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मंगलवार, 24 जनवरी 2012

थाह है, या अथाह है ?

मेला भरा था समुद्र तट पर । विवाद था की समुद्र अथाह है, या उसकी थाह है ? है तो कितनी है ? भीड़ इकट्ठी हो गयी थी, पंडित शास्त्र खोले बैठे थे । उत्तेजना थी - कौन हारेगा , कौन जीतेगा ?सागर में कौन उतरे - बस किनारे बैठे बाल की खाल खींची जा रही थी । 

कोई कहता - अथाह, कोई - थाह है । कितनी ? अब जब नापा ही न गया - कैसे कह सकते हो की अथाह है ? जिसका नाप नहीं ही हुआ - उसे अथाह कैसे कहें ? न ही थाह बता सकते हैं ।

नमक के दो पुतले भी थे वहां - उन्हें जोश आ गया। "हम पता कर के आते हैं "- कहते दोनों सागर में कूद पड़े । वे जैसे जैसे नीचे जाते - हैरान होते । जैसे नीचे जा रहे हैं - सागर का अंत तो आता नहीं - खुद ज़रूर घुलते जा रहे हैं । नमक के थे न !! कहते हैं - वे दोनों पहुँच भी गए बहुत गहरे में, पर लौटने का क्या हो ? वे तो अब समुद्र ही हो गए थे - वे तो अब थे ही नहीं । 

कई दिनों तक लोग किनारे प्रतीक्षा करते रहे - फिर वाद विवाद शुरू हो गया - थाह है या अथाह ? जो भीतर गए खोजने - वे तो खो गए । अब भी विवाद चल रहा है किनारे पर - थाह है ? या अथाह ?

13 टिप्‍पणियां:

  1. आपके इस उत्‍कृष्‍ट लेखन के लिए आभार ।

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  2. सत्य यही है। जिसने थाह लगाने की कोशिश करी, घुलता चला गया..उसी का हो गया। किनारे खड़ी भीड़ चीखती रहती है..सत्य क्या है..थाह या अथाह। जो आगे बढ़ा..डूबा..फिर बताने के लिए बाहर नहीं आ पाया।
    जो कूदे मगर डूबने के भय से तैरने लगे, वे काठ हो गये। किसी ने लिखा है..

    लाश थी इसलिए तैरती रह गई
    डूबने के लिए जिंदगी चाहिए।

    ...सुंदर दर्शन।

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    1. WHA DOST BAHUT KHUB LIKHA AAP NE

      लाश थी इसलिए तैरती रह गई
      डूबने के लिए जिंदगी चाहिए।

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  3. इस दर्शन पर और सोचा।

    दिल ने पूछा..

    नमक के बोरे ही क्यों कूदे ? चीनी के बोरे भी तो कूद सकते थे! वे भी तो घुल जाते। पत्थर भी तो कूद सकता था! झट से थाह पा लेता। नमक के बोरे ही क्यों कूदे ?

    दिमाग ने कहा..

    नमक के बोरे इसलिए कूदे क्योंकि समुंद्र का पानी खारा होता है। अर्थ यह निकला कि कूदेगा वही जिसका स्वभाव सत्य के जैसा होगा। जिसमें सत्य को जानने की ललक होगी।

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    1. वाह देवेन्द्र जी - कितनी अच्छी बात कही है आपने !!! कूदने को वे शायद तैयार हुए ही इसलिए, की उनमे सागर तत्त्व सत्व मौजूद था |

      फिर इसके आगे की सोच - सागर में सब कुछ है - हममे से जिस किसी में जो भी तत्त्व / स्वभाव है - वह सब कुछ उस परम में है , जो कूदेगा - देर सबेर अपने मूल तत्त्व में घुल ही जाएगा | पत्थर भी कूदे - जा कर बैठेगा तो उसी सागर के तल ताल में न ? तो सागर तो वह भी हो ही जायेगा | फिर - सागर के तल में धरे पत्थर क्या सागर ही नहीं कहलाते बहार वालों को ?

      जब कोई बाहरी गृह के लोग हमारे धरती को धरती कहते होंगे - तो उस "धरती " शब्द में हम सब जीव जो यहाँ हैं - हम सब उसी में निहित हैं | जब हम किसी सागर किनारे जाते हैं - तो कहते हैं - देखो सागर | उस एक शब्द में वह सब निहित है - जो उसमे मौजूद है | पानी भी, नमक भी, मछलियाँ आदि जीव भी, तल में विश्राम करते कंकर पत्थर भी, - हर चीज़ |

      शायद इसी लिए मुक्ति के कई प्रकार बताये जाते हों ? ब्रह्म में लीं हो जाना भी मुक्ति हैं, और सशरीर इश्वर के पास होना भी |

      सालोप्य...सामीप्य..सारुप्य..और सायुज्य...! ये खास चार प्रकार हैं |

      तो शक्कर के बोरे भी कूद सकते हैं, नमक के भी, और पत्थर भी | कूदने के बाद सागर उन्हें आत्मसात कर ही लेगा | :)

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    2. :)
      शक्कर के बोरे भी कूद सकते हैं, पत्थर भी कूद सकते हैं। कूदने पर निःसंदेह सागर उन्हें आत्मसात कर लेगा पर हाय! वे कूदते नहीं। उन्हे इसका अहसास भी नहीं होता। कूदते तो नमक के बोरे हैं क्योंकि उनमें सागर तत्व मौजूद रहता है। कूदेगा वही जिसमें सत्य को जानने की ललक होगी।

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  4. वाह देवेन्द्र जी - कितनी अच्छी बात कही है आपने | कूदने को वे शायद तैयार हुए ही इसलिए, की उनमे सागर तत्त्व सत्व मौजूद था |
    सूत्रधार जी, रश्मि जी, मनोज सर - आभार आपका :)

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  5. जिन खोजा तिन पाइयां ...गहरे पानी पइठि....
    और जब पा लिया तब रम गया उसी में ......गूंगे के गुड़ की तरह किसी को बताना भी चाहे तो न बता सके ...बता सकता तो इतने वेद पुराण पढ़कर सब अब तक जान गए होते ...सबने पा लिया होता ....यह जो पाना है इसे तो खुद ही करना होता है.....

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  6. वाह! दो ही पुतले क्यूँ थे नमक के.
    एक आध शक्कर का पुतला भी कुदा देतीं न शिल्पा जी.
    क्षीर सागर तो मीठा ही मीठा है न.

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