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बुधवार, 18 मार्च 2026

ज़िंदगी अधूरी तेरे बिन - भाग इकत्तीस (31)

  

 ज़िंदगी अधूरी तेरे बिन - भाग इकत्तीस (31)


भाग 31

प्रियंका

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श्रेया ने हमारे साथ नये साल का जश्न मनाया।

विजय हमारे साथ नए साल की पूर्व संध्या पर डिनर पर शामिल हुआ और हमने श्रेया के कमरे में शैंपेन के साथ मजे किए। उसने अपना पूरा ज़ोर लगा दिया लेकिन मुझे पता था कि उसका समय लगभग खत्म हो गया था। मैं उस रात श्रेया के साथ रही, और हमने उसी तरह बातें कीं जैसे हम बचपन में करते थे, उसकी या मेरी झुग्गी में, छिपकर, अपने माता-पिता से बचते हुए और हवाई महल बनाते हुए।

"तुम्हें वह दीपावली याद है जब मैंने अपने पापा से पैसे चुराए थे?" श्रेया ने कहा।

"हाँ, हमने पंजाबी ढाबे पर खूब ठूंस कर खाना खाया था। और फिर पिटाई भी तो हुई थी"

वह हंस पड़ी। "फ्राइड चिकन और तंदूरी रोटियाँ। ओह प्रियंका, अब तो मैं अपनी पसंदीदा चीजें भी नहीं खा सकती।" हम दोनों करवट लेकर लेटे हुए थे, बिस्तर का पास का लैंप धीरे-धीरे जल रहा था, जिससे हम एक-दूसरे को देख सकते थे।

"मुझे पता है," मैंने धीरे से कहा।

"अंशुमन कहता है कि वह तुम्हारे साथ यहीं रहने वाला है।"

"हाँ, वह कहता है! लेकिन बाद मेँ वह उकता जाएगा और मुझसे नफरत करने लगेगा।"

"बस करो, बुद्धू लड़की।" श्रेया अपनी कमज़ोर हालत में भी गुस्से से भर गई। "मैं यह कहने की कल्पना भी नहीं कर सकती थी, लेकिन वह आदमी तुमसे सच्चा प्यार करता है। अगर मैंने खुद नहीं देखा होता तो मैं इस पर यकीन नहीं करती।"

"तुम्हें सच मेँ ऐसा लगता है?"

"हाँ, प्रियंका। और तुम्हारे बच्चे भी। अरे, वे तो बहुत ही प्यारे हैं। शाश्वत ने जाने से पहले मुझसे बात की थी, मुझे गले लगाया। वह मुझे ‘श्रेया आंटी’ कहकर बुलाता है।"

मैंने उसका गाल को छुआ और कहा, "मुझे बहुत खेद है कि यह इतनी देर से हुआ।"

"खेद मत करो। खुश रहो कि अब तो ऐसा हुआ। मैं तो खुश हूं। पुरानी बातें याद कर के दुखी होना मूर्खता है जब अभी हमारे पास खुशी के लिए कई नियामतें हैं। "

"मैं तुमसे प्यार करती हूँ, श्रेया।"

"मैं भी तुमसे प्यार करती हूँ, प्यारी लड़की।"

यही हमारी आखिरी बातचीत थी। श्रेया गहरी नींद में सो गई, और जब वह जागी तो वह बेसुध थी, उसे होश नहीं था। विजय दिन-रात रिज़ॉर्ट में ही रहा, उसने मेरा कमरा ले लिया। मैं अंशुमन के साथ रहने लगी। वैसे भी हम ज़्यादा नहीं सोते थे। जब सोते तो जितना हो सके, श्रेया के पास ही सोते थे।

नया साल शुरू होने का एक सप्ताह बाद ही श्रेया की नींद में ही मौत हो गई। वह उस रात का बाद कभी नहीं जागी जब उसने मुझे कहा था कि अंशुमन मुझसे प्यार करता है।

उसकी मौत का बाद की सुबह गमगीन थी, महासागर का ऊपर घने बादलों की चादर छाई हुई थी, जो श्रेया को जानने वाले सभी लोगों का सामूहिक दुख को दर्शा रही थी। लहरों का टकराना शोकपूर्ण से ज़्यादा सम्मानजनक लग रहा था, यह मेरी प्यारी दोस्त के लिए एक स्वाभाविक श्रद्धांजलि थी।

अंतिम संस्कार गृह ने श्रेया को हमसे छीन लिया था, लेकिन मैंने कसम खाई कि उसकी आत्मा मेरे साथ रहेगी, जिसने मुझे मेरे दुख में भी मजबूत बना दिया। अंशुमन मेरे साथ था, उस की उपस्थिति शक्ति का एक मौन स्तंभ थी। शाश्वत और नीलिमा भी उस समय के लिए मेरे साथ आए, और मैं आभारी थी क्योंकि उनके आने से मुझे सुकून मिला। हम सभी ने श्रेया को खोया था, और हम सभी उसके लिए शोक मनाने और उस जीवन का जश्न मनाने के लिए एक साथ आए थे। मुझे पता था कि वह इसकी सराहना करेगी। जब वह जा रही थी, तो मुझे पता था कि वह मेरे बारे में चिंतित थी। लेकिन अंशुमन और बच्चों को देखकर उसे यकीन हो गया था कि अब मैं ठीक रहूँगी। मुझे पता था कि उसने अंशुमन से मेरी देखभाल करने का वादा करने का लिए कहा था; उसने मुझे बताया कि अंशुमन ने बिना किसी शर्त के यह वादा किया था।

"आपको कुछ तो खाना पड़ेगा, माँ।" नीलिमा ने अपना हाथ मेरे गले में डाल दिया, जब मैं लिविंग रूम की बड़ी खिड़कियों से बाहर देख रही थी, जहाँ हमने श्रेया का साथ परिवार का रूप में दीपावली मनाई थी। "जानती हूँ, लेकिन मुझे भूख नहीं है, बेबी।" मैंने अपना सिर उसके कंधे पर टिका दिया। अपने बच्चों को फिर से पाकर बेहतर लगा था - अंशुमन को यहाँ पाकर भी। जैसे श्रेया ने अपने जीवन के अंतिम दिनों की योजना बनाई थी ताकि मैं अपने परिवार को फिर से ठीक कर सकूँ, हमें एक साथ ला सकूँ।

"आंटी ने मुझसे कहा था कि वह आपकी अभिभावक देवदूत है, और आप उनकी अभिभावक देवदूत हो," नीलिमा ने मेरे बालों को सहलाते हुए फुसफुसाते हुए कहा।

"मैं कहाँ उसकी अभिभावक देवदूत थी? मैंने तो उसकी कुछ कीमो भी मिस कर दीं।“

"माँ, ऐसा मत सोचो। वे जानती थीं कि आप आना चाहती थीं। जैसे कि, उसी तरह, आज यशस्वी नहीं आ पाया है। मैं समझती हूँ कि उसकी व्यस्तता है। इससे हमें प्यार करने वाले नाराज नहीं होते माँ। माँ, यशस्वी को खेद है कि वह नहीं आ सका।"

"मुझे पता है, उसने आज सुबह मुझे फ़ोन किया था। उसे भी श्रेया पसंद थी। हर कोई उसे पसंद करता था। कोई उसे पसंद न करे यह संभव ही नहीं। वह थी ही इतनी अच्छी।"

"बिलकुल आपकी तरह, मम्मा।" नीलिमा ने मुझे झकझोरा। "हम सभी आपसे प्यार करते हैं, आपको पता है न? यहाँ तक कि अंकल रक्षित भी।"

"लेकिन चाची देविका नहीं," मैंने चिढ़ाते हुए कहा। "और तुम्हारी दादी भी थीं।"

"सच कहा" हम कुछ देर तक चुपचाप खड़े होकर समुद्र की लहरों को देखते रहे।

"माँ," नीलिमा ने चुप्पी तोड़ी, "मैं आपसे प्यार करती हूँ।"

"मेरे बेबी, मुझे भी तुम से प्यार है।"

"नहीं-नहीं माँ। मैं कह रही हूँ कि मैं आपसे प्यार करती हूँ। आप ने हमें एक दूसरे से ऐसा कहना सिखाया, लेकिन मुझे यह एहसास हुए काफी समय हो चुका है, कि मैंने लंबे समय से आप से ऐसा नहीं कहा था, क्योंकि मैंने आपके साथ समय बिताना ही बंद कर दिया था। लेकिन मैं बताना चाहती हूँ कि आपके बिना, हम वह परिवार नहीं होते जो गले मिलते हैं, चूमते हैं और एक दूसरे से कहते हैं कि ‘मैं तुमसे प्यार करता हूँ’। हम अंकल रक्षित और आंटी देविका की तरह रूखे परिवार होते, जिनके बच्चे स्नेह का भूखे हैं।"

"रानी बिटिया, पुरानी बातें छोड़ दो। हम आगे की ओर देखते हैं," मैंने धीरे से कहा। "अब पीछे मुड़कर नहीं देखना है।"

"आपका दिल बहुत बड़ा है माँ।"

"तुमने, शाश्वत और अंशुमन ने मुझे वह बनने में मदद की है जो मैं हूं।"

"और श्रेया आंटी ने भी"

"वह मेरे दिल की बहन थी। मुझे उसकी बहुत याद आएगी।" मैं फूट-फूट कर रोने लगी और नीलिमा ने मुझे थाम लिया। जल्द ही, मैंने महसूस किया कि पहले शाश्वत ने, और फिर अंशुमन ने भी मुझे अपनी बाँहों में जकड़ लिया है। हम तीनों रो रहे थे, एक परिवार की तरह एक साथ खड़े थे, एक-दूसरे को थामे हुए, शोक मना रहे थे।

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