बुधवार, 8 मई 2013

महादानी तेजस्वी सूर्यपुत्र कर्ण का जीवन इतना त्रासदियुक्त क्यों रहा ?

कई लोग कई जगह कई बार यह प्रश्न  हैं कि महाभारत  में कर्ण जैसे "हीरो" का जीवन इतना दुखद क्यों ? सूर्यपुत्र और ओजस्वी होकर भी उसे हमेशा सूतपुत्र पुकारा गया , माँ ने टोकरी में रख कर बहा दिया आदि आदि । (वैसे तो इसी तरह के प्रश्न भीष्म और ध्रितराष्ट्र के सम्बन्ध में भी उठते हैं - लेकिन उन पर बात कभी और सही) । इस प्रश्न का उत्तर श्री भागवतम में मिलता है ।

चार युग हैं : 

त्रेता युग में दो कहानियों के तार कर्ण से आ कर जुड़ते हैं । 

एक असुर था - दम्बोद्भव । उसने सूर्यदेव की बड़ी तपस्या की । सूर्य देव जब प्रसन्न हो कर प्रकट हुए और वरदान मांगने को कहा तो उसने "अमरत्व" का वरदान माँगा  । सूर्यदेव ने कहा यह संभव  नहीं है। तब उसने माँगा कि उसे एक हज़ार दिव्य कवचों की सुरक्षा मिले। इनमे से एक भी कवच सिर्फ वही तोड़ सके जिसने एक हज़ार वर्ष तपस्या की हो और जैसे ही कोई एक भी कवच को तोड़े, वह तुरंत मृत्यु को प्राप्त हो । 

सूर्यदेवता बड़े चिंतित हुए। वे इतना तो समझ ही पा रहे थे कि यह असुर इस वरदान का दुरपयोग करेगा, किन्तु उसकी तपस्या के आगे वे  मजबूर थे।उन्हे उसे यह वरदान देना ही पडा । 
इन कवचों से सुरक्षित होने के बाद वही हुआ जिसका सूर्यदेव को डर था । दम्बोद्भव अपने सहस्र कवचों की सहक्ति से अपने आप को अमर मान कर मनचाहे अत्याचार करने लगा । वह "सहस्र कवच" नाम से जाना जाने लगा  । 

उधर सती जी के पिता "दक्ष प्रजापति" ने अपनी पुत्री "मूर्ति" का विवाह ब्रह्मा जी के मानस पुत्र "धर्म" से किया । मूर्ति ने सहस्र्कवच के बारे में सुना  हुआ था - और उन्होंने श्री विष्णु से प्रार्थना की कि  इसे ख़त्म करने के लिए वे आयें । विष्णु जी ने उसे आश्वासन दिया कि वे ऐसा करेंगे ।  

समयक्रम में मूर्ति ने दो जुडवा पुत्रों को जन्म दिया जिनके नाम हुए नर और नारायण । दोनों दो शरीरों में होते हुए भी एक थे - दो शरीरों में एक आत्मा । विष्णु जी ने एक साथ दो शरीरों में नर और नारायण के रूप में अवतरण किया था । 

दोनों भाई बड़े हुए । एक बार दम्बोध्भव इस वन पर चढ़ आया । तब उसने  एक तेजस्वी मनुष्य को अपनी ओर आते देखा और भय का अनुभव किया । 

उस व्यक्ति ने कहा कि मैं "नर" हूँ , और तुमसे युद्ध करने आया हूँ । भय होते भी  दम्बोद्भव ने हंस कर कहा -  तुम मेरे बारे में जानते ही क्या हो ?  मेरा कवच सिर्फ वही तोड़ सकता है जिसने हज़ार वर्षों तक तप किया हो । 

नर ने हंस कर कहा कि मैं और मेरा भाई नारायण एक ही हैं - वह मेरे बदले तप कर रहे हैं, और मैं उनके बदले युद्ध कर रहा हूँ । 

युद्ध शुरू हुआ , और सहस्र कवच को आश्चर्य होता रहा कि सच ही में नारायण के तप से नर की शक्ति बढती चली जा रही थी ।  जैसे ही हज़ार वर्ष का समय  पूर्ण हुआ,नर ने सहस्र कवच का एक कवच तोड़ दिया । लेकिन सूर्य के वरदान के अनुसार जैसे ही कवच टूटा नर मृत हो कर वहीँ  गिर पड़े । सहस्र कवच ने सोचा, कि चलो एक कवच गया ही सही किन्तु यह तो मर ही गया । 

तभी उसने देखा की नर उसकी और दौड़े आ रहा है - और वह चकित हो गया । अभी ही तो उसके सामने नर की मृत्यु हुई थी और अभी ही यही जीवित हो मेरी और कैसे दौड़ा  आ रहा है ???

लेकिन फिर उसने देखा कि नर तो मृत पड़े हुए थे, यह तो हुबहु नर जैसे प्रतीत होते उनके भाई नारायण थे - जो दम्बोद्भव की और नहीं, बल्कि अपने भाई नर की और दौड़ रहे थे  । 

दम्बोद्भव ने अट्टहास करते हुए नारायण से कहा कि तुम्हे अपने भाई को समझाना चाहिए था - इसने अपने प्राण व्यर्थ ही गँवा दिए । 

नारायण शांतिपूर्वक मुस्कुराए । उन्होंने नर के पास बैठ कर कोई मन्त्र पढ़ा और चमत्कारिक रूप से नर उठ बैठे  । तब दम्बोद्भव की समझ में आया कि हज़ार वर्ष तक शिवजी की तपस्या करने से नारायण को मृत्युंजय मन्त्र की सिद्धि हुई है - जिससे वे अपने भाई को पुनर्जीवित कर सकते हैं । 

अब इस बार नारायण ने दम्बोद्भव को ललकारा और नर तपस्या में बैठे । हज़ार साल के युद्ध और तपस्या के बाद फिर एक कवच टूटा और नारायण की मृत्यु हो गयी । 

फिर नर ने आकर नारायण को पुनर्जीवित कर दिया, और यह चक्र फिर फिर चलता रहा । 

इस तरह ९९९ बार युद्ध हुआ । एक भाई युद्ध करता दूसरा तपस्या । हर बार पहले की मृत्यु पर दूसरा उसे पुनर्जीवित कर देता । 

जब 999  कवच टूट गए तो सहस्र्कवच समझ गया कि अब मेरी मृत्यु हो जायेगी । तब वह युद्ध त्याग कर सूर्यलोक भाग कर सूर्यदेव के शरणागत हुआ । 

नर और नारायण उसका पीछा करते वहां आये और सूर्यदेव से उसे सौंपने को कहा  । किन्तु अपने भक्त को सौंपने पर सूर्यदेव राजी न हुए। तब नारायण ने अपने कमंडल से जल लेकर सूर्यदेव को श्राप दिया कि आप इस असुर को उसके कर्मफल से बचाने का प्रयास कर रहे हैं, जिसके लिए आप भी इसके पापों के भागीदार हुए और आप भी इसके साथ जन्म लेंगे इसका कर्मफल भोगने के लिए । 

इसके साथ ही त्रेतायुग समाप्त हुआ और द्वापर का प्रारम्भ  हुआ । 

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 समय बाद कुंती जी ने अपने वरदान को जांचते हुए सूर्यदेव का आवाहन किया, और कर्ण का जन्म हुआ  । लेकिन यह  नहीं है कि , कर्ण सिर्फ सूर्यपुत्र ही नहीं है, बल्कि उसके भीतर सूर्य और दम्बोद्भव दोनों की आत्माएं हैं । जैसे नर और नारायण में दो शरीरों में एक आत्मा थी, उसी तरह कर्ण के एक शरीर में दो आत्माओं का वास है - सूर्य और सहस्रकवच ।  दूसरी ओर नर और नारायण इस बार अर्जुन और कृष्ण के रूप में आये । 

कर्ण के भीतर जो सूर्य का  अंश है,वही उसे तेजस्वी वीर बनाता है । जबकि उसके भीतर दम्बोद्भव भी होने से उसके कर्मफल उसे अनेकानेक अन्याय और अपमान मिलते है, और उसे द्रौपदी का अपमान और ऐसे ही अनेक अपकर्म करने को प्रेरित करता है ।  

यदि अर्जुन कर्ण का कवच तोड़ता, तो तुरंत ही उसकी मृत्यु हो  जाती ।इसिलिये इंद्र उससे उसका कवच पहले ही मांग ले गए थे । 

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एक और प्रश्न - श्री कृष्ण ने (इंद्रपुत्र) अर्जुन का साथ देते हुए (सूर्यपुत्र) कर्ण को धोखे से क्यों मरवाया ?  कहते हैं कि श्री राम अवतार में श्री राम ने (सूर्यपुत्र) सुग्रीव से मिल कर (इंद्रपुत्र) बाली का वध किया था - सो इस बार उल्टा हुआ । 
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यह कथा कर्ण के सम्बन्ध में थी - फिर कभी ऐसी ही दूसरी कथाओं पर बात होगी । 

मंगलवार, 16 अप्रैल 2013

सौर मंडल ४: मार्स / मंगल ग्रह


धरती से अगली कक्षा में हैं (चौथा ग्रह ) मार्स / मंगल ग्रह ।

यह धरती से मिलता जुलता है । कई अवधारणायें कहती हैं कीस पर जीवन था लेकिन बाद में यह सूर्य से दूर चला गया जिसकी वजह से जीवन समाप्त हो गया । किन्तु कोई साक्ष्य नहीं हैं । धरती की ही तरह यहाँ रेगिस्तान ज्वालामुखी पहाड़, और ध्रुवीय हिमखंड हैं ।

यह लाल ग्रह भी कहलाता है क्योंकि इसके धरातल पर लोहे की बहुतायत से यह लाल रंग का प्रतीत होता है । वायुमंडल बहुत पतला है । इस पर सौर मंडल के सभी ग्रहों में सबसे ऊंचा पहाड़ ( ओलिम्पस मोंस) और गहरी खाई ( वेल्स मेरिनारिस) हैं । उत्तरी अर्धांश में ४% हिस्सा समतल बोर्लेअस बेसिन में है - जो की किसी इम्पेक्ट से बना माना जाता है ।

इसके दो उपग्रह हैं :  फोबोस और दीमोस - जो दोनों ही गोलाकार न होकर इर्रेगुलर आकार के हैं । कुछ वैज्ञानिकों का मानना है कि ये क्षुद्र ग्रह थे जिन्हें मार्स ने अपने गुरुत्वाकर्षण से बाँध कर अपना उपग्रह बना लिया ।

ध्रुवीय प्रदेशों से आती रौशनी के बदलाव और रेखाओं के कारण पहले माना जाता था कि मार्स पर तरल पानी है और ये रेखाएं नदियाँ या सिंचाई की नहरें हैं । लेकिन मरिनर ४ की छवियों से ज्ञात हुआ की ये तापमान के बदलावों के चलते बने दृष्टिभ्रम भर हैं । लेकिन प्रोब्स ने यहाँ पानी के कण और अवशेष पाए हैं और आज माना जाता है कि कभी यहाँ बड़ी मात्रा में जल खंड थे।

आज मानव के भेजे ३ उपग्रह मार्स के आस पास कक्षाओं में हैं और दो सतह पर ।

नाम : मार्स / मंगल ग्रह
रेडियस (त्रिज्या ) : 3396.2 km
मास (द्रव्यमान ):   6.4185x10^23kg
वोल्यूम (आयतन):   1.6318 x 10^11 km^3
डेंसिटी (घनत्व):   3.9335 g/cm^3
ग्रेविटी (गुरुत्वाकर्षण ): 0.38 g
तापमान :  210 K
एक दिन (अपनी धुरी पर घूमने का समय) : 1.02 earth days
एक वर्ष (सूर्य का एक चक्कर पूरा करने का समय) : 686.98 earth days

कक्षा (orbit ) का सेमी मेजर एक्सिस (बड़ा अक्ष) : 1.52 AU
उपग्रह : 2 ( आगे देखिये )

वायुमंडल का कोम्पोजीशन (संरचना ):
     95.32% कार्बोन डाय ऑक्साइड
     2.7% नाइट्रोजन
      1.6% आर्गन
     0.13% ऑक्सीजन
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उपग्रह १ : फोबोस

त्रिज्या : 11   किमी
दिन: 0.31 धरती के दिन
वर्ष: 7.7
अक्ष : ९३७७  किमी
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उपग्रह २ :डीमोस :


त्रिज्या : 6.2 किमी
दिन: 1.26 धरती के दिन
वर्ष: 29.8
अक्ष : 23460  किमी