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सोमवार, 21 जुलाई 2014

श्रीमद भागवतम १८ : वृटासुर चित्रकेतु

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डिस्क्लेमर :
यह कथा मेरा एक निजी प्रयास है भागवतम जी की कहानियों को साधारण भाषा में अपने मित्रों (और अनजान लोगों से भी) शेयर करने का।  जो मेरी समझ है उससे मैं लिख रही हूँ।  यदि कहीं कोई बात अनुचित है या गलतियां हैं या समाज के किसी वर्ग के प्रति शोषण/ या किसी पर शोषक का गलत लेबल लगता है या किसी की भावनाओं को ठेस लगती है या कोई बात गलत लिखाई गयी है - तो कृपया पोस्ट दर पोस्ट जहां आपको आपत्ति हो वहां कॉमेंट में बताएं।  यदि मेरा और आपका दृष्टिकोण मेल नहीं खाता तो चर्चा करेंगे। यदि गलत प्रेजेंटेशन आदि है तो मैं सुधार भी करूंगी। 

यह श्रृंखला कोई धार्मिक पुस्तक या शास्त्र आदि नहीं - सिर्फ एक निजी प्रयास है।  इससे या इसमें हुई गलतियों से कृपया किसी धर्म / वर्ग / समाज / .... पर कोई आक्षेप न लगाएं।  ऐसी टिप्पणियां प्रकाशित नहीं की जाएंगी। 

इन दिनों सेमिस्टर ब्रेक की छुट्टियां थीं तो यह प्रोजेक्ट चल रहा था।  छुट्टियां ख़त्म हो कर कॉलेज खुलने को हैं। अभी के लिए इस श्रंखला की शायद यह आखरी पोस्ट हो या एक दो पोस्ट शायद और लिख पाऊँ।  उसके बाद एक सेमिस्टर का ब्रेक - फिर , यदि ईश्वर की मर्जी और कृपा हुई , तो अगली छुट्टियों में यह कार्य पुनः आरम्भ करूंगी जहाँ इस बार सिरा छूटेगा।  आशा करती हूँ यह प्रयास पूर्ण कर सकूँ । 
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पिछले भाग में वृटासुर के धर्मोपदेश से चकित हुए परीक्षित जी ने गोस्वामी शुकदेव जी से पूछा था कि ऐसे भयंकर इन्द्रशत्रु के मुंह से इतनी उच्च ज्ञान और धर्म की बातें कैसे निकलीं ? ऐसी निर्मल भक्ति तो उन देवताओं में भी नहीं दिखाई देती जो प्रभु के चरणकमलों तक भी पहुँच सकते हैं - वे भी भौतिक सुखों की मांग में प्रभु मिलन के दिव्य सुख को भूले जाते हैं, तब यह तो एक असुर था ?तब  शुकदेव जी ने कहना शुरू किया:

हे राजन!! इससे पहले मैं आपको एक अन्य कथा सुनाता हूँ।  सूरसेन नामक प्रदेश में चित्रकेतु नामक राजा थे।  वे धर्मानुसार राज्य काज करते थे और उनकी प्रजा सुखी रहती थी।  उनकी अनेक रानियां थीं , किन्तु संतानसुख न था, जिसके कारण वे उदास रहते। थे  एक बार श्री संत अंगिरा जी नारद जी सहित उनके यहाँ पधारे। राजा ने पूरी विनम्रता से उनका स्वागत किया और वे प्रसन्न हुए।  उनके चरणों में बैठे राजा से उन्होंने पूछे - हे राजन।  आपके राज्य में प्रजा सुखी है , किन्तु जो राजा अपने मन को न बाँध सके वह राज्य को कैसे सम्हालेगा ? आपका मन अशांत लगता है - इसका क्या कारण है ?

तब राजा ने अपनी कामना बताई।  ऋषिवर ने राजा को एक दिव्य पेय दिया जिसे राजा ने अपनी प्रियतमा पत्नी कृतद्युति को दिया।  ऋषिवर लौट गए।  राजा के सौभाग्य और ऋषिवर के आशीर्वाद से शीघ्र ही वे एक पुत्र की माता बनीं।

राजा चित्रकेतु की प्रसन्नता का ठिकाना न था।  वे अपने पुत्र में ऐसे खो गए कि अपने अन्य कर्तव्य भूलने लगे। वे सदा अपने पुत्र के साथ उसकी माता के कक्ष में समय बिताना पसंद करते, जिससे अन्य रानियों को उनका एक रानी के साथ अधिक प्रेम देख कर ईर्ष्या होने लगी।  ईर्ष्या से उनकी बुद्धि का नाश हुआ और एक दिन सब रानियों ने मिल कर बालक राजकुमार को जहर दे दिया जिससे उसकी मृत्यु हो गयी। जब सोता हुआ राजकुमार बहुत देर तक न जाएगा तो माँ को चिंता हुई और उसने सेविका को बालक को लाने भेजा।  यह जान कर कि बालक मृत है, माँ सुधबुध खो बैठी।  राजा रानी और पूरा राज्य शोक विषाद में डूब गया। जिन रानियों ने यह किया था वे भी खूब रोतीं और दुखी होने का आभास करातीं, जबकि वे भली प्रकार जानती थीं कि सच क्या है।

कुछ समय बाद महर्षि अंगिरा जी ने जान लिया कि राजा शोक से मृत्यु के निकट हैं तो वे अपनी कृपा के कारण श्री देवर्षि नारद जी सहित फिर से वहां आये। वे आये और यह सब देख कर उन्होंने राजा को उपदेश दिया।

महर्षि जी बोले - हे राजन - जिस बालक से दूर हो जाने पर आप इतने संतप्त हैं - वह आपका कौन था ? इस जन्म में उसका शरीर आपके इस जन्म के शरीर के अंश से बना था, किन्तु आप दो अलग अलग जीवात्माएं हैं जो अपनी अपनी राह पर कुछ समय के लिए पास आई थीं और अब फिर से पृथक राहों पर चलने लगी हैं।  जैसे नदी में पड़े पत्ते और तिनके कुछ दूर साथ होते हैं किन्तु समय के साथ अलग हो जाते हैं, वैसे ही हम भी इस संसार में ऐसे ही साथ आते और अलग होते हैं।  आप यह शरीर नहीं , अपितु इसके भीतर वास करने वाले "देही" हैं। "पिता" कहलाने वाले एक देही के वस्त्र रुपी देह में दूसरा देही प्रवेश करता है।  वहां से वह "माता" कहलाने वाले तीसरे देही के वस्त्र में जाता है।  फिर वहाँ से "संतान" नामक उस देहि के वस्त्र रुपी देह का प्राकट्य होता है और कुछ समय के लिए वह देहि यह वस्त्र धारण करता है।  फिर पहले देही को दुसरे देही को पुत्र मान लेना क्या उचित है ? देही अजन्मा है, अमर है, अनादि अनंत है।  यह किसी का पुत्र नहीं, किसी का पिता नहीं।  

यह सब सुन कर भी राजा के मन को शान्ति न होती थी।  तब उन्होंने आंसू पोछते हुए ऋषिवर से पूछा आप कौन हैं ? आप जो ज्ञान की बातें कहते हैं वे मुझे समझ नहीं आतीं। तब अंगिरस जी बोले - मैं वही हूँ जिसने तुम्हे वह पेय दिया था।  तबसे अब के बदलाव से तुम मुझे नहीं पहचान पाते।

मनुष्य जब आकाश को देखता है तो जानता है कि यह शून्य है।  फिर वहां मेघ आ जाते हैं तो मेघों में कभी महल कभी नगर कभी किसी के चेहरे दिखने की अनुभूति होती है और हम वहां एक काल्पनिक संसार देखने लगते हैं। ये बादलों पर दीखते नगर "गन्धर्वनगरी" कहलाते हैं। कुछ समय बाद पवन उन मेघों को बिखेर देता है तब आकाश फिर से खाली हो जाता है।  हम जानते हैं कि आकाश का निज स्वरूप शून्यता ही है फिर भी मेघों के आवरण से हमे कितने भ्रम होते हैं।  ऐसे ही, देही  जब देह में होता है , तब उसे माया प्रभावित करती है।  माया के आवरण से पुत्र पत्नी आदि के आभास ओते हैं, जबकि सत्य यह है कि हर देही अपनी यात्रा अकेले कर रहा है, किसी का किसी से कोई संबंध नहीं।

जब हम एक स्वप्न देखते हैं तो एक पृथक देह में होते हैं, दूसरे स्वप्न में एक और पृथक देह में।  इन दोनों ही का हमारी असल देह से कोई संबंध नहीं।  जब हम जागते हैं तो जानते हैं कि वह देह झूठ थी, किन्तु स्वप्न में होते हेु हम नहीं जान पाते की यह देह असल नहीं।  इसी प्रकार यह भौतिक देह भी है। हे राजन, इस मोह को तोड़ कर बाहर आइये।

राजा को तब नारद जी ने समझाया।  नारद जी ने अपनी शक्ति से उस जीवात्मा का आह्वान किया जो पुत्र बन कर आया था।  नारद जी बोले - हे शुभ जीव-आत्मन, आपकी जय हो।  जरा अपने माता और पिता को देखिये,  जो आपके बिना कितने शोकसंतप्त हैं।आप अकाल मृत्यु को प्राप्त हुए हैं, आपका जीवन काल अभी शेष है।  आप इस देह में पुनः प्रवेश करें और उस जीवन काल तक इन्हे सुख दें।

तब नारद जी की योगशक्ति से उस जीवात्मा ने कुछ समय के लिए फिर इस देह में प्रवेश किया। वे गंभीर वाणी में बोले : मैं इस संसार में आता जाता रहता हूँ।  जन्म द्वार से एक भवन (देह) में प्रवेश कर मृत्यु द्वार से उसे त्याग देता हूँ।  जब तक मैं उस देह में हूँ तब तक वे द्वार जिनसे मैंने प्रवेश पाया उन्हें माता पिता कहता हूँ।  तत्पश्चात देहत्याग के बाद मेरे सारे पूर्वजन्म एक स्वप्न हो जाते हैं।

आप कहते हैं ये मेरे माता पिता हैं जो विलाप करते हैं।  किन्तु मेरे तो अनेक जन्मों में अनेक माता पिता रहे हैं - मैं इन दोनों को कैसे अपने माता पिता मान लूँ? जो देह त्याग दी उसके सम्बन्ध उसके साथ ही समाप्त हुए। जैसे स्वर्णाभूषण पहले सुनार के डब्बे में होता है।  फिर खरीदार धन देकर उसे दुसरे डब्बे में घर ले जाता है।  फिर उसके घर में कोई स्त्री उसे अपनी तिजोरी में रखती है।  फिर पुत्रवधु आने पर वह डब्बी उसके पास चली जाती है।  इनमे से प्रत्येक व्यक्ति हर बार उस डब्बी को अपने अधिकार में रखते हुए सोचता है कि उसके भीतर का स्वर्ण मेरा है।  किन्तु सच यह है कि वह स्वर्ण बस स्वर्ण है।  वहां वास तो कर रहा है , किन्तु है किसीका भी नहीं।  ऐसे ही मैं किसी का पुत्र नहीं, कोई मेरे माता पिता नहीं।  अब मैं इस मिटटी के शरीर में और नहीं रह सकता।  आप लोग धीरज धरिये, मैं आपका कोई नहीं और आप मेरे कोई नहीं - यह माया के परदे हैं।  यह कह कर जीवात्मा फिर से वह देह त्याग कर चला गया।

पुत्र कहलाने वाले के मुंह से यह सब सुन कर सबका मोहभंग हुआ और वे शोक त्याग कर अपने कर्तव्य करने लगे।  जिन रानियों ने यह कुकृत्य किया था अब वे पछताने लगीं।  वे नदी पर जाकर स्नान आदि कर प्रायश्चित करने लगीं। पुत्र के अंतिम संस्कार के बाद भी राजा का मन अब अशांत न था।  तब वे यमुना में स्नान कर के आये और उन्होंने अंगिरस जी और नारद जी को प्रणाम किया।


नारद जी ने राजा को मन्त्र की दीक्षा दी।  जैसे लोहा ज्वलनशील नहीं है फिर भी भट्टी में गर्म करने पर दहक उठता है, उसी तरह हमारी इन्द्रियां भी आसानी से नहीं जलतीं किन्तु ज्ञानी गुरु के दिए मन्त्र से जल उठती हैं।  राजा चित्रकेतु की आंखॉ से सब परदे हट गए और वे अब प्रसन्न थे।  नारद जी के शिष्य बने राजा ने एक सप्ताह तक बिना कुछ भी अन्न जल लिए यह मन्त्र लगातार कहना जारी रखा। तब वह विद्याधर हुआ। कुछ और काल तक तपस्या करने से राजा को अनंत शेष जी के दर्शन हुए। श्री शेष जी के साथ सनत्कुमार जी और उन जैसे पहुंचे हुए ऋषि थे। दर्शन  चित्रकेतु का मन संसार से पूर्णतयः छूट गया। उन्हें भक्तिविभोर हो कर शेष जी की स्तुतियाँ गायीं।

श्री शेष जी ने चित्रकेतु को ज्ञान का उपदेश दिया और अंतर्ध्यान हो गए।  जी के जाने के बाद उस दिशा को प्रणाम कर के चित्रकेतु विद्याधरों के लोक में यात्रा पर चल पड़े। वे सिद्धलोक आदि में भी विचरण करते रहते।
एक बार वे विष्णु जी द्वारा प्रदत्त दिव्य रथ में भ्रमण कर रहे थे कि उनकी नज़र शिव जी पर पड़ी, जो सिद्धों आदि के संग बैठे उपदेश दे रहे थे।  पार्वती जी उनकी जांघ पर गोद में बैठ थीं और शिव जी उन्हें आलिंगन किये हुए ही बोल रहे थे।  यह देख कर चित्रकेतु जोर से हँसे और श्री शिव शिवा को सुना कर कहा कि, यह कैसा धर्म है जिसके अनुसार शिव इतने सिद्धों, जिनमे नारद, भृगु कुमार आदि भी हैं, की सभा में अपनी स्त्री का आलिंगन किये बैठे हैं? अचरज है कि इन ज्ञानियों ने भी इन्हे ऐसा करने से नहीं रोका !!

यह सुन कर श्री पार्वती जी को क्रोध हो आया।  वे बोलीं - रे मूर्ख!! तू नहीं जानता कि मेरे स्वामी कौन हैं ? उनकी निंदा की योग्यता किसी में नहीं है - तुझ जैसे मूर्ख में तो बिलकुल नहीं।  जा मैं तुझे श्राप देती हूँ कि तू एक अधम जन्म लेगा जिसमे तू कभी ऐसे लोगों के संपर्क में नहीं आएगा न उनसे ऐसी अपमानजनक बातें कहेगा।

तब चित्रकेतु अपने विमान से उतर कर पार्वती जी के पास आया और उन्हें प्रणाम कर कहा - हे माते , मुझे आपका श्राप मंज़ूर है।  हमें जो भी जन्म मिले वह हमारे पूर्व कर्मों पर निर्भर है।  इसलिए वरदान और श्राप में मुझे कोई फर्क नहीं दिखता।  ईश्वर एक ही हैं, और वे कृपानिधान हैं।  वे मेरे जन्म या मेरे शरीर की निकृष्टता को नहीं देखेंगे - बल्कि जैसे माता पिता अपनी कुरूप से कुरूप  संतान से भी प्रेम करती हैं, वैसे हो मैं भी उस रूप से भी प्रभु को स्वाईकार्य ही रहूंगा, यह मेरा विश्वास है।  हे मातेश्वरी, मैंने कुछ अधर्मपूर्ण किया तो नहीं था, किन्तु आप की आज्ञा मुझे शिरोधार्य है।  

यह कह कर चित्रकेतु प्रणाम कर वहां से चले गए।  

तब श्री शिव जी ने माता पार्वती से कहा - आपने इनकी महानता देखी ? ये वैष्णव हैं। वैष्णवों की अनंत शक्ति होती है।  वे हरिभक्त हैं और किसी भी जीवन से उन्हें भय नहीं होता।  हम में से कोई भी श्री नारायण को नहीं समझ सकते, किन्तु उनके भक्तों के तो वे हृदय में वास करते हैं।  शुकदेव जी परीक्षित से बोले - हे राजन।  चित्रकेतु में इतनी शक्ति थी कि वह इस श्राप पर माता को श्रापित कर सकते थे - किन्तु उन्होंने ऐसा नहीं किया।  

यही राजा चित्रकेतु माँ भवानी के शब्द के कारण अब वृटासुर हुए।


जारी ..........  

1 टिप्पणी:

  1. भागवद पुराण की ये कथाएं ज्ञान का अनुपम स्रोत हैं. इन्हें सरल भाषा में प्रस्तुत करने का जो कार्य आपने अपने हाथ में लिया है, अत्यंत सराहनीय है.

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