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रविवार, 29 जनवरी 2012

आनंद

कहीं मंदिर बन रहा था । तीन श्रमिक धूप में बैठे पत्थर तोड़ने का काम कर रहे थे । एक राहगीर ने पहले मजदूर से पूछा -

"क्या कर रहे हो ?"
वह बड़े दुखी स्वर में बोला - "पत्थर तोड़ रहा हूँ ।" सच ही था - वह पत्थर ही तोड़ रहा था ।

दूसरे से पूछा - वह दुखी न था - उसने कहा - "आजीविका कमा रहा हूँ ।" वह बिलकुल संतुलित था - न दुखी, न सुखी । और सच ही था - वह आजीविका कमाने को ही तो श्रम कर रहा था ।

फिर तीसरे से पूछा  - वह आनंदित था - गीत गाते हुए पत्थर तोड़ रहा था । उसने अपना गीत बीच में रोक कर कहा - "मैं मंदिर बना रहा हूँ ।" आँखों में चमक थी, ह्रदय में गीत थे, और वाणी में शान्ति । निश्चित ही मंदिर गढ़ना कितना सौभाग्यपूर्ण है !! सृजन से बड़ा कौनसा आनंद है ?

जीवन के प्रति भी क्या यही तीन उत्तर हैं ? कोई पत्थर तोड़ रहा है, कोई आजीविका कमा रहा है, तो कोई मंदिर गढ़ रहा है । ............. धूप तो तीनों पर बराबर पड़ रही है - परन्तु आनंद सबके हिस्से नहीं आता । 

जीवन का आनंद जीने वाले की दृष्टी में होता है । वह भीतर है, बाहर से नहीं आता ।

शनिवार, 28 जनवरी 2012

सीखे हुए उत्तर

सीखे हुए उत्तर कभी काफी नहीं होते- क्योंकि प्रश्न हमेशा बदलते रहते हैं । इस दुनिया में अगर कोई चीज़ नित्य है - तो वह है बदलाव । इस सिलसिले में एक कहानी याद आती है -

दो मंदिर थे - और एक दूसरे से कही भी सहमत न होते थे ( अक्सर ऐसा ही होता देखा जाता है - सभी कहते हैं की परम सत्य एक है - किन्तु उसे ढूँढने वाले / जानने के दावे करने वाले - कभी भी एक दूसरे से सहमत नहीं दीखते ) उनमे से किसी भी एक मंदिर वाले कभी भी दूसरे मंदिर वालों से हारना न चाहते, जहां तक हो - एक दुसरे को avoid करने का ही प्रयास करते । किन्तु बच्चे तो फिर बच्चे होते हैं न - बड़े उन्हें कितना ही बिगाड़ने के प्रयत्न करें, उन्हें बिगड़ने में समय लगता है । वे मन में प्रेम के सागर भरे आए होते हैं, जिस सागर को ये "सत्यखोजी" मार्गों वाले बड़े / समझदार जन सुखाने के प्रयास करते हैं - और यह सूखने तक जो समय चाहिए - तब तक वह बच्चा बड़ा हो गया होता है । 

तो दोनों मंदिरों के समूहों के दो बच्चे - अक्सर राह में मिलते, तो बातें कर लेते । दोनों कुछ कुछ बड़े हो चले थे, सागर सूखने लगा था - किन्तु अभी इतना भी न सूखा था की एक दूसरे से नज़र बचा कर निकल जाएँ । हाँ, एक दूसरे से जीतना है, यह भावना ज़रूर पनपने लगी थी । 

एक दिन ये दोनों बच्चे राह में मिले । एक ने दूसरे से पूछा - "कहाँ जा रहे हो ?" वह भी शायद कुछ Poetic Mood में रहा होगा - तो बोला - "जहां हवाएं ले जाएँ।" अब पहले वाले को कुछ समझ न आया, आगे क्या बात करूँ - चुप ही रह गया। (वैसे मेरी नज़र में यह पहले बच्चे की हार नहीं है - कम से कम उसने बात शुरू करने की कोशिश तो की  - दूसरे बच्चे ने - जो यहाँ जीता हुआ दीखता है - (के उसने इस को चुप करा दिया ) - उसीकी हार लगती है मुझे तो - उसने दोस्ती के राह बंद कर दी संवाद को ख़त्म कर के - पर खैर - यह एक कहानी है )

 अब यह पहला बच्चा बड़ा परेशान हुआ , वापस लौट कर मंदिर में गुरु से कहा "आज मैं उस मंदिर वाले से हार गया" - और पूरी बात बताई । अब यह कैसे स्वीकार हो  कि  हम हार गए ? गुरु को बड़ा बुरा लगा - उसने कहा - "यह तो बहुत बुरी बात है - हम हार कैसे सकते हैं ? कल फिर पूछना - वह ऐसा कहे तो कहना - अगर हवा न चलती हो - तो कहाँ जाओगे ?" 

अगले दिन फिर मुलाकात हुई - यह बच्चा तैयार था - फिर पूछा - "कहाँ जाते हो ?" लेकिन अब वह दूसरा बोला - "जहां पैर ले जाएँ " तो सीखा हुआ जवाब व्यर्थ हो गया - क्या कहे ? फिर चुप रह जाना पडा । आज तो गुरु जी को और बुरा लगा - वे बोले "कल पूछना - कभी ऐसा भी हो सकता है की पैर न रहे - तब कहीं नहीं जाओगे क्या ? और वह जवाब बदल कर जो भी और जवाब दे - उसमे इसी तरह का कुछ पूछना - की यह न हो तो क्या करोगे ? हार कर नहीं आना ।"

अगले दिन यह बच्चा पूरी तैयारी के साथ गया । alternative उत्तर भी सब सोचे हुए थे - की ऐसा घुमावदार जवाब मिला - तो ऐसा पूछूंगा । आज फिर दोनों मिले 

और इसने पूछा "कहाँ जा रहे हो ?"

दूसरा बच्चा बोला "सब्जी लेने "

....

:)

तो - सीखे हुए उत्तर अक्सर काम नहीं आते । जीतने के कोशिश अपने आप में ही हार होती है । जीतने / हारने के प्रयास ही यह कह रहे हैं की चुनी हुई राह ही गलत है - हमारी मंजिल यदि दूसरे से जीतना / उसे हराना है - तो वह प्रेम का / एकत्व का पथ है ही नहीं - हार तो हो ही चुकी । अब ऊपर से जीते या हारे - इससे कोई फर्क ही नहीं पड़ता ।

गुरुवार, 26 जनवरी 2012

गणतंत्र दिवस की बधाईयाँ और शुभकामनायें

हम सभी को हमारे गणतंत्र दिवस की बधाईयाँ और शुभकामनायें । 

हमारा भारत,
हमारा संविधान
हमारी प्रभुसत्ता 

फिर हम क्या कर रहे हैं ?

क्या हमारा योगदान सिर्फ शिकायत / व्यंग्य / आलोचना ही होना चाहिए ? 

"यह बुरा है" --- "वह बेकार है" ----
लेकिन - सवाल यह भी पूछें अपने आप से, कि हम खुद - सिर्फ इस शिकायत के अलावा - और अपने परिवार की गुज़र बसर के अलावा - कुछ कर रहे हैं क्या स्थितियों को बदलने के लिए ? आज हममे से कितने लोगों ने ध्वजारोहण और झंडावंदन में हिस्सा लिया ? (न कि-एक दिन छुट्टी मिली है, आज घर में ही आराम हो - कह कर एन्जॉय किया ?) यदि लिया - तो क्या हम सावधान मुद्रा में खड़े थे तब ?

हम कहते हैं की शहीदों ने अपनी जानें दीं - और आज देश का हाल तो देखो !!! परन्तु हम यह चाहते हैं की उन शहीदों की तरह ही देश की सेवा करने को कोई और आगे आये - हमारे कंधे सिर्फ अपने परिवार की जिम्मेदारियों से ही थक गए हैं, देश की ज़िम्मेदारी कोई और उठाये । आइये - हम भी कुछ योगदान करें - अपना छोटा सा योगदान - हममे से हर एक अपना छोटा सा हिस्सा करे - शुरुआत हो ।

आइये, हम सभी याद करें -
हम भारत के लोग, भारत को एक सम्पूर्ण प्रभुत्व सम्पन्न, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए तथा उसके समस्त नागरिकों को :
             सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय, विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता, प्रतिष्ठा और अवसर की समता प्राप्त करने के लिए तथा 
               उन सबमें व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखण्डता सुनिश्चित करनेवाली बंधुता बढाने के लिए 
                दृढ संकल्प होकर अपनी इस संविधान सभा में आज तारीख 26 नवंबर, 1949 ई0 (मिति मार्ग शीर्ष शुक्ल सप्तमी, सम्वत् दो हजार छह विक्रमी) को एतद 
               द्वारा इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं।
बधाईयाँ
शुभकामनायें 

मंगलवार, 24 जनवरी 2012

थाह है, या अथाह है ?

मेला भरा था समुद्र तट पर । विवाद था की समुद्र अथाह है, या उसकी थाह है ? है तो कितनी है ? भीड़ इकट्ठी हो गयी थी, पंडित शास्त्र खोले बैठे थे । उत्तेजना थी - कौन हारेगा , कौन जीतेगा ?सागर में कौन उतरे - बस किनारे बैठे बाल की खाल खींची जा रही थी । 

कोई कहता - अथाह, कोई - थाह है । कितनी ? अब जब नापा ही न गया - कैसे कह सकते हो की अथाह है ? जिसका नाप नहीं ही हुआ - उसे अथाह कैसे कहें ? न ही थाह बता सकते हैं ।

नमक के दो पुतले भी थे वहां - उन्हें जोश आ गया। "हम पता कर के आते हैं "- कहते दोनों सागर में कूद पड़े । वे जैसे जैसे नीचे जाते - हैरान होते । जैसे नीचे जा रहे हैं - सागर का अंत तो आता नहीं - खुद ज़रूर घुलते जा रहे हैं । नमक के थे न !! कहते हैं - वे दोनों पहुँच भी गए बहुत गहरे में, पर लौटने का क्या हो ? वे तो अब समुद्र ही हो गए थे - वे तो अब थे ही नहीं । 

कई दिनों तक लोग किनारे प्रतीक्षा करते रहे - फिर वाद विवाद शुरू हो गया - थाह है या अथाह ? जो भीतर गए खोजने - वे तो खो गए । अब भी विवाद चल रहा है किनारे पर - थाह है ? या अथाह ?

सोमवार, 23 जनवरी 2012

पूर्वाग्रह ३ : सीखना

इस शृंखला के पुराने भाग  देखें  :-
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पिछले दो भागों में हमने पढ़ा कि:

भाग १ -  पूर्वाग्रह का अर्थ है किसी वस्तु / व्यक्ति को देखने या जानने से पूर्व ही उसके बारे में एक धारणा बना लेना । यह पूर्वाग्रह भाषा ज्ञान से भी आता है, हमारे निजी अनुभव से भी बनता है । पूर्वाग्रह के बारे में अक्सर हमारे मन में एक पूर्वाग्रह है कि यह कोई "निंदनीय" चीज़ है, पूर्वाग्रह रखना कोई बुरी बात है । किन्तु यहाँ - इस शृंखला में मैं यह चाहूंगी कि आप इसके प्रति यह पूर्वाग्रह न रखें । यह हमारे पहचान और निर्णय की प्रक्रिया का एक भाग है । हमारे nervous system से ही प्रेरणा लेकर आजकल artificial intellegence के लिए सिस्टम्स बनाये जा रहे हैं - जो artificial neurons का उपयोग करते हैं । इन artificial electronic neurons को भी inputs और पूर्वाग्रह का उपयोग उसी प्रकार करना होता है जैसे हमारे मस्तिष्क की प्रक्रियाओं में होता है । मैंने दो तीन उदाहरण लिए पूर्वाग्रह के - जैसे, ....आम = मीठा पीला फल, .....हिंदी फिल्मों में " माँ " , .... सूर्य, ....चोट, ....दोस्त अदि ।

भाग २ - पूर्वाग्रह का पहचान और निर्णय की प्रक्रिया में क्या योगदान है । जैसे - यदि मैं मई के महीने में फल के बाज़ार में गयी और मुझे दूर से पीले फलों का ठेला दिखा - तो मैंने मान लिया कि यह आम हैं । यह तो पास जा कर ही जान पाऊंगी कि हैं , या नहीं हैं । तो मुझे एक तो यह पहचान करनी है कि यह फल आम है या नहीं, और दूसरा यह image मेरे मन में बने कि यह फल मुझे ख़ुशी की अनुभूति देगा (यदि मुझे आम पसंद हैं तो ) या नहीं (नापसंद हैं तो ) । निर्णय के दो आधार हैं - अभी क्या इनपुट आया और पहले से उस चीज़ के बारे में मेरा अनुभव कैसा रहा । neuron कैसे decide करे ? 
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यह दो चित्र आगे के लेख को समझने में सहायक होंगे - इन्हें याद रखने की आवश्यकता नहीं है - सिर्फ रेफेर करने में काम आयेंगे ।

हमारे शरीर के neuron  का एक उदाहरण यह है ।
natural neuron 


यह जो दोनों और, ऊपर और नीचे टहनियां और जडें सी दीखती हैं - ये हजारों की संख्या में हैं । ये synapse कहलाती हैं और neurons को एक दूसरे से जोडती हैं, और उनमे आपस में संकेत भेजने का भी काम करती हैं । जब जब भी दो neuron आपस में "बात" करते हैं - तो उनके बीच का सम्बन्ध और सुदृढ़ हो जाता है। जो बारम्बार बात करते हैं, उनके सम्बन्ध उतने अधिक प्रगाढ़ होते चले जाते हैं । 

इसके विरुद्ध, जो connection use  नहीं होता, वह कमज़ोर होता जाता है । हर एक neuron दुसरे हज़ारों neurons से इनपुट भी लेता है, और हजारों को output भी देता है । ( आपको शायद आश्चर्य होगा - किन्तु आज इलेक्ट्रोनिक / इंस्ट्रुमेंटेशन इंजिनियर / डॉक्टर हमारी जीभ के neurons - जो हम स्वाद के अनुभव के लिए use करते हैं - उन्हें नेत्रहीन लोगों के देखने के लिए प्रयुक्त करने का प्रयास कर रहे हैं - और कुछ हलकी सफलताएं मिलने भी लगी हैं । 

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artificial neuron कुछ ऐसा होता है - (यह natural वाले से बहुत ही कमतर है - किन्तु basic working को copy करता है ।)
Artificial  Neuron 

१.ये जो inputs दीख रहे हैं - ये असल inputs हैं । 
२.इस एक नयूरोन का सिर्फ एक ही output है ।
३.हर इनपुट को कितना महत्व (वजन, weight ) दिया जाएगा - यह बात न्यूरोन हर उदाहरण से सीखता है ।
४.यह सीखना अब तक के अनुभव की आधार पर होता है - यह वजन अनुभव के साथ बदलता है ।
५.जो इनपुट इस neuron के output के साथ में सकारात्मक रूप से काम करें - उन inputs का इस neuron में + महत्व बढ़ता जाता है, (+१ तक) , और जो इस output के साथ न हों / विरुद्ध हों, उनका घटता जाता है या - में बढ़ता है ( - १ तक)।
६.ये सारी चीज़ें (असर) जोड़ी जाती हैं ।
७.activation function का काम है इस जोड़ को (जो एक से अधिक हो सकता है - +-१ तक लिमिट करना। (अर्थात हाँ या ना में उत्तर बनाना )

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अब चलते हैं सीखने की प्रक्रिया की ओर - कि हर प्रविष्टि का वजन कैसे निर्धारित होता है और हर बार bias के वजन पर क्या असर होता है | 
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एक रोज़मर्रा का उदहारण लेते हैं : सोचिये की यह न्यूरोन एक नन्हा १० - ११ माह का बच्चा है जो घुटने चलता है । उसे कई तरह के अनुभव होते हैं - और अलग अलग स्थितयों के अनुसार सोचिये की उसे "हाँ" या "न" में चुनाव करना सीखना है ।
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एक बच्चे की सीखने की और निर्णय लेने की प्रक्रिया :
१. पहला इनपुट है - गर्म कूकर
२. दूसरा इनपुट है एक बजने वाला खिलौना
३. तीसरा इनपुट - पिता की थाली में परोसा हुआ अचार
..
..
bias (पूर्वाग्रह) बन रहा है इस बारे में कि माँ की बात in general माननी चाहिए, या नहीं माननी चाहिए ।


इनमे से हर एक इनपुट को एक के बाद एक लेते और समझते हैं । हम में से अधिकतर लोगों को ये experience हुए ही हैं - तो समझना आसान होगा ।
इसे पढने से पहले गुणा करने का एक मूलभूत सिद्धांत (जो हम सब जानते ही हैं ) ध्यान में ले आयें ---
        क    (+1).(+1) = +1  दो + संख्या / या दो - संख्या - अर्थात एक सी
        ख   (-1).(-1) = +1     संख्याएं आपस में गुणा हों तो उत्तर + होगा
       ---------------
        ग    (-1).(+1) = -1  अर्थात दो उलट प्रकार की संख्याएं (एक + दूसरी -)
        घ    (+1).(-1) = -1   गुणा हों तो उत्तर - होगा
       ---------------
       अर्थात - नकारात्मक और सकारात्मक (उलट स्वभाव की))संख्याएं आपस में गुणा की जायें तो परिणाम नकारात्मक होता है, और एक ही तरह की संख्याएं गुणा की जाएँ तो सकारात्मक ।
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१.
किचन में गर्म कुकर है - जिसे छूने बच्चे बार बार आगे जाते हैं । माँ मना करती है - बेटा मत छू - हाथ जलेगा। माँ सामने हो तो बच्चे अक्सर मान भी जाते हैं, परन्तु उनमे वह उत्सुकता बनी रहती है - कि छूना है । फिर किसी दिन माँ की नज़र न हो - तो छूते ही हैं - और हाथ में जलन के दर्द का अनुभव उन्हें तुरंत हाथ खींचने पर मजबूर करता है - रोने पर भी । कुछ देर बाद - हाथ धुलने से / दवा देने से राहत हो जाती है । कुछ दिन बच्चे को वह दर्द याद रहता है - और वह कुकर नहीं छूता । फिर यह repeat होता है - शायद अबकी बार किसी गर्म कढाई / गर्म दूध की भगोनी आदि के साथ । तो अनुभव पक्का होता जाता है, याददाश्त प्रगाढ़ होती जाती है ।

अब बच्चे ने दो तरह की बात सीखी - 
         (क) एक यह की किचन में गर्म चीज़ें जो प्लेटफोर्म पर / चूल्हे पर रखी हैं - उन्हें छूना दर्द देता है - तो उन्हें  नहीं छूना है । तो उस input के लिए वजन negative बन गया । 
         (ख) माँ जो कह रही थी - वह मेरे लिए सही था - तो माँ की बात मानने में भलाई है - नकारात्मकता (माँ ने मना किया था ) और नकारात्मकता (दर्द हुआ ) के गुणा होने से सकारात्मक परिणाम  (bias या माँ की बात का वजन बढ़ गया)
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(२)
दूसरा इनपुट एक बजता हुआ खिलौना है - माँ बच्चे को हंस हंस कर उससे खेलने को दे रही है । बच्चा उसे लेता है - खेलता है - और एन्जॉय करता है - फिर से दो बातें हिया हैं ।
       (क) खिलौने (input ) का वजन positive हो गया । 
       (ख) माँ की बात (bias ) का वजन भी बढ़ा - इस बार सकारात्मक (माँ ने खेलने दिया था) और सकारात्मक (मजा आया खेलने में )  के गुणा होने से + result आया है । 
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(३)
पिता की थाली में चटनी / अचार है - जबकि बच्चे को सिर्फ मीठी / फीकी /  हलकी नमकीन चीज़ें ही मिली हैं । बच्चे के ललचाने पर माँ कहती है - थोडा बड़ा हो जा - फिर मिलेगा । अभी मुह जलेगा । परन्तु बच्चा जिद करता है । फिर थोडा सा अचार चटाना ही पड़ा माता पिता को । उसे मिर्च लगी । अगली बार वह नहीं खाना चाहेगा (कुछ दिन तक ) । फिर से दो बातें हुईं 
         (क) तीखा अचार मुंह में जलन देता है - तो नहीं खाना है - neagtive वजन ।
         (ख) माँ की बात मान लेता तो तकलीफ न होती - bias का वजन फिर बढ़ा ।
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अब - इनमे से हर एक इनपुट - हर experience (अनुभव ) के बाद अपने ही वजन को प्रभावित कर रहा है - उसे + या - दिशा में बढ़ा रहा है । किस दिशा में - यह इस पर निर्भर है की अनुभव सुखदायी था या दुखदायी ।

इसके अलावा - इनमे से हर एक इनपुट के लिए माँ (bias ) ने जो कहा - यदि अनुभव उसके अनुरूप रहा - तो  bias का वजन बढ़ता चला जायेगा । यदि माँ ने न कहा था - और अनुभव कटु हुआ - तो बच्चा सीखेगा की माँ की बात न मानने में मेरा नुकसान है (नकरात्मक और नकरात्मक = सकारात्मक )। इसके ठीक उलट - यदि माँ ने हाँ कहा था और अनुभव मीठा रहा - तो बच्चे यह सीखते हैं की अरे वाह - माँ की बात मानने में बड़ा फायदा है (सकारात्मक और सकारात्मक = सकारात्मक )। इन दोनों ही रूप में bias का वजन + की दिशा में बढ़ता है । 
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इस सीखे हुए अनुभव का उपयोग कैसे होगा? एक समय में अक्सर एक ही इनपुट होगा, या तो गर्म कुकर है, या फिर बजने वाला बाजा । तो एक input =+१ है, बाकी के इनपुट शून्य हैं । तो जोड़ जो बनेगा - वह उस एक ही इनपुट के असर से बनेगा । और उसी के हिसाब से परिणाम या तो +१ आएगा (अर्थात हाँ ) या फिर -१ आएगा (अर्थात ना )।

अगले भाग में हम यह देखने का प्रयास करेंगे की यह bias या इनपुट के वजन जो हमने इंसानी दिमाग में देखे समझे - ये artificial neuron में कैसे घटाए और बढाए जाते हैं ।

जारी ........

गुरुवार, 5 जनवरी 2012

श्रीमद्भगवद्गीता २.११

श्री भगवानुवाच् 
अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादान्श्चभाषसे ||
गतासूनगतासून्श्च नानुशोचन्ति पण्डिताः ||११|| 

श्री भगवान् ने कहा - तू न सोचने योग्य बातों पर इतना सोचा रहा है, और पंडिताई की भाषा प्रयुक्त करता है | किन्तु जो सच ही में पंडित हो - वह तो जिनके प्राण चले गए, या जिनके नहीं भी गए, उन दोनों के ही लिए शोक नहीं करते |
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[ यहाँ यह ज़रूर कहूँगी, कि मैं भी इस गीता की एक student भर हूँ | translation और discussion कर रही हूँ, परन्तु न तो मैं कोई ज्ञानी होने का दावा कर रही हूँ, न ही कोई प्रवचनकर्ता हूँ | सिर्फ एक बहुत बड़ा खजाना मिला है गीतासागर का - तो यह उसे शेयर करने का प्रयास भर है | हो सकता है कई जगह मेरे और आपके interpretations मेल न खाएं - आपकी टिप्पणियों का स्वागत है | मैं भी सीख ही रही हूँ | चर्चा करेंगे, कि कौनसा interpretation  सही होगा |]
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अब तक हमने जो पढ़ा - वह कृष्ण गीत की भूमिका भर थी | अर्जुन का युद्ध क्षेत्र में आना, ध्रितराष्ट्र , दुर्योधन आदि की मानसिक स्थिति की और संकेत मिले | फिर अर्जुन ने दोनों सेनाओं को देखा, और अपने सम्बन्धियों / प्रियजनों के मोह वश होकर तड़पने लगा | उसकी स्थिति इतनी बुरी हो गयी, की उसके हाथ पाँव शिथिल हो गए, और गांडीव छूटने लगा | जिस महायोद्धा अर्जुन ने अनेकों युद्ध जीते, वह "प्रियजनों का हत्यारा बनूँगा" के विचार से काँप उठा | उसने कृष्ण से कहा की इस इन्द्रियों को सुखाने वाले महाशोक से मैं कभी नहीं छूट पाऊंगा , और हथियार डालने को उद्धत हो गया | पहले कृष्ण ने एक कुशल मनोवैज्ञानिक की भांति उसे व्यंग्य कर के उकसाया - जैसा साधारण स्थिति में हम करते हैं | उन्होंने उसे कायर भी कहा , और नपुंसक भी | किन्तु अर्जुन इन बातों से आगे की दवा का ज़रूरतमंद था | उसकी मानसिक स्थिति साधारण पलायन की नहीं थी, कि वह व्यंग्यों से होश में आता  |

उसका विषाद बहुत गहन था | आखिर कृष्ण को उसे जगाने के लिए . युद्धभूमि में खड़े हुए, यह परम गुप्त ज्ञान की नदी - यह गीता - सुनानी पडी - जिसे सुन कर ही उसके संशय दूर हो सके | वह विषाद से भर कर प्रभु की शरण में आया, और प्रभु ने उसे अपने ज्ञानसागर में शरण दी | तब उसका विषाद, विषादयोग में बदल गया - जो उसे प्रभु से योग की राह पर ले जाने का साधन हुआ | कृष्ण ने उसे ज्ञान, वैराग्य , भक्ति, सांख्य, निष्काम कर्म , वेदों , यज्ञों , स्थित-प्रज्ञता आदि सभी के महत्व बताये | ध्यान देने की बात है कि - यह सब नर और नारायण की लीला मात्र है - गीता अर्जुन को नहीं - बल्कि हम लोगों के लिए गई गयी है | अर्जुन नर हैं, कृष्ण नारायण | और महाभारत के नायक युवा अभिमन्यु के पुत्र परीक्षित के काल में ही कलियुग का आरम्भ हुआ | तो गीता हम लोगों को कलियुग में जीवन का सही मार्ग दिखने को गाई गयी है | अर्जुन - जो कृष्ण का चिर सखा है - वह भ्रम में पड़ा हो - यह कुछ बात हजम होती नहीं है | प्रभु के दर्शन भर करने को महाज्ञानी महामानव सदियों तपस्या करते हैं - उन प्रभु का चिर सखा मोह में पड़ेगा क्या ? 

"श्रीमद भगवद गीता " का अर्थ है "श्री भगवान् का गाया दिव्य गीत |"
........ यह गीत यहाँ - इस श्लोक से - शुरू होता है |  
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तो कृष्ण कह रहे हैं "तू न सोचने योग्य पर इतना सोच रहा है " -
न सोचने योग्य ???? तो क्या इतनी महामारी जो इस युद्ध से होगी, प्रिय पितामह की संभावित हत्या, गुरुजनों, बेटों, पोतों, चाचों, मामों आदि की संभावित मौत - पूरे परिवार का संभावित महाविनाश - क्या ये बातें "अशोच्यान" हैं ????

आप और मैं सोचें - अपने परिवार को लेकर - अर्जुन को लेकर सोचना बहुत आसान है - वह दूर है - अपने परिवार के बारे में सोचें - ऐसी महाविनाश की स्थिति अपने परिवार पर आये - तो क्या हम विषाद को प्राप्त नहीं हो जायेंगे ? हम सभी सामाजिक प्राणी हैं - सभी के परिवार हैं , साधू सन्यासी तो शायद हम सभी पढने वालों में कोई नहीं होगा - सभी के परिवारों में प्रिय जन हैं | और अर्जुन का तो फिर बहुत विराट परिवार है | प्रपिता से प्रपौत्र तक हैं, १०० तो cousins कौरव ही हैं | इन सभी की मृत्यु सामने खड़ी है - सोचिये कैसा गहरा अवसाद होगा उसके मन में | अर्जुन वैसे ही कुंती पुत्रों में शायद सबसे अधिक emotional है | 
और कृष्ण "अशोच्यान" कह रहे हैं ? 

क्योंकि - short  term  में ये चीज़ें बड़ी हैं, किन्तु इश्वर का viewpoint  short  term  तो नहीं होता न ? Larger perview में देखा जाए - तो हाँ , यह अशोच्यान ही है | long term scheme of events  में ये मृत्युएँ कोई मायने नहीं रखतीं | न भी मारे जाएँ ये सब इस धर्मयुद्ध में, तो किसी और रूप में उसी समय मृत्यु को पायेंगे, जिस समय उन्होंने पायी | कृष्ण महाकाल स्वरुप हैं, हर एक की मृत्यु का समय वे जानते हैं | अर्जुन युद्ध करे, या न करे, मारे, या न मारे - हर एक को अपने समय पर देह त्यागनी ही है | कृष्ण अर्जुन पर निर्भर नहीं हैं इन सबको मारने के लिए | बहुत तरीके हैं सामूहिक संहार के लिए, प्रभु भूकंप भी ला सकते हैं, बाढ़, ज्वालामुखी आदि - कुछ भी | 

नहीं - जोर यहाँ परिणाम (मृत्यु या संहार) पर नहीं है | जोर यहाँ है , कर्त्तव्य पर अडिग रहने और पलायन न करने पर | हर loss की कीमत पर अपना कर्त्तव्य पूरा करने पर stress  है | कोई यह न सोचे कि यदि अर्जुन न भी लड़ता - तो जो जो, जैसे जैसे, और जब जब मरा - उसमे तिल भर भी फर्क आता | उनकी मृत्यु उसी रूप में तय थी, वैसे ही और उसी पल आती !!! बस- उसका निमित्त कोई और होता |

एक बात - गीता के बाहर की है - फिर भी कहूँगी | जब कृष्ण बालसखाओं के संग वन में थे, तब ब्रह्मा जी ने सब बछड़े और ग्वाले छुपा लिए थे - परीक्षा लेने कि यही कृष्ण हैं ? ब्रह्मा तो पल भर में लौट आये अपने समय से, किन्तु यहाँ धरती पर साल बीत गया था | उस साल भर कृष्ण खुद ही उन सभी ग्वालों और बछड़ों का रूप धार कर हर घर में हर माँ और हर गाय को पुत्र सुख देते रहे | तो यहाँ भी वे हर चीज़ अकेले कर सकते हैं | उन्हें अर्जुन के युद्ध करने की आवश्यकता ही नहीं है | आवश्यकता अर्जुन को है अपना धर्म पूरा करने की | 

कृष्ण कह रहे हैं कि तेरी यह पांडित्य भरी बातें पांडित्य नहीं, बल्कि मूर्खता हैं | जो सच ही ज्ञानी होते हैं, वे न जीवित का शोक (चिंता) करते हैं, न मृत का | आगे वे इस पर विस्तार करेंगे |
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इस गीता आलेख के बाकी भागों (इससे पहले और बाद के) के लिए ऊपर गीता tab पर क्लिक करें 
जारी 

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disclaimer:
कई दिनों से इच्छा थी, कि भगवद गीता की अपनी समझ पर लिखूं - पर डर सा लगता है - शुरू करते हुए भी - कि कहाँ मैं और कहाँ गीता पर कुछ लिखने की काबिलियत ?| लेकिन दोस्तों - आज से इस लेबल पर शुरुआत कर रही हूँ - यदि आपके विश्लेषण के हिसाब से यह मेल ना खाता हो - तो you are welcome to comment - फिर डिस्कशन करेंगे .... यह जो भी लिख रही हूँ इस श्रंखला में, यह मेरा interpretation है, मैं इसके सही ही होने का कोई दावा नहीं कर रही  
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मेरे निजी जीवन में गीता जी में समझाए गए गुण नहीं उतरे हैं । मैं गीता जी की एक अध्येता भर हूँ, और साधारण परिस्थितियों वाली उतनी ही साधारण मनुष्य हूँ जितने यहाँ के अधिकतर पाठक गण हैं (सब नहीं - कुछ बहुत ज्ञानी या आदर्श हो सकते हैं) । गीता जी में कही गयी बातों को पढने / समझने / और आपस में बांटने का प्रयास भर कर रही हूँ , किन्तु मैं स्वयं उन ऊंचे आदर्शों पर अपने निजी जीवन में खरी उतरने का कोई दावा नहीं कर रही । न ही मैं अपनी कही बातों के "सही" होने का कोई दावा कर रही हूँ।   मैं पाखंडी नहीं हूँ, और भली तरह जानती हूँ  कि मुझमे अपनी बहुत सी कमियां और कमजोरियां हैं । मैं कई ऐसे इश्वर में आस्था न रखने वाले व्यक्तियों को जानती हूँ , जो वेदों की ऋचाओं को भली प्रकार प्रस्तुत करते हैं । कृपया सिर्फ इस मिल बाँट कर इस अमृतमयी गीता के पठन करने के प्रयास के कारण मुझे विदुषी न समझें (न पाखंडी ही) | कृष्ण गीता में एक दूसरी जगह कहते हैं की चार प्रकार के लोग इस खोज में उतरते हैं, और उनमे से सर्वोच्च स्तर है "ज्ञानी" - और मैं उस श्रेणी में नहीं आती हूँ ।