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रविवार, 29 नवंबर 2015

शिवपुराण २१ : नंदिकेश्वर और अत्रीश्वर


हमने पहले ज्योतिर्लिंगों के विषय में पढ़ा। इनके अतिरिक्त भी शिव आराधना में बहुत से तीर्थ सुविख्यात हैं। आज हम नंदिकेश्वर और अत्रीश्वर तीर्थ स्थलों पर चर्चा करते हैं।
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नंदिकेश्वर :
कर्णकी नामक शहर में एक ब्राह्मण रहते थे । वह अपने दो पुत्रों को अपनी पत्नी को सौंप कर वाराणसी की यात्रा को गए और वहां से उनकी मृत्यु की ही खबर आई। ब्राह्मणी ने बड़े यत्न से पुत्रों का लालन पालन किया और उनके विवाह किये। ब्राह्मणी वृद्धा हो चुकी थीं किन्तु शरीर के अति शिथिल हो जाने पर भी उनके प्राण न छूटते थे। एक दिन उनके बड़े पुत्र ने सप्रेम पूछा कि माँ आपकी क्या इच्छा है जो अधूरी है ? तब माँ ने कहा कि पुत्र मैं वाराणसी जाना चाहती थी किन्तु जा न सकी। माता ने पुत्रों से वचन लिया कि उनका अस्थि विसर्जन वाराणसी में ही किया जाए और शांत मन से विदा हुईं।

अंतिम संस्कार के बाद बेटा "सुवधि" माँ की अस्थियां ले वाराणसी को चला। राह में वह एक ब्राह्मण के घर रुका। सुवधि ने देखा कि जब ब्राह्ण गाय को दुहने आया तो बछड़ा माँ को न छोड़ता था। तब ब्राह्मण ने एक लकड़ी से मार कर बछड़े को दूर किया और गौ को दूहा। ब्राह्मण के जाने के बाद सुवधि ने देखा कि शुभ्र गाय अपने बछड़े से बोली कि तुझे मारने से मैं बहुत क्रोधित हूँ और कल मैं इस ब्राह्मण के पुत्र को मार दूँगी।

अगले दिन ब्राह्मण का बेटा आया तो गाय ने अपने सींगों से उसे मार डाला। लेकिन यह ब्रह्महत्या हुई। इससे गाय का रंग तुरंत सफ़ेद से काला हो गया। सुवदि हैरान थे। उन्होंने देखा कि गाय बाहर चली और वे उसके पीछे गए। उन्हें बहुत आश्चर्य हुआ जब उन्होंने देखा कि गाय जाकर नदी में डुबकी लगा कर निकली और फिर से धवल हो गयी थी। इसका अर्थ इस जगह ब्रह्महत्या का पाप भी धुल गया था। ब्राह्मण अचरज करते लौटने लगे तो एक स्त्री प्रकट हुईं और उनसे प्रश्न किया कि कहाँ जाते हो। जब सुवधि ने वाराणसी की बात कही तो स्त्री ने कहा मैं ही गंगा हूँ और यह बहुत सशक्त तीर्थ है। तुम अपने माँ की अस्थियां यहीं विसर्जित करो।

सुवधि ने यही किया और तुरंत अपनी माँ को आकाश में प्रकट देखा। वे बहुत प्रसन्न थीं और बोलीं कि अच्छा हुआ तुमने यह किया। अब मैं स्वर्ग जा रही हूँ। यहां एक कन्या ऋषिका ने शिव जी की तपस्या की थी जिसके प्रभाव से यह स्थल अति पवित्र तीर्थ हुआ है। और वे अंतर्ध्यान हुईं।

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अत्रीश्वर तीर्थ

कमद नामक वन में सौ वर्षों तक वर्ष न होने से भयंकर सूख पड़ा था। इसके लिए अत्रि मुनि और उनकी पत्नी अनुसूया ने कठोर तप किया। कई वर्षों के तप के बाद अत्रि जी की समाधि टूटी। उन्हें प्यास महसूस हुई और अनुसूया जी पति के लिए जल लेने गयीं। तब उनके सम्मुख गंगा जी प्रकट हुईं और कहा कि वे प्रसन्न हैं।तब सती अनुसूया जी ने उन्हें वहीँ सरोवर में रहने को कहा। फिर उस सरोवर का जल वे पति के लिए लेकर गयीं। अमृतमय जल पीने पर अत्रि जी पत्नी सहित वहां आये और उन दोनों के तप के पुण्य प्रभाव से गंगा जी उसी सरोवर में वहां बस गयीं।

उधर शिव जी ने प्रकट होकर अनुसूया जी से वरदान मांगने को कहा। अनुसूया जी ने शिव जी को सदा वहां बसने को कहा। इस वजह से यहाँ शिव जी का निवास है और यह पुण्यभूमि है।

गुरुवार, 30 जुलाई 2015

शिवपुराण २० : गणेश shivapurana20 ganesh

कैलाश पर्वत पर पार्वती माता के कक्ष के द्वार की रक्षा भी शिवजी के ही गण करते थे। लेकिन शिव जी किसी भी समय आएं उनके गण उन्हें भीतर जाने से न रोकते थे और इस कारण पार्वती जी असहज महसूस करती थीं। उनकी सहेलियों को भी यह अच्छा न लगता था और वे माता को समझातीं कि उनकी द्वारसेवा को उनका अपना गण होना चाहिए। तब एक दिन माँ ने मिटटी से (कहीं कहा गया है कि अपनी उबटन से) एक सुंदर बालक की मूरत गढ़ी और उसमें प्राण प्रवाहित कर दिए। बालक ने प्रणाम किया और पूछा - "हे माते - मेरे लिए क्या आज्ञा है ?"उमा जी ने पुत्र को गणेश नाम दिया और एक दण्ड प्रदान करते हुए कहा कि तुम द्वार की रक्षा करो और किसी को भी भीतर न आने देना। बालक द्वार की रक्षा करने लगा और माता जी स्नान को चली गयीं।

इधर शिव जी आये और हमेशा की तरह भीतर जाने लगे। बालक गणेश ने उन्हें रोक कर कहा कि आप भीतर नहीं जा सकते क्योंकि मेरी माता की आज्ञा नहीं है। इस पर शिव जी हँसे और बालक से बोले कि यह मेरी पत्नी का कक्ष है और मैं कभी भी भीतर जा सकता हूँ। मैं शिव हूँ और इस कैलाश का अधिपति हूँ। किन्तु गणेश ने कहा कि मैं सिर्फ अपनी माता को जानता हूँ , शिव कौन हैं यह मुझे नहीं मालूम। आप भीतर नहीं जा सकते हैं। शिव जी थोड़े क्षुब्ध हुए और अपने गणों को इस उद्दंड बालक को राह से हटाने को कहा। गणों ने प्रयास किया किन्तु गणेश ने उनकी दण्ड से पिटाई कर दी :) इस पर भी शिव जी भीतर जाने लगे तो गणेश ने उन्हें भी डंडा लेकर मार दिया।

अब देवतागण और ब्रह्मा विष्णु जी भी वहां आये किन्तु ब्रह्मा जी जब बालक को समझाने गए तो बालक ने उन्हें भी मारना शुरू कर दिया , वे वापस आ गए। देवताओं और शिवगणों ने बालक पर हमले किये किन्तु बालक के आगे सब हार गए।  उधर शक्ति माता भी इस युद्ध को अपनी प्रतिष्ठा से जोड़ कर देख रही थीं और पुत्र को अस्त्र शस्त्र प्रदान करती जा रही थीं।

इधर विष्णु जी ने शिव जी से कहा कि यह कोई साधारण बालक नहीं लगता इसे चाल से हराना होगा। तब विष्णु जी ने गणेश पर हमला किया और जब गणेश उनसे युद्ध कर रहे थे तब पीछे से शिव जी ने त्रिशूल से उनका सर काट दिया। त्रिशूल से कटा सर कहीं दूर खो गया और बालक का धड़ मृत होकर गिर पड़ा।

इस प्रकार धोखे से अपने पुत्र की मृत्यु होती देख माता कुपित हुईं और उन्होंने करोड़ों शक्तियां भेज दीं जो देवताओं को खाने लगीं और चहुँ ओर विध्वंस करने लगीं। देवता घबरा गए और माता को मनाने के लिए ब्रह्मा विष्णु महेश्वर से विनती की। किन्तु माता ने कहा कि जब तक मेरा पुत्र पुनर्जीवन न किया जायेगा तब तक मैं शांत नहीं होउंगी। तब शिव जी ने सेवकों को कहा कि आप जाइए और जो पहला जीव दिखे उसका सर लेकर आइये। संयोग से पहला प्राणी एक हाथी मिला और वे लोग उसका सर काट कर ले आये। शिव जी ने सर जोड़ कर बालक को पुनर्जीवित किया किन्तु माता ने कहा कि बालक इससे अधिक का अधिकारी है। तब गणेश "गणपति" (गणों के अधिपति) नियुक्त हुए और साथ ही यह निश्चय हुआ कि वे प्रथम पूज्य होंगे। कोई भी शुभ कार्य उनकी पूजा से ही आरम्भ हो सकेगा।

परिवार सुखपूर्वक कैलाश पर रहता था। एक बार कार्तिकेय और गणेश में पहले किसका विवाह हो इस पर बहस छिड़ गयी। इसकी पूरी कथा इस भाग में है (लिंक)

जारी ………




मंगलवार, 28 जुलाई 2015

शिवपुराण १९ : कार्तिकेय और ताड़कासुर

शिव जी और पार्वती जी के विवाह (लिंक) के उपरांत नवदम्पत्ति लम्बे समय तक हिमवान जी के ही घर में रहे। फिर एक दिन शिव जी ने हिमालय जी और मैना जी से आज्ञा ली और अपनी संगिनी श्री पार्वती जी सहित कैलाश पर लौट आये। दोनों लम्बे समय तक बहुत सुखपूर्वक दाम्पत्य जीवन का आनंद लेते हुए कैलाश पर निवास करते रहे। इधर तारकासुर के संहारक के आने के लिए देवगण व्याकुलता से प्रतीक्षा करते थे। उन्होंने ब्रह्मा जी से सहायता मांगी और वे सब ब्रह्मा जी को संग लेकर विष्णु जी के पास पहुंचे और उनसे कहा कि विवाह को इतना समय बीतने के बाद भी शिवपुत्र का जन्म अब भी प्रतीक्षित ही है। देवताओं ने विष्णु जी से प्रार्थना की कि वे शिव जी के पास जाएँ और उन्हें अपने विवाह के पीछे के देवकल्याण हेतु की याद दिलाएं। विष्णु जी नवदम्पत्ति के नवजीवन में विघ्न नहीं डालना चाहते थे किन्तु देवताओं के आग्रह पर देवताओं सहित शिवधाम को आये।

देवगणों ने शिव जी के सम्मुख अपनी प्रार्थना की। शिव जी के वीर्य की कुछ बूँदें छिटक कर धरती पर गिरीं और अग्निदेव ने तुरंत पक्षी बन उन्हें चुग लिया। पार्वती अत्यंत क्रुद्ध हुईं कि मेरी होने वाली संतान की आस में आप लोगों ने विघ्न पहुंचाया है। इस बात पर क्षुब्ध होकर श्री पार्वती जी ने देवताओं को श्रापित किया कि उनकी पत्नियां भी निःसंतान ही रहेंगी।

अग्निदेव तो तेज और ऊष्मा के ही स्वामी देव हैं किन्तु शिव वीर्य के तेज ताप को वे सहन नहीं कर पा रहे थे तब उन्हें शिव जी ने अनुमति दी कि वे इस वीर्य को एक तेजस्विनी स्त्री के गर्भ में स्थापित कर सकते हैं। अग्निदेव ने वीर्य को ६ स्त्रियों के गर्भ में उनके रोमकूपों के माध्यम से पहुंचाया। किन्तु वे भी इसे न धारण कर सकीं , और हिमालय पर बर्फ की ठंडक में इसे त्याग दिया। किन्तु इन बूंदों के ताप ने हिमालय की न ही सिर्फ बर्फ को पिघलाया , बल्कि पत्थरों को पिघला दिया और हिमालय की धरा धातु सी दहकने लगीं। तब इन्हे हिमालय नंदिनी श्री गंगा जी के बहाव सौंपा गया किन्तु जल में तपन आने से शीतल गंगा भी उबल पड़ीं।

गंगा जी की धारा के पास की ईखों सरकंडों के बीच मार्घशीर्ष के शुक्ल पक्ष की षष्ठी के रोज तेजस्वी बालक का जन्म हुआ। उधर से गुज़रती कृतिकाओं की नज़र बालक पर पड़ी और वे सब उस बालक को अपना दूध पिलाना चाहती थीं और आपस में लड़ पड़ीं। तभी बालक के ६ मुख हुए और सभी माताओं ने प्रसन्नतापूर्वक दुग्धपान करवाया। कृतिकाओं ने अपना दूध पिला कर बालक को पाल पोस कर बड़ा किया। इस कारण बालक "कार्तिकेय" हुए। श्री विश्वामित्र जी ने बालक को "गुहा" नाम दिया और ब्रह्मज्ञान भी दिया - साथ ही आशीष दिया कि वे ब्रह्मर्षि होंगे। अग्निदेव ने बालक को शक्ति नामक अस्त्र प्रदान किया। गुहा क्रौंच पर्वत पर गए और अपने अस्त्र से प्रहार किया। पर्वत बिखरने लगा और उसमे वास करने वाले असुरों ने बालक पर हमला किया जिन्हे बालक ने आसानी से मार दिया। बालक की वीरता सुन कर इंद्र उन पर हमला करने आये। इंद्र ने बालक के पर वज्र प्रहार किया तो दाहिने पक्ष से "शाख" प्रकट हुए, बाहिने अंग से "विशाख" उत्पन्न हुए और छाती पर प्रहार करने से "नैगम" हुए। गुहा और इन तीनों ने इंद्र की तरफ कदम लिए तो देवसेना भाग खड़ी हुई।

एक दिन पार्वती माँ ने शिव जी से प्रश्न किया कि उस दिन जो वीर्य की बूँदें धरा पर छिटकी थीं उनका क्या हुआ। तब शिव जी ने देवताओं से प्रश्न किया और कार्तिकेय के बारे में जान कर अति प्रसन्न हुए। तब शिव जी ने अपने शिवगणों को कृतिकाओं के पास से पुत्र को लाने भेजा और माताओं से अनुमति लेकर कार्तिकेय कैलाश आये। कैलाश पर उत्सव हुआ और देवताओं ने कार्तिकेय जी को अपने अपने अस्त्र और शक्तियां भेंट कीं। शिव जी ने ब्राह्मणों से कार्तिकेय जी का राज्याभिषेक करवाया और तबसे कार्तिकेय कैलाशपुरी के अधिपति हुए।

एक बार नारद जी कार्तिकेय जी के पास आये और यज्ञ के लिए निर्धारित हुई बकरी के खो जाने की बात कही। उन्होंने कहा कि मैंने संकल्प लिए है और वह बकरी न मिली तो यज्ञ अधूरा रह जाएगा। कार्तिकेय जी ने बकरी तलाशी तो वह धरती पर न थी। उसे खोजते हुए वे विष्णुलोक पहुंचे जहां उसने ऊधम मचा रखा था। वह उनपर अपने सींगों से हमला करने लगी। तब कार्तिकेय जी उसकी पीठ पर सवार हुए और तीनों लोकों से होते हुए उसे वापस ले आये। किन्तु नारद जी ने जब बकरी मांगी तो उन्होंने अखा कि आपका यज्ञ सफल हो ही गया है - अब आप इस बेचारी के प्राण न लीजिये। तब नारद जी प्रसन्न मन से वहां से चले गए।

इधर कार्तिकेय के शौर्य को देख देख कर देवता बहुत प्रसन्न थे। आत्म विश्वास से परिपूर्ण होकर देवताओं ने कार्तिकेय जी से देव सेना के प्रधान बनने का आग्रह किया। उनके नेतृत्व में देवताओं ने तारकासुर पर हमला किया किन्तु उसके सामने देवता फीके थे। इंद्र और सभी लोकपाल उसके आक्रमणों से बेहोश हो गए। श्री वीरभद्र और विष्णु जी भी पराजित हुए। तब कार्तिकेय जी आगे आये तो तारकासुर ने छोटे बालक के पीछे छिपने के लिए देवताओं को धिक्कारा और कहा कि यदि यह बालक युद्ध में मेरे हाथो मार जाए तो आप ही उत्तरदायी होंगे। किन्तु जब युद्ध हुआ तो मुकाबला बराबरी का लगता था। दोनों योद्धा लहू लुहान हुए। फिर कार्तिकेय जी ने शक्ति के प्रहार से तारकासुर का वध किया।


जारी …

बुधवार, 22 जुलाई 2015

शिव पुराण १८ : केतकी और चम्पक के फूल


केतकी और चम्पक के फूल शिव जी को नहीं चढ़ाये जाते। इस भाग में इन फूलों से ही सम्बंधित तीन कथाएं पढ़ते हैं।

१: ब्रह्मा, विष्णु, शिवलिंग और केतकी
२. सीता और केतकी
३. नारद, ब्राह्मण और चम्पक

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१: ब्रह्मा विष्णु शिवलिंग और केतकी

(brahmaa vishnu altercation and shivalinga and the ketaki flower )

पहली कथा है कि प्रलय के बाद जब सृष्टि नहीं हुई थी तब एक बार विष्णु जी और ब्रह्मा जी में बहस छिड़ गयी कि दोनों में कौन बड़ा है, कौन पूजनीय है । उन महाशक्तियों की क्रोधित बहस से संसार डोलने लगा। देवगण दौड़े हुए शिव जी के पास गए और उनसे सहायता मांगी।

शिव जी उन दोनों के मध्य प्रकाश लिंग के रूप में प्रकट हुए और गंभीर शब्द हुआ कि आप दोनों इस प्रकाश स्तम्भ का ओर छोर खोजिये। जो खोज ले वही महानतम होगा।

तब ब्रह्मा जी ने श्वेत हंस का रूप लिया और विष्णु जी ने श्वेत वराह का। हंस रूपी ब्रह्मा ऊपर को उड़ चले और वराह के रूप में विष्णु जी नीचे को गए। लम्बे समय बाद भी दोनों को कोई अंत न मिला। तब विष्णु जी लौट आये। किन्तु ब्रह्मा जी जब ऊपर जाते थे तो उन्हें ऊपर से गिरता केतकी का फूल मिला।ब्रह्मा जी ने केतकी से पूछा क्या तुम शीश से आई हो? केतकी ने कहा इस प्रकाश लिंग का कोई अंतिम सिरा है ही नहीं, यह अनादि अनंत है। जहां से मैं गिरा हूँ उससे भी बहुत ऊपर तक यह प्रकाश स्तम्भ दीखता है। कहाँ तक है इसका कोई पता नहीं।

ब्रह्मा जी ने केतकी से कहा कि हमारी स्पर्धा में मैं हारना नहीं चाहता। सो मैं कहूँगा कि मैंने सिरे को पा लिया और तुम्हे वहीँ से लाया हूँ। तुम साक्ष्य देना। केतकी मान गई। वे दोनों वहां लौटे जहां विष्णु जी थे। ब्रह्मा जी की बात और केतकी के प्रमाण पर विश्वास कर विष्णु जी ने ब्रह्मा जी को पूज्य स्वीकार किया। तब वहां शिव जी प्रकट हुए। उन्होंने कहा कि जब हमारा कोई सिरा है ही नहीं तब आपने सिरा कैसे पाया ? पूज्य होने के लोभ में आपने हमारे अंत को पाने के संदर्भ में असत्य कहा। सो अब धरती पर आप की पूजा नहीं होगी। और केतकी ने भी इस झूठ में समर्थन दिया था सो यह फूल हमारी अर्चना में कभी स्वीकार्य नहीं होगा। तब से केतकी के फूल शिव जी को नहीं चढ़ाये जाते।

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कथा २: सीता और केतकी :
(Seeta and the ketaki flower)

कथा सुनाते हुए श्री रोमहर्षण जी ने कहा कि शिवपूजा में कभी भी केतकी या चम्पक प्रयुक्त नहीं किये जाने चाहिए। मुनियों ने कारण पूछा तब उन्होंने यह कथाऐं कही।

जब श्री राम सीता और लक्ष्मण वन को चले गए तो यह दुःख श्री दशरथ जी के लिए असह्य हो गया। जीवन जीने की जिजीविषा त्याग उन्होंने स्वर्ग को प्रस्थान किया। यह खबर चित्रकूट पहुंची जहां श्री राम पत्नी और भाई सहित पर्णकुटी में निवास कर रहे थे। श्री राम दशरथ जी के ज्येष्ठ पुत्र थे और उन्हें अपरा अनुष्ठान करने थे। राम जी ने लक्ष्मण जी को सामग्रियाँ लेने गाँव भेजा किन्तु वे समय से न लौटे। दोपहर होती देख श्री राम स्वयं ही सामग्री लेने चले किन्तु उन्हें भी देर हो गयी। दोपहर से पहले संस्कार करना आवश्यक था और दोनों भाई अब तक न आये थी। सीता बहुत चिंतित थीं। आखिर समय बीतता देख सीता जी ने स्वयं ही संस्कार करने का निर्णय लिया। उन्होंने फाल्गु नदी में स्नान किया और भीगे वस्त्रों में मिटटी का दिया जलाकर पूर्वजों को पिंड अर्पित किया।

तुरंत आकाश वाणी हुई कि हे सीता , हम तुम्हारे चढ़ावे से प्रसन्न हैं और तुम्हे आशीष देते हैं (जो नारीवादी कहते हैं कि भारतीय संस्कृति स्त्री को श्राद्ध आदि का अधिकार नहीं देती वे कृपया ध्यान दें - सीता जी ने स्वयं यह अनुष्ठान किया था)। तब आकाश से दो हाथ प्रकट हुए जिन्होंने सामग्री स्वीकार की। सीता जी ने अपने आप को सम्हाला और आकाशवाणी से प्रश्न किया कि आअप कौन हैं ? शब्द हुआ कि हम ही अयोध्या पति दशरथ हैं और आपके श्वसुर हैं। हम संस्कार से तृप्त हैंआपका तर्पण स्वीकार कर रहे हैं। सीता ने चकित हो कर पूछा - हे पिताश्री। आपके सुपुत्र श्री राम और लक्ष्मण मेरी इस बात पर कैसे विश्वास करेंगे कि आकाश से हाथ आये और उन्होंने पिंडदान स्वीकारा ? वे हँसेंगे कि मैंने कैसे ऐसे हाथों को हमारे पिता दशरथ जी के हाथ मान लिया ?
श्री दशरथ बोले कि जब यह सत्य है ही तो उन्हें मानना ही होगा। फिर भी तुम चाहो तो तुम्हारे चार साक्षी होंगे। ये फाल्गु नदी जो बाह रही है , वह गाय जो वहां चर रही है , ये अग्नि जिससे तुमने यह संस्कार किया , और यह केतकी की झाडी जिसमे केतकी के फूल खिले हैं। इसके बाद वाणी थम गयी और हाथ अंतर्ध्यान हुए ।

शीघ्र ही श्री राम और लक्ष्मण सामग्री लेकर लौटे और उन्होंने सामग्री सीता को देकर जल्दी पकाने को कहा , क्योंकि बहुत समय हो चला था। बार बार कहने पर भी वे दोनों न माने कि सीता जी संस्कार कर चुकी हैं। चारों साक्षियों ने भी मना कर दिया कि उन्होंने कुछ नहीं देखा। तब सीता जी ने पति के कहने पर वह सामग्री पकाई और तब श्री राम तर्पण करने लगे। दोबारा आकाशवाणी हुई कि सीता श्राद्ध कर तो चुकी हैं और हम उनके तर्पण को स्वीकार भी कर चुके हैं। तब आप दोबारा हमें क्यों पुकारते हैं? किन्तु श्री राम को विश्वास नहीं हुआ और उन्होंने साक्ष्य माँगा । तब वाणी ने कहा कि जब हम सूर्यवंशी हैं तो आप सूर्यदेव से ही पूछ लें। तब सूर्यदेव ने कहा कि सीता सत्य कह रही हैं और चारों साक्षी असत्य कह रहे थे (नारीवादी ध्यान दें - श्री सीता जी स्त्री हैं - उनकी बात सत्य और अग्नि और गौ जैसे साक्षियों को अविश्वसनीय माना गया)।
श्री राम और लक्ष्मण जी ने श्री सीता जी से उन पर अविश्वास जताने के लिए क्षमा मांगी। अब सीता जी ने उनकी बात तो स्वीकारी किन्तु स्वयं को झूठा साबित करने दिए चारों साक्षियों को दंड में श्राप दिया ।

१. फाल्गु नदी श्रापित हुई कि अब वह सिर्फ भूगर्भ में बहेगी, बाहर नहीं।
२. केतकी कभी शिव जी को नहीं चढ़ाई जायेगी , चढ़ाई भी जाए तो अस्वीकृत होगी।
३. गाय ने अपने मुंह से झूठ कहा था। तो गाय का का मुंह अब से अशुद्ध माना जाएगा (बाकी शरीर पहले ही की तरह शुद्ध मान्य होगा - दूध, गोमूत्र और गोबर भी। )
४. अग्निदेव भी भय से काँप रहे थे कि उन्हें क्या श्राप मिलेगा। सीता जी ने कहा कि आप अब से हर वस्तु को अविवेकी होकर ग्रहण कर लेंगे - चाहे वह शुद्ध हो या अशुद्ध।

तबसे केतकी के फूल शिव जी को नहीं चढ़ाये जाते।
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चम्पक का पेड़ और नारद
(Narada and the champak tree )

गोकर्णं में एक प्रसिद्ध शिव मंदिर है। एक बार नारद जी वहां आये और वे शिव जी की पूजा करना चाहते थे। राह में उन्होंने एक चम्पक का पेड़ देखा जो बहुत सुंदर फूलों से लदा हुआ था। नारद प्रसन्न मन से उसे देख रहे थे कि ये फूल शिव जी के लिए लेकर जाएँ। तभी एक ब्राह्मण वहां आया किन्तु नारद जी के सामने फूल तोड़ने में संकोच में पड़ गया। नारद जी ने पूछा - हे ब्राह्मण , आप कहाँ जाते हैं ? ब्राह्मण ने झूठ ही कह दिया कि मैं भिक्षा मांगने जा रहा हूँ। तब नारद जी मंदिर को गए और उनके जाते ही ब्राह्मण ने सारे फूल तोड़ लिए। अपनी डलिया को वस्त्र से ढंक कर वह लौटने लगा तो मंदिर से लौटते नारद जी से फिर भेंट हुई। नारद जी ने फिर पूछा अब कहाँ जाते हो ? तो फिर ब्राह्मण ने फिर झूठ कहा - घर जाता हूँ। नारद जी को विश्वास न हुआ। उन्होंने चम्पक पेड़ से प्रश्न किया - क्या उस ब्राह्मण ने तुम्हारे फूल लिए ? चम्पक ने कहा - "क्या? कौन ब्राह्मण? आप किसकी बात कर रहे हैं ? मैं किसी ब्राह्मण को नहीं जानता। "

तब नारद जी वापस मंदिर गए जहां उन्होंने वे ही फूल शिवलिंग पर देखे। तब उन्होंने वह प्रार्थना करते दूसरे भक्त से पूछा कि ये फूल कौन लाया था?

उस व्यक्ति ने उत्तर दिया - वही दुष्ट ब्राह्मण लाया था जो अभी आपके आगे आगे आया। वह रोज़ चम्पक पुष्पों से शिव पूजा करता है और शिव जी की उस पर कृपा है। इस शिव कृपा के कारण उसने गोकर्ण के राजा को अपने चंगुल में ले रखा है और बहुत धन सम्पत्ति बनाई है। वह दुसरे ब्राह्मणों का अपमान भी करता है।

तब नारद जी ने शिव जी से प्रश्न किया कि आप क्यों ऐसे दुष्ट का साथ देते हैं ? शिव जी बोले कि यदि कोई चम्पक पुष्पों से मेरी पूजा करे तो मैं कुछ नहीं कर सकता - मुझे उसकी पूजा स्वीकार करनी ही होगी।
तब नारद जी ने सोचा ऐसे दुष्टों को शिव जी से दूर रखना आवश्यक है। उन्होंने झूठ बोलने वाले चम्पक को श्रापित किया कि अब कभी चम्पक फूल शिव जी को नहीं चढ़ेंगे। और उस ब्राह्मण को अगले जन्म में राक्षस होने का श्राप मिला। अगले जन्म में राक्षस हुआ वह ब्राह्मण शिव जी के ही हाथों से मृत्यु को प्राप्त हुआ और पुनः ब्राह्मण हुआ।

शनिवार, 4 जुलाई 2015

upsc परीक्षा में लड़कियों ने बाजी मारी। क्यों?

यह पोस्ट पूरीपढ़े बिना ओपिनियन न बनाइये कि मैं क्या कह रही हूँ।

सब जगह पढ़ रही हूँ आईएस में टॉप 4 लड़कियाँ/ पहले भी ऐसा पढ़ती सुनती रही कि यहाँ लड़कियां वहां लड़कियाँ।ऐसे कवरेज है जैसे कोई जश्न की बात हो। लेकिन मुझे यह कुछ ठीक नही लगता।क्यों? 

क्योंकि यदि यह कोई गर्व की बात नहीं कि माँ हमेशा इस बात पर खुश हो कि बेटे ने बेटी को मात दे दी ; तो उसी तरह हर बार इस पर खुश होना भी गलत है कि बेटी ने बेटे को। नारी बराबरी होनी चाहिए लेकिन इस का अर्थ बेटों को नीचा बना कर बेटियों पर फख्र करना नहीं है। 

फिर इस साल किसी बोर्ड रिज़ल्ट पर टीवी चैनलों पर मैदान मारने सा सेलिब्रेशन था कि "आखिर इस बार पछाड़ ही दिया लड़कों ने लड़कियों को" - यूँ लगा कि कोई "शत्रु" बरसों से "हमें" हराता रहा आखिर हम ने उसे मात दे ही दी। दुःख हुआ।

आपको कभी यह ख्याल नहीं आया कि क्यों? लड़कियां आगे क्यों निकलती हैं हर बार? और इस बार ऐसा क्यों?

नारीवाद और पुरुषवाद से इतर सोचिये। क्यों? क्यों आखिर??

इसलिए कि वे प्रेशर में हैं। वे अपने आप को प्रूव कर रही हैं।उनपर शायद sabconscious प्रेशर है कि उन्हें पढ़ने का "मौक़ा?" देकर उनके परिवार/ समाज/ समाज सुधारक/ आदि आदि ने जो "अहसान स्त्री जाति" पर किया है उसे उन्हें सिद्ध करना है। उन्हें प्रूव करना है कि वे इस लायक हैं। 

वे क्यों अव्वल आती हैं बार बार सोचिये? probability से तो ऐसा नहीं होना चाहिए न? क्यों नहीं वे पढाई को in my stride ले पातीं? क्यों उनपर अव्वल आने का इतना दबाव है कि बार बार बार बार बार यह पैटर्न रिपीट हो? 

लड़कियों - इस प्रेशर को परे करो। हाँ!!! ज़रूर आओ अव्वल। बहुत अच्छा है। हर बार आओ तो भी बहुत अच्छा है। लेकिन हर बार आना "जरूरी" नहीं। एन्जॉय यूर लाइफ। पढाई करो कि यह भली है। लेकिन अव्वल आने का प्रेशर न हो तो और अच्छी।

और मित्रों। मैं ईश्वर नहीं। मैं गलत हो सकती हूँ। मुझे बस ऐसा लगा तो मैंने लिखा। इस पोस्ट को नारीवाद या पुरुषवाद से न जोड़ें। दोनों बच्चे हमारे हैं। क्या लड़की क्या लड़का। मानती हूँ यह कोइन्सिडेंस हो सकता है किन्तु प्रोबेबिलिटी लॉज़ नहीं कहतीं कि कोइन्सिडेंस से हर बार एक ही सम्भावना पूर्ण होती रहे। कहीं कुछ गड़बड़ तो है ही।सोचियेगा? 

प्रोबेबिलिटी थियरि से दोनों आउटकम बराबर होने चाहिए।

When any "random" event is done in "fair" circumstances with "2" possible outcomes; the probability of occurrence of "any one of the two outcomes" is 1/2

90% occurrence of any one of two possible outcomes suggests that there is an unfairness built in somewhere. We need to analyse this. Instead of being almost proud of it.


Every year every exam - no. There is something definitely and seriously wrong here. Which we are trying to avoid looking at by convincing ourselves that it is normal.

शुक्रवार, 26 जून 2015

शिव पुराण १७ : / घुुष्णेश्वर /घृष्णेश्वर / घुश्मेश्वर ज्योतिर्लिंगम्

इस ज्योतिर्लिंग की भौगोलिक स्थिति के बारे में भी अलग अलग मत हैं . कोई इन्हें महाराष्ट्र के औरंगाबाद के पास बताते हैं तो कोई कहते हैं कि श्री घुश्मेश्वर राजस्थान के शिवालय (शिवाड ) ग्राम में विराजमान है . यह ज्योतिर्लिंग स्वयम्भू है अर्थात यह किसी के द्वारा निर्मित नहीं किया गया , अपितु स्वयं उत्पन्न है . 

कथाएँ कहती हैं कि दक्षिण भारत में देवगिरी नामक पर्वत  पर एक ब्राह्मण "ब्रह्मवेत्ता सुधर्म" अपनी पत्नी "सुदेह" के संग वास करते थे।  उन दोनों के कोई संतान न थी जिसके कारण सुदेह दुखी रहती थीं।  उन्होंने कई व्रत उपवास किये और भी बहुत कुछ किया किन्तु संतान न हुई। सुधर्म ने ईश्वर का नाम लेकर दो पुष्प पवित्र अग्नि के समक्ष रखे और अपने मन में एक के संतान होने और दूसरे के संतान न होने के साथ सम्बन्ध जोड़ा।  उन्होंने सुदेह जी से एक पुष्प चुनने को कहा और सुदेह ज ने जो पुष्प उठाया वह संतान न होने वाला था।  तब सुधर्म जी ने मान लिया कि हमारे संतान न होगी और इस बात को स्वीकार कर शांत रहे।  उन्होंने सुदेह जी को भी नियति को मान लेने के लिए समझाया किन्तु वे बहुत दुखी हो गयीं और इसे स्वीकार न कर पा रही थीं। सुदेह को हमेशा पुत्रहीन होने से अन्य स्त्रियों द्वारा अपमानित महसूस होता।

ब्राह्मणी सुदेह चाहती थीं कि सुधर्म दूसरा विवाह कर लें किन्तु वे न मानते थे।  सुदेह अपनी भांजी (किसी कथा में भतीजी तो कहीं बहन लिखा आता है ) घूष्णा (कहीं नाम घुश्मा तो कहीं घृष्णा लिखा आता है ) से बहुत स्नेह रखती थीं।  उन्होंने अपने पति से प्रार्थना की कि घूष्णा से मेरा इतना प्रेम है , इससे तो आप विवाह कर लीजिये , इसकी संतान मेरी अपनी जैसी ही होगी और मैं उससे भी प्रेम कर सकूँगी।  सुधर्म जी ने सुदेह जी को समझाया कि अभी तुम्हे ऐसा लगता है । किन्तु जब संतान होगी तब अवश्य तुम्हे ईर्ष्या होगी और तुम अब से अधिक दुखी हो जाओगी।  किन्तु सुदेह न मानीं और ज़िद कर के दोनों का ब्याह करा दिया।

घूष्णा जी परम शिवभक्तिनि थीं।  वे रोज प्रातः शिव उपासना करतीं और १०१ शिवलिंग बना कर उनकी पूजा अर्चना करतीं।  फिर पास ही के सरोवर में उन शिवलिंगों ससम्मान विसर्जन कर देतीं।  जब एक लाख शिवलिंग बन चुके तब घूष्णा ने एक सुंदर पुत्र को जन्म दिया।  कुछ समय तो सब ठीक रहा किन्तु अब सुदेह जी को लगने लगा कि पुत्रवती घूष्णा बदल गयी है और पति भी मेरी उपेक्षा कर उसी से अधिक प्रेम करने लगे हैं।  जैसा सुधर्म जी ने पहले कहा था, सुदेह अब ईर्ष्यालु हो चलीं और घूष्णा में उन्हें अपनी सौत नज़र आने लगी।

ईर्ष्या की मारी सुदेह ने एक रात, जब सब सोये हुए थे, चाक़ू से काट कर उस बालक की ह्त्या कर दी और उसे उसी ताल में फेंक दिया जिसमे घूष्णा शिवलिंगों का विसर्जन करती थी। सुबह रोज की तरह घूष्णा पूजा करने लगीं। इधर दासी (कहीं कहीं बहु लिखा मिलता है) ने बालक को न पाया और उसके बिछौने को रक्त रंजित पाया तो सब रोने लगे।  दासी ने आकर घूष्णा जी को बताया तब वे शिव जी की अर्चना कर रही थीं।  इतनी बड़ी बात सुन कर भी घूष्णा जी ने आपा न खोया और कहा कि , जो बालक मुझे शिवकृपा से मिला उसकी रक्षा भी शिव जी ही करेंगे।  और वे अपनी पूजा तटस्थ रह कर करती रहीं।

पूजा के बाद जब वे शिवलिंग विसर्जन को गयीं तो उनका पुत्र सरोवर से निकल उनकी तरफ आता मिला।  इस पर भी वे निर्मोही ही रहीं और शिव में ही उनका ध्यान रहा।  शिव जी प्रकट हुए और उन्होंने उन्हें बताया कि किस प्रकार सुदेह जी ने यह घोर अपकर्म किया।  किन्तु घूष्णा जी ने सुदेह जी के लिए शिव जी से क्षमा मांग ली।  प्रसन्न होकर शिव जी ने उनसे एक वरदान मांगने को कहा।  तब घूष्णा जी ने उनसे वहीँ रहने को कहा और वे घुश्मेश्वर / घुष्णेश्वर / घुुष्णेश्वर / घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग के रूप में स्थापित हुए।

एक और कथा है कि , एक परम शिवभक्त "घुश्म" को यहां एक साप की बाम्बी में खजाना मिला था इस धन से उन्होंने यह घुष्णेश्वर मंदिर और शिखरशिंगणपुर का सरोवर बनवाया।  बाद में श्रीमती अहल्याबाई होल्कर (इंदौर  की महारानी) ने इस मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया था।

  

गुरुवार, 25 जून 2015

शिवपुराण १६: रामेश्वरम रामेश्वर रमेस्वरम राम्मिसेरम ज्योतिर्लिंग


रामेश्वरम नामक शहर/ क़स्बा तमिल नाडु के रामनाथपुरम जिले में स्थित है।  यह पम्बन या रामेश्वरम नामक द्वीप है जो भारतीय उप महाद्वीप से विलग है और श्री लंका के मनणार द्वीप से ५० किमी की दूरी पर है। पम्बन या रामेश्वरम द्वीप भारत की मुख्य भूमि से पम्बन सेतु द्वारा जुड़ा हुआ है।

कथा है कि यह वही जगह है जहां से श्री राम ने अपनी प्रिया सीता जी को रावण से छुड़ाने के लिए सेतु बनाया था।  एक कथा कहती है कि श्री राम ने यहाँ सेतुबंध से पूर्व शिवलिंग स्थापित कर शिव जी की उपासना की थी।  लेकिन दूसरी कथा कहती है कि सीता जी को वापस ले जाते हुए श्री राम यहां शिव पूजन करना चाहते थे।  वे यहां भारतवर्ष का सर्वोच्च शिवलिंग स्थापित करना चाहते थे, जिसके लिए उन्होंने हनुमान जी को हिमालय से शिला लाने भेजा।  किन्तु समय अधिक बीत जाने से सीता माई ने छोटे शिवलिंग की स्थापना की और तत्पश्चात वही ज्योतिर्लिंग हुआ।  दोनों ही कथाएँ कही सुनी जाती हैं।  रामेश्वरम हिन्दू "चार धाम" में से एक है और वैष्णव और शैव दोनों ही द्वारा पवित्र माना जाता है , और पूजित है।

चौदहवीं सदी में अलाउद्दीन ख़िलजी के सेनापति मलिक कफ़ूर पंड्यान राजाओं को हराते हुए यहाँ तक पहुँच गया था और यहां मस्जिद बनाई।  बाद में पन्दहवीं सदी में पंड्यान राजाओं ने फिर से यह जगह जीत ली और इसके उपरान्त यह विजयनगर साम्राज्य का हिस्सा हुआ। मदुरै नायकों में से अलग हुए सेतुपति वंशजों को सेतु के संरक्षक माना जाता है।

रामनाथस्वामी मंदिर बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक है।  यहाँ के स्तम्भ नायक शैली के हैं।  (मदुरै मीनाक्षी अम्मा मंदिर में भी यही शैली है) मंदिर का गलियारा १७ से २२ फ़ीट चौड़ा और २५ फ़ीट ऊंचा है। रामेश्वरम में चौदह तीर्थ हैं।  इनमे २४ प्रमुख हैं।  इनमे भी २२ मंदिर की परिसीमा में ही हैं।  इन जलाशयों में स्नान करना तपस्या के बराबर माना जाता है।  इनमे एक है "अग्नितीर्थम" - बंगाल की खाड़ी।  एक और है "जड़ायु / जटायु तीर्थम" - माना जाता है कि जटायु ने सीता को बचाने के लिए रावण से युद्ध किया और रावण ने उनके पंख काट दिए - तब वे इस तीर्थ में गिर पड़े थे।  "विलूंदी तीर्थम" का शाब्दिक अर्थ है "धंसा हुआ धनुष।  कहते हैं सीता जी की प्यास बुझाने के लिए श्रीराम ने यहाँ अपना धनुषसागर सागर में आप्लावित किया था। इसके अतिरिक्त हनुमान तीर्थम, सुग्रीव तीर्थम , लक्ष्मण तीर्थम प्रमुख हैं। यही पास ही गन्धमादन पर्वत भी है जहां श्री राम चरण के निशान हैं।

द्वीप का दक्षिणी छोर है धनुष्कोडी।  यहां कोटान्द्रमास्वामी मंदिर है। १९६४ के चक्रवात तूफानों में धनुष्कोडी समुद्र में डूब गया था किन्तु मंदिर अक्षुण्ण रहा।  यह नगर मध्य से १८ किमी दूरी पर है।  कहते हैं यहीं विभीषण ने श्री राम के सम्मुख आकर आत्म समर्पण किया था। चार धाम (बद्रीनाथ, पुरी, द्वारका और रामेश्वरम) यात्रा में रामेश्वरम का प्रमुख महत्व है।  बनारस की यात्रा भी यहाँ आये बिना अपूर्ण मानी जाती है।

यहाँ यह कहे बिना नहीं रहा जा सकता कि "सेतुसमुद्रम" नामक समुद्री नहर बनाने का प्रोजेक्ट विचाराधीन है।  लेकिन हिन्दू धार्मिक दल और पर्यावरण सेवी दल इसका विरोध कर रहे हैं। भारत के उच्चतम न्यायालय में यह केस २०१० से रुका हुआ है क्योंकि भारत सरकार ने यह स्पष्ट नहीं किया कि यह राष्ट्रीय स्मारक है या नहीं है।

 मंदिर   

 स्तम्भ / गलियारा

  अग्नितीर्थ   जटायु तीर्थ 

मंगलवार, 23 जून 2015

शिवपुराण १५ : नागेश्वर जगेश्वर ज्योतिर्लिंग


कथा है कि दारुक नामक एक राक्षस था जिसकी स्त्री का नाम दारुकी था।  दारुकी ने अपनी तपस्या से माता पार्वती को प्रसन्न किया और वरदान पाया कि वह जहां जाए वहीँ वन हो जाएगा।  इस वरदान के प्रभाव से दारुक बहुत उत्पात करने लगा।  वह चाहे जहां लोगों / ऋषि / मुनियों को परेशान करता, यज्ञ भंग करता , और फिर दारुकी के संग चला जाता।  वन उत्पन्न हो जाने से उसे कोई न पकड़ पाता। उसके उत्पात से परेशान होकर लोग और्वा ऋषि की शरण में गये।  उन्होंने राक्षस जोड़े को श्राप दिया कि जैसे ही वे धरती पर कोई हिंसा करेंगे, वे स्वयं विनष्ट हो जायेंगे।

राक्षसों के सम्मुख बड़ी समस्या आन पड़ी।  देवताओं को यह पता चला तो उन्होंने हमला कर दिया।  राक्षस अब न लड़ें तो देवता उन्हें नष्ट कर दें और लड़ें तो श्राप से नष्ट हो जाएँ।  यह स्थिति भांप कर राक्षस सागर में प्रविष्ट हुए।  माँ पार्वती  के आशीष से सागर में वन उत्पन्न हो गया जहां वे सुखपूर्वक रहने लगे , और यहां ऋषि श्राप का भी भी न रहा।  जल मग्न रह कर ही वे शिकार पकड़ते।  बस्ती की बस्ती पकड़ लेते और क्रूरता करते।

एक बार उनकी पकड़ में एक वैश्य "सुप्रिय " को भी पकड़ लिया , जो बड़ा शिवभक्त था। उस शिवभक्त वैश्य ने वहीं शिवलिंग स्थापित किया और "ॐ नमः शिवाय" का उच्चारण प्रारम्भ किया।  दारुक उसे मारने दौड़ा तो शिव जी तत्क्षण प्रकटे और पाशुपत अस्त्र से उन राक्षसों को खत्म किया (अन्य कथा के अनुसार शिव जी ने सुप्रिय को पाशुपत दिया जिससे उस शिवभक्त ने ही राक्षसों का विनाश किया) . इसके पश्चात सुप्रिय की प्रार्थना पर शिव जी ने वहीं ज्योतिर्लिंग रूप में निवास किया।

एक कथा है मंदिर के उलटे होने की।  कहते हैं कि नामदेव जी एक बार यहां कीर्तन करते थे।  तब किसी ने उन्हें राह छोड़ने को कहा - कि वे भगवान के दर्शन की राह में अड़ रहे हैं।  तब नामदेव जी ने उन व्यक्ति को कहा कि आप ही मुझे ऐसे जगह कर दें जहाँ प्रभु मार्ग न हो।  गुस्साए लोगों ने उन्हें मंदिर के दक्षिण में धकेल दिया लेकिन जब दर्शन करने लौटे तो द्वार घूम कर नामदेव की तरफ हो गया था।  इसीलिए मंदिर में नंदी जी की मूरत और मंदिरों की तरह मंदिर के प्रवेश द्वार पर नहीं बल्कि उलटी दिशा में हैं। इसीलिए इन्हे "औंधा" नागनाथ भी कहते हैं।

नागेश्वर ज्योतिर्लिंग की भगोलिक स्थिति के बारे में भी अलग अलग मत हैं।  कोई इन्हे महाराष्ट्र के औंध में बताते हैं , तो कोई उत्तराखंड के जगेश्वर , और कोई कोई द्वारका के पश्चिम में नागेश्वर को ज्योतिर्लिंग बताते हैं।


 औंधा नागनाथ महाराष्ट्र
  नागेश्वर द्वारका



 जगेश्वर दारुक वन अल्मोड़ा उत्तराखंड





शनिवार, 6 जून 2015

शिवपुराण १४: बैजनाथ वैद्यनाथ बैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग

बैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग मंदिर या बैद्यनाथ धाम, शिव जी के द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से एक है।  यह झारखंड के देवगढ़ में है , और मंदिर परिसर में कुल २१ मंदिर हैं (इस मंदिर की भौगोलिक स्थिति के बारे में कुछ मतभेद हैं - आगे यह चर्चा है)।

कहा जाता है कि रावण ने शिव जी को प्रसन्न करने के लिए यहीं पर कडा तप किया था । शिव जी प्रकट न हुए तब रावण ने अपने सर काट काट कर अपने आराध्य को चढ़ाना शुरू किया। दस में से नौ सर कटने के बाद जब रावण अपना दसवां सर काटने को हुआ तब शिव जी प्रकट हुए।  उन्होंने "वैद्य" का रूप धार कर घायल रावण का इलाज़ किया इसीलिए वे वैद्य नाथ कहलाये। कहते हैं यहां प्रार्थना करने पर सब मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं इसलिए इसे "कामनालिंग" भी कहते हैं।  भक्त पवित्र गंगाजल सुल्तानगंज से लाते हैं और अभिषेक करते हैं।  श्रावण और भाद्रपद महीनों में यहां मेले लगते हैं।

इसके बारे में यह भी कहा गया है कि यह श्मशान भूमिं पर है और जलती चिताओं की राख शिव जी अपने शरीर पर मलते हैं।  यहां कापालिक साधनाएं भी होती हैं।  

इस ज्योतिर्लिंग की भौगोलिक स्थिति के बारे में थोड़ी अनिश्चितता है।  जहाँ एक तरफ यह 
१. देवगढ़ (झारखंड) में बैद्यनाथ रूप में माना गया है , वहीं इसे
२.  महाराष्ट्र में परली के वैजनाथ और इसे 
३. हिमाचल प्रदेश के बैजनाथ के रूप में भी कहा जाता है।

 परली महाराष्ट्र वैजनाथ मंदिर 
 देवगढ़ झारखंड का बैद्यनाथ मंदिर 
 हिमाचल प्रदेश का बैजनाथ मंदिर 

हिमाचल प्रदेश वाले शिवलिंग के बारे में कथा है कि रावण ने तपस्या कर शिव जी को प्रसन्न किया और माँगा कि वे उसके साथ चलें।  तब श्री शिव जी ने लिंग रूप लिया और रावण से कहा कि तुम इस शिवलिंग को जहां चाहे ले जाकर स्थापित कर लो।  किन्तु यह ध्यान रखना कि रास्ते में कहीं इसे भूमि पर न रखना क्योंकि एक बार रखने पर यह स्थापित हो आएगा और फिर न हिलेगा।  रावण जब शिवलिंग ले जा रहा था तब देवताओं को चिंता हुई कि यदि शिवलिंग लंका में रहे तो रावण को हरा पाना असम्भव होगा।  उन्होंने विचारविमर्श किया और वरुणदेव से प्रार्थना की।  वरुणदेव रावण के पेट में प्रविष्ट हुए और रावण को बेचैनी हुई।  वह जानता था कि शिवलिंग भूमि पर नहीं रखना है।  तब वह किसी को खोजने लगा और उसे एक ब्राह्ण  दिखे।  उसने उन्हें शिवलिंग कुछ पल पकड़ने को कहा और जब वह लौटा तो ब्राह्मण शिवलिंग को इतनी देर न उठा पानेका कारण कह कर कारण भूमि पर रख चुके थे।  रावण ने शिवलिंग को उठाने और आगे बढ़ने की कोशिश की तो शिवलिंग को उठा पाना संभव न हो पाया।  तबसे यह शिवलिंग यहीं स्थापित है। रावण ज्ब तक जीवित था रोज़ वहां आकर अर्चना करता था।  किन्तु रावण की मृत्यु के बाद लम्बे समय शिवलिंग यूँ ही उपेक्षित रहा।  तब एक "बैजू" नामक शिकारी को ये मिले और उसने उन्हें अपना इष्टदेव मान पुनः पूजा आरम्भ की  और स्थापित किया। इसलिए ये "बैजू के नाथ" या बैजनाथ नाम से प्रसिद्ध है। 

गुरुवार, 4 जून 2015

शिव पुराण १३ : त्रियम्बकेश्वर ज्योतिर्लिंग गोदावरी गौतमी गंगा


त्रियम्बकेश्वर मंदिर महाराष्ट्र के नाशिक जिले में स्थित हैं। गोदावरी नदी के उद्गम इस मंदिर के प्रांगण में एक कुशावर्त नामक कुण्ड है जो गोदावरी नदी का उद्गम स्थल कहा जाता है। गोदावरी नदी यहां से चल कर करीब डेढ़ हज़ार किलोमीटर का सफर करने के बाद आंध्र प्रदेश से होती हुई बंगाल की खाड़ी में प्रविष्ट होती हैं।

शिव पुराण में कहा गया है कि एक बार भयंकर सूखा पड़ा।  ब्रह्मपर्वत नामक पर्वत पर महर्षि गौतम अपनी पत्नी अहल्या के साथ निवास करते थे।  गौतम ऋषि और अहल्या जी ने वहां दस हज़ार वर्षों तक पति के संग तपस्या की थी । उस समय जब भयंकर सूखा पड़ा तो अकाल आया और पशु पक्षी और मनुष्य भूख प्यास से मरने लगे। तब श्री गौतम जी ने वरुण देव से प्रार्थना की कि वहां वर्षा करावें।  किन्तु यह वरुण देव के अधिकार क्षेत्र से बाहर था क्योंकि वे जल सामग्री के देव हैं किन्तु वर्षा और मेघ इंद्रदेव का अधिकार क्षेत्र है।  तब गौतम जी ने उनसे कहा कि वहां सदा बहने वाली झील हो जिससे उस स्थल पर कभी जल संकट न आये।  यह प्रदान कर वरुण देव अंतर्ध्यान हुए।  

देवी अहल्या पति सहित वहां रहतीं थीं ।  कहते हैं कि गौतम सुबह बीज बोते और दोपहर फसल काटते और सबऋषि मुनियों और साधारण जनों को भोजन करवाते।  इससे उनके पुण्य बहुत बढ़ने लगे और इंद्र को चिंता हुई।  तब इंद्र ने वहां वर्षा करवाई जिससे ब्राह्मण अपना भोजन के लिए गौतम पर ही निर्भर न रहें और गौतम का पुण्य और न बढे। किन्तु सब ठीक हो जाने पर भी गौतम जी ने आदर सहित मुनियों को वहीँ रहने को कहा और अपना पुण्यकार्य करते रहे। 

इधर वरुण देव द्वारा प्रदान की गयी पवित्र झील का जल सभी प्रयुक्त करते।  दूसरे मुनियों की पत्नियां वहां जातीं और जल लेटिन।  जब गौतम महर्षि के शिष्य वहां जाते तो वे उन्हें भगा देतीं।  यह जानने पर अहल्या जी स्वयं जल लेने जाने लगीं।  अन्य मुनिपत्नियां न चाहती थीं कि वे वहां से जल लें और वे उनपर अनेक व्यंग्य आदि करतीं किन्तु अहल्या जी चुप चाप जल लेकर लौट आतीं।  मुनि पत्नियां अपने पतियों से अहल्या की बुराई कहतीं।  धीरे धीरे सब यह मानने लगे कि गौतम और अहल्या ही गलत हैं।  तब सब मुनियों ने गणेश जी का आवाहन किया और उनसे माँगा कि गौतम और अहल्या को यहां से भगाए दिया जाए।  गणेश जी ने यह वरदान दे दिया। 

इधर शिव जी की पत्नी पार्वती थीं किन्तु गंगा जी शिव जी की जटाओं में बसी होती हैं।  पार्वती को यह अच्छा न लगता था , और शिव जी गनगा को अलग करने पर राजी न थे।  तब गणेश जी ने अपनी माता को सुख देने और मुनियों को दिए वरदान की पूर्ती करने के लिए एक स्वांग रचा।  पार्वती जी की एक सहेली थीं - जया।  गणेश जी ने उन्हें गाय का रूप लेने को कहा और कहा कि जब गौतम तुम्हे भगाने आएं तो मरने का स्वांग रचना।  तब जाया गाय बन कर गौतम जी के खेतों में घुस गयीं।  गौतम जी ने उन्हें हटाने के लिए कुशा घास से मार तो गाय मर कर गिर पड़ी।  यह देख कर मुनियों ने "गौहत्या" का आरोप लगा कर कहा कि ऐसे पापी के संग हम न रहेंगे।  हम जा रहे हैं।  गौतम जी ने उनसे प्रार्थना की कि वे वहीँ रहें और प्रायश्चित्त का तरीका पूछा।  

मुनियों ने कहा कि उन्हें पूरी पृथ्वी की परिक्रमा करनी होगी , फिर एक महीने कठिन तप और ब्रह्मपर्वत  सौ प्रदक्षिणाएँ। इसके पश्चात सौ पवित्र सरोवरों में स्नान।  यह सब गौतम जी और अहल्या जी ने किया ।  शिव जी उनके सम्मुख प्रकट हुए और उन्हें वरदान मांगने को कहा।  गौतम जी ने यह माँगा कि वे पार्वती जी सहित सदा वहां निवास करें , और गंगा जी इस क्षेत्र में बहें। 

तब शिव जी त्रियंबक लिंग के रूप में स्थापित हुए। शिव जी चाहते थे कि गंगा जी गौतम जी के मांगे वरदान के अनुरूप वहां प्रकट हों किन्तु गंगा जी शिव जी के सर चढ़ी थीं और उतरना न चाहती थीं।  क्रोधित हो शिव जी ने तांडव नृत्य किया और अपनी जटाएं पटकीं , जिससे गंगा जी छिटक गयीं।  किन्तु केशों से छिटके पानी के छींटों की तरह गंगा जी यहाँ वहां प्रकटतीं और लुप्त हो जातीं।  गौतम जी उनमे स्नान कर अपना गौहत्या का पाप धोना चाहते थे किन्तु गंगा इतनी देर कहीं न रुकतीं कि वे स्नान कर सकें।  तब गौतम जी ने ज्योतिर्लिंग के समीप ही "कुशा" घास में उन्हें बाँध दिया (आवर्त कर दिया) इसीसे इस सरोवर का नाम "कुशावर्त" हुआ। इस कुण्ड में बंधने के बाद गंगा जी वहां से बहने लगीं। इसीलिए गोदावरी जी को "गौतमी गंगा" भी कहते हैं। 

किन्तु शिव जी मुनियों के स्वांग को जानते थे और उन्हें दंड देना चाहते थे।  गौतम महर्षि ने उन मुनियों को क्षमादान दिलवाया। गोदावरी / गौतमी गंगा के माहात्म्य की कई कथाएं आगे आएंगी। किन्तु इनमे स्नान कर लाभ लेने वालों में श्री बलराम जी, चैतन्य महाप्रभु, आदि की कथाएं बड़ी प्रसिद्ध हैं। गोदावरी जी के किनारे ही बारह वर्षों में एक बार पुष्कर मेला लगता है।  



त्रियम्बकेश्वर मंदिर











गोदावरी जी का उद्गम - मंदिर के पास कुशावर्त सरोवर। 

शुक्रवार, 13 फ़रवरी 2015

शिव पुराण १२ : काशी विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग shivpurana12 kashi vishwanath jyotirlinga

शिव पुराण १२ : काशी  विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग

काशी विश्वनाथ मंदिर हिन्दू देवस्थानों में सर्वाधिक सुप्रसिद्ध मंदिरों में से एक है।  यह गंगा जी के किनारे बनारस में बसा है। मंदिर का बाहरी स्वरुप अनेक बार तोड़ दिया गया और यह पुनर्गठित हुआ।  आखिरी बार औरंगज़ेब ने इस मंदिर को तोड़ कर ज्ञानवापी मस्जिद बनवायी थी।  आज का मंदिर अहल्याबाई होल्कर (इंदौर की मराठा रानी) द्वारा बनवाया गया था।

कहते हैं कि एक बार ब्रह्मा और विष्णु में बहस हो गयी थी कि कौन बड़ा है। तब शिव जी वहां प्रकाश लिंग के रूप में प्रकट हुए थे और ब्रह्मा जी अपने हंस पर बैठ ऊपरी छोर ढूंढने निकले और विष्णु जी वराह रूप में निचला छोर। विष्णु जी ने स्वीकार किया कि मैं अंतिम छोर न ढूंढ पाया किन्तु ब्रह्मा जी ने झूठ कहा कि मैंने खोज लिया।  तब शिव जी एक और ज्योतिर्लिंग रूप में प्रकट हुए और ब्रह्मा को श्राप दिया कि उनकी पूजा न होगी क्योंकि स्वयं को पूजित बनाने  झूठ बोला था ।

यहीं पास में मणिकर्णिका मंदिर है जो सती माता का  शक्तिपीठ है ।  यह भी एक कथा है कि शिव जी ने यह स्थल अपने त्रिशूल पर उठा रखा है और इसे ब्रह्मा की सृष्टि से पृथक कर दिया था।  जब प्रलय होती है तो शिव जी इसे त्रिशूल पर रखते हैं और नए संसार में दुबारा अपने स्थान पर स्थापित कर  हैं ।

एक और कथा है कि जब शिव जी ब्रह्मा जी पर क्रुद्ध हुए तो  काल भैरव को प्रकट किया जिन्होने  ब्रह्मा जी का एक मुख काट दिया।  यह ब्रह्महत्या हुई और कटा हुआ मुख काल भैरव से जुड़ गया।  उन्होंने बहुत प्रयास किये किन्तु ब्रह्मह्त्या अलग न होती थी।  फिर कल भैरव ने काशी आकर गंगा स्नान किया और पाप मुक्त हुए ।

मंदिर  प्रांगण में ज्ञानवापी नामक कुआं है । कहते हैं आक्रमण के समय पुजारी शिवलिंग को बचाने के लिए उन्हें लेकर कुँए में कूद गए थे।

    

    बुधवार, 4 फ़रवरी 2015

    शिव पुराण ११ : भीमशंकर ज्योतिर्लिंग

    बहुत समय पहले  सह्याद्रि पर्वतों पर, डाकिनी के वनों में, भीम नामक असुर अपनी माता कर्कटी / कैकटी के संग रहता था।  वह बहुत क्रूर था और सब तरफ उसका भय व्याप्त था। किन्तु उसे अपने विषय में एक प्रश्न हमेशा सताता था - कि उसके पिता का नाम क्या है।  आखिर एक दिन भीम ने अपनी माता से इस विषय में प्रश्न किया। 
    उसकी माता ने बताया कि वह लंकेश्वर के छोटे भाई कुम्भकर्ण का पुत्र है।  विवाह के बाद कुम्भकर्ण ने वचन दिया था कि वे उन्हें लंका ले जाएंगे किन्तु ऐसा होता, इससे पहले ही युद्ध में श्री विष्णु के अवतार राम ने उनका वध कर दिया।  इसीलिए हम यहां वन में रहते हैं। यह सुन कर भीम बहुत क्रोधित हुआ और उसने ब्रह्मा जी की तपस्या की ठानी। 
    नारायण से बदला लेने के लिए भीम ने ब्रह्मा जी को पाने के लिए कड़ी तपस्या की और आखिर वे उसके सामने प्रकट हुए।  भीम ने वरदान लिया कि वह अनंत शक्तिवन्त हो और श्रीहरि भी उसे न मार सकें।  इस वरदान  तो वह और भी क्रूर हो गया और सब तरफ त्राहि त्राहि मचाने लगा।  इंद्र को हराकर स्वर्गाधिपति होने के बाद उसने कामरूपेश्वर शिवभक्त राजा सुदक्षिण को भी बंदी बना लिया।  
    ऋषि मुनियों और साधुओं पर अत्याचार होते देख देवगण ब्रह्मा जी के पास गए।  ब्रह्मा जी उन्हें शिव जी के पास ले कर गए।  उनकी प्रार्थना पर शिव जी ने कहा कि मैं जानता हूँ कि भीम के अत्याचार बहुत बढ़ गए हैं, और मेरे परम भक्त कामरूपेश्वर राजा सुदक्षिण भी उसीकी कैद में हैं।  मैं शीघ्र ही इस असुर का संहार करूंगा।  यह सुन कर देवगण प्रसन्न मन से लौट गए।  
    इधर भीम के बंदी गृह में सुदक्षिण पार्थिव शिवलिंग बना कर उसकी आराधना करने लगे।  जब यह बात आततायी को पता चली तो वह क्रुद्ध होकर वहीँ आ गया। उसने राजा सुदक्षिण से कहा कि वे शिवलिंग की नहीं उस (भीम) की आराधना करें।  कामरूपेश्वर ने मना कर दिये तो क्रोध में उसने अपनी तलवार से शिवलिंग को तोड़ने का प्रयास किया।  किन्तु तलवार शिवलिंग को छू पाती इससे पहले ही उसमे से श्री शंकर महादेव प्रकट हुए।  उनकी हुंकार भर से ही वह असुर वहीँ भस्म हो गया।  
    कहते हैं शिव जी के पसीने से भीमरति नदी बनी। सभी संत देव आदि ने आकर शिव जी की प्रार्थना की और उन्हें वहीँ रहने की आग्रह किया।  तब शिव जी वहां ज्योतिर्लिंग रूप में निवास करने लगे।  

    Bhimashankar (Maharashtra, India)


    गुरुवार, 29 जनवरी 2015

    शिव पुराण १० - केदारनाथ ज्योतिर्लिंग


    एक कथा है कि विष्णु जी के अवतार नर और नारायण (लिंक) ने बदरीनाथ धाम में शिव जी का शिवलिंग स्थापित कर, उनकी उपासना की थी। लम्बी और कठिन तपस्या के बाद शिव जी प्रकट हुए , और उन्हें कहा कि आप तो स्वयं ही पूज्य हैं, आप यह कठिन तप क्यों  कर रहे हैं। फिर भी जब आपने हमारा ध्यान करते हुए तप किया है , तो आप जो भी हमसे चाहें वह मांगें।

    इस पर श्री नर और नारायण ने शिव जी से प्रार्थना की , कि वे ज्योतिर्लिंग के रूप में सदा ही केदारनाथ धाम में बसे रहें।  जो भी मनुष्य आपके दर्शन करे वह समस्त दुखों से मुक्त हो जाए।  शिव जी उनकी इस प्रार्थना को सहर्ष स्वीकारते हुए ज्योतिर्लिंग रूप में वहीँ रहने लगे ।

    एक और कथा विख्यात है इस धाम के बारे में। कहते हैं कि महाभारत युद्ध में कौरवों पर विजय प्राप्त करने के बाद पांडव बड़े दुखी रहने लगे थे । अपने ही बांधवों को मार कर प्राप्त राज्य उन्हें कोई सुख न दे पाता था।  वे प्रायश्चित्त के लिए शिव जी के दर्शन करने गए।

    आयु हो जाने पर पांडव द्रौपदी सहित हिमालय जाकर शिव जी की आराधना करने गए।  रुद्रप्रयाग में उन्हें ऐसा लगा मानो कि शिव जी उन्हें दिखे हैं । लेकिन जब वे उनकी तरफ जाने लगे तो शिव जी भैंस का रूप लेकर वहां से तेज़ी से भागने लगे। यह जानकार कि प्रभु हमसे क्रोधित हैं और हमसे मिलना ही नहीं चाहते, पांडव दुखी हुए।  वे उनके पीछे दौड़े और आखिर केदारनाथ धाम में उन तक पहुँच पाये।  किन्तु प्रभु शिव भैंस के रूप में धरती में प्रविष्ट हो गए।  सिर्फ भैंसे का पिछला भाग दिखता था - जिसे खींच कर बाहर निकालने का भीम ने बहुत यत्न किया , किन्तु खींच न सके।  यही आगे शिवलिंग में परिवर्तित हो गया। और भी पांच हिस्से अलग अलग शिवलिंगों में बदले - जो पंच केदार कहलाते हैं।  ये सभी गढ़वाल (उत्तराखंड) के हिमालयी क्षेत्र में हैं।




    शनिवार, 24 जनवरी 2015

    शिव पुराण ९ : ओम्कारेश्वर अमरेश्वर मामलेश्वर ज्योतिर्लिंग



    ओंकारेश्वर और मामलेश्वर दो मंदिर हैं जो नर्मदा नदी के एक छोटे से टापू पर स्थिर हैं।  इस टापू को मन्धाता या शिवपुरी भी कहते हैं।  इसका आकार "ॐ" अक्षर जैसा कहा जाता है। यहां से जुडी अनेक कथाएं हैं।

    शिव पुराण के अनुसार, एक बार नारद जी विंध्य पर्वत आये। विंध्य बहुत अहंकारी था क्योंकि वह विराट और शक्तिवन्त था।  तब नारद जी ने कहा कि तुमसे श्रेष्ठ और बड़े सुमेरु पर्वत हैं, उनपर देवगण वास करते हैं।  तब विंध्य ने शिव जी को प्रसन्न करने के लिए पार्थिव लिंग बना कर कठिन तप किया।  शिव जी प्रकट हुए और वरदान मांगने को कहा।  तब विंध्य ने उन्हें वहीँ रहने का आग्रह किया।  वहां पहले से विद्यमान ओम्कारेश्वर महादेव ने स्वयं को तब दो हिस्सों में विभाजित किया - एक अमरेश्वर कहलाये और दुसरे मामलेश्वर।

    शिव जी ने विंध्य पर्वत को बढ़ने का वरदान दिया और कहा कि तुम बढ़ोगे अवश्य लेकिन भक्तों को परेशान न करना। शिव जी अंतर्ध्यान हो गए।  विंध्य बढ़ने लगा और अपना वचन भूल कर सुमेरु से महान होने की इच्छा से बढ़ता ही चला गया।  जब उसके कारण सूर्य और चन्द्र का रास्ता अवरुद्ध होने लगा तब देवगण महर्षि अगस्त्य के पास गए।  अगस्त्य जी विंध्य के पास गए और उसे कहा कि मेरे लौटने तक नहीं बढ़ना।  तब विंध्य रुका।  अगस्त्य जी अपनी पत्नी के संग श्रीशैले पर रहने चले गए और कभी न लौटे।  विंध्य पर्वत वैसे ही रुका रहा।

    एक और कथा है कि मन्धाता और उसके पुत्रों ने यहाँ कठिन तप किया था जिस वजह से यहां ये स्थल स्थापित हुआ।  एक तीसरी कथा देव दानवों के युद्ध से जुडी है कि युद्ध में पराजित होते देवताओं ने यहां प्रार्थना कर के फिर से बल प्राप्त किया था।


    शुक्रवार, 23 जनवरी 2015

    शिव पुराण ८ : महाकालेश्वर उज्जैन


    उज्जैन (म.प्र.) में तीसरे ज्योतिर्लिंग विद्यमान हैं - महाकालेश्वर।

    अवन्ति नगरी में क्षिप्रा तट पर वेदप्रिय नामक ब्राह्मण रहते थे।  वे शिवभक्त थे और प्रतिदिन शिव लिंग की अर्चना करते थे। उनके चार पुत्र थे - देवप्रिय, प्रियमेध, सुवृत (धर्मबाहु), और सुकृत।  ब्राह्मण की ही  पुत्र भी बड़भागी थे और  शिवभक्त थे।  समय आने पर ब्रह्मण  ने देहत्याग किया और उनके पुत्र उन्ही की तरह शिव भक्ति में लगे रहे।

    इधर रत्नाक नामक पहाड़ पर दूषण नामक दैत्य वास करता था । उसने कठिन तप कर ब्रह्मा जी से वर प्राप्त किया था और अत्यधिक  बल शाली था। उसने आसपास सब तरफ  साम्राज्य स्थापित किया था और सिर्फ इन चार ब्राह्मणों के अलावा सब तरफ  उसका भय था।  वेद स्थापित जीवन जीने की किसी को अनुमति न थी ।

    जब उसे पता चला कि चार ब्रह्मण शिव आराधना करते हैं तो वह बड़ा क्रोधित  हुआ।  उसने सैनिक भेजे कि उन्हें पकड़ लाओ।   इन दैत्यों ने वहां आकर उत्पात शुरू  किया और ब्राह्मणों को आज्ञा सुनाई।  किन्तु वे  पूजन करते रहे और बात ही न सुनी। क्रुद्ध दैत्य उन्हें मारने को चढ़ दौड़े। तब भी वे पूजा करते रहे।

    तभी तीव्र गर्जना हुई एवं धरती में पड़ी दरारों में से अग्निसमान शिव जी प्रकट हुए।  उन्होंने दैत्यों को मार  दिया और पर्वत  पर जा कर दूषण  का भी वध कर दिया। लौट कर उन्होंने ब्राह्मण बंधुओं से वरदान मांगने को कहा।  ब्राह्मणों ने मोक्ष माँगा और यह भी कि शिव जी सदैव उस स्थल पर रहें।  तबसे यह शिवलिंग उज्जैन में स्थित है।






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    बुधवार, 21 जनवरी 2015

    शिव पुराण ६ : मल्लिकार्जुन स्वामी - श्रीशैले mallikarjuna shrishaila

                    

    शिव और शिवा के दो पुत्र हैं - कार्तिकेय और गणेश।  जब दोनों पुत्रों के विवाह की बातें चलीं तो दोनों ही कहने लगे कि उनका विवाह पहले हो।  तब शिव और पार्वती जी ने कहा , कि जो संसार की परिक्रमा कर के पहले लौट आये - उसका विवाह पहले होगा।

    कार्तिकेय जी अपने वाहन मोर पर बैठ कर प्रदक्षिणा को निकल पड़े किन्तु गणेश जी ने यह नहीं किया।  उन्होंने अपने माता पिता को अपने आसन पर बैठाया और उनकी परिक्रमा कर ली ।  तब गणेश जी ने कहा कि अब आप मेरे विवाह का प्रबंध करें।  माता पिता ने कहा कि प्रिय पुत्र, कार्तिकेय आगे चले गए हैं - तुम भी जल्दी जाओ और पहले लौटने पर ही तुम्हारा विवाह पहले होगा।  इस पर गणेश जी बोले कि वेद वाणी के अनुसार मैंने संसार की परिक्रमा कर ली है , क्योंकि वेद कहते हैं कि माता पिता की परिक्रमा संसार की परिक्रमा जैसा ही है।  क्या वेदवाणी झूठी है ?

    शिव और शिवा वेदवाणी को नहीं झुठला सकते थे, तो उन्होंने  गणेश जी का विवाह करा दिया (विश्वरूप जी की पुत्रियों , ऋद्धि , और सिद्धि से। उनके पुत्र हुए क्षेम और लाभ। (कहीं लिखा आता है बुद्धि और सिद्धि से विवाह हुआ और पुत्र हुए लक्ष्य और लाभ ) जब कार्तिकेय वापस आये तो यह सब पता चलने पर बहुत क्रोधित हुए , और कभी विवाह न करने का व्रत लेकर कैलाश त्याग कर क्रौंच पर्वत पर तप करने चले गए।  पुत्र के यूँ रूठ कर जाने से माता पार्वती बहुत दुखी हुईं।

    शिव जी पार्वती जी सहित बेटे को मनाने गए किन्तु कुमार कार्तिकेय न माने और वह स्थान भी छोड़ कर जाने लगे।  देवगणों के समझाने पर वे वहीँ रहे , किन्तु माता पिता के साथ नहीं।  तब शिव जी और पार्वती जी ने वहीँ समीप ही श्रीशैले में रहने का  निर्णय किया और वहां स्वयं को स्थापित किया।  कहते हैं कि शिव जी अमावस्या के दिन और पार्वती माता पूर्णिमा के दिन अपने पुत्र को मिलने आते हैं।

    यहीं पास ही एक शक्तिपीठ भी है।  जब माता सती ने अपने पिता दक्ष के अपने पति के प्रति अपमानजनक व्यवहार से क्रुद्ध होकर योग-अग्नि में स्वयं को भस्म कर लिया था , तब शिव जी उनका जलता मृत शरीर उठाये संसार भर में घूमते रहे थे। तब उनका मोह नष्ट करने के लिए श्री विष्णु ने माता के शरीर के टुकड़े टुकड़े कर दिए थे - जो धरती पर यहां वहां गिर गए  थे।  उन सब जगहों पर माता के शक्ति पीठ हैं। तब यहीं माता के ऊपरी होंठ के गिरने से यहां भी एक शक्तिपीठ है।






    शिव पुराण ५ : सोमनाथ जी



     गुजरात में द्वारका जी के समीप ही यह तीर्थस्थल है।  कथा है कि सती माता के पिता प्रजापति दक्ष थे।  उनकी २७ पुत्रियों का विवाह चन्द्रदेव से हुआ था। ऐसा इसलिए कि , जब ब्रह्मा जी ने अपने पुत्र दक्ष को ये कन्याएँ प्रदान  कीं तब उन्हें कहा कि , इन सब का विवाह एक ही वर से करना क्योंकि ये २७ शरीर अवश्य हैं किन्तु आत्मा एक ही है।

    लेकिन चन्द्रदेव  (चन्द्रदेव का एक नाम सोमदेव भी है, जो रेवती के वर के रूप में उन्हें कहा जाता है। ) अपनी सभी वधुओं  सम्मान न देते थे।  वे रोहिणी के ही प्रति अत्यधिक प्रेममय थे।  इससे बाकी पत्नियां, मुख्यतः रेवती , दुखी रहती थीं।  यह बात दक्ष से कही जाने पर दक्ष ने कई बार चन्द्रदेव  समझाया लेकिन उनके व्यवहार में कोई फर्क न आया। इससे क्रुद्ध हो कर दक्ष प्रजापति ने चन्द्रदेव को श्राप दिया कि वे क्षयग्रस्त होंगे और धीरे धीरे लुप्त होते जाएंगे।

    श्राप के प्रभाव से चन्द्रदेव क्षय होने लगे और उनका तेज जाता रहा।  तब चन्द्रदेव ने मार्कण्डेय जी से महामृञ्जय मन्त्र (इसकी कथा आगे आएगी) प्राप्त किया और द्वारका के समीप सरस्वती नदी के किनारे शिवलिंग स्थापित कर वहाँ मृत्युंजय मन्त्र का पत्नियों सहित पाठ  किया।  इस पाठ के पश्चात शिव जी प्रकट हुए और उनसे वर मांगने को कहा।

    चन्द्रदेव ने  संगिनियों सहित अपनी कथा कही और प्राणरक्षण माँगा।  शिव जी बोले , दक्ष प्रजापति का श्राप पूरी तरह ख़त्म तो नहीं हो सकता , किन्तु मैं उसका प्रभाव काम कर दूंगा। आपने अनुचित व्यवहार किया ही है और आप दंड के अधिकारी भी हैं। जब आपने सभी कन्याओं के संग विधिवत विवाह किया था तब आपका कर्त्तव्य था कि आप उन सब को बराबर प्रेम और सम्मान दें। इसलिए दक्ष का श्राप अनुचित न था। इस पर चन्द्रदेव ने आगे यह भूल न दोहराने का वचन लिया।

    शिव जी ने कहा, मैं आपको अपने सर पर धारण करूंगा जिससे आपकी रक्षा होगी।  पंद्रह दिन प्रजापति दक्ष के श्राप के असर से आप कम होते जाएंगे , और यह समय खंड "कृष्ण पक्ष" कहलायेगा।  फिर पंद्रह दिन आप बढ़ेंगे और अपने पूर्व रूप में लौट आएंगे जो "शुक्ल पक्ष" कहलायेगा।

    तब सभी संतों, चन्द्रदेव, अत्रि जी और अनुसूया जी (चन्द्रदेव के माता पिता ) , और अन्य सभी देवगणों ने प्रार्थना की कि इस स्थान पर स्वयंभू शिव जी सदैव रहें।  यह ज्योतिर्लिंग "सोमनाथ"  प्रसिद्ध है। मान्यता है कि यहाँ आकर पूजन करने से सभी बीमारियां दूर हो जाते हैं।

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    जारी …… 

    शिव पुराण ४ : बारह ज्योतिर्लिंग

    शिव जी की पूजा आराधना लिंग रूप में होती है।  भक्त प्रभु के लिंग की स्थापना करते हैं और अर्चना करते हैं।  वैसे तो बहुत से शिवलिंग प्रसिद्ध हैं, किन्तु बारह प्रमुख हैं। ये बारह ज्योतिर्लिंग संसार भर में विख्यात हैं और इन के दर्शन करने का बहुत महत्व माना गया है (लिंक)।  ये हैं :

    १.  सोमनाथ जी (गुजरात)
    २. मल्लिकार्जुन स्वामी (श्रीशैला) (आंध्र)
    ३. महाकालेश्वर (म.प्र)
    ४. ओंकारेश्वर (म.प्र)
    ५. केदारनाथ जी (उत्तराखंड)
    ६. भीमशंकर महादेव (महाराष्ट्र)
    ७. काशी विश्वनाथ जी (उ.प्र)
    ८. त्रिम्बकेश्वर (महाराष्ट्र)
    ९. वैद्यनाथ जी (झारखंड)
    १०. नागेश्वर (गुजरात)
    ११. रामेश्वरम (तमिल नाडु)
    १२. घृष्णेश्वर  (महाराष्ट्र)

     अगले भाग से ज्योतिर्लिंगों की कथाएँ होंगी। 



    मंगलवार, 20 जनवरी 2015

    शिव पुराण ३ : पार्वती का तप और विवाह

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     यह भाग देवी कथाओं में पहले भी शेयर कर चुकी हूँ 
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    देवी रति को कामदेव के प्रद्युम्न रूप में लौटने के बारे में बता कर शिव जी वहां से अंतर्ध्यान हो गए । पार्वती बहुत दुखी हुईं और उन्होंने शिव जी को प्राप्त करने के लिए पंचाक्षरी नाम जाप के साथ तपस्या करना शुरू किया । माता ने उन्हें "उमा" कह कर रोका- जिससे उनका नाम उमा हुआ ।

    उमा ने बड़ी कठिन तपस्या की , पहले भोजन त्यागा, फिर फल आदि भी त्याग दिए और बाद में पत्र पुष्प भी । पर्ण भी त्याग देने से उनका नाjम "अपर्णा"हुआ । 3 हज़ार साल से अधिक होने पर भी शिव प्रसन्न न हुए, तब पार्वती जी और भी लगन के साथ अपनी साधना में लग गयीं ।

    उनके तप ताप के तेज से पृथ्वी संतप्त हो उठी और प्राणियों को अत्यंत पीड़ा होने लगी  । उधर ताड़कासुर ने सब और अपना राज्य विस्तारित किया और इन्द्रासन पर भी आसीन हो गया । तब देवगण विष्णु जी और ब्रह्मा जी सहित शिव जी के पास गये और पार्वती से ब्याह करने को कहा, । शिव जी ने कहा कि  मैं योगी हूँ, मुझे विवाह में कोई रूचि नहीं, और फिर से ध्यान मग्न हो गए । देवताओं ने उन्हें फिर पुकारा और धरा पर मची हाहाकार से मुक्ति के लिए उनसे तप स्वीकारने की प्रार्थना की । तब शिव जी ने कहा कि यद्यपि विवाह में हमारे रूचि नहीं है, तथापि आओ सब के लिए हम यह स्वीकार कर सकते हैं , आप सब प्रसन्न मन से प्रस्थान कीजिये ।

    देवताओं के जाने के बाद शिव जी ने सप्तर्षियों से काली के प्रेम और समर्पण की परीक्षा लेने को कहा, जिन्होंने उमा के आगे आ कर शिव जी के अवगुणों की बातें  कहीं। भवानी ने तनिक भी विचलित हुए बिना अपनी तपस्या जारी राखी ।

    फिर शिव जी खुद वृद्ध ब्राह्मण वेश में उनके पास आये और माँ ने उनका आदर सत्कार किया । उन्होंने पूछा की हे सुन्दर राजकुमारी, आप यह किस उद्देश्य से इतना कठोर तप कर रही हैं । उमा के कारण बताने पर वे शिव जी की बड़ी भर्त्सना करने लगे और कहा की ऐसे वर से विवाह करने से तो अच्छा हो की तुम कुंवारी ही रहो । शिव जी की बुराई पर माता भवानी क्रोधित हो गयीं और ब्राह्मण को वहां से जाने का आदेश दिया, अपनी सखी से कहा कि इसे यहाँ से दूर रखो और चुप रखो  । जितना पाप श्री महादेव की बुराई करने में है, ऐसा ही पाप उसे सुनने में भी है । मैं लज्जित हूँ कि मैंने इस शिवद्रोही का स्वागत सत्कार किया, और यह कह कर शिवा वहां से जाने लगीं  । इस पर शिव अपने निज रूप में आये और शिव का सारा क्लेश जाता रहा  । शिव जी ने कहा कि हे देवी, आपसे हम अति प्रसन्न हैं, और आपसे असीमित प्रेम भी करते हैं । आपके बिना अब हम भी नहीं रहना चाहते। आपको जो चाहिए है, मांग लीजिये । तब गिरिजा ने उनसे पिता हिमवान से अपना हाथ मांगने को कहा ।

    शिव जी बोले , की मांगने में समर्थ पुरुष का तेज घट जाता है । जैसे ही "देहि" (मांगने के लिए संस्कृत शब्द - दो / दीजिये) शब्द मुंह से निकले, पुरुष भिक्षुक की तरह हीन हो जाता है  । किन्तु माता भवानी ने कहा कि पिता से पुत्री को स्त्री रूप में मांगना पुरुष का अपनी स्व प्रकृति को प्राप्त करने का कर्म है, और शास्त्र सम्मत है ।  तब शिव उन्हें पिता के घर प्रसन्न मन से लौट जाने को कह कर चले गए और गिरिजा प्रसन्नचित्त से घर आ गयीं ।

    शिव नट रूप में डमरू लेकर हिमवान के घर आये और अत्यंत दिव्य नृत्य किया । अति प्रसन्न होकर राजा रानी ने उन्हें जो चाहें लेने को कहा, तो उन्होंने देवी काली का नाम लिया । राजा रानी नट की उद्दंडता पर अति क्रोधित हुए और सैनिकों से उसे बाहर निकालने को कहा, किन्तु उनके दिव्य तेज से कोई भी उनके सम्मुख न पहुँच सका  । नटराज ने फिर उमा का हाथ स्वयं को सौंपने को कहा, किन्तु मैना और हिमवान के न करने पर वे वहां से अंतर्ध्यान हो गए ।

    फिर गिरिजेश वैष्णव ब्राह्मण रूप में हिमवान के घर गए और शिव जी की इतनी तीव्र निंदा की कि मैना और हिमवान ने कहा कि हम अपनी बेटी को कुंवारी भले ही रखेंगे, किन्तु ऐसे वर को उसे न सौंपेंगे । बाद में शंकर जी की प्रेरणा से सप्तर्षि वहां गए और हिमवान को मनाया । मैना देवी फिर भी न मानें, तो उन्हें अरुंधती जी ने समझाया (अरुंधती जी ब्रह्मा पुत्री संध्या हैं, जो कामदेव के साथ ही ब्रह्मा के ह्रदय में से उत्पन्न हुईं थीं  । ब्रह्मा की अनुमति पा कर कामदेव ने बाण संधान किया, जिससे सभा में उपस्थित सभी देवों की दृष्टि काम्पूर्ण हो उठी और संध्या पर सकाम दृष्टि पडी । इससे संध्या का मन व्यथित हुआ और वे पित्राज्ञा से श्री वशिष्ठ जी से मन्त्र ले कर तपस्या को चली गयीं । संध्या को सूर्य ने प्रातः और सायं संध्या में विभक्त किया था । बाद में वे तपस्या करने वे चंद्रभाग पर्वत पर चली गयीं, जहां से चंद्रभागा नदी उत्पन्न हुईं । अगले जन्म में वे ऋषि मेधातिथि की पुत्री अरुंधती हुईं, और उनका ब्याह वशिष्ठ जी से हुआ )

    बरात आई तो शिव जी ने मैना जी के अहंकार को नष्ट करने के लिए इतना भयंकर वेश धारण किया कि मैना उन्हें देख कर बेहोश हो गयीं  । चेतना लौटने पर बेटी से कहा कि ऐसे कुलक्षणी अशुभ से मैं तुम्हे नहीं बांधूंगी ।
    वे अपनी बेटी उमा, नारद, सप्तर्षियों, सबको अपशब्द कहने लगीं की धिक्कार है कि मेरी कोमलांगी पुत्री को ऐसे अमंगल दूल्हा चुना गया । उसी समय मेरा गर्भ नष्ट हो जाता तो भला होता । मैं उमा को अपने हाथों से विष दे दूँगी परन्तु इस से उसे न ब्याहूंगी । नारद ने उन्हें समझाया की शिव रूप सर्व शुभ है , यह रूप तो उन्होंने कौतुकवश धारण किया है । किन्तु वे न मानीं और नारद को कहा कि तुम दुष्टों और अधर्मियों के शिरोमणि हो कि तुमने हमारी बेटी का जीवन खराब कर दिया । देवताओं और सप्तर्षियों के समझाने पर भी मैना अपनी बात पर अड़ी रहीं । हिमवान स्वयं भी समझाने गए तो मैना ने कहा की वे सहर्ष बेटी को गले में रस्सी बाँध कर पर्वत से लटका दें , किन्तु वे उसका ब्याह शिव से न होने देंगी ।

    अब पार्वती ने कहा कि "हे माते, तुम्हारी वाणी और बुद्धि तो सदैव मंगलकारी हुआ करती थी । आज यह धर्म का अवलंब न कर भटक गयी है । हे माँ, रूद्र सर्वोत्पत्ति के कारण और साक्षात इश्वर हैं । मनोहारी रूप धारी, कल्याणकारी महेश्वर परमेश्वर हैं । विष्णु ब्रह्मा द्वारा सेवित हैं और देवता गण इनकी आराधना करते हैं । ये निर्विकार, अविनाशी और सनातन हैं । शिव जी के ही कारण आज आपके द्वार पर ब्रह्मा विष्णु और समस्त देवगण और ऋषि मुनि जन पधारे हैं । मैं मन वचन कर्म से उन्हें पति मान चुकी हूँ, और आप मेरा विवाह न भी करेंगे, तो भी मैं आजीवन उनकी ही पत्नी बन कर कुंवारी रहूंगी " पुत्री की इन बातों से मैना देवी अति क्रोधित हुईं और उसे (निर्लज्जता के लिए ) डांटने लगीं । विष्णु जी भी मैना के पास आये और उन्हें समझाया , कि पितरों की कन्या और शैलप्रिया होने से उम्का सम्बन्ध ब्रह्मा जी के कुल से है । विष्णु जी के समझाने से मैना का आवेश कम तो हुआ, किन्तु उन्होंने जिद न छोड़ी । किन्तु जब शिव जी ने अपनी माया हटाई, तो मैना ने उन्हें उत्तम स्वीकार किया और नारायण से प्रार्थन की कि शिव जी से निज रूप में आने को कहें । तब शिव अपने स्वरुप में आये और उस रूप में अति सुन्दर प्रकट हुए  । मैना ने अपने व्यवहार पर क्षमा मांगी और फिर शिव और शिव का विवाह संपन्न हुआ ।

    नव दंपत्ति के दर्शनों को सोलह श्री नारियां आयीं : सरस्वती, लक्ष्मी सावित्री, गंगा, अदिति, लोपामुद्रा, अरुंधती, अहल्या, तुलसी, स्वाहा, रोहिणी, पृथ्वी, शतरूपा, संज्ञा और रति । फिर और भी अनेक दिव्य देवपत्नियाँ, नाग कन्याएं, मुनि कन्याएं आदि वहां आईं   । रति ने कामदेव की भस्म को शिव के आगे किया और विवाह के शुभ अवसर पर अपने पति को पुनर्जीवित करने को कहा, और बहुत रोने लगीं । उनके रोने से अन्य देवपत्नियाँ भी रोने लगीं और प्रभु की दयादृष्टि पड़ते ही भस्म से कामदेव अपने पूर्व रूप में आ अगये और रतिकाम ने शिव शिवा की मधुर स्तुतियाँ की । विदाई के समय माँ ने पुत्री को पतिव्रता नारी के धर्म समझाए । फिर गिरिजाकुमारी अपने पति के साथ हिमवान के देश से विदा हो गयीं ।

    शिव पुराण २ : पार्वती आगमन , कामदेव का भस्म होना

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     यह भाग देवी कथाओं में पहले भी शेयर कर चुकी हूँ 
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    दक्ष दत्त (सती का) शरीर त्याग कर माता भवानी स्वधाम को लौट गयीं । शिव बड़े संतप्त हुए और कैलाश पर तप को चले गए । समय गुज़रता गया ।

    इधर देवतागण ब्रह्मा जी के पास गए, जहाँ उन्होंने बताया कि कुछ आसुरी शक्तियों का नाश विष्णु अवतार करेंगे, कुछ का शिव अवतार, तो कुछ और आसुरी शक्तियों का विनाश सिर्फ जगदम्बिका के अवतारों और शिव भवानी की संतति द्वारा ही हो सकता है । आदिशक्ति जगदम्बिका अब हिमवान और मैना जी के घर अवतार लेंगी । तब देवता गण मैना जी के परिवार ( पितरों ) के पास गए और उनसे मैना जी और हिमवान के विवाह का अनुरोध किया । विवाह के उपरांत मैना जी और हिमवान ने माता की कठोर तपस्या की । ताप फलित हुआ और माता जी ने मैना रानी को दर्शन दिए और वर मांगने को कहा ।

    मैना जी ने कहा की हे मातेश्वरी, यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं तो मुझे वर दीजिये की मेरे सौ अत्योत्तम पुत्र हों, और स्वयं आप मेरी पुत्री के रूप में पधारें । माता ने वरदान दिया और अंतर्ध्यान हो गयीं । समयचक्र में मैना जी ने सौ बलवान पुत्रों को जन्म दिया । उमा महेश्वरी अपने पूर्ण अंश के साथ हिमालय के शरीर में प्रविष्ट हुईं , जिससे वे अद्वितीय आभा से संपन्न हो गए । फिर यथोचित समय पर गिरिराज हिमालय ने, शिवा के इस पूर्णांश को, अपनी प्रिया मैना जी के उदर में स्थापित किया ।जगदम्बा के गर्भ में होने से मैना अत्यंत तेजोमय हो उठीं और सभी देवताओं, ने विष्णु सहित उनकी स्तुति की । गर्भकाल पूर्ण होने पर जगदीश्वरी ने शिशु रूप में मैना जी के घर जन्म लिया । उनका शरीर नील श्याम कान्तियुक्त था । हिमवान जी ने अपनी पुत्री का नामकरण किया, और उन्हें काली इत्यादि सुन्दर नामों से बुलाया गया । सुशीलता के कारण परिवारजन उन्हें "पार्वती" भी बुलाते थे । माँ ने तप को रोकते हुए "उमा" कहा - जिससे उनका नाम उमा भी हुआ ।

    दैवीय प्रेरणा से नारद हिमालय जी के घर आये और पुत्री का हाथ देख कर बोले की इनका विवाह ऐसे वर से होगा जो योगी, नंग-धडंग, निर्गुण, निष्काम, मात-पिता रहित , निस्पृह और अमंगल वेशधारी होगा । यह सुन कर भवानी मन ही मन प्रसन्न हुईं, किन्तु माता पिता चिंतित हो गए । उनके उपाय पूछने पर नारद ने कहा कि ब्रह्म लेख झूठा तो हो नहीं सकता, किन्तु अशुभ को शुभ करने का एक उपाय है , कि आपकी पुत्री का ब्याह महेश्वर के साथ हो - क्योंकि उनमे ये सब गुण अवगुण नहीं, बल्कि भव्यता के रूप में वास करते हैं । हिमालय ने कहा कि वे तो निर्मोही और तपरत हैं, वे कैसे मेरी कन्या से विवाह करेंगे, तब नारद ने भवानी को शिव आराधना करने की सलाह दी , और कहा की तुम्हारी पुत्री आदिशक्ति है । शिव इनके अतिरिक्त किसी से विवाह न करेंगे । इनसे संगम होकर ही वे अर्धनारीश्वर कहलायेंगे ।

    जब उमा 8 वर्ष की आयु को पहुंची तब शिव को उनके अवतरण के विषय में समाचार आया, और वे अति प्रसन्न हुए, (वे जानते तो पहले ही थे) और लौकिक रीति निभाते हेतु अपने पार्षद गणों सहित गंगावतरण तीर्थ पर जा कर समाधिस्थ हो रहे ।

    पुत्री को लेकर पर्वतराज वहां पहुंचे और उन्हें नमन कर के अपनी पुत्री को आगे कर के भगवान् से बोले, हे प्रभु , आप हमारे यहाँ उपस्थित हुए, यह आपकी हम पर असीम कृपा है । हम अपनी कन्या को आपकी सेवा में समर्पित कर रहे हैं, यह सखियों सहित यहीं रहेगी और आपकी सेवा करेगी । कृपया आज्ञा दें ।

    महाप्रभु बोले, हे हिमवान शैलराज, आप हमारे दर्शन कर सकते हैं । किन्तु अपनी पुत्री को घर ही में छोड़ आइये , कि हम तो तपस्वी हैं, हमें इससे क्या सेवा लेनी है ? वेद पारंगत विद्वान् ऐसी अत्यंत सुन्दर, तन्वंगी,चंद्रमुखी और शुभ लक्षना युवास्त्री को मायारूपिणी कहते हैं । हे गिरिश्रेष्ठ, मैं योगी हूँ, और माया से सदा दूर रहता हूँ  ।इस पर हिमवान अत्यंत उदास हो उठे ।

    अब पार्वती बोलीं, हे आप योगी और ज्ञान विशारद हैं, फिर भी हमारे पिता से ऐसी बात कही ? सभी कर्मो को करने की शक्ति, सर्व प्राकट्य प्रकृति (nature ) ही है । प्रकृति से ही सृष्टि , पालन, और संहार होता है ( जो ब्रह्मा, विष्णु और महादेव के अधीनस्थ लोक कर्म हैं )। प्रकृति बिना आप लिंग रूप महेश्वरकैसे हो सकते हैं ? आप प्राणीमात्र के वन्दनीय और चिंतनीय हैं, किन्तु आपके मूल में आपकी प्रकृति ही है ।

    महेश जी हंस पड़े और बोले ,  मैं तप द्वारा प्रकृति का नाश करता हूँ और तत्वरूप प्रकृति रहित शम्भू रूप में स्थित और विद्यमान रहता हूँ । सत्पुरुष कभी प्रकृति के अधीन नहीं होते । 

    माता महाकाली ने कहा, हे प्रभु । अभी जो आपने कहा, वह भी "वाणी" से कहा, और वाणी प्रकृति प्रदत्त है । तब आप प्रकृति से परे कैसे रहे ? जो आप प्रकृति से परे हैं, तो न आप को बोलना चाहिए, न कर्म करना, कि कर्म का किया जाना भी प्रकृति (nature ) है । जो आप प्रकृति से परे हैं, तो हिमालय पर तपस्या क्यों और  कैसे? प्राणियों की इन्द्रियों से सम्बंधित हर वास्तु प्रकृतिजन्य ही है । अधिक कहने से क्या प्रयोजन ? मैं प्रकृति हूँ, और आप पुरुष हैं। आप निराकार निर्गुण हैं और मेरे अनुग्रह से ही आप साकार सगुण होते हैं । आप इन्द्रियों को जीत कर जितेन्द्रिय कहलाते हैं, किन्तु इन्द्रियां मुझसे हैं । प्रकृति अधीन ही आप सब लीलाएं करते हैं । यदि आप प्रकृति से परे हैं, तो मेरे यहाँ रहने से आपको भय कैसा ?

    इससे आगे शंकर जी तर्क न कर सके । उन्होंने हिमवान को घर जाने की अनुमति दे दी , और बोले कि हे गिरिजे, यदि तुम ऐसा कहती हो, तो प्रतिदिन मेरी शास्त्र सम्मत विधि से पूजा करो । हिमवान प्रतिदिन वहां आते और पार्वती शंकर जी की विधिसम्मत रूप से आराधना पूजा करतीं ।

    इसी बीच ब्रह्मा जी की आज्ञा से इंद्र ने कामदेव को (दक्ष की पुत्री रति कामदेव की पत्नी हैं) शिव के पास भेजा, किन्तु जब कामदेव के वाण से शिव का ध्यान टूटा तो उनकी क्रोधमयी तीसरी दृष्टि से कामदेव पल में भस्म हो गए । रति ने शिव जी की बड़ी स्तुति की और कहा कि मेरे पति यहाँ अपने किसी स्वार्थ वश नहीं आये थे । वे तो देवताओं के कल्याण हेतु आपके और पार्वती जी के ब्याह के लिए अपना धर्म पूर्ण करने आये थे  ।तब शिव जी ने कहा कि भले ही मंतव्य शुभ हो, किन्तु कर्म तो अशुद्ध था, और मन भी उस समय अपने "काम्वेग के बाण" की शक्ति पर गर्वित था । इसलिए कामदेव कोयाह दैहिक क्षति हुई । लेकिन शुभ लक्ष्य होने से उन्होंने बड़ा सौभाग्य भी अर्जित किया है कि वे साक्षात श्री कृष्ण को अपने पिता के रूप में प्राप्त करेंगे । रति की प्रार्थना और निवेदन पर शिव जी ने वचन दिया की अब से कामदेव अनंग रहेंगे, और कृष्णावतार के समय कृष्ण और रुक्मिणी के पुत्र प्रद्युम्न के रूप में फिर से शरीर प्राप्त करेंगे ।