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गुरुवार, 18 अक्तूबर 2012

देवी की कथाएँ 2


नवरात्र पर्व के तीसरे दिन माँ को मेरा प्रणाम पहुंचे ।

आज वैष्णो देवी धाम से जुडी दो कथाएँ कहती हूँ । फिर एक बार दोहरा दूं, कि कथा मेरी नहीं है । जो जानती हूँ, बड़ों से सुना है - बस दोहरा भर रही हूँ ।

1.
कहते हैं कि त्रेता युग में दुष्ट राक्षसों से परेशान देवताओं की रक्षा के लिए एक दैवीय कन्या का अवतरण हुआ, जो "त्रिकुटा" कहलाई । उस कन्या ने वैष्णव धर्म का प्रसार किया , और कालान्तर में "वैष्णो" कहलाई । बाद में पिता की आज्ञा लेकर वे तपस्या को चली गयीं, और श्री विष्णु जी की आराधना करने लगीं । 

तब रामावतार का समय था । श्री राम अपनी पत्नी श्रीसीता जी की खोज में वहां पहुंचे, और उन्होंने त्रिकुटा से अपना नाम और तपस्या का उद्देश्य पूछा । तब उन्होंने श्री राम को बताया कि वे उन्हें मन से पति रूप में स्वीकार कर चुकी हैं , और उन्हें प्राप्त करने के लिए तपस्या कर रही हैं । श्री राम ने उस अवतार में एक पत्नीव्रत धारण किया था । फिर भी, उनके ताप को निरुद्देश्य न जाने देने के भाव से, श्री राम ने उन्हें कहा कि वे बदले रूप में उनके सम्मुख आयंगे और यदि वे उन्हें पहचान सकीं, तो उन्हें स्वीकार कर लेंगे । 

बाद में श्रीलंका से लौटते हुए श्री राम त्रिकुटा के आगे एक वृद्ध सन्यासी के रूप में आये, जब वे उन्हें न पहचान सकीं  । तब अपने असल रूप में आकर श्री राम ने उन्हें आशीर्वाद दिया कि वे कलियुग में कल्कि अवतार के रूप में प्रकट होंगे, और तब उनसे विवाह करेंगे । तब तक वे हिमालय के त्रिकूट पर्वत पर रहें , और भक्त जनों की मनोकामनाएं पूर्ण करें ।

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2.
श्रीधर नामक एक ब्राह्मण, श्री वैष्णो देवी के बहुत बड़े भक्त थे । वह कटरा के पास हंसाली नामक गाँव में रहते थे । एक बार माँ ने उन्हें एक सुन्दर कन्या के रूप में दर्शन दिए, और "भंडारा" करवाने के लिए कहा । ( भंडारा का अर्थ है भक्तों को भोजन करवाना) । श्रीधर धनवान नहीं थे, न ही उनमे भोज करवाने की आर्थिक क्षमता थी । किन्तु माँ के आदेश को सर माथे पर लेकर उन्होंने गाँव के सभी वासियों को आमंत्रित किया । 

उस समय वहां भैरवनाथ नामक एक तांत्रिक वास करते थे । श्रीधर जी ने उन्हें भी बुलाया, और उन्होंने चेतावनी दी कि उन्हें संतुष्ट न कर सकने का परिणाम बुरा होगा । श्रीधर के पास धन तो था नहीं , वे भोज को लेकर बड़े चिंतित थे । तब माँ उनके सामने फिर से प्रकट हुईं, और कहा कि वे चिंतित न हों, वे स्वयं सारा प्रबंध करेंगी । और ऐसा ही हुआ भी । श्रीधर जी की छोटी सी झोपडी में माँ ने 360 व्यक्तियों को बैठाया भी, और भरपेट भोजन भी परोसा । 

भोज में भैरवनाथ ने कहा कि  वे तो तांत्रिक हैं, और निरामिष भोजन उन्हें स्वीकार्य नही। उन्हें तो मांस आदि ही चाहिए। किन्तु कन्या ने इनकार करते हुए कहा कि वैष्णव भोज में सिर्फ सात्विक भोजन ही परोसा जाएगा, तामसिक भोजन नहीं । इस पर क्रोधित होकर तांत्रिक ने अपनी चेतावनी याद दिलाते हुए श्रीधर को डराया , और उसकी रक्षक कन्या पर हमला किया ।

ध्यान देने की बात है कि कई सम्प्रदायों में देवी के आगे पशुबलि का प्रचालन है - जिसका हम पुरजोर विरोध करते हैं । यहाँ माँ का भैरवनाथ को मांसाहार के लिए इनकार उसी विरोध का प्रामाणीकरण है मेरी नज़र में । भैरंव्नाथ तांत्रिक पद्धति के अनुगामी थे और देवी के आगे पशु बली के समर्थन की बात है यह मांसाहार की मांग ।

देवी जानती थीं कि भैरवनाथ एक भक्त है, और वे उसका वध नहीं करना थीं । वे वहां से त्रिकूट पर्वत की तरफ चली गयीं । भैरंव उनका पीछा करने लगा । 

** माँ ने उसकी तरफ एक बाण चलाया, जो धरती में धंस गया और वहां से "बाणगंगा" प्रकट हुई । कहते हैं कि बाणगंगा में स्नान करने वाले भक्त के सारे पाप धुल जाते हैं । नदी के किनारे पर माँ की "चरणपादुका" के निशान हैं ।

** फिर माँ यहाँ से आगे बढीं, और अर्धक्वारी के पास "गर्भ गुफा" में छुप गयीं । यहाँ वे नौ महीने तक रहीं । कहा जाता है कि इस बीच रामभक्त श्री बजरंगबली गुफा के बाहर पहरा देते रहे । 

[** इससे कुछ ऊपर और बढ़ने पर "सांझी छत" आता है , और आखिर में माँ की टेकरी आती है । ]

** यहाँ से निकल कर माँ और ऊपर को बढीं, और भैरंव के हमले करते रहने से उन्हें महा काली का रूप लेना पडा, और माँ ने भैरंव का वध कर दिया । 

सर कट जाने पर कटे हुए सर ने माँ से कहा कि वे जानते थे की माँ कौन हैं, और उन्होंने यह सब इसलिए किया , जिससे माँ के हाथों से मृत्यु होने पर उन्हें मोक्ष मिल जाए । किन्तु उन्होंने दुःख प्रकट किया कि माँ के भक्त उन्हें हमेशा इस शैतानी रूप के ही लिए याद करेंगे । 

इस पर माँ ने उन्हें वचन दिया , कि जो भक्त मेरे दर्शन को आयेंगे, उनके दर्शन तभी सम्पूर्ण माने जायंगे जब वे भैरंवनाथ के स्थान पर भी जाकर दर्शन करेंगे । आज भी भक्त वैष्णो माँ के दर्शनों के बाद भैरंवानाथ के दर्शनों को जाते हैं । 

फिर माँ पिंडियों के रूप में परिवर्तित होकर तपस्यारत हो गयीं । इधर माँ के इंतज़ार में अधीर श्रीधन ने स्वप्न में देखे हुए रास्ते पर उन्हें खोजना शुरू किया, और आखिर पिंडियों तक पहुँच गए । तब से श्रीधर पंडित और उनके वंशज यहाँ पूजा आराधना करते हैं ।
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आभार । जय माता दी ।

13 टिप्‍पणियां:

  1. मां के दिनों में की मां की यह कथा ...
    आभार आपका इसे साझा करने के लिए

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  2. ये कथायें भोले मानुषों के लिए हैं! ताकि उनकी आस्था और विश्वास जीवन में बना रहे !

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  3. ये कथायें भोले मानुषों के लिए हैं! ताकि उनकी आस्था और विश्वास जीवन में बना रहे !

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  4. जी बिल्कुल..

    किन्तु हम अब भोले नहीं रहे . चमत्कारों को, देवी देवताओं की कथाओं को, अवतारों को,.... मानने में हमारा ग्यान आडे आता है,

    ओशो कई बार कहते हैं कि पूर्ण हो या बिल्कुल न.. अधूरा ग्यान बडा डेन्जरस है..

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  5. भोले बने रहने में बुराई क्या है , कहते हैं इश्वर भोलों के बस में होते हैं :)
    लोक आख्यान सी ये कथाएं कितने सन्दर्भ और व्याखाएं छुपाये रखती हैं , बस उन्हें समझा जा सके !

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  6. जय माता की कथाओं से परिचित कराने के लिये आभार्।

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  7. जय माता की.सुन्दर कथा.
    शेयर करने के लिए आभार.

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  8. सुन्दर कथा
    आपकी इस प्रस्तुति की चर्चा कल सोमवार [07.10.2013]
    चर्चामंच 1391 पर
    कृपया पधार कर अनुग्रहित करें |
    नवरात्र की हार्दिक शुभकामनाओं सहित
    सादर
    सरिता भाटिया

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  9. सुन्दर प्रस्तुति-
    आभार आदरणीया--

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  10. पहली बार यह कथा सुनी है। . . .
    आभार आपका !

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  11. आदरणीया शिल्पा जी, आपने इस पावन समय में माँ की कथाओं से ज्ञान बढ़ाया इसके लिए आपका बहुत बहुत आभार , कृप्या आगे भी इसी तरह ब्लॉग के माध्यम से पौराणिक कथाओं को लिखते रहें।

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