहे थे। तब उनका मोह नष्ट करने के लिए श्री विष्णु ने माता के शरीर के टुकड़े टुकड़े कर दिए थे - जो धरती पर यहां वहां गिर गए  थे।  उन सब जगहों पर माता के शक्ति पीठ हैं। तब यहीं माता के ऊपरी होंठ के गिरने से यहां भी एक शक्तिपीठ है।






शिव पुराण ५ : सोमनाथ जी



 गुजरात में द्वारका जी के समीप ही यह तीर्थस्थल है।  कथा है कि सती माता के पिता प्रजापति दक्ष थे।  उनकी २७ पुत्रियों का विवाह चन्द्रदेव से हुआ था। ऐसा इसलिए कि , जब ब्रह्मा जी ने अपने पुत्र दक्ष को ये कन्याएँ प्रदान  कीं तब उन्हें कहा कि , इन सब का विवाह एक ही वर से करना क्योंकि ये २७ शरीर अवश्य हैं किन्तु आत्मा एक ही है।

लेकिन चन्द्रदेव  (चन्द्रदेव का एक नाम सोमदेव भी है, जो रेवती के वर के रूप में उन्हें कहा जाता है। ) अपनी सभी वधुओं  सम्मान न देते थे।  वे रोहिणी के ही प्रति अत्यधिक प्रेममय थे।  इससे बाकी पत्नियां, मुख्यतः रेवती , दुखी रहती थीं।  यह बात दक्ष से कही जाने पर दक्ष ने कई बार चन्द्रदेव  समझाया लेकिन उनके व्यवहार में कोई फर्क न आया। इससे क्रुद्ध हो कर दक्ष प्रजापति ने चन्द्रदेव को श्राप दिया कि वे क्षयग्रस्त होंगे और धीरे धीरे लुप्त होते जाएंगे।

श्राप के प्रभाव से चन्द्रदेव क्षय होने लगे और उनका तेज जाता रहा।  तब चन्द्रदेव ने मार्कण्डेय जी से महामृञ्जय मन्त्र (इसकी कथा आगे आएगी) प्राप्त किया और द्वारका के समीप सरस्वती नदी के किनारे शिवलिंग स्थापित कर वहाँ मृत्युंजय मन्त्र का पत्नियों सहित पाठ  किया।  इस पाठ के पश्चात शिव जी प्रकट हुए और उनसे वर मांगने को कहा।

चन्द्रदेव ने  संगिनियों सहित अपनी कथा कही और प्राणरक्षण माँगा।  शिव जी बोले , दक्ष प्रजापति का श्राप पूरी तरह ख़त्म तो नहीं हो सकता , किन्तु मैं उसका प्रभाव काम कर दूंगा। आपने अनुचित व्यवहार किया ही है और आप दंड के अधिकारी भी हैं। जब आपने सभी कन्याओं के संग विधिवत विवाह किया था तब आपका कर्त्तव्य था कि आप उन सब को बराबर प्रेम और सम्मान दें। इसलिए दक्ष का श्राप अनुचित न था। इस पर चन्द्रदेव ने आगे यह भूल न दोहराने का वचन लिया।

शिव जी ने कहा, मैं आपको अपने सर पर धारण करूंगा जिससे आपकी रक्षा होगी।  पंद्रह दिन प्रजापति दक्ष के श्राप के असर से आप कम होते जाएंगे , और यह समय खंड "कृष्ण पक्ष" कहलायेगा।  फिर पंद्रह दिन आप बढ़ेंगे और अपने पूर्व रूप में लौट आएंगे जो "शुक्ल पक्ष" कहलायेगा।

तब सभी संतों, चन्द्रदेव, अत्रि जी और अनुसूया जी (चन्द्रदेव के माता पिता ) , और अन्य सभी देवगणों ने प्रार्थना की कि इस स्थान पर स्वयंभू शिव जी सदैव रहें।  यह ज्योतिर्लिंग "सोमनाथ"  प्रसिद्ध है। मान्यता है कि यहाँ आकर पूजन करने से सभी बीमारियां दूर हो जाते हैं।

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जारी …… 

शिव पुराण ४ : बारह ज्योतिर्लिंग

शिव जी की पूजा आराधना लिंग रूप में होती है।  भक्त प्रभु के लिंग की स्थापना करते हैं और अर्चना करते हैं।  वैसे तो बहुत से शिवलिंग प्रसिद्ध हैं, किन्तु बारह प्रमुख हैं। ये बारह ज्योतिर्लिंग संसार भर में विख्यात हैं और इन के दर्शन करने का बहुत महत्व माना गया है (लिंक)।  ये हैं :

१.  सोमनाथ जी (गुजरात)
२. मल्लिकार्जुन स्वामी (श्रीशैला) (आंध्र)
३. महाकालेश्वर (म.प्र)
४. ओंकारेश्वर (म.प्र)
५. केदारनाथ जी (उत्तराखंड)
६. भीमशंकर महादेव (महाराष्ट्र)
७. काशी विश्वनाथ जी (उ.प्र)
८. त्रिम्बकेश्वर (महाराष्ट्र)
९. वैद्यनाथ जी (झारखंड)
१०. नागेश्वर (गुजरात)
११. रामेश्वरम (तमिल नाडु)
१२. घृष्णेश्वर  (महाराष्ट्र)

 अगले भाग से ज्योतिर्लिंगों की कथाएँ होंगी। 



मंगलवार, 20 जनवरी 2015

शिव पुराण ३ : पार्वती का तप और विवाह

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 यह भाग देवी कथाओं में पहले भी शेयर कर चुकी हूँ 
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देवी रति को कामदेव के प्रद्युम्न रूप में लौटने के बारे में बता कर शिव जी वहां से अंतर्ध्यान हो गए । पार्वती बहुत दुखी हुईं और उन्होंने शिव जी को प्राप्त करने के लिए पंचाक्षरी नाम जाप के साथ तपस्या करना शुरू किया । माता ने उन्हें "उमा" कह कर रोका- जिससे उनका नाम उमा हुआ ।

उमा ने बड़ी कठिन तपस्या की , पहले भोजन त्यागा, फिर फल आदि भी त्याग दिए और बाद में पत्र पुष्प भी । पर्ण भी त्याग देने से उनका नाjम "अपर्णा"हुआ । 3 हज़ार साल से अधिक होने पर भी शिव प्रसन्न न हुए, तब पार्वती जी और भी लगन के साथ अपनी साधना में लग गयीं ।

उनके तप ताप के तेज से पृथ्वी संतप्त हो उठी और प्राणियों को अत्यंत पीड़ा होने लगी  । उधर ताड़कासुर ने सब और अपना राज्य विस्तारित किया और इन्द्रासन पर भी आसीन हो गया । तब देवगण विष्णु जी और ब्रह्मा जी सहित शिव जी के पास गये और पार्वती से ब्याह करने को कहा, । शिव जी ने कहा कि  मैं योगी हूँ, मुझे विवाह में कोई रूचि नहीं, और फिर से ध्यान मग्न हो गए । देवताओं ने उन्हें फिर पुकारा और धरा पर मची हाहाकार से मुक्ति के लिए उनसे तप स्वीकारने की प्रार्थना की । तब शिव जी ने कहा कि यद्यपि विवाह में हमारे रूचि नहीं है, तथापि आओ सब के लिए हम यह स्वीकार कर सकते हैं , आप सब प्रसन्न मन से प्रस्थान कीजिये ।

देवताओं के जाने के बाद शिव जी ने सप्तर्षियों से काली के प्रेम और समर्पण की परीक्षा लेने को कहा, जिन्होंने उमा के आगे आ कर शिव जी के अवगुणों की बातें  कहीं। भवानी ने तनिक भी विचलित हुए बिना अपनी तपस्या जारी राखी ।

फिर शिव जी खुद वृद्ध ब्राह्मण वेश में उनके पास आये और माँ ने उनका आदर सत्कार किया । उन्होंने पूछा की हे सुन्दर राजकुमारी, आप यह किस उद्देश्य से इतना कठोर तप कर रही हैं । उमा के कारण बताने पर वे शिव जी की बड़ी भर्त्सना करने लगे और कहा की ऐसे वर से विवाह करने से तो अच्छा हो की तुम कुंवारी ही रहो । शिव जी की बुराई पर माता भवानी क्रोधित हो गयीं और ब्राह्मण को वहां से जाने का आदेश दिया, अपनी सखी से कहा कि इसे यहाँ से दूर रखो और चुप रखो  । जितना पाप श्री महादेव की बुराई करने में है, ऐसा ही पाप उसे सुनने में भी है । मैं लज्जित हूँ कि मैंने इस शिवद्रोही का स्वागत सत्कार किया, और यह कह कर शिवा वहां से जाने लगीं  । इस पर शिव अपने निज रूप में आये और शिव का सारा क्लेश जाता रहा  । शिव जी ने कहा कि हे देवी, आपसे हम अति प्रसन्न हैं, और आपसे असीमित प्रेम भी करते हैं । आपके बिना अब हम भी नहीं रहना चाहते। आपको जो चाहिए है, मांग लीजिये । तब गिरिजा ने उनसे पिता हिमवान से अपना हाथ मांगने को कहा ।

शिव जी बोले , की मांगने में समर्थ पुरुष का तेज घट जाता है । जैसे ही "देहि" (मांगने के लिए संस्कृत शब्द - दो / दीजिये) शब्द मुंह से निकले, पुरुष भिक्षुक की तरह हीन हो जाता है  । किन्तु माता भवानी ने कहा कि पिता से पुत्री को स्त्री रूप में मांगना पुरुष का अपनी स्व प्रकृति को प्राप्त करने का कर्म है, और शास्त्र सम्मत है ।  तब शिव उन्हें पिता के घर प्रसन्न मन से लौट जाने को कह कर चले गए और गिरिजा प्रसन्नचित्त से घर आ गयीं ।

शिव नट रूप में डमरू लेकर हिमवान के घर आये और अत्यंत दिव्य नृत्य किया । अति प्रसन्न होकर राजा रानी ने उन्हें जो चाहें लेने को कहा, तो उन्होंने देवी काली का नाम लिया । राजा रानी नट की उद्दंडता पर अति क्रोधित हुए और सैनिकों से उसे बाहर निकालने को कहा, किन्तु उनके दिव्य तेज से कोई भी उनके सम्मुख न पहुँच सका  । नटराज ने फिर उमा का हाथ स्वयं को सौंपने को कहा, किन्तु मैना और हिमवान के न करने पर वे वहां से अंतर्ध्यान हो गए ।

फिर गिरिजेश वैष्णव ब्राह्मण रूप में हिमवान के घर गए और शिव जी की इतनी तीव्र निंदा की कि मैना और हिमवान ने कहा कि हम अपनी बेटी को कुंवारी भले ही रखेंगे, किन्तु ऐसे वर को उसे न सौंपेंगे । बाद में शंकर जी की प्रेरणा से सप्तर्षि वहां गए और हिमवान को मनाया । मैना देवी फिर भी न मानें, तो उन्हें अरुंधती जी ने समझाया (अरुंधती जी ब्रह्मा पुत्री संध्या हैं, जो कामदेव के साथ ही ब्रह्मा के ह्रदय में से उत्पन्न हुईं थीं  । ब्रह्मा की अनुमति पा कर कामदेव ने बाण संधान किया, जिससे सभा में उपस्थित सभी देवों की दृष्टि काम्पूर्ण हो उठी और संध्या पर सकाम दृष्टि पडी । इससे संध्या का मन व्यथित हुआ और वे पित्राज्ञा से श्री वशिष्ठ जी से मन्त्र ले कर तपस्या को चली गयीं । संध्या को सूर्य ने प्रातः और सायं संध्या में विभक्त किया था । बाद में वे तपस्या करने वे चंद्रभाग पर्वत पर चली गयीं, जहां से चंद्रभागा नदी उत्पन्न हुईं । अगले जन्म में वे ऋषि मेधातिथि की पुत्री अरुंधती हुईं, और उनका ब्याह वशिष्ठ जी से हुआ )

बरात आई तो शिव जी ने मैना जी के अहंकार को नष्ट करने के लिए इतना भयंकर वेश धारण किया कि मैना उन्हें देख कर बेहोश हो गयीं  । चेतना लौटने पर बेटी से कहा कि ऐसे कुलक्षणी अशुभ से मैं तुम्हे नहीं बांधूंगी ।
वे अपनी बेटी उमा, नारद, सप्तर्षियों, सबको अपशब्द कहने लगीं की धिक्कार है कि मेरी कोमलांगी पुत्री को ऐसे अमंगल दूल्हा चुना गया । उसी समय मेरा गर्भ नष्ट हो जाता तो भला होता । मैं उमा को अपने हाथों से विष दे दूँगी परन्तु इस से उसे न ब्याहूंगी । नारद ने उन्हें समझाया की शिव रूप सर्व शुभ है , यह रूप तो उन्होंने कौतुकवश धारण किया है । किन्तु वे न मानीं और नारद को कहा कि तुम दुष्टों और अधर्मियों के शिरोमणि हो कि तुमने हमारी बेटी का जीवन खराब कर दिया । देवताओं और सप्तर्षियों के समझाने पर भी मैना अपनी बात पर अड़ी रहीं । हिमवान स्वयं भी समझाने गए तो मैना ने कहा की वे सहर्ष बेटी को गले में रस्सी बाँध कर पर्वत से लटका दें , किन्तु वे उसका ब्याह शिव से न होने देंगी ।

अब पार्वती ने कहा कि "हे माते, तुम्हारी वाणी और बुद्धि तो सदैव मंगलकारी हुआ करती थी । आज यह धर्म का अवलंब न कर भटक गयी है । हे माँ, रूद्र सर्वोत्पत्ति के कारण और साक्षात इश्वर हैं । मनोहारी रूप धारी, कल्याणकारी महेश्वर परमेश्वर हैं । विष्णु ब्रह्मा द्वारा सेवित हैं और देवता गण इनकी आराधना करते हैं । ये निर्विकार, अविनाशी और सनातन हैं । शिव जी के ही कारण आज आपके द्वार पर ब्रह्मा विष्णु और समस्त देवगण और ऋषि मुनि जन पधारे हैं । मैं मन वचन कर्म से उन्हें पति मान चुकी हूँ, और आप मेरा विवाह न भी करेंगे, तो भी मैं आजीवन उनकी ही पत्नी बन कर कुंवारी रहूंगी " पुत्री की इन बातों से मैना देवी अति क्रोधित हुईं और उसे (निर्लज्जता के लिए ) डांटने लगीं । विष्णु जी भी मैना के पास आये और उन्हें समझाया , कि पितरों की कन्या और शैलप्रिया होने से उम्का सम्बन्ध ब्रह्मा जी के कुल से है । विष्णु जी के समझाने से मैना का आवेश कम तो हुआ, किन्तु उन्होंने जिद न छोड़ी । किन्तु जब शिव जी ने अपनी माया हटाई, तो मैना ने उन्हें उत्तम स्वीकार किया और नारायण से प्रार्थन की कि शिव जी से निज रूप में आने को कहें । तब शिव अपने स्वरुप में आये और उस रूप में अति सुन्दर प्रकट हुए  । मैना ने अपने व्यवहार पर क्षमा मांगी और फिर शिव और शिव का विवाह संपन्न हुआ ।

नव दंपत्ति के दर्शनों को सोलह श्री नारियां आयीं : सरस्वती, लक्ष्मी सावित्री, गंगा, अदिति, लोपामुद्रा, अरुंधती, अहल्या, तुलसी, स्वाहा, रोहिणी, पृथ्वी, शतरूपा, संज्ञा और रति । फिर और भी अनेक दिव्य देवपत्नियाँ, नाग कन्याएं, मुनि कन्याएं आदि वहां आईं   । रति ने कामदेव की भस्म को शिव के आगे किया और विवाह के शुभ अवसर पर अपने पति को पुनर्जीवित करने को कहा, और बहुत रोने लगीं । उनके रोने से अन्य देवपत्नियाँ भी रोने लगीं और प्रभु की दयादृष्टि पड़ते ही भस्म से कामदेव अपने पूर्व रूप में आ अगये और रतिकाम ने शिव शिवा की मधुर स्तुतियाँ की । विदाई के समय माँ ने पुत्री को पतिव्रता नारी के धर्म समझाए । फिर गिरिजाकुमारी अपने पति के साथ हिमवान के देश से विदा हो गयीं ।

शिव पुराण २ : पार्वती आगमन , कामदेव का भस्म होना

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 यह भाग देवी कथाओं में पहले भी शेयर कर चुकी हूँ 
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दक्ष दत्त (सती का) शरीर त्याग कर माता भवानी स्वधाम को लौट गयीं । शिव बड़े संतप्त हुए और कैलाश पर तप को चले गए । समय गुज़रता गया ।

इधर देवतागण ब्रह्मा जी के पास गए, जहाँ उन्होंने बताया कि कुछ आसुरी शक्तियों का नाश विष्णु अवतार करेंगे, कुछ का शिव अवतार, तो कुछ और आसुरी शक्तियों का विनाश सिर्फ जगदम्बिका के अवतारों और शिव भवानी की संतति द्वारा ही हो सकता है । आदिशक्ति जगदम्बिका अब हिमवान और मैना जी के घर अवतार लेंगी । तब देवता गण मैना जी के परिवार ( पितरों ) के पास गए और उनसे मैना जी और हिमवान के विवाह का अनुरोध किया । विवाह के उपरांत मैना जी और हिमवान ने माता की कठोर तपस्या की । ताप फलित हुआ और माता जी ने मैना रानी को दर्शन दिए और वर मांगने को कहा ।

मैना जी ने कहा की हे मातेश्वरी, यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं तो मुझे वर दीजिये की मेरे सौ अत्योत्तम पुत्र हों, और स्वयं आप मेरी पुत्री के रूप में पधारें । माता ने वरदान दिया और अंतर्ध्यान हो गयीं । समयचक्र में मैना जी ने सौ बलवान पुत्रों को जन्म दिया । उमा महेश्वरी अपने पूर्ण अंश के साथ हिमालय के शरीर में प्रविष्ट हुईं , जिससे वे अद्वितीय आभा से संपन्न हो गए । फिर यथोचित समय पर गिरिराज हिमालय ने, शिवा के इस पूर्णांश को, अपनी प्रिया मैना जी के उदर में स्थापित किया ।जगदम्बा के गर्भ में होने से मैना अत्यंत तेजोमय हो उठीं और सभी देवताओं, ने विष्णु सहित उनकी स्तुति की । गर्भकाल पूर्ण होने पर जगदीश्वरी ने शिशु रूप में मैना जी के घर जन्म लिया । उनका शरीर नील श्याम कान्तियुक्त था । हिमवान जी ने अपनी पुत्री का नामकरण किया, और उन्हें काली इत्यादि सुन्दर नामों से बुलाया गया । सुशीलता के कारण परिवारजन उन्हें "पार्वती" भी बुलाते थे । माँ ने तप को रोकते हुए "उमा" कहा - जिससे उनका नाम उमा भी हुआ ।

दैवीय प्रेरणा से नारद हिमालय जी के घर आये और पुत्री का हाथ देख कर बोले की इनका विवाह ऐसे वर से होगा जो योगी, नंग-धडंग, निर्गुण, निष्काम, मात-पिता रहित , निस्पृह और अमंगल वेशधारी होगा । यह सुन कर भवानी मन ही मन प्रसन्न हुईं, किन्तु माता पिता चिंतित हो गए । उनके उपाय पूछने पर नारद ने कहा कि ब्रह्म लेख झूठा तो हो नहीं सकता, किन्तु अशुभ को शुभ करने का एक उपाय है , कि आपकी पुत्री का ब्याह महेश्वर के साथ हो - क्योंकि उनमे ये सब गुण अवगुण नहीं, बल्कि भव्यता के रूप में वास करते हैं । हिमालय ने कहा कि वे तो निर्मोही और तपरत हैं, वे कैसे मेरी कन्या से विवाह करेंगे, तब नारद ने भवानी को शिव आराधना करने की सलाह दी , और कहा की तुम्हारी पुत्री आदिशक्ति है । शिव इनके अतिरिक्त किसी से विवाह न करेंगे । इनसे संगम होकर ही वे अर्धनारीश्वर कहलायेंगे ।

जब उमा 8 वर्ष की आयु को पहुंची तब शिव को उनके अवतरण के विषय में समाचार आया, और वे अति प्रसन्न हुए, (वे जानते तो पहले ही थे) और लौकिक रीति निभाते हेतु अपने पार्षद गणों सहित गंगावतरण तीर्थ पर जा कर समाधिस्थ हो रहे ।

पुत्री को लेकर पर्वतराज वहां पहुंचे और उन्हें नमन कर के अपनी पुत्री को आगे कर के भगवान् से बोले, हे प्रभु , आप हमारे यहाँ उपस्थित हुए, यह आपकी हम पर असीम कृपा है । हम अपनी कन्या को आपकी सेवा में समर्पित कर रहे हैं, यह सखियों सहित यहीं रहेगी और आपकी सेवा करेगी । कृपया आज्ञा दें ।

महाप्रभु बोले, हे हिमवान शैलराज, आप हमारे दर्शन कर सकते हैं । किन्तु अपनी पुत्री को घर ही में छोड़ आइये , कि हम तो तपस्वी हैं, हमें इससे क्या सेवा लेनी है ? वेद पारंगत विद्वान् ऐसी अत्यंत सुन्दर, तन्वंगी,चंद्रमुखी और शुभ लक्षना युवास्त्री को मायारूपिणी कहते हैं । हे गिरिश्रेष्ठ, मैं योगी हूँ, और माया से सदा दूर रहता हूँ  ।इस पर हिमवान अत्यंत उदास हो उठे ।

अब पार्वती बोलीं, हे आप योगी और ज्ञान विशारद हैं, फिर भी हमारे पिता से ऐसी बात कही ? सभी कर्मो को करने की शक्ति, सर्व प्राकट्य प्रकृति (nature ) ही है । प्रकृति से ही सृष्टि , पालन, और संहार होता है ( जो ब्रह्मा, विष्णु और महादेव के अधीनस्थ लोक कर्म हैं )। प्रकृति बिना आप लिंग रूप महेश्वरकैसे हो सकते हैं ? आप प्राणीमात्र के वन्दनीय और चिंतनीय हैं, किन्तु आपके मूल में आपकी प्रकृति ही है ।

महेश जी हंस पड़े और बोले ,  मैं तप द्वारा प्रकृति का नाश करता हूँ और तत्वरूप प्रकृति रहित शम्भू रूप में स्थित और विद्यमान रहता हूँ । सत्पुरुष कभी प्रकृति के अधीन नहीं होते । 

माता महाकाली ने कहा, हे प्रभु । अभी जो आपने कहा, वह भी "वाणी" से कहा, और वाणी प्रकृति प्रदत्त है । तब आप प्रकृति से परे कैसे रहे ? जो आप प्रकृति से परे हैं, तो न आप को बोलना चाहिए, न कर्म करना, कि कर्म का किया जाना भी प्रकृति (nature ) है । जो आप प्रकृति से परे हैं, तो हिमालय पर तपस्या क्यों और  कैसे? प्राणियों की इन्द्रियों से सम्बंधित हर वास्तु प्रकृतिजन्य ही है । अधिक कहने से क्या प्रयोजन ? मैं प्रकृति हूँ, और आप पुरुष हैं। आप निराकार निर्गुण हैं और मेरे अनुग्रह से ही आप साकार सगुण होते हैं । आप इन्द्रियों को जीत कर जितेन्द्रिय कहलाते हैं, किन्तु इन्द्रियां मुझसे हैं । प्रकृति अधीन ही आप सब लीलाएं करते हैं । यदि आप प्रकृति से परे हैं, तो मेरे यहाँ रहने से आपको भय कैसा ?

इससे आगे शंकर जी तर्क न कर सके । उन्होंने हिमवान को घर जाने की अनुमति दे दी , और बोले कि हे गिरिजे, यदि तुम ऐसा कहती हो, तो प्रतिदिन मेरी शास्त्र सम्मत विधि से पूजा करो । हिमवान प्रतिदिन वहां आते और पार्वती शंकर जी की विधिसम्मत रूप से आराधना पूजा करतीं ।

इसी बीच ब्रह्मा जी की आज्ञा से इंद्र ने कामदेव को (दक्ष की पुत्री रति कामदेव की पत्नी हैं) शिव के पास भेजा, किन्तु जब कामदेव के वाण से शिव का ध्यान टूटा तो उनकी क्रोधमयी तीसरी दृष्टि से कामदेव पल में भस्म हो गए । रति ने शिव जी की बड़ी स्तुति की और कहा कि मेरे पति यहाँ अपने किसी स्वार्थ वश नहीं आये थे । वे तो देवताओं के कल्याण हेतु आपके और पार्वती जी के ब्याह के लिए अपना धर्म पूर्ण करने आये थे  ।तब शिव जी ने कहा कि भले ही मंतव्य शुभ हो, किन्तु कर्म तो अशुद्ध था, और मन भी उस समय अपने "काम्वेग के बाण" की शक्ति पर गर्वित था । इसलिए कामदेव कोयाह दैहिक क्षति हुई । लेकिन शुभ लक्ष्य होने से उन्होंने बड़ा सौभाग्य भी अर्जित किया है कि वे साक्षात श्री कृष्ण को अपने पिता के रूप में प्राप्त करेंगे । रति की प्रार्थना और निवेदन पर शिव जी ने वचन दिया की अब से कामदेव अनंग रहेंगे, और कृष्णावतार के समय कृष्ण और रुक्मिणी के पुत्र प्रद्युम्न के रूप में फिर से शरीर प्राप्त करेंगे ।

शिव पुराण १ : सृष्टि , दक्ष , सती कथा

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 यह भाग देवी कथाओं में पहले भी शेयर कर चुकी हूँ 
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ब्रह्माण्डों  के होने से पूर्व , और ब्रह्माण्डों की समाप्तियों के बाद , जो दैवी शक्ति है (या रहती है) , वैष्णव इसे नारायण / नारायणी या राधकृष्ण का नाम देते हैं, तो शैव इन्हें सदाशिव और आदिशक्ति । ये सत चित और  आनंद हैं,  अव्यक्त, अचिन्त्य, अविकार्य हैं ।

जब शिव और शिवा के मन में यह इच्छा आई कि  सञ्चालन को एक और पुरुष हो, तो एक सत्त्वगुणी पुरुष का प्रादुर्भाव हुआ, जो व्यापक होने से "विष्णु" कहलाये ।वे तपस्या में विलीन हो गए, और उनके शरीर से अनेक जलधाराएं (जल = नीर) फूटीं और आकाश जलमय हो गया । विष्णु ने (स्वयं) नीर में स्वयं के शेष (भाग) पर शयन किया , जिससे उनका नाम शेषशायी या नारायण भी हुआ । उनसे ही सभी तत्त्व,गुण , त्रिविध अहंकार तन्मात्राएँ,  पञ्च भूत, ज्ञानेन्द्रियाँ और कर्मेन्द्रियाँ प्रकटीं ।

फिर शेषशायी नारायण की नाभि से कमल उगा, जिसपर ब्रह्मा का प्राकट्य हुआ ।ब्रह्मा के तप पर चतुर्भुज विष्णु प्रकटे, जिन्होंने उन्हें ज्ञान दिया । बाद में किसी तर्क के समाधान के लिए उन दोनों के बीच महान ज्योतिर्लिंग प्रकट हुए, जिन के आदि अंत का पता वे दोनों न लगा सके । दोनों की प्रार्थना पर ज्योतिर्लिंग से उमाशिव प्रकटे । ब्रह्मा को सृष्टि करने और विष्णु को सृष्टि पालने का कर्म मिला ।

ब्रह्मा ने अंजुली भर कर जल उछाला जो अंडे की आकृति में फ़ैल गया और ब्रह्माण्ड उत्पन्न हुआ, किन्तु चेतन न हुआ । फिर श्रीविष्णु ने उस अंड में अनंत रूप में प्रवेश किया जिस से वह चेतन हुआ । किसी बात पर क्रुद्ध होकर रोते हुए ब्रह्मा के माथे से रूद्र प्रकट हुए ।

ब्रह्मा के शरीर से (दायें अंगूठे से) दक्ष प्रजापति प्रकट हुए, जिनकी संगिनी हुईं प्रसूति 

ब्रह्मा के कहने पर (रूद्र की अर्धांगिनी बनने के लिए)  दक्ष ने सदाशिव की चिर संगिनी आदिशक्ति, की 3 हज़ार  वर्षों तक, तपस्या और आराधना की और जब माँ प्रकट हुईं तो उनसे कहा "हे जगन्माते, हे जगदम्बिके । सदाशिव ने ब्रह्मा पुत्र के रूप में (रूद्र) अवतार लिए है  । उनकी संगिनी होने के लिए आप मेरे घर पुत्री रूप में पधारें" । माँ ने उन्हें वरदान दिया की मैं तुम्हारी पुत्री तो बनूंगी, किन्तु यदि तुमने कभी भी मुझे अप्रसन्न किया, तो मैं तुरंत तुम्हारी दी हुई देह त्याग दूँगी । दक्ष ने यह शर्त स्वीकार की , और समय के साथ उनके घर में माँ ने सती के रूप में जन्म लिया ।

पति को पाने के लिए तप करने के बाद सती का ब्याह शिव से हुआ , और एक बार शिव जी के साथ विहार करते सती ने श्री राम को सीता की खोज में पागलों की तरह रोते बिलखते देखा । सती माँ के मन में आया की मेरे पति जिन राम को ईश्वर मानते हैं, वे स्त्री के लिए ऐसे मोहित हैं ? और उन्होंने समयक्रम में श्री राम की परीक्षा लेने के लिए सीता का रूप लिया और उनके सामने गयीं । श्री राम उन्हें तुरंत पहचान गए और पूछा कि हे माते, आप यहाँ वन में अकेली क्या कर रही हैं , शम्भू कहाँ हैं । इसपर सती ने राम की सत्यता जान ली किन्तु दिव्य दृष्टि से यह सब जान लेने पर शिव शम्भू अपने आराध्य की पत्नी का रूप ले चुकी सती को पत्नी रूप में न देख पाए । सती मन में यह जान गयीं और उदास रहने लगीं ।

समयक्रम में  दक्ष ने एक यज्ञ आयोजित किया, जिसमे उन्होंने शिव को नहीं बुलाया । बिना बुलाये भी सती वहां जाना चाहती थीं और शिव जी के समझाने के बाद भी वे गयीं । वहां उन्हें बड़ा अपमानित महसूस हुआ, पिता और बहनों ने उन्हें मान न दिया,  और सिर्फ माँ ने ही उन्हें प्रेम और सम्मान दिया । यज्ञ में सब देवताओं के भाग थे, किन्तु शिव जी का न था, जिस पर सती माँ ने आपत्ति की और दक्ष ने शिव जी के लिए बड़े अपशब्द कहे । इससे कुपित होकर सती वहीं योगाग्नि में दक्ष से जन्मी अपनी देह को त्याग दिया ।

यह जान लेने पर शिव जी ने वीरभद्र को वहां भेजा, जिन्होंने यज्ञ ध्वंस कर दिया और दक्ष की गर्दन काट दी । शिव जी सती के जले हुए शरीर को हाथों में उठाये यहाँ वहां भटकने लगे  ।उनके मोह को तोड़ने के लिए विष्णु जी ने सुदर्शन चक्र से सती माँ के शरीर के टुकड़े कर दिए , जो धरती पर अलग अलग जगह गिरे ।

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रविवार, 18 जनवरी 2015

spiritual revelations scientific discoveries

धर्म का अर्थ "उपासना पद्धति" करने वालों के लिए इस पोस्ट का कोई ख़ास अर्थ नहीं है - फिर चाहे वे आस्तिक कन्फूज़न में हों या नास्तिक कन्फ्यूज़न में :) आप पढ़ने के लिए सादर आमंत्रित हैं, लेकिन यह पोस्ट उपासना पद्धति की बात नहीं कर रही इसलिए किसी उपासना पद्धति पर मुझसे प्रश्न न कीजियेगा प्लीज़ :)

ओशो को सुनते हुए :

महावीर , बुद्ध , कृष्ण , जीज़स आदि …जैसे धार्मिक खोजियों ; और न्यूटन , आइंस्टाइन , बोस आदि ....  जैसे वैज्ञानिक खोजियों की खोज पद्धति में मूल फर्क क्या और क्यों है ? विज्ञान कभी नहीं कहता कि आज खोज सम्पूर्ण हुई - इसके आगे / पीछे जानने को कुछ नहीं बचा।  लेकिन धर्म की खोज का स्कोप timeless कहा जाता है।  बुद्ध की बातें आज भी प्रासंगिक ही हैं जबकि विज्ञान अपने वर्जन को बदलता रहता है।  कुछ समय पहले यह माना जाता था आज वह माना जाता है। पहले कहते थे प्रकाश वेव है, फिर कहा पार्टिकल है, फिर कहा ड्युअल नेचर है फिर कहा द्रव्यमान शून्य है फिर नहीं है और पता नहीं क्या क्या।


ओशो इसपर बहुत ही उपयुक्त निरूपण देते हुए लगते हैं।  वे कहते हैं - विज्ञान की खोज ऎसी है जैसे व्यक्ति एक दिया या लालटेन लेकर अँधेरे में कुछ खोजता हो।  अपने आगे और अपने पीछे का सीमित दायरा ही उसे दिखेगा।  उस रौशनी के घेरे में वह खोजी सब तरफ, हर कोण पर देख तो पायेगा , लेकिन निश्चित सीमा तक ही।  जहां तक प्रकाश, उतने दायरे के सत्य सत्य होंगे।  प्रकाश के दायरे से पीछे जो छूट गया - वह सत्य है या नहीं इस पर स्मृति के अलावा कोई साक्ष्य नहीं।

रामायण महाभारत आदि - स्मृतियाँ ही हैं ? या लोककहानियाँ ? या कवियों की कल्पनाएं ? या सत्य ? या कैसे तय हो ? हाँ - गांधी हुए थे यह माना जा सकता है आज - क्योंकि गांधी तक हमारे साक्ष्यों का प्रकाश दायरा अभी तक पहुँच रहा है।  जीज़स हुए या नहीं इस पर बहसें अब होने लगी हैं, जबकि कुछ समय पहले तक यही जीज़स एक ऐतिहासिक सत्य थे।

इसी तरह आगे की तरफ भी वैज्ञानिक खोजी उतना ही देख सकता है जितना उसकी वैज्ञानिक दृष्टि देख पाये।  उसके आगे सब कुछ असत्य ही है - आगे बढ़ने के बाद जब प्रकाश का दायरा आगे जाएगा - तब वहां नए सत्य उजागर होंगे।

इसके विपरीत - धार्मिक (उपासक नहीं , पंथ नहीं - धर्म ) खोजी जैसे महावीर और बुद्ध जो खोजते हैं वह दिए के प्रकाश को लेकर एक दायरे में खोजी गयी सीमित सच्चाई नहीं बल्कि revelation होता है।  जैसे व्यक्ति अँधेरे में खड़ा हो और पल भर में बिजली कौंधे, और जितनी दूर नज़र जाए सब कुछ प्रकाशित हो उठे।  व्यक्ति फिर वस्तुओं को दायरे में नहीं देखता बल्कि पूर्ण में सब कुछ उसे दिख जाता है।  वह फिर जान कर उन्हें बताता है जिन्होंने नहीं देखा - और यह संभव ही नहीं कि सदियों बाद उनकी देखि हुई विराट सच्चाई हम तक उसी रूप में पहुंचे।  हम अपने अपने चश्मों से सत्य के अलग अलग पहलुओं को देखते समझते और समझाते रहते हैं।  भूल होती ही चली जाती है।

इस तरह देखा जाये तो वैज्ञानिक खोज हर एक के निजी खोज के मार्ग में बेहतर है - क्योंकि कम से कम हर एक अपने दिए तो लेकर चल रहा है।  जबकि अधिकाँश पंथ अपने आप को "धर्म" मानते हुए अँधेरी रात में बिना दिए के सदियों पहले किसी और को हुए revelation  के समझाए मार्ग पर आँखों पर पट्टी बांधे चल रहे हैं ....


मंगलवार, 13 जनवरी 2015

सजा राजा को महंगी पड़ी - बड़ी महँगी :)


यह लघुकथा "लियो टॉलस्टॉय" की कहानी "Too Dear " पर आधारित है
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फ़्रांस और इटली के बॉर्डर पर एक नन्हा सा (खिलौना) राज्य था - मोनैको।  यहां एक राजा भी थे - उनका  दरबार, दरबारी, सेना, सेनाध्यक्ष, महल - सभी कुछ किसी और देश की ही तरह थे - बस एक छोटे पैमाने पर।  राज्य की जनसंख्या किसी छोटे शहर से भी कम थी - कुल ७०००।  और क्षेत्रफल तो इतना कम कि हर नागरिक पर एक एकड़ तक न आये।  फिर भी राज्य में अन्य किसी देश की ही तरह राजशाही थी और राजा का राज भी।

राज्य कार्य अधिक न था किन्तु दरबार अवश्य थे।  कायदे कानून भी थे और उन्हें लागू करवाने को पुलिस बल की तरह छोटी सी टुकड़ी भी - लेकिन राज्य के लोग भले थे तो नगर रक्षियों को कोई ख़ास काम न था।  सीमा सुरक्षा को सेना भी थी - कुल ६० जवानों की :) राज्य का खर्चा कर से चलता था। अब करों से कोई ख़ास आय तो थी नहीं क्योंकि अधिकांश नागरिक छोटे मोटे ही काम करते थे।  शराब सिगरेट आदि पर कर थे लेकिन इनकी तो खपत इतनी कम थी कि कोई ज्यादा आमदनी न होती थी।

एक आमदनी थी "गेमिंग हाउस" से - जहां रुलेट आदि खेले जाते।  चाहे लोग जीतते या हारते - कर तो दोनों ही सूरतों में आता।  पास पड़ोस के देशों में जुए पर पाबंदी लग चुकी थी क्योंकि जुए में हार (न सिर्फ अपना ही धन किन्तु उधार भी जुए में गँवा ) कर लोग हताशा में आत्महत्या तक कर लेते थे।  तो आस पास के देशों से भी जुआरी यहां आते जुआ खेलने - और सेना कोई रोक न करती क्योंकि उनकी आमदनी इन्ही के कारण आये कर से जो आती थी ।

अब एक बार हुआ यूँ कि राज्य में एक खून हो गया।  अपराधी पकड़ भी लिया गया और बड़ी शान शौकत से अदालत बुला कर मुकदमा चला।  मुकदमे से जुड़े सभी अधिकारी बड़े रुतबे से बैठे - आखिर उन्हें ऐसा मौका पहली बार मिला जो मिला था। क़ानून के अनुसार सब कार्यवाही हुई और अपराधी को अपराध सिद्ध होने पर मृत्युदंड दिया गया।  राजा के पास नतीजा गया और राजा साहब ने पूर्ण गंभीरता से यह कहा कि न्यायालय का निर्णय बिलकुल सही है और अवश्य ही इस जुर्म पर मृत्युदंड होना चाहिए।

अब आई असल मुसीबत।  मृत्युदंड देने के लिए न तो जल्लाद था राज्य के पास - और न ही औजार।  मृत्युदंड दे तो कौन दे ? सभा बुलाई गयी और विचार विमर्श हुआ।  तय पाया गया कि पडोसी देश फ्रांस से जल्लाद और सामान उधार / किराए पर लिया जाए।  चिट्ठी भेज कर किराए के बाबत पूछा गया तो जवाब आया - १६००० फ़्रैंक।  फिर से सभा बुलाई गयी और राजा ने निर्णय लिया कि यह तो बहुत महंगा पड़ेगा - क्योंकि प्रति नागरिक २ फ्रैंक से अधिक ही कर का बोझ बढ़ जाएगा - कहीं विद्रोह न हो जाए।  निर्णय हुआ कि इटली हमसे मित्र वत है उन्हें पूछा जाए - और इटली को पत्र भेजा गया।

इटली से जवाब आया १२००० :) ।  अब यह पहले से कम तो था- किन्तु फिर भी रकम बड़ी थी।  राजा ने फिर सभा बुलाई और तय पाया गया कि सेना के किसी सैनिक को यह काम करने को राजी किया जाए।  किन्तु सैनिकों ने यह करने से साफ़ इंकार कर दिया। अब आखिर यह तय हुआ कि - बेहतर है कि सजा को मृत्युदंड से आजीवन कारावास में बदल दिया जाए। यही हुआ भी।

अब आया अगला प्रश्न - आजीवन कारावास के लिए तो जेल चाहिए - और जेल थी नहीं।  एक हवलदार वाली एक हवालात थी जहां एक दो दिन के लिए लोगों को बंद किया जाता था।  लेकिन आजीवन? ऐसी तो कोई व्यवस्था ही नहीं थी !!! तो - फिर एक बार सभा बैठी।  तय पाया गया कि एक कमरेनुमा जेल होगी जिसमे कैदी रहेगा और उसके रखवाले के रूप में एक व्यक्ति रहेगा।

ऐसा ही किया गया।  कैदी जेल में रहता और बाहर पहरा देने पहरेदार।  वही पहरेदार महल के भोजनालय से कैदी और अपने लिए भोजन भी लाता, जिससे अलग से रसोई न करनी पड़े। साल बीतने पर हिसाब हुआ तो मालूम हुआ कि खर्चा आया ६०० फ्रैंक।  यह तो बहुत अधिक था , और कैदी भी अभी भरा पूरा जवान था - आजीवन तो पता नहीं कितने वर्ष हो जाए। इतना अतिरिक्त बोझ तो अधिक होगा।

तय हुआ कि पहरेदार को हटा लिया जाए।  "फिर तो कैदी भाग जाएगा न?" …  "अरे भागे तो भाग जाए - खर्च बचेगा।" तो पहरेदार हटा लिया गया।  लेकिन हुआ यूँ कि भोजन के समय कैदी खुद ही द्वार खोल बाहर आया और महल के भोजनालय से भोजन लिया, भोजन करके पात्र लौटाए और वापस कमरे में आकर खुद हो बंद हो गया।  कुछ दिन यही सिलसिला चला।

एक सभागर ने उस से पूछा - अजीब आदमी हो - दरवाजा खुला है - भाग क्यों नहीं जाते? कैदी बोला - मैं क्यों भागूं? यहाँ आराम से घर है, बढ़िया महल का भोजन मिलता है - मैं तो नहीं भागता।  अब क्या हो ? फिर तो लोग भेजे गए उसे भगाने को मनाने के लिए।

इस बार वह क्रोधित हो गया।  बोला - देखिये , पहले आपने मुझे मृत्युदंड दिया - मैंने चुपचाप स्वीकार कर लिया।  फिर उसे आजीवन कारावास में बदला - मैं कुछ न बोला।  फिर आपने पहरेदार हटा दिया - मैं फिर भी चुप रहा, उसका काम भी खुद करने लगा।  अब तो हद हो गयी।  मैं क्यों कानून तोड़ कर भागूँ ? आप लोगों को देश के क़ानून का कोई ख्याल नहीं ?

आखिर बैठकें चलीं और एक बड़ी पेंशन की बात तय हुई।  साल की पेंशन का तिहाई हिस्सा दे कर उसे "रिहा" किया गया और वह सीमा के पास घर बना कर रहने लगा।  उस पैसे से उसने घर और खेत लिए, और और खेती करने लगा , लेकिन पेंशन लेने सही समय पर आता ।  फिर कुछ धन रुलेट खेलने में इस्तेमाल करता - जीते या हारे। और अपने खेत पर लौट जाता।

किस्मत उसकी अच्छी थी कि उसने यही ह्त्या किसी ऐसे देश में न की जो असला देश होता और वहां सब इंतज़ाम होते - कि उसने यह अपराध उस टॉय स्टेट में किया  ……

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यह लघुकथा "लियो टॉलस्टॉय" की कहानी "Too Dear " पर आधारित है
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