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शुक्रवार, 26 जून 2015

शिव पुराण १७ : / घुुष्णेश्वर /घृष्णेश्वर / घुश्मेश्वर ज्योतिर्लिंगम्

इस ज्योतिर्लिंग की भौगोलिक स्थिति के बारे में भी अलग अलग मत हैं . कोई इन्हें महाराष्ट्र के औरंगाबाद के पास बताते हैं तो कोई कहते हैं कि श्री घुश्मेश्वर राजस्थान के शिवालय (शिवाड ) ग्राम में विराजमान है . यह ज्योतिर्लिंग स्वयम्भू है अर्थात यह किसी के द्वारा निर्मित नहीं किया गया , अपितु स्वयं उत्पन्न है . 

कथाएँ कहती हैं कि दक्षिण भारत में देवगिरी नामक पर्वत  पर एक ब्राह्मण "ब्रह्मवेत्ता सुधर्म" अपनी पत्नी "सुदेह" के संग वास करते थे।  उन दोनों के कोई संतान न थी जिसके कारण सुदेह दुखी रहती थीं।  उन्होंने कई व्रत उपवास किये और भी बहुत कुछ किया किन्तु संतान न हुई। सुधर्म ने ईश्वर का नाम लेकर दो पुष्प पवित्र अग्नि के समक्ष रखे और अपने मन में एक के संतान होने और दूसरे के संतान न होने के साथ सम्बन्ध जोड़ा।  उन्होंने सुदेह जी से एक पुष्प चुनने को कहा और सुदेह ज ने जो पुष्प उठाया वह संतान न होने वाला था।  तब सुधर्म जी ने मान लिया कि हमारे संतान न होगी और इस बात को स्वीकार कर शांत रहे।  उन्होंने सुदेह जी को भी नियति को मान लेने के लिए समझाया किन्तु वे बहुत दुखी हो गयीं और इसे स्वीकार न कर पा रही थीं। सुदेह को हमेशा पुत्रहीन होने से अन्य स्त्रियों द्वारा अपमानित महसूस होता।

ब्राह्मणी सुदेह चाहती थीं कि सुधर्म दूसरा विवाह कर लें किन्तु वे न मानते थे।  सुदेह अपनी भांजी (किसी कथा में भतीजी तो कहीं बहन लिखा आता है ) घूष्णा (कहीं नाम घुश्मा तो कहीं घृष्णा लिखा आता है ) से बहुत स्नेह रखती थीं।  उन्होंने अपने पति से प्रार्थना की कि घूष्णा से मेरा इतना प्रेम है , इससे तो आप विवाह कर लीजिये , इसकी संतान मेरी अपनी जैसी ही होगी और मैं उससे भी प्रेम कर सकूँगी।  सुधर्म जी ने सुदेह जी को समझाया कि अभी तुम्हे ऐसा लगता है । किन्तु जब संतान होगी तब अवश्य तुम्हे ईर्ष्या होगी और तुम अब से अधिक दुखी हो जाओगी।  किन्तु सुदेह न मानीं और ज़िद कर के दोनों का ब्याह करा दिया।

घूष्णा जी परम शिवभक्तिनि थीं।  वे रोज प्रातः शिव उपासना करतीं और १०१ शिवलिंग बना कर उनकी पूजा अर्चना करतीं।  फिर पास ही के सरोवर में उन शिवलिंगों ससम्मान विसर्जन कर देतीं।  जब एक लाख शिवलिंग बन चुके तब घूष्णा ने एक सुंदर पुत्र को जन्म दिया।  कुछ समय तो सब ठीक रहा किन्तु अब सुदेह जी को लगने लगा कि पुत्रवती घूष्णा बदल गयी है और पति भी मेरी उपेक्षा कर उसी से अधिक प्रेम करने लगे हैं।  जैसा सुधर्म जी ने पहले कहा था, सुदेह अब ईर्ष्यालु हो चलीं और घूष्णा में उन्हें अपनी सौत नज़र आने लगी।

ईर्ष्या की मारी सुदेह ने एक रात, जब सब सोये हुए थे, चाक़ू से काट कर उस बालक की ह्त्या कर दी और उसे उसी ताल में फेंक दिया जिसमे घूष्णा शिवलिंगों का विसर्जन करती थी। सुबह रोज की तरह घूष्णा पूजा करने लगीं। इधर दासी (कहीं कहीं बहु लिखा मिलता है) ने बालक को न पाया और उसके बिछौने को रक्त रंजित पाया तो सब रोने लगे।  दासी ने आकर घूष्णा जी को बताया तब वे शिव जी की अर्चना कर रही थीं।  इतनी बड़ी बात सुन कर भी घूष्णा जी ने आपा न खोया और कहा कि , जो बालक मुझे शिवकृपा से मिला उसकी रक्षा भी शिव जी ही करेंगे।  और वे अपनी पूजा तटस्थ रह कर करती रहीं।

पूजा के बाद जब वे शिवलिंग विसर्जन को गयीं तो उनका पुत्र सरोवर से निकल उनकी तरफ आता मिला।  इस पर भी वे निर्मोही ही रहीं और शिव में ही उनका ध्यान रहा।  शिव जी प्रकट हुए और उन्होंने उन्हें बताया कि किस प्रकार सुदेह जी ने यह घोर अपकर्म किया।  किन्तु घूष्णा जी ने सुदेह जी के लिए शिव जी से क्षमा मांग ली।  प्रसन्न होकर शिव जी ने उनसे एक वरदान मांगने को कहा।  तब घूष्णा जी ने उनसे वहीँ रहने को कहा और वे घुश्मेश्वर / घुष्णेश्वर / घुुष्णेश्वर / घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग के रूप में स्थापित हुए।

एक और कथा है कि , एक परम शिवभक्त "घुश्म" को यहां एक साप की बाम्बी में खजाना मिला था इस धन से उन्होंने यह घुष्णेश्वर मंदिर और शिखरशिंगणपुर का सरोवर बनवाया।  बाद में श्रीमती अहल्याबाई होल्कर (इंदौर  की महारानी) ने इस मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया था।

  

गुरुवार, 25 जून 2015

शिवपुराण १६: रामेश्वरम रामेश्वर रमेस्वरम राम्मिसेरम ज्योतिर्लिंग


रामेश्वरम नामक शहर/ क़स्बा तमिल नाडु के रामनाथपुरम जिले में स्थित है।  यह पम्बन या रामेश्वरम नामक द्वीप है जो भारतीय उप महाद्वीप से विलग है और श्री लंका के मनणार द्वीप से ५० किमी की दूरी पर है। पम्बन या रामेश्वरम द्वीप भारत की मुख्य भूमि से पम्बन सेतु द्वारा जुड़ा हुआ है।

कथा है कि यह वही जगह है जहां से श्री राम ने अपनी प्रिया सीता जी को रावण से छुड़ाने के लिए सेतु बनाया था।  एक कथा कहती है कि श्री राम ने यहाँ सेतुबंध से पूर्व शिवलिंग स्थापित कर शिव जी की उपासना की थी।  लेकिन दूसरी कथा कहती है कि सीता जी को वापस ले जाते हुए श्री राम यहां शिव पूजन करना चाहते थे।  वे यहां भारतवर्ष का सर्वोच्च शिवलिंग स्थापित करना चाहते थे, जिसके लिए उन्होंने हनुमान जी को हिमालय से शिला लाने भेजा।  किन्तु समय अधिक बीत जाने से सीता माई ने छोटे शिवलिंग की स्थापना की और तत्पश्चात वही ज्योतिर्लिंग हुआ।  दोनों ही कथाएँ कही सुनी जाती हैं।  रामेश्वरम हिन्दू "चार धाम" में से एक है और वैष्णव और शैव दोनों ही द्वारा पवित्र माना जाता है , और पूजित है।

चौदहवीं सदी में अलाउद्दीन ख़िलजी के सेनापति मलिक कफ़ूर पंड्यान राजाओं को हराते हुए यहाँ तक पहुँच गया था और यहां मस्जिद बनाई।  बाद में पन्दहवीं सदी में पंड्यान राजाओं ने फिर से यह जगह जीत ली और इसके उपरान्त यह विजयनगर साम्राज्य का हिस्सा हुआ। मदुरै नायकों में से अलग हुए सेतुपति वंशजों को सेतु के संरक्षक माना जाता है।

रामनाथस्वामी मंदिर बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक है।  यहाँ के स्तम्भ नायक शैली के हैं।  (मदुरै मीनाक्षी अम्मा मंदिर में भी यही शैली है) मंदिर का गलियारा १७ से २२ फ़ीट चौड़ा और २५ फ़ीट ऊंचा है। रामेश्वरम में चौदह तीर्थ हैं।  इनमे २४ प्रमुख हैं।  इनमे भी २२ मंदिर की परिसीमा में ही हैं।  इन जलाशयों में स्नान करना तपस्या के बराबर माना जाता है।  इनमे एक है "अग्नितीर्थम" - बंगाल की खाड़ी।  एक और है "जड़ायु / जटायु तीर्थम" - माना जाता है कि जटायु ने सीता को बचाने के लिए रावण से युद्ध किया और रावण ने उनके पंख काट दिए - तब वे इस तीर्थ में गिर पड़े थे।  "विलूंदी तीर्थम" का शाब्दिक अर्थ है "धंसा हुआ धनुष।  कहते हैं सीता जी की प्यास बुझाने के लिए श्रीराम ने यहाँ अपना धनुषसागर सागर में आप्लावित किया था। इसके अतिरिक्त हनुमान तीर्थम, सुग्रीव तीर्थम , लक्ष्मण तीर्थम प्रमुख हैं। यही पास ही गन्धमादन पर्वत भी है जहां श्री राम चरण के निशान हैं।

द्वीप का दक्षिणी छोर है धनुष्कोडी।  यहां कोटान्द्रमास्वामी मंदिर है। १९६४ के चक्रवात तूफानों में धनुष्कोडी समुद्र में डूब गया था किन्तु मंदिर अक्षुण्ण रहा।  यह नगर मध्य से १८ किमी दूरी पर है।  कहते हैं यहीं विभीषण ने श्री राम के सम्मुख आकर आत्म समर्पण किया था। चार धाम (बद्रीनाथ, पुरी, द्वारका और रामेश्वरम) यात्रा में रामेश्वरम का प्रमुख महत्व है।  बनारस की यात्रा भी यहाँ आये बिना अपूर्ण मानी जाती है।

यहाँ यह कहे बिना नहीं रहा जा सकता कि "सेतुसमुद्रम" नामक समुद्री नहर बनाने का प्रोजेक्ट विचाराधीन है।  लेकिन हिन्दू धार्मिक दल और पर्यावरण सेवी दल इसका विरोध कर रहे हैं। भारत के उच्चतम न्यायालय में यह केस २०१० से रुका हुआ है क्योंकि भारत सरकार ने यह स्पष्ट नहीं किया कि यह राष्ट्रीय स्मारक है या नहीं है।

 मंदिर   

 स्तम्भ / गलियारा

  अग्नितीर्थ   जटायु तीर्थ 

मंगलवार, 23 जून 2015

शिवपुराण १५ : नागेश्वर जगेश्वर ज्योतिर्लिंग


कथा है कि दारुक नामक एक राक्षस था जिसकी स्त्री का नाम दारुकी था।  दारुकी ने अपनी तपस्या से माता पार्वती को प्रसन्न किया और वरदान पाया कि वह जहां जाए वहीँ वन हो जाएगा।  इस वरदान के प्रभाव से दारुक बहुत उत्पात करने लगा।  वह चाहे जहां लोगों / ऋषि / मुनियों को परेशान करता, यज्ञ भंग करता , और फिर दारुकी के संग चला जाता।  वन उत्पन्न हो जाने से उसे कोई न पकड़ पाता। उसके उत्पात से परेशान होकर लोग और्वा ऋषि की शरण में गये।  उन्होंने राक्षस जोड़े को श्राप दिया कि जैसे ही वे धरती पर कोई हिंसा करेंगे, वे स्वयं विनष्ट हो जायेंगे।

राक्षसों के सम्मुख बड़ी समस्या आन पड़ी।  देवताओं को यह पता चला तो उन्होंने हमला कर दिया।  राक्षस अब न लड़ें तो देवता उन्हें नष्ट कर दें और लड़ें तो श्राप से नष्ट हो जाएँ।  यह स्थिति भांप कर राक्षस सागर में प्रविष्ट हुए।  माँ पार्वती  के आशीष से सागर में वन उत्पन्न हो गया जहां वे सुखपूर्वक रहने लगे , और यहां ऋषि श्राप का भी भी न रहा।  जल मग्न रह कर ही वे शिकार पकड़ते।  बस्ती की बस्ती पकड़ लेते और क्रूरता करते।

एक बार उनकी पकड़ में एक वैश्य "सुप्रिय " को भी पकड़ लिया , जो बड़ा शिवभक्त था। उस शिवभक्त वैश्य ने वहीं शिवलिंग स्थापित किया और "ॐ नमः शिवाय" का उच्चारण प्रारम्भ किया।  दारुक उसे मारने दौड़ा तो शिव जी तत्क्षण प्रकटे और पाशुपत अस्त्र से उन राक्षसों को खत्म किया (अन्य कथा के अनुसार शिव जी ने सुप्रिय को पाशुपत दिया जिससे उस शिवभक्त ने ही राक्षसों का विनाश किया) . इसके पश्चात सुप्रिय की प्रार्थना पर शिव जी ने वहीं ज्योतिर्लिंग रूप में निवास किया।

एक कथा है मंदिर के उलटे होने की।  कहते हैं कि नामदेव जी एक बार यहां कीर्तन करते थे।  तब किसी ने उन्हें राह छोड़ने को कहा - कि वे भगवान के दर्शन की राह में अड़ रहे हैं।  तब नामदेव जी ने उन व्यक्ति को कहा कि आप ही मुझे ऐसे जगह कर दें जहाँ प्रभु मार्ग न हो।  गुस्साए लोगों ने उन्हें मंदिर के दक्षिण में धकेल दिया लेकिन जब दर्शन करने लौटे तो द्वार घूम कर नामदेव की तरफ हो गया था।  इसीलिए मंदिर में नंदी जी की मूरत और मंदिरों की तरह मंदिर के प्रवेश द्वार पर नहीं बल्कि उलटी दिशा में हैं। इसीलिए इन्हे "औंधा" नागनाथ भी कहते हैं।

नागेश्वर ज्योतिर्लिंग की भगोलिक स्थिति के बारे में भी अलग अलग मत हैं।  कोई इन्हे महाराष्ट्र के औंध में बताते हैं , तो कोई उत्तराखंड के जगेश्वर , और कोई कोई द्वारका के पश्चिम में नागेश्वर को ज्योतिर्लिंग बताते हैं।


 औंधा नागनाथ महाराष्ट्र
  नागेश्वर द्वारका



 जगेश्वर दारुक वन अल्मोड़ा उत्तराखंड





शनिवार, 6 जून 2015

शिवपुराण १४: बैजनाथ वैद्यनाथ बैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग

बैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग मंदिर या बैद्यनाथ धाम, शिव जी के द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से एक है।  यह झारखंड के देवगढ़ में है , और मंदिर परिसर में कुल २१ मंदिर हैं (इस मंदिर की भौगोलिक स्थिति के बारे में कुछ मतभेद हैं - आगे यह चर्चा है)।

कहा जाता है कि रावण ने शिव जी को प्रसन्न करने के लिए यहीं पर कडा तप किया था । शिव जी प्रकट न हुए तब रावण ने अपने सर काट काट कर अपने आराध्य को चढ़ाना शुरू किया। दस में से नौ सर कटने के बाद जब रावण अपना दसवां सर काटने को हुआ तब शिव जी प्रकट हुए।  उन्होंने "वैद्य" का रूप धार कर घायल रावण का इलाज़ किया इसीलिए वे वैद्य नाथ कहलाये। कहते हैं यहां प्रार्थना करने पर सब मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं इसलिए इसे "कामनालिंग" भी कहते हैं।  भक्त पवित्र गंगाजल सुल्तानगंज से लाते हैं और अभिषेक करते हैं।  श्रावण और भाद्रपद महीनों में यहां मेले लगते हैं।

इसके बारे में यह भी कहा गया है कि यह श्मशान भूमिं पर है और जलती चिताओं की राख शिव जी अपने शरीर पर मलते हैं।  यहां कापालिक साधनाएं भी होती हैं।  

इस ज्योतिर्लिंग की भौगोलिक स्थिति के बारे में थोड़ी अनिश्चितता है।  जहाँ एक तरफ यह 
१. देवगढ़ (झारखंड) में बैद्यनाथ रूप में माना गया है , वहीं इसे
२.  महाराष्ट्र में परली के वैजनाथ और इसे 
३. हिमाचल प्रदेश के बैजनाथ के रूप में भी कहा जाता है।

 परली महाराष्ट्र वैजनाथ मंदिर 
 देवगढ़ झारखंड का बैद्यनाथ मंदिर 
 हिमाचल प्रदेश का बैजनाथ मंदिर 

हिमाचल प्रदेश वाले शिवलिंग के बारे में कथा है कि रावण ने तपस्या कर शिव जी को प्रसन्न किया और माँगा कि वे उसके साथ चलें।  तब श्री शिव जी ने लिंग रूप लिया और रावण से कहा कि तुम इस शिवलिंग को जहां चाहे ले जाकर स्थापित कर लो।  किन्तु यह ध्यान रखना कि रास्ते में कहीं इसे भूमि पर न रखना क्योंकि एक बार रखने पर यह स्थापित हो आएगा और फिर न हिलेगा।  रावण जब शिवलिंग ले जा रहा था तब देवताओं को चिंता हुई कि यदि शिवलिंग लंका में रहे तो रावण को हरा पाना असम्भव होगा।  उन्होंने विचारविमर्श किया और वरुणदेव से प्रार्थना की।  वरुणदेव रावण के पेट में प्रविष्ट हुए और रावण को बेचैनी हुई।  वह जानता था कि शिवलिंग भूमि पर नहीं रखना है।  तब वह किसी को खोजने लगा और उसे एक ब्राह्ण  दिखे।  उसने उन्हें शिवलिंग कुछ पल पकड़ने को कहा और जब वह लौटा तो ब्राह्मण शिवलिंग को इतनी देर न उठा पानेका कारण कह कर कारण भूमि पर रख चुके थे।  रावण ने शिवलिंग को उठाने और आगे बढ़ने की कोशिश की तो शिवलिंग को उठा पाना संभव न हो पाया।  तबसे यह शिवलिंग यहीं स्थापित है। रावण ज्ब तक जीवित था रोज़ वहां आकर अर्चना करता था।  किन्तु रावण की मृत्यु के बाद लम्बे समय शिवलिंग यूँ ही उपेक्षित रहा।  तब एक "बैजू" नामक शिकारी को ये मिले और उसने उन्हें अपना इष्टदेव मान पुनः पूजा आरम्भ की  और स्थापित किया। इसलिए ये "बैजू के नाथ" या बैजनाथ नाम से प्रसिद्ध है। 

गुरुवार, 4 जून 2015

शिव पुराण १३ : त्रियम्बकेश्वर ज्योतिर्लिंग गोदावरी गौतमी गंगा


त्रियम्बकेश्वर मंदिर महाराष्ट्र के नाशिक जिले में स्थित हैं। गोदावरी नदी के उद्गम इस मंदिर के प्रांगण में एक कुशावर्त नामक कुण्ड है जो गोदावरी नदी का उद्गम स्थल कहा जाता है। गोदावरी नदी यहां से चल कर करीब डेढ़ हज़ार किलोमीटर का सफर करने के बाद आंध्र प्रदेश से होती हुई बंगाल की खाड़ी में प्रविष्ट होती हैं।

शिव पुराण में कहा गया है कि एक बार भयंकर सूखा पड़ा।  ब्रह्मपर्वत नामक पर्वत पर महर्षि गौतम अपनी पत्नी अहल्या के साथ निवास करते थे।  गौतम ऋषि और अहल्या जी ने वहां दस हज़ार वर्षों तक पति के संग तपस्या की थी । उस समय जब भयंकर सूखा पड़ा तो अकाल आया और पशु पक्षी और मनुष्य भूख प्यास से मरने लगे। तब श्री गौतम जी ने वरुण देव से प्रार्थना की कि वहां वर्षा करावें।  किन्तु यह वरुण देव के अधिकार क्षेत्र से बाहर था क्योंकि वे जल सामग्री के देव हैं किन्तु वर्षा और मेघ इंद्रदेव का अधिकार क्षेत्र है।  तब गौतम जी ने उनसे कहा कि वहां सदा बहने वाली झील हो जिससे उस स्थल पर कभी जल संकट न आये।  यह प्रदान कर वरुण देव अंतर्ध्यान हुए।  

देवी अहल्या पति सहित वहां रहतीं थीं ।  कहते हैं कि गौतम सुबह बीज बोते और दोपहर फसल काटते और सबऋषि मुनियों और साधारण जनों को भोजन करवाते।  इससे उनके पुण्य बहुत बढ़ने लगे और इंद्र को चिंता हुई।  तब इंद्र ने वहां वर्षा करवाई जिससे ब्राह्मण अपना भोजन के लिए गौतम पर ही निर्भर न रहें और गौतम का पुण्य और न बढे। किन्तु सब ठीक हो जाने पर भी गौतम जी ने आदर सहित मुनियों को वहीँ रहने को कहा और अपना पुण्यकार्य करते रहे। 

इधर वरुण देव द्वारा प्रदान की गयी पवित्र झील का जल सभी प्रयुक्त करते।  दूसरे मुनियों की पत्नियां वहां जातीं और जल लेटिन।  जब गौतम महर्षि के शिष्य वहां जाते तो वे उन्हें भगा देतीं।  यह जानने पर अहल्या जी स्वयं जल लेने जाने लगीं।  अन्य मुनिपत्नियां न चाहती थीं कि वे वहां से जल लें और वे उनपर अनेक व्यंग्य आदि करतीं किन्तु अहल्या जी चुप चाप जल लेकर लौट आतीं।  मुनि पत्नियां अपने पतियों से अहल्या की बुराई कहतीं।  धीरे धीरे सब यह मानने लगे कि गौतम और अहल्या ही गलत हैं।  तब सब मुनियों ने गणेश जी का आवाहन किया और उनसे माँगा कि गौतम और अहल्या को यहां से भगाए दिया जाए।  गणेश जी ने यह वरदान दे दिया। 

इधर शिव जी की पत्नी पार्वती थीं किन्तु गंगा जी शिव जी की जटाओं में बसी होती हैं।  पार्वती को यह अच्छा न लगता था , और शिव जी गनगा को अलग करने पर राजी न थे।  तब गणेश जी ने अपनी माता को सुख देने और मुनियों को दिए वरदान की पूर्ती करने के लिए एक स्वांग रचा।  पार्वती जी की एक सहेली थीं - जया।  गणेश जी ने उन्हें गाय का रूप लेने को कहा और कहा कि जब गौतम तुम्हे भगाने आएं तो मरने का स्वांग रचना।  तब जाया गाय बन कर गौतम जी के खेतों में घुस गयीं।  गौतम जी ने उन्हें हटाने के लिए कुशा घास से मार तो गाय मर कर गिर पड़ी।  यह देख कर मुनियों ने "गौहत्या" का आरोप लगा कर कहा कि ऐसे पापी के संग हम न रहेंगे।  हम जा रहे हैं।  गौतम जी ने उनसे प्रार्थना की कि वे वहीँ रहें और प्रायश्चित्त का तरीका पूछा।  

मुनियों ने कहा कि उन्हें पूरी पृथ्वी की परिक्रमा करनी होगी , फिर एक महीने कठिन तप और ब्रह्मपर्वत  सौ प्रदक्षिणाएँ। इसके पश्चात सौ पवित्र सरोवरों में स्नान।  यह सब गौतम जी और अहल्या जी ने किया ।  शिव जी उनके सम्मुख प्रकट हुए और उन्हें वरदान मांगने को कहा।  गौतम जी ने यह माँगा कि वे पार्वती जी सहित सदा वहां निवास करें , और गंगा जी इस क्षेत्र में बहें। 

तब शिव जी त्रियंबक लिंग के रूप में स्थापित हुए। शिव जी चाहते थे कि गंगा जी गौतम जी के मांगे वरदान के अनुरूप वहां प्रकट हों किन्तु गंगा जी शिव जी के सर चढ़ी थीं और उतरना न चाहती थीं।  क्रोधित हो शिव जी ने तांडव नृत्य किया और अपनी जटाएं पटकीं , जिससे गंगा जी छिटक गयीं।  किन्तु केशों से छिटके पानी के छींटों की तरह गंगा जी यहाँ वहां प्रकटतीं और लुप्त हो जातीं।  गौतम जी उनमे स्नान कर अपना गौहत्या का पाप धोना चाहते थे किन्तु गंगा इतनी देर कहीं न रुकतीं कि वे स्नान कर सकें।  तब गौतम जी ने ज्योतिर्लिंग के समीप ही "कुशा" घास में उन्हें बाँध दिया (आवर्त कर दिया) इसीसे इस सरोवर का नाम "कुशावर्त" हुआ। इस कुण्ड में बंधने के बाद गंगा जी वहां से बहने लगीं। इसीलिए गोदावरी जी को "गौतमी गंगा" भी कहते हैं। 

किन्तु शिव जी मुनियों के स्वांग को जानते थे और उन्हें दंड देना चाहते थे।  गौतम महर्षि ने उन मुनियों को क्षमादान दिलवाया। गोदावरी / गौतमी गंगा के माहात्म्य की कई कथाएं आगे आएंगी। किन्तु इनमे स्नान कर लाभ लेने वालों में श्री बलराम जी, चैतन्य महाप्रभु, आदि की कथाएं बड़ी प्रसिद्ध हैं। गोदावरी जी के किनारे ही बारह वर्षों में एक बार पुष्कर मेला लगता है।  



त्रियम्बकेश्वर मंदिर











गोदावरी जी का उद्गम - मंदिर के पास कुशावर्त सरोवर।