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शनिवार, 31 मई 2014

श्रीमद भागवतम सुखसागर -२ : महाभारत युद्ध का अंत, अश्वत्थामा, पांडवों का वनगमन

भाग १ 

महाभारत युद्ध अपने अंतिम क्षणों की तरफ अग्रसर था।  दुर्योधन भीम के अनुचित आघातों से घायल मृत्यु के इंतज़ार मे लाचार पड़ा हुए थ।  अश्वत्थामा के लिए  यह सब असह्य था -  उसे अपने पिता की अन्यायपूर्ण हत्या और दुर्योधन की पीड़ा सहन नहीं हो रही थी।  सो रात के समय वह पांडवों के नामोंनिशान को समाप्त करने उनके शिविर आया , लेकिन वह नहीं जानता था कि वहाँ पाँडव नहीं , बल्कि द्रौपदीपुत्र सो रहे हैं।

सोते हुए धृष्टद्युम्न को मारने के बाद उसने  पांडवों को (असलियत मे द्रौपदी के बेटों को) मार दिया और वापस आकर वन को चला गया।  इधर इस अनपेक्षित हत्याकांङ  से पीड़ित द्रौपदी को हत्यारे क सर लाने का वचन दे कर पाँडव उसकी खोज मे पीछे आये।

वेदव्यास जी के निकट खड़ा अश्वत्थामा अपने प्रायश्चित और संन्यास का मार्ग पूछ रहा था कि पांडव वहां पहुंचे।  उन्हें मृत समझ छोड़ आया अश्वत्थामा उन्हें देख क्रोधित हुआ और उन्हें समाप्त करने के लिए ब्रह्मास्त्र का संधान किया।  यह देख कृष्ण ने अर्जुन को भी आज्ञा दी कि वह भी यही करे - और अर्जुन ने भी यही किया।

यह देख वेदव्यास जी को क्षोभ हुआ और उन्होंने कहा कि तुम दोनों मूर्ख हो - इस तरह दुनिया समाप्त हो जाएगी - इन्हे वापस लो।  कृष्ण और वेदव्यास की आज्ञा से अर्जुन ने तो अपना ब्रह्मास्त्र लौटा लिया किन्तु अश्वत्थामा को यह करना नहीं आता था - सो उसने अपने क्रोध के कारण अपने अस्त्र को पांडवों की अगली संतति के अकेले वारिस - उत्तरा की कोख में पल रहे अभिमन्यु के अंश - की ओर प्रेषित किया।  ब्रह्मास्त्र की अग्नि से उत्तरा तड़प उठी और तभी कृष्ण ने लघु (अंगूठे सा) रूप धरा और उत्तरा की कोख में प्रवेश कर अभिमन्यु पुत्र की रक्षा की।  कोख में पल रहे बालक ने अपने पास उस दिव्य पुरुष को देखा जो अग्निकुंज रुपी ब्रह्मास्त्र से उसकी रक्षा कर रहे थे।

कोख में ही बालक की परम परीक्षा हो जाने से बालक "परीक्षित" हुए ; और उस दिव्य पुरुष को वे आजीवन न भूल सके और उनकी प्रतीक्षा में रहे - इसलिए वे "प्रतीक्षित" भी कहलाये।

इधर अश्वत्थामा के नीच कर्म के परिणाम स्वरुप कृष्ण ने उसके माथे पर चमकती तेज मणि ले ली और उसे चिरकाल तक इसी अवस्था में मुक्ति के लिए इंतज़ार में भटकने के लिए त्याग दिया।

बाद में कृष्ण और पांडव राजभवन पहुंचे।  समयक्रम में बड़ों (धृतराष्ट्र, विदुर, गांधारी (कुंती जी के बारे में जानकारी पूर्ण नहीं है)) ने सन्यास लिया

और कृष्ण द्वारका लौटे। युधिष्ठिर महाभारत युद्ध की भयावहता के लिए अपने को जिम्मेदार मानते थे और अचल साम्राज्य के स्वामी हो कर भी सुख से न रह पाते थे।

इधर व्यासदेव और अन्य जनों ने युधिष्ठिर को अश्वमेध यज्ञ की सलाह दी।  अश्वमेध के लिए कृष्ण भी आये।  उनके साथ अर्जुन भी द्वारका गए।  अर्जुन द्वारका से लौटे तो तेजहीन हो कर।  उन्होंने बताया कि श्रीकृष्ण अपने धाम लौट चुके हैं, और द्वारिका जलमग्न हो चुकी है। इस पर युधिष्ठिर आदि अति दुखित हुए।  कुंती ने प्राण त्याग दिए और अपने आराध्य कृष्ण के धाम चली गयीं। इधर वन में रह रहे विदुर जी को भी यह घटनाएं पता चलीं।  कृष्ण के बालकाल के संगी उद्धव जी से उन्होंने भागवद कथा जाननी चाही।  तब उद्धव जी ने उन्हें मैत्रेय ऋषि के पास जा कर कथा सुनने की सलाह दी।

[
विदुर तीर्थयात्रा पर थे। पहले वे धृतराष्ट्र को नीतिगत सलाह देते थे जो धृतराष्ट्र अनसुनी करते रहते थे।  एक बार जब मंत्री के कर्त्तव्य अनुसार विदुर महाराज धृतराष्ट्र को युद्ध टालने के लिए समझा रहे थे - तब दुर्योधन ने अति क्रुद्ध होकर उन्हें अपमानित कर निकल जाने को कहा, और विदुर ने जब महाराज की तरफ देखा तो वे मौन रहे।  तब विदुर निर्लिप्त मन से अपने पद को त्याग कर तीर्थ करने चले गए थे।  

अपनी यात्रा के दौरान ही उन्हें युद्ध के हालात पता चलते रहे। बाद में उन्हें उद्धव जी से ज्ञात हुआ कि कैसे श्रीकृष्ण का पूर्ण यादव वंश , गांधारी के श्राप वश  और साम्ब एवं युवा यादवों के अपमान से मिले श्राप से आपस में ही लड़ कर समाप्त हो गए, और कैसे श्रीकृष्ण जी भी अपने धाम लौट गए ) युद्ध के बाद ही वे वापस आये और उन्होंने धृतराष्ट्र को समझाया कि अब आपको संन्यास ले लेना चाहिए क्योंकि आपने अपने राजकाल में हमेशा अपने अनुज पुत्रों के साथ अन्याय किया, और अब उन्हीकी कृपा पर जी रहे हैं।  युधिष्ठिर कर्तव्यशील हैं और आपको ससम्मान रखेंगे।  किन्तु आपको यह शोभा नहीं देता।  इसके बाद वे, धृतराष्ट्र और गांधारी वन को चले गए। ]

युधिष्ठिर राज्य काज परीक्षित को विधिपूर्वक सौंप कर हिमालय की तरफ चल पड़े, और उनके पीछे उनके चारों प्रिय भाई , और द्रौपदी भी , चल पड़े।

परीक्षित ने कई वर्षों तक धर्मपूर्वक शासन किया।

जारि…


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