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सोमवार, 18 अगस्त 2014

सभी को जन्माष्टमी की बधाईयाँ और शुभकामनाएं - होने वाले आठवें पुत्र से गीतोपदेशक तक का सफर

२०१२ में श्री कृष्ण जन्माष्टमी पर यह  थी (लिंक)

आज यह लिख रही हूँ

जन्माष्टमी का पर्व है आज
तो मन में आता है बस 
नन्हा माखन चुराता कान्हा 
यशोमती माई के डंडे के डर से  
भागता - सहमता - छिप जाता कान्हा।

याद आता है - गोपियों की धमकियों से 
चिढ़चिड़ाता नाचता नचाता कान्हा 
याद आता है राधा और नंदिनी के 
बुलावण को मुरली बजाता कान्हा। 

कभी गैया चराता तो 
कभी गोपों संग खिलखिलाता कान्हा 
कभी सेब वाली के फल ले 
मासूमियत से धन के बदल
(हीरों सम) चावल पोटली में भर लाता कान्हा। 

भूल जाता है तुम्हारा वह रूप 
कि जिसमे तुम सुनाते हो 
सर्वोपरि उपदेश - 
साकाम से निष्काम कर्म का सफर 
कर्म से कर्म योग 
अधर्म के नाश से 
धर्म के पुनर्स्थापन का सफर। 

भूल जाते है अर्जुन के वह 
विश्वरूप देख हुए भयभीत स्वर 
हे प्रभु - मुझे माफ़ करो 
मैंने तो आपको - 
हे सखा हे गोविन्द पुकारा। 
अपना सम सखा ही मान आपको 
बहुत निरादर व्यवहार किया। 

याद बस रहता है वह 
हँसता नन्हा निश्छल बालक 
जो बांसुरी की धुन पर 
सारे संसार को नचाता 
इंद्र की अतिवृष्टि से गोकुल को 
गोवर्धन उठा शरण देता बालक। 

तुम कौन हो कृष्ण ? कौन हो ? 
बोलो ? क्या वह बालक हो जो गैया चराता है ? 
या वो जो मुरली बजाता है ?
वो जो गोवर्धन उठाता है या वो जो रास रचाता है ?
वह फिर कौन है जो रुक्मिणी को हर ले जाता है 
या भामा की तुला में तुल जाता है ?

कौन हो तुम बोलो ? 
जो जरासंध का वध कराता है 
या अर्जुन को कर्म पथ बताता है ? 
कौन हो तुम कहो तो  कान्हा ?


बुधवार, 2 जुलाई 2014

श्रीमद भागवतम ५ : कर्दम, देवहूति, ऋषि दंपत्ति

पिछला भाग 

पहला भाग 

मनु और शतरूपा जी ने ब्रह्मा जी के आदेश से संतति बढाने के लिए पांच संतानों को जन्म दिया। ये थे - प्रियव्रत और उत्तानपाद नामक पुत्र और आकूति , देवहुति , एवं प्रसूति नामक कन्याएं।
मनु और शतरूपा की एक पुत्री थीं देवहूति। अब मैं देवहूति और ऋषि कर्दम और उनकी संतति की कथा कहूँगी।

कर्दम ब्रह्मा के पुत्र थे।  वे परम ज्ञानी थे और माया से परे थे , किन्तु पिता ब्रह्मा की आज्ञानुसार संतति बढ़ाने को प्रतिबद्ध थे।  उन्होंने बहुत तप किया और नारायण प्रकट हुए।  तब उन्होंने वर मांगने को कहा।

कर्दम जी बोले - आपके दर्शन होने के बाद तो मांगने को कुछ  बचा ही नहीं है।  फिर भी पिता ब्रह्मा की आज्ञा से मुझे संतति का प्रजनन करना आवश्यक है।  सो हे प्रभु, मैं आपको ही अपने पुत्र के रूप में चाहता हूँ , और संतति प्राप्त करने के लिए एक शीलवती धर्मपत्नी की भी आवश्यकता है।  कर्दम की प्रेमभक्ति से प्रसन्न नारायण की आँखों से अश्रु गिरे और  दिव्या जलाशय - हुए बिन्दुसार। नारायण ने कहा - आपकी पत्नी होंगी मनु और शतरूपा जी की सुपुत्री - देवहुति।  मैं आप दोनों के पुत्र रूप में आऊंगा।

उधर मनु जी को प्रेरणा हुई कि देवहूती जी को कर्दम जी की संगिनी होना है।  वे अपनी धर्मपत्नी शतरूपा और देवहूती के संग कर्दम जी के आश्रम आये और कहा प्रणाम और स्वागत आदि के उपरांत कहा , कि मेरी पुत्री आपकी स्त्री होना चाहती है।  कर्दम जी ने कहा कि मैं विवाह करने को तो तैयार हूँ, किन्तु गृहस्थाश्रम के बाद मैं संन्यासाश्रम में भी जाऊँगा , जब आपकी पुत्री संतानों की माता बन जाएंगी।  देवहूति और मनु और शतरूपा की सहमति से कर्दम जी और देवहूति जी का शुभविवाह हुआ और माता पिता अपनी पुत्री को पति के संग छोड़ कर वापस चले गए। लौट कर जहां वराह जी के शरीर से कुछ बाल गिरे थे वहां उन दोनों ने यज्ञ कराया।

इधर नवविवाहित कर्दम जी फिर से अपने ध्यान आदि में लग गए और देवहूति उनकी सेवा करती रहीं। कई प्रहर बीते , दिन, महीने , वर्षों बीत गए और देवहूति सेवा में लगी रहीं।  उनका नवयौवन समय के साथ समाप्त हो गया, किन्तु वे तनिक भी दुखी हुए बिना पति की सेवा करती रहीं।

कई वर्षों बाद कर्दम जी की समाधि खुली तो उन्होंने देखा कि उनकी सुन्दर नवयौवना पत्नी वृद्धा सी हो चली थीं।  वे  स्वयं   भी अब युवा न थे।  तब उन्होंने अपनी प्रिय  पत्नी से कहा - आप ने पूर्ण रूप निस्वार्थ हो कर स्त्री - धर्म निभाया है।  मेरी तपस्या के साथ आपने भी अनेक व्रत-उपवास किये - जिनसे आप असमय ही कुम्हला गयीं।  अब मैं पति धर्म  निभाऊंगा। कहिये आप मुझसे क्या चाहती हैं।

 देवहूति बहुत संकोच में थीं।  मन से तो वे वही युवती थीं जो  पति  अपने माता पिता के संग यहां आयीं थीं , किन्तु उनका शरीर वृद्धा का हो चुका था। उनके रेशमी वस्त्र अब न थे, और वे पुराने वस्त्र पहनी थीं।  गहनों को भी वे कबसे त्याग चुकी थीं। उनका शरीर अनेक व्रतों से कमज़ोर हो गया था और उनके सुन्दर नेत्र अपनी चमक खो चुके थे।  वे लजाते हुए अपने  कि मैं आपकी पत्नी हूँ, क्यों आप मुझसे कहलवाना चाहते हैं कि मैं क्या चाहती हूँ ?

उनकी कामना को  समझते हुए ,  तब कर्दम जी  योगशक्ति से एक ऐसा विमान बनाया जो पूरा नगर सा था - जिसमे सभी सांसारिक सुविधायें थीं। तत्पश्चात उन्होंने सप्रेम देवहूति जी से बिन्दुसार में स्नान कर आने। झिझकती हुई देवहूति जलाशय में उतरीं तो अत्यधिक चकित हो गयीं।  बिन्दुसार नारायण जी के अश्रुओं से बने थे , उनके चमत्कारी जल के प्रभाव से देवहूति वृद्धा से पुनः युवा हो उठीं। वहां अनेक सुन्दर स्त्रियां उनके सामने ही प्रकट हो कर उन्हें सजाने - संवारने लगीं।  उनके सुंदर केश संवार कर उनका श्रृंगार किया।  रेशमी वस्त्र और गहने पहनाए।

स्नान और श्रृंगार के पश्चात पुनर्यौवना हुई देवहूति सकुचाते हुए पति के निकट पहुंची तो चकित रह गयीं , क्योंकि उन्ही की तरह कर्दम मुनि भी वृध्द से फिर वही युवक बन गए थे जिनसे वर्षों पहले उनका विवाह हुआ था। अब कर्दम जी ने अपनी शर्माती लजाती हुई धर्मपत्नी का हाथ थामा और विमान में प्रवेश किया।  विमान कई वर्षों तक अंतरिक्ष में विचरण करता रहा और संसार से बेखबर दंपत्ति गृहस्थाश्रम आनंद लेते रहे।  इस बीच देवहूति नौ कन्याओं की माता भी हो गयीं।

नौ कन्याओं के पिता होने के बाद कर्दम जी ने कहा - हे प्रिय संगिनी - मैंने विवाह के समय ही कहा था कि संतानोत्पत्ति के पश्चात संन्यास ले लूँगा - अब वह समय आ गया लगता है। तुम नौ कन्याओं की माता हो चुकी हो।  तब देवहूति जी बोलीं - ये कन्याएं तो ब्याह कर के अपने अपने पति के घर चली जाएंगी।  आप तो ब्रह्मज्ञानी हैं किन्तु मैं तो साधारण स्त्री हूँ।  मैं किसके सहारे जियुंगी ? यदि एक पुत्र होता तो मेरे सहारे को कोई रहता।  तब कर्दम जी ने कहा कि हे देवी - अपने आप को साधारण न कहो। नारायण स्वयं ही तुम्हारे पुत्र होंगे - इसके लिए हम दोनों को व्रतादि करने होंगे।  तब दोनों ने कई वर्षों व्रतोपवास आदि किये और नारायण देवहूति के गर्भ में आये।

गर्भस्थित नारायण की स्तुति करने ब्रह्मा जी नौ परम ब्राह्मण ऋषियों को लेकर आये। उन्होंने बताया कि आपके पुत्र रूप में नारायण आएंगे और संसार को सांख्य योग की शिक्षा देंगे, और कपिल मुनि नाम से प्रसिद्ध होंगे। इसके पश्चात उन्होंने कर्दम और देवहूति जी से उनकी कन्याओं के विवाह इन नौ परम ब्राह्मणों से करने का प्रस्ताव किया जिसे दोनों ने सहर्ष स्वीकारा।  तब उन नौ कन्याओं के इन नौ ब्राह्मणों से विवाह संपन्न हुए।

मारीचि जी का विवाह कला जी से हुआ ,
अनुसूया माता का अत्रि जी से,
श्रद्धा जी का अंगिरा जी से,
पुलत्स्य जी का हविर्भू जी से ,
गति जी का पुलह जी से विवाह हुआ

क्रिया जी का कृतु जी से ,
ख्याति जी और भृगु जी का विवाह हुआ ,
अरुंधति जी का विवाह वशिष्ठ जी से हुआ,
शान्ति जी का अथर्व जी से विवाह हुआ।

नौ कन्याएं अपने पतियों के संग उनके आश्रम को चली गयीं और वृद्ध माता पिता अपने आश्रम में रहते हुए अपने नारायण - अवतार सुपुत्र के जन्म की प्रतीक्षा में रहने लगे।

जारी 

सोमवार, 30 जून 2014

श्रीमद भागवतम 4: ब्रह्मा सृष्टि ब्रह्मा के पुत्र पुत्रियाँ


पिछला भाग 
पहला भाग 
[
कथा स्ट्रिक्टली समय क्रम में नहीं होगी 
]

श्री महाविष्णु शेष शैया पर लेटे  थे और उनकी नाभि से विशाल डंठल वाला कमल खिला - जिस पर ब्रह्मा प्रकट हुए।  ब्रह्मा ने अपने आस पास देखना चाहा , तो उनके चार दिशाओं में चार चेहरे हुए। उन्होंने अपने आठ नेत्रों से सब ओर देखा।  सब तरफ शून्य ही दिखता था।  तब उन्होंने अपने आप को जानने के लिए कमल के डंठल के भीतर प्रवेश किया लेकिन कितना ही गहरा उतरने पर भी कुछ न मिला।  वे वापस कमल पर लौट आये।  उन्हें अपने भीतर शब्द सुनाई दिया "तपस तपस तपस"। तब उन्होंने सौ वर्षों तक तप किया।  तत्पश्चात उनके अंतर्मन में विष्णु जी की छवि  उभरी, सृष्टि का ज्ञान , और वेद प्राप्त हुए, और सृष्टि रचने की प्रेरणा हुई।

पहले स्थूल जगत कि रचना हुई।  काल परमात्मा की सूक्ष्म शक्तियों और और स्थूल सृष्टि को प्रथक करते है।  सतोगुण, रजोगुण और तमोगुण से सृष्टि चलती है। नौ स्तर पर सृष्टियाँ हैं - महत तत्व , अहंकार , इन्द्रियां , ज्ञान और कर्म ऊर्जा , मन , विभ्रांति करने वाली माया , अचल जगत (ग्रह नक्षत्र सितारे पृथ्वियां जल थल पेड़ पौधे …… ) , चल जीवन के निचले रूप (कीड़े, पशु पक्षी …… ).

इसके बाद मानव, फिर देव, पितर, असुर / दानव, गन्धर्व और अप्सराएँ , यक्ष और राक्षस , सिद्ध चरण और विद्याधर , भूत प्रेत पिशाच ; महामानव आदि हुए।  [तत्व और समय के माप कोई जानना चाहे तो यहाँ (लिंक क्लिक करें) उपलब्ध हैं।  ]

स्थूल जगत रचने के पश्चात ब्रह्मा ने अपनी शक्ति से चार "कुमारों" (सनक , सनन्दन , सनातन, सनत कुमार) को प्रकट किया - किन्तु कुमारों ने संतति बढाने से मना कर दिया यह कहते हुए कि हम बालक ही रहेंगे - क्योंकि हमें "बड़ों" के अवगुण नहीं चाहिए। इस पर ब्रह्मा जी को क्रोध तो आया किन्तु उन्होंने अपने क्रोध को तुरंत सम्हाल लिया।  तब उनका क्रोध उनके मस्तक से एक रोते हुए लालिमा युक्त नीलवर्ण बालक के रूप में प्रकट हुआ - जो "रूद्र" हुए।  रूद्र के अन्य नाम हैं - मन्यु , मनु ,  महिनाशा , महान, शिव , ऋतध्वज , उग्ररेता , भव , काल , धृतवृता।  रूद्र की पत्नी  रुद्राणी होंगी - धी , धृति , रसाला , उमा , नियुत, सर्पि , इला , अम्बिका , इरावती , स्वधा दीक्षा।  क्रोध से उत्पन्न हुए रूद्र और रुद्राणी की अगणित संतानें हुईं जो उन जैसी ही क्रोधित नेत्रों को लिए सृष्टि को समाप्त करने उद्धत हुईं।  ब्रह्मा ने रूद्र से कहा - हे पुत्र - ऐसी संतति तो सृष्टि का नाश कर देगी।  हे प्रिय पुत्र - तुम तपस में लीन होओ।  तब रूद्र तपस में लीन हुए।

तत्पश्चात ब्रह्मा जी ने दस मानस पुत्र उतपन्न किये :-

मारीचि
अत्रि
अंगीरा
पुलह
पुलत्स्य
कृतु
वशिष्ठ
दक्ष
भृगु
नारद

नारद पूर्व सृष्टि के पूर्वजन्म के आशीर्वचन से अपना सत्य स्वरुप नहीं भूले थे - तो उन्होंने श्री नारायण जी कि भक्ति में ही जीवन जीने का निर्णय लिया।

ब्रह्मा जी के चार चेहरों से चार वेद प्रगट हुए। आयुर्विद्या , शास्त्र ज्ञान , संगीत , वास्तुशिल्प विद्या सब वेदों से प्रकट हुए।  क्रोध , काम , लोभ आदि  भी ब्रह्मा से प्रकट हुए। आयुर्विद्या , शास्त्र ज्ञान , संगीत , वास्तुशिल्प विद्या सब वेदों से प्रकट हुए। वेदों के बाद ब्रह्मा ने अपने चारों चेहरों से पुराण अभिव्यक्त किये। ब्रह्मा के ह्रदय से काम प्रकट हुए , उनकी छाया से कर्दम ऋषि।

उनके शरीर से एक पुरुष और एक स्त्री आकृति प्रकटे , जिनके नाम हुए - मनु और शतरूपा।संतति के रहने के लिए धरनी आवश्यक थीं - जो पिछली प्रलय से रसातल में ही थीं।  पृथ्वी को रसातल से निकाल्ने के लिए श्री विष्णु वराह रूप में प्रकट और रसातल से पृथ्वी को बाहर लाये ( इसी प्रक्रिया में उन्होंने हिरण्याक्ष का वध भी किया था - जो कथा आगे आएगी ) । मनु और शतरूपा जी ने ब्रह्मा जी के आदेश से संतति बढाने के लिए पांच संतानों को जन्म दिया। ये थे - प्रियव्रत और उत्तानपाद नामक पुत्र और आकूति , देवहुति , एवं प्रसूति नामक कन्याएं।

 ब्रह्मा की पुत्री हुईं "वाक" जिनके प्रति ब्रह्मा ही आकर्षित हो गए। किन्तु पुत्री उनकी ओर ऐसे कोई भाव न रखती थीं।  तब मारीचि और अन्य पुत्रों ने विनम्रता से अपने पिता से कहा कि  इससे पूर्व किसी ब्रह्मा ने यह नहीं किया।  आप सृष्टा हैं - आप अपनी ही पुत्री से कामभाव रखेंेगे तो सृष्टि किस दिशा में अग्रसर होगी ? अपने प्रजापति पुत्रों की बात से ब्रह्मा लज्जित हुए और तुरंत अपनी देह त्याग दी।  यह त्यागी हुई देह सब दिशाओं में भयंकर अंधकार रूप हुई।

आकूति का विवाह रूचि नामक प्रजापति  से हुआ , देवहूति का कर्दम ऋषि से और प्रसूति का दक्ष प्रजापति से हुआ।  इनसे संतति आगे बढ़ी।

सोमवार, 2 जून 2014

श्रीमद भागवतम सुखसागर 3: परीक्षित, कलियुग, श्राप

भाग २ 
भाग १ 

परीक्षित ने कई वर्षों तक धर्मपूर्वक राज्य किया।  उनका विवाह उत्तरकुमार जी की पुत्री इरावती जी से हुआ और उनका जनमेजय नामक पुत्र हुआ।  वे एक बार सरस्वती नदी के किनारे जा रहे थे जब उन्होंने देखा कि एक बहुत कमज़ोर गाय और एक बैल बात कर रहे थे। बैल की तीन टाँगे टूटी हुई थीं और वह लंगड़ा कर चलता था।

बैल गाय से कह रहा था :
"हे माता पृथ्वी, आप इतनी दुखी और कमज़ोर लगती हैं।  आप इसीलिए उदास हैं न कि श्रीकृष्ण आपको छोड़ कर अपने धाम चले गए और धर्म क्षीण हो चला है ?"

गौमाता ने कहा:
"जी हाँ, धर्म देव।  जब कृष्ण यहां थे तब उन्होंने अापका उत्थान किया एवं अन्याय और अधर्म का नाश किया।  अब कलि प्रभाव से धर्म का ह्रास हो रहा है।  धर्म के चार पैर हैं - तपस, शौच, दया और सत्य। आपके तीन चरण कलि प्रभाव से बिगड़ गए हैं और अब कलियुग में सत्य ही बचा है।  मैं बहुत दुखी हूँ कि अब मुझ पर ऐसे लोग रहेंगे जो कहेंगे कि कोई ईश्वर है ही नहीं और यह चराचर जगत सिर्फ पदार्थों के प्रभाव से बना है और चल रहा है।  सिर्फ संयोग और सम्भोग से जीवन बनता और बहता है। ईश्वर है ही नहीं। "

इतने में वहां से एक भयावह दिखने वाला पुरुष आया और वह बैल के चौथे पैर (सत्य) को तोड़ने का प्रयास करने लगा। यह देख कर परीक्षित दौड़े  आए और उस पुरुष को मारने दौड़े।

उस कलि ने अपना भेष त्याग दिया और परीक्षित के चरणों में गिर पड़ा।  परीक्षित बोले - मैं अर्जुन पुत्र अभिमन्यु का पुत्र हूँ।  शरणागत की ह्त्या नहीं कर सकता।  तुम कौन हो ? उसने बताया कि वह कलियुग है तो परीक्षित कुपित हो कर बोले कि मेरे राज्य में प्रविष्ट होने का तुम्हारा साहस कैसे हुआ।  निकल जाओ यहां से।

कलि ने कहा - हे राजन , सारी पृथ्वी पर आप ही का तो राज्य है।  मैं कहाँ जाऊंगा ? मुझे भी प्रभु ने बनाया है ,  और समयानुसार ही मैं आया हूँ।  अब मैं कहाँ जाऊंगा ? आप राजा हैं तो मुझे रहने का स्थान देना भी आप का ही धर्म है। क्योंकि मैं प्रभु द्वारा रचित हूँ और आपकी प्रजा भी हूँ।

तब परीक्षित ने सोच समझ कर कहा - ठीक है।  शरणागत प्रजाजन का मैं वध नहीं करूंगा। तुम वहां रह सकते हो जहां ईश्वर का नाम भुलाया जा चुका हो, जहां जुआ, शराब, कामवासना , और ह्त्या की कामना हो। कलि ने कहा - मुझे एक ऐसा स्थान बताएं जहाँ ये सब साथ हों। मैं वहीं चला जाऊँगा।  तब परीक्षित ने कहा - स्वर्ण में यह सब है - तुम स्वर्ण में रह सकते हो।  तत्क्षण कलियुग ने स्वर्ण में अपना घर बना लिया।

परीक्षित का मुकुट भी स्वर्ण का ही था और कलियुग के प्रवेश पर उनका सर कलि प्रभाव से प्रभावित हुआ।
………………

एक बार परीक्षित आखेट पर थे और बहुत थके और क्लांत हो कर वे महर्षि शमिका के आश्रम पहुंचे। उन्होंने आदरपूर्वक ऋषि को प्रणाम किया और जल माँगा।  किन्तु ऋषि समाधिस्थ थे और उन्होंने राजा को कोई उत्तर न दिया।  बार बार पूछने पर भी उत्तर न आने से कलि प्रभावित थके हुए और प्यासे राजा को लगा कि ऋषि जानबूझ कर उनका अपमान कर  क्रोध में आकर उन्होंने वहां पड़े हुए मृत सर्प को ऋषि के गले में डाल दिया और लौट गए।  जब वे महल पहुंचे और मुकुट उतार तो कलि प्रभाव हटा और वे बहुत लज्जित हुए कि मैंने कितना गलत पाप कर्म कर दिया।  वे क्षमा मांगने जाने का सोचने लगे।

उधर ऋषि पुत्र श्रृंगी के मित्र आकर उसे छेड़ने लगे कि तुम्हारे पिता मृत शरीर उठाये हैं।  वह दौड़ा भागा आश्रम पहुंचा और यह दृश्य देख अत्यंत दुखी हुआ।  तत्क्षण उसने कमंडल का जल लेकर श्राप दिया कि जिसने मेरे पिता के साथ यह किया वह ठीक सात दिन में सांप के ही काटने से मर जाएगा।  फिर बालक बहुत रोने लगा।

पुत्र के रोने से ऋषिवर की समाधी टूटी और सब जानकर उन्होंने औने पुत्र को कहा कि तुम कैसे ब्राह्मण हो ? परीक्षित तो धर्मरक्षक राजा है  - प्यास की अधीरता से यदि उनका क्षत्रिय क्रोध उठ आया और उन्होंने यह कर भी दिया तो तुम्हे तो ब्राह्मण के गुणों - क्षमा और शान्ति - का त्याग नहीं करना चाहिए था ? लेकिन अब कुछ नहीं हो सकता - क्योंकि सच्चे ब्राह्मण का श्राप झूठा नहीं हो सकता।

तभी ऋषि ने महल अपने शिष्यों को भेजा जिन्होंने परीक्षित को बताया कि आज से सात दिन बाद आपकी सांप काटने से मृत्यु हो जायेगी।  यह सुन परीक्षित बिलकुल दुखी नहीं हुए और बोले - मुझसे भयंकर पाप हुआ था , उसका दंड यहीं देकर ऋषिपुत्र ने मुझे मृत्यपरांत पाप का धारण किये रहने से बचा लिया है।

तुरंत परीक्षित ने अपने पुत्र का राज्याभिषेक कराया और सर्वस्व त्याग कर गंगातट पर चल पड़े।  वहां अनेक महान ऋषिगण पहुंचे और मोक्ष के तरीके पर उन्हें सलाह देने के आग्रह पर उन्हें बताने को उद्धत हुए। किसी ने योग, किसी ने तपस, किसी ने दान और किसी ने यज्ञ की सलाह दी।  तभी वहां व्यास पुत्र शुकदेव आये और सभी ने उनसे ही राह सुझाने को कहा। 

शुकदेव जी ने कहा - योग और यज्ञ के लिए एक सप्ताह का समय कम है।  दान आप नहीं कर सकते क्योंकि आप सर्वस्व पहले ही त्याग आये - तो आपके पास दान करने को कुछ नहीं है।  तपस भी एक सप्ताह में नहीं हो सकता।

भागवद कथा के श्रवण से आप शुद्ध हो जाएंगे और ईश्वर धाम को जाएंगे। एक सप्ताह का समय तो बहुत अधिक है - एक मुहूर्त भी भागवत कथा का श्रवण मन और भक्ति से हो तो काफी है किसी के भी लिए।

इसके पश्चात कथा प्रारम्भ हुई।

जारी ……

शनिवार, 31 मई 2014

श्रीमद भागवतम सुखसागर -२ : महाभारत युद्ध का अंत, अश्वत्थामा, पांडवों का वनगमन

भाग १ 

महाभारत युद्ध अपने अंतिम क्षणों की तरफ अग्रसर था।  दुर्योधन भीम के अनुचित आघातों से घायल मृत्यु के इंतज़ार मे लाचार पड़ा हुए थ।  अश्वत्थामा के लिए  यह सब असह्य था -  उसे अपने पिता की अन्यायपूर्ण हत्या और दुर्योधन की पीड़ा सहन नहीं हो रही थी।  सो रात के समय वह पांडवों के नामोंनिशान को समाप्त करने उनके शिविर आया , लेकिन वह नहीं जानता था कि वहाँ पाँडव नहीं , बल्कि द्रौपदीपुत्र सो रहे हैं।

सोते हुए धृष्टद्युम्न को मारने के बाद उसने  पांडवों को (असलियत मे द्रौपदी के बेटों को) मार दिया और वापस आकर वन को चला गया।  इधर इस अनपेक्षित हत्याकांङ  से पीड़ित द्रौपदी को हत्यारे क सर लाने का वचन दे कर पाँडव उसकी खोज मे पीछे आये।

वेदव्यास जी के निकट खड़ा अश्वत्थामा अपने प्रायश्चित और संन्यास का मार्ग पूछ रहा था कि पांडव वहां पहुंचे।  उन्हें मृत समझ छोड़ आया अश्वत्थामा उन्हें देख क्रोधित हुआ और उन्हें समाप्त करने के लिए ब्रह्मास्त्र का संधान किया।  यह देख कृष्ण ने अर्जुन को भी आज्ञा दी कि वह भी यही करे - और अर्जुन ने भी यही किया।

यह देख वेदव्यास जी को क्षोभ हुआ और उन्होंने कहा कि तुम दोनों मूर्ख हो - इस तरह दुनिया समाप्त हो जाएगी - इन्हे वापस लो।  कृष्ण और वेदव्यास की आज्ञा से अर्जुन ने तो अपना ब्रह्मास्त्र लौटा लिया किन्तु अश्वत्थामा को यह करना नहीं आता था - सो उसने अपने क्रोध के कारण अपने अस्त्र को पांडवों की अगली संतति के अकेले वारिस - उत्तरा की कोख में पल रहे अभिमन्यु के अंश - की ओर प्रेषित किया।  ब्रह्मास्त्र की अग्नि से उत्तरा तड़प उठी और तभी कृष्ण ने लघु (अंगूठे सा) रूप धरा और उत्तरा की कोख में प्रवेश कर अभिमन्यु पुत्र की रक्षा की।  कोख में पल रहे बालक ने अपने पास उस दिव्य पुरुष को देखा जो अग्निकुंज रुपी ब्रह्मास्त्र से उसकी रक्षा कर रहे थे।

कोख में ही बालक की परम परीक्षा हो जाने से बालक "परीक्षित" हुए ; और उस दिव्य पुरुष को वे आजीवन न भूल सके और उनकी प्रतीक्षा में रहे - इसलिए वे "प्रतीक्षित" भी कहलाये।

इधर अश्वत्थामा के नीच कर्म के परिणाम स्वरुप कृष्ण ने उसके माथे पर चमकती तेज मणि ले ली और उसे चिरकाल तक इसी अवस्था में मुक्ति के लिए इंतज़ार में भटकने के लिए त्याग दिया।

बाद में कृष्ण और पांडव राजभवन पहुंचे।  समयक्रम में बड़ों (धृतराष्ट्र, विदुर, गांधारी (कुंती जी के बारे में जानकारी पूर्ण नहीं है)) ने सन्यास लिया

और कृष्ण द्वारका लौटे। युधिष्ठिर महाभारत युद्ध की भयावहता के लिए अपने को जिम्मेदार मानते थे और अचल साम्राज्य के स्वामी हो कर भी सुख से न रह पाते थे।

इधर व्यासदेव और अन्य जनों ने युधिष्ठिर को अश्वमेध यज्ञ की सलाह दी।  अश्वमेध के लिए कृष्ण भी आये।  उनके साथ अर्जुन भी द्वारका गए।  अर्जुन द्वारका से लौटे तो तेजहीन हो कर।  उन्होंने बताया कि श्रीकृष्ण अपने धाम लौट चुके हैं, और द्वारिका जलमग्न हो चुकी है। इस पर युधिष्ठिर आदि अति दुखित हुए।  कुंती ने प्राण त्याग दिए और अपने आराध्य कृष्ण के धाम चली गयीं। इधर वन में रह रहे विदुर जी को भी यह घटनाएं पता चलीं।  कृष्ण के बालकाल के संगी उद्धव जी से उन्होंने भागवद कथा जाननी चाही।  तब उद्धव जी ने उन्हें मैत्रेय ऋषि के पास जा कर कथा सुनने की सलाह दी।

[
विदुर तीर्थयात्रा पर थे। पहले वे धृतराष्ट्र को नीतिगत सलाह देते थे जो धृतराष्ट्र अनसुनी करते रहते थे।  एक बार जब मंत्री के कर्त्तव्य अनुसार विदुर महाराज धृतराष्ट्र को युद्ध टालने के लिए समझा रहे थे - तब दुर्योधन ने अति क्रुद्ध होकर उन्हें अपमानित कर निकल जाने को कहा, और विदुर ने जब महाराज की तरफ देखा तो वे मौन रहे।  तब विदुर निर्लिप्त मन से अपने पद को त्याग कर तीर्थ करने चले गए थे।  

अपनी यात्रा के दौरान ही उन्हें युद्ध के हालात पता चलते रहे। बाद में उन्हें उद्धव जी से ज्ञात हुआ कि कैसे श्रीकृष्ण का पूर्ण यादव वंश , गांधारी के श्राप वश  और साम्ब एवं युवा यादवों के अपमान से मिले श्राप से आपस में ही लड़ कर समाप्त हो गए, और कैसे श्रीकृष्ण जी भी अपने धाम लौट गए ) युद्ध के बाद ही वे वापस आये और उन्होंने धृतराष्ट्र को समझाया कि अब आपको संन्यास ले लेना चाहिए क्योंकि आपने अपने राजकाल में हमेशा अपने अनुज पुत्रों के साथ अन्याय किया, और अब उन्हीकी कृपा पर जी रहे हैं।  युधिष्ठिर कर्तव्यशील हैं और आपको ससम्मान रखेंगे।  किन्तु आपको यह शोभा नहीं देता।  इसके बाद वे, धृतराष्ट्र और गांधारी वन को चले गए। ]

युधिष्ठिर राज्य काज परीक्षित को विधिपूर्वक सौंप कर हिमालय की तरफ चल पड़े, और उनके पीछे उनके चारों प्रिय भाई , और द्रौपदी भी , चल पड़े।

परीक्षित ने कई वर्षों तक धर्मपूर्वक शासन किया।

जारि…


मंगलवार, 18 मार्च 2014

श्रीमद भगवद गीता २.१५

इस श्रंखला की पिछली पोस्ट में हमने इस श्लोक पर बात की ।

मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः |
आगमापायिनोSनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत || १४ ||

इस श्रंखला के बाकी भाग देखने चाहें / पहले भाग से पढ़ना चाहें तो ऊपर गीता टैब पर क्लिक करें । या फिर ये लिंक देखें

1.1 , 1.2 , 1.3
2.12.22.32.42.52.62.72.82.9and 2.10,

उस पोस्ट पर एक चर्चा चली जिसमे महाभारत युद्ध में दोनों ही पक्षों का अधर्म पथ पर होने की बात हुई । इस पर मैं कोई टिप्पणी नहीं कर रही हूँ । सिर्फ यह कह रही हूँ कि इस श्रंखला में मैं महाभारत ग्रन्थ पर नहीं बल्कि गीता पर बात कर रही हूँ । गीता महाभारत युद्ध के दौरान पुनः कही गयी है लेकिन यह महाभारत का हिस्सा नहीं । श्री कृष्ण (आगे गीता में) अर्जुन से कहते हैं कि यह गीता ज्ञान मैंने पहले सूर्य देव को दिया था जिन्होंने अपने पुत्र को दिया और परम्परा से वह ज्ञान आगे बढ़ा - लेकिन समय के साथ यह लुप्तप्रायः हो चला है इसलिए मैं आज इसे फिर से तुझे कह रहा हूँ ।

अजीब बात यह है कि , यह सब "अर्जुन को कृष्ण न लड़वाते तो हिंसा रूकती" कहने वाले लोग वे ही हैं जो कुछ महीने पहले दामिनी के गुनाहगारों को सड़क पर जंगली से जंगली सजाओं की वकालत कर रहे थे। क्या वे कहेंगे कि जज की कुर्सी पर बैठे व्यक्ति को यदि कटघरे में खड़ा बलात्कारी अपना गुरु या परिवारजन दिखे (या शक्तिशाली राजपुत्र दिखे) तब जज को "अहिंसावादी" बन कर पीछे हट जाना चाहिए ? ............. लेकिन यह रक्त का उबाल राजपुत्र दुर्योधन के अनेकानेक स्त्रियों के शोषण पर उबाल नहीं खाता , क्योंकि वह सब तो "पुरानी बात" है  । दुर्योधन की नज़र न सिर्फ अपनी भाभी (राजपरिवार की बहू )पर ही पड़ी बल्कि यदि आपको याद हो तो पांडवों के वनवास के दौरान एक और राजकन्या के साथ उसने यही किया था । जब राज कन्या के साथ  का यह  होता था तो जन साधारण की तो सोच ही सकते हैं  ।

लेकिन नहीं -  ये सब   भूल कर ये "ज्ञानीजन" अचानक "अहिंसावाद" पर चल देते हैं और गीता कह कर अर्जुन को प्रेरित करने के लिए कृष्ण को "अपराधी" घोषित कर देते हैं । वे यह भी भूल जाते हैं कि अक्सर साधारण स्थितियों में अहिंसा की बात करने वालों को वे स्वयं ही मूर्ख / डरपोक / आदि आदि  ... घोषित करते हैं ।

लेकिन जब गीता की बात होती है तब अचानक सब न्यायप्रियता और वीरता "अहिंसावाद" की ओट  में छुप जाती है  । तब उन्हें अचानक लगने लगता है कि यदि बलात्कारियों के साथ अपने पितामह / गुरु / भाई दिखें तब न्याय की रक्षा को भूल कर युद्ध से पीठ दिखा देना "भला और सही रास्ता " हो जाता है  ।

कृपया गीता की चर्चा पर बने रहे । महाभारत की (औचित्य और अनौचित्य ) चर्चा उसी महाभारत श्रंखला पर रहे तो बेहतर रहेगा । जब हम केमिस्ट्री की क्लास में बैठते हैं तो फिजिक्स की बात नहीं करते । लेकिन जीवन मूल्य सिखाने वाली गीता पर हम जज और ज्यूरी बन कर अपने निर्णय देने लगते हैं ।
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अब अगला श्लोक :

यं हि न व्यथ्यन्त्येते पुरुषं पुरुषर्षभ् |
सं दुःख सुखं धीरं सोSमृतत्वायकल्पते ||


भावार्थ: 
जिसे ये सब व्यथित नहीं करते और जो इन सब (शारीरिक या मानसिक) परिस्थितियों में सम रहता है (और अपना निश्चित कर्म करता रहता है) वह पुरुष श्रेष्ठ है, और मुक्त है ।  
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गीता का दूसरा अध्याय पूरी गीता का summarization सा लगता है मुझे  । पहले दस श्लोकों में अर्जुन की व्यथा  थी । वह अपने रिश्ते नातेदारों को देख आकर विचलित हो जाता है और युद्ध को छोड़ देने की बातें कहता है । अब कृष्ण उसे समझा रहे हैं ।

पिछले श्लोक में कृष्ण ने कहा कि जैसे हमारी इन्द्रियां (sense of touch etc) हमें (हमारे शरीर को भिन्न शारीरिक परिस्थितियों में ) सर्दी और गर्मी का अनुभव कराती हैं , उसी तरह हे कुन्तीनन्दन, हमारे मन को भी सुख और दुःख का अनुभव होता है (भिन्न मानसिक परिस्थितियों में) । जैसे सर्दी और गर्मी (ऋतुएँ ) आती जाती रहती हैं और स्थायी नहीं हैं उसी तरह हे अर्जुन ये सुख दुःख के अनुभव भी आते जाते हैं और स्थायी नहीं हैं । (अपने मन से) इन्हें (जैसे शरीर गर्मी और सर्दी को सहन करता है) सहन कर ।

इस श्लोक में कृष्ण कह रहे हैं कि  जिस किसी मनुष्य को ये सब स्थितियां डावांडोल नहीं कर सकें वही मनुष्य मनुष्यों में श्रेष्ठ है और मोक्ष में है । आगे जाकर कहीं मुक्ति नहीं - अभी इसी जीवन में यदि कोई दुःख सुख से अनछुआ है तो अभी की ही स्थिति अमृतमय मुक्ति है ।

अब यह दोनों श्लोक सिर्फ महाभारत के सम्बन्ध में नहीं है  । दुःख और सुख को समान मान कर कर्म करने वाले ही सच में कर्तव्य कर्म कर सकते हैं । जो दुःख सुख से चलायमान होंगे वे कटु कर्तव्य कर ही नहीं सकते । क्योंकि वे तो दुःख से बचने और सुख की ओर जाने वाली ही राह चुनेंगे । ध्यान देने की बात है कि यहाँ कहीं भी युधिष्ठिर या दुर्योधन के सही गलत होने पर कुछ नहीं कहा गया है । बल्कि व्यक्ति के निजी कर्त्तव्य की बात कही जा रही है  ।

एक योद्धा जो युद्ध भूमि में आ चुका है, जिसके रण कौशल के भरोसे उसके राजा युद्ध में उतरे हैं - वह अब पीठ दिखा कर भागना चाहता है क्योंकि विरोध में उसके अपने खड़े हैं ।

कृष्ण कह रहे हैं कि अपने निजी दुःख सुख को आने जाने वाला (ऋतुओं की तरह परिवर्तन शील) मान ले, और अपना (अपना का अर्थ है अपन कर्म - योद्धा अर्जुन का कर्म - व्यक्ति अर्जुन का नहीं, पुत्र अर्जुन का नहीं, शिष्य अर्जुन का नहीं) कर्म कर । जो व्यक्ति अपने निजी दुःख सुख को परे कर कर्म कर सके वही मानवों में श्रेष्ठ होता है।

यह सब कृष्ण कब कह रहे हैं  ? कई लोग कहते हैं कि कृष्ण यदि अर्जुन को न समझाते , तो युद्ध रुक जाता , कई कई लोग न मरते। लेकिन वे भूल जाते हैं कि कृष्ण ने युद्ध से पहले तक बहुत समझाया था किन्तु अर्जुन तब अपने क्रोध (द्रौपदी का अपमान , वनवास का अपमान, आदि आदि) से क्रुद्ध हुआ युद्ध को उद्धत था। तब क्या अर्जुन नहीं जानता था कि युद्ध में कौन सामने होंगे ? भीष्म और द्रोण तो द्यूत क्रीडा के समय ही उसे अपना पक्ष बता चुके थे, और सारे पांडव जानते थे कि वे कौरवों के साथ खड़े दिखेंगे । फ़िर अब नया क्या हुआ ?

जो लोग हज़ारों प्राणों के खोने की बातें करते हैं वे यह भूल जाते हैं कि वे खुद अपने देश के शत्रु देश के शुरू हो चुके युद्ध के दौरान मुख्य सेनानायक/ जनरल / सेनाध्यक्ष .... के अर्जुन की तरह "अहिंसावादी" बन कर संन्यास ले कर युद्ध भूमि छोड़ देने को वे खुद क्या कहेंगे ???? वे यह भी भूल जाते हैं कि हर आतंकवादी घटना के बाद वे खुद युद्ध छेड़ने की गुहार लगाते हैं - यह भूल कर की युद्ध में कितनी "हिंसा" होगी और कितने "निर्दोष सैनिक" मारे जायेंगे। कितनी औरतें विधवा होंगी, और कितने बच्चे अनाथ हो जायेंगे  ।

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यदि हमें गीता समझनी है तो अपने आप को महाभारत के मायाजाल से निकाल कर इसे देखना होगा  । गीता जीवन पथ प्रदर्शिका है - यह महाभारत या अर्जुन तक सीमित नहीं है  । कृपया काँटों में उलझे रह कर गुलाब से मुंह न मोडें - इसे समझने के प्रयास करें ।

गीता की असल शुरुआत मुझे लगती है २.११ से । कई विद्वान् ऐसा मानते हैं तो कई नहीं मानते । यह मेरा अपना विचार था की यहाँ से श्री भगवान् का कथन शुरू होता है और पहले बैकग्राउंड है - और पहली बार मुझे श्रीविनोबा भावे जी का version  श्री अनुराग शर्मा जी की आवाज़ में सुनते हुए यह पता चला कि यह और भी लोग मानते हैं  । और यहाँ से कृष्ण का गीत आता है । पूरी महाभारत में न उलझें - इस पर आयें । दुसरे अध्याय के ग्यारहवे श्लोक से जो पोस्ट  लिखी हैं उनके भावार्थ फिर से पेस्ट कर रही हूँ  (ऊपर पूरी पोस्ट्स के लिंक भी हैं ।) :  :

11 श्री भगवान् ने कहा - तू न सोचने योग्य बातों पर इतना सोचा रहा है, और पंडिताई की भाषा प्रयुक्त करता है | किन्तु जो सच ही में पंडित हो - वह तो जिनके प्राण चले गए, या जिनके नहीं भी गए, उन दोनों के ही लिए शोक नहीं करते |

12 (श्री कृष्ण आगे अर्जुन से बोले - )
निश्चित ही पूर्व में ऐसा कोई काल नहीं था जब तू नहीं था, या मैं नहीं था या ये सब राजागण नहीं थे । न ही आगे ऐसा कोई काल होगा जब हम सब नहीं होंगे ।


13 जैसे शरीर में रहने वाला आत्मा अपरिवर्तित ही रह कर लगातार बदलते हुए शरीर में वास करता है (शरीर बालक से जवान होता है, फिर बूढा भी परन्तु उसके भीतर रहने वाला व्यक्ति वही रहता है ) उसी तरह मृत्यु के समय भी वही आत्मा एक से दूसरे शरीर में पुनर्वास कर लेता है | जो यह जानते हैं , वे मोहित नहीं होते ।

14 इन्द्रिय अनुभूति (और मन की भी ) - गर्मी, सर्दी,सुख और दुःख की अनुभूति कराती हैं । जैसे ये मौसम के असर आने जाने वाले हैं, स्थायी नहीं, वैसे ही सुख दुःख भी आने जाने वाले हैं । हे भारत, इनसे प्रभावित हुए बिना इन्हें सहन करना (अनुभव करते हुए भी उपेक्षा करना) सीख । 

15 जिसे ये सब व्यथित नहीं करते और जो इन सब (शारीरिक या मानसिक) परिस्थितियों में सम रहता है (और अपना निश्चित कर्म करता रहता है) वह पुरुष श्रेष्ठ है और मुक्त है ।  

इन श्लोकों में जीवन का ज्ञान है - अपने मानस में इन्हें कृपया सिर्फ पांडव कौरव युद्ध के सन्दर्भ भर तक सीमित न रखें  ।

इस गीता आलेख के बाकी भागों (इससे पहले और बाद के) के लिए ऊपर गीता tab पर क्लिक करें 
जारी 

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disclaimer:
कई दिनों से इच्छा थी, कि भगवद गीता की अपनी समझ पर लिखूं - पर डर सा लगता है - शुरू करते हुए भी - कि कहाँ मैं और कहाँ गीता पर कुछ लिखने की काबिलियत ?| लेकिन दोस्तों - आज से इस लेबल पर शुरुआत कर रही हूँ - यदि आपके विश्लेषण के हिसाब से यह मेल ना खाता हो - तो you are welcome to comment - फिर डिस्कशन करेंगे .... यह जो भी लिख रही हूँ इस श्रंखला में, यह मेरा interpretation है, मैं इसके सही ही होने का कोई दावा नहीं कर रही  
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मेरे निजी जीवन में गीता जी में समझाए गए गुण नहीं उतरे हैं । मैं गीता जी की एक अध्येता भर हूँ, और साधारण परिस्थितियों वाली उतनी ही साधारण मनुष्य हूँ जितने यहाँ के अधिकतर पाठक गण हैं (सब नहीं - कुछ बहुत ज्ञानी या आदर्श हो सकते हैं) । गीता जी में कही गयी बातों को पढने / समझने / और आपस में बांटने का प्रयास भर कर रही हूँ , किन्तु मैं स्वयं उन ऊंचे आदर्शों पर अपने निजी जीवन में खरी उतरने का कोई दावा नहीं कर रही । न ही मैं अपनी कही बातों के "सही" होने का कोई दावा कर रही हूँ।   मैं पाखंडी नहीं हूँ, और भली तरह जानती हूँ  कि मुझमे अपनी बहुत सी कमियां और कमजोरियां हैं । मैं कई ऐसे इश्वर में आस्था न रखने वाले व्यक्तियों को जानती हूँ , जो वेदों की ऋचाओं को भली प्रकार प्रस्तुत करते हैं । कृपया सिर्फ इस मिल बाँट कर इस अमृतमयी गीता के पठन करने के प्रयास के कारण मुझे विदुषी न समझें (न पाखंडी ही) | कृष्ण गीता में एक दूसरी जगह कहते हैं की चार प्रकार के लोग इस खोज में उतरते हैं, और उनमे से सर्वोच्च स्तर है "ज्ञानी" - और मैं उस श्रेणी में नहीं आती हूँ ।

बुधवार, 8 मई 2013

महादानी तेजस्वी सूर्यपुत्र कर्ण का जीवन इतना त्रासदियुक्त क्यों रहा ?

कई लोग कई जगह कई बार यह प्रश्न  हैं कि महाभारत  में कर्ण जैसे "हीरो" का जीवन इतना दुखद क्यों ? सूर्यपुत्र और ओजस्वी होकर भी उसे हमेशा सूतपुत्र पुकारा गया , माँ ने टोकरी में रख कर बहा दिया आदि आदि । (वैसे तो इसी तरह के प्रश्न भीष्म और धृतराष्ट्र के सम्बन्ध में भी उठते हैं - लेकिन उन पर बात कभी और सही) । इस प्रश्न का उत्तर श्री भागवतम में मिलता है ।

चार युग हैं : 

त्रेता युग में दो कहानियों के तार कर्ण से आ कर जुड़ते हैं । 

एक असुर था - दम्बोद्भव । उसने सूर्यदेव की बड़ी तपस्या की । सूर्य देव जब प्रसन्न हो कर प्रकट हुए और वरदान मांगने को कहा तो उसने "अमरत्व" का वरदान माँगा  । सूर्यदेव ने कहा यह संभव  नहीं है। तब उसने माँगा कि उसे एक हज़ार दिव्य कवचों की सुरक्षा मिले। इनमे से एक भी कवच सिर्फ वही तोड़ सके जिसने एक हज़ार वर्ष तपस्या की हो और जैसे ही कोई एक भी कवच को तोड़े, वह तुरंत मृत्यु को प्राप्त हो । 

सूर्यदेवता बड़े चिंतित हुए। वे इतना तो समझ ही पा रहे थे कि यह असुर इस वरदान का दुरपयोग करेगा, किन्तु उसकी तपस्या के आगे वे  मजबूर थे।उन्हे उसे यह वरदान देना ही पडा । 
इन कवचों से सुरक्षित होने के बाद वही हुआ जिसका सूर्यदेव को डर था । दम्बोद्भव अपने सहस्र कवचों की सहक्ति से अपने आप को अमर मान कर मनचाहे अत्याचार करने लगा । वह "सहस्र कवच" नाम से जाना जाने लगा  । 

उधर सती जी के पिता "दक्ष प्रजापति" ने अपनी पुत्री "मूर्ति" का विवाह ब्रह्मा जी के मानस पुत्र "धर्म" से किया । मूर्ति ने सहस्र्कवच के बारे में सुना  हुआ था - और उन्होंने श्री विष्णु से प्रार्थना की कि  इसे ख़त्म करने के लिए वे आयें । विष्णु जी ने उसे आश्वासन दिया कि वे ऐसा करेंगे ।  

समयक्रम में मूर्ति ने दो जुडवा पुत्रों को जन्म दिया जिनके नाम हुए नर और नारायण । दोनों दो शरीरों में होते हुए भी एक थे - दो शरीरों में एक आत्मा । विष्णु जी ने एक साथ दो शरीरों में नर और नारायण के रूप में अवतरण किया था । 

दोनों भाई बड़े हुए । एक बार दम्बोध्भव इस वन पर चढ़ आया । तब उसने  एक तेजस्वी मनुष्य को अपनी ओर आते देखा और भय का अनुभव किया । 

उस व्यक्ति ने कहा कि मैं "नर" हूँ , और तुमसे युद्ध करने आया हूँ । भय होते भी  दम्बोद्भव ने हंस कर कहा -  तुम मेरे बारे में जानते ही क्या हो ?  मेरा कवच सिर्फ वही तोड़ सकता है जिसने हज़ार वर्षों तक तप किया हो । 

नर ने हंस कर कहा कि मैं और मेरा भाई नारायण एक ही हैं - वह मेरे बदले तप कर रहे हैं, और मैं उनके बदले युद्ध कर रहा हूँ । 

युद्ध शुरू हुआ , और सहस्र कवच को आश्चर्य होता रहा कि सच ही में नारायण के तप से नर की शक्ति बढती चली जा रही थी ।  जैसे ही हज़ार वर्ष का समय  पूर्ण हुआ,नर ने सहस्र कवच का एक कवच तोड़ दिया । लेकिन सूर्य के वरदान के अनुसार जैसे ही कवच टूटा नर मृत हो कर वहीँ  गिर पड़े । सहस्र कवच ने सोचा, कि चलो एक कवच गया ही सही किन्तु यह तो मर ही गया । 

तभी उसने देखा की नर उसकी और दौड़े आ रहा है - और वह चकित हो गया । अभी ही तो उसके सामने नर की मृत्यु हुई थी और अभी ही यही जीवित हो मेरी और कैसे दौड़ा  आ रहा है ???

लेकिन फिर उसने देखा कि नर तो मृत पड़े हुए थे, यह तो हुबहु नर जैसे प्रतीत होते उनके भाई नारायण थे - जो दम्बोद्भव की और नहीं, बल्कि अपने भाई नर की और दौड़ रहे थे  । 

दम्बोद्भव ने अट्टहास करते हुए नारायण से कहा कि तुम्हे अपने भाई को समझाना चाहिए था - इसने अपने प्राण व्यर्थ ही गँवा दिए । 

नारायण शांतिपूर्वक मुस्कुराए । उन्होंने नर के पास बैठ कर कोई मन्त्र पढ़ा और चमत्कारिक रूप से नर उठ बैठे  । तब दम्बोद्भव की समझ में आया कि हज़ार वर्ष तक शिवजी की तपस्या करने से नारायण को मृत्युंजय मन्त्र की सिद्धि हुई है - जिससे वे अपने भाई को पुनर्जीवित कर सकते हैं । 

अब इस बार नारायण ने दम्बोद्भव को ललकारा और नर तपस्या में बैठे । हज़ार साल के युद्ध और तपस्या के बाद फिर एक कवच टूटा और नारायण की मृत्यु हो गयी । 

फिर नर ने आकर नारायण को पुनर्जीवित कर दिया, और यह चक्र फिर फिर चलता रहा । 

इस तरह ९९९ बार युद्ध हुआ । एक भाई युद्ध करता दूसरा तपस्या । हर बार पहले की मृत्यु पर दूसरा उसे पुनर्जीवित कर देता । 

जब 999  कवच टूट गए तो सहस्र्कवच समझ गया कि अब मेरी मृत्यु हो जायेगी । तब वह युद्ध त्याग कर सूर्यलोक भाग कर सूर्यदेव के शरणागत हुआ । 

नर और नारायण उसका पीछा करते वहां आये और सूर्यदेव से उसे सौंपने को कहा  । किन्तु अपने भक्त को सौंपने पर सूर्यदेव राजी न हुए। तब नारायण ने अपने कमंडल से जल लेकर सूर्यदेव को श्राप दिया कि आप इस असुर को उसके कर्मफल से बचाने का प्रयास कर रहे हैं, जिसके लिए आप भी इसके पापों के भागीदार हुए और आप भी इसके साथ जन्म लेंगे इसका कर्मफल भोगने के लिए । 

इसके साथ ही त्रेतायुग समाप्त हुआ और द्वापर का प्रारम्भ  हुआ । 

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 समय बाद कुंती जी ने अपने वरदान को जांचते हुए सूर्यदेव का आवाहन किया, और कर्ण का जन्म हुआ  । लेकिन यह आम तौर पर ज्ञात नहीं है, कि , कर्ण सिर्फ सूर्यपुत्र ही नहीं है, बल्कि उसके भीतर सूर्य और दम्बोद्भव दोनों हैं । जैसे नर और नारायण में दो शरीरों में एक आत्मा थी, उसी तरह कर्ण के एक शरीर में दो आत्माओं का वास है - सूर्य और सहस्रकवच ।  दूसरी ओर नर और नारायण इस बार अर्जुन और कृष्ण के रूप में आये । 

कर्ण के भीतर जो सूर्य का  अंश है,वही उसे तेजस्वी वीर बनाता है । जबकि उसके भीतर दम्बोद्भव भी होने से उसके कर्मफल उसे अनेकानेक अन्याय और अपमान मिलते है, और उसे द्रौपदी का अपमान और ऐसे ही अनेक अपकर्म करने को प्रेरित करता है ।  

यदि अर्जुन कर्ण का कवच तोड़ता, तो तुरंत ही उसकी मृत्यु हो  जाती ।इसिलिये इंद्र उससे उसका कवच पहले ही मांग ले गए थे । 

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एक और प्रश्न जो लोग अक्सर उठाते हैं - श्री कृष्ण ने (इंद्रपुत्र) अर्जुन का साथ देते हुए (सूर्यपुत्र) कर्ण को धोखे से क्यों मरवाया ?
..... कहते हैं कि श्री राम अवतार में श्री राम ने (सूर्यपुत्र) सुग्रीव से मिल कर (इंद्रपुत्र) बाली का वध किया था (वध किया था , धोखा नहीं । जब किसी अपराधी को जज मृत्युदंड की सजा देते हैं तो उसे सामने से मारते नहीं - यह कोई धोखे से मारना नहीं होता)- सो इस बार उल्टा हुआ । 
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यह कथा कर्ण के सम्बन्ध में थी - फिर कभी ऐसी ही दूसरी कथाओं पर बात होगी । 

शुक्रवार, 1 मार्च 2013

क्या हिन्दू धर्म हमें अपने आराध्यों की आलोचना का अधिकार देता है ?

आज रचना जी के ब्लॉग "बिना लाग लपेट के…" पर यह लेख पढ़ा : "ईश्वर - हिन्दू धर्म "। इसमें रचना जी ने हिन्दू धर्म में अवतारों के तत्कालीन सामाजिक बिहेवियर और उसपर हिन्दू धर्मावलम्बियों द्वारा होने वाली आलोचना और उसके लिए धार्मिक सम्मति पर लिखा है । इस पर टिप्पणी लिखने लगी , तो वह टिप्पणी पूरी पोस्ट ही बन गयी - इसलिए वहां लिंक दे कर यहाँ पोस्ट के रूप में पब्लिश कर रही हूँ ।

इससे पहले भी मैं इसी "हिन्दू धर्म में अवतारों" की आलोचना , उनकी "मानवीय गलतियों" की आलोचना आदि पर , इस ब्लॉग पर , यहाँ लिखा था , लिंक क्लिक कर आप फिर से पढ़ सकते हैं ।
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-त्रुटी सुधार 
पूरे लेख में "आलोचना" शब्द से अर्थ "निंदा की मंशा से की गयी आलोचना " पढ़ा जाए । यह सुधार आदरणीय सुज्ञ जी के दिए कमेन्ट और "आलोचना" और "निंदा" में फर्क के सन्दर्भ में है ।   
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"
यह हिन्दू धर्म की "खासियत" या "तारीफ़" की बात नहीं है की हम अपने आराध्यों की आलोचना करते हैं, बल्कि यह हमारी कमी है, कि हमने इसे इतना common बना लिया कि अब यह हमें normal लगने लगा है । एक रेपिस्ट के लिए रेप करना "normal" है, एक चोर के लिए चोरी करना "normal" है, एक डाकू के लिए डाका डालना भी normal है । इसका अर्थ यह नहीं है कि यह सब सच ही में नोर्मल है । .............. और इसी तरह से आराध्यों की आलोचना भी normal नहीं है, और "हिन्दू" या कोई भी समाज / धर्म इसे सही नहीं ही मानते हैं / ठहरा रहे हैं ।

हम ऐसा इसलिए समझने लगे हैं, कि हमें अपने धर्म के बारे में सही जानकारी ही नहीं है । 

जानकारी कैसे हो ? एक तरीका था कि हम धर्मग्रन्थ पढ़ कर जानते - लेकिन हमने तो अपने ग्रन्थ भी नहीं पढ़े (जिससे हम जान पाते) कि हमारा धर्म क्या कहता है (समय कहाँ है हमारे पास यह सब पोथियाँ पढने  के लिए ???) । और दूसरा तरीका था धर्म गुरुओं से आम इंसान धर्म के बारे में जान पाता । वह भी नहीं हुआ , क्योंकि गुरुओं से सीखना तो खैर आज के modern ज़माने में हमें अपनी तौहीन ही लगती है, और सच्चे गुरु भी इस कलियुग में मिलना बड़ा कठिन है :(  :(  ....... तो उस दिशा से भी हम कभी नहीं जान पाए कि "क्या हमें अधिकार है भी या नहीं यह "आलोचना" करने का ।"

अवतारों की आलोचना करने का अधिकार हमें "हिन्दू धर्म" नहीं देता - यह हमारा धर्म के बारे में अज्ञान है जो हम ऐसा सोचते हैं कि हमारा धर्म हमें इन अवतारों के बारे में "क्रिटिकल" होने का अधिकार देता है । तीन उद्धरण दे रही हूँ अपनी बात रखने के लिए ।

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१. रामायण में बाली राम से प्रश्न करता है कि आपने मुझ पर छुप कर वार क्यों किया - अर्थात आलोचना । राम उत्तर देते हैं कि मेरे निर्णय के कारण मैं जानता हूँ - तुम्हे प्रश्न करने का अधिकार ही नहीं है । अर्थात - जिसे मारा गया - उसे तक भी आलोचना का अधिकार नहीं है , हमारी और आपकी तो खैर बात ही छोड़ दीजिये ।
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२. गीता में कृष्ण कहते हैं कि

(४.६ से ४.९ 4.6 to 4.9 )
"सब जीवों का प्राणदाता, अजन्मा, ईश्वर हो कर भी , मैं , अपनी प्रकृति को अपने अधीन कर (धर्मरक्षा के लिए और अधर्म के नाश के लिए ) प्रकट होता हूं । जो मुझे और मेरे अवतरण को दिव्य जानते हैं, वे मुझे प्राप्त करते हैं"

( ४.१४ 4.14)
"मैं अपने कर्म में लिप्त नहीं होता - इसलिए कर्मफल में नहीं बंधता । और जो ज्ञानीजन इस बात को समझते हैं वे भी कर्म से नहीं बंधते "
****(आपके शब्दों में "कर्मों की आलोचना" - यह भी कर्म फल ही होता है , और यह ज्ञानीजन नहीं करते)****

(९ .९ से ९ . ११ 9.9 to 9.11 )
" मैं सब कर्मों को करते हुए भी उनमे आसक्ति नहीं रखता, तो कर्म मुझे नहीं बाँध सकते । जो "मूर्ख" इस बात को नहीं समझते, वे मूर्ख , मानव रूप में विचरण करते हुए मुझ "दिव्य" को नहीं पहचानते और मेरी आलोचना करते हैं । वे मोहित हुए (माया से, अपने अज्ञान को ज्ञान समझ कर के मोह में विमूढ़ / बेसुध हुए ) इन "राक्षसी" और "नास्तिकता की" बातों की ओर आकर्षित होते हैं, और मुक्ति की संभावनाओं से दूर होते जाते हैं ।
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३. रामचरित मानस में जब शिव जी सती जी को राम जी की लीलाएं सुनाते हैं तो सती जी इस "मानव अवतार" के "परमेश्वर" होने पर अविश्वास करती हैं, राम जी की मानवी लीलाओं की "आलोचना" करते हुए प्रश्न करती हैं , कि "ऐसे मूर्ख मानव संवेदनाओं में बहने वाले को आप परमेश्वर कहते हैं ?" तब शिव जी उन्हें बहुत समझाते हैं, कि यह सब लीला है और प्रभु की "आलोचना" करना महापाप है । 

किन्तु सती जी को समाधान नहीं होता और वे अपनी "आलोचना" पर मन ही मन अडिग रहती हैं । इस पर एक बहुत लंबा वर्णन है जिसके अंत में शिव द्वारा मानस रूप से सती जी का त्याग होता है, और आखिर सती जी भी मानव संवेदनाओं की ही लीला रचते हुए (जिन संवेदनाओं की उन्होंने राम जी में आलोचना की थी) अपने पिता की यज्ञशाला में आत्मदाह कर लेती हैं ।

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यह तीनों वर्णन कहने का मतलब है कि "धर्म" आपको , या मुझे , या किसीको भी , ईश्वर की / अवतारों की , "आलोचना" करने आ अधिकार नहीं देता । यह तो पिछले ६-७ शताब्दियों में विदेशी धर्मों के विदेशी प्रचारकों (और बाद में विदेशी प्रचारकों और देशी धर्मान्तरित अव्लम्बियो, जो भूल चुके थे कि उनके पुरखों को कैसे धर्मान्तरित  किया गया था ) की फैलाई हुई सीख है जो हिन्दुओं को इस भ्रान्ति में डाल रही है कि "तुम अपने आराध्यों की "आलोचना" करने को स्वतंत्र हो ।"

क्योंकि उस पराधीन कालखंड में (पहले मुग़ल और फिर ब्रिटिश राज्य के कालखंड ) यह "आलोचना" राज करने वालों "शक्तिवंतों" की ओर से आती थी , विरोध करने का अर्थ मृत्युदंड था ।  इसलिए यह सदियों तक सुनते सुनते जनमानस के मन में "acceptable" हो गयी । 

माता पिता भी सत्य बताते हुए डरते , कि आखिर बच्चे तो बच्चे होते हैं, उन्हें सत्य कहा , तो वे बाहर कह देंगे, और मारे जायेंगे । तो वे बच्चों को "बड़ा" होने पर बताने के लिए बात को टाले रखते । लेकिन विडम्बना यह है कि , बच्चे बड़े होने तक उनकी विचारधाराएं पक जाती है, उनके मन में "आलोचना" पक्की बैठ जाती है । यही हमारे धर्म के साथ हुआ ।

फिर देश में सरकार बनी जो हमें "secularism" की पट्टी पढ़ाती रही, इतिहास की पुस्तकों से वह सब क्रूरताएं छिपाई रखी गयीं कि किस तरह "हिन्दू" को जबरन धर्म के बारे में भ्रमित किया गया । इसलिए हम यही समझ रहे हैं कि यह "आलोचना" सही है, बल्कि इससे भी आगे बढ़ कर यह समझ रहे हैं कि हिन्दू धर्म की सीख ही है कि आराध्यों की आलोचना करो । जबकि यह अर्धसत्य है, जो झूठ से भी अधिक खतरनाक होता है ।

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"साम" "दाम" "दंड" "भेद" ये चार तरीके होते हैं मनुष्य को उसके विश्वासों से डिगाने के लिए । इस "धर्म निंदा और धर्मांतरण" के सिलसिले में, जब हिन्दू "गुलाम" थे और "दुसरे धर्मों वाले" हमारे राजा थे, इन चारों नीतियों को ऐसे इस्तेमाल किया गया । 

साम का अर्थ है समझाइश : हमें समझाया गया कि हमारे आराध्य "imperfect" हैं, उन्होंने तो बहुत सी "मानवीय भूलें" की हैं, वे आराधना के योग्य हैं ही नहीं ।

दाम का अर्थ है : जो गरीब / दरिद्र थे - उन्हें धन के बल पर / पैसे दे कर / जमीन दे कर आदि धर्मान्तरित किया गया ।

दंड अर्थ है - सजा के डर से (टार्चर) 
( गूगल इमेजेस में "gurudwara mahtiana sahab" डाल कर सर्च कीजिये । कुछ अंदाज़ होगा की धर्म परिवर्तन स्वीकार न करने पर किस तरह माओं के आगे उनके दुधमुंहे बच्चों को काटा गया - पहले एक हाथ , फिर दूसरा हाथ , फिर एक पैर ..... :( ।  देखिएगा , कैसे साधू को लकड़ियों में बाँध कर उनके शरीर को आरी से दो भागों में काटा गया, पानी / तेल के बड़े बर्तन में खडा कर के आग पर उबाला गया , कैसे सर की चमड़ी बालों सहित खींच कर उखाड़ ली गयी , आदि…। इसी सब से हिन्दू धर्म और समाज की रक्षा के लिए सिख गुरुओं ने "सिख" बनाए ।

पंजाब के हर "हिन्दू" परिवार का एक बेटा मोना (हिन्दू) होता तो दूजा बेटा सिख । लेकिन आगे औरंगजेब ने दसवें सिख गुरु, श्री गुरु गोबिंद सिंह जी, के सभी सुपुत्रों को मरवा दिया , तो गुरु परम्परा आगे न बढ़ सकी और हमें यह सिखा दिया गया कि "सरदार" के "मूर्ख" होने पर चुटकुले बनाए , सुनाएं, और उनकी हंसी उडाये - जिससे उनका मनोबल भी टूटे और हमसे "भेद:" भी हो ।:(

भेद का अर्थ है जनसँख्या के एक समूह को यह समझाना कि दूसरा समूह तुम्हारा शत्रु है, तुम्हारा शोषण कर रहा है । या इसके -उलट  की वह समूह मूर्ख है, तुमसे नीचा है । नफरत की ऐसी बेल बोई गयी कि "हिन्दू" भूल ही गया कि वह क्या था । वह स्त्री और पुरुष, उच्च वर्ग और निम्न वर्ग, सिख और हिन्दू , मद्रासी और हिंदी, जाति आदि में विभाजित हो कर "धर्म आलोचक" बन गया ।
"

मैं यह सब कह कर सिर्फ इतना समझाने का प्रयास कर रही हूँ कि हिन्दू धर्म हमें कदापि अपने आराध्यों की आलोचना करने की स्वतन्त्रता नहीं देता, यह हमें झूठी पट्टी पढ़ाई गयी है , समय आ गया है की अपनी आँखों पर बंधी पट्टी को हम उतार फेंकें ।

शनिवार, 20 अक्टूबर 2012

देवी कथाएँ 4

पिछले भाग से आगे (पढने के लिए ऊपर पुरानों की कहानियाँ tab क्लिक करें )

दक्ष दत्त (सती का) शरीर त्याग कर माता भवानी स्वधाम को लौट गयीं । शिव बड़े संतप्त हुए और कैलाश पर तप को चले गए । समय गुज़रता गया ।

इधर देवतागण ब्रह्मा जी के पास गए, जहाँ उन्होंने बताया कि कुछ आसुरी शक्तियों का नाश विष्णु अवतार करेंगे, कुछ का शिव अवतार, तो कुछ और आसुरी शक्तियों का विनाश सिर्फ जगदम्बिका के अवतारों और शिव भवानी की संतति द्वारा ही हो सकता है । आदिशक्ति जगदम्बिका अब हिमवान और मैना जी के घर अवतार लेंगी । तब देवता गण मैना जी के परिवार ( पितरों ) के पास गए और उनसे मैना जी और हिमवान के विवाह का अनुरोध किया । विवाह के उपरांत मैना जी और हिमवान ने माता की कठोर तपस्या की । ताप फलित हुआ और माता जी ने मैना रानी को दर्शन दिए और वर मांगने को कहा ।

मैना जी ने कहा की हे मातेश्वरी, यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं तो मुझे वर दीजिये की मेरे सौ अत्योत्तम पुत्र हों, और स्वयं आप मेरी पुत्री के रूप में पधारें । माता ने वरदान दिया और अंतर्ध्यान हो गयीं । समयचक्र में मैना जी ने सौ बलवान पुत्रों को जन्म दिया । उमा महेश्वरी अपने पूर्ण अंश के साथ हिमालय के शरीर में प्रविष्ट हुईं , जिससे वे अद्वितीय आभा से संपन्न हो गए । फिर यथोचित समय पर गिरिराज हिमालय ने, शिवा के इस पूर्णांश को, अपनी प्रिया मैना जी के उदर में स्थापित किया ।जगदम्बा के गर्भ में होने से मैना अत्यंत तेजोमय हो उठीं और सभी देवताओं, ने विष्णु सहित उनकी स्तुति की । गर्भकाल पूर्ण होने पर जगदीश्वरी ने शिशु रूप में मैना जी के घर जन्म लिया । उनका शरीर नील श्याम कान्तियुक्त था । हिमवान जी ने अपनी पुत्री का नामकरण किया, और उन्हें काली इत्यादि सुन्दर नामों से बुलाया गया । सुशीलता के कारण परिवारजन उन्हें "पार्वती" भी बुलाते थे । माँ ने तप को रोकते हुए "उमा" कहा - जिससे उनका नाम उमा भी हुआ ।

दैवीय प्रेरणा से नारद हिमालय जी के घर आये और पुत्री का हाथ देख कर बोले की इनका विवाह ऐसे वर से होगा जो योगी, नंग-धडंग, निर्गुण, निष्काम, मात-पिता रहित , निस्पृह और अमंगल वेशधारी होगा । यह सुन कर भवानी मन ही मन प्रसन्न हुईं, किन्तु माता पिता चिंतित हो गए । उनके उपाय पूछने पर नारद ने कहा कि ब्रह्म लेख झूठा तो हो नहीं सकता, किन्तु अशुभ को शुभ करने का एक उपाय है , कि आपकी पुत्री का ब्याह महेश्वर के साथ हो - क्योंकि उनमे ये सब गुण अवगुण नहीं, बल्कि भव्यता के रूप में वास करते हैं । हिमालय ने कहा कि वे तो निर्मोही और तपरत हैं, वे कैसे मेरी कन्या से विवाह करेंगे, तब नारद ने भवानी को शिव आराधना करने की सलाह दी , और कहा की तुम्हारी पुत्री आदिशक्ति है । शिव इनके अतिरिक्त किसी से विवाह न करेंगे । इनसे संगम होकर ही वे अर्धनारीश्वर कहलायेंगे ।

जब उमा 8 वर्ष की आयु को पहुंची तब शिव को उनके अवतरण के विषय में समाचार आया, और वे अति प्रसन्न हुए, (वे जानते तो पहले ही थे) और लौकिक रीति निभाते हेतु अपने पार्षद गणों सहित गंगावतरण तीर्थ पर जा कर समाधिस्थ हो रहे ।

पुत्री को लेकर पर्वतराज वहां पहुंचे और उन्हें नमन कर के अपनी पुत्री को आगे कर के भगवान् से बोले, हे प्रभु , आप हमारे यहाँ उपस्थित हुए, यह आपकी हम पर असीम कृपा है । हम अपनी कन्या को आपकी सेवा में समर्पित कर रहे हैं, यह सखियों सहित यहीं रहेगी और आपकी सेवा करेगी । कृपया आज्ञा दें ।

महाप्रभु बोले, हे हिमवान शैलराज, आप हमारे दर्शन कर सकते हैं । किन्तु अपनी पुत्री को घर ही में छोड़ आइये , कि हम तो तपस्वी हैं, हमें इससे क्या सेवा लेनी है ? वेद पारंगत विद्वान् ऐसी अत्यंत सुन्दर, तन्वंगी,चंद्रमुखी और शुभ लक्षना युवास्त्री को मायारूपिणी कहते हैं । हे गिरिश्रेष्ठ, मैं योगी हूँ, और माया से सदा दूर रहता हूँ  ।इस पर हिमवान अत्यंत उदास हो उठे ।

अब पार्वती बोलीं, हे आप योगी और ज्ञान विशारद हैं, फिर भी हमारे पिता से ऐसी बात कही ? सभी कर्मो को करने की शक्ति, सर्व प्राकट्य प्रकृति (nature ) ही है । प्रकृति से ही सृष्टि , पालन, और संहार होता है ( जो ब्रह्मा, विष्णु और महादेव के अधीनस्थ लोक कर्म हैं )। प्रकृति बिना आप लिंग रूप महेश्वर कैसे हो सकते हैं ? आप प्राणीमात्र के वन्दनीय और चिंतनीय हैं, किन्तु आपके मूल में आपकी प्रकृति ही है ।

महेश जी हंस पड़े और बोले ,  मैं तप द्वारा प्रकृति का नाश करता हूँ और तत्वरूप प्रकृति रहित शम्भू रूप में स्थित और विद्यमान रहता हूँ । सत्पुरुष कभी प्रकृति के अधीन नहीं होते । 

माता महाकाली ने कहा, हे प्रभु । अभी जो आपने कहा, वह भी "वाणी" से कहा, और वाणी प्रकृति प्रदत्त है । तब आप प्रकृति से परे कैसे रहे ? जो आप प्रकृति से परे हैं, तो न आप को बोलना चाहिए, न कर्म करना, कि कर्म का किया जाना भी प्रकृति (nature ) है । जो आप प्रकृति से परे हैं, तो हिमालय पर तपस्या क्यों और  कैसे? प्राणियों की इन्द्रियों से सम्बंधित हर वास्तु प्रकृतिजन्य ही है । अधिक कहने से क्या प्रयोजन ? मैं प्रकृति हूँ, और आप पुरुष हैं । आप निराकार निर्गुण हैं और मेरे अनुग्रह से ही आप साकार सगुण होते हैं । आप इन्द्रियों को जीत कर जितेन्द्रिय कहलाते हैं, किन्तु इन्द्रियां मुझसे हैं । प्रकृति अधीन ही आप सब लीलाएं करते हैं । यदि आप प्रकृति से परे हैं, तो मेरे यहाँ रहने से आपको भय कैसा ?

इससे आगे शंकर जी तर्क न कर सके । उन्होंने हिमवान को घर जाने की अनुमति दे दी , और बोले कि हे गिरिजे, यदि तुम ऐसा कहती हो, तो प्रतिदिन मेरी शास्त्र सम्मत विधि से पूजा करो । हिमवान प्रतिदिन वहां आते और पार्वती शंकर जी की विधिसम्मत रूप से आराधना पूजा करतीं ।

इसी बीच ब्रह्मा जी की आज्ञा से इंद्र ने कामदेव को (दक्ष की पुत्री रति कामदेव की पत्नी हैं) शिव के पास भेजा, किन्तु जब कामदेव के वाण से शिव का ध्यान टूटा तो उनकी क्रोधमयी तीसरी दृष्टि से कामदेव पल में भस्म हो गए । रति ने शिव जी की बड़ी स्तुति की और कहा कि मेरे पति यहाँ अपने किसी स्वार्थ वश नहीं आये थे । वे तो देवताओं के कल्याण हेतु आपके और पार्वती जी के ब्याह के लिए अपना धर्म पूर्ण करने आये थे  ।तब शिव जी ने कहा कि भले ही मंतव्य शुभ हो, किन्तु कर्म तो अशुद्ध था, और मन भी उस समय अपने "काम्वेग के बाण" की शक्ति पर गर्वित था । इसलिए कामदेव कोयाह दैहिक क्षति हुई । लेकिन शुभ लक्ष्य होने से उन्होंने बड़ा सौभाग्य भी अर्जित किया है कि वे साक्षात श्री कृष्ण को अपने पिता के रूप में प्राप्त करेंगे । रति की प्रार्थना और निवेदन पर शिव जी ने वचन दिया की अब से कामदेव अनंग रहेंगे, और कृष्णावतार के समय कृष्ण और रुक्मिणी के पुत्र प्रद्युम्न के रूप में फिर से शरीर प्राप्त करेंगे ।

जारी ...