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मंगलवार, 4 अप्रैल 2017

पूर्वाग्रह २ : पहचान और निर्णय

पूर्वाग्रह भाग  देखें 

पिछले भाग में मैंने (लेख और टिप्पणियों के discussion में) कहने की कोशिश की - कि 

१. शब्द जो छवि बनाते हैं हमारे मन मस्तिष्क में - उसमे से कुछ भाषाज्ञान है, और कुछ पूर्वाग्रह | 

२, आम - फल है | किन्तु - कैसा है ? यह हर वह व्यक्ति बता सकता है - जिसने आम खाया है (समझाना तो मेरे बस का नहीं है) यह भाषाज्ञान है |


३.  मैंने यह भी कहा ( पोस्ट में भी और टिप्पणियों में भी ) कि यह पोस्ट मैं सिर्फ हमारी (मनुष्यों की) मानसिक प्रक्रियाओं पर concentrate कर के नहीं लिख रही हूँ, बल्कि ये मानसिक प्रक्रियाएं सिर्फ एक background हैं - आगे मैं natural neurons , artificial neurons और artificial neural networks पर बात करने वाली हूँ | 
अब - आगे ....
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पहली बात तो यह कि आम पीला है - यह हमारी सोच प्रक्रिया में बना हुआ एक पूर्वाग्रह है | कृपया यह न सोचें कि मैं पूर्वाग्रह की निंदा कर रही हूँ - नहीं तो आगे जो बातें होनी हैं - वे इस निंदा की image [ पूर्वाग्रह में प्रति पूर्वाग्रह ? ... :) ] की ही वजह से निरर्थक हो जायेंगी | इस पोस्ट के सन्दर्भों में पूर्वाग्रह निंदनीय नहीं है - यह अक्सर सहायक है सही पहचान के लिए | यदि यह अड़चन बनने लगता है - तो धीरे धीरे यह ( हमारी मानसिक प्रक्रियाओं के द्वारा ) बदल भी जाता है | हर आम तो पीला नहीं होता ( दसहरी , लंगड़ा हरे आम हैं ) - फिर भी यह बात तो है ही कि आम सुन कर पीला फल ही मन में उभरता है | इससे उलट - यदि गर्मियों के मौसम में दूर से फल का ठेला दिखे - तो यदि उस पर पीले फल दिख रहे हों - तो आम ही लगते हैं |  

यह ऊपर - दो अलग बातें है - 

(अ) आम पीले होते हैं - यह छवि - "cognition " कहलाती है हमारी इलेक्ट्रोनिक की इमेज प्रोसेसिंग की भाषा में | 
(ब) ठेले पर जब दूर से पीले फल दिख रहे हों - तो वह आम का ठेला है - यह "recognition " कहलाता है | 

जब cognition होता है - तब हम मशीन को सिखाते हैं कि किस वस्तु (label) के साथ क्या properties associate की जाएँ | इसी तरह - छोटे बच्चे को हम सिखाते हैं - अ- अनार का ; आ - आम का - और उस पुस्तक में अनार और आम की छवि होती है | लेकिन न हम उसे अनार सिखा रहे थे, न आम, हम तो उसे सिखा रहे थे कि यह जो अक्षर लिखा है किताब में - इसे बोला किस तरह से जाता है | इसके उलट - यह जो हम बोल रहे हैं "अ", "आ" इसे लिखा कैसे जाए |


अब समझें - दो प्रकार के factors हैं, जो हमारे निर्णय को प्रभावित करते हैं (उदाहरण के लिए - यह चीज़ / व्यक्ति मुझे पसंद आएगा / नापसंद / या न्यूट्रल ? ) ............ अब जैसे - किसी को आम पसंद है / किसी को नहीं | तो उसी एक फल को देख कर पहली बात तो यह कि - कोई पहचानेगा कि यह आम है, कोई नहीं पहचानेगा | ............ इसके आगे - किसी के मन में पसंद की भावना होगी - किसी के मन में नापसंदगी की | 


अ) एक - तत्काल अभी उस से क्या input आ रहा है ? (जो सामने फल है - यह आम है या नहीं इसे पहचानने के लिए उसका रंग, रूप. आदि )
बी) और दूसरा - लॉन्ग टर्म में मैंने उसके बारे में क्या जाना है | ( मीठा ? खट्टा ? रसीला ? नर्म ? सख्त ? )


तत्काल अभी आए inputs को weigh कर के जो असर होता है - वह एक sum बनाता है | इसमें पहले के अनुभव से आये bias को जोड़ा जात है | तब - इस मिले जोड़ के आधार पर - निश्चय लिया जाता है |

अब आगे बढ़ते हैं - neuron की ओर - कि वह कैसे decision लेता है कि किस वस्तु को किस category में रखा जाए | हमारे शरीर में एक nervous system है , जिसके हिस्से हैं nerves , spinal chord और brain | ये सब नयूरोंस पर बने हैं | ये नन्हे नयूरोंस करोड़ों की संख्या में हैं - और इनकी कई शाखाएं एक दुसरे से जुडी हैं | ये जुडी हुई शाखाएं एक से दुसरे को chemicals के exchange द्वारा सन्देश देती हैं | 


शरीर का एक प्राकृतिक neuron हमारे engineers द्वार बनाए artificial neuron से बहुत अधिक advanced है     


- किन्तु उसी को समझ कर और उसकी working को कॉपी कर के ही हम artificial neron और neural network बनाते हैं | इन नयूरोंस पर बात होगी अगले अंक में - कि  कैसे बनते और कार्य करते हैं | 


और एक ध्यान देने वाली बात है कि - जिस computer पर हम अभी बैठे हैं , वह हमारे nervous system से बहुत पिछड़ा हुआ है | एक तो वह अपने आप कुछ सोच नहीं पाता - उसे हर काम करना सिखाना पड़ता है | दूसरे - वह intellegent  नहीं है | यदि उसे (कंप्यूटर को) हम neural network दें भी - तब भी अभी बहुत दूर है वह दिन जब इसकी intellegence एक चमगादड़ की intellegence से भी मुकाबला कर सके, मानव दिमाग तो और दूर है अभी |


 अब सोचिये - बटन भर के दिमाग से चमगादड़ - ultrasound sonar से अपने आसपास की चीज़ें न सिर्फ दूरी और दिशा के लिए sense कर लेगा, बल्कि उसका आकर भी जान लेगा | यह भी decide कर लेगा कि यह चीज़ मुझसे कितनी बड़ी / छोटी है - अर्थात यह decision कि इस पर झपट्टा मार कर इसे खाना है - या इससे बच कर भागना है :) | यही करने में हमारे highly modern sonars को उस बटन भर के दिमाग वाले प्राणी से हज़ारों गुना समय लग जाता है |


तो क्या artificial neuron slow हैं ???
 नहीं
ये हमारे दिमाग से तेज़ हैं, हमारे दिमाग के neurons की typical स्पीड मिली सेकण्ड में है जबकि आपके कंप्यूटर kee nanosecond में | 
फिर ??


फर्क है - energy  efficiency में | जहां दिमाग के natural neurons बहुत कम गर्म होते हैं (ऊर्जा का waste ) तो दिमाग में कई neuron एक साथ काम कर सकते हैं, वहीँ हमारे कंप्यूटर का जो दिमाग है - वह processor chip है तो तेज़, किन्तु energy efficiency कम है - तो कम parallel काम हो सकते हैं, यह गर्म हो जायेगी | शायद आप जानते ही हैं कि pentium chip - mounted पंखे के साथ ही आती है - उसे ठंडा रखने के लिए | :) | [
 जब हम लोग lab में कोई experiment करते हैं - तो breadboard पर circuit बनाते हैं - जिसमे IC chips लगी होती हैं | कभी गलती से कोई IC छू जाए - तो हाथ वैसे ही जलता है जैसे रोटी बनाते हुए तवा छू जाने से :) ]
........... लेकिन हमारा दिमाग आखिरी बार कब गर्म महसूस हुआ था ?? जब हम अपने पिछले exam की तैयारी में जुटे हुए १ महीने की पढ़ाई १ घंटे में करने का प्रयास कर रहे थे ? :) तो - अधिक न्यूरोन काम कर रहे थे न तब ? वह भी हल्का गर्म, तवे जैसा नहीं - क्योंकि हमारे रक्त का बहाव coolant  का काम करता है - तो उतनी heating dissipate हो जाती है | यही फर्क है हमारे दिमाग और processor के दिमाग में लगे नयूरोंस की efficiency में - कि वे उतना काम एक साथ नहीं कर सकते जितना हम | 


आगे अगले भाग में ..................

17 टिप्‍पणियां:

  1. poorvagrah par aapke dono article padhi. bahut achchha likhi hain. tathyapurn vishleshanaatmak vyaakhya hai. bahut achchhi jaakari ke dene ke liye dhanyawaad.

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  2. बहुत रोचक आलेख| अगली कड़ी का इंतज़ार है|

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  3. दोनों पोस्ट बुकमार्क करके रखी थी कि इत्मीनान से पढूंगी...
    बहुत ही रोचक विश्लेषण किया है...आनंद आ रहा है...
    अगली कड़ियों का इंतज़ार

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  4. here here - http://shilpamehta1.blogspot.com/2011/11/ramayan15.html (ahalya - you have already read it rakesh bhaiya)

    but why ? :)
    pls clik ramayana tab for it - all posts links are there

    14-B (published) and 14-c (still unpublished) are about side stories. I thought i would give side stories tags like a, b, c from now on :) , to enable people to choose to leave them aside while reading the series of the poetry, if they want to concentrate only on the main story .... many people (including myself) don't have an inclination to read them :)

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  5. एक रोचक वैचारिक जानकारीपरक आलेख ...भाषा,साहित्य और विज्ञान का आमेलन....नाम और रूपाकार के संपृक्तता के अर्थबोध को विश्लेषित किया है आपने ....
    एक अज्ञानता भरा मासूम सा सवाल -सही शब्द पूर्वग्रह है या पूर्वाग्रह ?

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  6. @ arvind mishra sir -
    मेरे हिसाब से तो पूर्वाग्रह ही होना चाहिए - पूर्व + आग्रह = पहले से बनी धारणा ?
    google tralnslate - bias =
    पूर्वाग्रह, झुकाव, अभिनति, मति
    noun
    पक्षपात, ढाल, ढलान
    verb
    पक्षपातपूर्ण बनाना, झुकाना
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    @ Dr. Shabnam ji - thanks :)
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    @ Smart Indian ji - thanks - I will try my best to keep it interesting, though i ma not sure how well i will be able to present it because it is a highly technical topic, and i can't use the technical examples to clarify it here :( ... that's the reason why the series is slow....
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    @ rashmi - thanks yaar - aaram se padho :) kahin gadbadi ho to batana :)

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  7. Rochak post .... Is ko padhne ke liye vigyaan ki jaankari ho to aur Bhi dilchasp post ho jaaygi ...

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  8. फ़िलहाल तो पढ़ रहे है और ठीक से समझने का प्रयास कर रहे है टिपण्णी के रूप में अभी कहने के लिए कुछ नहीं है |
    आप की पोस्ट खोलने पर टिप्पणिया नहीं खुलती है जिससे टिप्पणी पढ़ने से पाठक वंचित रहा जाता है पिछली पोस्ट पर मुझे लगा की आप ने टिप्पणी विकल्प बंद कर दिया है | यदि आप के लिए संभव है तो इसमे बदलाव कर दे पोस्ट के साथ टिप्पणिया भी निचे दिख जाये तो पाठको को और आसानी होगी |

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    1. मुझे भी लगा शायद पहले के आलेख है अतः टिप्पणीयां बंद है।

      खैर यह दोनो ज्ञानवर्धक आलेख पहले पढ़े हुए है, अगली कडी का इन्तजार!!

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  9. बहुत रोचक जानकारी..आभार !

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  10. अब पढ़ पाई हूं ये ...लेकिन अच्छा लग रहा है पढ़ने मे मन भी लगा....:-)

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