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शनिवार, 30 जुलाई 2016

ramayan ayodhyakand1 रामायण अयोध्याकांड भाग १

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अहोभाग्य हैं - अवध नगरी के 
   जिसके कुंवर हैं - राSम सरीखे। 
संगिनी संग श्री मैथिलि सीता जी  
   चिर सखी हैं जो श्री ज्ञान गुण धाम की।। 

श्रुतकीर्ति उर्मिला, मांडवी और सिया 
    वधुएं माताओं की, हैं अति प्रिया।
स्नेह माताओं का, पुत्रियों पर बरसता 
    सौम्य सुमधुर, शब्दों की सरसता।। 

बैकुंठ क्या होता है ये ? 
    जान लो क्या है ये स्वरग ?
इस नगर को देखो 
    जहां नित राम के पड़ते पग।।  

युवक कुंवर चारों अब 
   राज्यसभा में नित जाते 
छत्रछाया में दशरथ जी 
   राजकाज सुतों को सिखलाते। 

लखन शत्रुघन बने हैं सेवक 
   भरत राम ज्येष्ठ  हैं।   
रघुनन्दन सगरे जगत में 
   अहो सर्व-श्रेष्ठ  हैं। 

समय चक्र घूम रहा 
   अपनी ही नित गति से। 
कौन गुने समय को 
    सब आनन्दित रघुपति से।। 

कल की छाया तक
   नगर ने नहीं जानी।  
भाग्य देवता की 
   निःशब्द है वाणी।। 

नगर की है मधुर 
    सुमधुर बड़ी बेला। 
कौन जाने भाग ने 
    क्या खेल है खेला।।  

........ जारी