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शनिवार, 5 जुलाई 2014

श्रीमद भागवतम ६ कपिल, देवहूति

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श्री शौनक जी ने कहा - अजन्मे ईश्वर ने अपनी योगशक्ति को अधीन कर माता देवहूति के पुत्र रूप में जन्म लिया।  उनकी सुखदायी कथा कहिये। सूत जी बोले - 'व्यासदेव के मित्र श्री मैत्रेय, तब विदुर जी से कहने लगे' :

"पिता के वन गमन के पश्चात कपिलदेव , माता देवहूति के संग बिंदु सरोवर के किनारे रहने लगे।  एक समय माता देवहूति ब्रह्मा के वचन को याद करते हुए  (कि पुत्र नारायण होगा और सत्य का पथ दिखायेगा) अत्यंत विनम्रता से कपिल जी से बोलीं :
"हे प्रभो - मैं माया के जाल में असत में डूबी हुई हूँ। अनेक जन्मों के बाद आपकी असीम कृपा से अब आप मिले हैं।  इस अज्ञानरूपी अंधकार से निकलने का प्रकाश प्रज्वलित कीजिये। हे प्रभो आपकी माया के आवरण के कारण ही मुझे "मैं" "मेरा" का भरम होता है - आप मुझे प्रकृति और पुरुष के बारे में समझाइये।  आप मायाजाल से बने संसार वृक्ष को काटने के लिए मेरी कुल्हाड़ी हैं।"

माता की इन बातों को सुन कर कपिल देव (श्री नारायण) प्रसन्न मन से बोलने लगे:
हे माते , योगी आत्म परायण हो कर मोहबंधन को काट देता है।  वह सुख और दुःख से मोह को प्राप्त नहीं होता (यह वही सांख्य ज्ञान है जो गीता में श्री कृष्ण अर्जुन से कहते हैं, कई जगह तो शब्द भी वही होते हैं ) । आपको वही योग ज्ञान बता रहा हूँ , जो ज्ञान मैंने इससे पहले उन संतों योगियों को दिया था जो सत जानने को तत्पर थे।  

जीवात्मा अपने बंधन एवं मुक्ति के लिए स्वयं उत्तरदायी होता है।  तीनों गुणों (सतो रजो तमो-गुण ) में उसकी आसक्ति ही उसे बंधन में बांधती है और इनसे परे होना परमात्मा के पास ले जाता है। काम क्रोध लोभ और मोह - "मैं" से जन्म लेते हैं।  मैं (अहम) से मुक्ति ही इन सब से मुक्त करती है।  जब मन आत्म ज्ञान युक्त हो जाए , तब संसार से स्वयं ही संन्यास हो जाता है।  परमात्मा से एकत्व सर्वश्रेष्ठ योग है।   

संसार से मोह बंधन करता है। और वही मोह जब परमात्मा से हो जाए तो बंधन मुक्त कर देता है।  तब व्यक्ति सहिष्णु , दयायुक्त और सब जीवों के प्रति अनुकूल हो जाता है  , और किसी के प्रति उसका शत्रुभाव नहीं रह जाता।  वह उस मार्ग पर स्वतः चलने लगता है जो शास्त्र बताते हैं। (यहां ध्यान दें - वह शास्त्र पढ़ कर मार्ग पर अपनी शिक्षा के पूर्वग्रह के बंधन से चलेगा यह नहीं कहा जा रहा - कहा यह जा रहा है कि आत्मज्ञानी स्वतः ही जिस मार्ग पर चलेगा, वही मार्ग शास्त्र अनात्मज्ञानी के लिए  भी दिखाते हैं) .…  


भक्ति मार्ग बड़ा आसान है और इसका यात्री सब जीवों के प्रति दयावान और अनुकूल प्रकृति का हो जाता है। जो मुझ तक आना चाहें वे अपने मोह और बंधन को काटने के सीधे प्रयास को कठिन पाते हैं।  वे अपने मोह के पात्र की जगह मुझे बदल दें - इससे विषय वस्तुओं में उनका मोह स्वतः ही छूट जाएगा और वे निः संग हो जाएंगे।  अब वे ज्ञानी साधुओं के सत्संग में रहें और उनके साथ रह कर सदा प्रभु की लीलाओं का वर्णन सुनने से स्वयं ही उनकी आसक्ति प्रभु की तरफ लक्षित हो जायेगी। भक्त मना सज्जनों से लगातार मेरी लीला गाथाएं सुनने से स्वतः ही भक्ति मन में उपजेगी - और जो मन बंधन को ले जाता था वह स्वयं ही मुक्ति की ओर अग्रसर होगा। जो व्यक्ति तीनों गुणों से पर होकर मुझ पर ही एकाग्र होते हैं वे जीवन में ही मुक्ति के योग्य हैं।  

देवहूति ने प्रश्न किया : सच्ची भक्ति कैसे होगी ? सत्य का स्वरुप क्या होगा ? मुझ अल्पबुद्धि को ठीक से समझाइये।  तब कपिलदेव ने माँ को सत्य का ज्ञान दिया।  

जैसे जठराग्नि भोजन को पचा देती है उसी तरह स्थितप्रज्ञ मुझ में स्थिर मना हो कर मायाजाल को काट देते हैं। जिनकी बुद्धि स्थिर हो जाती है वे माया से नहीं भटकते और जन्म मृत्यु के चक्र से निकल जाते हैं।  मेरी इच्छा से पवन चलता है,  इंद्र वर्षा कराते हैं , अग्नि प्रज्ज्वलित हैं और जन्म मरण का चक्र काल चक्र चलता है। मुझमे स्थिर बुद्धि वाले ज्ञानी इन सब भयों से मुक्त हो जाते हैं।  

हमारे भीतरका आत्मा ही पुरुष है,  प्रकृति आत्मन का आवरण है। पुरुष अनादि अनंत है, निर्गुण है। प्रकृति की दो प्रमुख शक्तियां हैं - आवरण शक्ति और विक्षेप शक्ति।  प्रकृति के तीनों गुण  (सतो तमो रजो) जब संतुलन में हों तो वह निर्गुण लगती है।  निर्गुण पुरुष समय भी है।  जब समय चलायमान हो तो वह प्रकृति के तीनों गुणों के संतुलन को उत्तेजित करता है और गुणों में असंतुलन आ जाता है।  पहले राजस प्रकट होता है, फिर सतो और तमो। जब गन कर्म में आएं तब आवरण और विक्षेप शक्तियां भी पृथक प्रकट होती हैं और आवरण के कारण जीवात्मा अपने स्वरूप को भूल जाता है। पुरुष की इस स्थिति को अविद्या कहते हैं। इस अविद्या की स्थिति में विक्षेप शक्ति माया का प्राविर्भाव करती है।  जीवात्मा इन में उलझ कर स्वयं को भुला देता है और संसार में उलझता है।  जो आत्मा / परमात्मा / पुरुष इस से प्रभावित नहीं हुआ, वही ईश्वर/ मूलपुरुष/ ब्राह्मण / भगवान है। 

सब योग इसी ब्राह्मण तक जाने के अलग अलग मार्ग हैं। जो यह सत जान ले वह ब्राह्मण है। ब्राह्मण की खोज ब्राह्मण की अनुभूति पर ही समाप्त होती है, ब्राह्मण की प्राप्ति पर नहीं।  जो ब्राह्मण को पा ले वह ब्राह्मण को "ढूंढ" नहीं लेता बल्कि स्वयं ब्राह्मण हो जाता है। जीवात्मा जान लेता है कि वह परमात्मा / ईश्वर / ब्राह्मण है भक्ति योग भी यहीं पहुंचाता है और सांख्य योग भी।  भक्ति योग में प्रेम की वह अवस्था प्राप्त होती है जहां भक्त भगवान हो जाए और उसकी अपनी कोई पहचान न रहे, सांख्य योग ज्ञान की वह अवस्था है जहां योगी आवरण और विक्षेप शक्तियों से पृथक होकर अपने को पुरुष रूप में जान ले।  

मूलपुरुष अनादि अनंत है , सर्व व्यापी है और सारे ब्रह्माण्ड उसी में निवास करते हैं। अपनी ही इच्छा से उस सर्व कारणों के कारण ने संसार के निर्माण का निर्णय लिया और प्रकृति ने पुरुष की इच्छा मात्र से सृष्टि की। संसार तीन गुणों पर आधारित है  और जीवात्माएं इन्ही तीन गुणों के प्रभाव से कर्म करती हैं। कर्म में संग होने से बंधन होता है और कर्म निष्काम और निर्मोह से होने से मुक्ति।  जब व्यक्ति अपने को कर्म का कर्ता मानता है तो वह उस कर्म के फल से जुड़ जाता है, और बंधन में बंध जाता है ।   

१. पंचतत्व - आकाश, वायु , अग्नि जल और पृथ्वी 
२. इनके गुण - शब्द , स्पर्श , रंग , स्वाद , गंध 
३. पांच ज्ञानेन्द्रियाँ है - इन पांच गुणों के लिए - कान आदि,
४. पांच कर्मेन्द्रियाँ - मुंह,हाथ, पैर, जननेंद्रियां, एवं मल त्याग के अंग 
५. इन बीस के साथ - चार सूक्ष्म स्वभाव हैं -मन , बुद्धि , अहंकार और चैतन्य 

यह चौबीस "सगुण ब्रह्म" के प्राकट्य हैं।  निर्गुण ब्रह्म पदार्थ से नहीं समझा जा सकता। ये चौबीस प्रकार के तत्व त्रि-गुण (सतो , रजो तमो) , काल के चक्र से बिंधे कर्म चक्र में घूमते हैं। पुरुष ने जब इन गुणों वाली प्रकृति में प्रवेश किया तो संतुलन बिगड़ गया और हिरण्यमय प्रकट हुई। सतोगुण वासुदेव नाम से प्रकट हुए, संकर्षण शेषनाग हुए।  विराट पुरुष का प्रादुर्भाव हुआ , फिर अंडाकार ब्रह्माण्ड हुआ।  यह "विशेष" कहलाया।  

जीवात्माओं ने शरीर धारण किये।  जैसे थाली में पानी भर कर चन्द्रमा को  देखते हुए, पानी हिलने से चन्द्र हिलते दीखते हैं किन्तु असल में स्थिर  होते हैं, उसी तरह शरीर में वास करने वाला जीवात्मा उस शरीर के बदलाव से परिवर्तित नहीं होता। अहंकार जनित "मैं करता हूँ - यह मेरा कर्म और यह मेरा फल है" की भावना से जीवात्मा भटक जाता है। जब व्यक्ति ज्ञान और भक्ति के मार्गों पर चलता है , तब बंधन छूट जाते हैं।  

देवहूति जी ने पूछा - हे ब्राह्मण - जैसे पृथ्वी के बिना गंध और जल के बिना रस नहीं हो सकते - वैसे ही माया से अलग जीव कैसे होगा ? 

कपिल जी ने कहा - हे देवी - जीवात्मा संसार पर निर्भर नहीं होता ।  जब वह माया बंधन को तोड़ देता है तब वह जान लेता है कि वह हमेशा संसार से पृथक था।  मुझे तत्वरूप में जानने वाला फिर से भव कूप में नहीं पड़ता। हे मनुकुमारी , अपने कर्म को धर्म रूप में करने वाला कर्म से नहीं बंधता , क्योंकि उसका कर्म फल की कामना से नहीं होता। 

परम्परागत कर्मकांडी धर्म का प्रदर्शन, और धर्म, पृथक पृथक होते हैं।  जब जीवात्मा स्थितप्रज्ञ हो, तब मौन, योग, ब्रह्मचर्य, शौच , और आत्मसंयम स्वतः ही बाह्य रूप से प्रकट होते हैं । लेकिन पाखंडी बाहरी रूप से यह सब गुण प्रकट करते हुए भी भीतर से संसार में लिप्त बना रहता है।  

सच्चा योगी प्राणायाम का अभ्यास करता हुआ अपने मन को केंद्रित करता है।  उसका मन प्रभु में स्थित हो जाता है और वह उनके दर्शन कर लेता है।  उस दिव्य रूप के अलौकिक सौंदर्य के दर्शन के पश्चात फिर संसार में ऐसा कुछ नहीं बचता जो योगी को दोबारा आसक्त कर सके।  सुन्दर से सुन्दर वस्तु भी उस दिव्य सौंदर्य के आगे फीकी हो जाती है।  जैसे व्यक्ति अपने आप को अपने पुत्र, जमीन, धन से पृथक समझ पाटा है, वैसे ही दिव्य साक्षात्कार के उपरान्त व्यक्ति खुद को संसार से पृथक देख पाता है।  अपने सत्य स्वरुप को जानने वाला समदृष्टा हो जाता है क्योंकि वह गाय, संत , कुत्ते , वृक्ष , और चांडाल , सब में एक ही परम को देखता है।

माता देवहूति जी को योग ज्ञान देकर उनकी आज्ञा लेकर कपिल जी पूर्वोत्तर को चले गए।  उनकी दीक्षा पर चलते हुए माता ने तपस किया।  उनकी अविद्या लुप्त हुई और वे ब्राह्मी स्थिति को प्राप्त हुईं। उनके भीतर का पुरुष आवरण और विक्षेप के प्रभाव से निकल कर मूलरूप ब्राह्मण हुआ। जिस स्थान पर उन्होंने ब्राह्मणत्व प्राप्त किया वह सिद्धपाद नामक तीर्थ स्थल हुआ।  उधर कपिल जी पूर्वोत्तर को गए जहां सिद्ध, चरण और गन्धर्वों ने उनकी आराधना के।  वरुणदेव  उन्हें अर्घ्य दिया और अपने भीतर तपस का स्थान दिया, जहां कपिल जी ने तपस किया।   

जारी ……। 

1 टिप्पणी:

  1. जीवात्मा संसार पर निर्भर नहीं। जब वह माया बंधन को तोड़ देता है तब वह जानते है कि वह हमेशा संसार से पृथक था। मुझे जानने वाला फिर से भव कूप में नहीं पड़ता। हे मनुकुमारी , अपने कर्म को धर्म रूप में करने वाला कर्म से क्योंकि उसका कर्म फल की कामना से नहीं होता।

    बहुत सुंदर ! बोध करातीं पंक्तियाँ

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