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मंगलवार, 15 जुलाई 2014

श्रीमद भागवतम १२ : प्रियव्रत, अग्नित्र, नाभि, ऋषभदेव


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मनु और शतरूपा जी ने ब्रह्मा जी के आदेश से संतति बढाने के लिए पांच संतानों को जन्म दिया। ये थे - प्रियव्रत और उत्तानपाद नामक पुत्र और आकूति , देवहुति , एवं प्रसूति नामक कन्याएं। इससे पहले हमने तीनों बहनों और उत्तानपाद के वंश के बारे में पढ़ा।  अब इस भाग में प्रियव्रत जी के बारे में पढ़ते हैं।

मनु के बड़े पुत्र थे प्रियव्रत और छोटे थे उत्तानपाद।  लेकिन प्रियव्रत को राजा बनने में रूचि नहीं थी और वे उत्तानपाद को यह बोझ सौंप कर वन को चले गए थे।  उत्तानपाद और उनके वंशजों ने बहुत समय तक राज किया किन्तु जब प्रचेता भ्राताओं के पुत्र प्रजापति दक्ष अपना राज्य त्याग कर वन को गए तब मनु ने देखा कि धरती पर कोई नृप न होने से हानि हो रही है।  तब वे (मन न होते हुए भी) वहां गए जहां उनके बड़े पुत्र प्रियव्रत तप कर रहे थे। उन्होंने प्रियव्रत को बहुत समझाया कि वे लौट आएं और राज्य को सम्हालें, किन्तु प्रियव्रत न माने।  हार कर दुखी मन से मनु लौट आये।  उन्होंने अपने पिता ब्रह्मा से प्रार्थना की कि वे ही प्रियव्रत को समझाएं।

एक गुहा में प्रियव्रत नारद जी से कोई चर्चा कर रहे थे कि उनके पितामह ब्रह्मा जी वहां आये। पौत्र प्रियव्रत और पुत्र नारद जी ने उठ कर उन्हें प्रणाम किया और आशीर्वाद देने के पश्चात ब्रह्मा जी ने उन्हें समझाया।  ब्रह्मा जी बोले - प्रिय पौत्र, हमारी बात ध्यानपूर्वक सुनो।  जब प्रभु ने हम सब को जीवन दिया है तो उन्होंने हम सब का कर्मक्षेत्र भी निश्चित किया है , और हमें उस कर्म में रूचि न भी हो तो भी अपना कर्त्तव्य होने से हमारे लिए अपना नियत कर्म करना आवश्यक है।  हम जानते हैं कि आपको राजकाज में अरुचि है, किन्तु यह आपका कर्तव्य (धर्म) है।

जब बैल खेत को जोतने के लिए हल खींचता है, तो कृषक उसकी नाक में नकेल डाल देता है।  तब बैल उस दिशा में जाता है जिस दिशा में उसका स्वामी उसे ले जाना चाहे, न कि अपनी रूचि के अनुसार।  इसी प्रकार हम सब का भी नियत पथ उस रचयिता ने निश्चित किया है।  हमें उस कर्म पथ मे रूचि न भी हो तो भी कर्त्तव्य भाव से हमें उसे करना चाहिए।

यदि जीवात्मा अपना नियत कर्म करे, और अपने कर्म से निःसंग रहे, तो वह कर्मफल से नहीं बंधता।  इन्द्रियों के विषयों में रहते हुए भी उनसे जुड़ाव न रखना ही मुक्ति का द्वार है।  वन में रह कर नहीं, बल्कि साधारण मानव की ही तरह गृहस्थ बन कर इन्द्रियों के विषयों से अलिप्त बने रहना हो इन्द्रियों पर विजय पाने का एकमात्र उपाय है।  जैसे  राज्य पर शत्रु हमला करे तो राजा किले में सुरक्षित रहता है, वैसे ही इन्द्रिय विषयों के आक्रमण से भी ईश्वर के चरणों में स्थिर मन रख कर व्यक्ति उनसे सुरक्षित रह सकता है।  आप भी ऐसे वन को न भागें, बल्कि लौट कर अपना नियत कर्तव्य करें।  कर्त्तव्य निभाने के पश्चात आप फिर से वन जाकर अपना तप जारी रख सकते हैं।

प्रियव्रत  हाथ जोड़ कर ब्रह्मा जी की आज्ञा शिरोधार्य की और ब्रह्मा जी लौट गए।  फिर मनु जी आकर प्रियव्रत जी को वापस ले गए और उनका राज्याभिषेक करवाया।

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प्रियव्रत ने कई वर्षों तक राज किया और साधारण राजा का जीवन जिया, किन्तु वे सब कुछ करते हुए भी अलिप्त ही रहे।  उनके अति उत्तम कौशल के कारण उनका राज्य सुखी और सुरक्षित था और उनके कोई शत्रु नहीं थे।  उनका विवाह विश्वकर्मा जी की पुत्री बर्हिष्मती जी से हुआ और उनके दस पुत्र और एक पुत्री हुए, जिनमे सबसे ज्येष्ठ थे अग्नित्र।

एक दिन राजा ने सोचा कि सूर्यदेव आधी पृथा को प्रकाशित करते हैं और बाकी आधी धरती पर अंधकार रहता है, मैं सूर्यदेव की राह जानना चाहता हूँ।  तब उन्होंने अपने रथ को लेकर धरती की सात परिक्रमाएं की।  उनके रथ की तेज़ गति के कारण धरती पर धब्बे पद गए और धरती सात द्वीपों में बँट गयी।  सात द्वीपों के नाम हुए जम्बू, प्लक्ष, शाल्मली, कुश, क्रौंच, शक, पुष्कर।  सात समुद्र हुए - लवण, इक्षु, सुरा, सर्पि, दधि, क्षीर, मधु। राजा ने अग्नित्र और उनके छः छोटे भाइयों को सात द्ववीपों का राज्य कार्य सौंप दिया।  उनकी पुत्री ओजस्वती का विवाह शुक्र जी से संपन्न हुआ और उन दोनों की पुत्री हुईं देवयानी।

अपने नियत कर्त्तव्य पूरे होने के बाद राजा प्रियव्रत ने संन्यास ले लिया और अपना तप (जो ब्रह्मा जी की आज्ञा से बीच में छूट गया था) पुनः आरम्भ किया।
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प्रियव्रत जी के बड़े पुत्र अग्नित्र जी थे जो जम्बूद्वीप के भूपति थे।  उनके पुत्र थे नाभि।

नाभि जी के कोई संतान न थी, और नारायण को अपने पुत्र के रूप में पाना चाहते थे।  इस मनोरथ से उन्होंने एक पुत्रेष्टि यज्ञ करवाया। ब्राह्मणों के द्वारा कराये जा रहे इस यज्ञ में श्री नारायण स्वयं यज्ञ पुरुष रूप में पूजित थे।  वे नाभि की भक्ति से प्रसन्न होकर वहां प्रकट हुए।  ब्राह्मणों ने उन्हें देख कर भावविभोर होते हुए उन्हें प्रणाम किया और कहा कि आपके दर्शनों के बाद भी कोई सांसारिक अभिलाषा रखना या ऐसा फल मांगना धर्मानुसार तो अनुचित है, किन्तु हम शर्मिंदा हैं कि, यह यज्ञ हमने राजन के पुत्र प्राप्ति के लिए किया है। इसलिए हमें आपसे यह मांगना ही होगा।

श्री नारायण ने कहा कि मुझे ज्ञानी ब्राह्मण और भक्त से प्रिय और क्या है ? आप लोग ऐसे खुद को छोटा न करें - राजा की मुझमे अटूट प्रेमभक्ति है, और मैं जानता हूँ कि वे मुझ जैसा पुत्र चाहते हैं। किन्तु मुझ जैसा कोई है ही नहीं, सो मैं स्वायं ही उनके पुत्र रूप में आऊंगा।  यह कह कर प्रभु अन्तर्धान हो गए।  समयक्रम में नाभि जी को पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई जो नारायण ही थे - इनका नाम हुआ ऋषभ देव। (कहीं पढ़ा है कि ये ही जैनों के ऋषभदेव हैं, पक्के तौर पर नहीं पता)

समय आने पर ऋषभ देव का विवाह इंद्र की सुपुत्री जयंती से हुआ और इनके सौ पुत्र हुए, जिनमे सबसे बड़े भरत जी थे। ये सभी पुत्र स्वयं श्री नारायण के पुत्र थे और बहुत संत स्वभाव वाले थे।  एक दिन ऋषभ देव जी ने अपने पुत्रों को बुलाया और उन्हें ब्रह्मज्ञान दिया।

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ऋषभ जी बोले - हे पुत्रों, मानव देह हमें पशुओं की ही तरह संसार का सुख भोगने भर के लिए नहीं मिली है, बल्कि उच्च लक्ष्य की प्राप्ति के लिए मिली है ।  मन की शुद्धि आवश्यक है।  दो महाद्वार हैं- एक मोक्ष का और दूसरा संसार का ।  लोकसेवा का धर्म (कर्तव्य), साक्षी भाव से अलिप्त होकर करना, मनुष्य  को मोक्ष की ओर ले जाता है।  कर्मों में संग होना , और इन्द्रियविषयों में लिप्त होना संसार में डुबा देता है।

संसार को भोगने की इच्छा ही जीवात्मा को परमात्मा से दूर देह के संग लाती है (पिछले भाग में पुरंजन की कथा पढ़ें) . फिर देह और मन का संग होने से मनुष्य अपने ही कर्म और मोहबंधनों में बांध जाता है और "आत्मन" कर्मों के जाल में फंसता चला जाता है और जन्म मरण के चक्र में बार बार घूमता रहता है।  अपने मोह में वह अपनी बुद्धि को मन और इन्द्रियों के विषयों के जाल में बाँध देता है और  कष्ट भोगता रहता है।

"मैं (अहंकार)" और "मेरा(ममकार)" - यह मनुष्य के प्रमुख शत्रु हैं।  

यह "अहंकार" और "ममकार" ( यहां कथा से अलग यह एक बात मैं कहना चाहूंगी -- "ममता" को हम बहुत + मानते हैं - किन्तु ममता ममकार से जन्म लेती है - और "माँ की ममता" का जाल स्त्री से जुड़ सा गया था - जिसके कारण स्त्री मोक्ष मार्ग पर जा न पाती) मनुष्य को जकड़ लेते हैं।

हे पुत्रों, मोह को त्याग दो।  गर्मी सर्दी सुख दुःख भ्रान्ति भूख प्यास इन सब का तुम पर कोई असर न हो।  तुम्हारा एक ही लक्ष्य हो -ब्रह्मज्ञान, आत्मज्ञान । अपने आप को प्रभु को सौंप दो।  तुम्हारे सब कर्म उसके (कर्तव्य के / धर्म के) प्रति हों , उन कर्मों में तुम्हारा संग न हो।  हर एक में उसे देखो - इससे तुम किसी से नफरत नहीं करोगे।  सदा भक्तों के संग रहो जिससे प्रभु की कथाएं सुन सुन कर तुम्हारा मन प्रभु में रमा रहे।  एकांत में रहने का भी प्रयास करो (अधिकाँश लोग एकांत से डरते हैं) , अपने नियत कर्म करो, कम बोलो और अधिक विचारवान होओ।

"गुरु" का कर्त्तव्य है कि  "शिष्य" को सही राह दिखाए, क्योंकि वह जिस राह पर से चल कर आया है उस राह के संकट वह पहले से जानता है।  यदि उसके अनुभव से उसका शिष्य उन राह के रोड़ों से न बच सके तो उस गुरु का अनुभव बेकार ही है।  यदि कोई डूब रहा हो तो पहले से तैरना सीखे हुए व्यक्ति का कर्तव्य है कि उसे सम्हाले , न कि अपने अनुभव को अपने पास रख कर तमाशा देखे।

हे प्रिय पुत्रों - अपने बड़े भ्राता भारत को अपना पिता समान मानना और उनकी आज्ञा मानना।  इस संसार में वैसे रहना जैसे मैंने अभी तुम्हे समझाया है।  भक्ति द्वारा मोह बंधन को काटते रहना, और स्वयं को इस जन्म मरण के चक्र से निकाल लेना।

तब ऋषभ देव जी ने भरत को राजा बनाया और राज्य और परिवार से मुक्त ऋषभ देव जी वन को चले गए।  वे अवधूत हो गए और संसार त्यागने के समय के इंतज़ार में भ्रमण करते रहे। समय आने पर वे कूर्ग के वनों में थे - जहां भीषण आग लगी जिसमे वे स्व धाम को लौट गए।


1 टिप्पणी:

  1. "मैं (अहंकार)" और "मेरा(ममकार)" - यह मनुष्य के प्रमुख शत्रु हैं। सुंदर बोध देती पोस्ट !

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