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गुरुवार, 29 जनवरी 2015

शिव पुराण १० - केदारनाथ ज्योतिर्लिंग


एक कथा है कि विष्णु जी के अवतार नर और नारायण (लिंक) ने बदरीनाथ धाम में शिव जी का शिवलिंग स्थापित कर, उनकी उपासना की थी। लम्बी और कठिन तपस्या के बाद शिव जी प्रकट हुए , और उन्हें कहा कि आप तो स्वयं ही पूज्य हैं, आप यह कठिन तप क्यों  कर रहे हैं। फिर भी जब आपने हमारा ध्यान करते हुए तप किया है , तो आप जो भी हमसे चाहें वह मांगें।

इस पर श्री नर और नारायण ने शिव जी से प्रार्थना की , कि वे ज्योतिर्लिंग के रूप में सदा ही केदारनाथ धाम में बसे रहें।  जो भी मनुष्य आपके दर्शन करे वह समस्त दुखों से मुक्त हो जाए।  शिव जी उनकी इस प्रार्थना को सहर्ष स्वीकारते हुए ज्योतिर्लिंग रूप में वहीँ रहने लगे ।

एक और कथा विख्यात है इस धाम के बारे में। कहते हैं कि महाभारत युद्ध में कौरवों पर विजय प्राप्त करने के बाद पांडव बड़े दुखी रहने लगे थे । अपने ही बांधवों को मार कर प्राप्त राज्य उन्हें कोई सुख न दे पाता था।  वे प्रायश्चित्त के लिए शिव जी के दर्शन करने गए।

आयु हो जाने पर पांडव द्रौपदी सहित हिमालय जाकर शिव जी की आराधना करने गए।  रुद्रप्रयाग में उन्हें ऐसा लगा मानो कि शिव जी उन्हें दिखे हैं । लेकिन जब वे उनकी तरफ जाने लगे तो शिव जी भैंस का रूप लेकर वहां से तेज़ी से भागने लगे। यह जानकार कि प्रभु हमसे क्रोधित हैं और हमसे मिलना ही नहीं चाहते, पांडव दुखी हुए।  वे उनके पीछे दौड़े और आखिर केदारनाथ धाम में उन तक पहुँच पाये।  किन्तु प्रभु शिव भैंस के रूप में धरती में प्रविष्ट हो गए।  सिर्फ भैंसे का पिछला भाग दिखता था - जिसे खींच कर बाहर निकालने का भीम ने बहुत यत्न किया , किन्तु खींच न सके।  यही आगे शिवलिंग में परिवर्तित हो गया। और भी पांच हिस्से अलग अलग शिवलिंगों में बदले - जो पंच केदार कहलाते हैं।  ये सभी गढ़वाल (उत्तराखंड) के हिमालयी क्षेत्र में हैं।




शनिवार, 24 जनवरी 2015

शिव पुराण ९ : ओम्कारेश्वर अमरेश्वर मामलेश्वर ज्योतिर्लिंग



ओंकारेश्वर और मामलेश्वर दो मंदिर हैं जो नर्मदा नदी के एक छोटे से टापू पर स्थिर हैं।  इस टापू को मन्धाता या शिवपुरी भी कहते हैं।  इसका आकार "ॐ" अक्षर जैसा कहा जाता है। यहां से जुडी अनेक कथाएं हैं।

शिव पुराण के अनुसार, एक बार नारद जी विंध्य पर्वत आये। विंध्य बहुत अहंकारी था क्योंकि वह विराट और शक्तिवन्त था।  तब नारद जी ने कहा कि तुमसे श्रेष्ठ और बड़े सुमेरु पर्वत हैं, उनपर देवगण वास करते हैं।  तब विंध्य ने शिव जी को प्रसन्न करने के लिए पार्थिव लिंग बना कर कठिन तप किया।  शिव जी प्रकट हुए और वरदान मांगने को कहा।  तब विंध्य ने उन्हें वहीँ रहने का आग्रह किया।  वहां पहले से विद्यमान ओम्कारेश्वर महादेव ने स्वयं को तब दो हिस्सों में विभाजित किया - एक अमरेश्वर कहलाये और दुसरे मामलेश्वर।

शिव जी ने विंध्य पर्वत को बढ़ने का वरदान दिया और कहा कि तुम बढ़ोगे अवश्य लेकिन भक्तों को परेशान न करना। शिव जी अंतर्ध्यान हो गए।  विंध्य बढ़ने लगा और अपना वचन भूल कर सुमेरु से महान होने की इच्छा से बढ़ता ही चला गया।  जब उसके कारण सूर्य और चन्द्र का रास्ता अवरुद्ध होने लगा तब देवगण महर्षि अगस्त्य के पास गए।  अगस्त्य जी विंध्य के पास गए और उसे कहा कि मेरे लौटने तक नहीं बढ़ना।  तब विंध्य रुका।  अगस्त्य जी अपनी पत्नी के संग श्रीशैले पर रहने चले गए और कभी न लौटे।  विंध्य पर्वत वैसे ही रुका रहा।

एक और कथा है कि मन्धाता और उसके पुत्रों ने यहाँ कठिन तप किया था जिस वजह से यहां ये स्थल स्थापित हुआ।  एक तीसरी कथा देव दानवों के युद्ध से जुडी है कि युद्ध में पराजित होते देवताओं ने यहां प्रार्थना कर के फिर से बल प्राप्त किया था।


शुक्रवार, 23 जनवरी 2015

शिव पुराण ८ : महाकालेश्वर उज्जैन


उज्जैन (म.प्र.) में तीसरे ज्योतिर्लिंग विद्यमान हैं - महाकालेश्वर।

अवन्ति नगरी में क्षिप्रा तट पर वेदप्रिय नामक ब्राह्मण रहते थे।  वे शिवभक्त थे और प्रतिदिन शिव लिंग की अर्चना करते थे। उनके चार पुत्र थे - देवप्रिय, प्रियमेध, सुवृत (धर्मबाहु), और सुकृत।  ब्राह्मण की ही  पुत्र भी बड़भागी थे और  शिवभक्त थे।  समय आने पर ब्रह्मण  ने देहत्याग किया और उनके पुत्र उन्ही की तरह शिव भक्ति में लगे रहे।

इधर रत्नाक नामक पहाड़ पर दूषण नामक दैत्य वास करता था । उसने कठिन तप कर ब्रह्मा जी से वर प्राप्त किया था और अत्यधिक  बल शाली था। उसने आसपास सब तरफ  साम्राज्य स्थापित किया था और सिर्फ इन चार ब्राह्मणों के अलावा सब तरफ  उसका भय था।  वेद स्थापित जीवन जीने की किसी को अनुमति न थी ।

जब उसे पता चला कि चार ब्रह्मण शिव आराधना करते हैं तो वह बड़ा क्रोधित  हुआ।  उसने सैनिक भेजे कि उन्हें पकड़ लाओ।   इन दैत्यों ने वहां आकर उत्पात शुरू  किया और ब्राह्मणों को आज्ञा सुनाई।  किन्तु वे  पूजन करते रहे और बात ही न सुनी। क्रुद्ध दैत्य उन्हें मारने को चढ़ दौड़े। तब भी वे पूजा करते रहे।

तभी तीव्र गर्जना हुई एवं धरती में पड़ी दरारों में से अग्निसमान शिव जी प्रकट हुए।  उन्होंने दैत्यों को मार  दिया और पर्वत  पर जा कर दूषण  का भी वध कर दिया। लौट कर उन्होंने ब्राह्मण बंधुओं से वरदान मांगने को कहा।  ब्राह्मणों ने मोक्ष माँगा और यह भी कि शिव जी सदैव उस स्थल पर रहें।  तबसे यह शिवलिंग उज्जैन में स्थित है।






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बुधवार, 21 जनवरी 2015

शिव पुराण ६ : मल्लिकार्जुन स्वामी - श्रीशैले mallikarjuna shrishaila

                

शिव और शिवा के दो पुत्र हैं - कार्तिकेय और गणेश।  जब दोनों पुत्रों के विवाह की बातें चलीं तो दोनों ही कहने लगे कि उनका विवाह पहले हो।  तब शिव और पार्वती जी ने कहा , कि जो संसार की परिक्रमा कर के पहले लौट आये - उसका विवाह पहले होगा।

कार्तिकेय जी अपने वाहन मोर पर बैठ कर प्रदक्षिणा को निकल पड़े किन्तु गणेश जी ने यह नहीं किया।  उन्होंने अपने माता पिता को अपने आसन पर बैठाया और उनकी परिक्रमा कर ली ।  तब गणेश जी ने कहा कि अब आप मेरे विवाह का प्रबंध करें।  माता पिता ने कहा कि प्रिय पुत्र, कार्तिकेय आगे चले गए हैं - तुम भी जल्दी जाओ और पहले लौटने पर ही तुम्हारा विवाह पहले होगा।  इस पर गणेश जी बोले कि वेद वाणी के अनुसार मैंने संसार की परिक्रमा कर ली है , क्योंकि वेद कहते हैं कि माता पिता की परिक्रमा संसार की परिक्रमा जैसा ही है।  क्या वेदवाणी झूठी है ?

शिव और शिवा वेदवाणी को नहीं झुठला सकते थे, तो उन्होंने  गणेश जी का विवाह करा दिया (विश्वरूप जी की पुत्रियों , ऋद्धि , और सिद्धि से। उनके पुत्र हुए क्षेम और लाभ। (कहीं लिखा आता है बुद्धि और सिद्धि से विवाह हुआ और पुत्र हुए लक्ष्य और लाभ ) जब कार्तिकेय वापस आये तो यह सब पता चलने पर बहुत क्रोधित हुए , और कभी विवाह न करने का व्रत लेकर कैलाश त्याग कर क्रौंच पर्वत पर तप करने चले गए।  पुत्र के यूँ रूठ कर जाने से माता पार्वती बहुत दुखी हुईं।

शिव जी पार्वती जी सहित बेटे को मनाने गए किन्तु कुमार कार्तिकेय न माने और वह स्थान भी छोड़ कर जाने लगे।  देवगणों के समझाने पर वे वहीँ रहे , किन्तु माता पिता के साथ नहीं।  तब शिव जी और पार्वती जी ने वहीँ समीप ही श्रीशैले में रहने का  निर्णय किया और वहां स्वयं को स्थापित किया।  कहते हैं कि शिव जी अमावस्या के दिन और पार्वती माता पूर्णिमा के दिन अपने पुत्र को मिलने आते हैं।

यहीं पास ही एक शक्तिपीठ भी है।  जब माता सती ने अपने पिता दक्ष के अपने पति के प्रति अपमानजनक व्यवहार से क्रुद्ध होकर योग-अग्नि में स्वयं को भस्म कर लिया था , तब शिव जी उनका जलता मृत शरीर उठाये संसार भर में घूमते रहे थे। तब उनका मोह नष्ट करने के लिए श्री विष्णु ने माता के शरीर के टुकड़े टुकड़े कर दिए थे - जो धरती पर यहां वहां गिर गए  थे।  उन सब जगहों पर माता के शक्ति पीठ हैं। तब यहीं माता के ऊपरी होंठ के गिरने से यहां भी एक शक्तिपीठ है।






शिव पुराण ५ : सोमनाथ जी



 गुजरात में द्वारका जी के समीप ही यह तीर्थस्थल है।  कथा है कि सती माता के पिता प्रजापति दक्ष थे।  उनकी २७ पुत्रियों का विवाह चन्द्रदेव से हुआ था। ऐसा इसलिए कि , जब ब्रह्मा जी ने अपने पुत्र दक्ष को ये कन्याएँ प्रदान  कीं तब उन्हें कहा कि , इन सब का विवाह एक ही वर से करना क्योंकि ये २७ शरीर अवश्य हैं किन्तु आत्मा एक ही है।

लेकिन चन्द्रदेव  (चन्द्रदेव का एक नाम सोमदेव भी है, जो रेवती के वर के रूप में उन्हें कहा जाता है। ) अपनी सभी वधुओं  सम्मान न देते थे।  वे रोहिणी के ही प्रति अत्यधिक प्रेममय थे।  इससे बाकी पत्नियां, मुख्यतः रेवती , दुखी रहती थीं।  यह बात दक्ष से कही जाने पर दक्ष ने कई बार चन्द्रदेव  समझाया लेकिन उनके व्यवहार में कोई फर्क न आया। इससे क्रुद्ध हो कर दक्ष प्रजापति ने चन्द्रदेव को श्राप दिया कि वे क्षयग्रस्त होंगे और धीरे धीरे लुप्त होते जाएंगे।

श्राप के प्रभाव से चन्द्रदेव क्षय होने लगे और उनका तेज जाता रहा।  तब चन्द्रदेव ने मार्कण्डेय जी से महामृञ्जय मन्त्र (इसकी कथा आगे आएगी) प्राप्त किया और द्वारका के समीप सरस्वती नदी के किनारे शिवलिंग स्थापित कर वहाँ मृत्युंजय मन्त्र का पत्नियों सहित पाठ  किया।  इस पाठ के पश्चात शिव जी प्रकट हुए और उनसे वर मांगने को कहा।

चन्द्रदेव ने  संगिनियों सहित अपनी कथा कही और प्राणरक्षण माँगा।  शिव जी बोले , दक्ष प्रजापति का श्राप पूरी तरह ख़त्म तो नहीं हो सकता , किन्तु मैं उसका प्रभाव काम कर दूंगा। आपने अनुचित व्यवहार किया ही है और आप दंड के अधिकारी भी हैं। जब आपने सभी कन्याओं के संग विधिवत विवाह किया था तब आपका कर्त्तव्य था कि आप उन सब को बराबर प्रेम और सम्मान दें। इसलिए दक्ष का श्राप अनुचित न था। इस पर चन्द्रदेव ने आगे यह भूल न दोहराने का वचन लिया।

शिव जी ने कहा, मैं आपको अपने सर पर धारण करूंगा जिससे आपकी रक्षा होगी।  पंद्रह दिन प्रजापति दक्ष के श्राप के असर से आप कम होते जाएंगे , और यह समय खंड "कृष्ण पक्ष" कहलायेगा।  फिर पंद्रह दिन आप बढ़ेंगे और अपने पूर्व रूप में लौट आएंगे जो "शुक्ल पक्ष" कहलायेगा।

तब सभी संतों, चन्द्रदेव, अत्रि जी और अनुसूया जी (चन्द्रदेव के माता पिता ) , और अन्य सभी देवगणों ने प्रार्थना की कि इस स्थान पर स्वयंभू शिव जी सदैव रहें।  यह ज्योतिर्लिंग "सोमनाथ"  प्रसिद्ध है। मान्यता है कि यहाँ आकर पूजन करने से सभी बीमारियां दूर हो जाते हैं।

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जारी ……