सीखे हुए उत्तर कभी काफी नहीं होते- क्योंकि प्रश्न हमेशा बदलते रहते हैं । इस दुनिया में अगर कोई चीज़ नित्य है - तो वह है बदलाव । इस सिलसिले में एक कहानी याद आती है -
दो मंदिर थे - और एक दूसरे से कही भी सहमत न होते थे ( अक्सर ऐसा ही होता देखा जाता है - सभी कहते हैं की परम सत्य एक है - किन्तु उसे ढूँढने वाले / जानने के दावे करने वाले - कभी भी एक दूसरे से सहमत नहीं दीखते ) उनमे से किसी भी एक मंदिर वाले कभी भी दूसरे मंदिर वालों से हारना न चाहते, जहां तक हो - एक दुसरे को avoid करने का ही प्रयास करते । किन्तु बच्चे तो फिर बच्चे होते हैं न - बड़े उन्हें कितना ही बिगाड़ने के प्रयत्न करें, उन्हें बिगड़ने में समय लगता है । वे मन में प्रेम के सागर भरे आए होते हैं, जिस सागर को ये "सत्यखोजी" मार्गों वाले बड़े / समझदार जन सुखाने के प्रयास करते हैं - और यह सूखने तक जो समय चाहिए - तब तक वह बच्चा बड़ा हो गया होता है ।
तो दोनों मंदिरों के समूहों के दो बच्चे - अक्सर राह में मिलते, तो बातें कर लेते । दोनों कुछ कुछ बड़े हो चले थे, सागर सूखने लगा था - किन्तु अभी इतना भी न सूखा था की एक दूसरे से नज़र बचा कर निकल जाएँ । हाँ, एक दूसरे से जीतना है, यह भावना ज़रूर पनपने लगी थी ।
एक दिन ये दोनों बच्चे राह में मिले । एक ने दूसरे से पूछा - "कहाँ जा रहे हो ?" वह भी शायद कुछ Poetic Mood में रहा होगा - तो बोला - "जहां हवाएं ले जाएँ।" अब पहले वाले को कुछ समझ न आया, आगे क्या बात करूँ - चुप ही रह गया। (वैसे मेरी नज़र में यह पहले बच्चे की हार नहीं है - कम से कम उसने बात शुरू करने की कोशिश तो की - दूसरे बच्चे ने - जो यहाँ जीता हुआ दीखता है - (के उसने इस को चुप करा दिया ) - उसीकी हार लगती है मुझे तो - उसने दोस्ती के राह बंद कर दी संवाद को ख़त्म कर के - पर खैर - यह एक कहानी है )
अब यह पहला बच्चा बड़ा परेशान हुआ , वापस लौट कर मंदिर में गुरु से कहा "आज मैं उस मंदिर वाले से हार गया" - और पूरी बात बताई । अब यह कैसे स्वीकार हो कि हम हार गए ? गुरु को बड़ा बुरा लगा - उसने कहा - "यह तो बहुत बुरी बात है - हम हार कैसे सकते हैं ? कल फिर पूछना - वह ऐसा कहे तो कहना - अगर हवा न चलती हो - तो कहाँ जाओगे ?"
अगले दिन फिर मुलाकात हुई - यह बच्चा तैयार था - फिर पूछा - "कहाँ जाते हो ?" लेकिन अब वह दूसरा बोला - "जहां पैर ले जाएँ " तो सीखा हुआ जवाब व्यर्थ हो गया - क्या कहे ? फिर चुप रह जाना पडा । आज तो गुरु जी को और बुरा लगा - वे बोले "कल पूछना - कभी ऐसा भी हो सकता है की पैर न रहे - तब कहीं नहीं जाओगे क्या ? और वह जवाब बदल कर जो भी और जवाब दे - उसमे इसी तरह का कुछ पूछना - की यह न हो तो क्या करोगे ? हार कर नहीं आना ।"
अगले दिन यह बच्चा पूरी तैयारी के साथ गया । alternative उत्तर भी सब सोचे हुए थे - की ऐसा घुमावदार जवाब मिला - तो ऐसा पूछूंगा । आज फिर दोनों मिले
और इसने पूछा "कहाँ जा रहे हो ?"
दूसरा बच्चा बोला "सब्जी लेने "
....
:)
तो - सीखे हुए उत्तर अक्सर काम नहीं आते । जीतने के कोशिश अपने आप में ही हार होती है । जीतने / हारने के प्रयास ही यह कह रहे हैं की चुनी हुई राह ही गलत है - हमारी मंजिल यदि दूसरे से जीतना / उसे हराना है - तो वह प्रेम का / एकत्व का पथ है ही नहीं - हार तो हो ही चुकी । अब ऊपर से जीते या हारे - इससे कोई फर्क ही नहीं पड़ता ।
:)
जवाब देंहटाएंवाह!
बहुत ही बढ़िया ।
जवाब देंहटाएंबसंत पंचमी की हार्दिक शुभकामनाएँ।
सादर
हारने का भय बता देता है वहां जीत अपेक्षित थी। जहां जीत अपेक्षित होती है वहां सच्चाई दम तोड देती है।
जवाब देंहटाएंबहुत ही गम्भीर प्रस्तुति!!
बुद्धि और समृद्धि से देश खुशहाल हो, वसंत पंचमी की शुभकामनाएँ!!
जवाब देंहटाएंप्रेम गली अति सांकरी जा में दो ना समाय।
जवाब देंहटाएं@स्मार्ट इंडियन जी, आभार :)
जवाब देंहटाएं@यशवंत जी - आपको भी वसंत पंचमी की शुभकामनायें |
@सुज्ञ भैया - बिलकुल सच कह रहे हैं आप | वसंत पंचमी की शुभकामनायें |
@देवेन्द्र जी - बिलकुल सच है - दो नहीं हैं - एक ही समा सकता है - और एक ही है :)
सभी को वसंत पंचमी की शुभेच्छाएं |
बहुत सुन्दर,सार्थक प्रस्तुति।
जवाब देंहटाएंऋतुराज वसंत पंचमी की हार्दिक शुभकामनाएँ।
gambhirta se vichar karna hoga . sarthak post hae. .
जवाब देंहटाएंबहुत ही बदिया ... पहली बार पढ़ा है... सुंदर अभिव्यक्ति. साधुवाद.
जवाब देंहटाएंसचमुच रटंत विद्या कभी काम नहीं आ सकती...अपनी बुद्धि का ही संबल अपेक्षित है.
जवाब देंहटाएंपाताली जी - आपका आभार | आपका नाम नहीं जानती - सो यही लिख रही हूँ :) आपको भी वसंत के आगमन की बधाइयाँ |
जवाब देंहटाएंसंगीता जी - आभार आपका :)
दीपक बाबा जी - आपको तो मैं काफी समय से पढ़ रही हूँ, २- ३ बार कुछ टिप्पणियां भी की - पर अधिकतर सिर्फ पढ़ कर आ जाती थी | आपका आभार की आप यहाँ आये - आते रहिएगा :) आपका यहाँ स्वागत है |
रश्मि जी - बिलकुल | रटे हुए उत्तर कभी काम नहीं आते, flexibility नहीं होती न :)
ऐसी विद्या किसी काम की नहीं।
जवाब देंहटाएंबसंत पंचमी की शुभकामनाएं....!
थ्री ईडियट्स की याद आ गयी ....
जवाब देंहटाएंyah bhi khoob rahi.
जवाब देंहटाएंek kahaavat suni thi.
ek ne kaha daaje ne maani
naanak kahen dono gyaani.
iska matlab yah nahi ki doosra kuchh
bhi n kahe.par dono ek doosre ke
vicharon ke sakaaraatmak aadaan pradaan
se aage badhen.
samy mile to meri post'aisi vaani boliye'
padhiyega.meri popular poston men se ek hai.