फ़ॉलोअर

poetry लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
poetry लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

सोमवार, 18 अगस्त 2014

सभी को जन्माष्टमी की बधाईयाँ और शुभकामनाएं - होने वाले आठवें पुत्र से गीतोपदेशक तक का सफर

२०१२ में श्री कृष्ण जन्माष्टमी पर यह  थी (लिंक)

आज यह लिख रही हूँ

जन्माष्टमी का पर्व है आज
तो मन में आता है बस 
नन्हा माखन चुराता कान्हा 
यशोमती माई के डंडे के डर से  
भागता - सहमता - छिप जाता कान्हा।

याद आता है - गोपियों की धमकियों से 
चिढ़चिड़ाता नाचता नचाता कान्हा 
याद आता है राधा और नंदिनी के 
बुलावण को मुरली बजाता कान्हा। 

कभी गैया चराता तो 
कभी गोपों संग खिलखिलाता कान्हा 
कभी सेब वाली के फल ले 
मासूमियत से धन के बदल
(हीरों सम) चावल पोटली में भर लाता कान्हा। 

भूल जाता है तुम्हारा वह रूप 
कि जिसमे तुम सुनाते हो 
सर्वोपरि उपदेश - 
साकाम से निष्काम कर्म का सफर 
कर्म से कर्म योग 
अधर्म के नाश से 
धर्म के पुनर्स्थापन का सफर। 

भूल जाते है अर्जुन के वह 
विश्वरूप देख हुए भयभीत स्वर 
हे प्रभु - मुझे माफ़ करो 
मैंने तो आपको - 
हे सखा हे गोविन्द पुकारा। 
अपना सम सखा ही मान आपको 
बहुत निरादर व्यवहार किया। 

याद बस रहता है वह 
हँसता नन्हा निश्छल बालक 
जो बांसुरी की धुन पर 
सारे संसार को नचाता 
इंद्र की अतिवृष्टि से गोकुल को 
गोवर्धन उठा शरण देता बालक। 

तुम कौन हो कृष्ण ? कौन हो ? 
बोलो ? क्या वह बालक हो जो गैया चराता है ? 
या वो जो मुरली बजाता है ?
वो जो गोवर्धन उठाता है या वो जो रास रचाता है ?
वह फिर कौन है जो रुक्मिणी को हर ले जाता है 
या भामा की तुला में तुल जाता है ?

कौन हो तुम बोलो ? 
जो जरासंध का वध कराता है 
या अर्जुन को कर्म पथ बताता है ? 
कौन हो तुम कहो तो  कान्हा ?


गुरुवार, 2 जनवरी 2014

yogi patanjali non-violence osho

पतंजलि सूत्र :

जब योगी पूर्णतः योग में डूब जाता है तब उसके पास की सम्पूर्ण सृष्टि अहिंसक हो जाती है :

-------

योगी भर ही तो योगी है -
आस पास की सृष्टि तो नहीं ?
फिर यह सूत्र क्या कह रहा है ?
यदि ऐसा है तो क्यों ,
जीज़स को सलीब और ,
सुकरात को जहर मिला ?
वे लोग जो इन योगियों के समीप थे ,
क्यों अहिंसक न हुए ?
क्या जीज़स या सोक्रेट्स ,
सनातन सत्य प्राप्त -
सच्चे योगी नहीं थे ?

क्यों लोगों ने महावीर और ,
बुद्ध पर लगाए लांछन ?
क्या उन्होंने आत्मबोध को नहीं पा लिया था ?

क्यों हुए कृष्ण और राम जैसे ,
ब्रह्मज्ञान युक्त योगियों के  ,
आस पास इतने भयंकर युद्ध ?
क्या यह सूत्र झूठा है ?

न - पतंजलि सिद्ध योगी हैं ,
उनका सूत्र झूठा कैसे हो सकता है ?
फिर ?

हाँ - सुना है यह भी हमने ,
कि जब मीरा को आया था,
विष का प्याला ,
तो विष ने अपना स्वभाव बदल ,
खुद को अमृत कर लिया था ,
और सांप ने स्वयं को बदल दिया
पुष्प माला में ।

सुना है मैंने कि ,
देवव्रत ने बुद्ध पर ,
बड़ा शिलाखंड गिरवाया था ,
लेकिन ठहर गया था शिलाखंड ,
बुद्ध को छूने से पहले ,
अपने स्वभाव के विपरीत ।

जब बुद्ध पर पागल हाथी लपकाया गया ,
तो वह शांत भाव से हुआ ,
चरणों की शरण।

सुना है बहुत कुछ जो ,
हुआ इन सिद्ध योगियों के निकट ,
जो सृष्टि के स्वाभाविक ,
नियमों के विरुद्ध हुआ ,
लेकिन ,
इन्हे चमत्कार मान लिया गया।

सुना मैंने यह भी है कि ,
एक व्यक्ति ने ,
लाखों लोगों के सामने ,
एक प्रयोग किया था ,
एक सांड के दिमाग में ,
बिठाया एक इलेक्ट्रोड ,
उसे बटन दबा कर क्रोधित किया गया ,
और वह लपका व्यक्ति को मारने ,
फिर कुछ फीट की दूरी पर ,
दूसरा बटन ,
और क्रोधित सांड एकदम शांत हुआ ,
आशंकायें मुस्कुराईं और ,
व्यक्ति को कुछ न हुआ।

तो क्या योगी के आस पास ,
निर्मित होता है कोई तेजमण्डल?
जो ऐसा ही कुछ प्रभाव करता है ,
आस पास की निर्जीव सजीव सृष्टि पर ?

जो पत्थर हैं और हैं पशु ,
उनके मस्तिष्क ,
स्वाभाविक हैं।
तो उनपर असर करता है ,
सतयोगी का प्रभा मंडल ,
वे आईने हो जाते हैं और ,
उनमे दिखती है योगी की ,
शांत छवि।
वे सम्पूर्ण अहिंसक हो जाते हैं।
उनका स्वभाव स्व न रह कर  ,
योगी स्वभाव का प्रतिरूप हो उठता है ,
योगी उन्हें नहीं बदलता ,
उनके आईने साफ़ होने से ,
वे स्वयं योगी का,
प्रतिबिम्बन करने लगते हैं।

लेकिन मानव ?
अनेकों आइनों पर धूल पड़ी है।

जो शांत और खुले मनुष्य हैं ,
वे ऐसे योगी के समीप ,
शांत हो जाते हैं ,
सम्बोधि भी प्राप्त कर लेते हैं।

लेकिन जिनके आईने धूलि धूसरित हैं ,
वे बिम्ब नहीं बनाते ,
वे स्वयं ही धूल में लिपटे ,
चुनाव करते हैं ,
हो वह हिन्दू आस्थाओं की धूल ,
या मुस्लिम ईमान की ,
धारणाओं में लिपटे मानव ,
प्रकाश को स्वयं तक आने ही नहीं देते।

यीशु का प्रेम सन्देश ,
तोते की तरह रट लेने वाले ,
नहीं मान सकते ,
युद्ध को उकसाते कृष्ण को ,
योगी।

और ,
धर्म के नाम पर
निरीह जीवों और जनों की ,
हत्या करना सीखे लोग ,
नहीं मान सकते महावीर के ,
अहिंसा के सन्देश को।
तो वे महावीर को,
योगी मान ही नहीं सकते।

अपने मानक योगी के ,
अपने विश्वासों के विरुद्ध हुई बातो के ,
तर्कसंगत औचित्य ढूंढ लेते हैं।
और दूसरे विश्वासों के योगियों के ,
वे नरक भेज देते हैं ,
अपने मानस मंडल में।

वे कृष्ण को मानें तो ,
रासलीला के अनेक तर्कसंगत कारण ,
गिना देते हैं क्योंकि ,
उनके आईने की धूल कहती है ,
कि योगी नहीं कर सकता रासलीला।
क्योंकि उनकी धूल के अनुसार तो ,
शारीरिक प्रेम सिर्फ पाप है।
फिर वे अपने मन में ही ,
अपने ईश्वर को - ढाल लेते हैं ,
और
उसके आस्था के विरुद्ध दीखते कर्मों के ,
कारण आरोपित करते हैं।

योगी यदि पूर्ण रूपेण ,
यॊगस्थित हो ,
तो अहिंसक हो जाती है उसके ,
उपवास करने वाली सम्पूर्ण सृष्टि।

कृष्ण की गोपिकाएं नाचने लगती हैं ,
सिंह और छौने संग आ जाते हैं।
अग्नियाँ शीतल हो जाती हैं ,
सीता के गुजरने के लिए।

राम के वनमार्ग के ,
कठोर कंटक कोमल पुष्प हो उठते है
तैरने लगते हैं सागर पर पत्थर।

मोज़ेस के संग जाते ,
ईजिप्शियनों से बच भागते ,
इज़राइलियों के लिए ,
सागर राह देता है ,
और उनके जाते ही ,
फिर पूर्ववत हो उठता है।

कृष्ण के स्पर्श से ,
कुब्जा सीधी हो उठती है ,
गुरुनानक जिधर पैर करें ,
उसी ओर ,
दीनवालों को काबा दीखता है।

लेकिन धूलभरे मानव आईने ,
अपने विश्वासों की धूल लिए ,
योगी के प्रकाश की ऊर्जा को ,
प्रतिबिंबित नहीं करते।
वे उसे ,
क्रोधाग्नि की ऊर्जा में ,
रूपांतरित कर लेते हैं ,
और करते हैं योगी पर हमले।

योग सूत्र सच ही है ,
किन्तु परन्तु  लेकिन ....

-----------------

ओशो रजनीश के वचनो से











मंगलवार, 21 फ़रवरी 2012

सच कडवा होता है ? क्या सचमुच ?

... हमारी राह सत्य से होकर ... गुज़रे, न गुज़रे ...

कई लोगों से सुना है,
कई किताबों में पढ़ा है
"सच तो कड़वा ही होता है"
क्या सचमुच ?

मैंने तो यह भी पढ़ा है कि
"God is truth " और यह कि
-- "सत्यम शिवम् सुन्दरम"
और "सत चित आनंद" फिर
"न असतो विद्यते भावो, न अभावो विद्यते सतः"

फिर
सत्य कडवा कैसे होता होगा ?
है यदि
तो क्यों सारी दुनिया
उसे खोजती फिर रही है ?

नहीं
सत्य कडवा नहीं होता
सत्य मीठा भी नहीं होता,
सत्य बस है,
रंगहीन, गंधहीन, स्वादहीन
न वह ठंडा है, न गर्म
वह न कट सकता है,
न जल सकता  है
न भीग सकता है कभी,
न कभी सूख सकता है ।

जो इसे कड़वा समझते हैं,
जो इसे मीठा कहते हैं
दोनों ही नहीं जानते
क्योंकि यह दोनों से परे है ।

कड़वा कब लगता है सच ?
जब सत्य के पथ पर
हमारी आकांक्षाएं
अवरोधित होती हैं
हमारे स्वार्थ टकराते हैं ।
मीठा कब है ?
जब विराट का वह नन्हा टुकड़ा
जो हमें दीखता है
हमारे सुखानुभव को संबल देता है।

पानी तो पानी है
हल्दी मिला दो तो पीला,
नील मिला दी तो नीला
न नीला न पीला
पानी तो है बस बस पानी ।

यदि सत्य मुझे मीठा लगता हो
तो मिठास मेरे भीतर है
यदि कड़वा
तो कडवाहट भी मेरी ही
सत्य बस सत्य है ।

हम कहते हैं - हम सत्य के साथ हैं ।
नहीं
हम सिर्फ अपनी राह पर हैं ।
सत्य बस है
हमारी राह सत्य से होकर
गुज़रे, न गुज़रे
इससे सत्य को, उसकी भव्यता को
कोई फर्क नहीं पड़ता
हाँ - हमें ज़रूर फर्क पड़ता है ........
तभी तो हमें सत्य मीठा और कड़वा दिखता है ......

.....................................................

इन पंक्तियों को आदरणीय अर्चना चावजी जी ने अपनी आवाज़ दी है - आप यहाँ क्लीक करने पर इन्हें सुन सकते हैं :


बुधवार, 28 दिसंबर 2011

Does God Exist? - Christian story .... nice .....


The Atheist and the Bear

An atheist (one who does not beleive in God) was taking a walk through the woods. 'What majestic trees! What powerful rivers! What beautiful animals!', he said to himself. 
As he continued walking alongside the river he heard a rustling in the bushes. Turning to look, he saw a 7 foot grizzly charging towards him. 
He ran as fast as he could up the path. Looking over his shoulder he saw that the bear was closing in on him. His heart was pumping frantically and he tried to run even faster. 
He tripped and fell on the ground. He rolled over to pick himself up but saw the bear raising his paw to take a swipe at him.
At that instant the atheist cried out: 'Oh my God!...'
Time stopped.
The bear froze.
The forest was silent.
It was then that a bright light shone upon the man and a voice came out of the sky saying:
'You deny my existence for all of these years, teach others I don't exist and even credit creation to a cosmic accident.  Do you expect me to help you out of this predicament? Am I to count you as a believer?'
The atheist looked directly into the light.
'It would be hypocritical of me to suddenly ask you to treat me as a Christian now, but perhaps, could you make the BEAR a Christian?'
'Very well, 'said the voice. The light went out, and the sounds of the forest resumed.
And then the bear lowered his paw, bowed his head and spoke: 'Lord, bless this food which I am about to receive and for which I am truly thankful, Amen.'
............. courtesy - will and guy ....