ज़िंदगी अधूरी तेरे बिन
भाग एक
अस्वीकरण
यह एक पूरी तरह काल्पनिक कहानी है। इसका किसी भी जीवित या मृत व्यक्ति, या परिवार से कोई संबंध नहीं है।
परिचय
उसने विरासत मेँ एक साम्राज्य पाया, और उसे खूब बढ़ाया। लेकिन उसमें उलझा रह कर, वह अपनी रानी का ख्याल रखना भूल गया। उपेक्षाओं की हद पार होने पर आखिर एक दिन वह उसे छोड़ कर चली गई। क्या वह उसके पीछे जाकर उसे वापस पा सकेगा?
अंशुमन राव-सिन्हा के पास सब-कुछ था — एक फलता-फूलता व्यवसाय, आलीशान घर और प्यार करने वाला परिवार। फिर भी, जब उस की पत्नी प्रियंका शादी के बीस साल बाद, बच्चों के बाहर पढ़ने चले जाने के दो साल बाद उसे छोड़ देती है, तो उसे सच्चाई का सामना करना पड़ता है; कि उसने अपनी पत्नी से बहुत प्यार करने के बावजूद, अपनी पत्नी के प्यार की लगातार उपेक्षा की थी, और उसके प्रति हमेशा लापरवाही बरती थी। और इस पूरे समय वह यही समझता रहा था कि हम एक सुखी परिवार हैं। उसे एहसास तक नहीं हुआ था कि प्रियंका उसके वैभवशाली घर मेँ दुखी भी हो सकती थी।
पहली बार अपनी गलतियों को समझते और स्वीकार करते हुए, अंशुमन अपने जीवन के प्यार को फिर से जीतने के लिए प्रियंका के पीछे जाता है।
चालीस की उम्र की दहलीज पर खड़ी प्रियंका राव-सिन्हा, जीवन के एक ऐसे मोड़ पर खड़ी हैं, जो उस की जिंदगी बदल देगा। अपनी शादी में खुद को अनदेखा और कमतर महसूस करते रहने से थक कर, वह अपनी समृद्ध जिंदगी छोड़कर लक्षद्वीप में अपनी दोस्त श्रेया के रिसॉर्ट का प्रबंधन करने चली जाती है। श्रेया, जो जीवन के आखिरी पड़ाव पर है।
जब अंशुमन उसे मनाने और सुलह करने आता है, तो प्रियंका उलझन मेँ पड़ जाती है। उसने तो सोचा था कि वह मुझसे छुटकारा चाहता है?
मुख्य विषय: पति-पत्नी का रिश्ता, प्रौढ़ अवस्था का प्यार, पछतावा, दूसरा मौका
भाग 1प्रियंका
मैंने बहुत पहले ही सीख लिया था कि मुझे अंशुमन का इंतज़ार नहीं करना चाहिए, लेकिन मैंने अपनी आदत से मजबूर होकर शुक्रवार की रात को एक बार फिर वही इंतजार किया था। यह स्थिति मुझे हज़ारों बार बेवकूफ़ साबित करती आई थी, आज भी यही होना था।
शादी की बीसवीं सालगिरह!
मैं पूरे दिन किसी तरह के किसी भी संकेत, किसी भी अभिव्यक्ति की उम्मीद करती रही - एक गुलदस्ते, एक गुलाब, एक डिनर निमंत्रण, या एक टेक्स्ट संदेश भर की भी उम्मीद - जिसमें लिखा हो “हैप्पी एनिवर्सरी, बेबी”। इसके बाद कुछ इस तरह का कि “मैं इस बीसवीं सालगिरह को तुम्हारे लिए खास बनाऊँगा।” लेकिन, कुछ भी नहीं था। कुछ भी नहीं।
मैं सालगिरह या जन्मदिन को लेकर ज्यादा अपेक्षाएं नहीं रखती, क्योंकि मुझे पता है कि इससे निराशा ही हाथ लगेगी। अंशुमन मेरे पिछले कुछ जन्मदिन भूल गया था, लेकिन पहले के वर्षों मेँ कई बार उसने मेरे लिए फूल भी खरीदे थे। पिछले कई सालों से तो जैसे भूलना ही नियम हो गया था। लेकिन यह तो हमारी बीसवीं सालगिरह थी, कुछ अलग, कुछ खास। इसलिए मैं इस बार सोच रही थी .....
जब बच्चे घर पर थे तो इतना बुरा नहीं लगा करता था, लेकिन सत्रह साल के होने पर हमारे जुड़वाँ बच्चे घर छोड़कर आगे पढ़ने चले गए थे। शाश्वत अपने पिता की तरह आर्किटेक्चर की डिग्री हासिल करने की तैयारी के लिए पढ़ाई करने, और नीलिमा प्री-मेडिकल की तैयारी की पढ़ाई करने। अब उन्हें गए दो साल हो गए थे, दोनों उन्नीस के होने वाले हैं।
और मैं? मैं यहां हूँ, एक बड़े और आलीशान घर में अकेली घूमती हुई। घर, जो कर्नाटक के बैंगलोर शहर के सबसे पॉश इलाकों में है, हर उस विलासिता से घिरा हुआ है, जिसकी मैंने कभी कल्पना भी नहीं की थी। मैं एक झोंपड़ पट्टी में गरीबी में पली बढ़ी थी। और अंशुमन? अंशुमन हमेशा से ही अमीर रहा है। वह अपने अमीर व्यवसायी परिवार के पुश्तैनी पैसों के साथ बड़ा हुआ है, और एक दशक पहले, उसे अपने पिता से ‘राव-सिन्हा-आर्किटेक्ट्स-एण्ड-बिल्डर्स’ कंपनी विरासत में मिली थी। उसने अपनी कड़ी मेहनत और दृढ़ इच्छाशक्ति के दम पर कंपनी को और भी बड़ा और सफल बना दिया था। इस तरह के परिवार से आने के कारण उसे कभी नहीं पता था कि एक असुरक्षित जीवन का क्या मतलब है।
मैंने शैंपेन का एक और गिलास अपने लिए डाला। यह इस महंगी ड्रिंक का आखिरी गिलास था जिसे मैंने हमारी सालगिरह के लिए फ्रिज मेँ रख कर ठंडा किया था। तो, क्या हुआ अगर वह भूल भी गया तो? मैंने खुद से कहा। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। मुझे तो याद था, और शायद अगर वह देर से भी आता, तो हम टोस्ट करते, हम प्यार करते – एक दिन के लिए उस समय खंड मेँ वापस लौट जाते जब मैं अपनी शादी में इतनी एकाकी नहीं थी।
घड़ी ने आधी रात बजने की सूचना की घोषणा की, तारीख बदल गई। और मुझे पता था कि अब इंतजार का कोई अर्थ नहीं, अब इस सिंडरेला के राजकुमारी बनने का समय पूरा हो गया है। कुछ और देर बाद दरवाज़ा खुलने की आहट हुई और मैंने अंशुमन को भीतर घुसते हुए फोन पर बातें करते सुना, किसी बात पर हंसते हुए। "बेशक, मैं कल ऑफिस मेँ तुमसे मिलूंगा। हाँ, मुझे पता है, हमारी मीटिंग सात बजे है।"
वह उसकी कार्यकारी सहायक काव्या होगी। वह दो या तीन साल पहले हमारे जीवन में आई थी, सुंदर और स्मार्ट थी, और उसके पास आईआईएम से बिजनेस की डिग्री थी। काव्या ग्रेवाल भोपाल मेँ काम करने के बाद बैंगलोर आई थी, जिसकी उम्र बीस के दशक मेँ कहीं थी, तीस से कुछ कम। अंशुमन चालीस का था, और मैं अड़तीस की उम्र पूरी कर के चालीस का दरवाजा खटखटा रही थी। लोग कई बार कहते थे कि उनका अफेयर है, लेकिन मुझे यह नहीं लगता था। अंशुमन के साथ नहीं। वह ऐसा व्यक्ति नहीं था। लेकिन शायद हर पत्नी, जिसके पति ने उसे धोखा दिया हो, वह यही सोचती होगी: नहीं, मेरे पति ऐसे नहीं!
यह ख्याल इसलिए, क्योंकि एक तो हर पार्टी मेँ लोग यह इशारा करते थे। फिर, पिछले कई महीनों से हम बहुत सेक्स नहीं कर रहे थे। काव्या, गोरी, सुंदर और जवान थी, उसके पास मेरी तरह छिपाने के लिए सफेद होते हुए बाल नहीं थे, ना गालों पर कंसीलर से छिपाने के लिए काले धब्बे ही। उसके पास एक बढ़िया करियर था, उसने घर बैठकर बच्चों की परवरिश और घर संभालने में पूरी ज़िंदगी नहीं बिताई थी, वह हर तरह से मुझसे बेहतर थी। लेकिन मुझे पूरा विश्वास था कि मेरा अंशुमन ऐसा नहीं हैं। चाहे लोग कुछ भी कहते हों, चाहे अंशुमन कितना ही देर से घर आता हो, लेकिन वह ऐसा व्यक्ति हरगिज नहीं था।
लेकिन जब हमारे दोस्त गुप्ता दम्पत्ति का तलाक हुआ था (क्योंकि विवेक किसी और के साथ शारीरिक संबंध बना रहा था) तब अंशुमन ने कहा था, "विवेक ईशानी से बहुत आगे निकल चुका है। जब विवेक प्रगति की सीढ़ियाँ चढ़ रहा था, तब वह घर पर थी, एक व्यक्ति के रूप में विकसित नहीं हो रही थी, इसीलिए उसने किसी युवा, छरहरी और बुद्धिमान लड़की को ढूंढा और संबंध बनाए।" यह कहते हुए अंशुमन को जरा भी यह एहसास नहीं हुआ कि वह ईशानी के साथ-साथ मेरे बारे में भी तो बात कर रहा है। मेरी दोस्त की तरह मेरा भी तो वजन थोड़ा सा बढ़ गया था – जब एक स्त्री माँ बनती है, अपने बच्चों की अच्छी परवरिश करने मेँ अपना समय लगाती है, तो वह कई बार खुद पर उतना ध्यान नहीं दे पाती। जब हम बच्चों को जन्म देते हैं, तो शरीर मेँ हार्मोनल बदलाव आते हैं, और उम्र बढ़ने के साथ मेटाबोलिज्म कम हो जाता है, अपना बस नहीं चलता ।
मेरे विपरीत, ईशानी पहले वकालत करती थी, उसने शादी के बाद अपनी वकालत की प्रैक्टिस को घर चलाने के लिए छोड़ दिया था। जिससे विवेक अपनी “गुप्ता एंड गुप्ता लॉ फर्म” पर ध्यान देने को पूरा समय निकाल सके; कि विवेक को अपने बच्चों की परवरिश की चिंता नहीं करनी पड़े, वह अपने व्यवसाय मेँ आगे बढ़ सके। लेकिन उनकी शादी खत्म होने के बाद, वह काम पर वापस चली गई थी। एक महिला के लिए, जो पंद्रह साल से अधिक समय घर सम्हालती रही थी, यह एक कठिन काम था, फिर भी ईशानी अपनी मेहनत से सफल हुई थी। अब ईशानी के पास एक ऐसा करियर था, जिसे उसने तलाक के बाद के पाँच सालों में बनाया था, जिसमें वह ‘ईशानी गुप्ता’ नहीं, बल्कि अपने शादी के पहले के नाम ‘ईशानी अस्थाना” से जानी जाती थी । तलाक में उसने अपनी बेटी की कस्टडी को विवेक को खो दिया (बेटी ने विवेक की बेवफाई के लिए ईशानी को ही दोषी ठहराया, उसी तरह जैसे अंशुमन ने कहा था) और बेटे को अपनी होने वाली बहू से खो दिया (वह विवेक की कंपनी मेँ काम करती थी और ईशानी को पसंद नहीं करती थी)। विवेक और ईशानी के बीच विवाह-पूर्व एक सख्त प्री-नेपुटल समझौता हुआ था। सब सोचते थे कि उस समझौते के कारण ईशानी को तलाक मेँ कुछ नहीं मिला, लेकिन मैं जानती थी कि ईशानी विवेक से कुछ भी लेने को तैयार नहीं थी। "यह पैसा गंदा पैसा है, प्रियंका” उसने मुझसे कहा था "यह मेरे टूटे हुए दिल के खून से सना है। मुझे इसकी नहीं, अपने परिवार की जरूरत थी, पैसा तो मैं खुद भी कमा सकती हूँ।"
अंशुमन और मेरे बीच भी विवाह-पूर्व एक सख्त प्री-नेपुटल समझौता हुआ था। वह एक धनवान परिवार की पैतृक संपत्ति वाला व्यक्ति था, और मैं गरीबी से आई थी। श्रीमती राव-सिन्हा ने हमेशा मुझसे सख्त नफरत की थी, कुछ साल पहले अपनी अंतिम सांस लेने तक भी। शादी के इतने सालों बाद भी, वह मुझे धन के लालच वाली, सोने की खोज करने वाली, अपने बेटे को झांसा देकर फँसाने वाली और लालची वगैरह कहती रहती थीं, और अंशुमन से बात करते हुए कई बार यह कहती थीं, "बेटा, तुमने उसके साथ शादी कर के गलती की।"
"आप उन्हें कुछ क्यों नहीं कहते?" जब मैं छोटी थी, और हमारी नई-नई शादी हुई थी, तब मैंने कई बार पूछा था, और हर बार अंशुमन ने इस बात को टाल दिया था। "बस इस बात पर ध्यान मत दो। मैंने तुमसे शादी की है, है न? तो समस्या क्या है?"
अपनी सभी कमियों और उनकी नापसंद के बावजूद, अंशुमन की माँ ने मुझे निखारने और आकर्षक बनाने के लिए हर संभव प्रयास किया। मुझे सिखाया कि ऐसे उच्च परिवार की बहू कैसे बनना है। घर कैसे संभालना है, कैसे कपड़े पहनने हैं, कैसे सही फूल और उपहार खरीदने हैं, कैसे पार्टी आयोजित करनी है, कैसे अमीर समाज मेँ उठने बैठने योग्य एक “अच्छी पत्नी” बनना है। शादी के तुरंत बाद ही मैं जुड़वा बच्चों के साथ गर्भवती हो गई थी - और मेरी शादी मेरी हैसियत से कहीं अधिक ऊंचे स्तर पर हुई थी, तो यह सब आसान नहीं था। बच्चों के जन्म के बाद मैंने अपना वजन कम करने के लिए कसरत आदि भी की, और खुद को बच्चों, चैरिटी के काम, पार्टियाँ देने और घर की देखभाल में व्यस्त बनाए रखा। अंशुमन के और उसके उस समाज के लायक पत्नी बनने के लिए मैंने बहुत मेहनत की। मैं अपने प्यारे अंशुमन को निराश नहीं करना चाहती थी।
इस सबके बाद, आज मेरे पति हमारी शादी की बीसवीं सालगिरह को भूल गए थे और आधी रात के बाद घर मेँ घुसते हुए हमारे लिविंग रूम में अपनी युवा सहायक के साथ हंस-हंस कर बातें कर रहे थे, जबकि मैंने अभी-अभी शैंपेन की हजारों रुपए की बोतल अकेले ही खाली की थीं। खैर, कम से कम मुझे शैंपेन तो मिली।
"अरे, बेब, तुम अभी भी जाग रही हो?" कॉल खत्म करने के बाद वह मेरे पास आया। उसने फोन देखते हुए मेरे माथे को चूमा। फिर वह बर्फ की बाल्टी और टेबल सेटिंग, फूलों और टेबल पर रखे हुए उपहार को देख कर एक पल के लिए रुका। वह एक पल के लिए उलझन में लग रहा था, और फिर उसे समझ में आ गया। मैंने उसके चेहरे पर इसे होते हुए देखा। उसे यकीन नहीं हो रहा था कि वह फिर से भूल गया है। भूल जाने के लिए खुद पर गुस्सा, और उसे याद न दिलाने के लिए मुझ पर गुस्सा भी। और फिर इस भूल को सही करने की ज़रूरत। यह सब उसके चेहरे पर बदलता हुआ दिख रहा था। मेरा प्यारा अंशुमन, जो हमेशा सही काम करना चाहता है।
"बेब, मैं बिल्कुल भूल गया था - मुझे बहुत खेद है।"
मैं उठ कर खड़ी हो गई, एक अच्छी पत्नी की तरह। घंटों के इंतजार के बाद मेरी मांसपेशियां अकड़ गई थीं, और हिलने पर विरोध में चीख रही थीं। "कोई बात नहीं, अंशुमन। क्या तुमने खाना खाया है?" देखिए, श्रीमती राव-सिन्हा, मैं कितनी अच्छी पत्नी हूँ। मेरे पति हमारी सालगिरह भूल गए, और मैं पूछ रही हूँ कि क्या उन्होंने खाना खाया है। मैंने मन मेँ अपनी सासु-माँ से कहा। बात यह थी कि मैं क्रोध से आगे निकल चुकी थी, अपने दर्द से, अपने दुख से आगे निकल चुकी थी। ऐसा नहीं था कि मैं अंशुमन के अचानक अपने आप ही अखिल भारतीय सर्वश्रेष्ठ पति बन जाने का इंतज़ार कर रही थी। अरे नहीं! मैंने उसे कई बार यह बताने की कोशिश की थी कि उसे मेरे लिए जगह बनाने की ज़रूरत है, मुझे अपने पति की ज़रूरत है। लेकिन मुझे नहीं लगता कि मेरी बात कभी भी उस तक पहुँची थी।
एक पिता के रूप में अंशुमन बेदाग़ था। उसने कभी भी बच्चों के स्कूल का कोई कार्यक्रम मिस नहीं किया। जब भी दोनों जुड़वाँ बच्चों को उनकी ज़रूरत होती, वे हमेशा मौजूद रहता। वे तीनों बहुत करीब थे, और जैसे-जैसे बच्चे बड़े होते गए, मैं किसी तरह अपने ही परिवार में बाहरी व्यक्ति बनती चली गई, जैसे वे तीन एक परिवार हों और मैं सिर्फ घर सम्हालने वाली भर हूँ। मैं जानती थी कि वे तीनों ही मुझे नीची नजर से देखते थे क्योंकि मैं अंशुमन की तरह बुद्धिमान या उच्च-शिक्षित नहीं थी।
मेरे बुक क्लब की नवीनतम पुस्तक नोरा रॉबर्ट्स की एक रोमांटिक थ्रिलर थी, जबकि अंशुमन और बच्चे “डेरिडा” नामक किसी फ्रांसीसी व्यक्ति के बारे में चर्चा कर रहे होते थे। वे सभी अच्छे विश्वविद्यालयों से डिग्री प्राप्त कर रहे थे या कर चुके थे - जबकि मैं सरकारी कॉलेज मेँ पढ़ी थी। शादी के समय मैंने सोचा था एक साल के बाद वापस पढ़ने जाऊँगी। लेकिन जुड़वां बच्चों के साथ गर्भवती होने पर सरकारी कॉलेज से भी बाहर हो गई थी। मैंने जो पाठ्य-क्रम शुरू किया था उसे पूरा करने के लिए मैं कभी वापस नहीं गई। जैसा कि अंशुमन की माँ ने मुझसे कहा, "गर्भवती होने से तो तुम सोने के कुण्ड में गिर गई हो, लड़की; अब क्या और क्यों पढ़ोगी? तुम्हें अपने जीवन में एक दिन भी काम करने की ज़रूरत नहीं है। यह गर्भ नहीं होता तो दो साल के अंदर ही अंदर अंशुमन के सर से प्यार का भूत उतर जाता और वह तुम्हें तलाक दे देता। लेकिन ये दोनों बच्चे तो हमारे परिवार के हैं और तुम उनकी माँ होगी, इसलिए अब वह बेचारा तुमसे छुटकारा भी नहीं पा सकेगा।"
उन्होंने कहा था मुझे एक दिन भी काम करने की जरूरत नहीं है, लेकिन मैंने अपने जीवन के हर दिन कड़ी मेहनत से काम किया था। कड़ी मेहनत! नौकरी भले ही न की हो, पढ़ाई भले न पूरी हुई हो, लेकिन मेहनत? अपनी क्रूर सास, देवरानी और ननद के हर दिन के ताने और अपने पति की अरुचि और लापरवाही को हर दिन मुस्करा कर सहते हुए भी मैंने अपने बच्चों को खुशनुमा संसार और परवरिश दी थी।
"हाँ, मैं खाकर आया हूँ। प्रियंका, बेब, मैं सच में शर्मिंदा —" मैंने उसे देखकर मुस्कराई। अब मैं उसे वह सब दिखाने में माहिर हो गई थी जो वह देखना चाहता था। "कोई बात नहीं।"
"हमारे सामने एक व्यापारिक संकट था और—" मैं पंजों पर ऊंची उठी और उसका गाल चूमा। पहले मुझे अच्छा लगता था कि वह मुझसे एक फुट लंबा था, बहुत रोमांटिक लगता था। लेकिन अब? अब यह उसे ज़्यादा अप्राप्य बना देता है। ऊंची एड़ी के जूते पहनती काव्या, पाँच फुट नौ इंच की होती थी, मेरे पाँच फुट पाँच इंच के मुकाबले यह ऊंचाई तो एक मॉडल की तरह लगती थी। "मैं सोने जा रही हूँ। शुभ रात्रि, प्रिय अंशुमन।"
उसने फिर से मेरे माथे को चूमा। मेरे मुंह को नहीं, जैसा कि वह पहले करता था। क्या वह मुझे धोखा दे रहा था? आखिरी बार हमने कब सेक्स किया था? तीन… नहीं चार महीने पहले? या पाँच महीने पहले? जब आपको याद भी नहीं रहता, तो आपको पता चल जाता था कि आपकी शादी मुश्किल में है। जैसे एक सीरियल में नायिका की सास ने कहा था जब शादी चट्टानों पर होती है, तो जोड़े के बिस्तर में बर्फ जमी होती है। "काश मैं तुम्हारे साथ सोने आ पाता, लेकिन मुझे सुबह होने वाली बैठक के लिए कुछ काम निपटाने हैं," उसने माफी मांगी। "कोई बात नहीं। तुम काम निपटा लो और थोड़ा आराम भी कर लो।"
आजकल अंशुमन अपने कार्यालय में देर तक काम करता था, और फिर अतिथि कक्ष में सो जाता था। उसका बहाना होता था "मैं तुम्हें जगाना नहीं चाहता था, बेबी।" सुबह मेरे जागने से पहले ही वह चला जाता था। मैं बिस्तर पर लेट गई और आखिर वह निर्णय ले ही लिया, जो मुझे एक न एक दिन लेना ही था, काश मैं इसे दो साल पहले ले लेती, बच्चों के पढ़ने चले जाने के ठीक बाद।
मैंने श्रेया को मैसेज किया, जो मेरे बचपन की दोस्त है और मेरे झोंपड़ पट्टी के दिनों से ही काम करती आ रही है। अब अपना रिसॉर्ट चलाती है। मैं अक्सर उससे मिलने जाती। पिछले कुछ सालों में तो और भी ज़्यादा, क्योंकि उसे ब्रेस्ट कैंसर का पता चला था। इलाज चल रहा था। श्रेया के बच्चे नहीं थे, और जिस व्यक्ति से उसने दूसरी शादी की थी, उसकी कार दुर्घटना में मृत्यु हो गई थी। उसी ने उसके लिए वह घर छोड़ा था, जिसमें वह अब रहती है। मैं उसके कीमोथेरेपी के दौरान उसके साथ थी, और जब वह ठीक हो गई तो हम दोनों ने जश्न मनाया। अब, दो साल बाद, कैंसर फिर से पलट कर वापस लौट आया था, और डॉक्टरों ने उसे कुछ महीने, ज्यादा हुआ तो एक साल, का समय दिया था। कुछ महीने पहले जब उसने मुझे बताया, तो मेरे भविष्य की योजना बनने लगी।
मैं: श्रेया, मैं कल तक वहाँ पहुँच जाऊँगी।
श्रेया: तो अब आखिर तुम आखिर यह कर ही रही हो?
मैं: हाँ ।
श्रेया: क्या तुमने उसे बताया है?
मैं: नहीं, मैं उसके लिए एक नोट छोड़ दूँगी।
श्रेया: क्या इस तरह बताना ठीक है? सामने क्यों नहीं बता देती?
मैं: मुझे नहीं लगता कि उसे कोई परवाह होगी।
श्रेया: तुम जानती ही हो, यहाँ तुम्हारा हमेशा स्वागत है, जब चाहे आ जाओ।
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