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बुधवार, 22 जुलाई 2015

शिव पुराण १८ : केतकी और चम्पक के फूल


केतकी और चम्पक के फूल शिव जी को नहीं चढ़ाये जाते। इस भाग में इन फूलों से ही सम्बंधित तीन कथाएं पढ़ते हैं।

१: ब्रह्मा, विष्णु, शिवलिंग और केतकी
२. सीता और केतकी
३. नारद, ब्राह्मण और चम्पक

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१: ब्रह्मा विष्णु शिवलिंग और केतकी

(brahmaa vishnu altercation and shivalinga and the ketaki flower )

पहली कथा है कि प्रलय के बाद जब सृष्टि नहीं हुई थी तब एक बार विष्णु जी और ब्रह्मा जी में बहस छिड़ गयी कि दोनों में कौन बड़ा है, कौन पूजनीय है । उन महाशक्तियों की क्रोधित बहस से संसार डोलने लगा। देवगण दौड़े हुए शिव जी के पास गए और उनसे सहायता मांगी।

शिव जी उन दोनों के मध्य प्रकाश लिंग के रूप में प्रकट हुए और गंभीर शब्द हुआ कि आप दोनों इस प्रकाश स्तम्भ का ओर छोर खोजिये। जो खोज ले वही महानतम होगा।

तब ब्रह्मा जी ने श्वेत हंस का रूप लिया और विष्णु जी ने श्वेत वराह का। हंस रूपी ब्रह्मा ऊपर को उड़ चले और वराह के रूप में विष्णु जी नीचे को गए। लम्बे समय बाद भी दोनों को कोई अंत न मिला। तब विष्णु जी लौट आये। किन्तु ब्रह्मा जी जब ऊपर जाते थे तो उन्हें ऊपर से गिरता केतकी का फूल मिला।ब्रह्मा जी ने केतकी से पूछा क्या तुम शीश से आई हो? केतकी ने कहा इस प्रकाश लिंग का कोई अंतिम सिरा है ही नहीं, यह अनादि अनंत है। जहां से मैं गिरा हूँ उससे भी बहुत ऊपर तक यह प्रकाश स्तम्भ दीखता है। कहाँ तक है इसका कोई पता नहीं।

ब्रह्मा जी ने केतकी से कहा कि हमारी स्पर्धा में मैं हारना नहीं चाहता। सो मैं कहूँगा कि मैंने सिरे को पा लिया और तुम्हे वहीँ से लाया हूँ। तुम साक्ष्य देना। केतकी मान गई। वे दोनों वहां लौटे जहां विष्णु जी थे। ब्रह्मा जी की बात और केतकी के प्रमाण पर विश्वास कर विष्णु जी ने ब्रह्मा जी को पूज्य स्वीकार किया। तब वहां शिव जी प्रकट हुए। उन्होंने कहा कि जब हमारा कोई सिरा है ही नहीं तब आपने सिरा कैसे पाया ? पूज्य होने के लोभ में आपने हमारे अंत को पाने के संदर्भ में असत्य कहा। सो अब धरती पर आप की पूजा नहीं होगी। और केतकी ने भी इस झूठ में समर्थन दिया था सो यह फूल हमारी अर्चना में कभी स्वीकार्य नहीं होगा। तब से केतकी के फूल शिव जी को नहीं चढ़ाये जाते।

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कथा २: सीता और केतकी :
(Seeta and the ketaki flower)

कथा सुनाते हुए श्री रोमहर्षण जी ने कहा कि शिवपूजा में कभी भी केतकी या चम्पक प्रयुक्त नहीं किये जाने चाहिए। मुनियों ने कारण पूछा तब उन्होंने यह कथाऐं कही।

जब श्री राम सीता और लक्ष्मण वन को चले गए तो यह दुःख श्री दशरथ जी के लिए असह्य हो गया। जीवन जीने की जिजीविषा त्याग उन्होंने स्वर्ग को प्रस्थान किया। यह खबर चित्रकूट पहुंची जहां श्री राम पत्नी और भाई सहित पर्णकुटी में निवास कर रहे थे। श्री राम दशरथ जी के ज्येष्ठ पुत्र थे और उन्हें अपरा अनुष्ठान करने थे। राम जी ने लक्ष्मण जी को सामग्रियाँ लेने गाँव भेजा किन्तु वे समय से न लौटे। दोपहर होती देख श्री राम स्वयं ही सामग्री लेने चले किन्तु उन्हें भी देर हो गयी। दोपहर से पहले संस्कार करना आवश्यक था और दोनों भाई अब तक न आये थी। सीता बहुत चिंतित थीं। आखिर समय बीतता देख सीता जी ने स्वयं ही संस्कार करने का निर्णय लिया। उन्होंने फाल्गु नदी में स्नान किया और भीगे वस्त्रों में मिटटी का दिया जलाकर पूर्वजों को पिंड अर्पित किया।

तुरंत आकाश वाणी हुई कि हे सीता , हम तुम्हारे चढ़ावे से प्रसन्न हैं और तुम्हे आशीष देते हैं (जो नारीवादी कहते हैं कि भारतीय संस्कृति स्त्री को श्राद्ध आदि का अधिकार नहीं देती वे कृपया ध्यान दें - सीता जी ने स्वयं यह अनुष्ठान किया था)। तब आकाश से दो हाथ प्रकट हुए जिन्होंने सामग्री स्वीकार की। सीता जी ने अपने आप को सम्हाला और आकाशवाणी से प्रश्न किया कि आअप कौन हैं ? शब्द हुआ कि हम ही अयोध्या पति दशरथ हैं और आपके श्वसुर हैं। हम संस्कार से तृप्त हैंआपका तर्पण स्वीकार कर रहे हैं। सीता ने चकित हो कर पूछा - हे पिताश्री। आपके सुपुत्र श्री राम और लक्ष्मण मेरी इस बात पर कैसे विश्वास करेंगे कि आकाश से हाथ आये और उन्होंने पिंडदान स्वीकारा ? वे हँसेंगे कि मैंने कैसे ऐसे हाथों को हमारे पिता दशरथ जी के हाथ मान लिया ?
श्री दशरथ बोले कि जब यह सत्य है ही तो उन्हें मानना ही होगा। फिर भी तुम चाहो तो तुम्हारे चार साक्षी होंगे। ये फाल्गु नदी जो बाह रही है , वह गाय जो वहां चर रही है , ये अग्नि जिससे तुमने यह संस्कार किया , और यह केतकी की झाडी जिसमे केतकी के फूल खिले हैं। इसके बाद वाणी थम गयी और हाथ अंतर्ध्यान हुए ।

शीघ्र ही श्री राम और लक्ष्मण सामग्री लेकर लौटे और उन्होंने सामग्री सीता को देकर जल्दी पकाने को कहा , क्योंकि बहुत समय हो चला था। बार बार कहने पर भी वे दोनों न माने कि सीता जी संस्कार कर चुकी हैं। चारों साक्षियों ने भी मना कर दिया कि उन्होंने कुछ नहीं देखा। तब सीता जी ने पति के कहने पर वह सामग्री पकाई और तब श्री राम तर्पण करने लगे। दोबारा आकाशवाणी हुई कि सीता श्राद्ध कर तो चुकी हैं और हम उनके तर्पण को स्वीकार भी कर चुके हैं। तब आप दोबारा हमें क्यों पुकारते हैं? किन्तु श्री राम को विश्वास नहीं हुआ और उन्होंने साक्ष्य माँगा । तब वाणी ने कहा कि जब हम सूर्यवंशी हैं तो आप सूर्यदेव से ही पूछ लें। तब सूर्यदेव ने कहा कि सीता सत्य कह रही हैं और चारों साक्षी असत्य कह रहे थे (नारीवादी ध्यान दें - श्री सीता जी स्त्री हैं - उनकी बात सत्य और अग्नि और गौ जैसे साक्षियों को अविश्वसनीय माना गया)।
श्री राम और लक्ष्मण जी ने श्री सीता जी से उन पर अविश्वास जताने के लिए क्षमा मांगी। अब सीता जी ने उनकी बात तो स्वीकारी किन्तु स्वयं को झूठा साबित करने दिए चारों साक्षियों को दंड में श्राप दिया ।

१. फाल्गु नदी श्रापित हुई कि अब वह सिर्फ भूगर्भ में बहेगी, बाहर नहीं।
२. केतकी कभी शिव जी को नहीं चढ़ाई जायेगी , चढ़ाई भी जाए तो अस्वीकृत होगी।
३. गाय ने अपने मुंह से झूठ कहा था। तो गाय का का मुंह अब से अशुद्ध माना जाएगा (बाकी शरीर पहले ही की तरह शुद्ध मान्य होगा - दूध, गोमूत्र और गोबर भी। )
४. अग्निदेव भी भय से काँप रहे थे कि उन्हें क्या श्राप मिलेगा। सीता जी ने कहा कि आप अब से हर वस्तु को अविवेकी होकर ग्रहण कर लेंगे - चाहे वह शुद्ध हो या अशुद्ध।

तबसे केतकी के फूल शिव जी को नहीं चढ़ाये जाते।
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चम्पक का पेड़ और नारद
(Narada and the champak tree )

गोकर्णं में एक प्रसिद्ध शिव मंदिर है। एक बार नारद जी वहां आये और वे शिव जी की पूजा करना चाहते थे। राह में उन्होंने एक चम्पक का पेड़ देखा जो बहुत सुंदर फूलों से लदा हुआ था। नारद प्रसन्न मन से उसे देख रहे थे कि ये फूल शिव जी के लिए लेकर जाएँ। तभी एक ब्राह्मण वहां आया किन्तु नारद जी के सामने फूल तोड़ने में संकोच में पड़ गया। नारद जी ने पूछा - हे ब्राह्मण , आप कहाँ जाते हैं ? ब्राह्मण ने झूठ ही कह दिया कि मैं भिक्षा मांगने जा रहा हूँ। तब नारद जी मंदिर को गए और उनके जाते ही ब्राह्मण ने सारे फूल तोड़ लिए। अपनी डलिया को वस्त्र से ढंक कर वह लौटने लगा तो मंदिर से लौटते नारद जी से फिर भेंट हुई। नारद जी ने फिर पूछा अब कहाँ जाते हो ? तो फिर ब्राह्मण ने फिर झूठ कहा - घर जाता हूँ। नारद जी को विश्वास न हुआ। उन्होंने चम्पक पेड़ से प्रश्न किया - क्या उस ब्राह्मण ने तुम्हारे फूल लिए ? चम्पक ने कहा - "क्या? कौन ब्राह्मण? आप किसकी बात कर रहे हैं ? मैं किसी ब्राह्मण को नहीं जानता। "

तब नारद जी वापस मंदिर गए जहां उन्होंने वे ही फूल शिवलिंग पर देखे। तब उन्होंने वह प्रार्थना करते दूसरे भक्त से पूछा कि ये फूल कौन लाया था?

उस व्यक्ति ने उत्तर दिया - वही दुष्ट ब्राह्मण लाया था जो अभी आपके आगे आगे आया। वह रोज़ चम्पक पुष्पों से शिव पूजा करता है और शिव जी की उस पर कृपा है। इस शिव कृपा के कारण उसने गोकर्ण के राजा को अपने चंगुल में ले रखा है और बहुत धन सम्पत्ति बनाई है। वह दुसरे ब्राह्मणों का अपमान भी करता है।

तब नारद जी ने शिव जी से प्रश्न किया कि आप क्यों ऐसे दुष्ट का साथ देते हैं ? शिव जी बोले कि यदि कोई चम्पक पुष्पों से मेरी पूजा करे तो मैं कुछ नहीं कर सकता - मुझे उसकी पूजा स्वीकार करनी ही होगी।
तब नारद जी ने सोचा ऐसे दुष्टों को शिव जी से दूर रखना आवश्यक है। उन्होंने झूठ बोलने वाले चम्पक को श्रापित किया कि अब कभी चम्पक फूल शिव जी को नहीं चढ़ेंगे। और उस ब्राह्मण को अगले जन्म में राक्षस होने का श्राप मिला। अगले जन्म में राक्षस हुआ वह ब्राह्मण शिव जी के ही हाथों से मृत्यु को प्राप्त हुआ और पुनः ब्राह्मण हुआ।

1 टिप्पणी:

  1. आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (24.07.2015) को "मगर आँखें बोलती हैं"(चर्चा अंक-2046) पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें और अपने विचारों से अवगत करायें, चर्चा मंच पर आपका स्वागत है।

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