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बुधवार, 20 फ़रवरी 2013

सभ्यता शासन क़ानून व्यवस्था दंड प्रक्रिया 4

पुराने भाग 1  2  3  

इस भाग में मैं इन व्यवस्थाओं के चलते बन गयी वर्ण व्यवस्था और वर्ग असमानता  के कारणों पर बात करूंगी । 

अगले भाग में "स्त्री - पुरुष" वर्ग विभिन्नता, और उसके अगले भाग में इन असमानताओं के चलते बन गए , सही और गलत , सामाजिक नियमों, परम्पराओं और "शोषण" आदि पर बात करेंगे 
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यह नीला भाग वह है जो मैंने पिछले भाग में मैंने कहा , इसे न पढ़ना चाहें तो यह नीला भाग छोड़ कर नीचे चले  जाएँ)

मुझे लगता है कि अपने समाज में आदर पाने की इच्छा हर मनुष्य में अन्तर्निहित है । इस निहित इच्छा की पूर्ती तभी हो सकती है जब व्यक्ति कोई न कोई ऐसा कर्म करता हो, जो उसे दूसरों के मन में सम्मानित बनाए। सम्मान प्राप्त करने योग्य कर्म क्या होंगे ? 

1. समाज की / समाज के मूल्यों की (बाहुबल , शक्ति , अस्त्र शस्त्रादि से ) रक्षा करना (क्या आज हम अपने सेना के जवानों का आदर नहीं करते क्योंकि वे अपनी जान खतरे में रख कर हमारे जीवन और समाज को रक्षित करते हैं?) 

2. ज्ञान पथ पर चलना / पुराने अर्जित ज्ञान को नयी पीढ़ी तक पहुंचाने और सम्हालने का कार्य करना / नयी नयी खोजें करना / विद्यार्जन और विद्यादान करना , वैद्य आदि हो कर लोगों की जान बचाना, दर्द दूर करना । (आज भी साइंटिस्ट डॉक्टर्स और टीचर्स का बहुत सम्मान है समाज में) ।

3. धनवान होना, समाज की / लोगों की ज़रूरतों की चीज़ें बनाना / बेचना, कई लोगों को रोजगार मुहैया करा सकना (आज के टाटा बिडला अम्बानी की तरह?)

मैं धार्मिक व्यवस्थाओं / सुव्यवास्थाओं / कुव्यवस्थाओं या अप्व्यवस्थाओं की बात नहीं कर रही, मैं सिर्फ सम्मान पाने के योग्य कर्म पथों की बात कर रही हूँ ।

मुझे लगता है की इन कर्मों में लगने वाले लोग क्रमशः क्षत्रिय, ब्राह्मण और वैश्य कहलाये होंगे समाज की नयी नयी गढन के समयखंड में जिनकी रूचि इन तीनों कर्मों में स्पेसिफिक न रही हो, वे इन तीनों कर्मों में लगे लोगों का सहयोग करने लगे होंगे, और यह "सिर्फ सहयोग" या "सेवा कर्म" बाकी तीनों कर्मों से क्षुद्र माना गया होगा ? यह "क्षुद्र" कर्म कहलाने से "शूद्र" कहलाये होंगे शायद ? ........ और ये सब कर्मपथ , धीरे धीरे , संतान मोह के कारण , और माहौल के अनुसार रुचिकर कर्मपथ का चुनाव करने की मानवीय प्रकृति, के कारण रूढ़ हो कर जन्म से जुड़ गये होंगे । 

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पहले लेते हैं कि दूसरों द्वारा ब्राह्मण को सर्वश्रेष्ठ क्यों माना गया होगा ?

ब्राह्मण विद्योपार्जन और विद्यादान में कर्मरत रहने और शोध करने वाले जन थे । जब बाकी सब वर्गों को अपनी अगली सन्तति के विद्याध्ययन और "ट्रेनिंग" के लिए ब्राह्मणों पर ही निर्भर होना होता, तो यह आवश्यक था की विद्याग्रहण करने वाले बालक के मन में यथोचित सम्मानपूर्ण भावनाएं हों । क्या हमारे बच्चे किसी ऐसे व्यक्ति से कुछ सीख सकते हैं जिसका वे आदर नहीं करते ? क्या हम अपने बच्चों को अपने गुरुओं का आदर नहीं करना सिखाते ?

न भी सिखाएं, तब भी यह बहुत ही प्राकृतिक है की 6-7 वर्ष का बालक जिस गुरु से शिक्षा ले, उसे बहुत ही ज्ञानी मानता ही है, और अक्सर माता पिटा से भी बढ़ कर टीचर की ही छवि होती है बालमन में । कई बार तो बच्चे को स्कूल में कुछ गलत भी पढ़ाया जाए, और माता उसे सही कराने का प्रयास करे - तो बच्चा यह कह कर नहीं मानता कि "मेरी मिस ने ऐसा ही कहा है" । तो जब पीढियां गुरु को श्रेष्ठ मानती हुई बड़ी होती हैं, तो स्वाभाविक है की विद्यार्जन और विद्यादान में रत व्यक्ति और समाज शेष समाज के लिए आदरणीय होते ही जाते हैं ।

लेकिन शायद कुछ पीढियां बीतने तक ब्राह्मण परिवारों में जन्मे बालक इस आदर को "अर्जित" आदर की जगह "जन्मसिद्ध अधिकार" मानने लगे होंगे - कि मैं ब्राह्मण होने (जन्मने) भर से आदरणीय हूँ । इश्वर और संसार दोनों ही के बारे में शिक्षा देने वाला वर्ग होने से उनकी authority को कोई challenge  नहीं कर पाता होगा, क्योंकि बाकी सब ने तो साड़ी "पोथियाँ पढ़ी" (या श्रुतियां सुनी ) नहीं होती होंगी , ज्ञान में तो वे ब्राह्मणों से उन्नीस ही होते । तो ब्राह्मण जन जो कह दें वही "सत्य" । कब किसने असल में कितना जोड़ा होगा, कौन जानता होगा, कौन बता सकता होगा ?
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दूसरा वर्ग है क्षत्रिय । इन्हें श्रेष्ठ क्यों माना गया होगा ?

किसी भी एक समाज के रूप में हमें दो तरह की मनुष्य निर्मित आपदाओं का सामना करना होता है । बाहरी समाजों के / राज्यों के हमले, और भीतरी अराजक तत्त्वों के / चोर डाकू लुटेरों आदि के हमले । इनसे लड़ने और समाज की रक्षा करने के लिए शक्तिवंतों का एक तबका होना आवश्यक था, जो अपने प्राणों को भी खतरे में रखते हुए भी बाहरी भीतरी हमलावारों से लडे , और समाज को सुरक्षित करे।

इसके बदले में समाज का कर्त्तव्य होता कि वह उन जान पर खेलने वालों को जीवन की सुख सुविधाओं की सामग्रियों मुहैया  कराये । सिर्फ "necessities" नहीं, बल्कि "luxuries" भी - क्योंकि आखिर वह वर्ग अपनी जान खतरे में रख कर बाकी समाज को सुख शांतिपूर्ण जीवन मुहैया कराता होगा न ? शायद् इसी के चलते राजा को "भेंट" देने की परम्परा बनी हो । ......... इसके अलावा, वही शक्तिवंत व्यक्तिसमूह , देश के बुनियादी ढाँचे (infrastructure) को भी बनवाते (सडकें नहरें आदि) तो उसके लिए भी धनराशि चाहिए ही होती - जिसके लिए "कर" व्यवस्था बनी होगी ।

क्या हम में से हर एक अपनी, अपने परिवार की और अपने अधिकारों की रक्षा स्वयं करने में सक्षम है ? क्या भीतरी या बाहरी हमलों के समय हर व्यक्ति अपनी दैनिक पारिवारिक आदि जिम्मेदारियां छोड़ छाड़ कर इस हमलों का मुकाबला कर सकता है ? क्या खेत की कटाई या बुवाई के समय बाहरी शत्रु आने से किसान युद्ध पर चला जाए ? तब समाज खायेगा क्या और जीवित कैसे रहेगा ?

तब ? समाज की रक्षा में ही रत रहने वाला एक बड़ा तबका होना चाहिए । क्योंकि बिना किसी तरह की सामाजिक क़ानून व्यवस्था के तो हर कोई उसे जो सही लगे वैसा कर सकता है । समाज है, तो नियम कायदे भी होंगे । और नियम कायदे उस समयखंड के विश्वासों, मान्यताओं और सामाजिक अपेक्षाओं के अनुरूप होंगे, जो समय के साथ बदलते रहेंगे ।

लेकिन नियम होने का अर्थ कुछ रह ही नहीं जाता जब तक उन्हें क्रियान्वित न किया जाए । जो असामाजिक व्यक्ति नियम तोड़े - उसे रोका कैसे जाए ? यदि कोई सामाजिक कानूनों के विरुद्ध जाए, चोरी करे, डकैती करे, उसे रोका कैसे जाए ?

नियम के क्रियान्वन के लिए, समाज की रक्षा के लिए शक्ति और भय आवश्यक थे, हैं और रहेंगे । "अहिंसा" का सिद्धांत बहुत सुन्दर है, किन्तु "भय बिनु होए न प्रीती" । तो - समाज को अराजकता से बचाना हो तो न्याय और सत्य के पक्ष से भी लड़ने वाले को शक्तिवान होना होगा । इस शक्तिवान वर्ग को और अधिक शक्तिवान बनाने के लिए समाज को उसे अधिकार देने होंगे, कि वह आवश्यकता होने पर "दोषियों" को दण्डित कर सके । दोष के अनुसार दंड का नियमन भले ही समाज के बुद्धिमान-गण मिल कर करते हों, या सिर्फ शक्तिवंत अकेले, किन्तु दंड प्रक्रिया के क्रियान्वन का कार्यभार आवश्यक रूप से शक्तिवंतों के ही हाथ में रहना आवश्यक होगा

जब दंड प्रक्रिया के क्रियान्वन का भार शक्तिवंतों (जो क्षत्रिय कहलाये) पर सौंप दिया गया होगा तब आवश्यक रूप से समाज ने उन्हें इस सम्बन्ध में यथोचित निर्णय लेने का उत्तरदायित्व सौप दिया होगा (उत्तरदायित्व शब्द मे अधिकार और कर्तव्य दोनों शामिल हैं ) ।

पर कहते हैं न - power corrupts  and absolute power corrupts absolutely .

तो - जिन "क्षत्रियों" को यह उत्तरदायित्व दिया गया - वे ( उस समय वाले) भले ही अपने उत्तरदायित्व के कर्त्तव्य की ओर जागरूक थे किन्तु, जब यह व्यवस्था कर्म से हट कर जन्म से जुड़ गयी होगी, तो आगामी संततियों के लिए शायद "अधिकार" बड़ा होता चला गया होगा और कर्त्तव्य गौण :(  ।

धीरे धीरे शायद राज्य शासन व्यवस्था चलाने वाले शक्तिवंतों (क्षत्रियों) ने अपना "अधिकार" मान लिया होगा प्रजा से कर लेना, उन्हें दण्डित करना, किन्तु यह भूलते चले गए होंगे कि  राज्य की रक्षा और प्रजा की रक्षा के लिए उन्हें यह स्थान दिया गया था । दुर्भाग्य से आज "डेमोक्रसी में भी यही होता जा रहा है ।
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तीसरा वर्ग है "वैश्य"
- वे - जो समाज के नए नए निर्माण के समय्खंड में , सामाजिक उपयोग की वस्तुएं बनाने और बेचने, धनोपार्जन करने, रोजगार मुहैया कराने आदि के कर्म में लगे । आरंभिक पीढियां तो genuine रूचि और कर्म से प्रेरित रही होंगी । लेकिन फिर -वही  संतान प्रेम / संतान मोह / विरासत/ आस पास के माहौल के कारण बालक पीढ़ी की रूचि का स्वयमेव उस और मुड़ जाना ।

जब एक पीढ़ी ने बड़ी बड़ी संपत्ति इकट्ठी की / कारोबार चलाया , तो स्वाभाविक रूप से वह विरासत में उसकी पीढ़ियों तक पहुंची । और वह कहते हैं न - money breeds money , तो आने वाली सन्ततियां और धनाढ्य होती चली गयी होंगी । जब धनाढ्य हुए तो धन की शक्ति बढती चली गयी होगी । धन बढ़ता चला जाने से अपने से कम धनवानों को हे दृष्टि से देखने की प्रवृत्ति भी अक्सर आ ही जाती है , सो आ गयी होगी ।
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और चौथा वर्ग है "शूद्र"
- वे, जो उस समय्खंड में ऊपर दिए कर्मक्षेत्रों (शक्ति से समाज की रक्षा, ज्ञानोपार्जन और वितरण, धनोपार्जन और सामाजिक आवश्यकता की वस्तुओं / रोगारों का उत्पादन ) में ख़ास तौर पर न रमे होंगे, वे इन सब में लगे हुए लोगों को (यथोचित पारिश्रमिक के साथ) सहयोग देते होंगे  । (उनके काम का भी उस समय खंड में उतना ही मान रहा होगा, तभी तो पारिश्रमिक मिलता होगा न ?)

धीरे धीरे समाज की भीतरी बाहरी आक्रमणों से रक्षा का का उत्तरदायित्व लिए क्षत्रिय , विद्या क्षेत्र में रत ब्राह्मण और धनाढ्य वर्गों का प्रभाव बढ़ता चला गया होगा । सबके पास एक एक शक्ति केंद्र होने से उनकी शक्ति भी बढ़ गयी होगी और साख भी ।

और जो सहयोग कर्म में लगे थे वे जान ही नहीं पाए होंगे की समय के साथ इन तीनों में से एक भी शक्तिकेंद्र उनके पास नहीं होने से उनकी स्थिति समाज में कमज़ोर पड़ती चली जा रही है । वे यह भी नहीं जान पाते होंगे कि उनके अधिकार भी बाकी सब के बराबर ही हैं - न कम न ज्यादा । स्वयं को दूसरों का "सेवक" मान कर ही जीवन यापन करते करते वे अपने शोषण को स्वीकारने पर मजबूर होते गए होंगे ।
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एक और वर्ग है -"स्त्रियाँ"
ऊपर के हर वर्ग में स्त्रियाँ हैं और पुरुष भी । वह भी करीब करीब बराबर संख्या में । और अक्सर स्त्री और पुरुष की पारिवारिक और सामाजिक स्थिति में फर्क भी है ही, हर वर्ग में ।

हम कितना भी झुठला लें सच तो यही है कि हमारे समाज में यह फर्क है । कन्या भ्रूण ह्त्या हो या दहेज़ हत्या  , आये दिन होने वाले बलात्कार हों, सड़कों पर होने वाली छेडखानियाँ हों, चेहरे अपर एसिड फेंकने की घटनाएं हों, - सब अक्सर स्त्रियों के ही साथ होते हैं । क़ानून कुछ भी कहे हम कितना ही कहें कि  यह नहीं हो रहा - लेकिन हम सब जानते हैं कि यह हो रहा है । यह सब दुर्गुण इसी सामाजिक परिवेश से आये हैं । यह कैसे और क्यों हुआ होगा - इस पर बातचीत अगली पोस्ट में - यह पोस्ट काफी लम्बी हो चली है ।

जारी ....

7 टिप्‍पणियां:

  1. ठीक है -सहमति ! अगले अंक का इंतज़ार है! कालांतर में हर वर्ग में अपने पारंपरिक कार्यों में विचलन हुआ -कारण कि ब्राहमण जहाँ दरिद्र होते गए तो उन्हें भी धनोपार्जन की स्वाभाविक जरुरत उत्पन्न हुई होगी ......द्रोणाचार्य की गरीबी देखिये ,,,,ऐसे ही सभी वर्गों में विचलन हुआ

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  2. धन, विद्या, शक्ति(संगठित या ओर्गेनाईज़्ड शक्ति की बात कर रहा हूँ) के अभाव में निश्चित ही एक वर्ग को सामान्य अधिकारों से भी वंचित रहना पड़ा। समाज के आंतरिक कारक निश्चित ही इसके जिम्मेदार रहे हैं। एक मत ऐसा भी है जो कहता है कि देश पर बाहरी शक्तियों का आधिपत्य हो जाने के बाद बहुत से ऐसे लोग जिन्होंने बलात धर्मांतरण स्वीकार नहीं किया, दंडस्वरूप क्रूर शासकों द्वारा उन्हें भी इस चौथे वर्ण में जाने को मजबूर किया गया। प्रख्यात साहित्यकार नागर जी ने अपने उपन्यास ’नाच्यौ बहुत गोपाल’ के लेखन के दौरान इस पर काफ़ी शोध किया था।
    हमारे परिवारों में विवाह तथा अन्य धार्मिक व सामाजिक संस्कार संपन्न करवाने वाले हमारे पुरोहित जी सिर्फ़ एक कर्मकांडी ब्राह्मण न होकर आधुनिक शिक्षा प्राप्त एक बुद्धिजीवी हैं(संयोगवश उनका भी मेहता सरनेम ही है:) ) जब कहते हैं कि जिन्हें उनकी पहली वाली पीढ़ी अस्पृश्य मानती थी, वे हमारे लिये श्रद्धेय हैं तो मेहताजी के लिये और अपने विचारशील धर्म के लिये मेरे मन में श्रद्धा स्वयं ही बढ़ जाती है।
    स्त्रियों के साथ होने वाले अत्याचारों को झुठलाता कोई नहीं है, कारण और निवारण के तरीकों पर जरूर मतभेद हो सकते हैं। लेकिन जैसा मैंने ऊपर मेहताजी का उदाहरण दिया, मैं सौ प्रतिशत निराश भी इसी लिये नहीं होता कि जानता हूँ, हल भी इसी समाज से निकलेंगे जिससे ये दुर्गुण निकले हैं। सिर्फ़ किसी सौ या हजार या दस हजार साल पहले लिखी किताब में आज की समस्या का हल है, ये मेरा समाज नहीं मानता।

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  3. विद्या का अध्ययन और अध्यापन करने वाले ब्राहमण ,देश या समाज के रक्षक क्षत्रिय ,व्यवसायी वैश्य , कृषि आदि अन्य काम करने वाले शुद्र . यही वर्ण प्रथा है . एक ब्राह्मण का बेटा शुद्र भी हो सकता है यदि वह कृषि करता है या वैश्य हो सकता है यदि व्यवसाय करता है. लेकिन सामाज में ब्राह्मण का लड़का ब्राह्मण माना जाता है जन्म को आधार मान कर जबकि उसके कर्म के आधार पर उसे शुद्र या वैश्य होना चाहिए.. ...वास्तव में आदि काल से
    अनपढ़ जनता को गुम राह किया गया है जिसका परिणाम आज समाज भुगत रहा है .
    latest post पिंजड़े की पंछी

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  4. बहुत बढ़िया विश्लेषण |
    शक्ति केंद्र पंडित बना, संतानों हित ज्ञान |
    क्षत्रिय रक्षा तंत्र से, दुष्टों प्रति अभियान |
    दुष्टों प्रति अभियान, वस्तु जीवन-उपयोगी |
    करे वनिक व्यापार, चाहते योगी भोगी |
    पर चौथे के पास, शक्ति के केंद्र नदारद |
    बदल परिस्थिति किन्तु, बने विद्वान विशारद ||

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  5. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति का लिंक लिंक-लिक्खाड़ पर है ।।

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  6. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति शुक्रवारीय चर्चा मंच पर ।।

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  7. बहुत गहन विश्लेषण..हमारा वर्तमान अतीत की ही उपज है.

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