समर्थक

बुधवार, 9 जुलाई 2014

श्रीमद भागवतम ८ : दक्ष प्रसूति और उनकी कन्यायें ; सती शिव सोमनाथ

पहला भाग 
पिछला भाग  (मनु और शतरूपा जी ने ब्रह्मा जी के आदेश से संतति बढाने के लिए पांच संतानों को जन्म दिया। ये थे - प्रियव्रत और उत्तानपाद नामक पुत्र और आकूति , देवहुति , एवं प्रसूति नामक कन्याएं।

आकूति का विवाह रूचि नामक प्रजापति  से हुआ , देवहूति का कर्दम ऋषि से और प्रसूति का दक्ष प्रजापति से हुआ।  इनसे संतति आगे बढ़ी। )


------------------------
मनु और शतरूपा जी की तीसरी पुत्री थीं प्रसूति जिनका विवाह दक्ष प्रजापति से हुआ था। इनकी सोलह कन्याएं  हुईं। दक्ष और  प्रसूति की तेरह कन्याओं का विवाह धर्म से हुआ, एक का अग्नि से हुआ। एक और पुत्री का विवाह पितरों से हुआ। और एक का शिव जी से हुआ। यहां इन सबकी बात करूंगी।  दक्ष की अन्य पुत्रियों की बात अगले भाग में होगी। (दक्ष ने अनेक शरीर धरे और उनकी और भी पत्नियों से और भी कई संतानें हुईं, आगे कथा आएगी )
-------------------------
दक्ष सुता सती का विवाह शिव जी से हुआ।  

एक बार दक्ष द्वारा किया जा रहा एक यज्ञ चल रहा था, जिसे भृगु जी प्रमुख पुरोहित के रूप में सम्पन्न करा रहे थे।  देवगण , ब्रह्मा , विष्णु , और महेश वहां विराजे हुए थे।  जब दक्ष भीतर आये तो सब ने उठ कर अभिवादन किया। लेकिन शिव जान गये कि जो "नमस्कार" हर व्यक्ति एक दुसरे के भीतर बैठे परमात्मा को भेजता है, उसे दक्ष अपने अहंकार को किया प्रणाम मान रहे हैं। सो शिव नहीं उठे, जिसे देख कर दक्ष को अपमानित महसूस हुआ।  तब दक्ष ने सब के सामने शिव जी को बहुत बुरा भला कहा और यह भी कहा कि अब से किसी यज्ञ में शिव जी का भाग नहीं होगा।  इस पर नन्दीश्वर बहुत क्रोधित हुए और उन्होंने दक्ष और उनके पुरोहित भृगु आदि से कड़वी बातें कीं ।  दोनों पक्षों के समर्थकों ने एक दुसरे को श्राप दिए किन्तु शिव बिना कुछ कहे वहां से चले आये।

बाद में दक्ष ने एक और यज्ञ का आयोजन किया जिसमे शिव और सती को निमंत्रित नहीं किया गया।  सती  वहां जाना चाहती थीं किन्तु शिव ने मना किया।  शिव जी ने कहा कि आपके पिता यह यज्ञ मुझे अपमानित करने के मन से करा रहे हैं (जो सत्य था) और यदि आप वहां जाती हैं तो आपको वहां तीक्ष्ण अपमान झेलना पड़ेगा।  सम्मानित व्यक्ति के लिए अपमान मृत्यु से भी अधिक दुखदायी होता है, आप सह नहीं पाएंगी और हम आपको खो देंगे।

किन्तु सती माता को यज्ञ में अपने सगे सम्बन्धियों से मिलने का मोह खींच रहा था , और वे अपने आप को रोक न सकीं , और वहां चली गयीं।  तत्पश्चात वहां दक्ष द्वारा शिव जी के बारे में अपशब्द सुन कर उन्होंने अपमानित महसूस किया , और बोलीं कि सच्चा भक्त अपने प्रभु की निंदा सुन कर चुप नहीं रह सकता।  यदि उसमे शक्ति हो तो अपमानकर्ता को दण्डित करे, अन्यथा वहां से चला जाए।  जिसके मन में सच्चा प्रेम हो वह तो अपने आराध्य के अपमान के बाद जीवित ही नहीं रह सकता।  और मैं तो जिस शरीर में जी रही हूँ यह आप ही का दिया हुआ है, जो मेरे ईश्वर का अपमान करते हैं। सो मुझे इस शरीर में अब और नहीं रहना है ।  यह कह कर सती माता वहीँ बैठ गयीं और भीतर से योगाग्नि प्रज्ज्वलित कर उन्होंने अपने शरीर को भस्म कर दिया।

यह देख कर शिव जी के गण क्रोधित हो कर दक्ष पर लपके किन्तु भृगु जी ने यज्ञ रक्षक उत्पन्न किये जिन्होंने गणों को खदेड़ दिया।

इधर नारद ने यह सब घटना शिव जी को बताई, और शिव जी ने अपनी आशंका को सच होते सुन कर आवेग में अपनी जटाओं से एक बाल तोड़ धरती पर फेंका , जिससे महान भयंकर वीरभद्र प्रकट हुए।  वीरभद्र गणों को लेकर यज्ञशाला पहुंचे और यज्ञ तहस नहस कर दिया।  इन लोगो ने उन सब को खूब परेशान किया जिन जिन ने शिव का (इस यज्ञ में और पहले वाले यज्ञ में भी) अपमान किया था। वीरभद्र जी ने दक्ष को मार दिया और उनका सर काट कर नष्ट कर दिया। यह सब कर के गण लौट गए।

इधर यज्ञ से बचे लोग ब्रह्मा और विष्णु के पास आये और उनसे शिव जी का क्रोध काम करने का उपाय पूछा।  ब्रह्मा देवताओं से बोले कि आप लोग जानते थे कि यज्ञ शिव जी के अपमान को हो रहा है, तो आप सब को वहां नहीं जाना चाहिए था।  अब हम सब को शिव जी को शांत करना होगा। देवताओं सहित ब्रह्मा और विष्णु शिव जी के पास आये तो वे तप में मग्न थे।  ब्रह्मा ने उनकी स्तुति की जिस से उनका ध्यान टूटा, और वे मुस्कुराये।  तब ब्रह्मा ने कहा कि यज्ञ अधूरा रह गया है और इससे संसार नष्ट हो जाएगा।  शिव जी ने कहा मैं निर्दोषों पर क्रोधित नहीं हूँ। आपका बनाया संसार नष्ट होने का समय अभी नहीं आया है।

शिव जी यज्ञशाला में आये और दक्ष के शरीर पर बकरे का सर जोड़ कर उन्हें पुनर्जीवित किया।  तदोपरांत अहंकार नष्ट हो जाने पर दक्ष ने पश्चात्ताप करते हुए क्षमा मांगी और यज्ञ पूर्ण किया।  यज्ञ के उपरान्त सब अपने अपने धाम लौट गए, लेकिन सती जी अब जा चुकी थीं और शिव जी योगनिद्रा में चले गए थे।

-------------------------

धर्म की पत्नियां हुईं - दक्ष की तेरह बेटियां - श्रद्धा, मैत्री, दया, शान्ति, तुष्टि, पुष्टि, क्रिया, उन्नति, बुद्धि, मेधा, तितिक्षा, ह्री, मूर्ति । इनके पुत्र हुए -
श्रद्धा - शुभ,
मैत्री - प्रसाद ,
दया - अभय ,
शान्ति - सुख ,
तुष्टि - मुद ,
पुष्टि- समय ,
क्रिया - योग ,
उन्नति - दर्प ,
बुद्धि - अर्थ ,
मेधा - स्मृति ,
तितिक्षा - क्षेम ,
ह्री - प्रश्रय ,
मूर्ती - श्री नर और श्री नारायण । (लिंक)

मैत्रेय जी बोले - हे विदुर , विष्णु जी के अवतार , श्री नर और नारायण के जन्म पर देवताओं यक्षों गन्धर्वों आदि ने स्तुति की। वे ही दोनों अब कृष्ण और अर्जुन बने हैं।

---------------------
दक्ष की एक पुत्री "स्वाहा" थीं जिनका का विवाह अग्निदेव से हुआ। इनके तीन संतानें हुईं - पावक, पवमान, शुचि।

इन तीन पुत्रों से ४५ वंशज हुए - जो सभी अग्निदेव के विभिन्न रूप हैं। इस प्रकार कुल ४५+३+१=४९ अग्निदेव हैं।
-----------------

दक्ष पुत्री स्वधा का विवाह पितरों से हुआ।  इनकी पुत्रियां हैं - वायुना और धारिणी।  

---------------
दक्ष प्रजापति ने अन्य रूप भी धरे जिनमे उनकी अन्य पत्नियों और पुत्रियों के विवरण अलग अलग पुराणों में मिलते हैं। सोलह पुत्रियों की कथा हमने ऊपर के भाग में पढ़ी।
-----------------
प्रचेताओं के पुत्र रूप में जन्म लिए दक्ष का विवाह असिक्नी से हुआ था। इनकी ६० बेटियां हुईं।
दक्ष का विवाह वीरिणी (पाञ्चजन्य/ पंचजनी ) जी से भी हुआ था।  जिनके ६२ (और प्रसूति की २४ ) पुत्रियों के विवरण मिलते हैं।
६० पुत्रियों में १० का विवाह धर्म (ऊपर भाग में ) १३ का कश्यप, २७ का सोम (चन्द्रदेव) से हुआ।  भूता , अंगिरस और कृशाश्वा से दो दो पुत्रियों के विवाह हुए।  तार्क्ष्य (कहीं कहीं कहा गया है कि यह कश्यप जी का ही अन्य नाम है) से चार पुत्रियां ब्याही गयीं।
--------
१.
जब ब्रह्मा जी ने सर्जन किया तब उनके ह्रदय से कामदेव प्रकट हुए थे, जिनके वांण से ब्रह्मा अपनी ही पुत्री संध्या पर आकर्षित हो उठे थे, और दक्ष भी।  इससे सहमत न होने से अपमानित हुई संध्या ने अपने प्राण त्याग दिए थे।  उस उत्तेजना में दक्ष के शरीर से जो स्वेद निकला, उससे रति ने जन्म लिया, जिनका विवाह पिता दक्ष ने कामदेव से किया।
-------

२. वसु नामक दक्ष पुत्री ने आठ वसुओं को जन्म दिया - द्रोण , प्राण ध्रुव , अर्का , दोषा , वासु, विभवसु, अग्नि। वासु के पुत्र हुए विश्वकर्मा और चक्षुषा (जो अन्य मन्वन्तर में मनु हुए)
एक और दक्षसुता के पुत्र हुए विश्वदेव ।  मारुत्वती ने मरुत्वान और जयंत को जन्म दिए।  संकल्पा के पुत्र भी संकल्प नामी ही हुए।   भूत की संगिनी सरुपा ने करोड़ों रुद्रों को जन्म दिया।
-------
३. तार्क्ष्य की पत्नी बनीं - विनता, कद्रु, पतंगी, और यामिनी। पतंगी पक्षियों की माँ हुईं, यामिनी छोटे कीट पतंगों की।  विनाता के दो पुत्र हुए -  एक अरुण (सूर्यदेव के सारथि) और दुसरे गरुड़ (नारायण के सेवक) . कद्रु ने नागों और सर्पों को जना - जिनमे वासुकि सर्प , शेषनाग, तक्षक और कारकोटक प्रसिद्ध हैं।
--------
४. चन्द्रमा की २७ पत्नियों में प्रसिद्ध हैं - कृतिका, रोहिणी, चित्रा।
चन्द्रमा रोहिणी से अधिक प्रेम करते और बाकी पत्नियों पर काम ध्यान देते थे।  क्रुद्ध होकर दक्ष ने उन्हें श्राप दिया कि उन्हें क्षयरोग हो जाए।  इसके प्रभाव से चन्द्रमा घटने लगे, तब उन्होंने सोमनाथ शिवलिंग की स्थापना कर वहां शिव जी की अर्चना की।  प्रसन्न होकर शिव जी ने उन्हें पुनः ठीक होने का वरदान दिया।  इस प्रभाव से चन्द्रमा एक पक्ष में घटते हैं, और जब घटते हुए लुप्त होते हैं तो फिर से बढ़ने लगते हैं।
--------
कश्यप की पत्नी हुईं - अदिति, दिति धनु, कश्ता ,अरिष्टा ,सुरसा, इला, मुनि, क्रोधवशा, ताम्रा ,सुरभि, सरमा, तिमी।
दिति असुरों की और अदिति देवों की माता हैं। तिमी जलचरों की माँ हुईं (whale को तिमिंगला कहते हैं ). सरामा वनपशुओं की माँ हुईं।  सुरभि ने खुर वाले पशुओं (जैसे गाय भैंस) को जना। ताम्रा ने शिकारी पक्षियों (बाज आदि)  को जन्म दिया।  मुनि के अप्सराएं पैदा हुईं।  इला के वृक्ष। अरिष्टा के गन्धर्व और जुड़े खुरों वाले पशु हुए।  धनु के ६१ प्रसिद्द पुत्र हैं।  धनु के वंशजों में राहु और केतु भी हैं।

-------
अदिति जी ने विष्णु जी के अवतार, "वामन देव उपेन्द्र" की माता होने का गौरव पाया।  इसके अतिरिक्त उनके पुत्र हैं - आर्यमा, पूषा, त्वष्ठा , सविता , भाग, धाता,विधाता, वरुण, मित्र, सक्र, उरुक्रमा ,विवस्वान (सूर्यदेव) इंद्र आदि। पिछले भाग में धाता और विधाता का विवाह आयति और नियति से होने की बात आई थी।  इनके पुत्र हुए मृकंद और प्राण, मृकंद जी के पुत्र हुए प्रसिद्ध मार्कंडेय मुनि। अन्य देवताओं की कथाएं आगे आती रहेंगी।

सूर्य की पत्नी संज्ञा (सरण्यु / संझ्या ) और छाया (सवर्णा/ सदृषा ) हैं। संज्ञा विश्वकर्मा की पुत्री हैं, किन्तु पति के अत्यधिक  झेल पाने से तीन संतानों (यम, यमी, श्राद्धदेव मनु ) के जन्म के बाद उन्होंने अपनी "छाया" से  नामक सदृषा  (अपने जैसी) स्त्री प्रकट की और अपनी जगह उन्हें छोड़ कर धरती पर चली गयीं। वहाँ वे घोड़ी के रूप में रहीं और अश्विनी कुमारों को जन्म दिया। लेकिन सूर्य उन्हें ही अपनी पत्नी मानकर उनके साथ रहे और उनके तीन और संतानें (सावर्णि मनु, शनिश्चर, तापती) हुईं।  एक दिन छाया ने अपने सौतेले पुत्र को पैर गल जाने का श्राप दिया, जिससेसूर्यदेव की छाया पर शक हुआ और कड़ाई से पूरी बात पूछने पर (और पता चलने पर) वे अपनी पहली पत्नी को वापस लाये।  सूर्य के पुत्र और पुत्रियां हैं - यम, यमुना, शनि, सावर्णि मनु , ताप्ती, विष्टि।

-------
जारी ……… 

5 टिप्‍पणियां:

  1. धर्म की पत्नियां हुईं - दक्ष की तेरह बेटियां - श्रद्धा, मैत्री, दया, शान्ति, तुष्टि, पुष्टि, क्रिया, उन्नति, बुद्धि, मेधा, तितिक्षा, ह्री, मूर्ति । इनके पुत्र हुए -
    श्रद्धा - शुभ,
    मैत्री - प्रसाद ,
    दया - अभय ,
    शान्ति - सुख ,
    तुष्टि - मुद ,
    पुष्टि- समय ,
    क्रिया - योग ,
    उन्नति - दर्प ,
    बुद्धि - अर्थ ,
    मेधा - स्मृति ,
    तितिक्षा - क्षेम ,
    ह्री - प्रश्रय ,
    मूर्ती - श्री नर और श्री नारायण । (लिंक)
    अद्भुत ! कथा के माध्यम से धर्म के स्वरूप का वर्णन !

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत सुन्दर और सहज बोधगम्य प्रस्तुति...

    उत्तर देंहटाएं