फ़ॉलोअर

गुरुवार, 17 जुलाई 2014

श्रीमद भागवतम १६ : प्रह्लाद नरसिंहदेव हिरण्यकश्यप

दूसरे भागों को पढ़ने के लिए ऊपर भागवतम टैब क्लिक करें।
-----------
पिछले भाग में हमने हिरण्याक्ष नामक दिति पुत्र की कथा पढ़ी।  इस भाग में दिति के दूसरे पुत्र हिरण्यकशिपु के बारे में पढ़ते हैं। जैसा हम पहले की कथा में पढ़ चुके हैं, ये दोनों भाई नारायण के द्वारपाल जय और विजय हैं जो श्रापित हुए थे कि तीन जन्मों तक प्रभु के घोर शत्रु के रूप में जन्म लेंगे और स्वयं नारायण के हाथों मारे जाएंगे।

जब श्रीकृष्ण ने शिशुपाल वध किया तो शिशुपाल की जीवात्मा निकल कर श्री कृष्ण में समा गयी।  यह देख युधिष्ठिर महाराज आश्चर्यचकित रहा गए और पूछा कि यह इतना घोर कृष्ण विरोधी था - यह चमत्कार कैसे हुआ।  तब नारद जी ने कहा कि यह जय विजय की कथा से संबंधित है, और युधिष्ठिर और उनके अनुजों को यह कथा सुनाई।
------------------
हिरण्यकशिपु महाशक्तिशाली असुर था।  उसने तीनों लोकों को जीत लिया और सब तरफ नारायण का नाम लेना और पूजा आदि बंद करवा दिया।  उसने अपने सैनिकों को आज्ञा दी कि जहाँ भी साधू, गौ, यज्ञ आदि देखों, सब नष्ट कर दो , पूजा करने वालों को मार दो। शास्त्र कहते हैं कि  नारायण भक्तों के मन में रहते हैं  , यज्ञ में रहते हैं, जहाँ गौ की सेवा हो वहां रहते हैं।  तो ऐसा कोई स्थान ही न छोडो जहां मेरा (विष्णु) शत्रु रह पाये।

उसके सैनिकों ने सब ओर उत्पात मचाना आरम्भ कर दिया।  लोग डर कर छिप छिप कर प्रार्थना करते कि प्रभु उन्हें बचा लें।  खुल कर ईश्वर का नाम लेने की किसी की हिम्मत न थी।  इधर दिति पुत्र ने स्वर्ग पर हमला कर स्वर्ग जीत लिया था और इंद्र और अन्य देवतागण दर दर भटकते थे।  उनके प्रति जो हवी हवनों में अर्पित होती, उस सब पर दिति पुत्र ने कब्जा कर लिया था।

जब हिरण्यकश्यप को यह पता चला कि वराह रुपी नारायण ने उसके भाई हिरण्याक्ष का वध कर दिया है तो उसकी नफरत और बढ़ गयी।  वह नारायण को कैसे ख़त्म करे यही विचार उसे हमेशा घेरे रहते।  उसने फैसला लिया कि मैं सृष्टिकर्ता ब्रह्मा की आराधना और तप करूंगा और उनसे अमरत्व लूँगा।  ब्रह्मा ने भी तप बल से सृष्टि रची और मैं भी यही करूंगा।  यह सोच कर वह हिमालय को चला गया और कई वर्षों तक तपरत रहा।  उसके जाने के काफी समय गुज़र जाने पर डरे छिपे देवता बाहर निकल आये।  उन्होंने हमला किया और स्वर्ग वापस  छीन लिया।  असुर राज की पत्नी तब माँ बनने वाली थीं और इंद्र उसके कक्षमे घुस गए।  वे रोते हुए बहुत अनुनय विनय करने लगीं , किन्तु इंद्र न माने और उन्हें खींचते हुए ले जाने लगे।

तब नारद जी वहां आये और उन्होंने इंद्र को डांटा कि यह आप दैवीय नहीं आसुरी व्यवहार कर रहे हैं !! क्या ऐसे स्त्री पर क्रूरता करना आपको शोभा देता है ? इन्हे तुरंत छोड़ दीजिये - यह मेरी आज्ञा है !!इस पर इंद्र ने कहा कि हे देवर्षि, हम इन्हे स्त्री होने से नहीं ले जा रहे।  हमें इनसे नहीं, इनके गर्भ में पल रहे असुर से भय है।  हम इन्हे अपने पास रखेंगे और जब बालक का जन्म होगा तो उस असुर को हम समाप्त कर देंगे, और इन्हे जाने देंगे। क्योंकि वह भी अपने पिता जैसा ही क्रूर ही होगा। इस पर नारद जी ने कहा कि यह अनुचित है।  हम इन्हे अपने आश्रम ले जायेगे , आप ऐसा पाप करने का सोचें भी मत।

तब नारद जी उन्हें सादर अपने आश्रम ले गए और उन्हें वहां आराम से रहने को कहा।  नारद जी बोले कि  तप से लौट आने तक आप निर्भय होकर यहां रहें, यहां कोई कुछ अनुचित नहीं कर सकता।  वे वहां रहने लगीं , और नारद जी नारायण भक्त होने से सदा नारायण कथाएं गाते रहते।  ये कथाएँ कोख में पल रहा बालक सुनता रहा और वह गर्भ में ही नारायण का परम भक्त हो गया और ब्राह्मी स्थिति को पहुँच गया।
------------------

इधर हिरण्यकश्यप की भयंकर तपस्या से भयंकर ताप उठने लगा और तीनो लोक डोलने लगे।  हमेशा की तरह देवता ब्रह्मा जी के पास गए और उन्हें तपस्या रोकने के लिए असुर को वरदान देने का अनुरोध किया।  किन्तु देवता जानते थे कि असुर वरदान का दुरुपयोग कर उन्हें ही परेशान करेगा, सो उन्होंने ब्रह्मा जी से प्रार्थना की कि वर दान देते हुए इस बात को वे भूल न जाएँ।

ब्रह्मा जी तपस्वी के सम्मुख प्रकट हुए, और देखा कि , इतने वर्षो से तप कर रहे हिरण्यकश्यप का पूरा शरीर झाड़ झंखाड़ों से छिप गया है। ब्रह्मा जी ने स्पर्श दिया जिससे पल भर में ही उनका भक्त अपने निज रूप में आ गया, और उसे वरदान मांगने को कहा।  हिरण्यकश्यप उन्हें देख कर भाव विभोर हो गए।  उनकी आँखों में प्रसन्नता के अश्रु आ गए और सारा तन कांपने लगा।  उन्होंने गद्गद स्वरों मेंब्रह्मा जी की सादर स्तुतियाँ गयीं।  वरदान स्वरुप हिरण्यकश्यप ने अमरत्व माँगा।

ब्रह्मा जी ने कहा, अमर तो मैं भी नहीं हूँ , इसके अलावा तुम जो मांगोगे वह मैं दे दूंगा।  तब असुर राज ने कहा:

हे ब्रह्म देव, मैं आपके द्वारा रचे किसी जीव द्वारा न मारा जाऊँ। न मैं घर के भीतर मरूँ , न बाहर।    न दिन में न रात में; न धरती पर न आकाश में ; न अस्त्र से न शस्त्र से ; न मनुष्य से न पशु से ; न जीवित वास्तु द्वारा न ही निर्जीव द्वारा ; न देव न दानव न नाग द्वारा ; न अंड से जन्मा हो न माँ के गर्भ से ; युद्धस्थली में मेरा कोई प्रतिद्वंद्वी न हो।  मैं तीनों लोकों का स्वामी होऊँ और अष्टांग योग से प्राप्त होने वाली सारी दिव्य शक्तियां मेरी हों।

ब्रह्मदेव से ये सब वरदान पा कर असुर राज वापस लौट आया। अब तो उसने अपनी क्रूरता की सारी बातें और बढ़ा दीं ।  प्रजा को अब विष्णु की नहीं बल्कि अपने राजा की ही आराधना करनी होती।  सब यज्ञ असुर राज के ही प्रति होते और शिक्षा भी बच्चो को यही दी जाती कि वही भगवान है।

ब्रह्मा विष्णु और महेश को छोड़ कर सभी देवता अब इसीके अधीन थे।  हिरण्यकशिपु देवताओं , वेदों को मानने वालों, गौओं, साधुओं, ब्राह्मणों और सब तरह के धार्मिक लोगों का आततायी उत्पीड़क बन गया था।  हमेशा की तरह देवता नारायण की शरण में गए।  श्री नारायण ने कहा किआप लोग धीरज धरें, इसी असुरराज का पुत्र मेरा परम भक्त होगा और उसीकी वजह से उसके पिता को मेरे ही हाथों मुक्ति मिलेगी, यह कश्यप जी ने माता दिति को वचन दिया है।  सो ऐसा ही होगा। देवगण यह सुन कर थोड़े प्रसन्न मन से लौट गए और इंतज़ार करने लगे।

हिरण्यकशिपु के चार पुत्र थे - संहृदा , अनुहृदा, हृदा और प्रह्लाद , जिनमे सबसे छोटे थे प्रह्लाद।  ये जब गर्भ में थे तब इनकी माता नारद जी के आश्रम में वास करती थीं जिसकी वजह से ये नारायण नाम और कथाएं सुन पाते थे।  तो प्रह्लाद गर्भ से ही नारायण के परम भक्त हो गए थे। जब प्रह्लाद पांच बरस के हुए तो उन्हें गुरुकुल भेजा गया।  यहाँ प्रमुख गुरु थे शुक्राचार्य जी के दो पुत्र - संद और अमरक।  गुरुकुल में सभी बच्चों को पढ़ाया जाता कि महाराज ही ईश्वर हैं और उनकी ही स्तुतियाँ हों, किन्तु प्रह्लाद सिर्फ नारायण की स्तुतियाँ गाते।  वे कुछ भी न सीखते जो उन्हें सिखाया जाता।  गुरु उन्हें राजनीती, अर्थशास्त्र, और अन्य लोकविज्ञान सिखाने के प्रयास करते, किन्तु प्रह्लाद सिर्फ नारायण की भक्ति में लगे रहते।  वे समदृष्टा थे और सबसे प्रेम से बोलते थे।  एक बार मिलने पर पिता ने प्रह्लाद से पूछा कि उन्होंने क्या सीखा है - तो प्रह्लाद ने कहा कि मनुष्य द्वैत में उलझा है - उसे सब त्याग कर श्रीनारायण की शरण लेनी चाहिए।  हिरण्यकशिपु को लगा कि नन्हा बालक किसी बुरी संगती के असर से गलत बातें सीख गया है और उन्होंने गुरुओं को आज्ञा दी कि इसे अपने घर में रख कर पढ़ाएं।  दोनों ने प्रह्लाद को सुधारने के बहुत प्रयास किये, मार पीट कर, डरा धमका कर, समझा बुझा कर - किन्तु कोई लाभ न हुआ।

अगली बार जब प्रह्लाद पिता के सामने आये तो पिता ने सस्नेह पुत्र को गोद में बिठाया, और पूछा कि तुमने क्या सीखा है ? तब प्रह्लाद ने कहा - मैंने नौ तरीके सीखे हैं :
श्रवण (सुनना),
कीर्तन(गाना),
स्मरण(याद / ध्यान करना),
पादसेवन(सेवा),
अर्चना(स्तुतिगान),
वंदना(पूजन) ,
दास्य(दास भाव),
सख्यम(मित्र भाव),
आत्मनिवेदन(स्वयं को सौंप देना)।

यह सुन हिरण्यकशिपु को पहले लगाकी प्रिय पुत्र मेरी पूजा की बात कर रहा है और उन्होंने प्रसन्न भाव से गुरुओं को देखा, जो खुद भी हैरानी और प्रसन्नता से प्रह्लाद को देख रहे थे।  किन्तु प्रह्लाद ने आगे कहना जारी रखा -

हे पिताजी - ये नौ तरीके यहीं जिनसे हम प्रभु नारायण की सेवा कर सकते हैं। यह सुन राजा आगबबूला हो उठे और गुरुओं की तरफ क्रोधित होकर देखा।  किन्तु उन्होंने कहा - हमने यह सब नहीं सिखाया।  राजकुमार हमारी पढ़ाई कोई बात नहीं सीखते। यह सुन कर पिता ने कहा कि ऐसा पुत्र तो शत्रुवत है।  यह मेरे भाई के हत्यारे नारायण की स्तुति जाता है, इसे मार दिया जाए।

प्रह्लाद को मारने के अनेक प्रयास हुए किन्तु सब असफल हुए।  सैनिकों ने अनेक प्रयास किये - तलवारों, भालों, त्रिशूलों का कोई असर न हुआ।  उन्हें धरती पर लिटा कर उनके ऊपर से हाथी चलाये गए,  फेंका गया, विषैले नागों से भरे गड्ढे में फेंका गया, अपनी में डुबाया गया, आग में जलाया गया, जहर पिलाया गया , और भी अनेक प्रयास हुए, किन्तु कोई असर न हुआ।

तब हिरण्यकशिपु ने प्रह्लाद को बंदी बनाया और फिर से गुरुओं ने उन्हें  पढ़ाने के प्रयास किये।  उन्हें दोबारा गुरुकुल ले जाया गया। लेकिन उन्हें कुछ और सीखना ही न था।   एक दिन दोनों गुरुजन बाहर गए थे। दूसरे बच्चों को प्रह्लाद  प्रेम था क्योंकि वे सबसे मीठा बोलते थे, और सहानुभूति भी थी क्योंकि उनके साथ सब बड़े बुरा बर्ताव करते थे जो दूसरे भोले भाले बच्चों को समझ  नहीं आता था।  

बच्चों ने प्रह्लाद से पूछा कि यह सब उन्होंने कहाँ से सीखा तो उन्होंने बताया कि उन्होंने नारद जी से यह सब सुना। तब बच्चो ने पुछा कि तुम तो हमेशा हमारे साथ रहते हो, नारद जी से तुम कब मिले? तब प्रह्लाद ने बताया कि माता के गर्भ में रहते हुए ही कैसे उन्होंने यह सब जाना। प्रह्लाद ने बालकों को नारायण कथाएं सुनाईं और सब बच्चे नारायण की स्तुतियाँ गाने लगे। जब गुरु लौटे तो यह देख कर बहुत चिंतित हुए और तुरंत जाकर महाराज से स्थिति कही।  अब राजा का क्रोध असह्य था।  उन्होंने कहा पहले तो मैं बालक समझा था - किन्तु अब तो यह दूसरे बच्चों को भी मेरे भाई के हत्यारे का गुणगान सिखा रहा है।  अब मैं खुद ही इसे मारूंगा।  प्रह्लाद को महाराज के सम्मुख लाया गया जहाँ उस बालक ने हमेशा की ही तरह पूरे प्रेम और सम्मान से पिता के चरणस्पर्श किये।  राजा ने कहा - ये सब पाखंड न करो - तुम मेरे शत्रु के भक्त हो - आज मैं स्वयं ही तुम्हे मार दूंगा।

प्रह्लाद तनिक भी भयभीत हुए बिना बोले - मैं यह शरीर नहीं हूँ, आत्मन हूँ, आप मुझे नहीं मार सकते। आप भी नारायण के प्रति समर्पित हो जाइए - वे सर्वशक्तिमान और सर्वज्ञाता हैं,  ,परमात्मा हैं , सब जगह मौजूद हैं।  क्रोध से पागल हुए राजा ने पूछ - बोल कहाँ है तेरा भगवान ? प्रह्लाद ने कहा सब जगह।  हिरण्यकशिपु ने एक खम्बे की ओर दिखा कर पूछा - क्या यहां भी है ? प्रह्लाद ने कहा हाँ हैं।  तब असुरराज ने अपनी गदा से खम्बे पर प्रहार किया और कहा अब यहां से निकल कर दिखाए तेरा भगवान!!!

तभी भयंकर शब्द हुआ और खम्बा फट गया।  उसमे से एक भयंकर आकृति निकली जो सर से कमर तक सिंह रूप और कमर के नीचे मानव रूप थी।  उस आकृति को देखते ही हिरण्यकशिपु को वर्षों पहले ब्रह्मा जी से लिया वरदान याद आया - अहो !! यह न मानव है न पशु। न यह जन्मा है न अजन्मा, न कोखजना है न अंडे से जन्मा है। कहीं यही तो मेरा काल नहीं ?

हिरण्यकशिपु को पल भर में सब याद आ गया, और उसने काल को सामने देखा।  किन्तु उसके अंतर्मन में भय न था, एक अजीब सी शान्ति थी। उसने लड़ने का बेमन से प्रयास किया। बुरी तरह दहाड़ते हुए क्रोधावतार श्री नरसिम्हा ने असुरराज को उठाया और द्वार पर ले जाकर अपनी जांघो पर रखा। वह न घर के भीतर था न बाहर, दहलीज़ पर था; न धरती पर था न आसमान में प्रभु की जाँघों पर था ; संध्याकाल था, न दिन था न रात।  क्रोध से लाल नेत्रों वाले नरसिम्हा ने अपने नाखूनों/पंजो और दांतों से उसका पेट चीर कर उसे मार दिया - न अस्त्र से न शस्त्र से ; न जीवित वस्तु होते हैं नख और दांत न निर्जीव ही।

दहाड़ते हुए नरसिम्हा अपने मृत शिकार के अनेक सैनिकों को भी मार दिया। उनके क्रोध के वेग से धरती कांपने लगी, पहाड़ टूट गए, सागर उफ़न पड़े, आसमान के विमान अंतरिक्ष में फिंक गए। उनके तेज़ से सभी सितारे धूमिल पड़ गए, देवता भयभीत हुए लक्ष्मी जी से बोले आप ही प्रभु के पास जाकर उनका क्रोध शांत करिये, किन्तु वे भी भयभीत थीं।  तब प्रह्लाद उनके पास गए और अपनी निश्छल प्रेम से, भक्तिविभोर स्तुतियों से, उन्हें शांत किया।  भगवान ने उन्हें वार मांगने को कहा तो प्रह्लाद ने सदा सर्वदा के लिए उनके प्रति भक्ति मांगी।  श्री नरसिंहदेव के पास आकर लक्ष्मी जी विराजीं और वे श्रीलक्ष्मीनरसिम्हा कहलाये। देवताओं. गन्धर्वों, किन्नरों, नागों, और सभी ने स्तुतिगान गाये।

नारद जी बोले - ये ही जय और विजय एक जन्म में हिरण्यकश्यप और हिरण्याक्ष हुए; अगले जन्म में रावण और कुम्भकर्ण हुए और इस बार शिशुपाल और दन्तवक्र हैं।  इसलिए शिशुपाल की जीवात्मा श्री कृष्ण में मिल गयी है।

युधिष्ठिर बोले - प्रह्लाद कितने सौभाग्यवान थे कि उन्होंने प्रभु के दर्शन किये।  नारद जी बोले उनसे अधिक तो आप सौभाग्यशाली हैं।  जिन प्रभु के लिए लोग कितनी तपस्या करते हैं वे श्रीकृष्ण रूप में आपको यूँ ही मिले हुए हैं , आपको बड़े भैया कहते हैं और आपके चरण स्पर्श करते हैं।  श्रीकृष्ण स्वयं आपके छोटे बड़े कार्य करते हैं, आपको परामर्श देते हैं, आपके हर कदम के साथी हैं।  हे महाराज - आप जैसा सौभाग्यशाली दूसरा कौन होगा ?

जारी ..........