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शुक्रवार, 13 अप्रैल 2018

time dilation at light velocity part 2 समय का फैलाव एवं लम्बाई में कमी भाग दो


भाग एक (समय कैसे धीमा हो जाता है?) पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

इस भाग में हम length contraction  या प्रकाश वेग से गतिमान वस्तु की लम्बाई में आई कमी पर बात करेंगे

यदि आपने पिछले भाग नहीं पढ़ा है तो ऊपर लिंक क्लिक कर के उसे पढ़ आइये - तब यह भाग आसानी से समझ पाएंगे। वहां हमने यह समझा कि समय का फैलाव कैसे होता है और कैसे स्पेशशिप में गया astronaut जब धरती पर लौटता है तो उसके हम उम्र लोग शायद बूढ़े हो चुके होंगे और वह  अब भी तकरीबन उसी उम्र का/ की  रह गया होगा।


यह सिर्फ इतना ही नहीं होता जितना मैंने पिछले भाग में कहा। यहां क्योंकि einstein के अनुसार दोनों ही आब्जर्वर एक दूसरे को गतिमान और स्वयं को स्थिर मान रहे हैं और दोनों समझ रहे है की उनकी घड़ी नार्मल और दूसरे की धीमी है - इससे तो दोनों को यही लगना चाहिए कि दूसरा कम उम्र का रह गया और मेरी उम्र नार्मल बढ़ी।  तबै जब वह व्यक्ति धरती पर लौटेगा तो कौन बूढ़ा होगा और कौन जवान ? यह twin paradox कहलाता है क्योंकि ऐसा तो नहीं हो सकता कि दोनों ही अपने को बूढ़ा और दूसरे को जवान पाएं लौटते हुए ? लेकिन ऐसा नहीं होता - स्पेस से लौटा व्यक्ति ही कम उम्र का रह जाता है।  यह gravity के कारण और समय की रफ्तार पर इसी गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव से होता है - यह बात किसी और पोस्ट में करेंगे । 

इस भाग में हम length contraction  या प्रकाश वेग से गतिमान वस्तु की लम्बाई में आई कमी पर बात करते हैं।

मैं जानते बूझते मुख्य पोस्ट में गणितीय समीकरण नहीं लिख रही हूँ - यह समीकरण बाद में हर पोस्ट में जोड़ दूँगी।  सिर्फ concept  या सिद्धांत भर समझने समझाने के प्रयास हैं ये पोस्ट्स। यह सब पढ़ने सुनने में अजीब लगता है क्योंकि हम आम जीवन में इस परिस्थिति को नहीं देखते हैं।  आम जीवन में कोई भी प्रकाश की गति पर नहीं चलता और आम गति पर रिलेटिविटी के सिद्धांत इतना कम असर करते हैं कि हमारे अनुभव से हमें यह पता ही नहीं चलता।

मान लीजिये "शिल्पा" धरती पर है और "नीता" एक प्रकाश गति के समीप की गति से उड़ते विमान पर।  यह भी मानिये कि  नीता के विमान के आगे और पीछे उसकी ही ठीक बराबर गति से चलते दो विमान और हैं - कुल तीन विमान हैं - ऐसे:

तीनों ही विमान प्रकाश के करीब की गति से उलटे हाथ से सीधे हाथ की तरफ बढ़ रहे हैं।  अब समय के एक पल में नीता एक प्रकाश बिंदु दोनों तरफ भेजती है - कि हम तीनों को एक साथ तीनों विमानों की गति बढ़ानी है।  क्योंकि प्रकाश की गति दोनों दिशाओं में समान है और नीता के लिए अपनी ही गति से उड़ते तीनों विमान स्थिर दिख रहे हैं। (X, Y, and Z) , तो नीता के लिए अपने आगे और पीछे वाले विमानों तक उसकी भेजी हुई किरण एक संग पहुंचेगी (दोनों तरफ बराबर दूरी है और प्रकाश गति भी दोनों तरफ बराबर है) तो नीता के दृष्टिकोण से तीनों विमान एक ही साथ अपनी गति बढ़ाएंगे - तो तीनों की दूरी पहले जितनी ही बनी रहेगी। (उदाहरण के लिए यदि आप ट्रेन के भीतर बैठे हैं तो आपके लिए आपके आगे वाला और आपके पीछे  वाला कम्पार्टमेंट आप ही की गति से चल रहा होने से स्थिर प्रतीत होता है , यदि आप दोनों तरफ एक साथ दो बॉल फेंकें तो वे दोनों एक साथ बराबर दूरी के अगले पिछले कम्पार्टमेंट को लगेंगी। तो नीता के लिए तीनों विमान एक साथ उतनी ही दूरी पर बने रहेंगे। जबकि प्लेटफॉर्म पर खड़े आपके मित्र के लिए आप तीनों ही स्थिर नहीं हैं बल्कि समान गति से आगे बढ़ रहे हैं)

अब धरती पर स्थिर खड़ी शिल्पा क्या देखेगी ? उस आब्जर्वर के लिए तो तीनों विमान गतिमान हैं - तो Y से निकली प्रकाश किरण जब X की तरफ बढ़ रही है , तब खुद X भी तो Y की तरफ बढ़ रहा है न ? तो प्रकाश किरण को X  तक पहुँचने के लिए कम दूरी तय करनी है। ऐसे ही  Z की तरफ प्रकाश बढ़ रहा है और Z  खुद भी Y से दूर जा रहा है।  तो उसे पीछे से दौड़ कर पकड़ने के लिए प्रकाश किरण को अधिक दूरी तय करनी होगी।  यह कुछ ऐसा है
अब शिल्पा की दृष्टि में विमान  X  को गति बढ़ाने का सिग्नल पहले मिला और Z  को  आखरी में।  तो X तुरंत गति बढ़ा देने से Y के कुछ पास पहुंचेगा और Y खुद भी गति बढ़ा कर  Z  के पास पहुंचेगा।  तो अब Z अपनी गति बढ़ाएंगे लेकिन तब तक तीनों की आपसी दूरी शिल्पा के दृष्टि कोण में पहले से कम रह गयी।  नीता के दृष्टिकोण में यह दूरी अब भी उतनी ही है।  यह देखिये :
 इसी तरह हम सोचें कि हर जहाज भीतर छोटे टुकड़े जहाजों से बना है - तो उनमे से हर एक को एक दूसरे के पास देखेगी धरती पर खड़ी शिल्पा - जबकि जहाज में बैठी नीता के लिए कोई बदलाव नहीं है क्योंकि उसकी दृष्टि में तीनों विमान स्थिर हैं।

यह है लम्बाई घटने  का सिद्धांत।

मजे  की बात यह है कि हर आब्जर्वर खुद को स्थिर और दूसरे को चलायमान देख रहा है।  तो नीता को शिल्पा का संसार छोटा होता दिख रहा होगा जबकि शिल्पा को नीता का। 

यह भी पैराडॉक्स ही है।

तो अब विमान में बैठी नीता यदि प्रकाश वेग से चली तो उसके लिए बाहरी संसार इतना छोटा हो जाएगा कि वह पल भर गुज़रने के पहले ही पूरा संसार देख लेगी।   और धरती पर रुकी शिल्पा के लिए नीता की समय घड़ी पूरी तरह धीमी होते होते रुक से गयी है - तो शिल्पा को लगेगा कि नीता ने (नीता की घड़ी के अनुसार) पल भर में पूरे संसार का चक्कर लगा लिया है।

यही है प्रकाश वेग पर चलते विमान की लम्बाई घटने का सिद्धांत।

शुक्रवार, 30 मार्च 2018

time dilation 1 समय का फैलाव भाग एक

क्या होता है समय का फैलाव ? न्यूटन और आईन्स्टीन के सिद्धांतों का आपसी प्रत्यक्ष विरोधाभास - कैसे और क्या और क्यों?

स्पीड या गति क्या है ? आप यदि कुर्सी पर बैठे यह ब्लॉग पढ़ रहे हैं तो आप स्थिर हैं या गतिमान ? यह इस पर निर्भर है कि आप किस reference या संदर्भ में अपने बारे में कह रहे हैं।  यदि आप अपने घर के बिस्तर पर बैठे हैं तो शायद आप कहें की आप स्थिर हैं और यदि आप कार की कुर्सी पर बैठे हैं और गाड़ी आपके ऑफिस से घर जा रहे हों तो आप शायद कहें की आप गतिमान हैं।  लेकिन क्या यह सच में सत्य है? आप घर के बिस्तर पर भी बैठे हों तब तो धरती पर हैं - और धरती स्वयं ही गतिमान है।  धरती अपनी धुरी पर भी घूम रही है और सूर्य के आस पास भी।  इसी तरफ सूर्य भी तो हमारी आकाशगंगा में गतिमान ही है न ? तो जब आप घर के बिस्तर पर भी बैठे हों तब भी आप गतिमान हैं।

गति या speed या velocity  - ये सब शब्द in motion  या चलायमान होने के संदर्भ में हैं। गति किसी न किसी रिफरेन्स के संदर्भ में ही डिफाइन या परिभाषित हो सकती है।  हम कहते हैं

v = d / t (यानी गति है दूरी प्रति समय इकाई )

 कुछ केस देखते हैं

१. तीन बच्चे हैं - पार्थ विजय और विनय।  पार्थ और विजय एक चलते ट्रक में खड़े हैं और विनय सड़क के किनारे उन्हें देख रहा है। ट्रक ५० किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से चल रहा है। पार्थ और विजय एक दूसरे को ठहरा हुआ देख रहे हैं और विनय उन्हें ५० किमी/घंटे से चलता देख रहा है। इसके उलट पार्थ और विजय अपने  परिपेक्ष्य से विनय को ५० किमी प्रति घंटे की गति से पीछे जाते देख रहे हैं।

२. पार्थ और विजय एक बॉल एक दूर की तरफ फेंकने पकड़ने का खेल खेल रहे हैं - दोनों के लिए बॉल ५ किमी / घंटे पर चलती है लेकिन विनय के लिए दूर जाती बॉल ५० +५=५५किमी/घंटे पर चलती दिखेगी और लौटती हुई ५०-५ =४५किमी/घंटे पर।

३. यानी कि गति की गणना देखने वाले की relative स्थिति पर है - यही सापेक्षता है।   (यह सब शून्य त्वरण या zero acceleration पर inertial frame में परिभाषित है। )

४. लेकिन प्रकाश की गति किसी भी निश्चित माध्यम में स्थिर रहती है - अंतरिक्ष के शून्य में यह तकरीबन ३००,०००,००० मीटर प्रति सेकंड है।

५ प्रकाश की गति रिफरेन्स या रिलेटिव फ्रेम पर निर्भर नहीं है।  स्थिर प्रेक्षक (stationary observer) के लिए भी प्रकाश उतनी ही गति से गतिमान है और चलते हुए प्रेक्षक लिए भी। और यदि  प्रकाश किसी गतिमान जहाज पर से भी चला हो तो उसके अपने वेग में कोई परिवर्तन नहीं आएगा - गति न तो बढ़ेगी न ही घटेगी - उतनी ही होगी जितनी थी। अर्थात ३००००००००मीटर प्रति सेकंड।

६ अब मानिये की एक जहाज समुद्र में रुका हुआ है और एक १००० किमी/घंटे की रफ्तार से चल रहा है - और एक ही समय पर दोनों से एक समान लेज़र बीम / किरण आगे की दिशा में दागी गयी - तो "दोनों" जहाजों पर खड़े प्रेक्षकों के लिए "दोनों" लेज़र बीम एक ही गति से बढ़ती दिखेंगी - इससे कोई फर्क नहीं पड़ेगा कि  कौन किस जहाज पर है या कौनसी बीम किस जहाज से चली है -   क्योंकि प्रकाश की गति स्रोत की गति से नही जुड़ती / घटती। बल्कि किसी भी लहर की गति उसके स्रोत की गति से नहीं जुड़ती।  अगर जुड़ती होती तो  - जब आप समुद्री जहाज़ में हैं तो आपके जहाज़ से उठी लहरें आपके आगे होतीं । जबकि हमेशा तेज चलते जहाज की लहरें उसके पीछे ही होती हैं। किसी भी जहाज के चित्र को देखिएगा :)

७. अब मानिये कि  २ समानांतर दर्पण हैं - दो अलग वाहनों में. दोनों ही वाहन रुके हुए हैं।  एक वाहन में पार्थ बैठा है दूसरे में विनय।  दोनों वाहन स्थिर हैं।  प्रकाश अपनी स्थिर गति से दोनों दर्पणों के बीच लगातार प्रतिबिंबित हो रहा है। ऐसे



 जहां "c " प्रकाश की गति है और t बीम के पहले दर्पण से चल कर दूर से टकरा कर वापस पहले तक लौट आने का समय है।

८. अब मानिये कि विनय की गाडी स्थिर है और पार्थ का जहाज चल रहा है।  अब पार्थ को तो अपने दर्पण अब भी वैसे ही दिख रहे हैं लेकिन विनय को पार्थ के दर्पण गतिमान दिखेंगे।  कुछ ऐसे



या ऐसे
                  

अब पार्थ तो उस जहाज /विमान/ स्पेस शिप में है तो उसे लग रहा है कि प्रकाश सिर्फ d +d =2d चला है लेकिन रुके हुए विनय को लगता है प्रकाश s=s=2s  दूरी चल कर वापस दर्पण पर पहुँच रहा है -  क्योंकि वह पार्थ के जहाज की गति के साथ प्रकाश को चलते देख रहा है।

९ अब यदि प्रकाश की गति नहीं बदल सकती और पार्थ और विनय के लिए दूरी अलग अलग है , तब यह कैसे संभव हो सकता है ? आइंस्टीन जी की हिसाब से यह होने का कारण है टाइम डायलेशन।  अर्थात - पार्थ के लिए समय धीरे गुज़रेगा।  और समीकरण होगा

C = 2D / TIME FOR PARTHA = 2D/ T_P
   = 2S / TIME FOR VINAY = 2S / T_V

अब जब दोनों के लिए C एक है तब यह कैसे हो सकता है ??? यह ऐसे हो सकता है की समय दोनों के लिए अलग हैं।  जब S  बड़ा है D से, और दोनों का C एक बराबर है - तब T_V अवश्य ही T_P से बड़ा होगा। 

१०. अर्थात - चलते हुए जहाज में बैठे पार्थ का समय , रुके हुए जहाज में बैठे हुए विनय के समय से धीरे गुज़रेगा।  यही समय का फैलाव है।  और इस पर कई वैज्ञानिक परीक्षण हो चुके हैं।  दो परफेक्ट अटॉमिक क्लॉक्स को एक साथ सिंक्रोनाइज़ कर के एक को धरती पर स्थिर रख दूसरी को विमान में घुमाया गया - तो लौटने के बाद विमान से आयी घड़ी हर बार इस गणितीय अपेक्षा के अनुसार ही स्थिर रखी घड़ी से पीछे निकली।  तो यह कोई मन की उड़ान नहीं है।  यह सच ही में होता है

वैसे इसके साथ ही स्पेस कंट्रेरक्शन भी होता है - लेकिन अभी इतना ही।  अगले भाग में इससे आगे चर्चा होगी।