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मंगलवार, 23 जून 2015

शिवपुराण १५ : नागेश्वर जगेश्वर ज्योतिर्लिंग


कथा है कि दारुक नामक एक राक्षस था जिसकी स्त्री का नाम दारुकी था।  दारुकी ने अपनी तपस्या से माता पार्वती को प्रसन्न किया और वरदान पाया कि वह जहां जाए वहीँ वन हो जाएगा।  इस वरदान के प्रभाव से दारुक बहुत उत्पात करने लगा।  वह चाहे जहां लोगों / ऋषि / मुनियों को परेशान करता, यज्ञ भंग करता , और फिर दारुकी के संग चला जाता।  वन उत्पन्न हो जाने से उसे कोई न पकड़ पाता। उसके उत्पात से परेशान होकर लोग और्वा ऋषि की शरण में गये।  उन्होंने राक्षस जोड़े को श्राप दिया कि जैसे ही वे धरती पर कोई हिंसा करेंगे, वे स्वयं विनष्ट हो जायेंगे।

राक्षसों के सम्मुख बड़ी समस्या आन पड़ी।  देवताओं को यह पता चला तो उन्होंने हमला कर दिया।  राक्षस अब न लड़ें तो देवता उन्हें नष्ट कर दें और लड़ें तो श्राप से नष्ट हो जाएँ।  यह स्थिति भांप कर राक्षस सागर में प्रविष्ट हुए।  माँ पार्वती  के आशीष से सागर में वन उत्पन्न हो गया जहां वे सुखपूर्वक रहने लगे , और यहां ऋषि श्राप का भी भी न रहा।  जल मग्न रह कर ही वे शिकार पकड़ते।  बस्ती की बस्ती पकड़ लेते और क्रूरता करते।

एक बार उनकी पकड़ में एक वैश्य "सुप्रिय " को भी पकड़ लिया , जो बड़ा शिवभक्त था। उस शिवभक्त वैश्य ने वहीं शिवलिंग स्थापित किया और "ॐ नमः शिवाय" का उच्चारण प्रारम्भ किया।  दारुक उसे मारने दौड़ा तो शिव जी तत्क्षण प्रकटे और पाशुपत अस्त्र से उन राक्षसों को खत्म किया (अन्य कथा के अनुसार शिव जी ने सुप्रिय को पाशुपत दिया जिससे उस शिवभक्त ने ही राक्षसों का विनाश किया) . इसके पश्चात सुप्रिय की प्रार्थना पर शिव जी ने वहीं ज्योतिर्लिंग रूप में निवास किया।

एक कथा है मंदिर के उलटे होने की।  कहते हैं कि नामदेव जी एक बार यहां कीर्तन करते थे।  तब किसी ने उन्हें राह छोड़ने को कहा - कि वे भगवान के दर्शन की राह में अड़ रहे हैं।  तब नामदेव जी ने उन व्यक्ति को कहा कि आप ही मुझे ऐसे जगह कर दें जहाँ प्रभु मार्ग न हो।  गुस्साए लोगों ने उन्हें मंदिर के दक्षिण में धकेल दिया लेकिन जब दर्शन करने लौटे तो द्वार घूम कर नामदेव की तरफ हो गया था।  इसीलिए मंदिर में नंदी जी की मूरत और मंदिरों की तरह मंदिर के प्रवेश द्वार पर नहीं बल्कि उलटी दिशा में हैं। इसीलिए इन्हे "औंधा" नागनाथ भी कहते हैं।

नागेश्वर ज्योतिर्लिंग की भगोलिक स्थिति के बारे में भी अलग अलग मत हैं।  कोई इन्हे महाराष्ट्र के औंध में बताते हैं , तो कोई उत्तराखंड के जगेश्वर , और कोई कोई द्वारका के पश्चिम में नागेश्वर को ज्योतिर्लिंग बताते हैं।


 औंधा नागनाथ महाराष्ट्र
  नागेश्वर द्वारका



 जगेश्वर दारुक वन अल्मोड़ा उत्तराखंड





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