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शुक्रवार, 19 अक्तूबर 2012

देवी कथाएँ 3


ब्रह्माण्डों  के होने से पूर्व , और ब्रह्माण्डों की समाप्तियों के बाद , जो दैवी शक्ति है (या रहती है) , वैष्णव इसे नारायण / नारायणी या राधकृष्ण का नाम देते हैं, तो शैव इन्हें सदाशिव और आदिशक्ति । ये सत चित और  आनंद हैं,  अव्यक्त, अचिन्त्य, अविकार्य हैं ।

जब शिव और शिवा के मन में यह इच्छा आई कि  सञ्चालन को एक और पुरुष हो, तो एक सत्त्वगुणी पुरुष का प्रादुर्भाव हुआ, जो व्यापक होने से "विष्णु" कहलाये ।वे तपस्या में विलीन हो गए, और उनके शरीर से अनेक जलधाराएं (जल = नीर) फूटीं और आकाश जलमय हो गया । विष्णु ने (स्वयं) नीर में स्वयं के शेष (भाग) पर शयन किया , जिससे उनका नाम शेषशायी या नारायण भी हुआ । उनसे ही सभी तत्त्व,गुण , त्रिविध अहंकार तन्मात्राएँ,  पञ्च भूत, ज्ञानेन्द्रियाँ और कर्मेन्द्रियाँ प्रकटीं ।

फिर शेषशायी नारायण की नाभि से कमल उगा, जिसपर ब्रह्मा का प्राकट्य हुआ ।ब्रह्मा के तप पर चतुर्भुज विष्णु प्रकटे, जिन्होंने उन्हें ज्ञान दिया । बाद में किसी तर्क के समाधान के लिए उन दोनों के बीच महान ज्योतिर्लिंग प्रकट हुए, जिन के आदि अंत का पता वे दोनों न लगा सके । दोनों की प्रार्थना पर ज्योतिर्लिंग से उमाशिव प्रकटे । ब्रह्मा को सृष्टि करने और विष्णु को सृष्टि पालने का कर्म मिला ।

ब्रह्मा ने अंजुली भर कर जल उछाला जो अंडे की आकृति में फ़ैल गया और ब्रह्माण्ड उत्पन्न हुआ, किन्तु चेतन न हुआ । फिर श्रीविष्णु ने उस अंड में अनंत रूप में प्रवेश किया जिस से वह चेतन हुआ । किसी बात पर क्रुद्ध होकर रोते हुए ब्रह्मा के माथे से रूद्र प्रकट हुए ।

ब्रह्मा के शरीर से (दायें अंगूठे से) दक्ष प्रजापति प्रकट हुए, जिनकी संगिनी हुईं प्रसूति 

ब्रह्मा के कहने पर (रूद्र की अर्धांगिनी बनने के लिए)  दक्ष ने सदाशिव की चिर संगिनी आदिशक्ति, की 3 हज़ार  वर्षों तक, तपस्या और आराधना की और जब माँ प्रकट हुईं तो उनसे कहा "हे जगन्माते, हे जगदम्बिके । सदाशिव ने ब्रह्मा पुत्र के रूप में (रूद्र) अवतार लिए है  । उनकी संगिनी होने के लिए आप मेरे घर पुत्री रूप में पधारें" । माँ ने उन्हें वरदान दिया की मैं तुम्हारी पुत्री तो बनूंगी, किन्तु यदि तुमने कभी भी मुझे अप्रसन्न किया, तो मैं तुरंत तुम्हारी दी हुई देह त्याग दूँगी । दक्ष ने यह शर्त स्वीकार की , और समय के साथ उनके घर में माँ ने सती के रूप में जन्म लिया ।

पति को पाने के लिए ताप करने के बाद सती का ब्याह शिव से हुआ , और एक बार शिव जी के साथ विहार करते सती ने श्री राम को सीता की खोज में पागलों की तरह रोते बिलखते देखा । सती माँ के मन में आया की मेरे पति जिन राम को ईश्वर मानते हैं, वे स्त्री के लिए ऐसे मोहित हैं ? और उन्होंने समयक्रम में श्री राम की परीक्षा लेने के लिए सीता का रूप लिया और उनके सामने गयीं । श्री राम उन्हें तुरंत पहचान गए और पूछा कि हे माते, आप यहाँ वन में अकेली क्या कर रही हैं , शम्भू कहाँ हैं । इसपर सती ने राम की सत्यता जान ली किन्तु दिव्य दृष्टि से यह सब जान लेने पर शिव शम्भू अपने आराध्य की पत्नी का रूप ले चुकी सती को पत्नी रूप में न देख पाए । सती मन में यह जान गयीं और उदास रहने लगीं ।

समयक्रम में  दक्ष ने एक यज्ञ आयोजित किया, जिसमे उन्होंने शिव को नहीं बुलाया । बिना बुलाये भी सती वहां जाना चाहती थीं और शिव जी के समझाने के बाद भी वे गयीं । वहां उन्हें बड़ा अपमानित महसूस हुआ, पिता और बहनों ने उन्हें मान न दिया,  और सिर्फ माँ ने ही उन्हें प्रेम और सम्मान दिया । यज्ञ में सब देवताओं के भाग थे, किन्तु शिव जी का न था, जिस पर सती माँ ने आपत्ति की और दक्ष ने शिव जी के लिए बड़े अपशब्द कहे । इससे कुपित होकर सती वहीं योगाग्नि में दक्ष से जन्मी अपनी देह को त्याग दिया ।

यह जान लेने पर शिव जी ने वीरभद्र को वहां भेजा, जिन्होंने यज्ञ ध्वंस कर दिया और दक्ष की गर्दन काट दी । शिव जी सती के जले हुए शरीर को हाथों में उठाये यहाँ वहां भटकने लगे  ।उनके मोह को तोड़ने के लिए विष्णु जी ने सुदर्शन चक्र से सती माँ के शरीर के टुकड़े कर दिए , जो धरती पर अलग अलग जगह गिरे ।

जिस जगह माँ की "जीभ" गिरी, वहां से अग्नि की जिव्हायें हमेशा निकलती रहती हैं, और वह स्थान ज्वालादेवी के नाम से प्रसिद्द है । मुग़ल सम्राट अकबर ने इस आग को बुझाने के लिए कई प्रयास किये, वहां मोटे मोटे लोहे ले ढक्कन भी ठोके गए, जिन सब को पिघला कर ज्वाला फिर ऊपर आ गयी । बाद में अकबर ने समझा, और प्रायश्चित्त के रूप में वहां सोने का छत्र चढ़ाया ।

किन्तु माना जाता है की माँ ने यह स्वीकार नहीं किया, क्योंकि वह एक अनजानी धातु में परिवर्तित हो गया ।

जय माता दी ।

6 टिप्‍पणियां:

  1. सृष्टि पुराण से लोकवेद तक का मनोरम आख्यान -आनंद आया !

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  2. उमाशिव = डोंट गो शिवा! जम्मू की शामें याद आ गईं जहाँ वैष्णो देवी के साथ ज्वाला जी के भजन भी फ़िज़ाओं में गूंजते थे, खासकर अकबर के छत्र चढाने का ज़िक्र करते हुए।

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    1. जी. आपकी इस बात पर वह कह रही हूं जो कथा में नहीं कहा. माता की माता जी में उन्हे तप को जाने से रोका था " उमा" कह कर. इस से इस अवतार में मां का नाम उमा हुआ था ... :)

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  3. जय हो.
    कथा क्रम रोचक और जानकारीपूर्ण है.
    आभार.

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  4. इस श्रृंखला को पूरा कर पुस्तक प्रकाशित करें -अच्छे प्रकाशक से बात करें -बेस्ट सेलर बनेगी -मेरा आशीर्वाद है -पक्का!

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