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बुधवार, 28 दिसंबर 2011

Does God Exist? - Christian story .... nice .....


The Atheist and the Bear

An atheist (one who does not beleive in God) was taking a walk through the woods. 'What majestic trees! What powerful rivers! What beautiful animals!', he said to himself. 
As he continued walking alongside the river he heard a rustling in the bushes. Turning to look, he saw a 7 foot grizzly charging towards him. 
He ran as fast as he could up the path. Looking over his shoulder he saw that the bear was closing in on him. His heart was pumping frantically and he tried to run even faster. 
He tripped and fell on the ground. He rolled over to pick himself up but saw the bear raising his paw to take a swipe at him.
At that instant the atheist cried out: 'Oh my God!...'
Time stopped.
The bear froze.
The forest was silent.
It was then that a bright light shone upon the man and a voice came out of the sky saying:
'You deny my existence for all of these years, teach others I don't exist and even credit creation to a cosmic accident.  Do you expect me to help you out of this predicament? Am I to count you as a believer?'
The atheist looked directly into the light.
'It would be hypocritical of me to suddenly ask you to treat me as a Christian now, but perhaps, could you make the BEAR a Christian?'
'Very well, 'said the voice. The light went out, and the sounds of the forest resumed.
And then the bear lowered his paw, bowed his head and spoke: 'Lord, bless this food which I am about to receive and for which I am truly thankful, Amen.'
............. courtesy - will and guy ....

सोमवार, 12 दिसंबर 2011

पूर्वाग्रह २ : पहचान और निर्णय

पूर्वाग्रह भाग  देखें 

पिछले भाग में मैंने (लेख और टिप्पणियों के discussion में) कहने की कोशिश की - कि 

१. शब्द जो छवि बनाते हैं हमारे मन मस्तिष्क में - उसमे से कुछ भाषाज्ञान है, और कुछ पूर्वाग्रह | 

२, आम - फल है | किन्तु - कैसा है ? यह हर वह व्यक्ति बता सकता है - जिसने आम खाया है (समझाना तो मेरे बस का नहीं है) यह भाषाज्ञान है |


३.  मैंने यह भी कहा ( पोस्ट में भी और टिप्पणियों में भी ) कि यह पोस्ट मैं सिर्फ हमारी (मनुष्यों की) मानसिक प्रक्रियाओं पर concentrate कर के नहीं लिख रही हूँ, बल्कि ये मानसिक प्रक्रियाएं सिर्फ एक background हैं - आगे मैं natural neurons , artificial neurons और artificial neural networks पर बात करने वाली हूँ | 
अब - आगे ....
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पहली बात तो यह कि आम पीला है - यह हमारी सोच प्रक्रिया में बना हुआ एक पूर्वाग्रह है | कृपया यह न सोचें कि मैं पूर्वाग्रह की निंदा कर रही हूँ - नहीं तो आगे जो बातें होनी हैं - वे इस निंदा की image [ पूर्वाग्रह में प्रति पूर्वाग्रह ? ... :) ] की ही वजह से निरर्थक हो जायेंगी | इस पोस्ट के सन्दर्भों में पूर्वाग्रह निंदनीय नहीं है - यह अक्सर सहायक है सही पहचान के लिए | यदि यह अड़चन बनने लगता है - तो धीरे धीरे यह ( हमारी मानसिक प्रक्रियाओं के द्वारा ) बदल भी जाता है | हर आम तो पीला नहीं होता ( दसहरी , लंगड़ा हरे आम हैं ) - फिर भी यह बात तो है ही कि आम सुन कर पीला फल ही मन में उभरता है | इससे उलट - यदि गर्मियों के मौसम में दूर से फल का ठेला दिखे - तो यदि उस पर पीले फल दिख रहे हों - तो आम ही लगते हैं |  

यह ऊपर - दो अलग बातें है - 

(अ) आम पीले होते हैं - यह छवि - "cognition " कहलाती है हमारी इलेक्ट्रोनिक की इमेज प्रोसेसिंग की भाषा में | 
(ब) ठेले पर जब दूर से पीले फल दिख रहे हों - तो वह आम का ठेला है - यह "recognition " कहलाता है | 

जब cognition होता है - तब हम मशीन को सिखाते हैं कि किस वस्तु (label) के साथ क्या properties associate की जाएँ | इसी तरह - छोटे बच्चे को हम सिखाते हैं - अ- अनार का ; आ - आम का - और उस पुस्तक में अनार और आम की छवि होती है | लेकिन न हम उसे अनार सिखा रहे थे, न आम, हम तो उसे सिखा रहे थे कि यह जो अक्षर लिखा है किताब में - इसे बोला किस तरह से जाता है | इसके उलट - यह जो हम बोल रहे हैं "अ", "आ" इसे लिखा कैसे जाए |


अब समझें - दो प्रकार के factors हैं, जो हमारे निर्णय को प्रभावित करते हैं (उदाहरण के लिए - यह चीज़ / व्यक्ति मुझे पसंद आएगा / नापसंद / या न्यूट्रल ? ) ............ अब जैसे - किसी को आम पसंद है / किसी को नहीं | तो उसी एक फल को देख कर पहली बात तो यह कि - कोई पहचानेगा कि यह आम है, कोई नहीं पहचानेगा | ............ इसके आगे - किसी के मन में पसंद की भावना होगी - किसी के मन में नापसंदगी की | 


अ) एक - तत्काल अभी उस से क्या input आ रहा है ? (जो सामने फल है - यह आम है या नहीं इसे पहचानने के लिए उसका रंग, रूप. आदि )
बी) और दूसरा - लॉन्ग टर्म में मैंने उसके बारे में क्या जाना है | ( मीठा ? खट्टा ? रसीला ? नर्म ? सख्त ? )


तत्काल अभी आए inputs को weigh कर के जो असर होता है - वह एक sum बनाता है | इसमें पहले के अनुभव से आये bias को जोड़ा जात है | तब - इस मिले जोड़ के आधार पर - निश्चय लिया जाता है |

अब आगे बढ़ते हैं - neuron की ओर - कि वह कैसे decision लेता है कि किस वस्तु को किस category में रखा जाए | हमारे शरीर में एक nervous system है , जिसके हिस्से हैं nerves , spinal chord और brain | ये सब नयूरोंस पर बने हैं | ये नन्हे नयूरोंस करोड़ों की संख्या में हैं - और इनकी कई शाखाएं एक दुसरे से जुडी हैं | ये जुडी हुई शाखाएं एक से दुसरे को chemicals के exchange द्वारा सन्देश देती हैं | 


शरीर का एक प्राकृतिक neuron हमारे engineers द्वार बनाए artificial neuron से बहुत अधिक advanced है     


- किन्तु उसी को समझ कर और उसकी working को कॉपी कर के ही हम artificial neron और neural network बनाते हैं | इन नयूरोंस पर बात होगी अगले अंक में - कि  कैसे बनते और कार्य करते हैं | 


और एक ध्यान देने वाली बात है कि - जिस computer पर हम अभी बैठे हैं , वह हमारे nervous system से बहुत पिछड़ा हुआ है | एक तो वह अपने आप कुछ सोच नहीं पाता - उसे हर काम करना सिखाना पड़ता है | दूसरे - वह intellegent  नहीं है | यदि उसे (कंप्यूटर को) हम neural network दें भी - तब भी अभी बहुत दूर है वह दिन जब इसकी intellegence एक चमगादड़ की intellegence से भी मुकाबला कर सके, मानव दिमाग तो और दूर है अभी |


 अब सोचिये - बटन भर के दिमाग से चमगादड़ - ultrasound sonar से अपने आसपास की चीज़ें न सिर्फ दूरी और दिशा के लिए sense कर लेगा, बल्कि उसका आकर भी जान लेगा | यह भी decide कर लेगा कि यह चीज़ मुझसे कितनी बड़ी / छोटी है - अर्थात यह decision कि इस पर झपट्टा मार कर इसे खाना है - या इससे बच कर भागना है :) | यही करने में हमारे highly modern sonars को उस बटन भर के दिमाग वाले प्राणी से हज़ारों गुना समय लग जाता है |


तो क्या artificial neuron slow हैं ???
 नहीं
ये हमारे दिमाग से तेज़ हैं, हमारे दिमाग के neurons की typical स्पीड मिली सेकण्ड में है जबकि आपके कंप्यूटर kee nanosecond में | 
फिर ??


फर्क है - energy  efficiency में | जहां दिमाग के natural neurons बहुत कम गर्म होते हैं (ऊर्जा का waste ) तो दिमाग में कई neuron एक साथ काम कर सकते हैं, वहीँ हमारे कंप्यूटर का जो दिमाग है - वह processor chip है तो तेज़, किन्तु energy efficiency कम है - तो कम parallel काम हो सकते हैं, यह गर्म हो जायेगी | शायद आप जानते ही हैं कि pentium chip - mounted पंखे के साथ ही आती है - उसे ठंडा रखने के लिए | :) | [
 जब हम लोग lab में कोई experiment करते हैं - तो breadboard पर circuit बनाते हैं - जिसमे IC chips लगी होती हैं | कभी गलती से कोई IC छू जाए - तो हाथ वैसे ही जलता है जैसे रोटी बनाते हुए तवा छू जाने से :) ]
........... लेकिन हमारा दिमाग आखिरी बार कब गर्म महसूस हुआ था ?? जब हम अपने पिछले exam की तैयारी में जुटे हुए १ महीने की पढ़ाई १ घंटे में करने का प्रयास कर रहे थे ? :) तो - अधिक न्यूरोन काम कर रहे थे न तब ? वह भी हल्का गर्म, तवे जैसा नहीं - क्योंकि हमारे रक्त का बहाव coolant  का काम करता है - तो उतनी heating dissipate हो जाती है | यही फर्क है हमारे दिमाग और processor के दिमाग में लगे नयूरोंस की efficiency में - कि वे उतना काम एक साथ नहीं कर सकते जितना हम | 


आगे अगले भाग में ..................

सोमवार, 5 दिसंबर 2011

पूर्वाग्रह 1 - पूर्वाग्रह क्या होता है ?

यह श्रंखला आगे बढाने का सोच रही हूँ ( आशा है इस बार अधूरी न छोड़ दूँगी ) तो पुराने (पहले) भाग को आज  repost कर रही हूँ :

पूर्वाग्रह ?
इस शब्द को सुन कर पहले पहल क्या भाव आता है मन में ?


यह जो भी भावना आपके मन में आई , इस शब्द से जो भी अच्छी या बुरी छवि मन में उभरी - वह आपके मन का पूर्वाग्रह है - इस शब्द की परिभाषा को लेकर | यदि आपके मन में यह आया कि "पूर्वाग्रह का शाब्दिक अर्थ है - पूर्व + आग्रह = किसी चीज़ को देखे / समझे / तौले / जाने बिना उसके बारे में पहले ही से कोई धारणा (अच्छी या बुरी) कायम कर लेना " तो आप "पूर्वाग्रह" से रहित होकर इस शब्द को परिभाषित कर रहे हैं | :)


कुछ प्रचलित सर्व ज्ञात हिंदी शब्द :
१. आम ?? ..............= फल, मीठा, पीला, रसीला .....
२. सूर्य ??........... = रौशनी, गर्मी, दिन, जीवनस्त्रोत, ....
३. चोट लगना ?? ........... = दर्द, तकलीफ, एक्सीडेंट, .....
४. दोस्त ??......... = ख़ुशी, बांटना , साथ, अपनापन, .....

आदि कई उदहारण हैं, जहां एक शब्द पढ़ / सुन कर हमारे मन में  कोई छवि उभर आती है | क्या यह सब छवियाँ पूर्वाग्रह हैं ? शायद हाँ, शायद नहीं | 


आम - यदि हमने देखा है, खाया है, और हम हिंदी जानते हैं ( कि आम किसे कहते हैं ) | यदि हमने इसे देखा / खाया न हो, या हम सिर्फ फ्रेंच भाषा जानते हों - तो ? क्या तब भी यह शब्द यही छवि बनाएगा ? नहीं | इसका अर्थ यह लगता है की यह जो पूर्वाग्रह (?) है हमारा कि आम एक रसीला, मीठा, पीला फल है - पहली बात तो हर बार, हर आम के लिए सही नहीं है. दूसरे, यह पूर्वाग्रह भी कोई पूर्वाग्रह नहीं है, बल्कि हमारे पुराने अनुभव के आधार पर ही बना है | लेकिन हर आम तो पीला नहीं होता न ? (लंगड़ा आम? दसहरी आम? ) न ही हर आम मीठा / रसीला ही होता है | फिर भी इस शब्द से यह छवि क्यों उभरती है पहले पहल ? यह परिभाषा कैसे बनी ? यह कैसे बदल सकती है ?


एक और उदाहरण लेती हूँ - हिंदी फिल्मों से | ५० या ६० के दशक की फिल्मों में "माँ " शब्द क्या छवि बनाता था ? शायद एक पुरानी साडी में लिपटी हुई प्रेम की मूर्ती की ? जो अपनी सारी निजी ज़रूरतों और भावनाओं को परे कर सिर्फ बेटों (बेटियों जानते बूझते नहीं लिखा है ) के लिए जीती थी | फिर आज की फिल्मों की माँ ? वह इतनी त्यागिनी नहीं दिखाई जाते | दिखाई भी जाये -तो शायद एक्सेप्ट भी न हो | न ही उसे हमेशा साडी में दिखाया जाता है | टीवी के एडवरटाइज्मेंट्स / सीरिअल्स में भी देखें, तो २० साल पहले की माँ और अज के माँ में ज़मीन आसमान का फर्क है | यही फर्क बहू में भी है, नायक और नायिका में भी | 


तो क्या हम इस माँ, बहु, नायक, नायिका को एक्सेप्ट नहीं करते ? या उस समय वालों को ? एक जनरेशन के लिए जो नेचरल है, दूसरी के लिए नाटकीय क्यों है ? क्या यह सब पूर्वाग्रह का खेल है ? 


यही  बात बाकी के उदाहरणों पर भी लागू होती है - न हर शब्द का अर्थ हर बार, हर सन्दर्भ में वह होता है जो हम आमतौर पर स्वीकार करते हैं, न हर बार उससे विपरीत | इसी पूर्वाग्रह पर मैं इस शृंखला में चर्चा करूंगी।  इसके आगे फिर हमारे मानसिक पूर्वाग्रहों से आगे बात करेंगे की इलेक्ट्रोनिक्स में bias के क्या अर्थ हैं, fixed और varying bias क्या होते हैं | और neural networks में किस तरह से हमारे मानसिक पूर्वाग्रहों और decision Making के आधारों को प्रयुक्त कर के artificial intellegence बनाई जाती है - कैसे मशीन को सिखाया जाता है की वह भी हमारी ही तरह अलग अलग inputs के आधार पर निर्णय ले पाए कि किस स्थिति में क्या किया जाये | यह भी कि "पूर्वाग्रह" करना कैसे सीखती है मशीन |


आशा है इस शृंखला में आप मेरे साथ होंगे |