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रविवार, 10 नवंबर 2013

self aware robots and machines 1


आज एक मजेदार कहानी शेयर कर रही हूँ रोबोटिक जनरेशन्स के बारे में।  असल में यह पोस्ट बहुत दिनों से मेरे मन में थी।  फेसबुक पर एक दिन आशीष श्रीवास्तव जी ने यह पूछा था की क्या मशीनें "सेल्फ अवेयर" हो सकते हैं।  तब से यह पोस्ट मेरे मन में थी।

एक बड़ी मजेदार कहानी है - लेकिन यह कहानी नहीं सच है :) रोबोट्स को सोचने समझने लायक बनाने के लिए बढे क़दमों में से तीन कदम आपके साथ आज शेयर करती हूँ :)

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मिस्टर एक्स नामक रोबोट जी को लोगों से बातचीत करना और सोचना सिखाया गया । उन्हें हर सोच के बाद कार्य करने से पहले "दो रूल" सिखाये गए  (ये दोनों रूल हर रोबोट कि रीड ओनली मेमोरी में होते हैं - जिन्हे हटाया या बदला नहीं जा सकता - आपको याद होगा की रोबोट पिक्चर में रजनीकांत के रोबोट कि मेमोरी चिप ही बदल दी गयी थी )

१. किसी इंसान को नुक्सान न पहुंचाओ (चाहे ऐसा हुक्म भी दिया जाए) ;
    यदि हो रहा हो तो मनुष्य को हो रहे नुक्सान को रोको
    (- यदि यह दुसरे इंस्ट्रक्शन के विरुद्ध न हो रहा हो तो ही )
२. अपने आप को नुक्सान न पहुंचाओ और अपने आप को हो रहे नुक्सान को रोको
    (- जब तक यह रूल एक के विरुद्ध न हो रहा हो।  )
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तो अब आगे कि कहानी।
मिस्टर एक्स को बताया गया कि जिस कमरे में उनकी बैटरी (रोबोट का जीवन बैटरी से ही है , बैटरी ख़त्म तो जीवन ख़त्म) रखी है उस कमरे में एक बम है।  रोबोट के सोचने की प्रक्रिया (ब्रेन) ने analysis किया तो पाया कि यदि बैटरी को बचाया न जाए तो मेरी ज़िन्दगी ख़त्म।  तो उसने निष्कर्ष निकाला कि कमरे से बम को बाहर निकालना आवश्यक है।  तो एक्स कमरे में गया, वहाँ उसने बम को वहाँ रखी एक ट्रॉली पर रखा और ट्रॉली को बाहर खींच लाया और दूर हट गया।

क्या समस्या सुलझा पाया रोबोट ?

:(
नहीं
:
:
:

क्योंकि जिस ट्रॉली पर वह उस बम को लाड कर बाहर खींच लाया वह ट्रॉली वह थी जिस पर बैटरी रखी थी।  बेचारा मिस्टर एक्स :(
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अगले जनरेशन के रोबोट की कहानी अब
मिस्टर वाय नामक रोबोट को अपनी की हुई गतिविधियों का कमरे के सामान पर होने वाले असर को भी analyse करना सिखाया गया और फिर उसे भी वही समस्या दी गयी।

इन्होने भी यही निर्णय निकाला कि बैटरी कमरे से निकाली जानी चाहिए।  फिर उसने analyse किया कि इस से कमरे पर क्या असर होगा।  तो उसने पाया की  इससे कमरे की दीवारों , फर्श खिड़कियों आदि पर कुछ भी फर्क नहीं पड़ेगा।  हाँ कमरे की स्पेस कुछ बढ़ अवश्य जायेगी और कार्पेट एरिया का खुलापन ट्रॉली जितना बढ़ जाएगा।  इससे न रूल एक न रूल दो टूटेगा।

तो मिस्टर वाय ने भी बम को ट्रॉली पर रखा और कमरे से बाहर ले आये :( अंजाम वही हुआ जो एक्स का हुआ था।

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अब जेड नामक रोबोट को यह सब सिखाया गया कि जो पहले वाले दोनों को सिखाया गया था।  इसके अलावा एक और रूल दिया गया
"ignore inconsequential details about the room "

और फिर जेड जी को भी यही समस्या दी गयी।
कुछ समय गुज़र जाने के बाद बम फूटने का समय पास आने लगा और जेड ने कुछ किया ही नहीं।  वैज्ञानिक रचयिता चिंतित होने लगे  . उन्होंने रोबोट जेड को query भेजी कि क्या हुआ - तुम्हारी बैटरी के कमरे में बम है - तुम्हे यह पता है - तुम कुछ करते क्यों नहीं ??????

उत्तर आया :

:
:
:
कर रहा हूँ न - मैं कमरे के बारे में हज़ारों inconsequential details को इग्नोर करने में बिज़ी हूँ - जिनमे यह भी एक डिटेल है की एक कमरे में एक बम रखा है - क्योंकि इससे रूल एक दो या तीन किसी के अंतर्गत कोई परेशानी नहीं .......

………

:) :) :)
फिर मिलेंगे :)

बुधवार, 11 सितंबर 2013

दूर संचार भाग २

पिछली पोस्ट में हम ने टेलीफोन पर बात की।  इस बार हम अपने घर पर रखे टीवी पर पिक्चर कैसे बनती है और चलती फिरती दिखती है इस पर एक नज़र डालते हैं।

बिलकुल पुराने टीवी पर चलते हैं। जब एशियन गेम्स के समय मैं छोटी सी थी तब हमारे शहर में नया नया टीवी आया था।  हमारे घर में तो खैर बहुत बाद में आया लेकिन टीवी तो आ गया थे - जान गए थे कि एक डब्बा होता है जिसमे फ़िल्मी गाने सुनाई नहीं बल्कि दिखाई देते हैं - फिल्मे भी दिखती हैं चलती फिरती।  बड़ी चकित होती थी मैं , और सोचती थी ये लोग कैसे इतने सारे डब्बों में एक साथ एक जैसे स्टेप्स पर नाचते गाते बोलते दिखते हैं ? आइये देखें यह कैसे होता है।

यह कंप्यूटर मॉनिटर भी एक स्क्रीन है, जिसपर आप ये अक्षर पढ़ रहे हैं।  नीचे यह इमेज देखिये।


यहाँ दो टीवी दिख रहे हैं।  पहले में रंगीन पट्टियाँ  हैं और दुसरे में एक काला सफ़ेद मुस्कुराता चेहरा।  आपने शायद कभी यह सोचा हो कि टीवी पर यह बनते कैसे हैं ? इसी पर आज की यह पोस्ट होगी : * पहले ब्लेक एंड वाइट पर चित्र कैसे बनता है  . 

अगले भाग में फिर कलर टीवी और फिर यह कि ये चित्र चलते फिरते कैसे दिखते हैं।  

हिंदी की कई टर्म्स मुझे नहीं आती हैं,  हिंदी की गलतियाँ माफ़ हों।  :) पहले आपको CRT  के बारे में बताती हूँ।  इंट्रेस्टिंग है - मुझे लगता है आप बोर नहीं होंगे।  :)

पुरानी टेक्नोलोजी के टीवी CRT पर चलते थे, और तब के कम्प्यूटर स्क्रीन भी।  ऐसा ही कुछ अभी भी अस्पताल के मोनिटर्स या हमारे ओफ़िसेज़ के पुराने कम्प्यूटर्स में दीखता है।  आपने ज़रूर ध्यान दिया होगा कि उन टीवी स्क्रीन्स के पीछे एक काफी गहरा डब्बा होता था।  जो टीवी चलते हुए गर्म भी काफी हो जाता था।  यह डब्बा CRT है - cathode ray terminal .

इस डब्बे के भीतर बहुत ज्यादा वोल्टेज का (+) और (-) टर्मिनल है (जैसा आप रिमोट कंट्रोल्स में प्रयुक्त होने वाले पेंसिल सेल में देखते हैं ) . इनमे से (+) को अनोड और (-) को कथोड कहते हैं /

टीवी के भीतर का (+) हमारे टीवी का आगे का जो कांच का स्क्रीन है (जिस पर हम पिक्चर्स देख पाते हैं ) वहां कनेक्टेड है और (-) सबसे पीछे की ओर।  यह ठीक किसी टोर्च के पीछे की और लगी इलेक्ट्रिक प्लेट और आगे लगी नन्ही बल्ब की तरह है।  जब हम टोर्च का बटन दबाते हैं तो पीछे से आगे का सर्किट पूर्ण होता है जिससे बिजली दौड़ने लगती है और बल्ब चमकता है।  लेकिन टोर्च से समरूपता यहीं ख़त्म हो जाती है।  इसके आगे टोर्च जैसा कुछ नहीं होता।

पहली बात तो यह कि टोर्च के भीतर बिजली तारों में दौड़ती है लेकिन टीवी की ट्यूब में पूरा vaccuum है।  जैसा कि हम जानते ही हैं - करंट तब ही दौड़ सकता है जब उसे तार या कोई और मेटल आदि कंडक्टर मिले।  लेकिन vaccuum या रिक्तता में बिजली नहीं दौड़ सकती।  फिर ? :)

फिर यह कि  टीवी के कथोड को हीटर से गर्म करते हैं जिससे इलेक्ट्रोन गर्मी के मारे बेचारे निकल भागते हैं।  इसे thermal emmission  कहते हैं।  ये जो इलेक्ट्रोन  र्म कथोड से बाहर आये वे स्कुल से घर की छुट्टी पर निकले बच्चों की तरह फ्री हैं - ये वहीँ इकट्ठे रहेंगे यदि इन्हें कोई न बुलाये।

आपको याद होगा कि मैंने पहले ही कहा था कि टीवी का कांच का स्क्रीन (+) से जुड़ा  हुआ है। और कथोड  (जिससे इलेक्ट्रोन निकले हैं) वह (-) से जुड़ा हुआ है।  तो ये स्कूल से छूटे बच्चों जैसे इलेक्त्रोन जैसे बच्चे स्कूल से दूर घर की और खिंचाव महसूस करते हैं वैसे ही ये इलेक्ट्रोन भी खुद निगेटिव हैं तो ये (-) कथोड से दूर (+) अनोड , यानी कि टीवी स्क्रीन की और दौड़ने लगते हैं।


यह इस चित्र में देखिये :

यह जो पूरा बंद ट्यूब दिख रहा है यह कांच का ट्यूब समझ लीजिये जिसके भीतर की हवा खींच कर vaccuum बना दिया गया है।  सबसे पीछे जो भीतर लाल रंग का अरेंजमेंट है वहां हीटर और काथोड हैं।  हीटर से गर्म हो कर जो इलेक्ट्रोन बाहर आये हैं वे नीले रंग में दिख रहे हैं।  ये इलेक्ट्रोन  किरणों की तरह सीधी रेखा में स्क्रीन (अनोड ) की तरह जाएँ इसके लिए उन्हें फोकस करना है - जिसके लिए एक्सिलरेटिंग और फ़ोकसिंग अनोड मदद करते हैं।

यह इलेक्ट्रोंन किरणें बहुत हाई वोल्टेज से खिंचती हुई अनोद (स्क्रीन) की तरफ दौड़ रही हैं।

इसके आगे लगी हैं हॉरिजॉन्टल डिफ्लेक्टिंग प्लेट्स ।  इन हॉरिजॉन्टल डिफ्लेक्टिंग प्लेट्स मे वोल्टेज क्रमशः कम से अधिक होता रहता है जिससे ये इलेक्ट्रोन  किरणें कभी उलटे हाथ को और कभी सीधे हाथ को खिंचाव महसूस करती हैं - लगातार इस खिंचाव के प्रभाव से दिशा बदलती हैं।  ये बहुत तेज़ हैं और दायीं बायीं और घूम तो जाती हैं लेकिन आगे बढती जाती है। इस कारण ये उलटे हाथ से सीधे हाथ की तरफ बहुत तेजी से स्क्रीन को कवर करती हैं।  इससे कुछ कम गति से वेर्टिकल डिफ्लेक्टिंग प्लेट्स लगातार किरणों को ऊपर से नीचे की तरफ दौडाती रहती हैं ।  तो किरणें स्क्रीन पर एक जगह न पड़ कर, लगातार, उलटे हाथ से सीधे की तरफ और साथ ही ऊपर से नीचे की तरफ बढती रहती हैं।  कुछ ऐसे :

इस तरह से बड़ी तेज़ी से पूरी स्क्रीन किरणों द्वारा स्केन होती है - जिसे रास्टर सकेन कहते हैं। 

स्क्रीन के कांच की भीतरी तरफ एक फोटो सेंसिटिव मटेरियल पुते हुए है , जो तेज़ गति से आते इलेक्ट्रोन की ऊर्जा सोख कर चमकता है।  जिस बिंदु पर उस वक्त किरण पड़ रही है सिर्फ वही बिंदु चमकता है, लेकिन यह इतनी तेज़ी से रिपीट होता रहता है लगातार, कि हमारी आँखें भ्रम में पड़ जाती हैं, कि पूरी स्क्रीन लगातार चमक रही है।  यदि आपने कभी किसीके फोटो तेज़ स्पीड शटर वाले केमरा से टीवी के आगे खींचे हों , तो आप देखेंगे कि उसमे स्क्रीन का कुछ ही भाग रोशन है - क्योंकि जितनी देर केमरा का शटर खुला था , उतनी देर में सिर्फ उतने ही भाग को किरणों ने स्कैन किया।  इसे ऐसे समझिये कि जैसे छत पर घूमता पंखा हमें ऐसे आभास देता है कि पूरे सर्कल में पंखा लगातार मौजूद है , असल में तो पंखे के ब्लेड्स एक समय में एक ही जगह हैं - किन्तु तेज़ी से घूम रहे होने से आँखों को निरंतरता का भ्रम होता है।  कभी रात को अँधेरे में लाइट बंद कर के टीवी की रौशनी में पंखे का घूमना देखिये - कुछ अलग स्पीड दिखेगी।  

अब यह होने से तो पूरी स्क्रीन बराबर चमकनी चाहिए न ? फिर ? चित्र कैसे बनेगा ?

फिर से CRT  का चित्र देखिये।  कथोड  के आगे एक ग्रिड है।  इस ग्रिड में तस्वीर के अनुसार वोल्टेज कम ज्यादा करने से इलेक्ट्रोन बीम की गति कम ज्यादा होती है।  जितनी कम गति उतनी कम ऊर्जा - उतनी कम चमक स्क्रीन पर - इसके लिये ग्रिड को थोडा निगेटिव वोल्टेज देंगे जिससे इलेक्ट्रोन बीम की गति कम हो। इससे उलट - यदि ज्यादा चमक चाहिए तो गति बढाने के लिए ग्रिड को अधिक पोजिटिव वोल्टेज दिया जाएगा।  

रास्टर स्केन की गति के अनुसार हमें यह पहले से पता है कि समय के किस बिंदु पर बीम स्क्रीन के किस स्थान पर गिरेगी।  उस बिंदु पर सफ़ेद रंग देखना हो, तो अधिकतम पोजिटिव वोल्टेज , पूरा काला बिंदु देखना हो तो पूरा निगेटिव वोल्टेज , और बीच का कोई ग्रे शेड देखना हो तो उस हिसाब का वोल्टेज ग्रिड को देते हैं।

जैसे ऊपर की टीवी पिक्चर में पहली दो तिरछी रेखाओं में ग्रे रंग है, …… तीसरी रेखा में पहला तिहाई भाग ग्रे फिर काला बिंदु। ……. फिर ७-८ ग्रे बिंदु  ……. फिर से एक काला बिंदु और। …… फिर एक तिहाई भाग फिर से ग्रे है।

हमारे भारत में स्क्रीन पर ६२५ हॉरिजॉन्टल रेखाएं हैं, और हॉरिजॉन्टल वर्टिकल अनुपात ४:३ का है।  HDTV में यह अनुपात १६:९ का होता है।  अमेरिका में पहले रेखाएं ५२५ होती थीं, भारत जापान आदि में ६२५। अर्थात भारत में एक रास्टर स्क्रीन में (६२५) x (६२५ x  ३ / ४ ) अलग अलग बिंदु हैं -जिनमे से हर एक बिंदु को काला सफ़ेद या ग्रे देखा जा सकता है, उस समय ग्रिड को अलग अलग वोल्टेज दे कर।

आपके इलेक्ट्रोनिक केमरा में इससे ठीक उलटी प्रक्रिया होती है।  रास्टर स्कैन तो वही होता है - लेकिन पड़ती हुई रौशनी के अनुसार स्क्रीन पर लगा फोटो सेंसिटिव पदार्थ अलग अलग वोल्टेज पैदा करता है - जो बाद में टीवी की ग्रिड को उसी क्रम में दिए जाते हैं।

अब बहुत हुआ - आगे रंग और चलती फिरती तस्वीरों की तकनीक अगली पोस्ट में।  अभी बताऊंगी तो आप बोर हो जायेंगे।

फिर मिलते हैं :)

गुरुवार, 29 अगस्त 2013

दूर संचार भाग १

इस श्रंखला की भी बड़े दिनों से प्लानिंग चल रही है। अन्य श्रंखलाओं की तरह यह भी अधूरी न रह जाय इस आशा से शुरुआत कर रही हूँ।

:)
:(
 :)

हम सब सॅटॅलाइट कम्युनिकेशन शब्द से परिचित हैं । हम टीवी देखते हैं - जी टीवी , स्टार प्लस आदि सेटेलाईट चेनल कहलाते हैं। इन पर केबल ओपरेटर को एक निश्चित दिशा में एंटीना रखने पर सिग्नल मिलने की बात होती है। फिर आजकल डायरेक्ट टू होम टीवी हैं  । जासे टाटा स्काई  , डिश टीवी आदि। जिनके लिए हम अपने घर एक नन्ही डिश लगवाते हैं एक निश्चित दिशा में। ये डिश कैसे काम करती है? रेडिओ , टीवी , फोन आदि को अपनी अपनी तरह के सिग्नल कैसे मिलते हैं? टीवी में फोटो और लोग कैसे चलते फिरते दीखते हैं?

इस श्रंखला में मैं इस पूरे सिस्टम पर बात करुँगी।

दूरसंचार की शुरुआत से शुरू करती हूँ फिर धीरे धीरे आगे बढूँगी।सिर्फ तरीके भर पर। मेथेमेटिकल डिटेल्स नही। ( मैं चिट्ठियों आदि नहीं बल्कि सिर्फ दूरसंचार / टीवी आदि इलेक्ट्रोनिक कम्युनिकेशन की बात कर रही हूँ।)

सबसे पहले तो हम मनुष्य सिर्फ अपने समीप मौजूद व्यक्तियों से ही बात कर पाते थे। फिर  dots and dashes का उपयोग कर दूर सन्देश भेजे जाने लगे। फिर तारों के द्वारा जुड़े दो टेली फोंस पर बात होनी शुरू हुई।

फोन मशीन के काम करने के बारे में अभी एक संक्षिप्त परिचय । मोटे तौर पर सिर्फ इतना है कि टेलीफोन में चार अलग भाग हैं।

1. - माइक। जैसे माइक पर गायक गीत गाते हैं और नेता भाषण देते हैं :) ।माइक के भीतर मैगनेट का इंतज़ाम रहता है जिसके कारण यह हमारी कही बात को बिजली की लहरों में परिवर्तित करता है। हमारी आवाज़ से हुए कम्पन के कारण वोल्टेज के बदलाव होते हैं , जिन्हें तकनीकी भाषा में ऑडियो सिग्नल कहते हैं।

2. - स्पीकर। जी हाँ वही जो नेता के कहे शब्दों को पूरे मैदान में सुनाने के लिए जगह जगह लगे होते हैं। या गायक के गीत को आपके कानों तक पहुंचाते हैं। दुबारा वही ध्वनि जनरेट कर कर। जो म्युज़िक सिस्टम या टीवी के शब्द को कमरे में फिर से बनाते हैं। इन स्पीकरों में परदे और चुम्बक होते हैं। चुम्बक और बिजली की लहरों का आपस में ऐसा असर होता है की स्पीकर में लगा पर्दा कम्पन करता है और ध्वनि तरंगों को जन्म देता है।  मूल तौर पर माइक और स्पीकर एक ही सिद्धांत पर काम करते हैं। एक ध्वनि तरंगों को विद्युत् तरंगो में बदलता है तो दूसरा विद्युत् तरंगों को ध्वनि तरंगो में। लेकिन सिद्धांत दोनों का एक ही है - विद्युत् और चुम्बक के आपसी सम्बन्ध और एक ताना हुआ स्क्रीन।

3. - तीसरा हिस्सा है वह भाग जो ऊपर बताई माइक की विद्युत् लहरों को टेलीफोन एक्सचेंज तक और टेलीफोन एक्सचेंज से अति हुई विद्युत् लहरों को स्पीकर तक आने का विद्युत् रास्ता बनाता है। ये बेसिकली तार और स्विच हैं।

4. आखरी हिस्सा हमारी आपस में की जा रही बातचीत से सम्बन्धित नही । यह सिग्नलिंग के लिए है। फोन उठाने पर आने वाली डायल टोन, किसी को फोन करने पर सुनाई देने वाली रिंगिंग या बिजी टोन, कोई हमें फोन करे तब बजने वाली घंटी, ये सब सिग्नलिंग के हिस्से हैं

ये सब तो था हमारे प्यारे घर में लगे टेलीफोन जी के नन्हे से डब्बे जी के भीतर। यह डब्बा हमारे घर के अन्य सामान की ही तरह हमारा है, यह खुद अपने आप में कम्युनिकेशन नेटवर्क का हिस्सा नहीं । आगे ये विद्युत् तरंगे कैसे एक से दूसरी जगह पहुँचती हैं, वह कम्युनिकेशन का हिस्सा है।

यह कैसे होता है यह अगले भाग में। सॅटॅलाइट तक पहुँचते पता नहीं कितने भाग हो चुके होंगे।

चलिए फिर मिलते हैं एक ब्रेक के बाद

:

रविवार, 21 जुलाई 2013

श्रीमद्भगवद्गीता २. १५

इस श्रंखला की पिछली पोस्ट में हमने इस श्लोक पर बात की ।

मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः |
आगमापायिनोSनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत || १४ ||

इस श्रंखला के बाकी भाग देखने चाहें / पहले भाग से पढ़ना चाहें तो ऊपर गीता टैब पर क्लिक करें । या फिर ये लिंक देखें

1.1 , 1.2 , 1.3

उस पोस्ट पर एक चर्चा चली जिसमे महाभारत युद्ध में दोनों ही पक्षों का अधर्म पथ पर होने की बात हुई । इस पर मैं कोई टिप्पणी नहीं कर रही हूँ । सिर्फ यह कह रही हूँ कि इस श्रंखला में मैं महाभारत ग्रन्थ पर नहीं बल्कि गीता पर बात कर रही हूँ । गीता महाभारत युद्ध के दौरान पुनः कही गयी है लेकिन यह महाभारत का हिस्सा नहीं । 

श्री कृष्ण (आगे गीता में) अर्जुन से कहते हैं कि यह गीता ज्ञान मैंने पहले सूर्य देव को दिया था जिन्होंने अपने पुत्र को दिया और परम्परा से वह ज्ञान आगे बढ़ा - लेकिन समय के साथ यह लुप्तप्रायः हो चला है इसलिए मैं आज इसे फिर से तुझे कह रहा हूँ ।

कृपया गीता की चर्चा पर बने रहे । महाभारत की (औचित्य और अनौचित्य ) चर्चा उसी महाभारत श्रंखला पर रहे तो बेहतर रहेगा । जब हम केमिस्ट्री की क्लास में बैठते हैं तो फिजिक्स की बात नहीं करते । लेकिन जीवन मूल्य सिखाने वाली गीता पर हम जज और ज्यूरी बन कर अपने निर्णय देने लगते हैं ।
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अब अगला श्लोक :
यं हि न व्यथ्यन्त्येते पुरुषं पुरुषर्षभ् |
सं दुःख सुखं धीरं सोSमृतत्वायकल्पते ||

भावार्थ: 
जिसे ये सब व्यथित नहीं करते और जो इन सब (शारीरिक या मानसिक) परिस्थितियों में सम रहता है (और अपना निश्चित कर्म करता रहता है) वह पुरुष श्रेष्ठ है, और मुक्त है ।  
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गीता का दूसरा अध्याय पूरी गीता का summarization सा लगता है मुझे  । पहले दस श्लोकों में अर्जुन की व्यथा  थी । वह अपने रिश्ते नातेदारों को देख आकर विचलित हो जाता है और युद्ध को छोड़ देने की बातें कहता है । अब कृष्ण उसे समझा रहे हैं ।

पिछले श्लोक में कृष्ण ने कहा कि जैसे हमारी इन्द्रियां (sense of touch etc) हमें (हमारे शरीर को भिन्न शारीरिक परिस्थितियों में ) सर्दी और गर्मी का अनुभव कराती हैं , उसी तरह हे कुन्तीनन्दन, हमारे मन को भी सुख और दुःख का अनुभव होता है (भिन्न मानसिक परिस्थितियों में) । जैसे सर्दी और गर्मी (ऋतुएँ ) आती जाती रहती हैं और स्थायी नहीं हैं उसी तरह हे अर्जुन ये सुख दुःख के अनुभव भी आते जाते हैं और स्थायी नहीं हैं । (अपने मन से) इन्हें (जैसे शरीर गर्मी और सर्दी को सहन करता है) सहन कर ।

इस श्लोक में कृष्ण कह रहे हैं कि  जिस किसी मनुष्य को ये सब स्थितियां डावांडोल नहीं कर सकें वही मनुष्य मनुष्यों में श्रेष्ठ है और मोक्ष में है । आगे जाकर कहीं मुक्ति नहीं - अभी इसी जीवन में यदि कोई दुःख सुख से अनछुआ है तो अभी की ही स्थिति अमृतमय मुक्ति है ।

अब यह दोनों श्लोक सिर्फ महाभारत के सम्बन्ध में नहीं है  । दुःख और सुख को समान मान कर कर्म करने वाले ही सच में कर्तव्य कर्म कर सकते हैं । जो दुःख सुख से चलायमान होंगे वे कटु कर्तव्य कर ही नहीं सकते । क्योंकि वे तो दुःख से बचने और सुख की ओर जाने वाली ही राह चुनेंगे । ध्यान देने की बात है कि यहाँ कहीं भी युधिष्ठिर या दुर्योधन के सही गलत होने पर कुछ नहीं कहा गया है । बल्कि व्यक्ति के निजी कर्त्तव्य की बात कही जा रही है  ।

एक योद्धा जो युद्ध भूमि में आ चुका है, जिसके रण कौशल के भरोसे उसके राजा युद्ध में उतरे हैं - वह अब पीठ दिखा कर भागना चाहता है क्योंकि विरोध में उसके अपने खड़े हैं ।

कृष्ण कह रहे हैं कि अपने निजी दुःख सुख को आने जाने वाला (ऋतुओं की तरह परिवर्तन शील) मान ले, और अपना (योद्धा का - अर्जुन का नहीं, पुत्र का नहीं, शिष्य का नहीं) कर्म कर । जो व्यक्ति अपने निजी दुःख सुख को परे कर कर्म कर सके वही मानवों में श्रेष्ठ होता है।

यह सब कृष्ण कब कह रहे हैं  ? कई लोग कहते हैं कि कृष्ण यदि अर्जुन को न समझाते , तो युद्ध रुक जाता , कई कई लोग न मरते। लेकिन वे भूल जाते हैं कि कृष्ण ने युद्ध से पहले तक बहुत समझाया था किन्तु अर्जुन तब अपने क्रोध (द्रौपदी का अपमान , वनवास का अपमान, आदि आदि) से क्रुद्ध हुआ युद्ध को उद्धत था। तब क्या अर्जुन नहीं जानता था कि युद्ध में कौन सामने होंगे ? भीष्म और द्रोण तो द्यूत क्रीडा के समय ही उसे अपना पक्ष बता चुके थे, और सारे पांडव जानते थे कि वे कौरवों के साथ खड़े दिखेंगे । फ़िर अब नया क्या हुआ ?

जो लोग हज़ारों प्राणों के खोने की बातें करते हैं वे यह भूल जाते हैं कि वे खुद अपने देश के शत्रु देश के शुरू हो चुके युद्ध के दौरान मुख्य सेनानायक/ जनरल / सेनाध्यक्ष .... के अर्जुन की तरह "अहिंसावादी" बन कर संन्यास ले कर युद्ध भूमि छोड़ देने को क्या कहेंगे ? वे यह भी भूल जाते हैं कि हर आतंकवादी घटना के बाद वे खुद युद्ध छेड़ने की गुहार लगाते हैं - यह भूल कर की युद्ध में कितनी "हिंसा" होगी और कितने "निर्दोष सैनिक" मारे जायेंगे। कितनी औरतें विधवा होंगी, और कितने बच्चे अनाथ हो जायेंगे  ।

यह सब "अर्जुन को कृष्ण न लड़वाते तो हिंसा रूकती" कहने वाले लोग वे ही हैं जो कुछ महीने पहले दामिनी के गुनाहगारों को सड़क पर जंगली से जंगली सजाओं की वकालत कर रहे थे। क्या वे कहेंगे कि जज की कुर्सी पर बैठे व्यक्ति को यदि कटघरे में खड़ा बलात्कारी अपना गुरु या परिवारजन दिखे (या शक्तिशाली राजपुत्र दिखे) तब जज को "अहिंसावादी" बन कर पीछे हट जाना चाहिए ? ............. लेकिन यह रक्त का उबाल राजपुत्र दुर्योधन के अनेकानेक स्त्रियों के शोषण पर उबाल नहीं खाता , क्योंकि वह सब तो "पुरानी बात" है  । दुर्योधन की नज़र न सिर्फ अपनी भाभी (राजपरिवार की बहू )पर ही पड़ी बल्कि यदि आपको याद हो तो पांडवों के वनवास के दौरान एक और राजकन्या के साथ उसने यही किया था । जब राज कन्या के साथ  का यह  होता था तो जन साधारण की तो सोच ही सकते हैं  ।

लेकिन नहीं -  ये सब   भूल कर ये "ज्ञानीजन" अचानक "अहिंसावाद" पर चल देते हैं और गीता कह कर अर्जुन को प्रेरित करने के लिए कृष्ण को "अपराधी" घोषित कर देते हैं । वे यह भी भूल जाते हैं कि अक्सर साधारण स्थितियों में अहिंसा की बात करने वालों को वे मूर्ख / डरपोक / आदि आदि  ... घोषित करते हैं ।

लेकिन जब गीता की बात होती है तब अचानक सब न्यायप्रियता और वीरता "अहिंसावाद" की ओट  में छुप जाती है  । तब उन्हें अचानक लगने लगता है कि यदि बलात्कारियों के साथ अपने पितामह / गुरु / भाई दिखें तब न्याय की रक्षा को भूल कर युद्ध से पीठ दिखा देना "भला और सही रास्ता " हो जाता है  ।

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यदि हमें गीता समझनी है तो अपने आप को महाभारत के मायाजाल से निकाल कर इसे देखना होगा  । गीता जीवन पथ प्रदर्शिका है - यह महाभारत या अर्जुन तक सीमित नहीं है  । कृपया काँटों में उलझे रह कर गुलाब से मुंह न मोडें - इसे समझने के प्रयास करें ।

गीता की असल शुरुआत मुझे लगती है २.११ से । कई विद्वान् ऐसा मानते हैं तो कई नहीं मानते । यह मेरा अपना विचार था की यहाँ से श्री भगवान् का कथन शुरू होता है और पहले बैकग्राउंड है - और पहली बार मुझे श्रीविनोबा भावे जी का version  श्री अनुराग शर्मा जी की आवाज़ में सुनते हुए यह पता चला कि यह और भी लोग मानते हैं  । और यहाँ से कृष्ण का गीत आता है । पूरी महाभारत में न उलझें - इस पर आयें । दुसरे अध्याय के ग्यारहवे श्लोक से जो पोस्ट  लिखी हैं उनके भावार्थ फिर से पेस्ट कर रही हूँ  (ऊपर पूरी पोस्ट्स के लिंक भी हैं ।) :  :

11 श्री भगवान् ने कहा - तू न सोचने योग्य बातों पर इतना सोचा रहा है, और पंडिताई की भाषा प्रयुक्त करता है | किन्तु जो सच ही में पंडित हो - वह तो जिनके प्राण चले गए, या जिनके नहीं भी गए, उन दोनों के ही लिए शोक नहीं करते |

12 (श्री कृष्ण आगे अर्जुन से बोले - )
निश्चित ही पूर्व में ऐसा कोई काल नहीं था जब तू नहीं था, या मैं नहीं था या ये सब राजागण नहीं थे । न ही आगे ऐसा कोई काल होगा जब हम सब नहीं होंगे ।


13 जैसे शरीर में रहने वाला आत्मा अपरिवर्तित ही रह कर लगातार बदलते हुए शरीर में वास करता है (शरीर बालक से जवान होता है, फिर बूढा भी परन्तु उसके भीतर रहने वाला व्यक्ति वही रहता है ) उसी तरह मृत्यु के समय भी वही आत्मा एक से दूसरे शरीर में पुनर्वास कर लेता है | जो यह जानते हैं , वे मोहित नहीं होते ।

14 इन्द्रिय अनुभूति (और मन की भी ) - गर्मी, सर्दी,सुख और दुःख की अनुभूति कराती हैं । जैसे ये मौसम के असर आने जाने वाले हैं, स्थायी नहीं, वैसे ही सुख दुःख भी आने जाने वाले हैं । हे भारत, इनसे प्रभावित हुए बिना इन्हें सहन करना (अनुभव करते हुए भी उपेक्षा करना) सीख । 

15 जिसे ये सब व्यथित नहीं करते और जो इन सब (शारीरिक या मानसिक) परिस्थितियों में सम रहता है (और अपना निश्चित कर्म करता रहता है) वह पुरुष श्रेष्ठ है और मुक्त है ।  

इन श्लोकों में जीवन का ज्ञान है - अपने मानस में इन्हें कृपया सिर्फ पांडव कौरव युद्ध के सन्दर्भ भर तक सीमित न रखें  ।

इस गीता आलेख के बाकी भागों (इससे पहले और बाद के) के लिए ऊपर गीता tab पर क्लिक करें 
जारी 

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disclaimer:
कई दिनों से इच्छा थी, कि भगवद गीता की अपनी समझ पर लिखूं - पर डर सा लगता है - शुरू करते हुए भी - कि कहाँ मैं और कहाँ गीता पर कुछ लिखने की काबिलियत ?| लेकिन दोस्तों - आज से इस लेबल पर शुरुआत कर रही हूँ - यदि आपके विश्लेषण के हिसाब से यह मेल ना खाता हो - तो you are welcome to comment - फिर डिस्कशन करेंगे .... यह जो भी लिख रही हूँ इस श्रंखला में, यह मेरा interpretation है, मैं इसके सही ही होने का कोई दावा नहीं कर रही  
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मेरे निजी जीवन में गीता जी में समझाए गए गुण नहीं उतरे हैं । मैं गीता जी की एक अध्येता भर हूँ, और साधारण परिस्थितियों वाली उतनी ही साधारण मनुष्य हूँ जितने यहाँ के अधिकतर पाठक गण हैं (सब नहीं - कुछ बहुत ज्ञानी या आदर्श हो सकते हैं) । गीता जी में कही गयी बातों को पढने / समझने / और आपस में बांटने का प्रयास भर कर रही हूँ , किन्तु मैं स्वयं उन ऊंचे आदर्शों पर अपने निजी जीवन में खरी उतरने का कोई दावा नहीं कर रही । न ही मैं अपनी कही बातों के "सही" होने का कोई दावा कर रही हूँ।   मैं पाखंडी नहीं हूँ, और भली तरह जानती हूँ  कि मुझमे अपनी बहुत सी कमियां और कमजोरियां हैं । मैं कई ऐसे इश्वर में आस्था न रखने वाले व्यक्तियों को जानती हूँ , जो वेदों की ऋचाओं को भली प्रकार प्रस्तुत करते हैं । कृपया सिर्फ इस मिल बाँट कर इस अमृतमयी गीता के पठन करने के प्रयास के कारण मुझे विदुषी न समझें (न पाखंडी ही) | कृष्ण गीता में एक दूसरी जगह कहते हैं की चार प्रकार के लोग इस खोज में उतरते हैं, और उनमे से सर्वोच्च स्तर है "ज्ञानी" - और मैं उस श्रेणी में नहीं आती हूँ ।

शुक्रवार, 10 मई 2013

सौर मंडल ५ : एस्टेरोइड पट्टी

हममें से अधिकतर जन बचपन से पढ़ते आये हैं :
"मरकरी , वीनस , अर्थ ; 
मार्स जुपिटर सेटर्न ; 
युरेनस नेप्चून प्लूटो ।"

लेकिन यह पूरी तरह सही नहीं है ।

एक तो प्लूटो अब ग्रहों में नहीं गिना जाता - यह एक क्षुद्रग्रह के रूप में नामांकित कर दिया गया है ।
इसके अलावा , मार्स और जुपिटर (मंगल और बृहस्पति) के बीच एक और कक्षा है - जिसमे "ग्रह" नहीं हैं - लेकिन रेगुलरली कक्षा में घूमते हुए कई शिलाखंड से हैं ।
इसके अलावा भी दूसरे अस्तेरोइड्स / कोमेट्स/ मीटियरोइट्स / कोमेट्स  आदि आदि खगोलीय पिंडों /वस्तुओं के बारे में सुना होगा आपने - लेकिन इस भाग में उन सब पर बात नहीं कर रही । यहाँ सिर्फ मेन एस्टेरोइड बेल्ट की ही बात करूंगी ।

बहुत पहले विटेंनबर्ग नामक खगोल प्रेक्षक ने तब तक ज्ञात ग्रहों (मरकरी से सेटर्न ) की विभिन्न कक्षाओं में एक तरह की समानता देखी और उस हिसाब से उन्हें लगा कि मंगल और गुरु के बीच एक और कक्षा होनी चाहिए । इस सिद्धांत का नाम हुआ टिटियस बोड सिद्धांत और बाद में  जब युरेनस ग्रह की खोज हुई तो उसकी कक्षा बिलकुल इस सिद्धांत के अनुरूप (मैच) हुई । इसके बाद एक समूह बनाया गया "खगोलीय पुलिस" { :)))) } जिन्होंने इस 360 डिग्री की कक्षा के 15 - 15 डिग्री के भागों में उस गुमशुदा गृह को खोजने का काम सम्हाला  । आश्चर्य जनक है कि इस खगोलीय पुलिस की और से पहला एस्टेरोइड नहीं खोजा गया, बल्कि किसी गैर सदस्य ( गिसेप पियाजी ) ने पहला शिलाखंड खोजा (वे पहले इसे कोमेट समझे लेकिन पूंछ न होने से इसे पुच्छल तार न मान कर ग्रह मान लिया गया) - जिसका नाम उन्होंने रखा "सेरेस" । और इसे वह खोया हुआ ग्रह समझा गया  ।

लेकिन 15 महीने बाद एक और शिलाखंड दिखा जिसका नाम पालास हुआ । तब सोचा गया कि शायद ये लघु सितारे हैं ? लेकिन ये टिमटिमाते नहीं थे - तो तारे भी नहीं हो सकते थे । इसके बाद मिला जूनो , फिर वेस्ता और फिर एस्त्रिया । इसके बाद बड़ी तेज़ी से इस कक्षा में दूसरे शिलाखंड मिलने लगे ।  तब इस कक्षा का नाम "एस्टरोइड बेल्ट" रख दिया गा और इन सब शिलाखंडों को "अस्टरोइड्स" कहा गया ।

बाद में नेप्चून की खोज ने टिटियस बोड  सिद्धांत को वैज्ञानिकों की नज़र में खारिज कर दिया क्योंकि इसकी कक्षा उसके अनुरूप नहीं थी । लेकिन इसके कारण अस्टरोइड्स की खोज हो चुकी थी । 

पहले समझा गया कि इस कक्षा में एक गृह था जो किसी खगोलीय टक्कर के कारण टूट कर बिखर गया और टुकड़े कक्षा में घूमते रहे  । लेकिन यह सिद्धांत जल्द ही खारिज कर दिया गया , क्योंकि इन टुकड़ों की बनावट आदि असमान थी  और ये बहुत छोटे थे (इस कक्षा में पाए गए सारे पिंडों का द्रव्यमान जोड़ कर भी हमारे चन्द्रमा से ४ % ही आता है) । अब यह माना जाता है कि जब सूर्य और सौर मंडल बन रहे थे तब ग्रह पूरी तरह से बने नहीं थे , बल्कि अलग अलग पिंड थे जो अपनी अपनी कक्षाओं में आने के बाद भी अलग थे  । जब ये आपस में टकराते तो "स्टिकी कोलिज़न" से जुड़ जाते और धीरे धीरे "प्लेनेटीसिमल" बने और बहुत बाद में प्लेनेट । लेकिन इस कक्षा के शिलाखंड जुपिटर के गुरुत्वाकर्षण के कारण ठीक से जुड़ ही नहीं पाए  ।

यह बेल्ट अधिकाँश रूप से खाली ही है । ये शिलाखंड इतने अधिक विस्तार क्षेत्र में फैले हुए हैं और इतने छोटे हैं कि इन तक पहुँचने के लिए बहुत ही सटीक निशाना लगाना होगा । इनकी कुल संख्या दस लाख से भी अधिक है, जिनमे अधिकाँश बहुत ही छोटे हैं ( त्रिज्या / रेडियस माइक्रो मीटर में )। कुछ तो धूल के कणों की तरह बारीक भी हैं । करीब २०० टुकड़े १०० कि.मी. से बड़े हैं ।   ७ और १७ लाख के करीब शिलाखंड ऐसे हैं जो १ कि.मी. से बड़े हैं ।  लेकिन पूरी कक्षा का कुल द्रव्यमान हमारे चन्द्रमा के द्रव्यमान का ४ प्रतिशत भर है। सबसे बड़े चार खंड "सेरेस , वेस्टा , पाल्लास , और हयजिया में ही कुल द्रव्यमान का आधा भाग समाया है । बल्कि अकेले सेरेस में ही एक तिहाई द्रव्यमान समाया है।

ये टुकड़े कार्बन , सिलिकेट, और मेटल प्रधान श्रेणियों में आते हैं । आश्चर्यजनक रूप से किसी भी शिलाखंड पर ज्वालामुखीय प्रधान चट्टानें या किसी भी तरह के ज्वालामुखीय पर्वतों के आसार नहीं मिलते (जबकि वेस्टा और उससे बड़े शिलाखंडों पर इनके पाए जाने की वैज्ञानिक अपेक्षा होती है । )

पुच्छल तारों पर विस्तार में बात किसी और जगह करूंगी । यहाँ सिर्फ इतना कहूँगी कि , माना जाता है कि  बाहरी शिलाखंडों पर बर्फ होगी जो टक्कर आदि से उदात्तीकृत हो जाती होगी जिससे ये धूमकेतु बनते होंगे , क्योंकि इनमे हाइड्रोजन ड्युटेरियम का अनुपात शास्त्रीय धूमकेतुओं से अलग है । यह भी माना जाता है (मतभेदों के साथ) कि  शायद इसी बेल्ट के कोमेट्स से पृथ्वी के सागर बने हों ।

अस्टरोइड्स आपस में टकराते भी रहते हैं । कुछ टक्करें "स्टिकी कोलिज़न" होती हैं - अर्थात दोनों जुड़ जाते हैं , तो कुछ टक्करें एक शिलाखंड को बिखेर भी देती है । इनमे से कुछ टूटे टुकड़े मीटीयरोइड बन जाते हैं  । ऐसे ही मीटीयरोइड की टक्कर से माना जाता है कि  पृथ्वी पर डायनोसौर प्रजाति का विनाश हुआ ( अटकलें ? ) ।

यह बेल्ट इतनी खाली है कि धरती के अनेक अंतरिक्ष वाहन इससे होकर गुज़र चुके हैं और अब तक कोई टक्कर नहीं हुई है । सबसे पहले पायोनियर १० इससे होकर गुजरा था ( July 16, 1972) जिसके बाद कई और वाहन गुज़र चुके हैं । डौन तो बाकायदा वेस्ता के उपग्रह की तरह घूमा July 2011 से September 2012 तक ।

आगे के भागों में आगे बात होगी । 

बुधवार, 8 मई 2013

महादानी तेजस्वी सूर्यपुत्र कर्ण का जीवन इतना त्रासदियुक्त क्यों रहा ?

कई लोग कई जगह कई बार यह प्रश्न  हैं कि महाभारत  में कर्ण जैसे "हीरो" का जीवन इतना दुखद क्यों ? सूर्यपुत्र और ओजस्वी होकर भी उसे हमेशा सूतपुत्र पुकारा गया , माँ ने टोकरी में रख कर बहा दिया आदि आदि । (वैसे तो इसी तरह के प्रश्न भीष्म और धृतराष्ट्र के सम्बन्ध में भी उठते हैं - लेकिन उन पर बात कभी और सही) । इस प्रश्न का उत्तर श्री भागवतम में मिलता है ।

चार युग हैं : 

त्रेता युग में दो कहानियों के तार कर्ण से आ कर जुड़ते हैं । 

एक असुर था - दम्बोद्भव । उसने सूर्यदेव की बड़ी तपस्या की । सूर्य देव जब प्रसन्न हो कर प्रकट हुए और वरदान मांगने को कहा तो उसने "अमरत्व" का वरदान माँगा  । सूर्यदेव ने कहा यह संभव  नहीं है। तब उसने माँगा कि उसे एक हज़ार दिव्य कवचों की सुरक्षा मिले। इनमे से एक भी कवच सिर्फ वही तोड़ सके जिसने एक हज़ार वर्ष तपस्या की हो और जैसे ही कोई एक भी कवच को तोड़े, वह तुरंत मृत्यु को प्राप्त हो । 

सूर्यदेवता बड़े चिंतित हुए। वे इतना तो समझ ही पा रहे थे कि यह असुर इस वरदान का दुरपयोग करेगा, किन्तु उसकी तपस्या के आगे वे  मजबूर थे।उन्हे उसे यह वरदान देना ही पडा । 
इन कवचों से सुरक्षित होने के बाद वही हुआ जिसका सूर्यदेव को डर था । दम्बोद्भव अपने सहस्र कवचों की सहक्ति से अपने आप को अमर मान कर मनचाहे अत्याचार करने लगा । वह "सहस्र कवच" नाम से जाना जाने लगा  । 

उधर सती जी के पिता "दक्ष प्रजापति" ने अपनी पुत्री "मूर्ति" का विवाह ब्रह्मा जी के मानस पुत्र "धर्म" से किया । मूर्ति ने सहस्र्कवच के बारे में सुना  हुआ था - और उन्होंने श्री विष्णु से प्रार्थना की कि  इसे ख़त्म करने के लिए वे आयें । विष्णु जी ने उसे आश्वासन दिया कि वे ऐसा करेंगे ।  

समयक्रम में मूर्ति ने दो जुडवा पुत्रों को जन्म दिया जिनके नाम हुए नर और नारायण । दोनों दो शरीरों में होते हुए भी एक थे - दो शरीरों में एक आत्मा । विष्णु जी ने एक साथ दो शरीरों में नर और नारायण के रूप में अवतरण किया था । 

दोनों भाई बड़े हुए । एक बार दम्बोध्भव इस वन पर चढ़ आया । तब उसने  एक तेजस्वी मनुष्य को अपनी ओर आते देखा और भय का अनुभव किया । 

उस व्यक्ति ने कहा कि मैं "नर" हूँ , और तुमसे युद्ध करने आया हूँ । भय होते भी  दम्बोद्भव ने हंस कर कहा -  तुम मेरे बारे में जानते ही क्या हो ?  मेरा कवच सिर्फ वही तोड़ सकता है जिसने हज़ार वर्षों तक तप किया हो । 

नर ने हंस कर कहा कि मैं और मेरा भाई नारायण एक ही हैं - वह मेरे बदले तप कर रहे हैं, और मैं उनके बदले युद्ध कर रहा हूँ । 

युद्ध शुरू हुआ , और सहस्र कवच को आश्चर्य होता रहा कि सच ही में नारायण के तप से नर की शक्ति बढती चली जा रही थी ।  जैसे ही हज़ार वर्ष का समय  पूर्ण हुआ,नर ने सहस्र कवच का एक कवच तोड़ दिया । लेकिन सूर्य के वरदान के अनुसार जैसे ही कवच टूटा नर मृत हो कर वहीँ  गिर पड़े । सहस्र कवच ने सोचा, कि चलो एक कवच गया ही सही किन्तु यह तो मर ही गया । 

तभी उसने देखा की नर उसकी और दौड़े आ रहा है - और वह चकित हो गया । अभी ही तो उसके सामने नर की मृत्यु हुई थी और अभी ही यही जीवित हो मेरी और कैसे दौड़ा  आ रहा है ???

लेकिन फिर उसने देखा कि नर तो मृत पड़े हुए थे, यह तो हुबहु नर जैसे प्रतीत होते उनके भाई नारायण थे - जो दम्बोद्भव की और नहीं, बल्कि अपने भाई नर की और दौड़ रहे थे  । 

दम्बोद्भव ने अट्टहास करते हुए नारायण से कहा कि तुम्हे अपने भाई को समझाना चाहिए था - इसने अपने प्राण व्यर्थ ही गँवा दिए । 

नारायण शांतिपूर्वक मुस्कुराए । उन्होंने नर के पास बैठ कर कोई मन्त्र पढ़ा और चमत्कारिक रूप से नर उठ बैठे  । तब दम्बोद्भव की समझ में आया कि हज़ार वर्ष तक शिवजी की तपस्या करने से नारायण को मृत्युंजय मन्त्र की सिद्धि हुई है - जिससे वे अपने भाई को पुनर्जीवित कर सकते हैं । 

अब इस बार नारायण ने दम्बोद्भव को ललकारा और नर तपस्या में बैठे । हज़ार साल के युद्ध और तपस्या के बाद फिर एक कवच टूटा और नारायण की मृत्यु हो गयी । 

फिर नर ने आकर नारायण को पुनर्जीवित कर दिया, और यह चक्र फिर फिर चलता रहा । 

इस तरह ९९९ बार युद्ध हुआ । एक भाई युद्ध करता दूसरा तपस्या । हर बार पहले की मृत्यु पर दूसरा उसे पुनर्जीवित कर देता । 

जब 999  कवच टूट गए तो सहस्र्कवच समझ गया कि अब मेरी मृत्यु हो जायेगी । तब वह युद्ध त्याग कर सूर्यलोक भाग कर सूर्यदेव के शरणागत हुआ । 

नर और नारायण उसका पीछा करते वहां आये और सूर्यदेव से उसे सौंपने को कहा  । किन्तु अपने भक्त को सौंपने पर सूर्यदेव राजी न हुए। तब नारायण ने अपने कमंडल से जल लेकर सूर्यदेव को श्राप दिया कि आप इस असुर को उसके कर्मफल से बचाने का प्रयास कर रहे हैं, जिसके लिए आप भी इसके पापों के भागीदार हुए और आप भी इसके साथ जन्म लेंगे इसका कर्मफल भोगने के लिए । 

इसके साथ ही त्रेतायुग समाप्त हुआ और द्वापर का प्रारम्भ  हुआ । 

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 समय बाद कुंती जी ने अपने वरदान को जांचते हुए सूर्यदेव का आवाहन किया, और कर्ण का जन्म हुआ  । लेकिन यह आम तौर पर ज्ञात नहीं है, कि , कर्ण सिर्फ सूर्यपुत्र ही नहीं है, बल्कि उसके भीतर सूर्य और दम्बोद्भव दोनों हैं । जैसे नर और नारायण में दो शरीरों में एक आत्मा थी, उसी तरह कर्ण के एक शरीर में दो आत्माओं का वास है - सूर्य और सहस्रकवच ।  दूसरी ओर नर और नारायण इस बार अर्जुन और कृष्ण के रूप में आये । 

कर्ण के भीतर जो सूर्य का  अंश है,वही उसे तेजस्वी वीर बनाता है । जबकि उसके भीतर दम्बोद्भव भी होने से उसके कर्मफल उसे अनेकानेक अन्याय और अपमान मिलते है, और उसे द्रौपदी का अपमान और ऐसे ही अनेक अपकर्म करने को प्रेरित करता है ।  

यदि अर्जुन कर्ण का कवच तोड़ता, तो तुरंत ही उसकी मृत्यु हो  जाती ।इसिलिये इंद्र उससे उसका कवच पहले ही मांग ले गए थे । 

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एक और प्रश्न जो लोग अक्सर उठाते हैं - श्री कृष्ण ने (इंद्रपुत्र) अर्जुन का साथ देते हुए (सूर्यपुत्र) कर्ण को धोखे से क्यों मरवाया ?
..... कहते हैं कि श्री राम अवतार में श्री राम ने (सूर्यपुत्र) सुग्रीव से मिल कर (इंद्रपुत्र) बाली का वध किया था (वध किया था , धोखा नहीं । जब किसी अपराधी को जज मृत्युदंड की सजा देते हैं तो उसे सामने से मारते नहीं - यह कोई धोखे से मारना नहीं होता)- सो इस बार उल्टा हुआ । 
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यह कथा कर्ण के सम्बन्ध में थी - फिर कभी ऐसी ही दूसरी कथाओं पर बात होगी । 

मंगलवार, 16 अप्रैल 2013

सौर मंडल ४: मार्स / मंगल ग्रह


धरती से अगली कक्षा में हैं (चौथा ग्रह ) मार्स / मंगल ग्रह ।

यह धरती से मिलता जुलता है । कई अवधारणायें कहती हैं कीस पर जीवन था लेकिन बाद में यह सूर्य से दूर चला गया जिसकी वजह से जीवन समाप्त हो गया । किन्तु कोई साक्ष्य नहीं हैं । धरती की ही तरह यहाँ रेगिस्तान ज्वालामुखी पहाड़, और ध्रुवीय हिमखंड हैं ।

यह लाल ग्रह भी कहलाता है क्योंकि इसके धरातल पर लोहे की बहुतायत से यह लाल रंग का प्रतीत होता है । वायुमंडल बहुत पतला है । इस पर सौर मंडल के सभी ग्रहों में सबसे ऊंचा पहाड़ ( ओलिम्पस मोंस) और गहरी खाई ( वेल्स मेरिनारिस) हैं । उत्तरी अर्धांश में ४% हिस्सा समतल बोर्लेअस बेसिन में है - जो की किसी इम्पेक्ट से बना माना जाता है ।

इसके दो उपग्रह हैं :  फोबोस और दीमोस - जो दोनों ही गोलाकार न होकर इर्रेगुलर आकार के हैं । कुछ वैज्ञानिकों का मानना है कि ये क्षुद्र ग्रह थे जिन्हें मार्स ने अपने गुरुत्वाकर्षण से बाँध कर अपना उपग्रह बना लिया ।

ध्रुवीय प्रदेशों से आती रौशनी के बदलाव और रेखाओं के कारण पहले माना जाता था कि मार्स पर तरल पानी है और ये रेखाएं नदियाँ या सिंचाई की नहरें हैं । लेकिन मरिनर ४ की छवियों से ज्ञात हुआ की ये तापमान के बदलावों के चलते बने दृष्टिभ्रम भर हैं । लेकिन प्रोब्स ने यहाँ पानी के कण और अवशेष पाए हैं और आज माना जाता है कि कभी यहाँ बड़ी मात्रा में जल खंड थे।

आज मानव के भेजे ३ उपग्रह मार्स के आस पास कक्षाओं में हैं और दो सतह पर ।

नाम : मार्स / मंगल ग्रह
रेडियस (त्रिज्या ) : 3396.2 km
मास (द्रव्यमान ):   6.4185x10^23kg
वोल्यूम (आयतन):   1.6318 x 10^11 km^3
डेंसिटी (घनत्व):   3.9335 g/cm^3
ग्रेविटी (गुरुत्वाकर्षण ): 0.38 g
तापमान :  210 K
एक दिन (अपनी धुरी पर घूमने का समय) : 1.02 earth days
एक वर्ष (सूर्य का एक चक्कर पूरा करने का समय) : 686.98 earth days

कक्षा (orbit ) का सेमी मेजर एक्सिस (बड़ा अक्ष) : 1.52 AU
उपग्रह : 2 ( आगे देखिये )

वायुमंडल का कोम्पोजीशन (संरचना ):
     95.32% कार्बोन डाय ऑक्साइड
     2.7% नाइट्रोजन
      1.6% आर्गन
     0.13% ऑक्सीजन
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उपग्रह १ : फोबोस

त्रिज्या : 11   किमी
दिन: 0.31 धरती के दिन
वर्ष: 7.7
अक्ष : ९३७७  किमी
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उपग्रह २ :डीमोस :


त्रिज्या : 6.2 किमी
दिन: 1.26 धरती के दिन
वर्ष: 29.8
अक्ष : 23460  किमी


सोमवार, 15 अप्रैल 2013

सौर मंडल ३ : धरती , चन्द्रमा

सौर मंडल ३ : धरती

धरती - हमारी धरती ।

जैसा किहम सब जानते हैं, धरती सौर मंडल का तीसरा ग्रह है । प्रामाणिक जानकारी के अनुसार यही एकमात्र ग्रह है जहां जल तरल रूप में रह सकता है क्योंकि तापमान इसके लिए उपयुक्त है । वैसे कई वैज्ञानिक दावों और खोजों के अनुसार अन्य ग्रहों पर भी जल के दूसरे रूप है -  लेकिन तरल रूप में जल रहने योग्य तापमान सौर्य मंडल में और किसी ग्रह पर नहीं पाया जाता ।

माना जाता है कि धरती पर जीवन इसी तरल जल के कारण ही संभव हो पाया है ।

१. वैज्ञानिक विचारधारा कहती है कि जल और अन्य तत्वों के संयोजन से धरती पर जीवन प्रकट हुआ
और
२. धार्मिक विचारधारा कहती है कि पहले से जीवन था, लेकिन प्रकट न होकर सुशुप्त अवस्था में था । और वह जीवन सुशुप्त अवस्था में रहते हुए भी निर्जीव तत्त्वों को अपने प्राकट्य के लिए उपयुक्त रूप में आने को प्रेरित करता रहा , ढालता रहा । और इन्हें ढाल-ढाल कर इस जोड़ सामंजस्य तक ले आया कि , तत्त्व इस तरह के जोड़ बनाएं , जिसमे जीवन अपने लक्षण प्रकट कर सके ।

धरती पर atmosphere (वायुमंडल) , hydrosphere (जल मंडल) और lithosphere (ठोस धरामंडल) हैं । इन तीनों का जहां मिलन होता है - वह स्थिति जीवन के प्राकट्य (जन्म नहीं प्राकट्य) के लिए उपयुक्त होती है - इसे biosphere कहते हैं । ऐसी परिस्थितियों में जीवन जीवों के रूप में प्रकट होता है ।

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पृथ्वी / धरती :

नाम : पृथ्वी / धरती
रेडियस (त्रिज्या ) : 6371 km
मास (द्रव्यमान ):   5.97x10^24kg
वोल्यूम (आयतन):   1.08 x 10^12 km^3
डेंसिटी (घनत्व):   5.515 g/cm^3
ग्रेविटी (गुरुत्वाकर्षण ): 1 g
तापमान :  287 K
एक दिन (अपनी धुरी पर घूमने का समय) : 1 earth days
एक वर्ष (सूर्य का एक चक्कर पूरा करने का समय) : 365.25 earth days

कक्षा (orbit ) का सेमी मेजर एक्सिस (बड़ा अक्ष) : 1 AU
उपग्रह : 1 - चन्द्रमा
( आगे देखिये )

वायुमंडल का कोम्पोजीशन (संरचना ):
     78.08% नाइट्रोजन
     20.95% ऑक्सीजन
     1% भाप
     कम मात्राओं में कार्बन दे ऑक्साइड, आर्गन आदि
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धरती का उपग्रह : चन्द्रमा

नाम : चन्द्रमा  / मून / लूना
रेडियस (त्रिज्या ) :  1737.1 km
मास (द्रव्यमान ):   7.35x10^22kg
वोल्यूम (आयतन):   2.1958x10^10km^3
डेंसिटी (घनत्व):   3.3464g/cm^3
ग्रेविटी (गुरुत्वाकर्षण ):  0.16g
तापमान : 220 K
एक दिन (अपनी धुरी पर घूमने का समय) : 27.32 earth days
एक वर्ष (धरती का एक चक्कर पूरा करने का समय) : 27.32 earth days
    (देखिएगा : दिन और वर्ष की अवधि बराबर है )
कक्षा (orbit ) का सेमी मेजर एक्सिस (बड़ा अक्ष) :  384399 km

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सौर मंडल २ मरकरी और वीनस

सौर मंडल २

मरकरी और वीनस (इस श्रंखला में मैं अंग्रेजी नामों का ही प्रयोग कर रही हूँ )

सौर मंडल के भीतरी ग्रह हैं : मरकरी और वीनस । "भीतरी" इसलिए कि इनकी कक्षाएं (ऑर्बिट) सूर्य और धरती की कक्षा के बीच हैं, अर्थात ये दोनों हमारे मुकाबले में सौर मंडल में भीतर की तरफ पड़ते हैं ।

ये दोनों ही अत्यधिक गर्म ग्रह हैं । सूर्य के पास होने के कारण आमतौर पर मन में आता है की मरकरी सबसे गर्म ग्रह होगा - लेकिन ऐसा है नहीं । वीनस मरकरी की अपेक्षा सूर्य से दूर होते हुए भी इससे कहीं अधिक गर्म है (नीचे तापमान देख सकते हैं आप इन दोनों के)  । ऐसा क्यों ?

क्योंकि, वीनस के वायु मंडल में कार्बन डाय ऑक्साइड अधिक है - जो "ग्रीन हाउस गैस" है और गर्मी को जकड लेती है, बाहर जाने ही नहीं देती  । (कुछ याद आता है ? धरती के पर्यावरण विद लगातार बढ़ते प्रदूषण और इस कार्बन डाय ऑक्साइड के कारण ग्लोबल वार्मिंग और ध्रुवीय हिमखंडों के पिघलने की चेतावनियाँ दे रहे हैं - यदि हम न संभाले तो ?)
आइये इन दोनों के बारे में जानें :

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मरकरी :


नाम : मरकरी
रेडियस (त्रिज्या ) : 2439.7 km
मास (द्रव्यमान ):  3.3 x 10^23 kg
वोल्यूम (आयतन):  6.08 x 10^10 km^3
डेंसिटी (घनत्व):  5.457 g/cm^3
ग्रेविटी (गुरुत्वाकर्षण ): 0.38 g
तापमान :  340 K = 67 डिग्री सेंटीग्रेड या सेल्सियस
                           (केल्विन तापमान = सेल्सियस तापमान + २७३ )
एक दिन (अपनी धुरी पर घूमने का समय) : 58.64 earth days
एक वर्ष (सूर्य का एक चक्कर पूरा करने का समय) : 87.96 earth days


कक्षा (orbit ) का सेमी मेजर एक्सिस (बड़ा अक्ष) : 0.38 AU
उपग्रह : कोई उपग्रह नहीं 

वायुमंडल का कोम्पोजीशन (संरचना ):
     42% oxygen
     29% sodium
     22% hydrogen
     6% helium
     0.5% potassium
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वीनस :

नाम : वीनस
रेडियस (त्रिज्या ) :  6051.8 km
मास (द्रव्यमान ):   4.8685 x 10^24 kg
वोल्यूम (आयतन):   9.28x10^11 km^3
डेंसिटी (घनत्व):   5.243 g/cm^3
ग्रेविटी (गुरुत्वाकर्षण ): 0.91 g
तापमान :   735 K  

एक दिन (अपनी धुरी पर घूमने का समय) : (-) 243.01 earth days
एक वर्ष (सूर्य का एक चक्कर पूरा करने का समय) : 224.70 earth days
कक्षा (orbit) का सेमी मेजर एक्सिस (बड़ा अक्ष) : 0.72 AU
उपग्रह : कोई उपग्रह नहीं
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वायुमंडल का कोम्पोजीशन (संरचना ):
         96.5% carbon di oxide 
         3.5% nitrogen

         बहुत कम मात्रा में सल्फर डाय ऑक्साइड ,पानी की भाप, आर्गन , हीलियम , नियोन । 

रविवार, 14 अप्रैल 2013

सौर मंडल १



अनुवाद आभार श्री गिरिजेश राव जी ।

जैसा कि हम सब जानते ही हैं, हम जिस धरती पर जी रहे हैं वह सौर मंडल का एक ग्रह है । आइये इस सौर  मंडल के सदस्यों को एक एक कर के जानें ।

परिवार का मुखिया कौन ? जो सबकी आवश्यकताओं की आपूर्ति करे, सब को एक अदृश्य आकर्षण से बाँध कर रखे फिर भी खुला भी छोड़े रहे ।  आकर्षण ऐसा कि बिना डोर के भी सभी सदस्य एक दूजे के साथ रहे । कुछ बच्चे अकेले हों तो कुछ के अपने कुनबे भी हों जो उनके साथ रहते हुए बड़े परिवार के भी सदस्य हों ।

इस परिभाषा के अनुसार सूर्य जी हमारे सौर्य मंडल के परिवार का मुखिया अवश्य ही कहला सकते हैं - नहीं ?

आइये आज इनसे परिचित हों ।

नाम : सोल
रेडियस (त्रिज्या ) : 696342 km
मास (द्रव्यमान ): 1.983x10^30 kg
वोल्यूम (आयतन): 1.412x10^18 km^3
डेंसिटी (घनत्व): 1.408x10^3 kg/m^3
ग्रेविटी (गुरुत्वाकर्षण ): 27.94 g
तापमान : 5778 K
उम्र : ४.५७ बिलियन वर्ष
कोम्पोजीशन (संरचना ):
     73% हायड्रोजन
     24% हीलियम
     0.77% ऑक्सीजन
     और इनसे कम मात्रा में कुछ कार्बन, आयरन, नियोन, नाइट्रोजन, सिलिकॉन, मैग्नीशियम , सल्फर ।
ग्रह : ९ (अब आठ)
एस्टेरोइड बेल्ट में दो बड़े पिंड जिनके नाम कम ही लोग जानते हैं : वेस्ता और सेरेस

कल मरकरी पर बात करूंगी ।

बुधवार, 10 अप्रैल 2013

हैरी पॉटर, सिरियस, और खगोल विज्ञानं


हैरी पॉटर की कहानी अधिकाँश लोग जानते ही होंगे। या तो किताबों से या फिल्मों से। यह बेसिकली बच्चों को सुनाई जाने वाली जादू से भरी अनोखी दुनिया की कहानी के रूप में आरम्भ हुई। लेकिन जब छपी , तो बिक्री के इतने रेकोर्ड टूटे कि रातों रात लेखिका सर्वाधिक धनि लोगों में शुमार हो गयीं।

दुसरे भाग तक आते आते लेखिका स्ट्रगलर न थीं। यहाँ आते आते "रिसर्च" की झलक किताब को पहले भाग की रोचकता बनाए रखते हुए भी इस श्रंखला को  किसी और स्तर पर ले जाती है। ...... आखिरी भाग आने तक तो शायद इस कहानी को बच्चों की कहानी में गिना ही नहीं जा सकता - यह तो सीधे सीधे होलीवूड फिल्म की पटकथा सी हो जाती है  । 

इसका बैकग्राउंड पहले ही बनता है जब हेड मास्टर हैरी के अंकल से कहते हैं कि हमारी दुनिया में १७ वर्ष की आयु ही "एडल्ट" है - जिसका कारण कहानी नहीं - बच्चों की कहानी तो बिलकुल ही नहीं । इसका असल कारण है कि तब तक यह फिल्म रूप में आ चुकी थी और अच्छी खासी कमाई कर रही थी - और असल जीवन में फिल्म बन्ने और कथा के समय मिसमैच के चलते वे व्बच्चे जो 12 साल की उम्र से हैरी , रोंन , हरमायनी और अन्य मित्र थे - वे असल जीवन में एडल्ट हो ही चुके थे । कथानक में बच्चों वाला कुछ रहा ही नहीं था अब तक - जबकि पहला भाग पूरी तरह बच्चों के लिए लिखी परी-कथा सा था । 
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लेकिन यह पोस्ट मैं हैरी पॉटर सीरीज पर नही लिख रही। यह पोस्ट है कथानक के चरित्रों के नाम और स्वभाव और खगोल विज्ञान के सम्बन्ध पर।

तीसरे भाग में हैरी के पिता के मित्र सिरियस की कहानी आती है। उसका चरित्र पूरी तरह सिरियस नामक तारे जैसा ही है।

सिरियस धरती से दिखने वाला रात के आसमान का सबसे चमकदार सितारा है। यह canis constellation का हिस्सा है (श्वान के आकार का constellation) । यदि आपने कहानी पढ़ी या सुनी या देखी है तो शायद आपको याद हो। जादू के विद्यालय में सिरियस सबसे चमकदार था। उसका patronus भी कुत्ते के आकार का है और वह जादू से अपने आप को कुत्ते में बदल सकता है।

इसी तरह बेल्लाट्रिक्स सबसे असंतुलित चरित्र है कहानी का। वह पागल सी है और बहुत लडाकी है। लार्ड वोल्डेमोर्ट की ही तरह उसे ह्त्या और टार्चर में मजा आता है। आसमान के सितारे बेल्लात्रिक्स के बारे में यही अवधारणा है। इस नाम का अर्थ है "lady warrior"। ( कहानी में भी तीन चार जगह बेल्लाट्रिक्स से नीली आभा / उसके बालों की नीली आभा की बात होती है । ) यह तारा सूर्य से कई गुना गर्म और असंतुलित है (कहानी की बेल्लाट्रिक्स की ही तरह) । इसकी सतह की अत्यधिक गर्मी इसकी नीली आभा का कारण है। वैज्ञानिक मानते हैं कि यह सितारा अपने जीवन के अंत पर है। लेकिन यह इतना भार नही रखता कि सुपरनोवा एक्सप्लोजन हो। (कहानी के अंत में बेल्लाट्रिक्स की मृत्यु भी बिना किसी एक्सप्लोजन के होती है )।

ऐसे और भी नाम हैं इस कहानी में। रेगुलस एक है। फिर कभी इन नामों की बात करूंगी।

शुक्रवार, 1 मार्च 2013

क्या हिन्दू धर्म हमें अपने आराध्यों की आलोचना का अधिकार देता है ?

आज रचना जी के ब्लॉग "बिना लाग लपेट के…" पर यह लेख पढ़ा : "ईश्वर - हिन्दू धर्म "। इसमें रचना जी ने हिन्दू धर्म में अवतारों के तत्कालीन सामाजिक बिहेवियर और उसपर हिन्दू धर्मावलम्बियों द्वारा होने वाली आलोचना और उसके लिए धार्मिक सम्मति पर लिखा है । इस पर टिप्पणी लिखने लगी , तो वह टिप्पणी पूरी पोस्ट ही बन गयी - इसलिए वहां लिंक दे कर यहाँ पोस्ट के रूप में पब्लिश कर रही हूँ ।

इससे पहले भी मैं इसी "हिन्दू धर्म में अवतारों" की आलोचना , उनकी "मानवीय गलतियों" की आलोचना आदि पर , इस ब्लॉग पर , यहाँ लिखा था , लिंक क्लिक कर आप फिर से पढ़ सकते हैं ।
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-त्रुटी सुधार 
पूरे लेख में "आलोचना" शब्द से अर्थ "निंदा की मंशा से की गयी आलोचना " पढ़ा जाए । यह सुधार आदरणीय सुज्ञ जी के दिए कमेन्ट और "आलोचना" और "निंदा" में फर्क के सन्दर्भ में है ।   
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यह हिन्दू धर्म की "खासियत" या "तारीफ़" की बात नहीं है की हम अपने आराध्यों की आलोचना करते हैं, बल्कि यह हमारी कमी है, कि हमने इसे इतना common बना लिया कि अब यह हमें normal लगने लगा है । एक रेपिस्ट के लिए रेप करना "normal" है, एक चोर के लिए चोरी करना "normal" है, एक डाकू के लिए डाका डालना भी normal है । इसका अर्थ यह नहीं है कि यह सब सच ही में नोर्मल है । .............. और इसी तरह से आराध्यों की आलोचना भी normal नहीं है, और "हिन्दू" या कोई भी समाज / धर्म इसे सही नहीं ही मानते हैं / ठहरा रहे हैं ।

हम ऐसा इसलिए समझने लगे हैं, कि हमें अपने धर्म के बारे में सही जानकारी ही नहीं है । 

जानकारी कैसे हो ? एक तरीका था कि हम धर्मग्रन्थ पढ़ कर जानते - लेकिन हमने तो अपने ग्रन्थ भी नहीं पढ़े (जिससे हम जान पाते) कि हमारा धर्म क्या कहता है (समय कहाँ है हमारे पास यह सब पोथियाँ पढने  के लिए ???) । और दूसरा तरीका था धर्म गुरुओं से आम इंसान धर्म के बारे में जान पाता । वह भी नहीं हुआ , क्योंकि गुरुओं से सीखना तो खैर आज के modern ज़माने में हमें अपनी तौहीन ही लगती है, और सच्चे गुरु भी इस कलियुग में मिलना बड़ा कठिन है :(  :(  ....... तो उस दिशा से भी हम कभी नहीं जान पाए कि "क्या हमें अधिकार है भी या नहीं यह "आलोचना" करने का ।"

अवतारों की आलोचना करने का अधिकार हमें "हिन्दू धर्म" नहीं देता - यह हमारा धर्म के बारे में अज्ञान है जो हम ऐसा सोचते हैं कि हमारा धर्म हमें इन अवतारों के बारे में "क्रिटिकल" होने का अधिकार देता है । तीन उद्धरण दे रही हूँ अपनी बात रखने के लिए ।

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१. रामायण में बाली राम से प्रश्न करता है कि आपने मुझ पर छुप कर वार क्यों किया - अर्थात आलोचना । राम उत्तर देते हैं कि मेरे निर्णय के कारण मैं जानता हूँ - तुम्हे प्रश्न करने का अधिकार ही नहीं है । अर्थात - जिसे मारा गया - उसे तक भी आलोचना का अधिकार नहीं है , हमारी और आपकी तो खैर बात ही छोड़ दीजिये ।
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२. गीता में कृष्ण कहते हैं कि

(४.६ से ४.९ 4.6 to 4.9 )
"सब जीवों का प्राणदाता, अजन्मा, ईश्वर हो कर भी , मैं , अपनी प्रकृति को अपने अधीन कर (धर्मरक्षा के लिए और अधर्म के नाश के लिए ) प्रकट होता हूं । जो मुझे और मेरे अवतरण को दिव्य जानते हैं, वे मुझे प्राप्त करते हैं"

( ४.१४ 4.14)
"मैं अपने कर्म में लिप्त नहीं होता - इसलिए कर्मफल में नहीं बंधता । और जो ज्ञानीजन इस बात को समझते हैं वे भी कर्म से नहीं बंधते "
****(आपके शब्दों में "कर्मों की आलोचना" - यह भी कर्म फल ही होता है , और यह ज्ञानीजन नहीं करते)****

(९ .९ से ९ . ११ 9.9 to 9.11 )
" मैं सब कर्मों को करते हुए भी उनमे आसक्ति नहीं रखता, तो कर्म मुझे नहीं बाँध सकते । जो "मूर्ख" इस बात को नहीं समझते, वे मूर्ख , मानव रूप में विचरण करते हुए मुझ "दिव्य" को नहीं पहचानते और मेरी आलोचना करते हैं । वे मोहित हुए (माया से, अपने अज्ञान को ज्ञान समझ कर के मोह में विमूढ़ / बेसुध हुए ) इन "राक्षसी" और "नास्तिकता की" बातों की ओर आकर्षित होते हैं, और मुक्ति की संभावनाओं से दूर होते जाते हैं ।
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३. रामचरित मानस में जब शिव जी सती जी को राम जी की लीलाएं सुनाते हैं तो सती जी इस "मानव अवतार" के "परमेश्वर" होने पर अविश्वास करती हैं, राम जी की मानवी लीलाओं की "आलोचना" करते हुए प्रश्न करती हैं , कि "ऐसे मूर्ख मानव संवेदनाओं में बहने वाले को आप परमेश्वर कहते हैं ?" तब शिव जी उन्हें बहुत समझाते हैं, कि यह सब लीला है और प्रभु की "आलोचना" करना महापाप है । 

किन्तु सती जी को समाधान नहीं होता और वे अपनी "आलोचना" पर मन ही मन अडिग रहती हैं । इस पर एक बहुत लंबा वर्णन है जिसके अंत में शिव द्वारा मानस रूप से सती जी का त्याग होता है, और आखिर सती जी भी मानव संवेदनाओं की ही लीला रचते हुए (जिन संवेदनाओं की उन्होंने राम जी में आलोचना की थी) अपने पिता की यज्ञशाला में आत्मदाह कर लेती हैं ।

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यह तीनों वर्णन कहने का मतलब है कि "धर्म" आपको , या मुझे , या किसीको भी , ईश्वर की / अवतारों की , "आलोचना" करने आ अधिकार नहीं देता । यह तो पिछले ६-७ शताब्दियों में विदेशी धर्मों के विदेशी प्रचारकों (और बाद में विदेशी प्रचारकों और देशी धर्मान्तरित अव्लम्बियो, जो भूल चुके थे कि उनके पुरखों को कैसे धर्मान्तरित  किया गया था ) की फैलाई हुई सीख है जो हिन्दुओं को इस भ्रान्ति में डाल रही है कि "तुम अपने आराध्यों की "आलोचना" करने को स्वतंत्र हो ।"

क्योंकि उस पराधीन कालखंड में (पहले मुग़ल और फिर ब्रिटिश राज्य के कालखंड ) यह "आलोचना" राज करने वालों "शक्तिवंतों" की ओर से आती थी , विरोध करने का अर्थ मृत्युदंड था ।  इसलिए यह सदियों तक सुनते सुनते जनमानस के मन में "acceptable" हो गयी । 

माता पिता भी सत्य बताते हुए डरते , कि आखिर बच्चे तो बच्चे होते हैं, उन्हें सत्य कहा , तो वे बाहर कह देंगे, और मारे जायेंगे । तो वे बच्चों को "बड़ा" होने पर बताने के लिए बात को टाले रखते । लेकिन विडम्बना यह है कि , बच्चे बड़े होने तक उनकी विचारधाराएं पक जाती है, उनके मन में "आलोचना" पक्की बैठ जाती है । यही हमारे धर्म के साथ हुआ ।

फिर देश में सरकार बनी जो हमें "secularism" की पट्टी पढ़ाती रही, इतिहास की पुस्तकों से वह सब क्रूरताएं छिपाई रखी गयीं कि किस तरह "हिन्दू" को जबरन धर्म के बारे में भ्रमित किया गया । इसलिए हम यही समझ रहे हैं कि यह "आलोचना" सही है, बल्कि इससे भी आगे बढ़ कर यह समझ रहे हैं कि हिन्दू धर्म की सीख ही है कि आराध्यों की आलोचना करो । जबकि यह अर्धसत्य है, जो झूठ से भी अधिक खतरनाक होता है ।

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"साम" "दाम" "दंड" "भेद" ये चार तरीके होते हैं मनुष्य को उसके विश्वासों से डिगाने के लिए । इस "धर्म निंदा और धर्मांतरण" के सिलसिले में, जब हिन्दू "गुलाम" थे और "दुसरे धर्मों वाले" हमारे राजा थे, इन चारों नीतियों को ऐसे इस्तेमाल किया गया । 

साम का अर्थ है समझाइश : हमें समझाया गया कि हमारे आराध्य "imperfect" हैं, उन्होंने तो बहुत सी "मानवीय भूलें" की हैं, वे आराधना के योग्य हैं ही नहीं ।

दाम का अर्थ है : जो गरीब / दरिद्र थे - उन्हें धन के बल पर / पैसे दे कर / जमीन दे कर आदि धर्मान्तरित किया गया ।

दंड अर्थ है - सजा के डर से (टार्चर) 
( गूगल इमेजेस में "gurudwara mahtiana sahab" डाल कर सर्च कीजिये । कुछ अंदाज़ होगा की धर्म परिवर्तन स्वीकार न करने पर किस तरह माओं के आगे उनके दुधमुंहे बच्चों को काटा गया - पहले एक हाथ , फिर दूसरा हाथ , फिर एक पैर ..... :( ।  देखिएगा , कैसे साधू को लकड़ियों में बाँध कर उनके शरीर को आरी से दो भागों में काटा गया, पानी / तेल के बड़े बर्तन में खडा कर के आग पर उबाला गया , कैसे सर की चमड़ी बालों सहित खींच कर उखाड़ ली गयी , आदि…। इसी सब से हिन्दू धर्म और समाज की रक्षा के लिए सिख गुरुओं ने "सिख" बनाए ।

पंजाब के हर "हिन्दू" परिवार का एक बेटा मोना (हिन्दू) होता तो दूजा बेटा सिख । लेकिन आगे औरंगजेब ने दसवें सिख गुरु, श्री गुरु गोबिंद सिंह जी, के सभी सुपुत्रों को मरवा दिया , तो गुरु परम्परा आगे न बढ़ सकी और हमें यह सिखा दिया गया कि "सरदार" के "मूर्ख" होने पर चुटकुले बनाए , सुनाएं, और उनकी हंसी उडाये - जिससे उनका मनोबल भी टूटे और हमसे "भेद:" भी हो ।:(

भेद का अर्थ है जनसँख्या के एक समूह को यह समझाना कि दूसरा समूह तुम्हारा शत्रु है, तुम्हारा शोषण कर रहा है । या इसके -उलट  की वह समूह मूर्ख है, तुमसे नीचा है । नफरत की ऐसी बेल बोई गयी कि "हिन्दू" भूल ही गया कि वह क्या था । वह स्त्री और पुरुष, उच्च वर्ग और निम्न वर्ग, सिख और हिन्दू , मद्रासी और हिंदी, जाति आदि में विभाजित हो कर "धर्म आलोचक" बन गया ।
"

मैं यह सब कह कर सिर्फ इतना समझाने का प्रयास कर रही हूँ कि हिन्दू धर्म हमें कदापि अपने आराध्यों की आलोचना करने की स्वतन्त्रता नहीं देता, यह हमें झूठी पट्टी पढ़ाई गयी है , समय आ गया है की अपनी आँखों पर बंधी पट्टी को हम उतार फेंकें ।

गुरुवार, 28 फ़रवरी 2013

माता पिता, बच्चे , और दादाजी


यह कहानी मेरी नहीं, कई बार पढ़ी होगी आपने ..... एक बार और सही ....

एक घर में माता पिता ,  उनके दो बच्चे ,  और दादाजी रहते थे ।

दादाजी की उम्र बहुत हो गयी थी, और उनके हाथ कांपते थे । कभी हाथ से चम्मच गिर जाते, कभी दूध के ग्लास से दूध फ़ैल जाता । पति पत्नी आये दिन की परेशानी से तंग आ गये थे ।

एक दिन उन्होंने सोचा कि बहुत हो गया । यह रोज़ रोज़ खाने के बीच का खलल, बीच में रुक कर सफाई - यह सब कितने दिन चलेगा ? तो उन्होंने दादाजी के लिए कोने में एक दूसरी मेज का इंतज़ाम कर दिया । चीनी के बर्तन टूटने से बचाने के लिए उन्हें लकड़ी का बर्तन मिलता भोजन के लिए । 

बेचारे दादाजी - क्या करते ? किसीसे कुछ कहते नहीं थे, बस चुप से अपने कोने में बैठ कर भोजन करते । जब जब कुछ गिरता , बेटे बहु की क्रोधित बातें भी सुनते और चुप चाप खाते रहते । 

कुछ दिन गुज़रे , पोता बड़ा हो चला था । एक दिन पोता गराज में लकड़ी से कुछ बना रहा था - बड़े जतन से । माँ ने - पूछा बेटा - क्या बना रहे हो ? -जवाब आया  लकड़ी के बर्तन बना रहा हूँ । जब आप दोनों दादाजी जैसे बूढ़े हो जायेंगे ......

फिर ?
फिर क्या - पति पत्नी की आँख खुल गयी - अगले ही दिन बेटे ने बूढ़े पिता को बड़े प्रेम से अपने साथ बिठाया और बुजुर्ग व्यक्ति उस दिन से पूरे प्रेम के साथ बाकी परिवार के साथ बैठने लगे । 

क्या हम भी अपने लकड़ी के बर्तनों का इंतज़ार कर रहे हैं ?  या हम अपने पिताजी के कांपते हाथों को थामने को तैयार हैं ?

रविवार, 24 फ़रवरी 2013

सभ्यता शासन क़ानून व्यवस्था दंड प्रक्रिया 5 : स्त्रियाँ - एक और वर्ग समूह

पुराने भाग 1    4   

इस भाग में "स्त्री - पुरुष" वर्ग विभिन्नता, और अगले भाग में इन असमानताओं के चलते बन गए , सही और गलत , सामाजिक नियमों, परम्पराओं और "शोषण" आदि पर बात करेंगे

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इस पोस्ट में माँ और पिता की पहचान आदि के सम्बन्ध में मैं जो कह रही हूँ, यह बात मैं सभ्य समाज के बन जाने के बाद की नहीं कर रही हूँ - समाज के स्थापन के पहले की कर रही हूँ । 

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स्त्री पुरुष वर्ग क्या सचमुच भिन्न हैं, या यह समाज का बनाया हुआ या थोपा हुआ वर्ग है ?

मुझे निजी तौर पर लगता है की समाज द्वारा कोई भी चीज़ तब तक थोपी ही नहीं जा सकती जब तक भीतर से फर्क न हो उन दोनों वर्ग समूहों के अधिकांश व्यक्तियों के स्वभाव और प्रवृत्तियों में । 

तो क्या इससे पहले के भाग में जो मैंने मानुषी स्वभाव की स्वाभाविक रुचियों की बातें कीं - क्या स्त्रियों में वे ही चार प्रकार नहीं होते ? जो स्त्रियाँ सब एक ही समूह में आ गयीं  ? क्या सभी स्त्रियों की एक सी प्रवृत्तियां होती हैं ???

नहीं - स्त्रियों में भी हर तरह की रुचियाँ होती हैं । संसार में सभ्य समाज की स्थापना के पहले के समय में , जब स्त्री और पुरुष दोनों ही अस्तित्व के लिए संघर्षरत थे, तब तो निश्चित तौर पर किसी भी दूसरी प्रजाति ही की तरह स्त्री-पुरुष दोनों ही बराबर रहे होंगे । दोनों अपनी अपनी शारीरिक आवश्यकताओं के लिए भोजन इकठ्ठा करते होंगे, फल, फूल, शिकार आदि । 

मैंने इस शृंखला के एक पुराने भाग में भी लिखा था - मानव स्तनधारी जीव हैं , जिनमे प्राकृतिक रूप से दूसरी प्रजातियों से कहीं अधिक संतान प्रेम दीखता है । मनुष्य में "साथ ढूँढने" और "परिवार जोड़ने" की प्रवृत्ति दुसरे स्तनधारियों से भी कहीं अधिक है, क्योंकि मानव बालक की संभावनाओं के पूर्ण विकास के लिए अन्य प्राणियों से कई गुना अधिक समय और लगन की आवश्यकता है । सिर्फ़ शारीरिक विकास का प्रश्न ही नहीं है, मानसिक और आध्यात्मिक, वैज्ञानिक और कलात्मक, अनेकानेक संभावनाएं हैं । इन सब संभावनाओं के साथ ही स्मृति है, तो पुराने विकास को याद रख कर अगली पीढ़ी को देने का अवसर भी है । मानव संतान को , शारीरिक देख रेख की भी, और देख रेख के समय खंड की अवधि के सम्बन्ध में भी , देख रेख की दूसरी स्तनधारी प्रजातियों से अधिक आवश्यकता है।  

जैसा हम हर स्तनधारी जीव में देखते हैं - सन्तति के प्रति माँ का लगाव और माँ सन्तति को माँ की आवश्यकता - दोनों ही - हर स्तनधारी जीव में - पिता से कहीं अधिक है । माँ के गर्भ में पलने से, और उसके दूध पर जीवित रहने के लिए पूरी तरह निर्भर होने से - संतान का जीवन के आरंभिक चरणों में - स्वाभाविक रूप से संतान का माँ के प्रति (और माँ का संतान के प्रति) लगाव पिता से कहीं अधिक दिखता है । 

फिर ? क्या पिता की कोई भूमिका ही नहीं ? शुद्ध वैज्ञानिक रूप से बताइये - मनुष्य के अतिरिक्त दूसरी प्रजातियों को देख कर बताइये - पिता का योगदान सिर्फ जीवन के निषेचन के बाद होता है क्या ? होता है तो कितना ? क्या माँ जितना ही ? यदि दुसरे जीवों में यह नहीं है , या न के बराबर है, लेकिन मनुष्य में इतना गहरा नाता है - तो यह फर्क क्यों है ?

यह फर्क इसलिए है कि मानव में अपनी सन्तति और फिर उसकी सन्तति से प्रेम होना शारीरिक आवश्यकताओं की पूर्ती के लिए नहीं, बल्कि मानसिक, और अन्य क्षमताओं, की प्रगति के लिए,  स्वाभाविक तौर पर उपजा है । पीढ़ियों के अर्जित ज्ञान का हस्तांतरण तब ही हो सकता है, जब उसके "योग्य सामाजिक माहौल" हो  । और समाज की संकल्पना तो परिवार की इकाई के विकास के बाद ही हो सकती है । 

तो पिता और माता एक इकाई में कैसे बंधें ? संतान को दोनों ही की देख रेख मिले इसकी व्यवस्था कैसे की जाए ?

जाहिर तौर पर - माँ का होना, और माँ की पहचान तो संतान के जन्म और उससे भी पहले उसके गर्भवती होने भर से ही , और प्रसूति से भी , स्वयं सिद्ध है । जन्म के बाद भी सहज और निहित तौर पर ही माँ का सन्तति से जुड़ाव है ही, पहचान और ऐक्य है ही । किन्तु पिता के प्रति ऐसा बिलकुल नहीं है । 

आज नारीवाद चीख चीख कर कहते हैं कि प्रकृति ने नारी से अन्याय किया पहले ऋतुस्राव की परेशानी फिर गर्भ का बोझ और फिर संतान उत्पन्न करने का दर्द और उसकी देख रेख की ज़िम्मेदारी । यह बात सिरे से ही मूर्खता पूर्ण है  । मातृत्व सुख सिर्फ मानव स्त्री ही नहीं पाती, हर प्रजाति की मादा संतान सुख पाती है । और यह ऐसी भेंट है जिसके लिए कोई भी "कीमत" लग ही नहीं सकती, यह संभव ही नहीं है । माँ बन जाने का सुख संसार की किसी भी चीज़ से बड़ा है - माँ होना , जन्म देना स्वार्गिक अनुभूति है, जिसे झुठलाया नहीं जा सकता न ही परिभाषित किया जा सकता ही है । 

फिर पिता ? उसका प्रेम, उसकी स्थिति ? संतान का जुड़ाव उससे कैसे हो ? माँ से तो स्वाभाविक रूप से हो ही गया - किन्तु पिता से कैसे हो ? याद रहे -  और यह बात मैं सभ्य समाज के बन जाने के बाद की नहीं कर रही हूँ - समाज के स्थापन के पहले की कर रही हूँ । संतान की पहचान अपनी जननी "माँ" से तो अन्तर्निहित है, लेकिन पिता का नाम माँ से ही मिल सकता है । यह तब ही हो सकता है जब एक स्त्री का एक ही पुरुष से सम्बन्ध हो । समाज बाद में आये, परिवार और कुनबे पहले बने  । उससे पहले मानव झुण्ड में भले ही रहते हों परस्पर रक्षा और अस्तित्व के लिए, किन्तु समाज का अर्थ सिर्फ साथ रहना भर नहीं होता । 

तो - समाज की प्रस्थापना से पहले ही पारिवारिक इकाइयां और फिर कुनबे बनते गये होंगे । 

स्त्री के पास तो प्रकृतिदत्त सहज भेंट थी - माँ होने की । उस संतान पर प्रेम का दावा करने वाले पुरुष ( पिता ) के पास यह सुविधा नहीं थी । उसे अपनी पहचान के लिए माँ के कथन पर निर्भर होना था  ।उस्के बदले वह स्त्री को क्या दे कि स्त्री उसके साथ अपनी बाकी रुचियों को छोड़ कर सिर्फ उसकी बनी रहे ? 

ध्यान देने की बात है कि नव प्रसूता मादा (स्त्री नहीं हर प्रजाति की मादा) की रुचि सिर्फ और सिर्फ अपनी संतान में होती है । नवजात शिशु की माँ होने का नशा ऐसा है जो हर दूसरी रूचि को कुछ समय के लिए पृष्ठभूमि में फेंक देता है । नवप्रसूता शेरनी हो या बिल्ली, वह अपनी संतान की सुरक्षा को लेकर अत्यधिक हिंसक और चिंतित होती है, और वह कदापि उस बच्चे को छोड़ कर इधर उधर नहीं जाना चाहती । इससे भी आगे, मानव प्रजाति की नवप्रसूता तो बाकी प्रजातियों से कहीं अधिक शारीरिक कष्ट से गुज़र कर माँ बनती है, और उस समय शारीरिक रूप से बहुत कमज़ोर होती है ।  ऐसे में यदि मानव "पुरुष" यह जिम्मा ले ले कि  वह उस माँ और उसकी सन्तति के भरण पोषण का पूरा इंतज़ाम करेगा, तो माँ निश्चिन्त हो कर सिर्फ संतान को अपना समय दे सकती थी, जिसमे उस सीमित समयावधि में उसकी रूचि बाकी सब रुचियों से अधिक होती । 

फिर से ध्यान दीजिये - मैं समाज आदि के पहले के जंगली समय की बात कर रही हूँ  । तब न TV  था, न पुस्तकें न मनोरंजन के अन्य साधन । शारीरिक ऊर्जा अत्यधिक थी, शक्ति भी , जबकि मानसिक चिंताएं सिर्फ  अस्तित्व बचाने तक सीमित थीं । तो ऐसी कोई रुचियाँ नहीं थी जो नवप्रसूता माँ को अपनी संतान से दूर खींच रही हों  । और पुरुष को भी सिर्फ अपनी स्त्री और सन्तति की प्राणरक्षा और भरण पोषण का इंतज़ाम करना था (जो अपने आप में काफी कठिन होता होगा उस समय खंड में ) । लेकिन मनोरंजन के कोई बहुत अधिक साधन न होने से यौनाकर्षण आज से कहीं अधिक रहा होगा, तो संतानें होती चली जाना बहुत स्वाभाविक होता होगा । तो स्त्री नवप्रसूता की स्थिति में ही होती अक्सर, और उसे रूचि संतान में होती, और पुरुष को परिवार के जीवन यापन का प्रबंध करना होता । 

जब परिवार है, तो घर भी चाहिए । घर है तो उस को सजाना सम्हालना भी होगा  । यदि पति शिकार पर गया है, जाता है, रोज जाता है , तो घर की देखभाल स्वतः ही नारी पर आ गयी होगी , क्योंकि वह संतान के साथ उसकी सुरक्षा के लिए घर पर रहती होगी । यह कोई ऊपर से थोपी हुई स्थिति न हो कर प्रकृतिजन्य स्थित थी, जिसमे "शोषण" जैसी कोई कल्पना नहीं थी । 

पुरुष को सन्तति पर अपना अभिज्ञान चाहिए, स्त्री को अपनी संतान की देख रेख में सहयोग चाहिए  । जो जोड़े एक दुसरे की इस आपसी आवश्यकता की पूर्ती कर रहे हों, वे स्वाभाविक रूप से साथ रहने लगे, रहते रहे - तो परिवार की इकाई बनी होगी । इसमें शोषण कहाँ है ? कार्य के बंटवारे को तात्कालिक रूचि के अनुरूप किया गया - और वह धीरे धीरे आदत में आ गया , "स्वाभाविक रूचि" से हट कर "अपेक्षित कर्त्तव्य" में परिवर्तित हो गया होगा ।  

जिन स्त्री और पुरुष दोनों की रुचियाँ एक सी हुईं वे एक दुसरे पर आकर्षित होते, और साथ जीवन यापन करते।धॆरे धीरे समाज का विकास हुआ होगा  ।और विभिन्न रुचियों के समूह बनते अगये होंगे जैसा मैंने पिछली पोस्ट में कहा था । स्वाभाविक तौर पर, पढने लिखने वाले परिवारों में जन्मी संतान (चाहे बच्ची या बच्चा) की रूचि उस ओर ही बढती । लेकिन सामाजिक समूह बन जाने से पहले ही, पाषाण काल से ही , परिवार में स्त्री और पुरुष के कार्यक्षेत्र का विभाजन हो आया था ।  

तो यह ऐसा था की - लड़कियों को पढने, शिकार सीखने धनुष्बाजी  सीखने, आदि आदि "बाहरी कार्य सीखने की कोई आवश्यकता नहीं है, क्योंकि उसके पास  मातृत्व की पूँजी है" । जिसके "बदले में" उसे जीवन भर सम्हालने के लिए, उसका भरण पोषण करने के लिए "पुरुष"  स्वयं सामने आयेंगे । तो आवश्यक नहीं कि वह ज्ञान, शक्ति या धन अर्जित करने की प्रतियोगिता में पड़े । यह "न करने की सुविधा"  कब और कैसे "न कर सकने की मजबूरी" में बदल गयी होगी, कोई जान ही न पाया होगा।

जैसा मैंने पिछली पोस्ट में कहा था - ज्ञान, शक्ति और धन, ये तीनों शक्ति के तीन केंद्र हैं जिनसे समाज चलता है । समाज निर्माण के पहले के जंगली समय में तो स्त्रियाँ बाकी तीनों शक्तिकेंद्रों से बढ़ कर मातृत्व शक्ति केंद्र होने से परम धनिक थीं, तो उन्हें माँ के रूप में पूजा गया, अर्थात सिर्फ माँ बन पाने के कारण ही पुरुष ने उन्हें शीश पर लिया , पूजनीय माना, उनकी सेवा की । 

लेकिन समय बीतने के साथ स्थिति पूरी तरह पलट गयी । इस स्वाभाविक "सन्तति प्रेम" में उलझी रह गयी स्त्री पुरुष के समकक्ष अपनी प्रतिभाओं की प्रगति करने में पिछड़ गयी, और ज्ञान, दर्शन , शक्ति, धन हर क्षेत्र में उन्होंने अपनी रूचि होते हुए भी इन रुचियों के "संतान प्रेम की रूचि" से कमतर होने के कारण उतनी प्रगति नहीं की जितनी वे स्वाभाविक तौर पर कर सकती थीं  । इस बीच बाकी हर क्षेत्र में हो रही प्रगति में न तो तत्कालीन स्त्रियाँ सहभागी ही हो सकीं , न जान ही सकीं कि हो क्या रहा है  । तो आरंभिक दर्शन बनाए पुरुषों ने , धर्मग्रन्थ लिखे पुरुषों ने, परिभाषाएं गाढ़ी पुरुषों ने । स्वाभाविक ही था कि उन दर्शनशास्त्रों में पुरुष का ही दर्जा स्त्री से ऊपर था  । 

परिवार की इकाई की संस्थापना ऐसे हुई होगी (जो पाषाण युग में पुरुष का स्त्री के स्वाभाविक मातृत्व से प्राप्त "संतान पर अधिकार" को अपना नाम देने और सहभागी होने की आवश्यकता से शुरू हुआ होगा) 

पुरुष की स्थिति :-
"अपनी संतान पर तुम्हारी पहचान और अधिकार तो स्वयं सिद्ध है । तुम मुझे अपनी स्वयंसिद्ध संतान पर पहचान और अधिकार दो - उसके बदले में मैं तुम्हे सब सुविधायें  दूंगा । यदि मैं राजा हूँ, तो तुम रानी । यदि मैं यज्ञकर्ता हूँ तो तुम उस यज्ञ में बराबरी की सहभागिनी होगी, यदि मैं धनार्जन करता हूँ तो तुम उस धन की बराबरी की स्वामिनी होगी । मेरी शक्ति, मेरे ज्ञान, मेरी संपत्ति आदि सब पर तुम्हारा मेरे ही जितना अधिकार होगा, तुम्हे सिर्फ इतना करना है कि तुम्हारे गर्भ से जन्मी हर संतान "मेरी संतान" होने की मुझे आश्वस्ति देनी है (जो तब ही हो सकता था जब स्त्री शारीरिक तौर पर सिर्फ एक पुरुष के साथ सम्बन्ध बनाए)"   

स्त्री की स्थिति :-
"मैं माँ हूँ । मैं तुम्हे यह आश्वासन देती हूँ कि मेरी हर संतान तुम्हारी होगी (जो तभी संभव था जब स्त्री "पतिव्रता" हो)  । इसके बदल तुम मेरी , और मेरी संतानों की , आवश्यकताओं की पूर्ती करोगे और तुम भी मेरे प्रति निष्ठावान रहोगे । तुम्हारी हर वस्तु पर मेरा बराबर अधिकार होगा । "

यह शायद विवाह संस्था की शुरुआत थी । फिर संतानों के साथ इकाई हो जाने से सन्तान और माता पिता का स्वाभाविक प्रेम होने से , उसकी भलाई आदि के चलते, उसके जीवन साथी का चुनाव भी "अनुभवी और समझदार" परिवार की ओर से होने लगा होगा ।  लडकी को माँ बनना है, उसी "मातृत्व" संपदा पर जीवनयापन करना है , तो उसके लिए परिवार खोजने में माता पिता अपने ही जैसे (या बेहतर) परिवार की तलाश करते - और यह सब धीरे धीरे हर एक वर्ग समूह में बैठता चला गया होगा । 

जीवन की राह पर चलने के तरीके का चुनाव "स्वरूचि" से बदल कर "दूसरों के अनुसार रहने/ करने की मजबूरी" हो जाने पर जीवन शैली स्वाधीन नहीं रहती , परतंत्र हो जाती है । "प्रेम और भला सोचना" धीरे धीरे "अधिकार ज़माना और शोषण" में बदल जाता है । संतान प्रेम/ मोह में अंधी हुई और उस "मातृत्व शक्तिकेंद्र" की स्वामिनी होने से "पूजित और सेवित" बनी स्त्रियों के साथ यही हुआ होगा । ठहरा पानी अक्सर सड़ने लगता है  । सन्तान और मातृत्व की शक्ति पर सीमित रह गयी स्त्री , पुरुष के समकक्ष प्रगति न कर सकी, और धीरे धीरे परिवार संस्था ने उसे जकड लिया होगा । वह स्वतंत्र से मजबूर , और सेवित से सेविका , बन गयी होगी । 

विभिन्न वर्गों द्वारा विभिन्न वर्गों के बारे में विचार, शोषण आदि पर आगे के भागों में बात होगी । 

पढने के लिए आभार ।  

जारी ..... 

बुधवार, 20 फ़रवरी 2013

सभ्यता शासन क़ानून व्यवस्था दंड प्रक्रिया 4

पुराने भाग 1  2  3  

इस भाग में मैं इन व्यवस्थाओं के चलते बन गयी वर्ण व्यवस्था और वर्ग असमानता  के कारणों पर बात करूंगी । 

अगले भाग में "स्त्री - पुरुष" वर्ग विभिन्नता, और उसके अगले भाग में इन असमानताओं के चलते बन गए , सही और गलत , सामाजिक नियमों, परम्पराओं और "शोषण" आदि पर बात करेंगे 
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यह नीला भाग वह है जो मैंने पिछले भाग में मैंने कहा , इसे न पढ़ना चाहें तो यह नीला भाग छोड़ कर नीचे चले  जाएँ)

मुझे लगता है कि अपने समाज में आदर पाने की इच्छा हर मनुष्य में अन्तर्निहित है । इस निहित इच्छा की पूर्ती तभी हो सकती है जब व्यक्ति कोई न कोई ऐसा कर्म करता हो, जो उसे दूसरों के मन में सम्मानित बनाए। सम्मान प्राप्त करने योग्य कर्म क्या होंगे ? 

1. समाज की / समाज के मूल्यों की (बाहुबल , शक्ति , अस्त्र शस्त्रादि से ) रक्षा करना (क्या आज हम अपने सेना के जवानों का आदर नहीं करते क्योंकि वे अपनी जान खतरे में रख कर हमारे जीवन और समाज को रक्षित करते हैं?) 

2. ज्ञान पथ पर चलना / पुराने अर्जित ज्ञान को नयी पीढ़ी तक पहुंचाने और सम्हालने का कार्य करना / नयी नयी खोजें करना / विद्यार्जन और विद्यादान करना , वैद्य आदि हो कर लोगों की जान बचाना, दर्द दूर करना । (आज भी साइंटिस्ट डॉक्टर्स और टीचर्स का बहुत सम्मान है समाज में) ।

3. धनवान होना, समाज की / लोगों की ज़रूरतों की चीज़ें बनाना / बेचना, कई लोगों को रोजगार मुहैया करा सकना (आज के टाटा बिडला अम्बानी की तरह?)

मैं धार्मिक व्यवस्थाओं / सुव्यवास्थाओं / कुव्यवस्थाओं या अप्व्यवस्थाओं की बात नहीं कर रही, मैं सिर्फ सम्मान पाने के योग्य कर्म पथों की बात कर रही हूँ ।

मुझे लगता है की इन कर्मों में लगने वाले लोग क्रमशः क्षत्रिय, ब्राह्मण और वैश्य कहलाये होंगे समाज की नयी नयी गढन के समयखंड में जिनकी रूचि इन तीनों कर्मों में स्पेसिफिक न रही हो, वे इन तीनों कर्मों में लगे लोगों का सहयोग करने लगे होंगे, और यह "सिर्फ सहयोग" या "सेवा कर्म" बाकी तीनों कर्मों से क्षुद्र माना गया होगा ? यह "क्षुद्र" कर्म कहलाने से "शूद्र" कहलाये होंगे शायद ? ........ और ये सब कर्मपथ , धीरे धीरे , संतान मोह के कारण , और माहौल के अनुसार रुचिकर कर्मपथ का चुनाव करने की मानवीय प्रकृति, के कारण रूढ़ हो कर जन्म से जुड़ गये होंगे । 

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पहले लेते हैं कि दूसरों द्वारा ब्राह्मण को सर्वश्रेष्ठ क्यों माना गया होगा ?

ब्राह्मण विद्योपार्जन और विद्यादान में कर्मरत रहने और शोध करने वाले जन थे । जब बाकी सब वर्गों को अपनी अगली सन्तति के विद्याध्ययन और "ट्रेनिंग" के लिए ब्राह्मणों पर ही निर्भर होना होता, तो यह आवश्यक था की विद्याग्रहण करने वाले बालक के मन में यथोचित सम्मानपूर्ण भावनाएं हों । क्या हमारे बच्चे किसी ऐसे व्यक्ति से कुछ सीख सकते हैं जिसका वे आदर नहीं करते ? क्या हम अपने बच्चों को अपने गुरुओं का आदर नहीं करना सिखाते ?

न भी सिखाएं, तब भी यह बहुत ही प्राकृतिक है की 6-7 वर्ष का बालक जिस गुरु से शिक्षा ले, उसे बहुत ही ज्ञानी मानता ही है, और अक्सर माता पिटा से भी बढ़ कर टीचर की ही छवि होती है बालमन में । कई बार तो बच्चे को स्कूल में कुछ गलत भी पढ़ाया जाए, और माता उसे सही कराने का प्रयास करे - तो बच्चा यह कह कर नहीं मानता कि "मेरी मिस ने ऐसा ही कहा है" । तो जब पीढियां गुरु को श्रेष्ठ मानती हुई बड़ी होती हैं, तो स्वाभाविक है की विद्यार्जन और विद्यादान में रत व्यक्ति और समाज शेष समाज के लिए आदरणीय होते ही जाते हैं ।

लेकिन शायद कुछ पीढियां बीतने तक ब्राह्मण परिवारों में जन्मे बालक इस आदर को "अर्जित" आदर की जगह "जन्मसिद्ध अधिकार" मानने लगे होंगे - कि मैं ब्राह्मण होने (जन्मने) भर से आदरणीय हूँ । इश्वर और संसार दोनों ही के बारे में शिक्षा देने वाला वर्ग होने से उनकी authority को कोई challenge  नहीं कर पाता होगा, क्योंकि बाकी सब ने तो साड़ी "पोथियाँ पढ़ी" (या श्रुतियां सुनी ) नहीं होती होंगी , ज्ञान में तो वे ब्राह्मणों से उन्नीस ही होते । तो ब्राह्मण जन जो कह दें वही "सत्य" । कब किसने असल में कितना जोड़ा होगा, कौन जानता होगा, कौन बता सकता होगा ?
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दूसरा वर्ग है क्षत्रिय । इन्हें श्रेष्ठ क्यों माना गया होगा ?

किसी भी एक समाज के रूप में हमें दो तरह की मनुष्य निर्मित आपदाओं का सामना करना होता है । बाहरी समाजों के / राज्यों के हमले, और भीतरी अराजक तत्त्वों के / चोर डाकू लुटेरों आदि के हमले । इनसे लड़ने और समाज की रक्षा करने के लिए शक्तिवंतों का एक तबका होना आवश्यक था, जो अपने प्राणों को भी खतरे में रखते हुए भी बाहरी भीतरी हमलावारों से लडे , और समाज को सुरक्षित करे।

इसके बदले में समाज का कर्त्तव्य होता कि वह उन जान पर खेलने वालों को जीवन की सुख सुविधाओं की सामग्रियों मुहैया  कराये । सिर्फ "necessities" नहीं, बल्कि "luxuries" भी - क्योंकि आखिर वह वर्ग अपनी जान खतरे में रख कर बाकी समाज को सुख शांतिपूर्ण जीवन मुहैया कराता होगा न ? शायद् इसी के चलते राजा को "भेंट" देने की परम्परा बनी हो । ......... इसके अलावा, वही शक्तिवंत व्यक्तिसमूह , देश के बुनियादी ढाँचे (infrastructure) को भी बनवाते (सडकें नहरें आदि) तो उसके लिए भी धनराशि चाहिए ही होती - जिसके लिए "कर" व्यवस्था बनी होगी ।

क्या हम में से हर एक अपनी, अपने परिवार की और अपने अधिकारों की रक्षा स्वयं करने में सक्षम है ? क्या भीतरी या बाहरी हमलों के समय हर व्यक्ति अपनी दैनिक पारिवारिक आदि जिम्मेदारियां छोड़ छाड़ कर इस हमलों का मुकाबला कर सकता है ? क्या खेत की कटाई या बुवाई के समय बाहरी शत्रु आने से किसान युद्ध पर चला जाए ? तब समाज खायेगा क्या और जीवित कैसे रहेगा ?

तब ? समाज की रक्षा में ही रत रहने वाला एक बड़ा तबका होना चाहिए । क्योंकि बिना किसी तरह की सामाजिक क़ानून व्यवस्था के तो हर कोई उसे जो सही लगे वैसा कर सकता है । समाज है, तो नियम कायदे भी होंगे । और नियम कायदे उस समयखंड के विश्वासों, मान्यताओं और सामाजिक अपेक्षाओं के अनुरूप होंगे, जो समय के साथ बदलते रहेंगे ।

लेकिन नियम होने का अर्थ कुछ रह ही नहीं जाता जब तक उन्हें क्रियान्वित न किया जाए । जो असामाजिक व्यक्ति नियम तोड़े - उसे रोका कैसे जाए ? यदि कोई सामाजिक कानूनों के विरुद्ध जाए, चोरी करे, डकैती करे, उसे रोका कैसे जाए ?

नियम के क्रियान्वन के लिए, समाज की रक्षा के लिए शक्ति और भय आवश्यक थे, हैं और रहेंगे । "अहिंसा" का सिद्धांत बहुत सुन्दर है, किन्तु "भय बिनु होए न प्रीती" । तो - समाज को अराजकता से बचाना हो तो न्याय और सत्य के पक्ष से भी लड़ने वाले को शक्तिवान होना होगा । इस शक्तिवान वर्ग को और अधिक शक्तिवान बनाने के लिए समाज को उसे अधिकार देने होंगे, कि वह आवश्यकता होने पर "दोषियों" को दण्डित कर सके । दोष के अनुसार दंड का नियमन भले ही समाज के बुद्धिमान-गण मिल कर करते हों, या सिर्फ शक्तिवंत अकेले, किन्तु दंड प्रक्रिया के क्रियान्वन का कार्यभार आवश्यक रूप से शक्तिवंतों के ही हाथ में रहना आवश्यक होगा

जब दंड प्रक्रिया के क्रियान्वन का भार शक्तिवंतों (जो क्षत्रिय कहलाये) पर सौंप दिया गया होगा तब आवश्यक रूप से समाज ने उन्हें इस सम्बन्ध में यथोचित निर्णय लेने का उत्तरदायित्व सौप दिया होगा (उत्तरदायित्व शब्द मे अधिकार और कर्तव्य दोनों शामिल हैं ) ।

पर कहते हैं न - power corrupts  and absolute power corrupts absolutely .

तो - जिन "क्षत्रियों" को यह उत्तरदायित्व दिया गया - वे ( उस समय वाले) भले ही अपने उत्तरदायित्व के कर्त्तव्य की ओर जागरूक थे किन्तु, जब यह व्यवस्था कर्म से हट कर जन्म से जुड़ गयी होगी, तो आगामी संततियों के लिए शायद "अधिकार" बड़ा होता चला गया होगा और कर्त्तव्य गौण :(  ।

धीरे धीरे शायद राज्य शासन व्यवस्था चलाने वाले शक्तिवंतों (क्षत्रियों) ने अपना "अधिकार" मान लिया होगा प्रजा से कर लेना, उन्हें दण्डित करना, किन्तु यह भूलते चले गए होंगे कि  राज्य की रक्षा और प्रजा की रक्षा के लिए उन्हें यह स्थान दिया गया था । दुर्भाग्य से आज "डेमोक्रसी में भी यही होता जा रहा है ।
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तीसरा वर्ग है "वैश्य"
- वे - जो समाज के नए नए निर्माण के समय्खंड में , सामाजिक उपयोग की वस्तुएं बनाने और बेचने, धनोपार्जन करने, रोजगार मुहैया कराने आदि के कर्म में लगे । आरंभिक पीढियां तो genuine रूचि और कर्म से प्रेरित रही होंगी । लेकिन फिर -वही  संतान प्रेम / संतान मोह / विरासत/ आस पास के माहौल के कारण बालक पीढ़ी की रूचि का स्वयमेव उस और मुड़ जाना ।

जब एक पीढ़ी ने बड़ी बड़ी संपत्ति इकट्ठी की / कारोबार चलाया , तो स्वाभाविक रूप से वह विरासत में उसकी पीढ़ियों तक पहुंची । और वह कहते हैं न - money breeds money , तो आने वाली सन्ततियां और धनाढ्य होती चली गयी होंगी । जब धनाढ्य हुए तो धन की शक्ति बढती चली गयी होगी । धन बढ़ता चला जाने से अपने से कम धनवानों को हे दृष्टि से देखने की प्रवृत्ति भी अक्सर आ ही जाती है , सो आ गयी होगी ।
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और चौथा वर्ग है "शूद्र"
- वे, जो उस समय्खंड में ऊपर दिए कर्मक्षेत्रों (शक्ति से समाज की रक्षा, ज्ञानोपार्जन और वितरण, धनोपार्जन और सामाजिक आवश्यकता की वस्तुओं / रोगारों का उत्पादन ) में ख़ास तौर पर न रमे होंगे, वे इन सब में लगे हुए लोगों को (यथोचित पारिश्रमिक के साथ) सहयोग देते होंगे  । (उनके काम का भी उस समय खंड में उतना ही मान रहा होगा, तभी तो पारिश्रमिक मिलता होगा न ?)

धीरे धीरे समाज की भीतरी बाहरी आक्रमणों से रक्षा का का उत्तरदायित्व लिए क्षत्रिय , विद्या क्षेत्र में रत ब्राह्मण और धनाढ्य वर्गों का प्रभाव बढ़ता चला गया होगा । सबके पास एक एक शक्ति केंद्र होने से उनकी शक्ति भी बढ़ गयी होगी और साख भी ।

और जो सहयोग कर्म में लगे थे वे जान ही नहीं पाए होंगे की समय के साथ इन तीनों में से एक भी शक्तिकेंद्र उनके पास नहीं होने से उनकी स्थिति समाज में कमज़ोर पड़ती चली जा रही है । वे यह भी नहीं जान पाते होंगे कि उनके अधिकार भी बाकी सब के बराबर ही हैं - न कम न ज्यादा । स्वयं को दूसरों का "सेवक" मान कर ही जीवन यापन करते करते वे अपने शोषण को स्वीकारने पर मजबूर होते गए होंगे ।
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एक और वर्ग है -"स्त्रियाँ"
ऊपर के हर वर्ग में स्त्रियाँ हैं और पुरुष भी । वह भी करीब करीब बराबर संख्या में । और अक्सर स्त्री और पुरुष की पारिवारिक और सामाजिक स्थिति में फर्क भी है ही, हर वर्ग में ।

हम कितना भी झुठला लें सच तो यही है कि हमारे समाज में यह फर्क है । कन्या भ्रूण ह्त्या हो या दहेज़ हत्या  , आये दिन होने वाले बलात्कार हों, सड़कों पर होने वाली छेडखानियाँ हों, चेहरे अपर एसिड फेंकने की घटनाएं हों, - सब अक्सर स्त्रियों के ही साथ होते हैं । क़ानून कुछ भी कहे हम कितना ही कहें कि  यह नहीं हो रहा - लेकिन हम सब जानते हैं कि यह हो रहा है । यह सब दुर्गुण इसी सामाजिक परिवेश से आये हैं । यह कैसे और क्यों हुआ होगा - इस पर बातचीत अगली पोस्ट में - यह पोस्ट काफी लम्बी हो चली है ।

जारी ....

शनिवार, 2 फ़रवरी 2013

सभ्यता शासन क़ानून व्यवस्था दंड प्रक्रिया 3


पिछले  भाग 1 ,  2
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पिछले भाग में यह कहा -
.... सिर्फ और सिर्फ अपने निजी अनुभव से सीखने तक सीमित न रहना पड़े, बल्कि इससे पहले की पीढ़ियों द्वारा हुई शोधों से वे आगे बढ़ सकें । ... इसके लिए अब तक अर्जित ज्ञान का हस्तांतरण भी आवश्यक था । अर्जित ज्ञान के हस्तांतरण, सामाजिक न्यूनतम आवश्यक ज्ञान आदि के लिए शिक्षा व्यवस्था आवश्यक थी , संस्कृतियाँ आवश्यक थीं ।....
.... यदि समाज के हर व्यक्ति को अपनी निजी सुरक्षा की चिंता से दूर रह कर अपने रुचिकर क्षेत्र में प्रगति करनी हो, तो आवश्यक था कि समाज सुरक्षित हो ।.....
.... समाज को इस बुनियादी चिंता से मुक्ति मिली रहे, और एक शांतिपूर्ण अस्तित्व में वे दूसरी "मानवीय" दिशाओं में अपने ज्ञान और कला की और अग्रसर हो सकें ।.... क़ानून व्यवस्थाएं समय समय की सामाजिक आवश्यकताओं के अनुसार बदलती रहीं ।

अब आगे
...........
अब बात करते हैं समसामयिक मापदंडों की । मैं सोचती हूँ कि यदि हमें सभ्यता की और अग्रसर होते रहना हो, तब तो आवश्यक है कि सहज सह-अस्तित्व के लिए सुचिंतित और परिपक्व प्रयास हों । आवश्यक था कि  , यदि मानव के भीतर की शुभ प्रकृतियों का विकास होना हो, तो अशुभ प्रकृतियों का नियंत्रण भी हो।

मानव के भीतर स्वाभाविक इच्छा है - अपने समूह में सम्मानित होने की, प्रतिष्ठित होने की, समादर प्राप्त करने की । आदर प्राप्त करने के लिए व्यक्ति या तो ज्ञान अर्जित करे, सुकर्म करे, या शक्तिशाली हो, या धनवान हो । और इनमे से जो भी दिशा चुनी जाए, उस दिशा की ओर बालपन से ही समुचित प्रशिक्षण होने की परम्परा बन गयी हो ।

ज्ञान प्राप्ति एवं विस्तार के मार्ग पर चलने वाले शायद ब्राह्मण हुए होंगे,
शक्ति, देशरक्षा, समाज रक्षा के मार्ग पर जाने वाले शायद क्षत्रिय हुए होंगे ,
धन और अर्थ का अर्जन करने वाले वैश्य हुए होंगे

जो इस प्रतियोगिता में पीछे रह गए होंगे समाजों की नयी स्थापना के समयखण्ड में, वे दुसरे कर्मों में लगे रहने वाले लोगों कोछोटे मोटे कार्यों में सहयोग देते होंगे  । इसके लिए उन्हें जो "मेहनताना" मिलता होगा, वही उनके जीवन यापन के लिए सहायक होता होगा । ध्यान रहे कि समाजों के आरंभिक काल में "मुद्रा" नहीं रही होगी । शायद तब "बार्टर सिस्टम" था - कि मुझे चावल चाहिये और तुम्हे कपडा - और हम दोनों के पास एक दूजे की आवश्यकता की वस्तु है - तो हम दोनों अदला बदली कर लें । तो , सेवा कर्म में लगे लोगों को "उच्च" वर्ग के लोग "मेहनताने" के तौर पर जो भी कुछ देते होंगे, वह धीरे धीरे उनका "अधिकार" न रह कर उन पर शक्तिवंत ज्ञानवंत या धन्वंत समाज की "दया" में मान लिया गया होगा  

सहयोग देने वालों को पता नहीं कब "सेवक" मान लिया गया हो ? क्योंकि "सेवक" उस परिवार की पीढ़ियों से जन्मा होता जो पहले ही खुद को "सेवक" मानते होते, उस व्यक्ति के पास न ज्ञान , न शक्ति, न धन होता अपने अधिकारों की रक्षा के लिए, न ही उस वर्ग के व्यक्ति के पास यह जानकारी ही होती कि वह भी उतना ही अधिकारी है मानवीय अधिकारों का, जितने वे लोग जिन्हें वह अपने "मालिक" या "भाग्य विधाता" माने बैठा है - तो धीरे धीरे उस वर्ग ने अपने अधिकारों की सचेतता न हने से अपने अधिकारों की मांग भी बंद कर दी होगी ।

दुर्भाग्य से, सन्तति के प्रति जो प्रेम और उसके उत्थान के उद्देश्य से बनी बढ़ी शैक्षणिक व्यवस्था , सामाजिक व्यवस्था, क़ानून आदि व्यवस्था, उस प्रेम के मोह के ही चलते, धीरे धीरे योग्यता से घूम कर जन्म और परिवार से जुड़ गयी होगी । अपने आसपास जो हम देखते हैं - नेता के बच्चे नेता, अभिनेता के अभिनेता, डॉक्टर के बच्चे डॉक्टर आदि कई उदाहरण दीखते हैं ।  तरह से, तथाकथित "उच्च" वर्ग भी यही चाहते होंगे न , कि उनकी संतान भी उन्ही के मार्ग चले ? बहुत स्वाभाविक रहा होगा की ब्राह्मण अपने बच्चों को ज्ञानार्जन और उसके प्रतिपादन की दिशा दें, तो क्षत्रिय उन्हें सामाजिक क़ानून व्यवस्था और देश रक्षा की ओर मोडें। वही धन-अर्जन करने वाले - वैश्य, अपने बच्चों को अपने ही ख़ास कर्म में प्रेरित करें , किसान का बच्चा किसान, सोनार का बच्चा सोनार हो जाए ।

इस सब में कुछ अपवाद भी अवश्य होते होंगे, जैसे हम जानते भी हैं पौराणिक गाथाओं से, लेकिन अधिकांशतः कर्मपथ का चुनाव कुछ पीढियां जाते जाते, रूचि से हट कर जन्म से जुड़ चला होगा ।
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तो - क्षत्रिय का अर्थ है समाज की रक्षा में लगे लोग, जो भीतर के शत्रुओं (चोर डाकू आदि) और बाहर के शत्रुओं (दुसरे राज्यों की सेनायें) से लड़ने के कर्म में उद्यत लोग । आवश्यक था कि ऐसे लोग अपने कर्म के लिए विशेषज्ञ हों, बेहतर से बेहतर हथियार आदि चला सकें । 

तो उनके पास समय नहीं होता कि  वे अपने लिए शिक्षा, भोजन, घर आदि के लिए समय दे सकें । लेकिन, क्योंकि वे समाज के लिए आवश्यक तौर पर अपने जीवन को खतरे में डालते, तो समाज का कर्त्तव्य होता कि उनका जीवन निर्बाध हो, बल्कि विलासपूर्ण होने की सीमा तक भी उनके लिए धन आदि का प्रबंध हो । इस "कर" की संकल्पना के साथ ही यह संकल्पना भी विकसित हुई होगी, कि क्योंकि क्षत्रिय वर्ग को क़ानून व्यवस्था लागू करनी है, तो क़ानून बनाने के अधिकार, निर्णय लेने के अधिकार भी उन्ही के पास आ जाएँ, रहे । 

इसलिए, सब लोग अपने अपने जीवनोपार्जन के लिए जो भी करते, उसमे से इन्हें "कर" के रूप में धन देते , और उनके बनाए / चलाये कानूनों को भी मानते, स्वीकारते । धीरे धीरे,यह सब कब आपसी समझ बूझ से हट कर शक्तिवान "राजा" का अधिकार हो गया होगा, कहा नहीं जा सकता । इसके साथ ही , जब कोई "राजा" और दुसरे "प्रजा" हो गए होंगे, तब क़ानून व्यवस्था की समूची जिम्मेदारी उन्ही को सौंप दी गयी होगी, और धीरे धीरे वे निरंकुश होते गए होंगे ।

समय समय पर क़ानून, मापदंड कैसे बनते बदलते होंगे , किस समूह के प्रति सही और गलत , आदि कैसे हुए होंगे, अगले भाग में आगे बात करते हैं इस बारे में ...