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रविवार, 12 अगस्त 2012

हिन्दू और हिन्दुइज्म - अक्सर पूछे जाने वाले कुछ सवाल

कई दिनों से मन में एक बात चल रही है, सो यह पोस्ट लिख रही हूँ |

जन्माष्टमी के दिन कई सारे विद्वानों के ब्लोग्स पर कई सारी पोस्ट्स पढ़ीं | इससे पहले भी कई कवितायेँ, कई लेख पढ़ती आई हूँ कृष्ण पर, महाभारत पर, मानस पर, राम पर, सीता पर ... |

कोई कृष्ण और राम को महान या असाधारण गुणों से युक्त मानव के रूप में दर्शाती हैं, जिन्होंने अपने सामर्थ्य और समझ के अनुसार धर्म स्थापना की | 

कोई उन्हें स्वार्थी शक्तिकेंद्रों के रूप में - जिन्होंने अपनी धर्म की परिभाषा निरीह जनता और आने वाली पीढ़ियों पर थोप दी | 

कोई तो खुले शब्दों में उनके चरित्र पर प्रश्न उठाती हैं, और कोई दबे ढंके शब्दों में | 

एक बहुत बड़ी संख्या में ऐसे भी व्यक्ति हैं, जो अपने आप को "हिंदुत्व" का रक्षक मानते और दर्शाते है, किन्तु वे भी "pick and choose" करते हैं - वे कहते हैं - मैं हिन्दू हूँ, राम / कृष्ण को भगवान के अवतार मानता हूँ - लेकिन ...

एक बहुत बड़ी संख्या में पोस्ट्स हैं जो "कृष्ण" की रासलीला / कई गोपियों से प्रेम / गोपियों के वस्त्रहरण / राधा से धोखा / अनेक स्त्रियों से दाम्पत्य सम्बन्ध आदि पर कई प्रश्न उठाती हैं |

इसी तरह से "राम" पर जो प्रश्न उठाये जाते हैं उनमे मुख्य हैं बाली को छिप कर मारना / सीता की अग्निपरीक्षा / सीता को गर्भिणी स्थिति में वनवास / लव कुश के बारे में जान लेने के बाद भी प्रश्न |

यह सब कई जगह कई तरह से लिखा जाता है | इनमे से हर प्रश्न के उत्तर हैं, दिए भी जाते हैं, किन्तु प्रश्न फिर भी हैं | उत्तर मेरे पास भी हैं, लेकिन यहाँ मैं प्रश्नों के समाधानों की बात ले कर नहीं आयी हूँ | यह पोस्ट मैं उत्तरों पर नहीं, तर्कों पर नहीं, बल्कि प्रश्नों पर लिख रही हूँ |

लिखने वाले विद्वान् /विदुषी जन अपनी अपनी व्याख्याएं लिखते हैं, इन सभी "पात्रों" की विचारधारा / उनके किये कर्मों को अपने अपने हिसाब से परिभाषित करते हुए | कुछ प्रश्न हैं मन में - कुछ सहमतियाँ तो कुछ असहमतियां हैं | इस पर चर्चा करना चाहती हूँ | पाठकों को अनुचित लगती हो मेरी बात, तो उनकी आपत्ति सर माथे पर |

यदि आप यह पोस्ट पढ़ कर यह कहना चाहें कि इस तरह की अवैज्ञानिक सोच रखने के कारण , मैं गंवार हूँ / अन्धविश्वासी हूँ - और अनपढ़ हूँ आदि आदि - तो ये सब आक्षेप मुझे स्वीकार्य होंगे | लेकिन मैं अपनी बात कहना चाहूंगी अवश्य |  जो अपील मैं कर रही हूँ, यह सिर्फ हिन्दू धर्म के अनुयायियों से एक चर्चा या अपील है |
(अंशुमाला जी और रचना जी के कमेंट्स के सन्दर्भ में यहाँ सुधार कर रही हूँ - यह पोस्ट सभी के लिए है, किन्तु इसमें मैंने जो अपील की है - वह सिर्फ  limited audience के लिए है)

जब हम छोटे थे, शायद हम से पहले के जनरेशंस में भी, बचपन से हम यह मानते थे कि श्री राम, श्री कृष्ण, माँ सीता, माँ राधा, ... ये कुछ ऐसे नाम थे जिन्हें श्रद्धेय और पूज्य माना जाता था | इसमें कोई प्रश्न नहीं उठाये जाते थे, न उनके चरित्र की लीलाओं में बाल की खाल निकाली जाती थे | हम मानते थे कि वे इश्वर हैं , और यदि इश्वर हैं तो, वे जो भी कर रहे हैं, उसके पीछे दिव्य कारण होंगे । जो बातें हमें समझ आ जाते थी, वे ठीक, और जो हमें अपने हिसाब से सही नहीं भी लगती हों, वे भी स्वीकार ली जाती थीं |

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फिर हम बड़े हो गए, समझदार हो गए | पढ़े लिखे विद्वान् विदुषी जन हो गए | अब हम उन बातों को स्वीकार नहीं पाए क्योंकि वह निश्छल प्रेम भक्ति नहीं रही | अब तीन या चार ऑप्शन थे हमारे पास |

१. या तो हम "श्रद्धा" रखें, और यह माने कि नहीं - हमारी परिभाषाएं यदि इश्वर को गलत बताएं, तो परिभाषाएं गलत होंगी, क्योंकि यदि वे इश्वर हैं तो वे गलती नहीं कर सकते |

२. या तो हम मान लें कि वे इश्वर के "अवतार" नहीं, शक्तिशाली ऐतिहासिक मानव भर थे, जिन्होंने यदि ५० अच्छाइयां कीं, तो १ बुराई भी | यदि उन्होंने 100 अच्छे काम किये तो 2-3 बुरे भी । लेकिन, यदि हम ऐसा मानें, तो हमें स्वीकार करना होगा कि हमारे शास्त्र झूठे हैं, क्योंकि शास्त्र इन्हें इश्वर के अवतार ही बताते हैं, वह भी इनके आगमन से पहले ही इनकी पूर्वसूचना देते हुए | शास्त्रों में से pick and choose नहीं किया जा सकता न ?

३. या फिर यह मान लें कि इश्वर कोई होता ही नहीं, दुनिया अपने आप ही बनती बिगडती रहती है | यदि हम ऐसा मानते हैं, तब तो हमें अपने आप को "हिन्दू" या "ब्राह्मण" नहीं कहना चाहिए, बल्कि खुले रूप से स्वीकार लेना चाहिए कि नहीं - हमें इश्वर के अस्तित्व पर विश्वास नहीं | यह कहने वाले लोगों का मैं सम्मान करती हूँ, कम से कम उनमे हिम्मत है साफ़ तौर पर अपनी स्थिति साफ़ करने की |

४. लेकिन सबसे ज्यादा जो ऑप्शन चुना गया देख रही हूँ, वह यह है कि - हम अपने को हिन्दू भी कहेंगे | शास्त्रों को मानने वाला भी कहेंगे | राम और कृष्ण को अवतार मानते हुए अपने घर में सारी प्रार्थनाएं भी करेंगे, उनके चित्र अपने घर के "मंदिर" कहलाने वाली जगह पर भी रखेंगे और अगरबत्ती भी घुमाएंगे, उनसे अपने promotions और घर के लोगों की स्वास्थय सम्बन्धी या अन्य परेशानियों से हमें निजात दिलाने को 101 रुपये के प्रसाद की घूस भी offer करेंगे | हम रामायण का परायण भी करेंगे और अदालतों में गीता जी की कसमें भी खायेंगे | लेकिन, जब हम ब्लॉग पर आयेंगे, या "पढ़े लिखे समझदार reasonable लोगों के बीच बैठेंगे - तो हम ऐसा दर्शाएंगे कि जी हम तो बिलकुल "दकियानूसी" नहीं हैं |

** हिन्दू हैं, लेकिन नासमझ हिन्दू नहीं | हम जानते हैं कि राम और कृष्ण कोई अवतार वगैरह नहीं थे - वे बस असामान्य रूप से gifted पुरुष भर थे |

** सीता बस रावण के genetic / test tube experiment से उपजी एक टेस्ट ट्यूब बेबी थी |

** कृष्ण एक lover बॉय थे जो राधा (lover girl ) से प्रेम का नाटक कर उसे छोड़ गए |

** सीता को राम से (इसी तर्ज पर राधा को कृष्ण से आदि )बड़ी शिकायतें थीं जो इतिहास की पुस्तकों में "पुरुष वादियों "" ने दबा दीं |

** तुलसी बस एक पत्नी से खार खाए, पुरुष अहंकार के मारे व्यक्ति भर थे, जिन्होंने जहाँ तहां स्त्रियों के लिए जाने क्या क्या लिखा ... 

और भी ऐसी ही कई "modern " विचारधारा की बातें |

short में - हमें अपने हिन्दू होने का , अपने विश्वासों को खुले रूप से स्वीकार करने का अर्थ, अपनी तौहीन लगने लगा है | हमें शर्म महसूस होती है यह कहने में कि - हाँ - मुझे विश्वास है कि मेरे धर्म के अनुसार मैं जो मंदिर जाता हूँ / राम आदि को इश्वर मानता हूँ, मूर्ती की पूजा करता हूँ, इस सब में मुझे विश्वास है | हम यह दर्शाते हैं कि "यह सब मैं सिर्फ "परम्परा " के चलते कर तो रहा हूँ, किन्तु मैं एक modern पढ़ा लिखा व्यक्ति हूँ - जो मन में तो जानता ही है कि यह सब मूर्खतापूर्ण है |

इससे अधिक दर्दनाक ( और खतरनाक ) बात तो यह कि - हम स्वयं तो खैर यह सब कह ही रहे हैं - लेकिन इसके साथ ही हमने एक ऐसा "modern " माहौल बना लिया है अपने आस पास, कि कोई यदि रोज़ मंदिर जाना चाहता है, राम को इश्वर मानना चाहता / ती है - तो उसे भी हमने इतना डरा दिया है कि वह भी यह कहने से पहले दस बार सोचे कि ऐसा कहूं / करूँ या न कहूं | एक ज़माना था जब सब आस्तिक थे और कोई एकाध व्यक्ति नास्तिक - तो वह बेचारा दूसरों के डर के मारे दर्शाता था कि वह भी आस्तिक है | आज की स्थिति इससे उलटी है - वह अकेला यह स्वीकारने में भयभीत है कि हाँ, मैं आस्तिक हूँ, मैं राम को ईश्वर मानता हूँ | दोनों ही स्थितियां बराबर रूप से गलत हैं - व्यक्ति की निजी विचारधारा यदि डर से भीतर दबा दी जानी पड़े - तो यह कोई अच्छी स्थिति नहीं है |
कुछ दिन पहले स्मार्ट इन्डियन जी के ब्लॉग पर एक पुराना लेख "यह लेखक बेचारा क्या करे? " पढ़ा, जिसमे उन्होंने कहा कि "नास्तिक हूँ परन्तु नास्तिक और धर्म-विरोधी का अंतर देख सकता हूँ. मुझे दूसरों के धर्म या आस्था को गाली देने की कोई ज़रुरत नहीं लगती है" यह ideal situation होगी कि सभी के साथ ऐसी ही स्थिति रहे | ..... किन्तु सब उतनी हिम्मत लेकर नहीं आये हैं | सब धारा के विरुद्ध तैरने का साहस नहीं रखते | हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि खुद हम कहीं ऐसा माहौल तो नहीं बना रहे कि, अपने ही धर्म के अनुयायियों को, अपने विश्वास सार्वजनिक रूप से स्वीकारने में डर लगे ?
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मैं यह पूछना चाहूंगी - सभी से - उत्तर मुझे नहीं अपने आप को ही दीजियेगा |

यदि हम इतने ही modern हैं, तो फिर हमें क्या तकलीफ है यदि "हिन्दू" संस्कृति ख़त्म हो रही है ? क्यों हम  श्रावण सोमवार / जन्माष्टमी / गणेशोत्सव / नवरात्रि / दशहरा / दीवाली आदि मानते हैं ? यदि सिर्फ राम के अयोध्या लौटने की ख़ुशी में दीवाली मन रही है - तो ऐसा क्या है सिर्फ (एक असाधारण रूप से गिफ्टेड) राजा के लौटने में जिसे हजारों साल बाद मनाया जाए ? यदि ऐसा नहीं है, हम सच ही मानते हैं कि वे अवतार हैं - तो फिर यह modern होने और उन्हें सिर्फ पुरुष कहने का दिखावा क्यों ?

मेरा मानना है कि यह जो हम कहते हैं कि हिन्दू धर्म को "conversion " आदि ने नुकसान पहुँचाया है - यह हमारे अपनी responsibility को दूसरों पर थोपने के आलावा और कुछ नहीं है | hinduism को यदि किसी ने नुकसान पहुंचाया है - तो वह हैं हम खुद |

** इस्लाम में प्रवेश का पहला वाक्य है "सिर्फ एक अल्लाह हैं - और कोई नहीं, कोई नहीं, कोई नहीं - और मुहम्मद उस एक अल्लाह के पैगम्बर हैं" मैंने आज तक कोई एक भी इस्लामी व्यक्ति नहीं देखा जो खुद को "modern " दर्शाने के लिए इस बात पर लेशमात्र भी संदेह दिखाए |

** क्रिस्चियानिती का मानना है कि "प्रभु एक हैं | जीज़स उनके पुत्र हैं, जिन्होंने हम मनुष्यों के पापों से हमें छुडवाने के लिए सूली पर अपनी प्राण दी " - मैंने आजतक एक भी क्रिस्चियन को इस पर शक शुबहा दिखाते नहीं देखा |

** कोई सिख यदि ग्रन्थ साहब के आदेशों के पालन में कोई गलती कर देता है - तो गुरूद्वारे में जा कर अपनी सेवा पश्चात्ताप के रूप में करता है | बड़े बड़े ओहदे पर बैठे व्यक्ति भी वहां जाकर जूते तक साफ़ करने की सेवा, झाडू लगाने की सेवा देते हैं |

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सिर्फ हम ही ऐसे हैं, जो अपने ही विश्वासों पर हमेशा डांवाडोल होते रहते हैं | चारदीवारी के भीतर तो सब ठीक है - लेकिन सामाजिक रूप से हमें अपने विश्वासों को स्वीकारने में शर्म आती है | सार्वजनिक मंच पर हम "समझदार" हो जाते हैं जिनके लिए हमारे अवतार सिर्फ स्त्री पुरुष रह जाते हैं, और लक्ष्मी जी चंचला धन की देवी | ऐसा क्यों ????

आपको शायद याद हो - मैंने न्यूरल नेटवर्क्स पर एक श्रंखला शुरू की थी - जिसमे मैंने पूर्वाग्रह पर बातचीत शुरू की थी | न्यूरल नेटवर्क हमारे सोचने / समझने / निर्णय लेने के तरीकों को copy करते हैं | उस में हम पढ़ते हैं कि न्यूरल नेटवर्क को अपनी पुरानी सीखी हुई बातें भुलाने का सबसे efficient तरीका है उसे लगातार यह कहते रहना कि उसने जो निर्णय लिया, जिसे जैसा समझा - वह गलत है | सही है उसका उल्टा | और धीरे धीरे वह न्यूरल नेटवर्क उससे उलट सोचना सीख जाएगा | यही हो रहा है हमारे साथ | यदि हम सच ही आज यह मानने लगे हैं कि our beliefs are flawed, आज हमें यदि अपने विश्वासों को स्वीकारने में शर्म आ रही है - तो यही अनिश्चितता कई गुना बढ़ा कर अगली पीढ़ी को देंगे हम, और २-३ पीढ़ियों में हम वह कर देंगे जो हमलावरों की कई पीढियां न कर सकीं | वह है - हिन्दू विश्वासों का पूरी तरह अंत |

अगली बार हमारे आराध्यों को सिर्फ युगपुरुष या साधारण स्त्री भर के रूप में सार्वजनिक मंच पर कहने , बल्कि कहने नहीं - हमेशा के लिए इस इन्तेर्नेट ब्लॉग के शिलालेख पर लिख देने से पहले सोचिये - क्या हम यही लिखना चाह रहे हैं ? क्या सच ही ऐसा है हमारे मन में ? क्या हम चाहते हैं कि हमारी अगली पीढ़ी हमारे आराध्यों को बस ऐसा ही सोचे कि वे युगपुरुष हैं ?

भगवद गीता से कहती हूँ - जब अर्जुन कृष्ण के सूर्य से पहले होने पर यह कह कर शंका जाहिर करते हैं कि आप तो अभी जन्मे हैं और सूर्य पुराने हैं तो कृष्ण कहते हैं :

मैं साधारण प्राणियों की तरह जन्म बंधन में / अज्ञान में नहीं, बल्कि अपनी मर्ज़ी से, किसी उद्देश्य को लेकर, अपनी प्रकृति को अपने अधीन कर कर जन्म लेता हूँ | जो मेरी दिव्यता को जानते हुए मुझमे शरणागत होते हैं, वे मुझे प्राप्त होते हैं | मैं इस संसार का रचयिता हूँ | मुझे कर्म affect नहीं करते - क्योंकि मैं उनमे लिप्त नहीं |

आगे यह भी कहा गया कि मैं तो अपनी दिव्यता को अपने अधीन कर के मानव रूप में आता हूँ, किन्तु मूर्ख जन मुझे मानव मात्र मान कर मेरी लीलाओं का (और मेरा) मज़ाक उड़ाते हैं |

क्या हम वैसे ही मूर्ख बनना चाहते हैं अपने आप को अपने आस पास के पढ़े लिखे समाज में समझदार स्थापित करने के लिए ?

65 टिप्‍पणियां:

  1. क़ोई संदेशवाहक खुद ईश्वर नहीं बनता हैं क्युकी ईश्वर भी बिना भक्त के ईश्वर नहीं होता .
    अंधे भक्त संदेशवाहक को ईश्वर बना देते क्युकी ईश्वर को किसी ने देखा ही नहीं ,
    सिवाए हिग्ग्स बोसन के . केवल हिग्ग्स बोसन को वो अंतर दृष्टि मिली जिसके सहारे से उन्होने दुनिया कैसी बनी को खोजा . लोग हिग्ग्स बोसान को वैज्ञानिक मानते हैं , चाहे तो ईश्वर का सन्देश वाहक मान ले . वो आये हैं ईश्वर का ये सन्देश देने की दुनिया का सृजन कैसे हुआ . हिग्ग्स बोसान पार्टिकल से दुनिया बनी हैं आज कहा जा रहा हैं , ईश्वर का सन्देश किस रूप में समझ आता हैं ये भक्त के आ ई क्यू पर निर्भर हैं

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    1. आभार रचना जी
      @ क्युकी ईश्वर भी बिना भक्त के ईश्वर नहीं होता .
      - क्या आपको सच में ऐसा लगता है की बिना भक्त के इश्वर नहीं होते ? तब तो इस पोस्ट की अपील आपके प्रति नहीं है | मैं उनसे अपील कर रही हूँ इस पोस्ट में जो मानते हैं कि इश्वर ने दुनिया बनाई, उनसे नहीं जो मानते हैं कि हम इंसानों ने ही अपने इश्वर को गढ़ा | मुझे उनसे कोई शिकायत नहीं, किन्तु इस पोस्ट के सन्दर्भ अलग हैं |

      @@ अंधे भक्त संदेशवाहक को ईश्वर बना देते क्युकी ईश्वर को किसी ने देखा ही नहीं - पता नहीं ऐसा है या नहीं - i am not sure - शायद ऐसा हो, शायद न हो |

      @@ ईश्वर को किसी ने देखा ही नहीं ,सिवाए हिग्ग्स बोसन के . केवल हिग्ग्स बोसन को वो अंतर दृष्टि मिली....
      hhmmmm.... अब जैसे आपने कहा "हिग्ग्स ... दुनिया बनी है" - क्या आप ऐसा निश्चित तौर पर जानती हैं ? नहीं, हम में से कोई नहीं जानता | it is the latest research , and soon others will follow , नेति नेति नेति नेति ....

      @@ ईश्वर का सन्देश किस रूप में समझ आता हैं ये भक्त के आ ई क्यू पर निर्भर हैं - :) क्या कहूं ?
      मुझे तो लगता है, "पोथी पढ़ पढ़ जग .... ढाई अक्षर प्रेम का पढ़े सो पंडित होय" | मुझे लगता है कि इश्वर को समझने का स्तर आई क्यू पर निर्भर नहीं होता होगा

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    2. क्या आपको सच में ऐसा लगता है की बिना भक्त के इश्वर नहीं होते ? तब तो इस पोस्ट की अपील आपके प्रति नहीं है

      शिल्पा जी
      ईश्वर भी भक्त के बिना ईश्वर नहीं होता
      ये बात आप अगर समझे तो इतना जान ले की हनुमान जैसे भक्त की गुहार तुलसी लगाते थे राम तक अपनी बात कहलाने के किये
      हनुमान बाहुक शायद आप को याद नहीं रहा वरना आप जैसी हिन्दू धर्म की गुहरिका ऐसा नहीं कहती
      बालपने सूधे मन राम सनमुख भयो, राम नाम लेत माँगि खात टूकटाक हौं ।
      परयो लोक-रीति में पुनीत प्रीति राम राय, मोह बस बैठो तोरि तरकि तराक हौं ।।
      खोटे-खोटे आचरन आचरत अपनायो, अंजनी कुमार सोध्यो रामपानि पाक हौं ।
      तुलसी गुसाँई भयो भोंडे दिन भूल गयो, ताको फल पावत निदान परिपाक हौं ।।४०।।

      भावार्थ – मैं बाल्यावस्था से ही सीधे मन से श्रीरामचन्द्रजी के सम्मुख हुआ, मुँह से राम नाम लेता टुकड़ा-टुकड़ी माँगकर खाता था । (फिर युवावस्था में) लोकरीति में पड़कर अज्ञानवश राजा रामचन्द्रजी के चरणों की पवित्र प्रीति को चटपट (संसार में) कूदकर तोड़ बैठा । उस समय, खोटे-खोटे आचरणों को करते हुए मुझे अंजनीकुमार ने अपनाया और रामचन्द्रजी के पुनीत हाथों से मेरा सुधार करवाया । तुलसी गोसाईं हुआ, पिछले खराब दिन भुला दिये, आखिर उसी का फल आज अच्छी तरह पा रहा हूँ ।।४०।।

      हटाएं
    3. रचना जी
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      @ हनुमान बाहुक शायद आप को याद नहीं रहा - याद रहना तो दूर की बात है रचना जी - मैंने तो यह पढ़ा भी नहीं था |बड़ी अल्पज्ञान वाली हूँ | मानस पढ़ती भी हूँ, तो हिंदी ट्रांसलेशन, original भाषा तो मेरी समझ में भी नहीं आती :)
      ----------
      @ वरना आप जैसी हिन्दू धर्म की गुहरिका ऐसा नहीं कहती
      :) गुहारिका ? मैं हूँ ? सच में ? आभार आपका ऐसा मानने के लिए | गौरवान्वित महसूस करती हूँ, किन्तु यह आदर आप मुझे नाहक ही दे रही हैं |

      एक बात अपनी और से साफ कर रही हूँ - @ मैंने सिर्फ यह कहा कि, जो अपील मैं कर रही हूँ, वह अपील आप के लिए नहीं है | पोस्ट सभी के लिए है | यह साफ़ कर देना बड़ा आवश्यक है - न सिर्फ आपको , बल्कि सभी को |
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    4. hindi translation is from wiki so is the original
      respect and respected always
      i do understand your appeal is not a reaction so no issues

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    5. some info on the higs "god" particle can be found here

      http://vigyan.wordpress.com/2013/02/15/higs3/

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  2. कभी मैने भी पढ़ा था
    जो होता हैं वो सब अच्छे के लिये होता हैं
    हम वही करते हैं तो हम से करवाया जाता हैं
    अच्छा या बुरा सब विधि और कर्म से बंधा हैं
    अगर ईश्वर हमारे अच्छे कर्म को के लिये जिम्मेदार हैं
    तो वही हमारे बुरे कर्म के लिये भी जिम्मेदार

    अगर ईश्वर सब जगह व्याप्त हैं तो फिर उसको ही फैसला करने दो की वो किसी को सही मानता हैं , उनको जो महज उसको ईश्वर मान कर खुश हैं या उनको जो ईश्वर को भी इन्सान समझते हैं .
    क़ोई भी ईश्वर बन सकता हैं क्युकी ईश्वर सब के अन्दर ही छुपा हैं , और जब ईश्वर इन्सान का रूप धर कर आते हैं तो उनकी गलतियां भी होती ही होंगी
    अगर कृष्ण अपने से ९ साल बड़ी स्त्री राधा से प्रेम कर सकते हैं और हम उसको सही मान सकते हैं तो फिर क़ोई भी स्त्री अपने से ९ साल छोटे व्यक्ति से प्रेम करने पर दोषी क्यूँ बनती हैं , इस लिये बनती हैं क्युकी उसने ईश्वर की माया से सीख ही नहीं ली थी .
    उसी प्रकार से अगर राम , सीता का त्याग करते हैं और उसको घर छोडने पर मजबूर करते हैं तो वो आज के युग में घरेलू हिंसा कहलाता हैं क्युकी इन्सान को समझ आगया की राम ने माया से ये सब रच कर कुछ सिखाया था , क्या की अपनी पत्नी की इज्ज़त करो वरना अपने ही बच्चो से युद्ध में हार जाओगे

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    1. यह जो आप कह रही हैं, ये सामाजिक कथन / मान्यताएं / लोकोक्ति आदि हैं - यह "धर्म" की परिभाषाएं नहीं हैं |

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    2. मान्यताए संस्कृति बनाती हैं
      संस्कृति से धर्म बनता हैं { धर्म पहले या संस्कृति पहले अब ये फैसला मैने आज के लिये ईश्वर पर छोड़ा }
      धर्म की परिभाषा हिन्दू , इस्लाम नहीं हैं धर्म केवल और केवल एक दूसरे को स्वीकारने का नाम हैं ईश्वर को स्वीकारना अगर इतना आसन हैं / होना चाहिये तो एक दूसरे को स्वीकारने में क्यूँ झगडा करते हैं ??//
      धर्म महज एक आस्था हैं जो हमे अपने इष्ट से जोडती हैं http://mypoemsmyemotions.blogspot.in/2008/09/blog-post_29.html

      हटाएं
    3. @ धर्म महज एक आस्था हैं जो हमे अपने इष्ट से जोडती हैं

      मेरे विचार में तो, धर्म "महज" तो कुछ भी नहीं है - यह एक बड़ा विराट शब्द है, जिसमे इतना कुछ समाहित है , की कम से कम मैं तो उसे किसी भी "महज" सीमा में बाँधने में अपने आप को असमर्थ पाती हूँ |

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  3. पता नहीं मैं आस्तिक/नास्तिक/संशयवादी/धर्मविरोधी आदि में से किस श्रेणी में आता हूँ लेकिन पाखण्ड और कुरीतियों का कठोर विरोध हमेशा करता रहा हूँ और करता रहूँगा.
    यह मेरा हिन्दू धर्म ही है जो धर्म/संस्कृति/सभ्यता के अतिविराट वृक्ष के रूप में पांच हज़ार वर्षों से भी अधिक समय से थिर खड़ा है और इसी से निकली लताएँ और वल्लरियाँ, इसी के पुष्प और बीज सम्पूर्ण धरती पर न जाने कहाँ-कहाँ पहुंचकर किन रूपों में पल्लवित और विकसित हुए! उनमें से बहुतों ने तो इससे अपने जुड़ाव को ही नकार दिया और बहुतों ने इसे हीन और तिरस्कृत मानकर अपदस्थ करने के भी प्रयास किये.
    आज जो कुछ हो रहा है और आपको उद्वेलित कर रहा है वह सदियों से होता रहा है. यदि यह नहीं होता तो हिन्दू भी ईसाइयों और मुसलमानों की तरह लकीर-के-फ़कीर बने रहते. हांलांकि उसके कई प्रत्यक्ष और परोक्ष फायदे भी हैं.
    यदि आज मैं अपने शास्त्रों-अवतारों-महर्षियों और महात्माओं की शिक्षाओं का शब्दशः अनुसरण और अंगीकरण करता तो शायद मैं अपने दलित सहकर्मियों के साथ बैठकर भोजन करने से हिचकिचाता और विश्व की वैज्ञानिक व्याख्या को सिरे से ख़ारिज कर देता. लेकिन मेरे धर्म की गहनता, उदारता, दार्शनिकता, और लचीलेपन ने मुझे वह अंतर्दृष्टि दी है कि मैं इसकी विहंगमता से स्वयं और समाज के लिए उपयोगी सूत्रों का चयन कर सकता हूँ और देशकाल के प्रतिकूल रह चुके तथ्यों और शिक्षाओं को किनारे कर सकता हूँ, वही मैं करता भी हूँ.
    और आपकी पोस्ट में जो बात विशेषकर कही गयी है उसके लिए यह कहना ज़रूरी है कि यह हिन्दू धर्म और हिन्दुओं का विशेष लक्षण है. कोई इसे गुण कहेगा तो दूसरा इसे अवगुण बताएगा लेकिन यह शताब्दियों से जारी अंतर्विरोधों की श्रृंखला की कड़ियाँ ही हैं. हम और आप आज यहाँ अधिक व्यथित जान पड़ रहे हैं तो इसका कारण शिक्षा और सूचना का वह प्रवाह है जो हमें यह सब उपलब्ध कराता है. लेकिन शिक्षा और सूचनाओं का यही प्रवाह अन्य धर्मावलम्बियों पर प्रभाव क्यों नहीं डालता?
    क्योंकि उनका धर्म जड़ है.
    क्या आपको पोखर में जमा गाद नहीं दिखती? सब्र करिए, दुनिया जानती है कि हिन्दुओं को छोड़कर अन्य धर्मावलम्बियों ने दुनिया को कितने अमन-चैन से रखा है.
    बाकी, हमारे धर्म के वर्तमान स्वरूप और इसके भविष्य को लेकर मैं सकारात्मक रुख और आशावाद नहीं रखता, लेकिन, कौन जानता है भविष्य के गर्भ में क्या है!?
    दुःख इसी बात को देखकर होता है कि महान आध्यात्मिक परंपरा और धरोहर के वाहक हम राम और कृष्ण के जीवन चरित और उपदेशों को भुलाकर अपने दैहिक-दैविक-भौतिक तापों से मुक्ति पाने के लिए वैभव लक्ष्मी, साईं बाबा, और शनिदेव की शरण में जाते हैं. यह इस तथ्य का निरूपण करता है कि भीतर बहुत गहरे हम वासनाओं और लोलुपताओं से ग्रस्त हैं और धन एवं शक्ति से ही संचालित होते हैं. इसी पाखण्ड के फलस्वरूप हम अपने विश्वासों पर अटल नहीं रह पाते.
    ऐसी ही कुछ बातें, कुछ उग्र कुछ कठोर, कुछ अनर्थक कुछ अश्लील, कुछ अतार्किक कुछ असंगत बातें सुनाई-दिखाई देतीं रहतीं हैं. यह अच्छा है कि हम और आप अपनी चिंताएं जाहिर कर पा रहे हैं. नए मिलेनियम में होश संभालनेवाली पीढ़ी के पास तो किसी भी बात के लिए समय नहीं है. गाड़ी में पैट्रोल, मोबाइल में टॉकटाइम, और माँ-बाप की सरपरस्ती बनी रहे, फिर उन्हें भगवान् की ज़रुरत महसूस नहीं होगी.

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    1. @ पाखण्ड और कुरीतियों का कठोर विरोध हमेशा करता रहा हूँ और करता रहूँगा. -
      वह मैं भी करती हूँ | पेड़ की ऊपरी टहनियां अक्सर trimming के लिए काती जाती हैं, यह आवश्यक है !! किन्तु पेड़ की जड़ पर कुठाराघात और unwanted टहनियां काटने में फर्क होता है |

      @ यदि आज मैं अपने शास्त्रों-अवतारों-महर्षियों और महात्माओं की शिक्षाओं का शब्दशः अनुसरण और अंगीकरण करता तो शायद मैं अपने दलित सहकर्मियों के साथ बैठकर भोजन करने से हिचकिचाता और विश्व की वैज्ञानिक व्याख्या को सिरे से ख़ारिज कर देता -
      क्या सचमुच निशांत जी ? हिन्दू धर्म शास्त्रों में कहाँ लिखा है कि दलितों के साथ बैठ कर न खाएं ? शबरी के बेर राम ने नहीं खाए ? गोपाल (krishna) अपने गोपाल साथियों के साथ बैठ कर रोज़ कलेवा करते थे - जिसके कारण ही ब्रह्मा के मन में संदेह आया और उन्होंने बछड़ों और मित्रों को छुपा कर परिक्षा ली | और हारे | कृष्ण ने गीता में साफ़ कहा कि समदर्शी "साधु" और "कुत्ते का मांस खाने वाले" में फर्क नहीं करते | नहीं - यह discrimination हमारे शास्त्रों से नहीं आया, यह समाज के गलत परम्पराओं ने banaaya है |

      @ लेकिन मेरे धर्म की गहनता, उदारता, दार्शनिकता, और लचीलेपन ने मुझे वह अंतर्दृष्टि दी है कि मैं इसकी विहंगमता से स्वयं और समाज के लिए उपयोगी सूत्रों का चयन कर सकता हूँ और देशकाल के प्रतिकूल रह चुके तथ्यों और शिक्षाओं को किनारे कर सकता हूँ, वही मैं करता भी हूँ. -
      यह बहुत अच्छी बात है | लेकिन इसका अर्थ यह तो नहीं कि जिस सीढ़ी से आप इस मंजिल या पड़ाव तक पहुंचे, उसे ही काट दें ? आगे आनी वाली पीढियां किस सीढ़ी से चढ़ेंगी ?

      @ सब्र करिए, दुनिया जानती है कि हिन्दुओं को छोड़कर अन्य धर्मावलम्बियों ने दुनिया को कितने अमन-चैन से रखा है.
      :) सब्र तो निजी बात है निशांत जी | और यह निजी नहीं सामाजिक बात हो रही है |

      @ बाकी, हमारे धर्म के वर्तमान स्वरूप और इसके भविष्य को लेकर मैं सकारात्मक रुख और आशावाद नहीं रखता, लेकिन, कौन जानता है भविष्य के गर्भ में क्या है!?
      कोई नहीं जानता | लेकिन प्रयास करना और फल को जानना दो अलग बातें हैं | मेरा प्रयास मेरा धर्म (duty) है, फिर इसका परिणाम जो भी निकले, मैं अपनी पूरी शक्ति से प्रयास करूंगी | यह तो रचयिता ही जाने कि "हिन्दू" धर्म बचना चाहिए या नहीं / बचेगा या नहीं / सही है या नहीं / गलत है या नहीं , किन्तु मेरी अंतरात्मा मुझे निर्देश देगी इस दिशा में प्रयास करने को - वह मैं करूंगी |

      @ दुःख इसी बात को देखकर होता है कि महान आध्यात्मिक परंपरा और धरोहर के वाहक हम राम और कृष्ण के जीवन चरित और उपदेशों को भुलाकर अपने दैहिक-दैविक-भौतिक तापों से मुक्ति पाने के लिए वैभव लक्ष्मी, साईं बाबा, और शनिदेव की शरण में जाते हैं.
      - कृष्ण गीता में कहते हैं कि यदि किसी की किसी देवता विशेष में भक्ति है तो मैं उसे ही दृढ़ करता हूँ | क्योंकि आगे का रास्ता उसे वहां से मिल जाएगा | इन सब रास्तों से भी मैं ढूंढ लूँगा कि भक्त को सही राह कैसे दिखे और वह मुझ तक कैसेपहुंचे | मुझे (शिल्पा को) कोई problem नहीं यदि कोई जीज़स के रास्ते भी इश्वर तक पहुंचना चाहे | नहीं | इस पोस्ट का उद्देश्य यह था कि हम स्वयं अपने आराध्यों को यूँ अपमानित करना बंद करें अपने "पढ़े लिखे समझदार " होना prove करने के लिए |

      @ यह इस तथ्य का निरूपण करता है कि भीतर बहुत गहरे हम वासनाओं और लोलुपताओं से ग्रस्त हैं और धन एवं शक्ति से ही संचालित होते हैं. इसी पाखण्ड के फलस्वरूप हम अपने विश्वासों पर अटल नहीं रह पाते. -
      बिलकुल | हम हैं ही | यह होता रहा है, यह होता रहेगा |

      @ नए मिलेनियम में होश संभालनेवाली पीढ़ी के पास तो किसी भी बात के लिए समय नहीं है. गाड़ी में पैट्रोल, मोबाइल में टॉकटाइम, और माँ-बाप की सरपरस्ती बनी रहे, फिर उन्हें भगवान् की ज़रुरत महसूस नहीं होगी.
      - क्या हम उन्हें जानकारी दे रहे हैं ? हमरी पूर्व पीढ़ी ने जैसे जो हमें सिखाया - क्या हम कर रहे हैं ? यदि हिरन्यकश्यप का राज हो - तो अगली पीढियां तो यही मानेंगी न कि विष्णु नहीं है ? इसमें अगली पीढ़ी का क्या दोष ? हर कोई तो प्रह्लाद नहीं हो सकता न ? वह तो करोडो करोडो करोडो में एक हैं |

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    2. @ पाखण्ड और कुरीतियों का कठोर विरोध हमेशा करता रहा हूँ और करता रहूँगा. -
      वह मैं भी करती हूँ | पेड़ की ऊपरी टहनियां अक्सर trimming के लिए काती जाती हैं, यह आवश्यक है !! किन्तु पेड़ की जड़ पर कुठाराघात और unwanted टहनियां काटने में फर्क होता है|

      निशांत जी का प्रयास सही दिशा में है कुरीतियां व पाखण्ड रूपी वक्र व विकृत टहनियां ही काटी जाती है पेड़ की जड़ तो मूल है जिस पर धर्म रूपी वृक्ष फल-फूल रहा है, जड़ पर कुठाराघात करने से तो वृक्ष समूल धराशायी हो जाएगा।

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  4. हिन्दू मत में ईश्वर के अवतारों को मनुष्य रूप में पूजा गया , गोद में खिलाया गया , यहाँ तक की धमकाया भी गया . कुल मिलाकर ईश्वर हमारे लिए हमारे अभिभावकों या संतान की तरह ही पूज्यनीय या प्रेम / स्नेह किये जाने योग्य है , जिस तरह हमें अपने बच्चों से अभिभावकों से शिकायत भी होती है , हम उनकी हर बात को आंखमूंदकर नहीं मानते मगर उन्हें प्रेम करना या आदर देना नहीं छोड़ते , वही अपेक्षा या भावना हमारी ईश्वर को लेकर भी है .
    विचारणीय!

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    1. वाणी जी - आदर करना हम इसलिए नहीं छोड़ देते, क्योंकि यह हमारे भीतर बचपन से बहुत गहरा बैठा है |किन्तु आने वाली पीढ़ियों के साथ ऐसा नहीं होगा | with the advent of the net , and the time schooling takes - क्या हम उन्हें बता भी पा रहे हैं अपने धर्म के बारे में कुछ ? हमारी अगली पीढ़ी तक जो भी न्बातें धर्म को लेकर पहुँच रही हैं - शायद tv के माध्यम से | माता पिता यदि खुद ही डावांडोल हैं कि राम / कृष्ण आदि क्या हैं - तो वे आदर और श्रद्धा कैसे देंगे अपने बच्चों को ?

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  5. कभी मैं सोचता हूँ कि क्या होता यदि हमारे पास भी एक धर्मपुस्तक होती जो अंतिम व परिपूर्ण होती? हमारे ईश्वर की भी कोई छवि नहीं होती. क्या होता यदि हमारे पास भी एकमात्र अंतिम अवतार या मसीहा होता?

    मेरा यह मानना है कि विविधता लगभग हर मामले में अपने साथ समस्याएँ लाती है. हम भारतवासी बहुत से मामलों में 'एक जैसे' नहीं हैं. धर्म, जाति, रंग-रूप, शारीरिक गठन, भाषा, प्रांतीयता और अनेक स्तरों पर हम बंटे हुए हैं. हमारी धार्मिक, आध्यात्मिक, और दार्शनिक विविधता हमें एक नहीं रखती बल्कि बांटती है. यही कारण है कि हम 'सर्वधर्म समभाव', 'वसुधैव कुटुम्बकम' और 'सर्वे भवन्तु सुखिनः' के विचार को इतना गौरवशाली और महत्वपूर्ण मानते हैं. काश यह इतनी जटिल और समृद्ध नहीं होती!

    आज के सन्दर्भों में सेकुलरिस्म एक गाली की भांति है लेकिन सही अर्थों में हिन्दू धर्म ही एकमात्र धर्म है जो सेक्युलर है या बनने जा रहा है. और कोई माने या ना माने लेकिन भविष्य सेक्युलर विचारधारा का ही रहेगा.

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    1. @ कभी मैं सोचता हूँ कि क्या होता यदि हमारे पास भी एक धर्मपुस्तक होती जो अंतिम व परिपूर्ण होती? हमारे ईश्वर की भी कोई छवि नहीं होती. क्या होता यदि हमारे पास भी एकमात्र अंतिम अवतार या मसीहा होता?
      - तब हम भी धर्मांध ही होते :) नहीं | लेकिन हमारे पुस्तकें अनेक होकर भी contradictory नहीं हैं | रामायण, भागवतम, वेदादि में एक दुसरे की बातों को contradict नहीं किया जाता | यह तो पारस पत्थर है न - कि यदि अलग अलग पुस्तकें और मसीहा और पैगाम्ब्वर एक ही बात कह रहे हैं - तो it is a evrification | परीक्षा पुस्तिका में यदि १० अलग अलग विद्यार्थी लिखें कि ४+३=७ तो यह तो एक सकारात्मक बात हुई न ? यह तो यह बताता है कि हर एक विद्यार्थी जो कह रहा है वह सही स्रोत से आया है | पुलिस भी किसी केस की कार्यवाही के दौरान अलग अलग आरोपियों को अलग अलग कमरे में एक ही बात पूछती है - और बात सही तब मानी जाती है जब वे सब एक बात कहें | लेकिन दुसरे धर्मों के अलग अलग पैगम्बर एक बात कहाँ कहते हैं ?? कोई २+३ = ५ लिखता है, कोई ४ कोई ६ :) दिन की हर नमाज़ (५ बार) के पहले कुल्ला करना आवश्यक है, किन्तु रोज़े के दिन जब इश्वर को समर्पित ही रहना है पूरे दिन - तब दिन भर कुल्ला नहीं करना है |

      @ मेरा यह मानना है कि विविधता लगभग हर मामले में अपने साथ समस्याएँ लाती है. हम भारतवासी बहुत से मामलों में 'एक जैसे' नहीं हैं. धर्म, जाति, रंग-रूप, शारीरिक गठन, भाषा, प्रांतीयता और अनेक स्तरों पर हम बंटे हुए हैं. हमारी धार्मिक, आध्यात्मिक, और दार्शनिक विविधता हमें एक नहीं रखती बल्कि बांटती है. यही कारण है कि हम 'सर्वधर्म समभाव', 'वसुधैव कुटुम्बकम' और 'सर्वे भवन्तु सुखिनः' के विचार को इतना गौरवशाली और महत्वपूर्ण मानते हैं. काश यह इतनी जटिल और समृद्ध नहीं होती!
      - किसी प्रेम से उगाये बगीचे में अलग अलग रंगों के फूल भली प्रकार सुव्यवस्थित रूप से उगे हो सकते हैं, और किसी व्यापारिक उद्देश्य से बनाए बगीचे में एक ही तरह के फूलों के लाइनें होती हैं, क्योंकि उन्हें बेचने को उगाया जा रहा है | अब हमें कौनसा बगीचा अधिक प्रिय लगता है - यह हमारा अपना दृष्टिकोण है |

      @ आज के सन्दर्भों में सेकुलरिस्म एक गाली की भांति है लेकिन सही अर्थों में हिन्दू धर्म ही एकमात्र धर्म है जो सेक्युलर है या बनने जा रहा है. और कोई माने या ना माने लेकिन भविष्य सेक्युलर विचारधारा का ही रहेगा. असली सेकुलरिस्म यह नहीं है जो हमारे देश में ओढ़ी गयी है | यह बनावटी है - और वोट बैंक से प्रेरित है | यह व्यापर है सेकुलरिज्म नहीं | असल सेकुलरिज्म भविष्य में आएगी |

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  6. विचारपूर्ण आलेख है ...आपने कई विचार- संकटों की इन्गिती की है -कई बातें सूक्ष्म रूप से हमारे ग्रंथों में विवेचित भी हो चुकी हैं -हम चूंकि अपनी सांस्कारिक अंधश्रद्धा में अर्ध उन्मीलित आँखों और दिमाग से उनका पारायण करते हैं उन बातों के मर्म को समझ नहीं पाते -गीता जो आपकी प्रिय पुस्तक है मेरी भी और गांधी से लेकर तिलक तक प्रिय रही है एक जगहं बहुत स्पष्ट इंगित करती है -"कभी भी लोगों की आस्था पर चोट नहीं करना चाहिए ".....यह मैं मानने लगा हूँ (पहले उपहास की वृत्ति थी ) ..
    हिन्दू धर्म की श्रेष्टता -विलक्षणता यही है कि यहाँ कोई फ़तवा नहीं है कोई बंधन नहीं है -तो वे भी आपको प्रिय होने चाहिए जो इसकी और महापुरुषों में खोट निकालते हैं -हिन्दू धर्म (अगर ऐसा कोई धर्म है तब ) बहुत व्यापक है ...और अपनी उदात्तता /उदारता में विधर्मी को भी अनदेखा कर देता है और फिर भी अपनी सनातनता बनाए हुए हैं -इसे आपके और हमारे जैसे अल्प ज्ञानियों की बैसाखी की जरुरत नहीं है ...दुनिया में जो कुछ भी बहुत उदात है ,मानवोचित है और त्यागपूर्ण है सब हिन्दू धर्म के अधीन ही है .....
    इस विषय पर अक्भी आपसे आमुख चर्चा की अभिलाषा हो आयी है -शायद कभी सायास या अनायास पूरी हो जाय ..
    आपके विचारों और चिंतन ने प्रभावित किया !

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    1. @ आपने कई विचार- संकटों की इन्गिती की है -कई बातें सूक्ष्म रूप से हमारे ग्रंथों में विवेचित भी हो चुकी हैं - सच है |

      @ हम चूंकि अपनी सांस्कारिक अंधश्रद्धा में अर्ध उन्मीलित आँखों और दिमाग से उनका पारायण करते हैं उन बातों के मर्म को समझ नहीं पाते - true again

      @ गीता जो आपकी प्रिय पुस्तक है मेरी भी और गांधी से लेकर तिलक तक प्रिय रही है एक जगहं बहुत स्पष्ट इंगित करती है -"कभी भी लोगों की आस्था पर चोट नहीं करना चाहिए ".....यह मैं मानने लगा हूँ (पहले उपहास की वृत्ति थी )
      :) इस प्रिय पुस्तक को सभी के द्वारा आचार और व्यवहार में उतार लिया जाए - तो फिर तो कोई परेशानी ही न रह जायेगी | लेकिन जब हम गीता कहने वाले कृष्ण को ही चरित्रहीन / loverboy / धोखेबाज़ / cunning politician आदि मानेंगे, तो क्या इसे (unke upadeshon ko )व्यवहार में उतार पायेंगे ? जो कहते हैं कि - पहले ही मेरा मन परिवार में "विरक्त" है , गीता पढ़ कर कहीं संन्यास न ले लूं, वे क्या गीता को व्यवहार में उतारेंगे ? नहीं - हम यही भावना अपने बच्चों तक पहुंचाएंगे | खुद तो वंचित रहेंगे ही अमृत से, अपने बच्चो को भी वंचित रखेंगे | क्योंकि हम उन्हें यह आधी अधूरी information देंगे, एक हीनभाव के साथ कि - अरे मैं तो जानता ही हूँ कि मेरा धर्म मूर्खतापूर्ण है |

      @ हिन्दू धर्म की श्रेष्टता -विलक्षणता यही है कि यहाँ कोई फ़तवा नहीं है कोई बंधन नहीं है -तो वे भी आपको प्रिय होने चाहिए जो इसकी और महापुरुषों में खोट निकालते हैं -हिन्दू धर्म (अगर ऐसा कोई धर्म है तब ) बहुत व्यापक है
      ... मैंने कब कहा कि वे मुझे प्रिय हैं या अप्रिय हैं ? यह बात निजी प्रियता या अप्रियता की नहीं है | यह बात मेरी इस सोच की है कि जो अपने आस पास होते देख रही हूँ क्या उस पर ध्रितराष्ट्र की तरह (मोह ? प्रेम?) की पट्टी बाँध कर चुप रह जाऊं ? कोई प्रयास न करूँ ? prayas sahi hain ya galat, safal honge ya asafal - yah meri shart nahi | main bas prayas kar rahi hoon |

      @ और अपनी उदात्तता /उदारता में विधर्मी को भी अनदेखा कर देता है और फिर भी अपनी सनातनता बनाए हुए हैं
      - सनातनता बनाए हुए है क्या ? दुनिया में कितने प्रतिशत लोग हिन्दू हैं (सही कह रहे हैं आप - सनातन धर्मी कहना चाहिए - किन्तु हिन्दू प्रचलित शब्द है, सो वही कह रही हूँ) | दुनिया की छोड़ दीजिये - भारत में ही - ६०० साल पहले कितने प्रतिशत लोग हिन्दू थे ? आज कितने प्रतिशत बचे हैं ? और जो बचे भी हैं - उनके विश्वास कितने गहरे हैं / ५०० वर्ष पहले कितने गहरे थे ?

      @ इसे आपके और हमारे जैसे अल्प ज्ञानियों की बैसाखी की जरुरत नहीं है ...दुनिया में जो कुछ भी बहुत उदात है ,मानवोचित है और त्यागपूर्ण है सब हिन्दू धर्म के अधीन ही है ...
      नहीं | jaanti hoon ki इसे बैसाखी की ज़रुरत नहीं है | कृष्ण को भी अर्जुन के युद्ध करने की कोई ज़रुरत नहीं थी | उन्होंने उसे कहा - यह देख | मैं काल रूप बना हूँ | जिन्हें तू मारेगा - उन्हें मैं (भविष्य में) काल बन कर मार ही चूका हूँ | तू मारे या न मारे - मैं (काल) इन्हें इनके निर्धारित समय पर मार ही दूंगा, मुझे तेरी आवश्यकता नहीं | तू मेरा निमित्त मात्र हो कर यह कर | ........ इसी तरह से मैं भी निमित्त ही हूँ | यह मैं नहीं लिख रही - यह लेख मैंने नहीं लिखा है | यह कृष्ण ने लिखवाया है - क्योंकि ५ दिन पहले तक यह लेख लिखने का सोचा तक न था मैंने | मेरी बैसाखी ?- मैं बैसाखी नहीं बन रही | मैं वह नन्ही गिलहरी हूँ जो रामसेतु में अपने नन्हे पत्थर डाल रही हूँ :)

      @ इस विषय पर अक्भी आपसे आमुख चर्चा की अभिलाषा हो आयी है -शायद कभी सायास या अनायास पूरी हो जाय ..आपके विचारों और चिंतन ने प्रभावित किया !
      - आभार | शायद कभी हो ऐसा ? कौन जाने भविष्य में क्या छुपा है ?

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  7. कई बार इलाज ही बीमारी बन जाती है। जैसे बुतपरस्ती हटाने वाले बाद में अपने बुत लगवाने लग जाते हैं। अधिकांश आधुनिक (काल के हिसाब से - चिंतन की बात नहीं कर रहा) मज़हब संगठित, सुव्यवस्थित, सीमित (और शायद संकीर्ण भी) हैं। प्राचीन भारतीय परम्परा ऐसी किसी भी क़ैद, ज़ंज़ीर या दीवार को नकारकर असीम को जानने का प्रयास करती है। काले-सफ़ेद को काटने की कोई तलवार नहीं, भेद की कोई लकीर नहीं, तमस से प्रकाश की ओर गमन का सतत प्रयास। कम्युनिज़्म और इस्लाम, ये दोनों मज़हब एक दूसरे के विरोधी हो सकते हैं जबकि एक हिन्दू को इन दोनों में निहित अच्छी बात को स्वीकार करने में कोई अंतर्द्वन्द्व नहीं है। मुश्किल तब होती है जब इस अति-उन्नत विचारधारा की तुलना सहज, स्वाभाविक, मानवीय सीमाओं में कसकर लपेटे गये कल्ट्स, मज़हबों से होती है। आज के अनेक बाबागिरी संस्थान आम आदमी को उस स्तर पर आकर सर्व कर रहे हैं जिस पर भारतीय अध्यात्म की पावन प्राचीन परम्परा शायद आसानी से नहीं आ सकती। अतिवादी विचारधाराओं का मुक़ाबला करने के नाम पर कुछ वर्ग जिन हिंसक प्रतिरोधी प्रवृत्तियों को बढावा देने की बात रहे हैं वे मूलतः हमारी प्राचीन सर्व-सहिष्णु परम्परा को नकार रहे हैं।
    मुझे इस द्वन्द्व में कोई चिंता की बात इसलिये नहीं लगती क्योंकि मानव मस्तिष्क लगातार उन्नति कर रहा है और पिछड़ी विचारधारायें कुंठित और हिंसक भले ही हो जायें वे उन्नत विचारधाराओं को कभी मिटा नहीं सकती हैं। बुतपरस्ती, शख्सियतपरस्ती, आस्था, अनास्था, हिंसा, प्रेम किसी को भी पूर्णतया नष्ट इसलिये नहीं किया जा सकता क्योंकि इंसान नश्वर है। कुछ दशक, शती या और आगे का एक नया व्यक्ति और समाज कब क्या करेगा इसे अपने आप को पैग़म्बर, संत, पादरी, मुल्ला या गुरु कहने वाला कोई नश्वर प्राणी न तो जान सकता है और न नियंत्रित कर सकता है। हर संकीर्ण विचारधारा समय के साथ घिसी-पिटी और पुरानी होने को अभिशप्त है। हाँ, यह सच है कि हर संघर्ष में अंततः सत्य ही जीतता रहा है और आगे भी जीतेगा, भले ही उसके नाम में किसी देश, संस्कृति, भाषा या धर्म विशेष का नाम दिखे या नहीं।

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    1. @ कई बार इलाज ही बीमारी बन जाती है। जैसे बुतपरस्ती हटाने वाले बाद में अपने बुत लगवाने लग जाते हैं।
      so true , लेकिन इसका अर्थ नहीं कि हर इलाज़ बीमारी बन ही जाएगा, या इलाज का प्रयास करना ही नहीं चाहिए |

      @ अधिकांश आधुनिक (काल के हिसाब से - चिंतन की बात नहीं कर रहा) मज़हब संगठित, सुव्यवस्थित, सीमित (और शायद संकीर्ण भी) हैं। प्राचीन भारतीय परम्परा ऐसी किसी भी क़ैद, ज़ंज़ीर या दीवार को नकारकर असीम को जानने का प्रयास करती है। काले-सफ़ेद को काटने की कोई तलवार नहीं, भेद की कोई लकीर नहीं, तमस से प्रकाश की ओर गमन का सतत प्रयास। कम्युनिज़्म और इस्लाम, ये दोनों मज़हब एक दूसरे के विरोधी हो सकते हैं जबकि एक हिन्दू को इन दोनों में निहित अच्छी बात को स्वीकार करने में कोई अंतर्द्वन्द्व नहीं है।
      - आप की बातें हमेशा मुझे निरुत्तर कर देती हैं | wonderful - so true :)

      @ मुश्किल तब होती है जब इस अति-उन्नत विचारधारा की तुलना सहज, स्वाभाविक, मानवीय सीमाओं में कसकर लपेटे गये कल्ट्स, मज़हबों से होती है। आज के अनेक बाबागिरी संस्थान आम आदमी को उस स्तर पर आकर सर्व कर रहे हैं जिस पर भारतीय अध्यात्म की पावन प्राचीन परम्परा शायद आसानी से नहीं आ सकती। अतिवादी विचारधाराओं का मुक़ाबला करने के नाम पर कुछ वर्ग जिन हिंसक प्रतिरोधी प्रवृत्तियों को बढावा देने की बात रहे हैं वे मूलतः हमारी प्राचीन सर्व-सहिष्णु परम्परा को नकार रहे हैं।
      - सिर्फ प्रणाम ही कह सकती हूँ आपकी इस बात पर आपको |

      @ मुझे इस द्वन्द्व में कोई चिंता की बात इसलिये नहीं लगती क्योंकि मानव मस्तिष्क लगातार उन्नति कर रहा है और पिछड़ी विचारधारायें कुंठित और हिंसक भले ही हो जायें वे उन्नत विचारधाराओं को कभी मिटा नहीं सकती हैं। -
      १. चिंता की बात तो मुझे भी नहीं लगती, क्योंकि मैं जानती हूँ / मुझे विश्वास है कि long term में सब कुछ उस सर्वशक्तिमान की योजना से ही होगा - चिंता करने से चलती ट्रेन दिल्ली को जाती हो तो मुंबई को जाने से रही | किन्तु प्रयास मेरा धर्म है - उस दिशा में जो मुझे ठीक लगे |

      @ बुतपरस्ती, शख्सियतपरस्ती, आस्था, अनास्था, हिंसा, प्रेम किसी को भी पूर्णतया नष्ट इसलिये नहीं किया जा सकता क्योंकि इंसान नश्वर है।
      true - शख्सियत परस्ती के अर्थ बड़े गहरे हैं | हम में से कई लोग सिर्फ दिखावा भर करते हैं शख्सियत परस्ती का, किन्तु गहराई में हम जानते हैं कि वह शख्सियत तो अब है नहीं - तो उसके मुंह से अपने सन्देश बुलवाते रहते हैं | एक और बात है - तारीफ़ या आदर या सहमती "शाख्सियात्परास्ती" नहीं होती | लेकिन अक्सर ऐसा समझ लिया जाता है |

      @ कुछ दशक, शती या और आगे का एक नया व्यक्ति और समाज कब क्या करेगा इसे अपने आप को पैग़म्बर, संत, पादरी, मुल्ला या गुरु कहने वाला कोई नश्वर प्राणी न तो जान सकता है और न नियंत्रित कर सकता है। हर संकीर्ण विचारधारा समय के साथ घिसी-पिटी और पुरानी होने को अभिशप्त है। हाँ, यह सच है कि हर संघर्ष में अंततः सत्य ही जीतता रहा है और आगे भी जीतेगा, भले ही उसके नाम में किसी देश, संस्कृति, भाषा या धर्म विशेष का नाम दिखे या नहीं।
      - सत्य वचन

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    2. अनुराग जी,
      साधुवाद!! बहुत ही स्पष्ट और सार्थक भी!!

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    3. @ लेकिन इसका अर्थ नहीं कि हर इलाज़ बीमारी बन ही जाएगा, या इलाज का प्रयास करना ही नहीं चाहिए |

      - सच है! पोस्ट में उठाये गये सवाल जायज़ हैं। इलाज होते रहे हैं लेकिन - मर्ज़ बढता ही गया ज्यों ज्यों दवा की हमने! मैं इतना ही जोड़ना चाह रहा था कि इलाज भी जानकार द्वारा ही किया जाय तो लाभप्रद होता है। आज की अनेक मज़हबी/सामाजिक बीमारियाँ उन इलाजों का नतीज़ा हैं जो अपने को सर्वज्ञानी और सक्षम समझने वाले नीम-हकीमों द्वारा प्रिस्क्राइब किये गये थे। शुरू में निर्मल से दिखने वाले विचार आगे चलकर तालेबान या माओवाद जैसे दानवी बनकर सामने आते रहे हैं। बीमारी की तरह ही इलाज भी एक बड़ी समस्या है

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    4. You are absolutely right. Paerhaps i am not the "neemhakim" trying to prescribe a cure. Perhaps the closest similie to my approach is, a friend telling a person to not put mud in his own plate of food, lest he should fall ill... :)

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  8. ओह,

    बहुत विचारोत्‍तेजक पोस्‍ट है। शिल्‍पाजी साधूवाद। आपके तर्कों और विचार से सहमत होने के साथ ही कुछ और विचार दिमाग में हैं, अभी कुछ वक्‍त सोचने के लिए लूंगा, फिर वापस आकर कमेंट करूंगा। :)

    इन दिनों ब्‍लॉगर बहुत सीरियस और उम्‍दा लिख रहे हैं...

    एक बार फिर धन्‍यवाद।

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    1. आपका आभार, और स्वागत है | चर्चा में भाग लीजियेगा :) आपकी बातों पर शायद मैं भी कुछ कह पाऊँ ?

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  9. अब क्या कहूँ आप ने तो कह दिया की जो ईश्वर के अस्तित्व को नहीं मानते ये पोस्ट उनके लिए नहीं है , सो इस पोस्ट पर हम कुछ नहीं कह सकते हा पढ़ जरुर रहे है | किन्तु देखिएगा इस विषय पर वही लोग ज्यादा अच्छी, सची, तटष्थ और सुनने, चर्चा लायक और सही बात करेंगे जिन्हें नास्तिक/संशयवादी/धर्मविरोधी आदि आदि कह जाता है | दो दिन पहले ही आप ने कृष्ण पर कही मेरी बात को लाईक किया था जबकि मैंने कहा था की मै उन्हें मात्र एक कहानी का पात्र मानती हूँ |

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    1. अंशुमाला जी
      @ अब क्या कहूँ आप ने तो कह दिया की जो ईश्वर के अस्तित्व को नहीं मानते ये पोस्ट उनके लिए नहीं है -
      मैंने ऐसा कुछ भी नहीं कहा | Please Do not Misinterpret what I am saying - This is a major problem in the blogworld. Someone says something, and we transform it to something else altogether. मैंने सिर्फ यह कहा की, जो अपील मैं कर रही हूँ, वह अपील उनके लिए नहीं है | पोस्ट सभी के लिए है | यह साफ़ कर देना बड़ा आवश्यक है - न सिर्फ आपको , बल्कि सभी को |

      @ किन्तु देखिएगा इस विषय पर वही लोग ज्यादा अच्छी, सची, तटष्थ और सुनने, चर्चा लायक और सही बात करेंगे जिन्हें नास्तिक/संशयवादी/धर्मविरोधी आदि आदि कह जाता है |
      मेरी परिभाषा में - नास्तिक, संशयवादी, और धर्म विरोधी तीनों अलग अलग बातें हैं | उन्हें मिलाएं नहीं कृपया | इस पोस्ट में भी लिखा है की नास्तिक और धर्मविरोधी के फर्क को न समझ पाना मुझे तो कोई बड़ी समझदारी की बात नहीं लगती | { @ आदि आदि कह जाता है - जो ऐसा समझते हों/ कहते हों , समझते /कहते रहें, मैं ऐसा नहीं समझती की ये सब एक ही हैं |}

      ऊपर मैंने पोस्ट में अनुराग जी को quote किया जहां वे कह रहे हैं कि वे नास्तिक हैं - और मैंने साफ़ लिखा है कि यह ideal स्थिति है कि जो नास्तिक हो वह ऐसा कह सके और जो आस्तिक हो वह वैसा कह सके | फिर से पढ़ लीजिये - ऊपर से कॉपी पेस्ट कर रही हूँ | -------" कुछ दिन पहले स्मार्ट इन्डियन जी के ब्लॉग पर एक पुराना लेख "यह लेखक बेचारा क्या करे? " पढ़ा, जिसमे उन्होंने कहा कि "नास्तिक हूँ परन्तु नास्तिक और धर्म-विरोधी का अंतर देख सकता हूँ. मुझे दूसरों के धर्म या आस्था को गाली देने की कोई ज़रुरत नहीं लगती है" यह ideal situation होगी " गिरिजेश जी की भी मैं एक बड़ी फैन हूँ - वे भी कई पोस्टों में कह चुके हैं कि वे नास्तिक हैं | मुझे नास्तिकों से कोई परेशानी नहीं, बल्कि मैं अपने आप के बारे में भी बहुत sure नहीं कि मैं खुद किस category में हूँ |

      @@ दो दिन पहले ही आप ने कृष्ण पर कही मेरी बात को लाईक किया था जबकि मैंने कहा था की मै उन्हें मात्र एक कहानी का पात्र मानती हूँ - मैं अभी भी उस बात को लाइक ही कर रही हूँ |

      @ एक और बात साफ़ कर दूं, ऊपर भी लिखा है - वही पोस्ट से कॉपी पेस्ट करती हूँ "एक ज़माना था जब सब आस्तिक थे और कोई एकाध व्यक्ति नास्तिक - तो वह बेचारा दूसरों के डर के मारे दर्शाता था कि वह भी आस्तिक है | आज की स्थिति इससे उलटी है - वह अकेला यह स्वीकारने में भयभीत है कि हाँ, मैं आस्तिक हूँ, मैं राम को ईश्वर मानता हूँ | दोनों ही स्थितियां बराबर रूप से गलत हैं " aasha hai ab aapko meri baat saf hui hogi

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    2. शिल्पा जी
      समयाभाव के कारण आप की पोस्ट पर जवाब नहीं दे सकी और खुद कहने के बाद भी आप की पोस्ट की चर्चा को पढ़ नहीं सकी इसलिए नहीं जानती की बाद में क्या चर्चा हुए और आप ने क्या जवाब दिया बिना बाकि चर्चा पढ़े कुछ बाते थी दिमाग में वो कहना चाहती थी वो कह रही हूँ , बातो में तारतम्यता ना हो तो माफ़ कीजियेगा क्योकि मै आप महिला हूँ विद्वान् महिला नहीं और पोस्ट पर आने में देर कर दी है :)
      अहिंसा के पुजारी कहते है की कभी भी किसी पर हाथ ना उठाओ भले सामने वाला पिट पिट कर मार ही दे किन्तु मै इस तरह की अहिंसा में विश्वास नहीं रखती हूँ मै मानती हूँ की जीव हत्या नहीं करनी चाहिए , किसी को मरना पीटना भी नहीं चाहिए किन्तु आत्मरक्षा में किसी को पीटना पड़े या जान का खतरा होने पर उसकी ही जान ले लेनी पड़े तो उसमे कोई बुराई नहीं है , अब कहने वाले कह सकते है की ये विचार कही से भी अहिंसक नहीं है ये हिंसा ही है | ये उनके विचार है मेरे लिए मै अहिंसक ही हूँ , कहने का अर्थ ये है की की अहिंसा भक्ति आदि जैसी बातो को आप किसी एक सिमित क्षेत्र में बांध नहीं सकती है आप ये नहीं कहा सकती है कि यदि आप का विश्वास भगवान में है तो आप उस पर कोई सवाल ना उठाये , फिर पहले ये भी देखा जाना चाहिए की सवाल किस पर उठाये जा रहे है जहा तक मेरी छोटी सी जानकारी है उसके हिसाब से हमें भगवान आदि के बारे में बताने का कार्य जो धार्मिक पुस्तके करती है उनमे से ज्यादातर को लिखने का काम इंसानों ने किया है और सवाल उसमे लिखी गई बातो पर होता है , सवाल भगवान पर नहीं इन्सान द्वारा लिखी गई बातो पर किया जाता है चुकी ज्यादातर धार्मिक पुस्तकों को लिखने वाला इन्सान है तो उसके नीजि विचार अनुभव आदि यदि उन पुस्तकों में आ जाते है तो गलती भगवान की नहीं इन्सान की है जिस पर कोई भी सवाल उठा सकता है | मेरी नजर से देखिये तो हर ईश्वर का निर्माण समय समय पर समाज ने उस समय की जरुरत को ध्यान में रख कर बनाया है ( बिल्कुल मै यही मानती हूँ की संसार की रचना किसने की पता नहीं किन्तु भगवान की रचना तो इन्सान ने ही की है ) जब जैसा समाज, माहौल और जरुरत थी उस तरह के भगवान की रचना इंसानों ने अपने अपने समुदाय , समाज में की, जैसे कुछ देवी देवताओ की पूजा उच्च वर्ग के लोग नहीं करते है उन्हें दलित या छोटी जाति के लोग ही करते है साफ है जब हमारे समाज में छोटी जाति के लोगो को मंदिर जाने पर पाबन्दी लगा दी गई तो उन्होंने अपने लिए एक नये भगवान की रचना की, देवी जो गधे पर बैठी है और उसके हाथ में झाड़ू होता है , या फिर एक राजा के रूप में आदर्श के सबसे ऊँचे स्थान पर बैठाने के लिए राम की रचना की गई सोचिये की राम राज की बात क्यों होती है क्रष्ण भी तो द्वारिकाधीश थे उनके राज की बात आज क्यों नहीं की जाती है आज क्योकि राम की रचना एक श्रेष्ठ राजा , वचन के पक्के व्यक्ति के रूप में की गई थी जो प्रजा के लिए अपने पारिवारिक जीवन का भी त्याग देता है , किन्तु समय बदला और इन्सान को समझ आया की आदर्श की ये इतनी ऊँची दीवार शायद ही कोई पार कर सके ये तो बिल्कुल ही भगवान हो गया जिसकी तरह कोई मानव बनने की सोच भी नहीं सकता है तो कृष्ण का निर्माण किया गया जो एक आम इन्सान के जीवन के सबसे करीब नजर आते है , जहा अच्छे काम के लिए झूठ , चालाकी युद्ध को भी सही कहा जाता है , जो बचपन की सरराते भी करता है प्रेम भी करता है मित्रता भी निभाता है वो सब जो एक आम इन्सान करता है और जिसके लिए कृष्ण की कही बातो का पालन करना ज्यादा आसन है , जिस हिन्दू धर्म की बात आप कर रही है उसी से जुड़े बड़े लोग घर्म से पलायन को देख कर बड़ी चालाकी से बुद्ध को भी दसवा अवतार घोषित कर देता है , अब इसमे भगवान और धर्म की क्या गलती है, गलती तो इन्सान की है और उस पर सवाल उठाये जा सकते है , उसी तरह राम कृष्ण आदि की आदि के बारे में भी सवाल उठाया जा सकता है की क्यों राम का चरित्र के निर्माण के समय एक राजा के रूप में ही उभारा गया और पति के रूप को विकृत बना दिया गया ,क्योकि समाज को उनका अनुसरण करने की शिक्षा दी जाती है तो क्या एक इन्सान को उन्ही की तरह पति,पिता के रूप में ऐसा ही व्यवहार करना चाहिए ( बिल्कुल वैसे ही जैसे कई बार किसी एक बीमारी के लिए दवा बनाई जाती है और इस बात का ख्याल नहीं रखा जाता है की उससे कोई और भी नुकशान हो सकता है ) ,इसलिए जब कोई पति राम का उदाहरन दे कर पत्नी के साथ वैसा व्यवहार करेगा या समज बार बार किसी स्त्री को सीता जैसी बनने की बात करेगा तो वो राम पर सवाल उठा सकती है और समाज से ये भी पूछ सकती है की खुद राम ना बन पाने वाले किसी स्त्री से सीता जैसे बनने की उम्मीद कैसे कर सकते है , गलती समाज की है उसके बनाये भगवान की नहीं |

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    3. आप की इस बात से भी सहमत नहीं हूं की नास्तिकता आज की देन है , ये हमेसा से था ईश्वर को मानने वाले हमेसा इस बात से डरते थे की उन्होंने समाज में ईश्वर का निर्माण उसे व्यवस्थित रखने और नियंत्रण के लिए किया है यदि किसी ने उसे मानने से इनकार कर दिया तो क्या होगा , हिरन्यकश्यप , सती के पिता प्रजापति आदि क्या थे एक तरह से नास्तिक ही थे जिनके लिए कहा गया की यदि आप भगवान में विश्वास नहीं रखते है उनसे नहीं डरते है और समाज में गलत काम या अराजकता फैलाते है तो आप को ईश्वर अवतार ले कर सजा देगा , उस समय समाज को नियंत्रित करने के यही माध्यम थे | मै यहाँ ये नहीं कहा रही हूं की हर व्यक्ति डर से ही भगवान में आस्था रखता है | फिर बात यही ख़त्म नहीं होती है आर्य समाज , ब्रम्कुमारी जैसे संस्थान भी मूर्ति पूजा का विरोध करते है ये भी एक तरह की नास्तीकता ही है और फिर निर्गुण उपासको को क्यों भूल जाती है | आप का ये आकलन भी गलत है की दूसरे धर्मो में लोग अपने ईश्वर पर सवाल नहीं उठाते है, उठाते है और उसी तरह उठाते है जैसे ही हिन्दू धर्म के लोग उठाते है बस आप ने उन्हें ध्यान से देखा नहीं ( एक तो टीवी पार ही आते है ईसाई है तर्कशास्त्री है नाम याद नहीं आ रहा है उन्हें अभी हाल में ही उनके धर्म से बहिष्कृत करने का ऐलान किया गया है क्योकि उन्होंने यीशु के पैर से पानी गिरने की घटना को पोल खोल दी थी ) | चलिये आप की ही बात करते है क्या आप आज भी ये मानती है की सूर्य और चार्द्र ग्रहण राहू केतु का काम है यदि आप ऐसा नहीं मानती है और दान दक्षिण नहीं देती है तो आप भी सवाल उठा रही है किसी की आस्था पर :) निश्चित रूप से आप के विचारो को आज के विज्ञानं ने बदला है और आप नहीं मानती है की इसके पीछे राहू केतु है क्या आप अपनी वैज्ञानिक जानकारी को नकार पाएंगी और खुद को ये विश्वास दिला पाएगी की ये राहू केतु का काम है , ये काम आप शायद कभी नहीं कर पाएंगी , उसी तरह तर्क और विज्ञानं को समझने वाले सवाल उठाते है वो भी जिनको भगवान में आस्था है और वो भी जिनको नहीं है | बल्कि मुझे तो लगता है की ये अच्छी बात है हिन्दू धर्म की ,कि यहाँ हर तरह के विचारो को जगह मिलती है दूसरे अन्य धर्मो की तरह विपरीत विचार रखने वालो को इस तरह धर्म से निकालने या उन्हें नफ़रत से देखने की परंपरा नहीं है |

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    4. रही भक्ति मार्ग की बात तो कुछ चीजो के लिए समाज में प्रतिक बनाये गये ताकि लोग उस चीज का महत्व अपने जीवन में समझे अब जैसे विद्या और ज्ञान की देवी सरस्वती जी को ही ले ले , विवाह के पहले मै भी हर वसंत पंचमी को सरस्वती पूजा करती थी ये हमारे घर की परम्परा थी , मेरे जन्म से पहले घर में पढ़ने वाले बच्चे करते थे , मेरी लिए वो मात्र प्रतिक की और ये दर्शाने का जरिया थी की हा मेरे जीवन में इस समय ज्ञान और विद्या का महत्व है और साल में एक बार किताबो की जगह प्रतिक देवी की पूजा करती थी , उस मूर्ति पर आस्था नहीं थी किन्तु जिस मूल कारण की वजह से उस देवी का निर्माण किया गया था उस में आस्था थी , वसंत पंचमी पर घर के बाहर पंडाल भी लगता था मोहल्ले के सभी छ्टे हुए लडके जिसमे से ज्यादातर को पढाई लिखाई विद्या ज्ञान से कोई मतलब नहीं था जिसमे से चंदा मांगने आये कुछ को तो सरस्वती बोलना तक नहीं आता था सरसती माई कहते थे वो बड़े धूमधाम से तीन दिन धमा चौकड़ी मचाते थे , क्या कहेंगी वो भक्त है और मै नास्तिक उनकी भक्ति बड़ी है और मेरी बेकार , भक्ति के ये भी दो रूप है एक जो समझ कर किया जा रहा है और एक जो बिना समझे जाने किया जा रहा है , भक्ति में कुछ लोग बलि भी देते है कुछ कठिन जाप ,व्रत भी करते है तो कुछ शरीर को प्रताड़ित भी करते है सभी के भक्ति का अपना रूप है , हर व्यक्ति एक दूसरे के भक्ति के तरीके पर सवाल उठाता है उसे खुद की भक्ति ही सही लगती है |

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    5. @ समयाभाव ....हो तो माफ़ कीजियेगा क्योकि मै आप महिला हूँ विद्वान् महिला नहीं और पोस्ट पर आने में देर कर दी है :)
      माफ़ करने करने जैसी कोई बात ही नहीं है - आप भी जानती हैं और मैं भी | किसी की duty थोड़े ही है की मेरी हर पोस्ट पढ़े / टिपण्णी करे .. | आपसे वहां इसलिए कहना पड़ा क्योंकि आपने साफ़ लिखा था की यह पोस्ट आपके लिए नहीं है - और ऐसे कोई बात हो तो क्लियर करना आवश्यक है मेरे लिए | i know that you are not a regular reader here, and i have no issues with that. i too read very few blogs - everyone has their own tastes. if you wish to read me, or comment you are most welcome here. if you wish NOT to read me / not comment, you are equally welcome. but when someone says that "i have specifically said my post is forbidden to them", or that ihave written it to get traffic here - it is important for me to clarify it.

      when you said this "आप ने तो कह दिया की जो ईश्वर के अस्तित्व को नहीं मानते ये पोस्ट उनके लिए नहीं है " which was not true - i had to clarify.

      @ अहिंसा के पुजारी ... अहिंसक नहीं है ये हिंसा ही है |
      अपना अपना outlook हो सकता है |

      @ आप ये नहीं कहा सकती है कि यदि आप का विश्वास भगवान में है तो आप उस पर कोई सवाल ना उठाये ..... कोई भी सवाल उठा सकता है |
      exactly यही मैं कह रही हूँ - की जिनके मन में विश्वास न हो / clarification चाहता हो - वह सवाल करे - और ऐसे व्यक्ति से करे जहां सवाल का हल मिलने की संभावना हो | यह नहीं की बस public प्लात्फोर्म पर बैठ कर सिर्फ बुराइयाँ देखि गुनी जाएँ और clarification दे सकने वालों के पास भी न फटका जाए | अदालत में भी यदि किसी पर केस चलाना हो - तो मुलजिम या उसके वकील का होना कानूनन आवश्यक है |

      @ मेरी नजर से देखिये तो ... गलती समाज की है उसके बनाये भगवान की नहीं |
      आपके विचार और आपकी नज़र का मैं सम्मान करती हूँ |

      @ आप की इस बात से भी सहमत नहीं हूं कि नास्तिकता आज की देन है
      ऐसा मुझे तो याद नहीं पड़ता कि मैंने कहीं कहा है कि नास्तिकता आज की देन है ? कहा है क्या ?और असहमति से मुझे कोई problem नहीं है | प्रॉब्लम मुझे blindly Negative बातें कहे चले जाने से है |

      @ ये हमेसा से था ....निर्गुण उपासको को क्यों भूल जाती है |
      मैं किसे को नहीं भूली | मैं उनके विश्वासों का मखौल नहीं उडाती कभी | न मैं यह चाहूंगी कि मेरे विश्वासों का कोई मखौल उडाये | आप पोस्ट की भावना को समझ ही नहीं सकें, शायद आपने पूरी पोस्ट पढ़ी नहीं |

      @ आप का ये आकलन भी गलत है की दूसरे धर्मो में लोग अपने ईश्वर पर सवाल नहीं उठाते है, ....
      हो सकता है | मैं इंसान हूँ, इश्वर नहीं, जो मेरे आकलन गलत हो ही न सकते हों |

      @ निश्चित रूप से आप के विचारो को आज के विज्ञानं ने बदला है और आप नहीं मानती है की इसके पीछे राहू केतु ... धर्म से निकालने या उन्हें नफ़रत से देखने की परंपरा नहीं है |
      फिर वही कहूँगी - मैं यह बात कर ही नहीं रही | मैं blind biased criticism या unintentional negativity की बात कर रही हूँ |

      @ रही भक्ति मार्ग की बात तो कुछ चीजो के लिए समाज में प्रतिक .... उसे खुद की भक्ति ही सही लगती है |
      सही लगने न लगने की बात नहीं कर रही हूँ | intentional or unintentional negativity की बात कर रही हूँ |

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  10. सिर्फ हम ही ऐसे हैं, जो अपने ही विश्वासों पर हमेशा डांवाडोल होते रहते हैं | चारदीवारी के भीतर तो सब ठीक है - लेकिन सामाजिक रूप से हमें अपने विश्वासों को स्वीकारने में शर्म आती है | सार्वजनिक मंच पर हम "समझदार" हो जाते हैं जिनके लिए हमारे अवतार सिर्फ स्त्री पुरुष रह जाते हैं, और लक्ष्मी जी चंचला धन की देवी | ऐसा क्यों ????

    शिल्पा जी,
    मैं स्वीकार करता हूँ कि "लक्ष्मी चंचल है" यह मैने ही कहा था, और अभी भी इस बयान कर कायम हूँ। सचाई भी है,धन किसी के पास स्थिर नहीं रहता। पर इसका आस्था की अस्थिरता से क्या सम्बंध? विश्वासों के डांवाडोल से क्या सम्बंध? इसलिए ऐसा क्यों???? का सामन्जस्य समझ से परे है। चारदीवारी के भीतर भी मैं लक्ष्मी अनुष्ठान करता हूँ उसकी आराधना और साधना भी करता हूँ यह अनुष्ठान करते हुए संज्ञान में भी रखता हूँ धन स्वभाव से चंचल है इसलिए अनुष्ठान में लक्ष्मी जी को स्थिर रहने की प्रार्थना भी करता हूँ। हालांकि यह अनुष्ठान भयवश से छुपाने की कभी इच्छा ही नहीं हुई फिर इन पंक्तियों से इसे सार्वजनिक करता हूँ। :)

    इस पूरी पोस्ट में आपके मूल दो प्रश्न है
    1- सार्वजनिक रूप से हम भय वश आस्था पर दृढता व्यक्त नहीं करते या क्यों नहीं करते?
    2- इसी कारण हम अपने उपास्यों को सामान्य मनुष्य वर्णीत कर पेश करते है।

    हालांकि निशान्त जी, अरविन्द जी अनुराग जी ने प्रकान्तर से इन दोनो प्रश्नों के उत्तर स्पष्ट कर दिए है तथापि अगली टिप में मैं अपना प्रयास करूँगा।
    आपकी अपनी आस्था के प्रस्तुतिकरण में आप अंशुमाला जी को दिए उत्तर में सार्वजनिक स्पष्ट कर ही चुकी है----
    "मुझे नास्तिकों से कोई परेशानी नहीं, बल्कि मैं अपने आप के बारे में भी बहुत sure नहीं कि मैं खुद किस category में हूँ |"

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    1. @मैं स्वीकार करता हूँ कि "लक्ष्मी चंचल है" यह मैने ही कहा था, और अभी भी इस बयान कर कायम हूँ।
      यह आपने "ही" नहीं कहा था, यह आपने "भी" कहा था | this goes to strengthen my point - जो बात हम सुनते रहते हैं अपने आस पास बचपन से , वह इतनी "normal" होने का आभास देने लगती है की हम उसमे कुछ odd महसूस नहीं करते | नहीं तो अपनी माँ को "चंचला" संबोधन देना कोई आसान नहीं है | और हर "हिन्दू" (यदि हिन्दू सही शब्द हो तो) लक्ष्मी "मैया" कहता है, पूजता है, मानता है | वे धन की अधिष्ठात्री देवी हैं, धन देती हैं, किन्तु "धन" के चंचल होने का अर्थ माँ का चंचल होना होता है क्या ?
      अपनी माँ रोज़ भोजन बना कर परोसती है | एक दिन किसी कारण से (हो सकता है गरीबी / दुकान बंद होना - अनेक कारण हो सकते हैं) भोजन न मिले - तो माँ को "चंचला" कहती है उसकी संतान ?
      धन का अपने पास आना / न आना / टिकना / न टिकना ... यह सब अपने ही पूर्व (इस जन्मे के या पूर्व जन्मों के) और वर्त्तमान कर्मों से सम्बंधित है, किन्तु इसके लिए माँ को चंचल कह कर हम सारा इलज़ाम माँ की चंचलता पर दाल देते हैं | और ऐसा हम अपमान करने की दृष्टि से नहीं करते, बल्कि - बचपन से यह सुनते हुए condition होते गए हैं - इसलिए यह बात बड़ी आसानी से गले उतर जाती है | आप कायम हैं अपनी बात पर - मैं भी अपनी बात पर कायम हूँ |धन के चले जाने से माँ पर चंचला शब्द आरोपित करना मुझे सही नहीं लगता |ऐसी कई प्रचलित बातें मैं खुद भी बिना सोचे समझे कहती हूँ | तो यह कोई आपसे नाराजगी नहीं है आपसे | इसीलिए तो यह पोस्ट बनी - क्योंकि ऐसी कई बातें हम बार बार कह कर उनके प्रति अभ्यस्त होते जा रहे हैं |

      @ सचाई भी है,धन .........इसलिए ऐसा क्यों???? का सामन्जस्य समझ से परे है।
      शायद आपकी समझ से यह ठीक न हो | मैंने अपने कारण ऊपर लिख दिए हैं | यदि इतनी बड़ी पोस्ट से ही किसी को नहीं समझा पाई हूँ अपना अर्थ - तो एक और कमेन्ट से क्या समझा सकूंगी ? :) तो - कोई बात नहीं | यदि आपको ठीक लगता है की यह सब जो मैंने ऊपर लिखा है तो यह आपका अपना निर्णय है |

      @ चारदीवारी के भीतर भी मैं लक्ष्मी अनुष्ठान करता हूँ उसकी आराधना और साधना भी करता हूँ यह अनुष्ठान करते हुए संज्ञान में भी रखता हूँ धन स्वभाव से चंचल है इसलिए अनुष्ठान में लक्ष्मी जी को स्थिर रहने की प्रार्थना भी करता हूँ। हालांकि यह अनुष्ठान भयवश से छुपाने की कभी इच्छा ही नहीं हुई फिर इन पंक्तियों से इसे सार्वजनिक करता हूँ। :)
      ऊपर मैंने कहा है - सबमे इतना सहस नहीं होता | आप नहीं छुपाते होंगे |

      इस पूरी पोस्ट में आपके मूल दो प्रश्न है
      1- सार्वजनिक रूप से हम भय वश आस्था पर दृढता व्यक्त नहीं करते या क्यों नहीं करते? --- नहीं यह प्रश्न नहीं है | प्रश्न मेरा यह है कि हम ओढ़ी हुई "अनास्था" क्यों प्रकट करते हैं | जब हम "राम" से अपने बच्चे का बुखार ठीक करने की प्रार्थना करते हैं - तो हम जानते हैं कि वे सिर्फ एक ऐतिहासिक पुरुष से बढ़ कर आज भी एक जागृत शक्ति हैं (तभी तो प्रार्थना है कि मनचाही बात वे करवाएं - यदि ऐतिहासिक पुरुषमात्र थे - तो मृत्यु के बाद उनकी प्रार्थनाएं सुनने की शक्ति कैसे होती?) | तो यदि हम यह जानते हैं, मन में मानते हैं - तो क्यों हम सार्वजनिक मंच पर यह कहते हैं कि वे सिर्फ एक पुरुष भर थे ?

      2- इसी कारण हम अपने उपास्यों को सामान्य मनुष्य वर्णीत कर पेश करते है।
      हालांकि निशान्त जी, अरविन्द जी अनुराग जी ने प्रकान्तर से इन दोनो प्रश्नों के उत्तर स्पष्ट कर दिए है तथापि अगली टिप में मैं अपना प्रयास करूँगा। --- उत्तर दिए हैं सभी ने | लेकिन असल प्रश्न को कोई भी नहीं छू रहा है |

      ३. आपकी अपनी आस्था के प्रस्तुतिकरण में आप अंशुमाला जी को दिए उत्तर में सार्वजनिक स्पष्ट कर ही चुकी है----
      "मुझे नास्तिकों से कोई परेशानी नहीं, बल्कि मैं अपने आप के बारे में भी बहुत sure नहीं कि मैं खुद किस category में हूँ |" --- हाँ - मुझे नास्तिकों से कभी कोई परेशानी नहीं हुई | यह मैं शायद इस ब्लॉग की शुरूआती दूसरी या तीसरी ही पोस्ट में स्पष्ट कर चुकी हूँ | मेरे closest family friends हैं उमा परिहार(इंडियन) एंड हर हजबैंड बदरुल हसन (ओरिजीनली नोट अन इंडियन ) जो रशिया में पढ़े हैं - और कट्टर नॉन बीलीवर्स हैं | और उनसे मेरे सम्बन्ध १५ वर्ष की आयु से हैं - आज तक उतने ही मधुर हैं | नास्तिकता ने इसमें कभी कोई कडवाहट पैदा नहीं की | मैं क्या हूँ - यह तो मेरा कान्हा ही बता सकता है - हाँ यह जानती हूँ कि धर्मविरोधी तो (मेरी नज़र में ) मैं नहीं ही हूँ |

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    2. @ एक दिन किसी कारण से (हो सकता है गरीबी / दुकान बंद होना - अनेक कारण हो सकते हैं) भोजन न मिले - तो माँ को "चंचला" कहती है उसकी संतान ?
      आप जिस तरह कंडिशन मुक्त है बहुत कम ही लोग उस उच्च दशा को प्राप्त कर सकते है। आप जो सम्मान धन को दे पाती है जो मैया का दर्जा देकर उसकी अति और अल्पता ममत्व कृपा देखती है वह वाकई सबके बस का नहीं। संतान ऐसी ही होनी चाहिए।
      यह आपने सही कहा- "धन का अपने पास आना / न आना / टिकना / न टिकना ... यह सब अपने ही पूर्व (इस जन्मे के या पूर्व जन्मों के) और वर्त्तमान कर्मों से सम्बंधित है"
      -दरिद्ता और समृद्धि कर्माधीन है माता अधीन नहीं। जैसे पूर्व कर्म है, फल भोगना ही पडेगा। ममत्व के बाद उस समय वे कर्म निष्काम थे बहाना कहाँ चलने वाला है?

      जैसे आपकी आस्था का निर्णायक कान्हा है वैसे ही कंडिश्निंग की आस्था वालों के निर्णय भी हम उनके कान्हा पर क्यों नहीं छोड देते।
      मेरे भी अधिकांश मित्र नास्तिक है किन्तु सत्कर्मी नास्तिक। मैं नास्तिक होने मात्र से लोगों से अरूचि नहीं करता किन्तु दूसरों की आस्था को हवा करने में प्रयासरत नास्तिक अवश्य मुझ से दूर रहते है और मेरे लिए यह सुविधाजनक ही है। जो उच्च विचारक नास्तिक है वे दूसरों को आस्तिक या नास्तिक रूप में देखते भी नहीं वे लोगों को सद्कर्मी,दुष्कर्मी या मध्यम व्यक्ति के रूप में ही देखते है। जो किन्ही व्यक्तियों को धार्मिक, पाखण्डी, प्रदर्शनकर्ता के स्वरूप में ही देख पाते है निम्न कक्षा के नास्तिक होते है। उनका लक्ष्य निंदा ही होता है और निंदक से कैसा प्रेम?

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    3. @तो मृत्यु के बाद उनकी प्रार्थनाएं सुनने की शक्ति कैसे होती?)

      ??? यह तो सत्य है कि वे परम आत्माएं मनुष्य देह धारण करती है, मनुष्य देह धारण करने के कारण ही उन्हें 'अवतार' कहा जाता है मनुष्य योनि में जन्म-मरण अटल सच्चाई है हिन्दु अवधारणाओं में सामान्य आत्मा भी अजर-अमर है फिर उन दैवीय आत्माओं की शक्ति का तो कहना ही क्या? राम कृष्ण अवतार में वे पुरूष काया धारण करते है तो पुरूष ही कहा जाएगा न? वे किसी लिंग विशेष में अवतार धारण करते है अब उन अवतारों को लिंग निरपेक्ष कैसे मान लिया जाएगा?
      इसे युग"पुरूष" कहने के सन्दर्भ में भी समझें। दोनों के लिए पुरूषोत्तम उपमाएं शास्त्रीय और व्यवहार में भी है यहां पुरूष में उत्तम कहकर पुरूष मानने में आपको एतराज हो सकता है मुझे तो किंचित भी नहीं।

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    4. जी
      अपना अपना नज़रिया है | आपके कर्म आपका निर्णय हैं, मेरे कर्म मेरा निर्णय हैं |

      हाँ यह ज़रूर जान लीजिये की मैं " ऐतराज़" नहीं कर रही हूँ, "appeal" कर रही हूँ | दोनों में फर्क है |

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    5. मेरी बात का समापन मेरे इन विचारों के साथ करता हूँ, क्योंकि मेरे एक वाक्य के प्रयोग से मेरी अपनी आस्था अनास्था पर बहुत बड़ा प्रश्नचिन्ह लग रहा था। सवाल मात्र आपकी नाराजगी का ही नहीं है, आपने रेखांकित किया तो प्रकान्तर से एक सामान्य से वाक्य ने समग्र हिन्दुत्व को हानि पहुंचाने का कारण प्रतीत हो रहा है। इस भ्रम का प्रतिकार आवश्यक था। और यह स्पष्ट करना भी जरूरी था कि मेरी निष्ठाएं भी इतनी ही दूरगामी और गम्भीर है।
      प्रतिकार न करता तो निश्चित ही यह वाक्य अपराध में समायोजित कर लिया जाता।

      इसीलिए अवतारों और महापुरूषों के जीवन चरित्र पर मैं आलेख नहीं लिखता और ऐसे आलेखों पर टिप्पणी भी संक्षिप्त ही करता हूँ, पता नहीं कौनसा कथन या विचार के शब्द अपमान मान लिए जाय, और आने वाली पीढ़ी को भ्रमित करने का कारण्। उनके चरित्र पर लिखना तलवार की धार पर चलने के समान है जिनके मीन-मेख निकालने वाले न हो वे सौभाग्यशाली है।

      संजय जी के 'युगपुरूष' की तरह ही लक्ष्मी अथवा धन के लिए भी "खर्च" "हस्तान्तरण" अथवा मुहावरे में "डूब गई" या "फैक दिया" कहते हुए सौ बार सोचना होगा।
      इसलिए अपना आशय…
      1-अनास्था ओढ़ना नहीं था।
      2-न आराध्यों का अपमान।

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    6. जी - आभार |

      आप प्रतिकार न भी करते, तब भी यह वाक्य "अपराध" के रूप में नहीं, अनजाने कही गयी अनेक ऐसी बातों में सम्मिलित होता | अपराध तो वे कर रहे हैं, जो मन में अपमान का "उद्देश्य" रख कर ये बातें कहते हैं | ऊपर से मीठे बन कर, बगल में छुरी छिपाए चलते हैं | आप और संजय जी जैसे सज्जन जन तो ऐसा कर ही नहीं सकते |

      मैं जानती हूँ की आपके मन में उद्देश्य "अनास्था ओढ़ना" या"आराध्यों का अपमान" हो ही नहीं सकता | न पहले था, न अब है, न भविष्य में होगा |

      आभार :)

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    7. संजय जी को सज्जन बताया गया है, ये आप लोगों की दुरभिसंधि है और मैं इसका विरोध करता हूँ :)

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  11. आपने हिन्दुइज्म को नुकसान पहुंचाने के लिए हिन्दु को ही जिम्मेदार मानते हुए निदान स्वरूप जो इस्लामिक व इसाईयत की निष्ठा के उदाहरण, प्रस्तुत किए……

    किन्तु मैं तो नहीं मानता कि हिन्दुत्व को कोई भी इस तरह का कलमा पढ़ना चाहिए। हालांकि आर्ष ग्रंथों में ईश-वचनों पर आस्था धारण करने के लिए सूचित है फिर भी बोलने रटने या अभिव्यक्त करने मात्र से आस्था स्थापित हो जाती है ऐसी जड़ धारणा वैदिक, सनातन अथवा हिन्दुत्व में नहीं है। जहाँ कहीं भी आस्था रखने का उपदेश है वहाँ सभी जगह सम्यक आस्था ही गर्भित है। उपरी, सतही व अंध-आस्था नहीं। उस आस्था का कोई मूल्य नहीं जो मात्र कलमे की तरह कहने मात्र से हो जाती है सम्यक आस्था अन्तर्मन में दृढता से धारण करनी होती हैं। आस्था के सम्यक होने के लिए आस्था के प्रति अंधभक्ति नहीं सभी दृष्टिकोण पर सम्यक विचार के उपरांत धारण की जाती है हिन्दुत्व की ही यह विलक्षण उदार अवधारणा है जो हिन्दुत्व को सनातन शाश्वत बनाती। अपनी ही आस्था पर खुलकर समीक्षा से अंधश्रद्धा और सम्यकश्रद्धा में भेद कर पाते है और उसी से सम्यकश्रद्धा को शुद्ध रखते हुए अंधश्रद्धा का निर्मूलन कर पाते है।

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    1. @ आपने हिन्दुइज्म को नुकसान पहुंचाने के लिए हिन्दु को ही जिम्मेदार मानते हुए निदान स्वरूप जो इस्लामिक व इसाईयत की निष्ठा के उदाहरण, प्रस्तुत किए……
      पहली बात -"आपने" यह किया/ माना / कहा - नहीं मैंने कुछ नहीं कहा | जो भी कहा उसकी मैं सिर्फ निमित्त भर थी |
      दूसरी बात - मैंने कदापि यह "निदान" नहीं बताये | मैंने साफ़ तौर पर यह कहा की वे ऐसा कभी नहीं करते | यह हमारी ही speciality है की अपने आराध्यों को (जिनसे हम मनवांछित चीज़ें रोज़ प्रार्थनाओं में मांगते है - जिससे यह साफ़ है की वे जन्मे और मर गए पुरुषों से कुछ बढ़ कर हैं हमारे लिए - उन्हें lover boy / cheater / cunning / unfair and cruel towards wife (seeta ) / perpetrator of domestic violence / unfaithful to childhood sweethearts आदि आदि कहना - यह सिर्फ हम "हिन्दू" ही करते हैं - और कोई नहीं | आपको यह सब ठीक लगता हो शायद - मुझे नहीं लगता |

      @ किन्तु मैं तो नहीं मानता कि हिन्दुत्व को कोई भी इस तरह का कलमा पढ़ना चाहिए। मैं भी नहीं मानती |

      @ आस्था के सम्यक होने के लिए आस्था के प्रति अंधभक्ति नहीं सभी दृष्टिकोण पर सम्यक विचार के उपरांत धारण की जाती है हिन्दुत्व की ही यह विलक्षण उदार अवधारणा है जो हिन्दुत्व को सनातन शाश्वत बनाती।
      जी | यह सही है | लेकिन अनास्था और असम्मान का प्रदार्शन ? यह उदारता की बात नहीं सुज्ञ जी - यह एक कंडिशनिंग है | हम खुद भी नहीं जान पा रहे की किस तरह की ब्रेन वाशिंग से affected होते जा रहे हैं हम self hypnosis में |

      @ नहीं अपनी ही आस्था पर खुलकर समीक्षा से अंधश्रद्धा और सम्यकश्रद्धा में भेद कर पाते है और उसी से सम्यकश्रद्धा को शुद्ध रखते हुए अंधश्रद्धा का निर्मूलन कर पाते है। अंधश्रद्धा मैं भी नहीं रखती | किन्तु असम्मानजनक शब्दों को दोहराते जाना और अंधश्रद्धा अलग हैं |

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    2. @जो भी कहा उसकी मैं सिर्फ निमित्त भर थी |
      @……………आदि आदि कहना - यह सिर्फ हम "हिन्दू" ही करते हैं - और कोई नहीं | आपको यह सब ठीक लगता हो शायद - मुझे नहीं लगता |

      -आपके द्वारा जो भी कहा गया उसकी आप निमित्त भर थी तो……जो हम "हिन्दू" करते है, ठीक तो मुझे भी नहीं लगता किन्तु शायद किसी अभिव्यक्ति के कारण सहित निमित्त मात्र हों?

      @…जान पा रहे की किस तरह की ब्रेन वाशिंग से affected होते जा रहे हैं हम self hypnosis में |

      -ब्रेन वाशिंग की बात पर सहमत हूँ, क्योंकि यह हमारी अवधारणा ही नहीं है कि सामान्य लोगों द्वारा असम्मान के प्रदार्शन मात्र से धर्म खतरे में आ जाता है। यह निश्चित ही दूसरी अवधारणाओं से affected है।

      -असम्मानजनक शब्दों को दोहराते जाने वाले,चुन चुन कर बुराइयां ढूंढकर 'सतत' प्रयास करने वाले, न तो आस्तिक है न ही सच्चे नास्तिक और जिन्हें आप 'हम हिन्दु' कह रही है वे तो हो ही नहीं सकते। वे तो 'धर्म-विरोधी' या अ-धर्मी ही हो सकते है। जहां तक मैं समझता हूँ यह पोस्ट व प्रश्न उन्हें सम्बोधित नहीं है। और जिन्हें सम्बोधित है उनपर यह आरोप लगाया नहीं जा सकता। क्योंकि उनकी अपनी पूर्ण आस्था का दृष्टिकोण है। एक बात साफ कर दूं कि यह 'कंडिशनिंग' भी आस्था-श्रद्धा का ही प्रभाग है। अपनी अपनी आस्था ही मानस की विशेष कंडिशनिंग करती है।

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    3. @ वे तो 'धर्म-विरोधी' या अ-धर्मी ही हो सकते है। जहां तक मैं समझता हूँ यह पोस्ट व प्रश्न उन्हें सम्बोधित नहीं है।
      नहीं - यहाँ का कोई भी प्रश्न उन्हें संबोधित नहीं है |

      @ और जिन्हें सम्बोधित है उनपर यह आरोप लगाया नहीं जा सकता। क्योंकि उनकी अपनी पूर्ण आस्था का दृष्टिकोण है।
      आरोप ? आरोप लगा रही थी मैं ? आपको ऐसा लगा हो, तो क्षमाप्रार्थी हूँ | नहीं मैं आरोप नहीं लगा रही थी, मैं सबका ध्यान इस और खींच रही थी की अनजाने ही हम कुछ कर रहे हैं | आप मुझसे असहमत हैं, मैं आपसे |

      @ एक बात साफ कर दूं कि यह 'कंडिशनिंग' भी आस्था-श्रद्धा का ही प्रभाग है। अपनी अपनी आस्था ही मानस की विशेष कंडिशनिंग करती है।
      कंडिशनिंग सिर्फ आस्था श्रद्धा का प्रभाव भर नहीं है - वह बहुत सी दिशाओं से आने वाली बयारों से होती है | कंडीशन होने वाला व्यक्ति अक्सर नहीं जानता की वह किन बातों से किन बातों के प्रति और किन बातों के विरुद्ध कंडीशन होता चला जा रहा है |

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  12. ईश्वर या उसके प्रतिरूप अवतार महापुरूषों को ही हम आराध्य स्वीकार करते है। यदि उनके गुण हमारे समक्ष न हो तो कैसे पता करें वे सर्वोत्कृष्ट आराध्य है? उनके गुणों की तुलना समीक्षा तो होगी ही, यही गुणानुवाद है। अन्य कोई तरीका नहीं कि उपासना योग्य आराध्यों का महात्मय उजागर हो। इस दृष्टि से देखें तो ‘गुण’ ही हमारे आराध्य है। हम उनके दूसरे न्यून महत्वों के गुणों को गौण या उपेक्षित करते हुए विशिष्ट गुण को प्रधानता देते है। इस प्रकार विशिष्ठ गुण को पूजते हुए, समझ में न आए गुण भी यदि गौण रहे तो उस गौणता से हमारे आराध्य की आराधना व आस्था में कोई अन्तर नहीं पड़ता। अवतार युग विशेष में जन्म लेते है, युग की अपेक्षा से उन्हें युगपुरूष कहनें में कोई दोष नहीं है। यह आराध्यों का अवमूल्यन नहीं है, यह अपेक्षा भाव है गिरधर मुरलीधर की तरह, गिरि धरा तो गिरधर कहलाए और मुरली धरी तो मुरलीधर। वे ही जब चक्र धरते है तो चक्रधर कहलाने में कोई न्यूनता नहीं है।

    सत्य को हम अपनी अपनी धारणाओं पूर्वाग्रहों में संकीर्ण कर देना चाहते है, हम समझते है हमारी दृष्टि ही सर्वोत्कृष्ट है। किन्तु प्रवाह का ठहराव यहीं से प्रारम्भ होता है जो अन्ततः सड़न पर समाप्त होगा। अपने चिंतन को संकुचित कर के भी हम नई पीढ़ी को क्या अर्पण कर देंगे? उनके पास तो प्राचीन मिमांसा भी उपलब्ध न होगी यदि हमने धारणाओं को संकीर्ण कर दिया। यह तो उन पीढ़ी के समक्ष फिर से भ्रांत व्याख्याओं के लिए ऑपन स्पेस समान होगा।

    गीता में भगवान कृष्ण स्वयं अपनी तुलना जगत के दृश्यमान भौतिक सजीव निर्जीव से करते है और उसमें वे श्रेष्ट उपमा से अपनी स्थापना करते है। वस्तुओं आदि से उपमानित होने के उपरांत भी उससे भी सर्वश्रेष्ट है यह सत्य है फिर भी यह छोटी-मोटी उपमाएं धारण करने में उन्हें स्वयं कोई बाधा नहीं है। जैसे चंदा को मामा कह देने से चन्द्र के अस्तित्व को कोई फर्क नहीं पडता। उसी तरह आराध्यों के सामान्ययीकरण या मानवीयकरण से स्वयं आराध्यों की उत्कृष्टता राई भर भी अल्प नहीं हो जाती।

    आपकी चिंताएं निर्थक है, 'सनातन' एक शाश्वत 'सत्य' है, जो सूर्य के समान प्रकाशमान और मेरू के समान विशाल व उत्तंग है हम जैसे राई के दाने न उसकी विशालता, उत्तंगता को कम करने अथवा सत्य को भ्रमित करने में सक्षम है न हमारा राई सा योगदान सनातन के झंडे गाढ़ने में कोई मूल्य रखते है। सत्य स्वयं में शाश्वत है। इतना सुदृढ़ कि स्वयं ही दूध का दूध और पानी का पानी कर देता है। इसलिए सत्य कितना भी कठिन हो, सत्य उजागर होकर पारदर्शिता से व्यक्त भी जाय, अखण्ड ही रहना है। सत्य को अव्यक्त रहने की भला क्या जरूरत।

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    1. @ ईश्वर या उसके प्रतिरूप अवतार महापुरूषों को ही हम आराध्य स्वीकार करते है। यदि उनके गुण हमारे समक्ष न हो तो कैसे पता करें वे सर्वोत्कृष्ट आराध्य है? उनके गुणों की तुलना समीक्षा तो होगी ही, यही गुणानुवाद है।
      समीक्षा एक बात है - चुन चुन कर बुराइयां ढूंढते रहने के सतत प्रयास दूसरी ही बात है | दोनों में फर्क है | इस फर्क को आप मानें या न मानें - फर्क तो है ही |

      @ अन्य कोई तरीका नहीं कि उपासना योग्य आराध्यों का महात्मय उजागर हो।- तरीके तो हैं परन्तु इस पर चर्चा यहाँ नहीं |

      @ इस दृष्टि से देखें तो ‘गुण’ ही हमारे आराध्य है। - आपके आराध्य "गुण" ही होंगे | परमात्मा को निर्गुण रूप में भी समझा जाता है और सगुन रूप में भी | मेरे लिए यह साफ है की मेरी दृष्टि इतनी सम्पूर्ण नहीं, मेरी ज्ञान की परिधि इतनी नहीं की उससे नाप जोख कर मैं कृष्ण को जान सकूं | मैं उसे सिर्फ और सिर्फ विश्वास और भक्ति से ही जान सकती हूँ |आप ज्ञान पथ के यात्री होंगे, मैं भक्ति पथ पर ही ठीक हूँ |

      @ हम उनके दूसरे न्यून महत्वों के गुणों को गौण या उपेक्षित करते हुए विशिष्ट गुण को प्रधानता देते है। इस प्रकार विशिष्ठ गुण को पूजते हुए, समझ में न आए गुण भी यदि गौण रहे तो उस गौणता से हमारे आराध्य की आराधना व आस्था में कोई अन्तर नहीं पड़ता। --- शायद आपको नहीं पड़ता हो, हर एक की श्रद्धा आप और मेरी श्रद्धा से ही परिभाषित नहीं होती | यदि बचपन से बच्चा यही सुनेगा की कृष्ण धोखेबाज प्रेमी थे - तो उसके मन में वाही इमेज बनेगी | और श्रद्धा का प्रश्न ही नहीं आएगा |

      अवतार युग विशेष में जन्म लेते है, युग की अपेक्षा से उन्हें युगपुरूष कहनें में कोई दोष नहीं है। - युगपुरुष कहने में दोष हो न हो - सिर्फ युग "पुरुष" भर मान लेने में ?

      @ यह अपेक्षा भाव है गिरधर मुरलीधर की तरह, गिरि धरा तो गिरधर कहलाए और मुरली धरी तो मुरलीधर। वे ही जब चक्र धरते है तो चक्रधर कहलाने में कोई न्यूनता नहीं है। --- सो तो बात आपकी ठीक है |

      @ सत्य को हम अपनी अपनी धारणाओं पूर्वाग्रहों में संकीर्ण कर देना चाहते है, हम समझते है हमारी दृष्टि ही सर्वोत्कृष्ट है। किन्तु प्रवाह का ठहराव यहीं से प्रारम्भ होता है जो अन्ततः सड़न पर समाप्त होगा। अपने चिंतन को संकुचित कर के भी हम नई पीढ़ी को क्या अर्पण कर देंगे? उनके पास तो प्राचीन मिमांसा भी उपलब्ध न होगी यदि हमने धारणाओं को संकीर्ण कर दिया। यह तो उन पीढ़ी के समक्ष फिर से भ्रांत व्याख्याओं के लिए ऑपन स्पेस समान होगा। - सत्ये को संकीर्ण किया ही नहीं जा सकता | हाँ हम अवश्य संकीर्ण हो सकते हैं |

      @ गीता में भगवान कृष्ण स्वयं अपनी तुलना जगत के दृश्यमान भौतिक सजीव निर्जीव से करते है और उसमें वे श्रेष्ट उपमा से अपनी स्थापना करते है। वस्तुओं आदि से उपमानित होने के उपरांत भी उससे भी सर्वश्रेष्ट है यह सत्य है फिर भी यह छोटी-मोटी उपमाएं धारण करने में उन्हें स्वयं कोई बाधा नहीं है। जैसे चंदा को मामा कह देने से चन्द्र के अस्तित्व को कोई फर्क नहीं पडता। उसी तरह आराध्यों के सामान्ययीकरण या मानवीयकरण से स्वयं आराध्यों की उत्कृष्टता राई भर भी अल्प नहीं हो जाती।
      -- क्या कहा / किया जा रहा है - उससे अधिक रेलेवंत यह है की क्यों किया जा रहा है और सुनने पढने वाले पर उसका अपेक्षित असर क्या है | कृष्ण जब ओनी ये उपमाएं अर्जुन को कह रहे हैं तब वे जानते हैं की अर्जुन इन उपमाओं को भक्त भाव से ग्रहण कर रहा है | जब कृष्ण को प्यार से माँ माखन चोर कहती है - तो बड़ा प्रिय होता है | वही बात जब शिशुपाल अपमान के उद्देश्य से युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में कहता है - तो वह अपराध हो जाता है |

      @ आपकी चिंताएं निर्थक है
      मुझे कोई चिंता नहीं है - निश्चिन्त रहिये | मैं अपना कर्म कर रही हूँ | चिंता करनी होगी तो वह करता ही करेगा जो मुझसे यह कर्म करा रहा है |

      @ सत्य स्वयं में शाश्वत है। इतना सुदृढ़ कि स्वयं ही दूध का दूध और पानी का पानी कर देता है। इसलिए सत्य कितना भी कठिन हो, सत्य उजागर होकर पारदर्शिता से व्यक्त भी जाय, अखण्ड ही रहना है। सत्य को अव्यक्त रहने की भला क्या जरूरत। -सत्य वचन :)

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    2. @ मैं उसे सिर्फ और सिर्फ विश्वास और भक्ति से ही जान सकती हूँ |आप ज्ञान पथ के यात्री होंगे, मैं भक्ति पथ पर ही ठीक हूँ |

      बिलकुल ठीक फरमाया, आप कृष्ण को सिर्फ और सिर्फ विश्वास और भक्ति से ही जान सकती है। ऐसे में यह आग्रह महत्वहीन है कि सभी विश्वास और भक्ति से ही जाने। आप भक्ति पथ पर ही ठीक है, मुझे नहीं पता निर्गुण सगुण अवधारणा में क्या है और न ही दावे से कह पाउं कि ज्ञानमार्गी हूँ। किन्तु कईं भक्तिपथ अनुसरण करने वालों को व्याख्याएं मनन मंथन विवेचन करते देखता हूँ तो पता ही नहीं चलता कौन भक्तिपथ अनुयायी है और कौन ज्ञानपथगामी। भक्तिरस में डूबे सूर व मीरा प्यार से माखन चोर कहते है फिर भक्ति मार्ग इतना स्वार्थी कैसे हो सकता है कि दूसरे दृष्टिकोण वा्ले भक्त का अस्तित्व ही निषेध हो जाए?

      क्या वाकई जिन पोस्टों के संदर्भ में यह पोस्ट उपस्थित हुई है उनमें प्रयुक्त उपमाएं व कथन शिशुपाल कृत्य के समान अपराधिक है?

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    3. @ बिलकुल ठीक फरमाया, आप कृष्ण को सिर्फ और सिर्फ विश्वास और भक्ति से ही जान सकती है।
      इतना विश्वास ?

      @ ऐसे में यह आग्रह महत्वहीन है कि सभी विश्वास और भक्ति से ही जाने।
      आग्रह कोई भी "महत्वहीन" नहीं होते | वे एक सकारात्मक मानसिकता के साथ किये जाते हैं | हाँ, उन्हें स्वीकार न करना सामने वाले का अपना निर्णय होता है - वह स्वीकारे या न स्वीकारे - इससे आग्रह महत्वहीन नहीं हो जाते | आपके लिए मेरा आग्रह महत्वहीन हो सकता है, मेरे लिए बहुत महत्वपूर्ण है |

      @ आप भक्ति पथ पर ही ठीक है, मुझे नहीं पता निर्गुण सगुण अवधारणा में क्या है और न ही दावे से कह पाउं कि ज्ञानमार्गी हूँ। किन्तु कईं भक्तिपथ अनुसरण करने वालों को व्याख्याएं मनन मंथन विवेचन करते देखता हूँ तो पता ही नहीं चलता कौन भक्तिपथ अनुयायी है और कौन ज्ञानपथगामी। भक्तिरस में डूबे सूर व मीरा प्यार से माखन चोर कहते है फिर भक्ति मार्ग इतना स्वार्थी कैसे हो सकता है कि दूसरे दृष्टिकोण वा्ले भक्त का अस्तित्व ही निषेध हो जाए?
      भक्ति मार्ग स्वार्थी कैसे हो सकता है ? मैंने उसे स्वार्थी नहीं कहा - यह आपकी अपनी परिभाषा है | अभी कुछ दिन पहले यह भी पढ़ा था एक और ग्यानी पुरुष को कहते की "भक्त हमेशा अतिशयोक्ति पूर्ण होता है" अपने अपने नज़रिए हैं |

      @ क्या वाकई जिन पोस्टों के संदर्भ में यह पोस्ट उपस्थित हुई है
      मैंने यहाँ कोई सन्दर्भ नहीं दिए | हम सब ब्लॉगजगत में विचरते रहते हैं, सो हम सब यह सब पढ़ते रहते हैं | तो आप किसी पोस्ट को इसका सन्दर्भ मान सकते हैं, किन्तु मैंने बहुत सोच समझ कर इसे किसी भी सन्दर्भ से नहीं जोड़ा है | जिन्हें इशारा समझना है, जो मान लेना चाहते हैं की हाँ , अनजाने कुछ ऐसा हो रहा है जो हमारा उद्देश्य नहीं था - वे यह मान सकते हैं, और बदलाव कर सकते हैं | जो कहते हैं की नहीं हमारा मार्ग सही है, उन्हें अपना निर्णय खुद लेना है |

      @ उनमें प्रयुक्त उपमाएं व कथन शिशुपाल कृत्य के समान अपराधिक है?
      मैंने किसी को अपराधी कहा ? यदि किसी की अंतरात्मा इसे अपराध बताती है - तो वह इसे बंद कर दे | यदि सही बताती है - तो करता रहे | यह हरेक को खुद निश्चित करना है | मैंने वह कहा जो मुझे सही लगा, आप वह कीजिये जो आपको सही लगे |

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    4. @ इतना विश्वास ?
      -आपके विश्वास पर विश्वास रखना जरूरी है :)

      @ "सभी विश्वास और भक्ति से ही जाने"……आग्रह कोई भी "महत्वहीन" नहीं होते |वे एक सकारात्मक मानसिकता के साथ किये जाते हैं |
      -भक्त का यही आग्रह अतिशयोक्ति बन जाता है। भक्ति के ही दूसरे उपायों को निरस्त कर अपने भक्तिमार्ग को ही एकांत सही अनुसरण बताता हुआ भक्त अपनी ही भक्ति की श्रेष्ठता के प्रति स्वार्थी हो जाता है।

      @ जिन्हें इशारा समझना है, जो मान लेना चाहते हैं की हाँ , अनजाने कुछ ऐसा हो रहा है जो हमारा उद्देश्य नहीं था - वे यह मान सकते हैं, और बदलाव कर सकते हैं |
      -यह सायास निर्देश हो सकता है।

      @ मैंने किसी को अपराधी कहा ?
      पता नहीं, यह तो प्यार और असम्मान को रिलेवेंट करते आपके कथन से व्यक्त हुआ। भक्तियुक्त प्रेम व शिशुपाल अपराध की तुलना आपने प्रस्तुत की। अब इसे आप किसी की अंतरात्मा का अपराध बताती है तो अवश्य आत्ममंथन होना चाहिए। निश्चित ही यह हरेक को खुद निश्चित करना है कि कौनसा कृत्य आराध्यों और आस्था के प्रति विपरित परिणामी हो सकता है।

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    5. @ आपके विश्वास पर विश्वास रखना जरूरी है :)
      :) रखियेगा , और समय समय पर मुझे भी यह विश्वास देते रहिएगा | मैं बिलकुल साधारण सांसारिक स्त्री हूँ, दैनिक चर्या में आई साधारण परेशानियों आदि में घिर कर अक्सर अपने पथ से भटकती हूँ, अक्सर अपना विश्वास खो देती हूँ :)

      @ भक्त का यही आग्रह अतिशयोक्ति बन जाता है। भक्ति के ही दूसरे उपायों को निरस्त कर अपने भक्तिमार्ग को ही एकांत सही अनुसरण बताता हुआ भक्त अपनी ही भक्ति की श्रेष्ठता के प्रति स्वार्थी हो जाता है।
      ---पहली बात तो यह कि "अपने भक्तिमार्ग को ही एकांत सही अनुसरण बताता हुआ भक्त अपनी ही भक्ति की श्रेष्ठता" यह बात ही गलत है | भक्त यदि सच ही भक्त है - तो वह यह नहीं कहता कि मैं श्रेष्ठ हूँ और दुसरे कमतर हैं | यह अहंकार भक्त की निशानी नहीं |

      ---रही बात "स्वार्थ" की - तो , हो सकता है | लेकिन मुझे ऐसा नहीं लगता | अपने लिए कुछ पाने के प्रयास हों तो "स्वार्थ" माना जा सकता है | भक्ति "अपने लिए" दूसरे को नहीं बदलना चाहती कभी भी | भक्ति यदि आग्रह करती है (मैं "शिल्पा"- नहीं, बल्कि भक्ति आग्रह कर रही हो तो, मैं कोई भक्त नहीं, बिलकुल साधारण गृहस्थ स्त्री हूँ) तो इसलिए करती है कि उसके पास जो मधुर अमृत है, वह दुसरे भी चख पाएं | यह मुझे "स्वार्थ" नहीं लगता | भक्ति के आग्रह में कभी दूसरे को हराने की, अपने को दूसरे से श्रेष्ठ साबित करने की, भावना नहीं होती |

      @ जिन्हें इशारा समझना है, जो मान लेना चाहते हैं की हाँ , अनजाने कुछ ऐसा हो रहा है जो हमारा उद्देश्य नहीं था - वे यह मान सकते हैं, और बदलाव कर सकते हैं | -यह सायास निर्देश हो सकता है।
      ----नहीं - यह निर्देश नहीं है | पूरा पढ़िए - यह लिखा है "जिन्हें इशारा समझना है, जो मान लेना चाहते हैं की हाँ , अनजाने कुछ ऐसा हो रहा है जो हमारा उद्देश्य नहीं था - वे यह मान सकते हैं, और बदलाव कर सकते हैं | जो कहते हैं की नहीं हमारा मार्ग सही है, उन्हें अपना निर्णय खुद लेना है | "

      @ @मैंने किसी को अपराधी कहा ? पता नहीं, यह तो प्यार और असम्मान को रिलेवेंट करते आपके कथन से व्यक्त हुआ। भक्तियुक्त प्रेम व शिशुपाल अपराध की तुलना आपने प्रस्तुत की। अब इसे आप किसी की अंतरात्मा का अपराध बताती है तो अवश्य आत्ममंथन होना चाहिए।
      --- आपकी इंटरप्रेटेशन आपकी अपनी है | सर माथे पर | मैं तो जानती हूँ कि मैं किसी को अपराधी नहीं कह रही |

      @ निश्चित ही यह हरेक को खुद निश्चित करना है कि कौनसा कृत्य आराध्यों और आस्था के प्रति विपरित परिणामी हो सकता है।
      नहीं - कर्म हमारे अधीन हैं - उसका फल क्या निकलेगा यह भविष्य के गर्भ में है | कर्म का फल हमारा क्षेत्र नहीं | हम (आप और मैं) अंदाज़ लगाने के प्रयास कर सकते हैं कि शायद इसका परिणाम यह निकले - किन्तु यह सिर्फ अनुमान भर हैं |

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    6. @ पहली बात तो यह कि "अपने भक्तिमार्ग को ही एकांत सही अनुसरण बताता हुआ भक्त अपनी ही भक्ति की श्रेष्ठता" यह बात ही गलत है | भक्त यदि सच ही भक्त है - तो वह यह नहीं कहता कि मैं श्रेष्ठ हूँ और दुसरे कमतर हैं | यह अहंकार भक्त की निशानी नहीं |

      - (पूरी विनम्रता के साथ कहूंगा कि) मैं भी यही समझता हूँ। भ्रम हैं (और उनके कारण भी) लेकिन भक्त और भक्ति में सब कुछ अपने आराध्य पर टालने/सौंपने का चैन तो है परंतु अहंकार का स्थान नहीं। मीरा हों, भाई मतीदास-सतीदास या नरसी, आम इंसान की नज़र से देखने पर भक्तों का जीवन कष्टमय रहा है, लेकिन उन्होंने उच्च आदर्श और असम्भव को सम्भव करने के साथ निरहंकारी जीवन के उदाहरण सामने रखे हैं। आज भारत के स्वतंत्रता दिवस पर स्वाधीनता संग्राम का उदाहरण ही लें तो, अधिसंख्य स्वाधीनता सेनानी गीता के पाठक और कृष्ण के भक्त रहे हैं। दरअसल, ध्यान से न देखने पर कई बार अद्वितीय विनम्रता और अटूट सत्यनिष्ठा भी अहंकार सी दिख सकती है। एक लेख में मैंने भी याज्ञवल्क्य के जीवन की एक घटना का उदाहरण इसी भ्रम को स्पष्ट करने के लिये दिया था।

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    7. @भक्त यदि सच ही भक्त है - तो वह यह नहीं कहता कि मैं श्रेष्ठ हूँ और दुसरे कमतर हैं

      आपकी बात से अक्षरश सहमत!! सच्चे अर्थों वाले भक्त को वह उत्कृष्ट दशा अहंकार के गलन और समर्पण के बाद ही प्राप्त होती है। यह भक्ति की यह उच्च दशा अनुकरणीय है।

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  13. एक अच्छी ज्ञान वर्धक पोस्ट -
    शिल्पा जी आप तो बहुत गहराई से सोचती है !
    Hats off..
    for your deep knowledge and so keen observing thought..
    Regards

    Shravan

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  14. आपकी चिंता, आपके प्रश्नों से इत्तेफाक रखता हूँ| निशांत, अनुरागजी और सुज्ञ जी के कमेंट्स और आपके तर्क पढकर खुद को ही जवाब देने की कोशिश करूँगा, ऐसा ही आपने कहा भी है| एक बात जरूर बताना चाहूँगा, अपने धर्म पर मेरे विश्वास को उन्हीं लोगों ने और दृढ़ किया है जिनको केंद्रित करके आपने यह पोस्ट लिखी है वरना मैं भी कुछ हद तक बहुत लिबरली सोचता था, कुछ कुछ वैसा ही जैसा अरविन्द जी ने खुद के बारे में स्वीकार किया है|
    अगली बार 'युगपुरुष' जैसा कुछ लिखने से पहले मैं भी कई बार सोचूंगा, I assure.

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    1. @ आपकी चिंता, आपके प्रश्नों से इत्तेफाक रखता हूँ|
      आभार है संजय जी :)

      @ निशांत, अनुरागजी और सुज्ञ जी के कमेंट्स और आपके तर्क पढकर खुद को ही जवाब देने की कोशिश करूँगा, ऐसा ही आपने कहा भी है|
      हाँ, हम सब खुद से ही मुखातिब हैं | वैसे भी धर्म पथ की यात्रा भीतर ही उन्मुख होती है, बाहर की और उसकी परछाई भर होती है | हाँ, यदि बाहरी व्यवहार किसी और की या आने वाली पीढ़ी की यात्रा को सुगम बना सके, तो सोने पर सुहागा | :) यही बाहरी व्यवहार का असर कहीं दूसरों की, आने वाली पीढ़ियों की यात्रा में बाधक बनता हो, तो उसके बारे में कुछ करना हमारा कर्त्तव्य है |

      @ एक बात जरूर बताना चाहूँगा, अपने धर्म पर मेरे विश्वास को उन्हीं लोगों ने और दृढ़ किया है जिनको केंद्रित करके आपने यह पोस्ट लिखी है वरना मैं भी कुछ हद तक बहुत लिबरली सोचता था, कुछ कुछ वैसा ही जैसा अरविन्द जी ने खुद के बारे में स्वीकार किया है|
      जी | हर एक के अपने मार्ग हैं | बहुत fortunate हैं आप की आपको ऐसे साथी मिले जिन्होंने आपके विश्वासों को दृढ़ किया | :)

      @ अगली बार 'युगपुरुष' जैसा कुछ लिखने से पहले मैं भी कई बार सोचूंगा, I assure.
      आपने उसमे अपमानजनक कुछ नहीं लिखा था | वह एक पोजिटिव पोस्ट थी ... मैं सिर्फ यह कह रही हूँ की "युगपुरुष" को "मात्र युगपुरुष" भर मान लिया न जाए | मानती हूँ की यह आपका उद्देश्य नहीं था, आप ऐसा नहीं चाहते , लेकिन अनजाने ही ऐसा हो सकता है न ? यदि अगली पीढ़ी के बच्चे सब जगह यही पढ़ते रहे, तो वे तो यही मानेंगे न ?

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    2. इस अनजाने परिणाम के बारे में सोचकर ही ऐसा कुछ लिखने से पहले कई बार सोचने की बात कही है| हालांकि इससे बढ़कर मैं ये मानता हूँ कि हमें अपने बच्चों की सोच को रेशनल बनाने पर ज्यादा जोर देना चाहिए ताकि वो सिर्फ कहीं कुछ सुन पढकर भ्रमित न हों|

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    3. सच,है
      और सच है | हमें अपने बच्चों को रैशनल बनाना ही चाहिए | किन्तु जो ये लेख आदि पढेंगे - वे "सभी" तो हमारे अपने बच्चे नहीं होंगे | तो सामाजिक जिम्मेदारी भी है ब्लोग्लेखकों पर :) जैसे पोलिओ द्रोप्स का एड आता है न - अपने बच्चे को दवा पिला भी दी है तो सामाजिक हित के लिए इस तिथि को अवश्य पिलाएं - दो बूँद ज़िन्दगी की ....:)

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  15. सभी आदरणीय सुधीजनों,
    आवश्यक है यह समझना कि आदर के संबोधन भी व्यक्ति की गरिमा के अनुसार ही उपयुक्त लगते हैं | हम किसी को "सर" कहते हैं, आदर देने के लिए | किसी को "राजा" कहते हैं, तो भी आदर से है, और "मंत्री" कहते हैं तो भी आदरणीय ही है | किन्तु इस संबोधनों के स्थान और स्थिति में फर्क है |

    यदि हम एक सिपाही या नायब सूबेदार को कैप्टेन कहें, तो यह आदर प्रदर्शन हो सकता है (है तो अनुचित ही, फिर भी आदरसूचक है) किन्तु एक ब्रिगेडियर जनरल को कैप्टेन कह देना - ( सेना की पद की hierarchy न जानते हों, और सामने वाले को आदर देने को कह रहे हों) क्या आदर है या अनजाने में असम्मान है ?

    यह समझा जाए कि राजा को आदर देने के लिए "मंत्री जी" कहना , भले ही यह उसकी बड़ाई के उद्देश्य से कहा गया हो, किन्तु अनजाने ही उसका अपमान है |

    - जिस कृष्ण की परीक्षा लेकर ब्रह्मा जी पछताए,
    - जिस राम की परीक्षा लेकर सती माता शिव जी से दूर हो गयीं,
    - जिस बामन ने तीन पग में दुनिया नाप ली,
    - जिस कृष्ण के दिव्य स्वरुप दर्शनों के सौभाग्य को पाकर अर्जुन बारम्बार कहता रहा कि "हे परमेश्वर, मुझसे अनजाने ही बड़ी भूल हुई के मैं आपको सखा आदि कहता रहा" ,
    - जिसके आगे इंद्र का कोप गोवर्धन की छतरी से हार गया,
    - जिसने बालपन में ही अनेक अति शक्तिमान राक्षसों का खात्मा किया
    - उसे मानवमात्र समझ कर उसे अपनी सीमित बुद्धि से समझ पाने के प्रयास अक्सर असफल हो जाते हैं |

    ज्ञान यात्रियों के लिए भी पथ निर्देश हैं गीता में, कर्म पथ के यात्रियों के लिए भी हैं, भक्ति पथ के यात्रियों के लिए भी हैं |

    यदि हम ज्ञान पाना चाहते हैं सच मुच, तो अपने ही जैसे दूसरों से उसे पाने के प्रयास विफल ही होने हैं | यदि मुझे इलेक्ट्रोनिक्स इंजीनियरिंग पढनी है - तो मुझे उसी ब्रांच में एडमिशन लेकर उस ब्रांच की पुस्तकें पढनी होंगी , उसी विषय के गुरुओं के पास जाना होगा | मैं मेकेनिकल के गुरुओं के पास मेकेनिकल की पुस्तकों को कितना भी पढूं, इलेक्ट्रोनिक्स नहीं सीख सकती | ऐसे ही - कृष्ण को जानना हो ज्ञान मार्ग से तो भागवत महापुराण से जाना जाएगा, महाभारत में वे सिर्फ एक पात्र ही दिखेंगे | आपस में अपने ही जैसे ज्ञान स्तर के लोगों से वाद विवाद करने से ज्ञान नहीं मिलेगा - उचित पुस्तकें उचित गुरुओं से समझनी होंगी |

    रही बात मेरी - तो मैं तो कोई ज्ञानी हूँ नहीं - तो वही कह रही हूँ जो मुझे उचित लग रहा है | यदि मेरे कथन आपको दुखद लग रहे हैं, तो क्षमाप्रार्थी हूँ | पोस्ट में लिखा भी है - कि
    --- "लिखने वाले विद्वान् /विदुषी जन अपनी अपनी व्याख्याएं लिखते हैं, इन सभी "पात्रों" की विचारधारा / उनके किये कर्मों को अपने अपने हिसाब से परिभाषित करते हुए | कुछ प्रश्न हैं मन में - कुछ सहमतियाँ तो कुछ असहमतियां हैं | इस पर चर्चा करना चाहती हूँ | पाठकों को अनुचित लगती हो मेरी बात, तो उनकी आपत्ति सर माथे पर |

    यदि आप यह पोस्ट पढ़ कर यह कहना चाहें कि इस तरह की अवैज्ञानिक सोच रखने के कारण , मैं गंवार हूँ / अन्धविश्वासी हूँ - और अनपढ़ हूँ आदि आदि - तो ये सब आक्षेप मुझे स्वीकार्य होंगे | लेकिन मैं अपनी बात कहना चाहूंगी अवश्य | जो अपील मैं कर रही हूँ, यह सिर्फ हिन्दू धर्म के अनुयायियों से एक चर्चा या अपील है |
    (अंशुमाला जी और रचना जी के कमेंट्स के सन्दर्भ में यहाँ सुधार कर रही हूँ - यह पोस्ट सभी के लिए है, किन्तु इसमें मैंने जो अपील की है - वह सिर्फ limited audience के लिए है)"
    ----
    तो, हाँ - मैं अपनी बात पर कायम हूँ | आप मुझसे सहमत हो सकते हैं, असहमत हो सकते हैं, न्यूट्रल हो सकते हैं - यह आपका अपना निर्णय है |

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  16. स्वतंत्रता दिवस महोत्सव पर बधाईयाँ और शुभ कामनाएं

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  17. सार्थक पोस्ट,सार्थक टिप्पणियाँ.

    सभी को स्वतंत्रता दिवस महोत्सव पर बधाईयाँ और शुभकामनाएँ.

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