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शुक्रवार, 18 अप्रैल 2014

श्रीमद भागवतम १ : नैमिशारण्य, नारद पूर्व जन्म कथा

व्यास शिष्य "रोमहर्ष" जी के पुत्र ज्ञानी उग्रश्रवा हिमालय पर्वत के दक्षिणी ढलावों पर नैमिषारण्य पहुंचे, जहां शौनक जी अन्य ऋषियों के साथ यज्ञ कर रहे थे जिससे वहां कलियुग का प्रवेश नहीं हुआ था।  ऋषियों ने श्री सूत जी से प्रार्थना की कि कलियुग के अशुभ प्रभाव से बचने का उपाय बताएं।  तब उन्होंने भागवत कथा आरम्भ की।
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व्यास जी के आश्रम के निकट सरस्वती नदी बहती थीं।  व्यास शून्य आँखों और अशांत मन से बहते जल को देख रहे थे, तभी नारद मुनि वहां पधारे।  व्यास जी ने अति विनम्रता से पूछा, :

"हे गुरुवर , आगे समयक्रम में कलि  के प्रभाव से मानव अति दुखी होगा।  इसीसे उसे बचाने के लिए मैंने एक ज्ञान को चतुर्वेदों में संपादित किया जिससे ज्ञान लुप्त न हो। कर्मकांडियों  के लिए वेद, और ज्ञानपिपासुओं के लिए उपनिषद संपादित किये।   फिर यह जानते हुए कि वेद पाठ हर मनुष्य को सुलभ नहीं, मैंने महाभारत कथानक लिखा, जिसमे गीता के माध्यम से वेदज्ञान का निचोड़ जान जान तक पहुंचाया।  महाभारत में मानव के हर शुभ अशुभ कर्म के लक्षण और फल पर चिंतन है।  यह सब होने के बाद भी मेरा मन अशांत क्यों है ? मुझे अधूरे कर्म की अनुभूति क्यों है ?

नारद मुनि ने कहा - हे ब्राह्मण - आपको यह अनुभूति इसलिए ही है कि आपका निश्चित कर्म अभी भी अधूरा ही है।

वेदव्यास जी ने विनीत भाव से इसका कारण और उपाय पूछा।  नारद जी बोले - वेदों, उपनिषदों, महाभारत और गीता के माध्यम से आप ने कर्मकांड, ज्ञान योग, सांख्य और कर्म योग तो कहा - लेकिन भक्तियोग जो सबसे सुलभ और शीघ्र फलदायी है - उस पर कुछ नहीं कहा।  ज्ञान कर्म एवं निष्काम योग की साधना हर मानव के लिए संभव नहीं।  भक्ति स्वयं फलदायी और सुलभ है - इसलिए अब आप एक नवीन ग्रन्थ की रचना करें , जिसमे सिर्फ और सिर्फ प्रभु की अनंत लीलाओं का भक्ति प्रकाश में वर्णन हो , जिसे सुन / गन / पढ़ कर मानव के मन में सहज ही उसके प्रति प्रेम और निश्छल भक्ति का प्रस्फुटन हो।  इससे ही कलिकाल में मानव कलिप्रभाव की अग्नि से शीतलता पा सकेगा।

नारद जी बोले - हे ऋषि - मेरे पूर्व जन्म की कथा कहता हूँ - सुनो।  इस पर व्यास मुनि चकित स्वर में बोले - आप तो ब्रह्मा जी की संतान हैं और इस सृष्टि के आरम्भ में आपका।   आपका पूर्व जन्म  हुआ ? तब नारद जी बोले - इस सृष्टि से पूर्व भी सृष्टि थी।  उस कल्प में मैं एक दरिद्र माता का इकलौता पुत्र था।  मेरी माता शूद्र थीं और ऋषि आश्रम में सेविका थीं।

एक बार कुछ वैष्णव भक्त चातुर्मास के लिए वहां पधारे।  मैं नन्हा बालक था इसलिए उनके ज़रूरतें पूछने के लिए उनके आस आपस रहने का कार्य मुझे सौंपा गया  (  पाठक ध्यान दें - शूद्रा ऋषि सेवा में थीं और उनका बालक वैष्णवों के साथ था - छुआ छूत  कहीं नहीं दिखती न?)

मेरे बालक रूप में भी रुचियाँ अलग थीं और मैं खेलना कूदना न कर के श्रवण में अधिक रूचि रखता था।  उन वैष्णव भक्तों को मुझसे बहुत प्रेम हो गया और उनके  रहते उनकी भक्ति  श्रवण से मेरे मन में महाविष्णु जी के प्रति अनंत प्रेम उत्पन्न हुआ।  उन सभी  के जाने का समय होने पर मैं प्रभु वियोग की कल्पना से सिहर उठा और बहुत रोने लगा।  उन्होंने मुझ बालक को सप्रेम कहा कि मेरे मन में भक्ति है , एवं अब मैं प्रभु से अलग नहीं हूँगा , और उन्होंने मुझे अपना शिष्य स्वीकारा।

इस असीम कृपा के बाद भी , मेरा माता से मोह छूट जाने के उपरान्त भी , मैं यह जानता था कि जिस माता का मैं पुत्र हूँ वह मुझसे बहुत मोह रखती हैं एवं मेरे बिना नहीं जी पाएंगी।  सो मोहरहित होते हुए भी पुत्र धर्म से बंधा मैं माँ से दूर और उन गुरु महात्माओं के संग न जा सका।

समय क्रम में सर्प दंश से मेरी माता जी सीधारीं , जिसके बाद मैं  से  प्रभु की साधना में लगा।

एक दिन जब मैं ध्यान में बैठा तो मेरे अंतर्मन में प्रभु की आकृति बनी जिस से मैं आनंदमग्न हो विभोर हो उठा।   उसी आनंदातिरेक में मेरा ध्यान टूट गया।  फिर दुबारा मुझे वह आकृति नहीं दिखी और मैं वियोग में विक्षिप्त सा हो इधर उधर उन्हें खोजने लगा।  तब आकाशवाणी हुई कि यह दृश्य मुझे अब इस जन्म में नहीं दिखेगा, यह सिर्फ मुझे यह विश्वास दिलाने को दिखा था कि वे हैं और एक बार यह देखने के बाद मनुष्य के मायाभ्रमित होने की कोई संभावना ही नहीं रहती।

वह जीवन मैंने भक्तिमय हो गुज़ारा और क्षीर सागर की तरफ आया।  प्रलय के समय मैं ब्रह्मा में लीं हुआ और इस सृष्टि के आरम्भ में उन्होंने मुझे अपने मानस पुत्र के रूप में व्यक्त किया।

यह बताने के पश्चात नारद जी वहां से चले गए और वेदव्यास जी ध्यानमग्न हो भक्ति रचना के लिए प्रभु के विभिन्न अवतरणों के ध्यान में स्थिर हो गए।

जारी .......