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गुरुवार, 9 फ़रवरी 2012

खूब पर्दा है


पुनः प्रस्तुति
ब्लॉग की शुरुआत में यह लिखा था, एक बार फिर से प्रस्तुत है ,

खूब पर्दा है - कि चिलमन से लगे बैठे हैं
              साफ़ छुपते भी नहीं - नज़र आते भी नहीं .......

कभी कहीं पढ़ा था - तो ठीक से तो याद नहीं है कि क्या शब्द थे - पर अर्थ कुछ कुछ ऐसा ही निकल कर आता था. आजकल हमारी दोस्तियाँ भी इसी तरह हो गयी हैं - इन्टरनेट पर ही बातें शातें हुआ करती हैं - वह भी कोई टाइप करने की ज़हमत कभी कभार ही उठता है - ज्यादा तर तो मेल फॉरवर्ड ही करी जाती हैं .

एक परसन  को एक ग्रुप से मेल मिलती हैं - और वोही दूसरे दोस्तों को फॉरवर्ड कर दी जाती है - हाँ , इन्बोक्स में एक दूसरे के नाम बराबर दिखाई पड़ते रहते हैं - तो दूरी का एहसास नहीं होता - नज़र से आते रहते हैं - पर वह पुरानी  दोस्ती कहीं गुम सी हो जाती है - मन की बातों कि शेअरिंग तो अब जैसे होती ही नहीं - ..

ज़िन्दगी इतनी तेज़ दौडती है - कि कोई किसीसे बैठ कर बातें नहीं करता - वैसे इन्टरनेट की मेल सिस्टम में ऐसा कोई रूल तो है नहीं - कि आप अपने दोस्त को चिट्ठी नहीं लिख सकते. बल्कि , उसमे तो घर बैठ कर चैटिंग की भी चोईस है हमें - लेकिन हम अपनी ज़िन्दगी में इतने मसरूफ रहते हैं - कि टाइम ही नहीं है किसीको लम्बी चिट्ठी लिखने का - न ही बैठ कर बातें करने का . वही दोस्त जो पहले घंटो साथ गुज़ार देते हैं - यदि इंटर नेट पर दिख भी जाएँ कभी ऑनलाइन - तो एक छोटी सी हाई आपस में एक्स्चंज  करने के बाद - दोनों ही इंविसिबल  हो जाते हैं .. ....पहले लोग एक लाइन कि चिट्ठी तब लिखते थे जब कोई बुरा समाचार सुनाना हो - या कि किसी चीज़ की बधाइयाँ देनी हो - पर अब तो बातें ऐसे होती हैं -

"हाई - हाई , हाउ आर यू? और सुना - जीजाजी कैसे हैं? - बेटा ठीक  से पढ़ रहा है?  - - हाँ यार, सच में , आजकल पहले जैसी पढाई कहाँ !! -------- ओके - सी यू लेटर यार - बाय ///

और एक दूसरे के घर जा कर बैठ के बातें करने का चलन तो तब ही रुक गया था - जब टीवी आया था - अब तो हम पड़ोस के घर की खुशियों और तकलीफों से ज्यादा - टीवी के सीरिअलों के परिवारों के किरदारों के करीब महसूस करते हैं!! पड़ोस में कोई बीमार है  - तो हमें एक दिन एक बार मिलने जाने का टाइम निकालना मुश्किल होता है  - पर हाँ - टीवी सीरियल की हेरोइन अगर बीमार है  - तो हम पूरे पूरे हफ्ते उसके साथ रोज़ आधा घंटा गुज़र सकते हैं.... यह कहाँ आ गए हैं हम?

एक कहानी  याद आती  है यहाँ - एक मेल में ही पढ़ी थी - एक बच्चा अपनी माँ से पूछता है माँ , आपकी एक घंटे  की आमदनी कितनी है ? माँ ऑफिस  से थक कर आई है - काम निबटाने हैं - खाना पकाना है - फिर उसी बेटे का होमवर्क करवाना है -आखिर बच्चे के फ्यूचर के लिए भी तो माँए वरीड रहती हैं न !!!! तो माँ  काम के टेंशन में बच्चे के कणटिनयस क़्योएस्चन्स से चिढ कर उसे जोर से डांटती है - क्यों परेशान कर रहा है - दिखता नहीं - काम कर रही हूँ.. पर बच्चा नहीं मानता  - पूछता ही रहता है . आखिर  माँ कहती है - २००   रुपये. तब बच्चा कुछ परेशान सा हो जाता है - और चला जाता है वहां से .. तीन चार हफ्ते गुज़र जाते हैं - बच्चा फिर माँ के पास आता है - माँ फिर बिजी है - हमेशा के ही तरह - फिर चिढ जाती है.. तब बच्चा माँ को १०० रुपये देता है - उसके पास एक १०० का नोट भी नहीं - कभी कही कभी कही से बचाए - २ रुपये - पांच रुपये, दस रुपये , बीस रुपये के नोट हैं - कुल ९७ ही हो पाए हैं  - पर यदि १०० पूरे करने हों - तो एक हफ्ते और रुकना होगा - ...... तो बच्चा माँ को १०० रुपये दे कर कहता है - माँ - क्या अब आप आधा घंटा मेरे साथ बिता सकती हैं? ( बाकि ३ रुपये उधार  हैं ) तब   माँ को रीअलैज़ होता है - कि मैं अपने बच्चे का फ्यूचर बनाने में इतनी बिजी हूँ - कि उसका प्रेजेंट ख़राब हो रहा है - और मुझे पता तक नहीं चला -

तो शायद हम सबको सोचने के ज़रुरत है - कही हम भी - अनजाने ही सही - चिलमन से लगे तो नहीं बैठे - कि अपने अपनों को - साफ़ छुपते भी नहीं हों - और नज़र आते भी नहीं हो??

खैर , आज बस इतना ही .. ये तो कुछ ज्यादा ही लम्बी बात खिच गयी .. शायद सीरियल का टाइम  हो गया होगा - तो आप भी सीरियल देखें - मैं भी टीवी ऑन  करूँ - पर शायद - यदि किसी नेबर को ज़रुरत हो - या किसी पुराने दोस्त को,- या कि हमारे  बेटे / बेटी को कुछ  बात करनी हो - तो शायद टीवी सीरियल को छोड़ कर - उसके लिए वक़्त निकलना अच्छा हो.....

फिर मिलेंगे ...

14 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी लिखी सभी बातों से मैं पूर्णतः सहमत हूँ। सार्थक प्रस्तुति ....

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  2. मैं तो चला, कुछ दोस्तों के साथ डिनर पर जाना है.

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  3. क्या बात है शिल्पा जी.
    सोच रहा हूँ अब 'बधाई' और :)से ही काम चला लिया करूँ.
    पर रहा नहीं जाता.

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  4. समय समय की बात है. कभी हम इन दिनों को याद कर कहेंगे कि वे भी कितने अच्छे दिन थे जब दूर बैठे ही सही मानवों को हाय कहते थे. तब शायद डायरेक्ट मनुष्य से नेट पर भी बात करने को तरसें, शायद रोबोट ही हमारे मन का हाल सुनेंगे.
    घुघूतीबासूती

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  5. बातोँ का तो खजाना है हमारे पास लेकिन जहाँ तहाँ बिखेरते चलते है किंतु सही जगह विनियोग करने की प्रबन्ध व्यवस्था ही नही है हमारे पास. :(
    जरूरतमन्द को इसिलिए भाव लगाना पडता है.

    व्यर्थ व्यवस्था पर सार्थक चोट!!

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  6. अतीतजीवी हो चली हैं -वर्तमान में आईये!

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    1. :)
      ऐसा लगता है आपको सर ? :) मैं अतीतजीवी भी हूँ, वर्तमान भी, भविष्य भी - शाश्वत सनातन हूँ .....

      :)

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    2. बहती लहरें हैं, ठहरी भी...... रेत बिखरी है, बंधी भी..... | कुछ महल रेत के बनाए ..... लहरें आती रहीं, महल बनते बिखरते रहे ..... | रेत शाश्वत है, तब भी थी, अब भी है, अगली लहर के बाद भी रहेगी .....| महल धुलते जायेंगे - नित नए बनते जायेंगे .........| हर विसर्जन नए सर्जन के लिए होता है । ध्रुवनित्य है , सर्जन क्षणिक ....... |

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