फ़ॉलोअर

bhagwad geeta लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
bhagwad geeta लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

गुरुवार, 28 अगस्त 2014

श्रीमद भगवद गीता २.१८, २.१९

[ अन्य भाग पढ़ने के लिए ऊपर गीता तब पर क्लिक करिये ]

----------------
अन्तवन्त इमे देहा नित्यस्योक्ताः शरीरिणः। 
अनाशिनोSप्रमेयस्य तस्माद्युध्यस्व भारत।।

अर्जुन (या कोई भी) अपने प्रियजनों के शरीर से मोहग्रस्त होते है और उनकी मृत्यु के भय सेअपना कर्म नहीं करना चाहता (और यह हम भी करते हैं) . वह बार बार यह  कहता है कि , यह युद्ध अपने प्रिया गुरुजनों और परिवारजनों की मृत्यु का कारण होगा , तो मैं युद्ध नहीं करूंगा।

किन्तु कृष्ण उसे कह रहे हैं कि  जो तू शरीर से मोह करता है - तो उस शरीर को तो ख़त्म होना ही है - उसे तू कैसे बचा सकता है ?
और यदि  शरीरधारी से तू मोह रखता है - तो वह तो नष्ट हो सकता ही नहीं - तू उसके मरने की बात कैसे करता है ? यह जान और समझ लो कि शरीरधारी अविनाशी है - उसके मरने या विनष्ट होने को असंभव जान ले - और इस सब (कचरे) को मन से निकाल कर युद्ध कर।

---------------------
य एनं वेत्ति हन्तारं यश्चैनं मन्यते हतम्।
उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते।।

कृष्ण कह रहे हैं कि जो भी व्यक्ति इस शरीरधारी आत्मन को मारने वाला / या मर जाने वाला समझता है - वे दोनों ही सही यथार्थ नहीं जानते - क्योंकि शरीरधारी आत्मा न तो कभी मारता है न ही कभी मर सकता है (मारा जा सकता है)

कृष्ण यह नहीं कह रहे कि क्योंकि शरीर मारा नहीं जा सकता तो शरीरों की हत्याएं करने लगो - वे कह रहे हैं कि आत्मा को मारना या आत्मा का मर जाना  संभव नहीं - तो शरीर मर ही जाएगा और आत्मा स्थायी ही रहेगा - इसलिए तुम मोहग्रस्त मत हो जाओ।  तुम अपना स्वधर्म (जो अर्जुन के लिए उस समयकाल में युद्ध था) करो - शरीर या शरीरधारी के मरने के मोह में पड़े बिना।  

मंगलवार, 26 अगस्त 2014

श्रीमद भगवद गीता २.१६, २.१७

पिछले भाग में हमने यह श्लोक पढ़ा :

यं हि न व्यथ्यन्त्येते पुरुषं पुरुषर्षभ् |
सं दुःख सुखं धीरं सोSमृतत्वायकल्पते ||
-----------------------------------------------
अब आगे :
नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः।
उभयोरपि दृष्टोSन्तस्त्वनयोस्तत्त्वदर्शिभिः।।
---------------------------------------------
(गुरु) कृष्ण (शिष्य) अर्जुन से कह रहे हैं कि असत् (इस सन्दर्भ में शरीर क्योंकि अर्जुन अपने शरीर के सम्बन्धियों के शरीर छूट जाने के भय से कम्पित हो रहा है) का स्थायित्व है ही नहीं और सत् का कभी परिवर्तन हो ही नहीं सकता। तत्व ज्ञानियों ने इन दोनों के विषय में यही निष्कर्ष दिया है। 

अर्जुन डावांडोल क्यों है ? क्योंकि वह भीष्म और द्रोण (के वृद्ध शरीर) से मोह रखता है और सोचता है कि इस युद्ध में मैं अवश्य इन दोनों से बिछड़ जाऊंगा।  कृष्ण कह रहे हैं कि (युद्ध हो या न हो) शरीर तो नष्ट होगा ही क्योंकि शरीर अस्थायी ही है। यह कुछ समय के लिए ही बना है - उस समय सीमा के परे रह ही नहीं सकता। लेकिन इन दोनों के भीतर जिस व्यक्ति को तुम जानते हो वह तो आत्मन है - और वह कभी बदल नहीं सकता।  क्योंकि वह तो बदलाव की सीमा में है ही नहीं - वह तो सत है , और सत अपनी प्रकृति से ही स्थायी होता है। 

अविनाशि तु तद्विद्धि येन सर्वमिदं ततम्। 
विनाशमव्यवस्यास्य न कश्चित्कर्तुमर्हति।।

----------------------------------------------

अ-विनाशी तो वह है जो पूर्ण शरीर में व्याप्त है ( लेकिन शरीर से पृथक है) और जिससे यह शरीर जीवित है।  उस अविनाशि का विनाश (हो ही नहीं सकता परिभाषा से ही) करने में कोई भी (तू भी) समर्थ नहीं है। 

कृष्ण कह रहे हैं कि जिनके नष्ट होने के भय से तू युद्ध नहीं करना चाहता - वह तो अविनाशी है - वह शरीर है ही नहीं।  वह शरीर को व्याप्त अवश्य करता है लेकिन वह शरीर नहीं है।  उसको कोई भी (तू भी ) नष्ट कर ही नहीं सकता क्योंकि उसका नाश संभव है ही नहीं।   

इन दोनों पंक्तियों में कृष्ण कह रहे हैं की जिनसे अलगाव का भय तुझे भयभीत किये देता है वह वे लोग नहीं हैं - सिर्फ उनके शरीर हैं।  शरीर असत हैं और स्वभाव से ही उनका स्थायित्व नहीं है - वे तो आज नहीं तो कल अवश्य विनष्ट होंगे ही।  उधर शरीर के भीतर बसा हुआ आत्मन शरीर को व्याप्त अवश्य करता है परन्तु शरीर से पृथक वह सत और बदलाव से पर स्थायी है।  उसे कोई नष्ट नहीं कर सकता (तू भी नहीं)

मंगलवार, 18 मार्च 2014

श्रीमद भगवद गीता २.१५

इस श्रंखला की पिछली पोस्ट में हमने इस श्लोक पर बात की ।

मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः |
आगमापायिनोSनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत || १४ ||

इस श्रंखला के बाकी भाग देखने चाहें / पहले भाग से पढ़ना चाहें तो ऊपर गीता टैब पर क्लिक करें । या फिर ये लिंक देखें

1.1 , 1.2 , 1.3
2.1, 2.2, 2.3, 2.4, 2.5, 2.6, 2.7, 2.8, 2.9and 2.10,

उस पोस्ट पर एक चर्चा चली जिसमे महाभारत युद्ध में दोनों ही पक्षों का अधर्म पथ पर होने की बात हुई । इस पर मैं कोई टिप्पणी नहीं कर रही हूँ । सिर्फ यह कह रही हूँ कि इस श्रंखला में मैं महाभारत ग्रन्थ पर नहीं बल्कि गीता पर बात कर रही हूँ । गीता महाभारत युद्ध के दौरान पुनः कही गयी है लेकिन यह महाभारत का हिस्सा नहीं । श्री कृष्ण (आगे गीता में) अर्जुन से कहते हैं कि यह गीता ज्ञान मैंने पहले सूर्य देव को दिया था जिन्होंने अपने पुत्र को दिया और परम्परा से वह ज्ञान आगे बढ़ा - लेकिन समय के साथ यह लुप्तप्रायः हो चला है इसलिए मैं आज इसे फिर से तुझे कह रहा हूँ ।

अजीब बात यह है कि , यह सब "अर्जुन को कृष्ण न लड़वाते तो हिंसा रूकती" कहने वाले लोग वे ही हैं जो कुछ महीने पहले दामिनी के गुनाहगारों को सड़क पर जंगली से जंगली सजाओं की वकालत कर रहे थे। क्या वे कहेंगे कि जज की कुर्सी पर बैठे व्यक्ति को यदि कटघरे में खड़ा बलात्कारी अपना गुरु या परिवारजन दिखे (या शक्तिशाली राजपुत्र दिखे) तब जज को "अहिंसावादी" बन कर पीछे हट जाना चाहिए ? ............. लेकिन यह रक्त का उबाल राजपुत्र दुर्योधन के अनेकानेक स्त्रियों के शोषण पर उबाल नहीं खाता , क्योंकि वह सब तो "पुरानी बात" है  । दुर्योधन की नज़र न सिर्फ अपनी भाभी (राजपरिवार की बहू )पर ही पड़ी बल्कि यदि आपको याद हो तो पांडवों के वनवास के दौरान एक और राजकन्या के साथ उसने यही किया था । जब राज कन्या के साथ  का यह  होता था तो जन साधारण की तो सोच ही सकते हैं  ।

लेकिन नहीं -  ये सब   भूल कर ये "ज्ञानीजन" अचानक "अहिंसावाद" पर चल देते हैं और गीता कह कर अर्जुन को प्रेरित करने के लिए कृष्ण को "अपराधी" घोषित कर देते हैं । वे यह भी भूल जाते हैं कि अक्सर साधारण स्थितियों में अहिंसा की बात करने वालों को वे स्वयं ही मूर्ख / डरपोक / आदि आदि  ... घोषित करते हैं ।

लेकिन जब गीता की बात होती है तब अचानक सब न्यायप्रियता और वीरता "अहिंसावाद" की ओट  में छुप जाती है  । तब उन्हें अचानक लगने लगता है कि यदि बलात्कारियों के साथ अपने पितामह / गुरु / भाई दिखें तब न्याय की रक्षा को भूल कर युद्ध से पीठ दिखा देना "भला और सही रास्ता " हो जाता है  ।

कृपया गीता की चर्चा पर बने रहे । महाभारत की (औचित्य और अनौचित्य ) चर्चा उसी महाभारत श्रंखला पर रहे तो बेहतर रहेगा । जब हम केमिस्ट्री की क्लास में बैठते हैं तो फिजिक्स की बात नहीं करते । लेकिन जीवन मूल्य सिखाने वाली गीता पर हम जज और ज्यूरी बन कर अपने निर्णय देने लगते हैं ।
--------------------------------------------------------------

अब अगला श्लोक :

यं हि न व्यथ्यन्त्येते पुरुषं पुरुषर्षभ् |
सं दुःख सुखं धीरं सोSमृतत्वायकल्पते ||


भावार्थ: 
जिसे ये सब व्यथित नहीं करते और जो इन सब (शारीरिक या मानसिक) परिस्थितियों में सम रहता है (और अपना निश्चित कर्म करता रहता है) वह पुरुष श्रेष्ठ है, और मुक्त है ।  
----------------------------------------------------------------

गीता का दूसरा अध्याय पूरी गीता का summarization सा लगता है मुझे  । पहले दस श्लोकों में अर्जुन की व्यथा  थी । वह अपने रिश्ते नातेदारों को देख आकर विचलित हो जाता है और युद्ध को छोड़ देने की बातें कहता है । अब कृष्ण उसे समझा रहे हैं ।

पिछले श्लोक में कृष्ण ने कहा कि जैसे हमारी इन्द्रियां (sense of touch etc) हमें (हमारे शरीर को भिन्न शारीरिक परिस्थितियों में ) सर्दी और गर्मी का अनुभव कराती हैं , उसी तरह हे कुन्तीनन्दन, हमारे मन को भी सुख और दुःख का अनुभव होता है (भिन्न मानसिक परिस्थितियों में) । जैसे सर्दी और गर्मी (ऋतुएँ ) आती जाती रहती हैं और स्थायी नहीं हैं उसी तरह हे अर्जुन ये सुख दुःख के अनुभव भी आते जाते हैं और स्थायी नहीं हैं । (अपने मन से) इन्हें (जैसे शरीर गर्मी और सर्दी को सहन करता है) सहन कर ।

इस श्लोक में कृष्ण कह रहे हैं कि  जिस किसी मनुष्य को ये सब स्थितियां डावांडोल नहीं कर सकें वही मनुष्य मनुष्यों में श्रेष्ठ है और मोक्ष में है । आगे जाकर कहीं मुक्ति नहीं - अभी इसी जीवन में यदि कोई दुःख सुख से अनछुआ है तो अभी की ही स्थिति अमृतमय मुक्ति है ।

अब यह दोनों श्लोक सिर्फ महाभारत के सम्बन्ध में नहीं है  । दुःख और सुख को समान मान कर कर्म करने वाले ही सच में कर्तव्य कर्म कर सकते हैं । जो दुःख सुख से चलायमान होंगे वे कटु कर्तव्य कर ही नहीं सकते । क्योंकि वे तो दुःख से बचने और सुख की ओर जाने वाली ही राह चुनेंगे । ध्यान देने की बात है कि यहाँ कहीं भी युधिष्ठिर या दुर्योधन के सही गलत होने पर कुछ नहीं कहा गया है । बल्कि व्यक्ति के निजी कर्त्तव्य की बात कही जा रही है  ।

एक योद्धा जो युद्ध भूमि में आ चुका है, जिसके रण कौशल के भरोसे उसके राजा युद्ध में उतरे हैं - वह अब पीठ दिखा कर भागना चाहता है क्योंकि विरोध में उसके अपने खड़े हैं ।

कृष्ण कह रहे हैं कि अपने निजी दुःख सुख को आने जाने वाला (ऋतुओं की तरह परिवर्तन शील) मान ले, और अपना (अपना का अर्थ है अपन कर्म - योद्धा अर्जुन का कर्म - व्यक्ति अर्जुन का नहीं, पुत्र अर्जुन का नहीं, शिष्य अर्जुन का नहीं) कर्म कर । जो व्यक्ति अपने निजी दुःख सुख को परे कर कर्म कर सके वही मानवों में श्रेष्ठ होता है।

यह सब कृष्ण कब कह रहे हैं  ? कई लोग कहते हैं कि कृष्ण यदि अर्जुन को न समझाते , तो युद्ध रुक जाता , कई कई लोग न मरते। लेकिन वे भूल जाते हैं कि कृष्ण ने युद्ध से पहले तक बहुत समझाया था किन्तु अर्जुन तब अपने क्रोध (द्रौपदी का अपमान , वनवास का अपमान, आदि आदि) से क्रुद्ध हुआ युद्ध को उद्धत था। तब क्या अर्जुन नहीं जानता था कि युद्ध में कौन सामने होंगे ? भीष्म और द्रोण तो द्यूत क्रीडा के समय ही उसे अपना पक्ष बता चुके थे, और सारे पांडव जानते थे कि वे कौरवों के साथ खड़े दिखेंगे । फ़िर अब नया क्या हुआ ?

जो लोग हज़ारों प्राणों के खोने की बातें करते हैं वे यह भूल जाते हैं कि वे खुद अपने देश के शत्रु देश के शुरू हो चुके युद्ध के दौरान मुख्य सेनानायक/ जनरल / सेनाध्यक्ष .... के अर्जुन की तरह "अहिंसावादी" बन कर संन्यास ले कर युद्ध भूमि छोड़ देने को वे खुद क्या कहेंगे ???? वे यह भी भूल जाते हैं कि हर आतंकवादी घटना के बाद वे खुद युद्ध छेड़ने की गुहार लगाते हैं - यह भूल कर की युद्ध में कितनी "हिंसा" होगी और कितने "निर्दोष सैनिक" मारे जायेंगे। कितनी औरतें विधवा होंगी, और कितने बच्चे अनाथ हो जायेंगे  ।

----------------------------------------
यदि हमें गीता समझनी है तो अपने आप को महाभारत के मायाजाल से निकाल कर इसे देखना होगा  । गीता जीवन पथ प्रदर्शिका है - यह महाभारत या अर्जुन तक सीमित नहीं है  । कृपया काँटों में उलझे रह कर गुलाब से मुंह न मोडें - इसे समझने के प्रयास करें ।

गीता की असल शुरुआत मुझे लगती है २.११ से । कई विद्वान् ऐसा मानते हैं तो कई नहीं मानते । यह मेरा अपना विचार था की यहाँ से श्री भगवान् का कथन शुरू होता है और पहले बैकग्राउंड है - और पहली बार मुझे श्रीविनोबा भावे जी का version  श्री अनुराग शर्मा जी की आवाज़ में सुनते हुए यह पता चला कि यह और भी लोग मानते हैं  । और यहाँ से कृष्ण का गीत आता है । पूरी महाभारत में न उलझें - इस पर आयें । दुसरे अध्याय के ग्यारहवे श्लोक से जो पोस्ट  लिखी हैं उनके भावार्थ फिर से पेस्ट कर रही हूँ  (ऊपर पूरी पोस्ट्स के लिंक भी हैं ।) :  :

11 श्री भगवान् ने कहा - तू न सोचने योग्य बातों पर इतना सोचा रहा है, और पंडिताई की भाषा प्रयुक्त करता है | किन्तु जो सच ही में पंडित हो - वह तो जिनके प्राण चले गए, या जिनके नहीं भी गए, उन दोनों के ही लिए शोक नहीं करते |

12 (श्री कृष्ण आगे अर्जुन से बोले - )
निश्चित ही पूर्व में ऐसा कोई काल नहीं था जब तू नहीं था, या मैं नहीं था या ये सब राजागण नहीं थे । न ही आगे ऐसा कोई काल होगा जब हम सब नहीं होंगे ।


13 जैसे शरीर में रहने वाला आत्मा अपरिवर्तित ही रह कर लगातार बदलते हुए शरीर में वास करता है (शरीर बालक से जवान होता है, फिर बूढा भी परन्तु उसके भीतर रहने वाला व्यक्ति वही रहता है ) उसी तरह मृत्यु के समय भी वही आत्मा एक से दूसरे शरीर में पुनर्वास कर लेता है | जो यह जानते हैं , वे मोहित नहीं होते ।

14 इन्द्रिय अनुभूति (और मन की भी ) - गर्मी, सर्दी,सुख और दुःख की अनुभूति कराती हैं । जैसे ये मौसम के असर आने जाने वाले हैं, स्थायी नहीं, वैसे ही सुख दुःख भी आने जाने वाले हैं । हे भारत, इनसे प्रभावित हुए बिना इन्हें सहन करना (अनुभव करते हुए भी उपेक्षा करना) सीख । 

15 जिसे ये सब व्यथित नहीं करते और जो इन सब (शारीरिक या मानसिक) परिस्थितियों में सम रहता है (और अपना निश्चित कर्म करता रहता है) वह पुरुष श्रेष्ठ है और मुक्त है ।  

इन श्लोकों में जीवन का ज्ञान है - अपने मानस में इन्हें कृपया सिर्फ पांडव कौरव युद्ध के सन्दर्भ भर तक सीमित न रखें  ।

इस गीता आलेख के बाकी भागों (इससे पहले और बाद के) के लिए ऊपर गीता tab पर क्लिक करें 
जारी 

----------------------------------------
disclaimer:
कई दिनों से इच्छा थी, कि भगवद गीता की अपनी समझ पर लिखूं - पर डर सा लगता है - शुरू करते हुए भी - कि कहाँ मैं और कहाँ गीता पर कुछ लिखने की काबिलियत ?| लेकिन दोस्तों - आज से इस लेबल पर शुरुआत कर रही हूँ - यदि आपके विश्लेषण के हिसाब से यह मेल ना खाता हो - तो you are welcome to comment - फिर डिस्कशन करेंगे .... यह जो भी लिख रही हूँ इस श्रंखला में, यह मेरा interpretation है, मैं इसके सही ही होने का कोई दावा नहीं कर रही  
-----------------------------------------------
मेरे निजी जीवन में गीता जी में समझाए गए गुण नहीं उतरे हैं । मैं गीता जी की एक अध्येता भर हूँ, और साधारण परिस्थितियों वाली उतनी ही साधारण मनुष्य हूँ जितने यहाँ के अधिकतर पाठक गण हैं (सब नहीं - कुछ बहुत ज्ञानी या आदर्श हो सकते हैं) । गीता जी में कही गयी बातों को पढने / समझने / और आपस में बांटने का प्रयास भर कर रही हूँ , किन्तु मैं स्वयं उन ऊंचे आदर्शों पर अपने निजी जीवन में खरी उतरने का कोई दावा नहीं कर रही । न ही मैं अपनी कही बातों के "सही" होने का कोई दावा कर रही हूँ।   मैं पाखंडी नहीं हूँ, और भली तरह जानती हूँ  कि मुझमे अपनी बहुत सी कमियां और कमजोरियां हैं । मैं कई ऐसे इश्वर में आस्था न रखने वाले व्यक्तियों को जानती हूँ , जो वेदों की ऋचाओं को भली प्रकार प्रस्तुत करते हैं । कृपया सिर्फ इस मिल बाँट कर इस अमृतमयी गीता के पठन करने के प्रयास के कारण मुझे विदुषी न समझें (न पाखंडी ही) | कृष्ण गीता में एक दूसरी जगह कहते हैं की चार प्रकार के लोग इस खोज में उतरते हैं, और उनमे से सर्वोच्च स्तर है "ज्ञानी" - और मैं उस श्रेणी में नहीं आती हूँ ।

रविवार, 21 जुलाई 2013

श्रीमद्भगवद्गीता २. १५

इस श्रंखला की पिछली पोस्ट में हमने इस श्लोक पर बात की ।

मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः |
आगमापायिनोSनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत || १४ ||

इस श्रंखला के बाकी भाग देखने चाहें / पहले भाग से पढ़ना चाहें तो ऊपर गीता टैब पर क्लिक करें । या फिर ये लिंक देखें

1.1 , 1.2 , 1.3

उस पोस्ट पर एक चर्चा चली जिसमे महाभारत युद्ध में दोनों ही पक्षों का अधर्म पथ पर होने की बात हुई । इस पर मैं कोई टिप्पणी नहीं कर रही हूँ । सिर्फ यह कह रही हूँ कि इस श्रंखला में मैं महाभारत ग्रन्थ पर नहीं बल्कि गीता पर बात कर रही हूँ । गीता महाभारत युद्ध के दौरान पुनः कही गयी है लेकिन यह महाभारत का हिस्सा नहीं । 

श्री कृष्ण (आगे गीता में) अर्जुन से कहते हैं कि यह गीता ज्ञान मैंने पहले सूर्य देव को दिया था जिन्होंने अपने पुत्र को दिया और परम्परा से वह ज्ञान आगे बढ़ा - लेकिन समय के साथ यह लुप्तप्रायः हो चला है इसलिए मैं आज इसे फिर से तुझे कह रहा हूँ ।

कृपया गीता की चर्चा पर बने रहे । महाभारत की (औचित्य और अनौचित्य ) चर्चा उसी महाभारत श्रंखला पर रहे तो बेहतर रहेगा । जब हम केमिस्ट्री की क्लास में बैठते हैं तो फिजिक्स की बात नहीं करते । लेकिन जीवन मूल्य सिखाने वाली गीता पर हम जज और ज्यूरी बन कर अपने निर्णय देने लगते हैं ।
--------------------------------------------------------------

अब अगला श्लोक :
यं हि न व्यथ्यन्त्येते पुरुषं पुरुषर्षभ् |
सं दुःख सुखं धीरं सोSमृतत्वायकल्पते ||

भावार्थ: 
जिसे ये सब व्यथित नहीं करते और जो इन सब (शारीरिक या मानसिक) परिस्थितियों में सम रहता है (और अपना निश्चित कर्म करता रहता है) वह पुरुष श्रेष्ठ है, और मुक्त है ।  
----------------------------------------------------------------

गीता का दूसरा अध्याय पूरी गीता का summarization सा लगता है मुझे  । पहले दस श्लोकों में अर्जुन की व्यथा  थी । वह अपने रिश्ते नातेदारों को देख आकर विचलित हो जाता है और युद्ध को छोड़ देने की बातें कहता है । अब कृष्ण उसे समझा रहे हैं ।

पिछले श्लोक में कृष्ण ने कहा कि जैसे हमारी इन्द्रियां (sense of touch etc) हमें (हमारे शरीर को भिन्न शारीरिक परिस्थितियों में ) सर्दी और गर्मी का अनुभव कराती हैं , उसी तरह हे कुन्तीनन्दन, हमारे मन को भी सुख और दुःख का अनुभव होता है (भिन्न मानसिक परिस्थितियों में) । जैसे सर्दी और गर्मी (ऋतुएँ ) आती जाती रहती हैं और स्थायी नहीं हैं उसी तरह हे अर्जुन ये सुख दुःख के अनुभव भी आते जाते हैं और स्थायी नहीं हैं । (अपने मन से) इन्हें (जैसे शरीर गर्मी और सर्दी को सहन करता है) सहन कर ।

इस श्लोक में कृष्ण कह रहे हैं कि  जिस किसी मनुष्य को ये सब स्थितियां डावांडोल नहीं कर सकें वही मनुष्य मनुष्यों में श्रेष्ठ है और मोक्ष में है । आगे जाकर कहीं मुक्ति नहीं - अभी इसी जीवन में यदि कोई दुःख सुख से अनछुआ है तो अभी की ही स्थिति अमृतमय मुक्ति है ।

अब यह दोनों श्लोक सिर्फ महाभारत के सम्बन्ध में नहीं है  । दुःख और सुख को समान मान कर कर्म करने वाले ही सच में कर्तव्य कर्म कर सकते हैं । जो दुःख सुख से चलायमान होंगे वे कटु कर्तव्य कर ही नहीं सकते । क्योंकि वे तो दुःख से बचने और सुख की ओर जाने वाली ही राह चुनेंगे । ध्यान देने की बात है कि यहाँ कहीं भी युधिष्ठिर या दुर्योधन के सही गलत होने पर कुछ नहीं कहा गया है । बल्कि व्यक्ति के निजी कर्त्तव्य की बात कही जा रही है  ।

एक योद्धा जो युद्ध भूमि में आ चुका है, जिसके रण कौशल के भरोसे उसके राजा युद्ध में उतरे हैं - वह अब पीठ दिखा कर भागना चाहता है क्योंकि विरोध में उसके अपने खड़े हैं ।

कृष्ण कह रहे हैं कि अपने निजी दुःख सुख को आने जाने वाला (ऋतुओं की तरह परिवर्तन शील) मान ले, और अपना (योद्धा का - अर्जुन का नहीं, पुत्र का नहीं, शिष्य का नहीं) कर्म कर । जो व्यक्ति अपने निजी दुःख सुख को परे कर कर्म कर सके वही मानवों में श्रेष्ठ होता है।

यह सब कृष्ण कब कह रहे हैं  ? कई लोग कहते हैं कि कृष्ण यदि अर्जुन को न समझाते , तो युद्ध रुक जाता , कई कई लोग न मरते। लेकिन वे भूल जाते हैं कि कृष्ण ने युद्ध से पहले तक बहुत समझाया था किन्तु अर्जुन तब अपने क्रोध (द्रौपदी का अपमान , वनवास का अपमान, आदि आदि) से क्रुद्ध हुआ युद्ध को उद्धत था। तब क्या अर्जुन नहीं जानता था कि युद्ध में कौन सामने होंगे ? भीष्म और द्रोण तो द्यूत क्रीडा के समय ही उसे अपना पक्ष बता चुके थे, और सारे पांडव जानते थे कि वे कौरवों के साथ खड़े दिखेंगे । फ़िर अब नया क्या हुआ ?

जो लोग हज़ारों प्राणों के खोने की बातें करते हैं वे यह भूल जाते हैं कि वे खुद अपने देश के शत्रु देश के शुरू हो चुके युद्ध के दौरान मुख्य सेनानायक/ जनरल / सेनाध्यक्ष .... के अर्जुन की तरह "अहिंसावादी" बन कर संन्यास ले कर युद्ध भूमि छोड़ देने को क्या कहेंगे ? वे यह भी भूल जाते हैं कि हर आतंकवादी घटना के बाद वे खुद युद्ध छेड़ने की गुहार लगाते हैं - यह भूल कर की युद्ध में कितनी "हिंसा" होगी और कितने "निर्दोष सैनिक" मारे जायेंगे। कितनी औरतें विधवा होंगी, और कितने बच्चे अनाथ हो जायेंगे  ।

यह सब "अर्जुन को कृष्ण न लड़वाते तो हिंसा रूकती" कहने वाले लोग वे ही हैं जो कुछ महीने पहले दामिनी के गुनाहगारों को सड़क पर जंगली से जंगली सजाओं की वकालत कर रहे थे। क्या वे कहेंगे कि जज की कुर्सी पर बैठे व्यक्ति को यदि कटघरे में खड़ा बलात्कारी अपना गुरु या परिवारजन दिखे (या शक्तिशाली राजपुत्र दिखे) तब जज को "अहिंसावादी" बन कर पीछे हट जाना चाहिए ? ............. लेकिन यह रक्त का उबाल राजपुत्र दुर्योधन के अनेकानेक स्त्रियों के शोषण पर उबाल नहीं खाता , क्योंकि वह सब तो "पुरानी बात" है  । दुर्योधन की नज़र न सिर्फ अपनी भाभी (राजपरिवार की बहू )पर ही पड़ी बल्कि यदि आपको याद हो तो पांडवों के वनवास के दौरान एक और राजकन्या के साथ उसने यही किया था । जब राज कन्या के साथ  का यह  होता था तो जन साधारण की तो सोच ही सकते हैं  ।

लेकिन नहीं -  ये सब   भूल कर ये "ज्ञानीजन" अचानक "अहिंसावाद" पर चल देते हैं और गीता कह कर अर्जुन को प्रेरित करने के लिए कृष्ण को "अपराधी" घोषित कर देते हैं । वे यह भी भूल जाते हैं कि अक्सर साधारण स्थितियों में अहिंसा की बात करने वालों को वे मूर्ख / डरपोक / आदि आदि  ... घोषित करते हैं ।

लेकिन जब गीता की बात होती है तब अचानक सब न्यायप्रियता और वीरता "अहिंसावाद" की ओट  में छुप जाती है  । तब उन्हें अचानक लगने लगता है कि यदि बलात्कारियों के साथ अपने पितामह / गुरु / भाई दिखें तब न्याय की रक्षा को भूल कर युद्ध से पीठ दिखा देना "भला और सही रास्ता " हो जाता है  ।

----------------------------------------
यदि हमें गीता समझनी है तो अपने आप को महाभारत के मायाजाल से निकाल कर इसे देखना होगा  । गीता जीवन पथ प्रदर्शिका है - यह महाभारत या अर्जुन तक सीमित नहीं है  । कृपया काँटों में उलझे रह कर गुलाब से मुंह न मोडें - इसे समझने के प्रयास करें ।

गीता की असल शुरुआत मुझे लगती है २.११ से । कई विद्वान् ऐसा मानते हैं तो कई नहीं मानते । यह मेरा अपना विचार था की यहाँ से श्री भगवान् का कथन शुरू होता है और पहले बैकग्राउंड है - और पहली बार मुझे श्रीविनोबा भावे जी का version  श्री अनुराग शर्मा जी की आवाज़ में सुनते हुए यह पता चला कि यह और भी लोग मानते हैं  । और यहाँ से कृष्ण का गीत आता है । पूरी महाभारत में न उलझें - इस पर आयें । दुसरे अध्याय के ग्यारहवे श्लोक से जो पोस्ट  लिखी हैं उनके भावार्थ फिर से पेस्ट कर रही हूँ  (ऊपर पूरी पोस्ट्स के लिंक भी हैं ।) :  :

11 श्री भगवान् ने कहा - तू न सोचने योग्य बातों पर इतना सोचा रहा है, और पंडिताई की भाषा प्रयुक्त करता है | किन्तु जो सच ही में पंडित हो - वह तो जिनके प्राण चले गए, या जिनके नहीं भी गए, उन दोनों के ही लिए शोक नहीं करते |

12 (श्री कृष्ण आगे अर्जुन से बोले - )
निश्चित ही पूर्व में ऐसा कोई काल नहीं था जब तू नहीं था, या मैं नहीं था या ये सब राजागण नहीं थे । न ही आगे ऐसा कोई काल होगा जब हम सब नहीं होंगे ।


13 जैसे शरीर में रहने वाला आत्मा अपरिवर्तित ही रह कर लगातार बदलते हुए शरीर में वास करता है (शरीर बालक से जवान होता है, फिर बूढा भी परन्तु उसके भीतर रहने वाला व्यक्ति वही रहता है ) उसी तरह मृत्यु के समय भी वही आत्मा एक से दूसरे शरीर में पुनर्वास कर लेता है | जो यह जानते हैं , वे मोहित नहीं होते ।

14 इन्द्रिय अनुभूति (और मन की भी ) - गर्मी, सर्दी,सुख और दुःख की अनुभूति कराती हैं । जैसे ये मौसम के असर आने जाने वाले हैं, स्थायी नहीं, वैसे ही सुख दुःख भी आने जाने वाले हैं । हे भारत, इनसे प्रभावित हुए बिना इन्हें सहन करना (अनुभव करते हुए भी उपेक्षा करना) सीख । 

15 जिसे ये सब व्यथित नहीं करते और जो इन सब (शारीरिक या मानसिक) परिस्थितियों में सम रहता है (और अपना निश्चित कर्म करता रहता है) वह पुरुष श्रेष्ठ है और मुक्त है ।  

इन श्लोकों में जीवन का ज्ञान है - अपने मानस में इन्हें कृपया सिर्फ पांडव कौरव युद्ध के सन्दर्भ भर तक सीमित न रखें  ।

इस गीता आलेख के बाकी भागों (इससे पहले और बाद के) के लिए ऊपर गीता tab पर क्लिक करें 
जारी 

----------------------------------------
disclaimer:
कई दिनों से इच्छा थी, कि भगवद गीता की अपनी समझ पर लिखूं - पर डर सा लगता है - शुरू करते हुए भी - कि कहाँ मैं और कहाँ गीता पर कुछ लिखने की काबिलियत ?| लेकिन दोस्तों - आज से इस लेबल पर शुरुआत कर रही हूँ - यदि आपके विश्लेषण के हिसाब से यह मेल ना खाता हो - तो you are welcome to comment - फिर डिस्कशन करेंगे .... यह जो भी लिख रही हूँ इस श्रंखला में, यह मेरा interpretation है, मैं इसके सही ही होने का कोई दावा नहीं कर रही  
-----------------------------------------------
मेरे निजी जीवन में गीता जी में समझाए गए गुण नहीं उतरे हैं । मैं गीता जी की एक अध्येता भर हूँ, और साधारण परिस्थितियों वाली उतनी ही साधारण मनुष्य हूँ जितने यहाँ के अधिकतर पाठक गण हैं (सब नहीं - कुछ बहुत ज्ञानी या आदर्श हो सकते हैं) । गीता जी में कही गयी बातों को पढने / समझने / और आपस में बांटने का प्रयास भर कर रही हूँ , किन्तु मैं स्वयं उन ऊंचे आदर्शों पर अपने निजी जीवन में खरी उतरने का कोई दावा नहीं कर रही । न ही मैं अपनी कही बातों के "सही" होने का कोई दावा कर रही हूँ।   मैं पाखंडी नहीं हूँ, और भली तरह जानती हूँ  कि मुझमे अपनी बहुत सी कमियां और कमजोरियां हैं । मैं कई ऐसे इश्वर में आस्था न रखने वाले व्यक्तियों को जानती हूँ , जो वेदों की ऋचाओं को भली प्रकार प्रस्तुत करते हैं । कृपया सिर्फ इस मिल बाँट कर इस अमृतमयी गीता के पठन करने के प्रयास के कारण मुझे विदुषी न समझें (न पाखंडी ही) | कृष्ण गीता में एक दूसरी जगह कहते हैं की चार प्रकार के लोग इस खोज में उतरते हैं, और उनमे से सर्वोच्च स्तर है "ज्ञानी" - और मैं उस श्रेणी में नहीं आती हूँ ।

बुधवार, 25 जुलाई 2012

श्रीमद्भगवद्गीता 2.14

मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः |
आगमापायिनोSनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत || १४ ||

इन्द्रिय अनुभूति (और मन की भी ) - गर्मी, सर्दी,सुख और दुःख की अनुभूति कराती हैं । जैसे ये मौसम के असर आने जाने वाले हैं, स्थायी नहीं, वैसे ही सुख दुःख भी आने जाने वाले हैं । हे भारत, इनसे प्रभावित हुए बिना इन्हें सहन करना (अनुभव करते हुए भी उपेक्षा करना) सीख । 


पिछले श्लोक में श्री कृष्ण ने कहा कि जैसे जीव बदलते हुए शरीर में (पहले एक बालक शरीर , फिर युवा शरीर और फिर बूढा शरीर - शरीर तो तीनो अलग अलग हैं, परन्तु उनमे रहने वाला जीव एक ही है, समय के साथ सिर्फ शरीर बदल रहे हैं । विज्ञान के अनुसार भी हमारा शरीर हर सात वर्ष में पूरी तरह बदल जाता है ) में स्थायी रूप से (बिना किसी बदलाव के ) - अपरिवर्तित रहता है (हम आज भी वही व्यक्ति हैं जो शायद दस-पंद्रह साल पहले थे, हमारी इच्छाएं, आशाएं, प्रेम, क्रोध आदि करीब करीब वही हैं ) 

उसी तरह से मृत्यु पर भी वह जीव अपरिवर्तित ही रहता है, बस शरीर बदलता है, जैसे यह शरीर इस जीवन में लगातार बदलता रहा था । इसमें धीर जन मोहित नहीं होते (disclaimer : मैं धीर नहीं हूँ, कृष्ण कह रहे हैं कि धीर मोहित नहीं होते)) । अगले श्लोक में वे कहते हैं कि जो अपने जीवन में इस अस्पृश्य भाव को आत्मसात कर ले, वह पुरुषों में पुरुषर्षभ है - अर्थात उच्च श्रेणी का है । 

अब वे कह रहे हैं की जैसे सर्दी गर्मी के मौसम के साथ ठण्ड और गर्मी के अहसास आते जाते रहते हैं, उसमे दुखी या सुखी होने की कोई बात नहीं है , उसी तरह से जीवन में सुख और दुःख की अनुभूति कराने वाली परिस्थितियाँ आती जाती रहती हैं - उनमे हमें निर्लिप्त ही रहना चाहिए । 

पार्थ शिष्य है - वह सुन रहा है  ।  सुन तो रहा है, परन्तु यह उसके जीवन के सत्य नहीं बने हैं अभी । वह कृष्ण नहीं है, नारायण नहीं, सिर्फ नर है । नारायण कह रहे हैं, नर सुन रहे हैं । न पार्थ गीता से पहले मात्रा स्पर्श से अस्पृश्य था, न इसके उपरांत हुआ । हाँ, वह इस गीता अमृत के बाद अपने कर्म पथ पर चलने पर ज़रूर अडिग हो गया था, परन्तु जीवन मृत्यु के सुख दुःख से अस्पृश्य (अनछुआ) नहीं । न पार्थ, न उसकी माता ही । 

तो गीता पाठ का अर्थ यह नहीं की उसके सारे उच्च आदेशों का हम अपने जीवन में पूर्ण सामंजस्य ला ही पायेंगे, या न ला सके तो हम नीच हो जाएँगे । किन्तु इस पठन-पाठन और श्रवण से हमारे जीवन की अशुद्धियों से शुचिता की ओर अग्रसर होने की राह अवश्य खुलती है, सुपथ पर कुछ प्रगति तो होती ही है । आगे गीता में कई जगह इस पर बात-चीत है ।

अर्जुन कई तरह से पूछते हैं की हम इन सब बातों के प्रयास करें और बीच में मार्गच्युत हो जाएँ - तो क्या ? हर बार कृष्ण कहते हैं - तुम्हारे प्रयास महत्वपूर्ण हैं । सफलता या असफलता, पूर्ण लक्ष्य प्राप्ति की लिप्सा या अपूर्ण यात्रा में राहच्युत हो जाने के भय न करो - that is not your department ,it is not your worry,it is mine . तुम्हारे "योग्य" कर्म तुम्हारा धर्म हैं, परन्तु वे कर्म सफल हों या नहीं,इससे तुम्हारे कर्म का महत्त्व कम नहीं होता।

इस गीता आलेख के बाकी भागों (इससे पहले और बाद के) के लिए ऊपर गीता tab पर क्लिक करें 
जारी 

----------------------------------------
disclaimer:
कई दिनों से इच्छा थी, कि भगवद गीता की अपनी समझ पर लिखूं - पर डर सा लगता है - शुरू करते हुए भी - कि कहाँ मैं और कहाँ गीता पर कुछ लिखने की काबिलियत ?| लेकिन दोस्तों - आज से इस लेबल पर शुरुआत कर रही हूँ - यदि आपके विश्लेषण के हिसाब से यह मेल ना खाता हो - तो you are welcome to comment - फिर डिस्कशन करेंगे .... यह जो भी लिख रही हूँ इस श्रंखला में, यह मेरा interpretation है, मैं इसके सही ही होने का कोई दावा नहीं कर रही  
-----------------------------------------------
मेरे निजी जीवन में गीता जी में समझाए गए गुण नहीं उतरे हैं । मैं गीता जी की एक अध्येता भर हूँ, और साधारण परिस्थितियों वाली उतनी ही साधारण मनुष्य हूँ जितने यहाँ के अधिकतर पाठक गण हैं (सब नहीं - कुछ बहुत ज्ञानी या आदर्श हो सकते हैं) । गीता जी में कही गयी बातों को पढने / समझने / और आपस में बांटने का प्रयास भर कर रही हूँ , किन्तु मैं स्वयं उन ऊंचे आदर्शों पर अपने निजी जीवन में खरी उतरने का कोई दावा नहीं कर रही । न ही मैं अपनी कही बातों के "सही" होने का कोई दावा कर रही हूँ।   मैं पाखंडी नहीं हूँ, और भली तरह जानती हूँ  कि मुझमे अपनी बहुत सी कमियां और कमजोरियां हैं । मैं कई ऐसे इश्वर में आस्था न रखने वाले व्यक्तियों को जानती हूँ , जो वेदों की ऋचाओं को भली प्रकार प्रस्तुत करते हैं । कृपया सिर्फ इस मिल बाँट कर इस अमृतमयी गीता के पठन करने के प्रयास के कारण मुझे विदुषी न समझें (न पाखंडी ही) | कृष्ण गीता में एक दूसरी जगह कहते हैं की चार प्रकार के लोग इस खोज में उतरते हैं, और उनमे से सर्वोच्च स्तर है "ज्ञानी" - और मैं उस श्रेणी में नहीं आती हूँ ।
-------------------------------------------------
DISCLAIMER : 
I am not able to implement all this in real life. I am a student of the Geeta, and just as normal a human being with as normal circumstances as most of the readers here (not all - saome readers may be very high level ideal persons). I am just trying to read / understand / share the Geeta's message NOT claiming to be a person with the high ideal characteristics intended in the Geeta. I am not a hippocrite, and I do know that I have my limitations and weaknesses. I know many atheist persons who present the verses of the vedas perfectly. Please do not associate me with the perfection of the Geeta (or hippocricy ) just because I am trying to share the nectar I received from it) Krishna says elsewhere in the geeta that four types of persons try to get into this study - and only the highest category are the "gyaani" category. I am not one of them.

---------------------------------------------------

शुक्रवार, 27 अप्रैल 2012

श्रीमद्भगवद्गीता २.१२ , २.१३

नत्वेवाहं जातु नासं न त्वं नेमे जनाधिपाः ।
न चैव नभविष्यामः सर्वे वयमतः परम् ।।
(श्री कृष्ण आगे अर्जुन से बोले - )

निश्चित ही पूर्व में ऐसा कोई काल नहीं था जब तू नहीं था, या मैं नहीं था या ये सब राजागण नहीं थे । न ही आगे ऐसा कोई काल होगा जब हम सब नहीं होंगे ।


यह श्लोक यह कहता है कि जो भी है - सब स्थायी है - सिर्फ रूप बदलते हैं । विज्ञान भी कहता है - law of conservation of energy and matter - बाह्य रूप में बदलाव आ सकता है - परन्तु न तो नया कुछ बन सकता है - न ही विनष्ट हो सकता है । हम सभी जीव समय के भी पूर्व से हैं - और समय चक्र के आगे भी होंगे । किस रूप में होंगे ? हम में से कोई नहीं जानता । 

यह कृष्ण इसलिए कह रहे हैं कि अर्जुन घोर विषाद में है । वह अपने पितामह भीष्म और गुरु द्रोण आदि की संभावित मृत्यु (बल्कि शायद स्वयं अपने ही हाथ से मृत्यु ) से भयभीत है - कि वे सब न होंगे - तो मैं जीत कर भी क्या करूंगा । कृष्ण कह रहे हैं कि यह संभव ही नहीं कि ये नहीं होंगे - क्योंकि कुछ भी विनष्ट हो ही नहीं सकता है । 
-------------------------------------------------------
देहिनोSअस्मिन्यथा देहे कौमारं यौवनं जरा |
तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति  || 

जैसे शरीर में रहने वाला आत्मा अपरिवर्तित ही रह कर लगातार बदलते हुए शरीर में वास करता है (शरीर बालक से जवान होता है, फिर बूढा भी परन्तु उसके भीतर रहने वाला व्यक्ति वही रहता है ) उसी तरह मृत्यु के समय भी वही आत्मा एक से दूसरे शरीर में पुनर्वास कर लेता है | जो यह जानते हैं , वे मोहित नहीं होते ।

यह बात गीता के मुख्य ज्ञान से जुडी हुई है । यह सच है - यह हम सब का अनुभव है । हम आज जिस वयस / उम्र के हैं - पांच साल पहले इससे पांच वर्ष छोटे थे, पांच साल बाद [ यदि इसी शरीर में जीवित ही रहे तो :) ] इससे पांच साल बड़े हो जायेंगे । परन्तु - शरीर में जो भी बदलाव आये हैं - (शायद पहले के अपेक्षा हम अब थकते ज्यादा हों , आदि आदि ) , किन्तु हम व्यक्ति तो वही हैं जो पांच साल पहले थे ।

शायद कुछ नए अनुभव और नयी यादें जुड़ गयी हैं हमसे, परन्तु बुनियादी तौर पर हम नहीं बदले हैं ।

इसी तरह ( कृष्ण कह रहे हैं ) जब मृत्यु होगी - तब भी हम वही रहेंगे , सिर्फ जो जीव इस शरीर के बदलते रूपों में अपरिवर्तित रहता रहा इतने समय , वही एक और नए बदले हुए शरीर में चला जाएगा । जीव नहीं बदलेगा , यह सिर्फ इस present वाले बदलते शरीर से, एक नए बदलते शरीर में पुनर्वासित हो जाएगा । 

एक मकान बना - उसमे हम रहे । नए से पुराना हुआ, जर्जर, फिर रहने लायक न रहा । तो उसके निवासी दूसरे मकान में चले गए (जो फिर से पुराना होने ही वाला है, टूटने ही वाला है )। मृत्यु सिर्फ एक मकान का बदलाव भर है, और कुछ नहीं ।

इस गीता आलेख के बाकी भागों (इससे पहले और बाद के) के लिए ऊपर गीता tab पर क्लिक करें 
जारी 

----------------------------------------
disclaimer:
कई दिनों से इच्छा थी, कि भगवद गीता की अपनी समझ पर लिखूं - पर डर सा लगता है - शुरू करते हुए भी - कि कहाँ मैं और कहाँ गीता पर कुछ लिखने की काबिलियत ?| लेकिन दोस्तों - आज से इस लेबल पर शुरुआत कर रही हूँ - यदि आपके विश्लेषण के हिसाब से यह मेल ना खाता हो - तो you are welcome to comment - फिर डिस्कशन करेंगे .... यह जो भी लिख रही हूँ इस श्रंखला में, यह मेरा interpretation है, मैं इसके सही ही होने का कोई दावा नहीं कर रही  
-----------------------------------------------
मेरे निजी जीवन में गीता जी में समझाए गए गुण नहीं उतरे हैं । मैं गीता जी की एक अध्येता भर हूँ, और साधारण परिस्थितियों वाली उतनी ही साधारण मनुष्य हूँ जितने यहाँ के अधिकतर पाठक गण हैं (सब नहीं - कुछ बहुत ज्ञानी या आदर्श हो सकते हैं) । गीता जी में कही गयी बातों को पढने / समझने / और आपस में बांटने का प्रयास भर कर रही हूँ , किन्तु मैं स्वयं उन ऊंचे आदर्शों पर अपने निजी जीवन में खरी उतरने का कोई दावा नहीं कर रही । न ही मैं अपनी कही बातों के "सही" होने का कोई दावा कर रही हूँ।   मैं पाखंडी नहीं हूँ, और भली तरह जानती हूँ  कि मुझमे अपनी बहुत सी कमियां और कमजोरियां हैं । मैं कई ऐसे इश्वर में आस्था न रखने वाले व्यक्तियों को जानती हूँ , जो वेदों की ऋचाओं को भली प्रकार प्रस्तुत करते हैं । कृपया सिर्फ इस मिल बाँट कर इस अमृतमयी गीता के पठन करने के प्रयास के कारण मुझे विदुषी न समझें (न पाखंडी ही) | कृष्ण गीता में एक दूसरी जगह कहते हैं की चार प्रकार के लोग इस खोज में उतरते हैं, और उनमे से सर्वोच्च स्तर है "ज्ञानी" - और मैं उस श्रेणी में नहीं आती हूँ ।


मंगलवार, 21 फ़रवरी 2012

सच कडवा होता है ? क्या सचमुच ?

... हमारी राह सत्य से होकर ... गुज़रे, न गुज़रे ...

कई लोगों से सुना है,
कई किताबों में पढ़ा है
"सच तो कड़वा ही होता है"
क्या सचमुच ?

मैंने तो यह भी पढ़ा है कि
"God is truth " और यह कि
-- "सत्यम शिवम् सुन्दरम"
और "सत चित आनंद" फिर
"न असतो विद्यते भावो, न अभावो विद्यते सतः"

फिर
सत्य कडवा कैसे होता होगा ?
है यदि
तो क्यों सारी दुनिया
उसे खोजती फिर रही है ?

नहीं
सत्य कडवा नहीं होता
सत्य मीठा भी नहीं होता,
सत्य बस है,
रंगहीन, गंधहीन, स्वादहीन
न वह ठंडा है, न गर्म
वह न कट सकता है,
न जल सकता  है
न भीग सकता है कभी,
न कभी सूख सकता है ।

जो इसे कड़वा समझते हैं,
जो इसे मीठा कहते हैं
दोनों ही नहीं जानते
क्योंकि यह दोनों से परे है ।

कड़वा कब लगता है सच ?
जब सत्य के पथ पर
हमारी आकांक्षाएं
अवरोधित होती हैं
हमारे स्वार्थ टकराते हैं ।
मीठा कब है ?
जब विराट का वह नन्हा टुकड़ा
जो हमें दीखता है
हमारे सुखानुभव को संबल देता है।

पानी तो पानी है
हल्दी मिला दो तो पीला,
नील मिला दी तो नीला
न नीला न पीला
पानी तो है बस बस पानी ।

यदि सत्य मुझे मीठा लगता हो
तो मिठास मेरे भीतर है
यदि कड़वा
तो कडवाहट भी मेरी ही
सत्य बस सत्य है ।

हम कहते हैं - हम सत्य के साथ हैं ।
नहीं
हम सिर्फ अपनी राह पर हैं ।
सत्य बस है
हमारी राह सत्य से होकर
गुज़रे, न गुज़रे
इससे सत्य को, उसकी भव्यता को
कोई फर्क नहीं पड़ता
हाँ - हमें ज़रूर फर्क पड़ता है ........
तभी तो हमें सत्य मीठा और कड़वा दिखता है ......

.....................................................

इन पंक्तियों को आदरणीय अर्चना चावजी जी ने अपनी आवाज़ दी है - आप यहाँ क्लीक करने पर इन्हें सुन सकते हैं :


गुरुवार, 5 जनवरी 2012

श्रीमद्भगवद्गीता २.११

श्री भगवानुवाच् 
अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादान्श्चभाषसे ||
गतासूनगतासून्श्च नानुशोचन्ति पण्डिताः ||११|| 

श्री भगवान् ने कहा - तू न सोचने योग्य बातों पर इतना सोचा रहा है, और पंडिताई की भाषा प्रयुक्त करता है | किन्तु जो सच ही में पंडित हो - वह तो जिनके प्राण चले गए, या जिनके नहीं भी गए, उन दोनों के ही लिए शोक नहीं करते |
------------------------
[ यहाँ यह ज़रूर कहूँगी, कि मैं भी इस गीता की एक student भर हूँ | translation और discussion कर रही हूँ, परन्तु न तो मैं कोई ज्ञानी होने का दावा कर रही हूँ, न ही कोई प्रवचनकर्ता हूँ | सिर्फ एक बहुत बड़ा खजाना मिला है गीतासागर का - तो यह उसे शेयर करने का प्रयास भर है | हो सकता है कई जगह मेरे और आपके interpretations मेल न खाएं - आपकी टिप्पणियों का स्वागत है | मैं भी सीख ही रही हूँ | चर्चा करेंगे, कि कौनसा interpretation  सही होगा |]
------------------------

अब तक हमने जो पढ़ा - वह कृष्ण गीत की भूमिका भर थी | अर्जुन का युद्ध क्षेत्र में आना, ध्रितराष्ट्र , दुर्योधन आदि की मानसिक स्थिति की और संकेत मिले | फिर अर्जुन ने दोनों सेनाओं को देखा, और अपने सम्बन्धियों / प्रियजनों के मोह वश होकर तड़पने लगा | उसकी स्थिति इतनी बुरी हो गयी, की उसके हाथ पाँव शिथिल हो गए, और गांडीव छूटने लगा | जिस महायोद्धा अर्जुन ने अनेकों युद्ध जीते, वह "प्रियजनों का हत्यारा बनूँगा" के विचार से काँप उठा | उसने कृष्ण से कहा की इस इन्द्रियों को सुखाने वाले महाशोक से मैं कभी नहीं छूट पाऊंगा , और हथियार डालने को उद्धत हो गया | पहले कृष्ण ने एक कुशल मनोवैज्ञानिक की भांति उसे व्यंग्य कर के उकसाया - जैसा साधारण स्थिति में हम करते हैं | उन्होंने उसे कायर भी कहा , और नपुंसक भी | किन्तु अर्जुन इन बातों से आगे की दवा का ज़रूरतमंद था | उसकी मानसिक स्थिति साधारण पलायन की नहीं थी, कि वह व्यंग्यों से होश में आता  |

उसका विषाद बहुत गहन था | आखिर कृष्ण को उसे जगाने के लिए . युद्धभूमि में खड़े हुए, यह परम गुप्त ज्ञान की नदी - यह गीता - सुनानी पडी - जिसे सुन कर ही उसके संशय दूर हो सके | वह विषाद से भर कर प्रभु की शरण में आया, और प्रभु ने उसे अपने ज्ञानसागर में शरण दी | तब उसका विषाद, विषादयोग में बदल गया - जो उसे प्रभु से योग की राह पर ले जाने का साधन हुआ | कृष्ण ने उसे ज्ञान, वैराग्य , भक्ति, सांख्य, निष्काम कर्म , वेदों , यज्ञों , स्थित-प्रज्ञता आदि सभी के महत्व बताये | ध्यान देने की बात है कि - यह सब नर और नारायण की लीला मात्र है - गीता अर्जुन को नहीं - बल्कि हम लोगों के लिए गई गयी है | अर्जुन नर हैं, कृष्ण नारायण | और महाभारत के नायक युवा अभिमन्यु के पुत्र परीक्षित के काल में ही कलियुग का आरम्भ हुआ | तो गीता हम लोगों को कलियुग में जीवन का सही मार्ग दिखने को गाई गयी है | अर्जुन - जो कृष्ण का चिर सखा है - वह भ्रम में पड़ा हो - यह कुछ बात हजम होती नहीं है | प्रभु के दर्शन भर करने को महाज्ञानी महामानव सदियों तपस्या करते हैं - उन प्रभु का चिर सखा मोह में पड़ेगा क्या ? 

"श्रीमद भगवद गीता " का अर्थ है "श्री भगवान् का गाया दिव्य गीत |"
........ यह गीत यहाँ - इस श्लोक से - शुरू होता है |  
-------------------------------------------------------------------------

तो कृष्ण कह रहे हैं "तू न सोचने योग्य पर इतना सोच रहा है " -
न सोचने योग्य ???? तो क्या इतनी महामारी जो इस युद्ध से होगी, प्रिय पितामह की संभावित हत्या, गुरुजनों, बेटों, पोतों, चाचों, मामों आदि की संभावित मौत - पूरे परिवार का संभावित महाविनाश - क्या ये बातें "अशोच्यान" हैं ????

आप और मैं सोचें - अपने परिवार को लेकर - अर्जुन को लेकर सोचना बहुत आसान है - वह दूर है - अपने परिवार के बारे में सोचें - ऐसी महाविनाश की स्थिति अपने परिवार पर आये - तो क्या हम विषाद को प्राप्त नहीं हो जायेंगे ? हम सभी सामाजिक प्राणी हैं - सभी के परिवार हैं , साधू सन्यासी तो शायद हम सभी पढने वालों में कोई नहीं होगा - सभी के परिवारों में प्रिय जन हैं | और अर्जुन का तो फिर बहुत विराट परिवार है | प्रपिता से प्रपौत्र तक हैं, १०० तो cousins कौरव ही हैं | इन सभी की मृत्यु सामने खड़ी है - सोचिये कैसा गहरा अवसाद होगा उसके मन में | अर्जुन वैसे ही कुंती पुत्रों में शायद सबसे अधिक emotional है | 
और कृष्ण "अशोच्यान" कह रहे हैं ? 

क्योंकि - short  term  में ये चीज़ें बड़ी हैं, किन्तु इश्वर का viewpoint  short  term  तो नहीं होता न ? Larger perview में देखा जाए - तो हाँ , यह अशोच्यान ही है | long term scheme of events  में ये मृत्युएँ कोई मायने नहीं रखतीं | न भी मारे जाएँ ये सब इस धर्मयुद्ध में, तो किसी और रूप में उसी समय मृत्यु को पायेंगे, जिस समय उन्होंने पायी | कृष्ण महाकाल स्वरुप हैं, हर एक की मृत्यु का समय वे जानते हैं | अर्जुन युद्ध करे, या न करे, मारे, या न मारे - हर एक को अपने समय पर देह त्यागनी ही है | कृष्ण अर्जुन पर निर्भर नहीं हैं इन सबको मारने के लिए | बहुत तरीके हैं सामूहिक संहार के लिए, प्रभु भूकंप भी ला सकते हैं, बाढ़, ज्वालामुखी आदि - कुछ भी | 

नहीं - जोर यहाँ परिणाम (मृत्यु या संहार) पर नहीं है | जोर यहाँ है , कर्त्तव्य पर अडिग रहने और पलायन न करने पर | हर loss की कीमत पर अपना कर्त्तव्य पूरा करने पर stress  है | कोई यह न सोचे कि यदि अर्जुन न भी लड़ता - तो जो जो, जैसे जैसे, और जब जब मरा - उसमे तिल भर भी फर्क आता | उनकी मृत्यु उसी रूप में तय थी, वैसे ही और उसी पल आती !!! बस- उसका निमित्त कोई और होता |

एक बात - गीता के बाहर की है - फिर भी कहूँगी | जब कृष्ण बालसखाओं के संग वन में थे, तब ब्रह्मा जी ने सब बछड़े और ग्वाले छुपा लिए थे - परीक्षा लेने कि यही कृष्ण हैं ? ब्रह्मा तो पल भर में लौट आये अपने समय से, किन्तु यहाँ धरती पर साल बीत गया था | उस साल भर कृष्ण खुद ही उन सभी ग्वालों और बछड़ों का रूप धार कर हर घर में हर माँ और हर गाय को पुत्र सुख देते रहे | तो यहाँ भी वे हर चीज़ अकेले कर सकते हैं | उन्हें अर्जुन के युद्ध करने की आवश्यकता ही नहीं है | आवश्यकता अर्जुन को है अपना धर्म पूरा करने की | 

कृष्ण कह रहे हैं कि तेरी यह पांडित्य भरी बातें पांडित्य नहीं, बल्कि मूर्खता हैं | जो सच ही ज्ञानी होते हैं, वे न जीवित का शोक (चिंता) करते हैं, न मृत का | आगे वे इस पर विस्तार करेंगे |
-------

इस गीता आलेख के बाकी भागों (इससे पहले और बाद के) के लिए ऊपर गीता tab पर क्लिक करें 
जारी 

----------------------------------------
disclaimer:
कई दिनों से इच्छा थी, कि भगवद गीता की अपनी समझ पर लिखूं - पर डर सा लगता है - शुरू करते हुए भी - कि कहाँ मैं और कहाँ गीता पर कुछ लिखने की काबिलियत ?| लेकिन दोस्तों - आज से इस लेबल पर शुरुआत कर रही हूँ - यदि आपके विश्लेषण के हिसाब से यह मेल ना खाता हो - तो you are welcome to comment - फिर डिस्कशन करेंगे .... यह जो भी लिख रही हूँ इस श्रंखला में, यह मेरा interpretation है, मैं इसके सही ही होने का कोई दावा नहीं कर रही  
-----------------------------------------------
मेरे निजी जीवन में गीता जी में समझाए गए गुण नहीं उतरे हैं । मैं गीता जी की एक अध्येता भर हूँ, और साधारण परिस्थितियों वाली उतनी ही साधारण मनुष्य हूँ जितने यहाँ के अधिकतर पाठक गण हैं (सब नहीं - कुछ बहुत ज्ञानी या आदर्श हो सकते हैं) । गीता जी में कही गयी बातों को पढने / समझने / और आपस में बांटने का प्रयास भर कर रही हूँ , किन्तु मैं स्वयं उन ऊंचे आदर्शों पर अपने निजी जीवन में खरी उतरने का कोई दावा नहीं कर रही । न ही मैं अपनी कही बातों के "सही" होने का कोई दावा कर रही हूँ।   मैं पाखंडी नहीं हूँ, और भली तरह जानती हूँ  कि मुझमे अपनी बहुत सी कमियां और कमजोरियां हैं । मैं कई ऐसे इश्वर में आस्था न रखने वाले व्यक्तियों को जानती हूँ , जो वेदों की ऋचाओं को भली प्रकार प्रस्तुत करते हैं । कृपया सिर्फ इस मिल बाँट कर इस अमृतमयी गीता के पठन करने के प्रयास के कारण मुझे विदुषी न समझें (न पाखंडी ही) | कृष्ण गीता में एक दूसरी जगह कहते हैं की चार प्रकार के लोग इस खोज में उतरते हैं, और उनमे से सर्वोच्च स्तर है "ज्ञानी" - और मैं उस श्रेणी में नहीं आती हूँ ।

बुधवार, 30 नवंबर 2011

श्रीमद्भगवद्गीता २.९, २.१०

संजय उवाच 
एवमुक्त्वा हृषीकेशं , गुडाकेशः परन्तप |
न योत्स्य इति गोविन्दमुक्त्वा तूष्णीं बभूव ह ||

निद्रा को जीतने वाला अर्जुन ,  हृषीकेश (कृष्ण ) से , "हे गोविन्द, बस, मैं युद्ध नहीं करूंगा " ऐसा कह कर चुप हो गया |      

इतने सारे तर्क (या वितर्क ?){कि उसे युद्ध करना उचित क्यों नहीं है } देकर अर्जुन अपने आप को convince कर चुका है कि यह युद्ध नहीं करना ही उसके लिए उचित है | 

ध्यान दें कि 
(१) वह सुशिक्षित है, अपना कर्त्तव्य जानता है | यह भी जानता है कि धर्मयुद्ध से पलायन धर्म विरुद्ध है 
(२) यह भी कि वह "अहिंसा" के लिए नहीं, बल्कि प्रियजनों की मृत्यु के डर से यह कर रहा है | 
(३) यदि प्रिय पितामह और गुरुदेव (और कौरवों में से कुछ गिने चुने प्रिय भाई ) बच सकें, तो उसे युद्ध में होने वाली हिंसा / खो जाने वाली जानों ) से कोई आपत्ति नहीं है - वह कोई अहिंसावादी नहीं है - पहले भी कई सारे युद्ध कर चुका है, और आगे भी करेगा | 
(४) यह भी जानता है कि मैं प्रियजनों के मोह में पड़ कर अपने कर्त्तव्य से भाग रहा हूँ | अभी पीछे ही कृष्ण को गुरु कह कर उनकी शरण स्वीकारी है, अभी ही उन्ही गुरु को अपना निर्णय दे रहा है कि मैं युद्ध नहीं करूंगा - कि यह उचित नहीं है | 
(५) अभी दो श्लोक पहले उसने कृष्ण को गुरु स्वीकारा और उनकी शरण में आया , यह कह कर कि "शिष्यस्ते अहम् , शाधिमाम त्वाम प्रपन्नम"

अब, जब तुम जानते ही हो कि क्या करना उचित है और तुम्हे क्या करना है, और तुम स्थिर हो कि तुम वही करोगे,  तो कैसी शरणागति ? यह ऐसा है कि बच्चा teacher से कहे कि मुझे maths नहीं आता, सिखाइए, फिर जब teacher कहे कि २+२=४ तो बच्चा बोले कि नहीं यह तो ३ होना चाहिए, ४ नहीं | :)

पर कृष्ण तो सद्गुरु हैं न? वे कैसे अपनी शरण में आये अर्जुन को गलत राह पर जाने देंगे ? तो वे उसे समझाते हैं अब |
-------------------------------------------------
तमुवाच हृषीकेशः प्रहसन्निव भारत |
सेनयोरुभयोर्मध्ये विषीदन्तमिदं वचः ||

उसकी इन बातों को सुन कर, हँसते हुए से, श्री कृष्ण ने , दोनों सेनाओं के मध्य खड़े हुए ,उस दुखी (अर्जुन) से ,ये वचन कहे  |


कृष्ण हंस रहे हैं | किन्तु यह हंसी शिष्य की हंसी उड़ने वाली हंसी नहीं, बल्कि उसे encouragement देने के लिए, उसका tension कम करने के लिए है | उन्हें अर्जुन के सारे विरोधाभास दिख रहे हैं, जो उसे स्वयं को नहीं दिख रहे |


युद्ध से पहले जब कृष्ण युद्ध टालने के प्रयास कर रहे थे - तब यही अर्जुन युद्ध के लिए लालायित था | उस पर तब प्रतिशोध का भूत सवार था | तब भी यह विदित था कि युद्ध होगा तो किनसे लड़ना होगा, कौन प्रिय जन जान हथेली पर ले कर युद्ध करेंगे | किन्तु तब उसने युद्ध चुना | इसलिए नहीं कि यह न्यायोचित या धर्मोचित था, बल्कि इसलिए कि उसे द्रौपदी के अपमान का बदला लेना था |


कृष्ण और युधिष्ठिर युद्ध टालना चाहते थे, किन्तु चारों छोटे पांडव भाई युद्ध चाहते थे | अब युद्ध छिड़ गया है, भेरियां बज गयी हैं | अब युद्ध छोड़ देने का अर्थ है, अन्याय को धर्म पर जीत जाने देना | 


यहाँ से असल गीता का ज्ञान दिया जाता है | यह सब सिर्फ भूमिका थी | अब कृष्ण का गीत है - जिसे श्रीमद (श्री)- भगवद (भगवान की) गीता (गीत) कहते हैं | यह दिव्य गीत अगले श्लोक से शुरू होगा |


इस गीता आलेख के बाकी भागों (इससे पहले और बाद के) के लिए ऊपर गीता tab पर क्लिक करें 
जारी 

----------------------------------------
disclaimer:
कई दिनों से इच्छा थी, कि भगवद गीता की अपनी समझ पर लिखूं - पर डर सा लगता है - शुरू करते हुए भी - कि कहाँ मैं और कहाँ गीता पर कुछ लिखने की काबिलियत ?| लेकिन दोस्तों - आज से इस लेबल पर शुरुआत कर रही हूँ - यदि आपके विश्लेषण के हिसाब से यह मेल ना खाता हो - तो you are welcome to comment - फिर डिस्कशन करेंगे .... यह जो भी लिख रही हूँ इस श्रंखला में, यह मेरा interpretation है, मैं इसके सही ही होने का कोई दावा नहीं कर रही  
-----------------------------------------------
मेरे निजी जीवन में गीता जी में समझाए गए गुण नहीं उतरे हैं । मैं गीता जी की एक अध्येता भर हूँ, और साधारण परिस्थितियों वाली उतनी ही साधारण मनुष्य हूँ जितने यहाँ के अधिकतर पाठक गण हैं (सब नहीं - कुछ बहुत ज्ञानी या आदर्श हो सकते हैं) । गीता जी में कही गयी बातों को पढने / समझने / और आपस में बांटने का प्रयास भर कर रही हूँ , किन्तु मैं स्वयं उन ऊंचे आदर्शों पर अपने निजी जीवन में खरी उतरने का कोई दावा नहीं कर रही । न ही मैं अपनी कही बातों के "सही" होने का कोई दावा कर रही हूँ।   मैं पाखंडी नहीं हूँ, और भली तरह जानती हूँ  कि मुझमे अपनी बहुत सी कमियां और कमजोरियां हैं । मैं कई ऐसे इश्वर में आस्था न रखने वाले व्यक्तियों को जानती हूँ , जो वेदों की ऋचाओं को भली प्रकार प्रस्तुत करते हैं । कृपया सिर्फ इस मिल बाँट कर इस अमृतमयी गीता के पठन करने के प्रयास के कारण मुझे विदुषी न समझें (न पाखंडी ही) | कृष्ण गीता में एक दूसरी जगह कहते हैं की चार प्रकार के लोग इस खोज में उतरते हैं, और उनमे से सर्वोच्च स्तर है "ज्ञानी" - और मैं उस श्रेणी में नहीं आती हूँ ।

सोमवार, 28 नवंबर 2011

श्रीमद्भगवद्गीता २.८

न हि प्रपश्यामि ममापनुद्यात
यच्छ्होकमुच्छोषणमिन्द्रियाणां |
अवाप्यभूमावसपत्नंरिद्धं
राज्यं सुराणामपिचाधिपत्यं ||

अर्जुन ने कहा : मैं ऐसा कोई उपाय नहीं देख पा रहा जो मेरे इस इन्द्रियों को सुखा डालने वाले शोक को दूर कर सके (जो शोक प्रिय जनों की आसन्न हत्याओं के भय से उत्पन्न हुआ है ) | चाहे मुझे इस विजय से धरती का समृद्ध शत्रुविहीन साम्राज्य मिल जाये , या स्वर्ग का अधिपति ही बन जाऊं, तब भी यह गहन शोक न जाएगा |
----------------------
अर्जुन पिछले श्लोक (जिसमे उसने कार्पण्य से उपहत हो कर विवेक खो बैठा हूँ - यह स्वीकार कर के अपने को कृष्ण के शिष्य रूप में समर्पित कर दिया है ) आगे कह रहा है अब | वह अभी कह आया है (पिछले श्लोक में ) कि वह कृष्ण की शरण में है - जो वे कहेंगे वह करेगा | और अभी ही कह रहा है कि मुझे कोई उपाय नहीं दीखता | यह ऐसा नहीं की अर्जुन धोखा दे रहा है कृष्ण को, या विरोधाभास हो उसकी बातों में | वह इतना दुखी है - हाथ पाँव ठन्डे हुए जा रहे हैं, दिमाग काम नहीं कर रहा , खड़े नहीं हो पा रहा , हाथ से गांडीव गिर रहा है |

वह बेचारा (कृपया "बेचारा" शब्द पर विवाद न हो - बेचारा का अर्थ दया का पात्र नहीं होता - इसका अर्थ होता है - वह जिसे कोई चारा / उपाय न सूझ रहा हो ) समझ ही नहीं पा रहा कि मैं अब क्या करूँ, क्या कहूँ, कहाँ जाऊं ....... | सोचिये- उसे किसे मारना है - अपने प्रिय दादा, अपने प्रिय भाइयों, अपने प्रिय भतीजों आदि को - अपने आप को अपने सगे सम्बन्धियों के साथ सोचये - अर्जुन पर क्या गुज़र रही होगी, समझ में आएगा थोडा थोडा |

परन्तु - यह कर्म - यह परीक्षा - आवश्यक है | उसके अपने लिए नहीं - वरन धर्म की जीत के लिए आवश्यक है | यह विषाद ही उसे प्रभु के प्रति समर्पण के लिए तपा कर कुंदन कर रहा है | और जब ऐसा संपूर्ण समर्पण होगा - तब ही गीता ज्ञान आत्मसात हो पायेगा | नहीं तो तर्क कुतर्क के सिलसिले का क्या है - वह तो अनंत है |

आज की स्थिति में तो आये दिन लोग सिर्फ एक मकान भर के लिए सगे भाई की हत्या कर देते हैं | कोई लोग अपने अहंकार के पोषण के लिए पिता तुल्य व्यक्ति को व्यंग्य बाण मार मार कर इतनी मानसिक प्रतारणा देते हैं की वे खून के आंसू रोयें | पुत्र और पुत्रियाँ ( और पुत्रवधुएँ और दामाद) अपने जीते जागते बुजुर्गों को मानसिक आघात कर कर के इतना दुखित कर देते हैं की वह बुज़ुर्ग ईश्वर से मृत्यु मांगने लगे | इसी मानसिकता के कारण आज हमारी भारत भूमि पर old age homes स्थापित हैं :( |

लेकिन यहाँ अर्जुन कह रहा है कि (इन सब प्रिय जनों के बिना जीवन की कल्पना से भी ) जो मुझे कलेजे को चीर देने वाला दुःख हो रहा है- यह संताप तो स्वर्ग प्राप्त भी हो जाए - पर फिर भी नहीं जा सकता | वह धर्म अधर्म सब भूल गया है अभी इस मार्मिक दुःख से | यह भी भूल गया है कि इस युद्ध से वह ये सारे साम्राज्य जीतने को प्रयत्नरत भी नहीं है | उसे सिर्फ और सिर्फ अँधेरा नज़र आ रहा है |

इसके विपरीत दुर्योधन है - जिसकी और से पितामह लड़ रहे हैं | पर दुर्योधनी मानसिकता उन्हें सिर्फ एक योद्धा के रूप में देखती है | यदि उनकी मृत्यु हो गयी इसमें - तो जो नुक्सान होगा - वह सैनिक दृष्टी से तो उसे चोट देगा, किन्तु भावनात्मक कोई चोट न लगेगी | उसके लिए अपने बुज़ुर्ग सिर्फ शतरंज की बिसात की गोटियाँ हैं (या कहें कि द्यूत की ?) - जिन्हें वह सिर्फ अपनी जीत के उद्देश्य से उपयोग में ला रहा है | उसे उनकी भयंकर मानसिक पीड़ा से ( जो उसके कर्मों से उत्पन्न हो रही है ) या उनकी संभावित मृत्यु से भी - कोई तकलीफ नहीं होती है |

ध्यान देने की बात है कि - सिर्फ गीता के गायन से और उसके श्रवण भर से ही इस पीडादायी मनोस्थिति में पड़ा यह अर्जुन इस विषाद से निकल सका | यह इसलिए संभव हुआ कि उसने पूरी श्रद्धा से सुना, समझा और मनन किया |

ऐसा नहीं है कि उसने प्रति प्रश्न पूछे न हों - पूछे - अवश्य पूछे - बार बार पूछे | परन्तु उन प्रश्नों का उद्देश्य कृष्ण की बात काटना नहीं था, बल्कि उनकी बात समझना था |

मैं बार बार यही कहती रहती हूँ कि - हम क्या कर रहे हैं - इससे अधिक महत्वपूर्ण यह है कि हम वह क्यों कर रहे हैं, किस भावना से प्रेरित हो कर कर रहे हैं |

यह सिर्फ अर्जुन पर उस वक़्त नहीं - बल्कि हम में से हर एक पर - हर वक़्त, हर स्थति में लागू होता है | कई बार हमारा कर्त्तव्य ऐसा कुछ होता है - जो हमें कड़वा भी लगता है | तब - उस कर्त्तव्य को सामने देख कर ही हम मोहवश पस्त पड़ जाते हैं | कुतर्क भी करते हैं - ज्ञानियों जैसी बातें भी बनाते हैं | परन्तु यह ज्ञान नहीं होता, ज्ञान का छलावा भर होता है | परन्तु यदि कृष्ण जैसा सदगुरु मिले - और अर्जुन सा समर्पित शिष्य - तो संशय दूर होते समय नहीं लगता |

इस गीता आलेख के बाकी भागों (इससे पहले और बाद के) के लिए ऊपर गीता tab पर क्लिक करें

जारी
---------------------------------------
disclaimer:

कई दिनों से इच्छा थी, कि भगवद गीता की अपनी समझ पर लिखूं - पर डर सा लगता है - शुरू करते हुए भी - कि कहाँ मैं और कहाँ गीता पर कुछ लिखने की काबिलियत ?| लेकिन दोस्तों - आज से इस लेबल पर शुरुआत कर रही हूँ - यदि आपके विश्लेषण के हिसाब से यह मेल ना खाता हो - तो you are welcome to comment - फिर डिस्कशन करेंगे .... यह जो भी लिख रही हूँ इस श्रंखला में, यह मेरा interpretation है, मैं इसके सही ही होने का कोई दावा नहीं कर रही
----------------------------------------------
मेरे निजी जीवन में गीता जी में समझाए गए गुण नहीं उतरे हैं । मैं गीता जी की एक अध्येता भर हूँ, और साधारण परिस्थितियों वाली उतनी ही साधारण मनुष्य हूँ जितने यहाँ के अधिकतर पाठक गण हैं (सब नहीं - कुछ बहुत ज्ञानी या आदर्श हो सकते हैं) । गीता जी में कही गयी बातों को पढने / समझने / और आपस में बांटने का प्रयास भर कर रही हूँ , किन्तु मैं स्वयं उन ऊंचे आदर्शों पर अपने निजी जीवन में खरी उतरने का कोई दावा नहीं कर रही । न ही मैं अपनी कही बातों के "सही" होने का कोई दावा कर रही हूँ। मैं पाखंडी नहीं हूँ, और भली तरह जानती हूँ कि मुझमे अपनी बहुत सी कमियां और कमजोरियां हैं । मैं कई ऐसे इश्वर में आस्था न रखने वाले व्यक्तियों को जानती हूँ , जो वेदों की ऋचाओं को भली प्रकार प्रस्तुत करते हैं । कृपया सिर्फ इस मिल बाँट कर इस अमृतमयी गीता के पठन करने के प्रयास के कारण मुझे विदुषी न समझें (न पाखंडी ही) | कृष्ण गीता में एक दूसरी जगह कहते हैं की चार प्रकार के लोग इस खोज में उतरते हैं, और उनमे से सर्वोच्च स्तर है "ज्ञानी" - और मैं उस श्रेणी में नहीं आती हूँ ।

शुक्रवार, 25 नवंबर 2011

श्रीमद्भगवद्गीता २.७

कार्पण्यदोषोपहत्स्वभावः
पृच्छामि त्वाम् धर्मसम्मूढचेताः |
यच्छ्श्रेयोस्यान्निश्चितम्ब्रूहितन्मे
शिष्यस्ते अहं शाधिमांत्वाम्प्रपन्नं |७|


अर्जुन आगे बोला

मैं मन की दुर्बलता से आहत हूँ और अपनी (धर्म अधर्म की ) समझ खो बैठा हूँ | आपसे पूछ रहा हूँ कि जो उचित हो वह निश्चित कर के पक्के तौर पर मुझे बताइये - क्योंकि मैं अब आपका शिष्य हूँ और आपकी शरण में हूँ (शरणागत हूँ )
----------------------------------------------------------------

जैसा कि हम जानते हैं, अर्जुन एक सुशिक्षित मनुष्य है, युद्ध कला में भी, और जीवन / धर्म / कर्तव्यपालन के विषय में भी | अभी तक कई बार वह अपने युद्ध कौशल की परीक्षा दे भी चुका है, और उत्तीर्ण भी कर चुका है | अनेकों युद्ध जीत चुका है | परन्तु यह कर्त्तव्य धर्म की परीक्षा है - जिसमे वह डांवा डोल हो रहा है | मन के भीतर तो अर्जुन भी जान रहा है कि उसका कर्त्तव्य क्या है | वह यह जानते बूझते भूल रहा है की यह युद्ध वह अपने निजी लाभ के लिए नहीं, युधिष्ठिर और स्वधर्म के लिए लड़ रहा है | एक योद्धा के रूप में और अपने राजा (युधिष्ठिर) के सेवक और अनुज के रूप में उसका धर्म है दुर्योधन की ओर से लड़ने वाले हर योद्धा से लड़ना - कि वे सब धर्म के विरोध में खड़े हैं |

परन्तु वह उस और खड़े लोगों से प्रेम करता है | यह प्रेम "मोह" बन कर उसे अपने कर्त्तव्य पथ पर चलने से रोक रहा है | वह खुल कर स्वीकार भी नहीं कर रहा कि मैं अपने कर्त्तव्य से भाग रहा हूँ क्योंकि मैं अपने प्रियजनों को खोना नहीं चाहता | तो वह धर्मं और प्रेम की गोल मोल बातों में अपनी इस मोह जनित अन्धता को छुपाने की कोशिश कर रहा है |

वह यह सच्चाई भी नहीं कहता कि "मैं अपने निजी प्रेम संबंधों के लिए अपने कर्त्तव्य की बलि देना चाहता हूँ " |

नहीं

वह यह गोल मोल ( झूठ )कहता है कि "मैं बड़ा महान त्यागी हूँ | तो मैं "गुरुजनों" के रक्त से सने राज सुख त्याग कर , युद्ध से मिलने वाले लाभ को त्याग कर, भीख मांग कर अपने जीवन को काटने का महान त्याग करने वाला हूँ |"

वह अपनी कर्त्तव्य पलायन की प्रवृत्ति को त्याग का जामा पहना रहा है | वह भी वह कृष्ण का approval लेकर करना चाहता है - कि तुम बताओ मैं क्या करूँ | लेकिन वह असलियत में उनकी बात सुनना ही नहीं चाहता - वह सिर्फ "ठप्पा लगवाना " चाह रहा है - अपने निश्चय पर कृष्ण की हाँ का ठप्पा !!! यदि वह सच ही पूछ रहा होता - तो २.२ और २.३ श्लोक में अभी ही कृष्ण कह चुके हैं कि - "इस विषम समय में यह गन्दगी तुम्हारे मन में कैसे आ गयी है ? यह आर्य जनो को शोभा नहीं देता | इस नपुंसकता को त्यागो और युद्ध करने उठ खड़े होओ !!" तो, तो यदि सच में पूछ रहा होता - तो पूछने की आवश्यकता बची ही नहीं है - कृष्ण अपना निर्णय अभी 4 श्लोक पहले ही कह चुके हैं | पर वह नहीं पूछ रहा - वह कृष्ण को समझा रहा है कि मैं सही हूँ - और पूछ सिर्फ यह रहा है कि तुम मेरे निर्णय पर अपनी सहमति की मोहर क्यों नहीं लगा रहे हो ?

जब हम जानते हैं कि यह सही है और यह गलत - तब हमें उस जानकारी के आधार पर अपना कर्त्तव्य निश्चित करना होता है | हमारे सही गलत की परिभाषा गलत हो सकती है | अर्थात - जब अर्जुन अपनी समझ में यह जानता है कि युधिष्ठिर सही हैं और दुर्योधन गलत - फिर उसका यह विश्वास हमारी और आपकी समझ से सही या गलत हो, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता - उसके मन के विश्वास ने उस के निज कर्त्तव्य को तो निर्धारित कर ही दिया है | जब उसके मन में विश्वास है कि युधिष्ठिर धर्म पथ पर हैं, तो फिर एक योद्धा के रूप में उसका कर्त्तव्य बन जाता है कि वह उनके विरुद्ध सेना में खड़े हर योद्धा से युद्ध करे - फिर चाहे वे लोग उसके अपने परिवारजन ही क्यों न हों !!! उसके युद्ध कौशल के सम्बल पर सेना आज युद्ध भूमि में है | इस वक़्त पलायन करना अधर्म होगा - क्योंकि वह इस सेना का एक प्रमुख सेनापति है - उसके जाने का असर यह भी हो सकता है कि धर्म की सेना हार जाए और अधर्म की सेना जीत जाए | युद्ध टालने का समय पीछे छूट चुका है |

इसी तर्ज पर - विभीषण ने रावण को तब त्यागा जब युद्ध का निर्णय अभी नहीं हुआ था | तो यह अधर्म नहीं, धर्म था | और युयुत्सु ने दुर्योधन को तब धोखा दिया, जब युद्ध में सेनायें आमने सामने थीं | यही निर्णय युयुत्सु पहले लेता - तो धर्म होता; किन्तु अब लेने से यह अधर्म है | कर्ण भी युद्ध के समय तक जान चुका था - कि मैं जिनसे लडूंगा वे मेरे भाई भी हैं और धर्म पथ पर भी हैं | किन्तु उसने दुर्योधन का साथ दिया क्योंकि उसकी अपनी समझ में यही उसका कर्त्तव्य था | तो कर्ण भी धर्म पथ पर है | यह कह कर मैं यह कहने की कोशिश कर रही हूँ की सिर्फ वे ही लोग धर्म पथ पर हों जो युधिष्ठिर के साथ हैं - ऐसा नहीं है | किसी के लिए धर्म है दुर्योधन का साथ देना भी !!!

अर्जुन यह भी नहीं जानता की हम जीतेंगे या हारेंगे, मैं इन लोगों को मारूंगा या वे मुझे , (हाँ उसे अपने युद्ध कौशल पर भरोसा है की मैं इन सब को हरा सकता हूँ ) फिर भी, प्रियजनों को मारने की संभावना भी उसे परेशान कर रही है |

वह दो श्लोक बाद ही "मैं नहीं लडूंगा हे कृष्ण" कह कर बैठ जाएगा - इसका अर्थ है की यह "मैं आपसे पूछ रहा हूँ" सिर्फ एक झूठ है - ऐसा झूठ जो वह कृष्ण से नही बल्कि खुद अपने आप से कह रहा है |

लेकिन - यह भी ध्यान देने की बात है की - श्री कृष्ण बार बार अर्जुन को यह तो बताते हैं की "यह सही राह होगी और यह गलत राह होगी" , किन्तु , वे कभी यह नहीं कहते की "यह करो और यह न करो" | सिर्फ इतना ही कहते हैं कि "यह करना उचित होगा और यह अनुचित होगा"| यह दर्शाता है कि ईश्वर हमारे भीतर से यह हमेशा बताते हैं कि क्या सही और क्या गलत होगा - पर हम पर कभी कोई जबरदस्ती नहीं होती |

गीतोपदेश के दौरान कृष्ण कई बार कहते हैं कि कर्म का अपना होना ही पाप पुण्य को निश्चित नहीं करता है | यह निश्चित इस बात से होता है कि उस कर्म के पीछे उद्देश्य क्या है |

जैसे दान देना मैं इसलिए कर सकती हूँ कि-

१) देखने वाले लोग मुझे "महान" समझें - तो उस कर्म का फल वहीँ मिल गया - न पाप है, न पुण्य |

२) इस जग में दान किया तो स्वर्ग मिलेगा - तो पुण्य है - यह मुझे बांधेगा (कुछ समय के लिए स्वर्ग में )

३) इस व्यक्ति को ज़रुरत है - मेरे पास है तो मेरा कर्त्तव्य है कि मैं इसकी सहायता करूं - तब यह निष्काम कर्म है |

और एक उदाहरण
एक व्यक्ति किसी को मार दे (kill )
१) क्योंकि वह राष्ट्र की सेना में है और दूसरा विरोधी सेना में - न पाप, न पुण्य | सिर्फ कर्त्तव्य (धर्म)|

२) क्योंकि वह इसकी कोई चीज़ हथियाना चाहता है - पाप |

तो -कर्म का अपना होना ही पाप पुण्य को निश्चित नहीं करता है | यह निश्चित इस बात से होता है की उस कर्म के पीछे उद्देश्य क्या है |

इस गीता आलेख के बाकी भागों (इससे पहले और बाद के) के लिए ऊपर गीता tab पर क्लिक करें

जारी
----------------------------------------
disclaimer:

कई दिनों से इच्छा थी, कि भगवद गीता की अपनी समझ पर लिखूं - पर डर सा लगता है - शुरू करते हुए भी - कि कहाँ मैं और कहाँ गीता पर कुछ लिखने की काबिलियत ?| लेकिन दोस्तों - आज से इस लेबल पर शुरुआत कर रही हूँ - यदि आपके विश्लेषण के हिसाब से यह मेल ना खाता हो - तो you are welcome to comment - फिर डिस्कशन करेंगे .... यह जो भी लिख रही हूँ इस श्रंखला में, यह मेरा interpretation है, मैं इसके सही ही होने का कोई दावा नहीं कर रही
----------------------------------------------
मेरे निजी जीवन में गीता जी में समझाए गए गुण नहीं उतरे हैं । मैं गीता जी की एक अध्येता भर हूँ, और साधारण परिस्थितियों वाली उतनी ही साधारण मनुष्य हूँ जितने यहाँ के अधिकतर पाठक गण हैं (सब नहीं - कुछ बहुत ज्ञानी या आदर्श हो सकते हैं) । गीता जी में कही गयी बातों को पढने / समझने / और आपस में बांटने का प्रयास भर कर रही हूँ , किन्तु मैं स्वयं उन ऊंचे आदर्शों पर अपने निजी जीवन में खरी उतरने का कोई दावा नहीं कर रही । न ही मैं अपनी कही बातों के "सही" होने का कोई दावा कर रही हूँ। मैं पाखंडी नहीं हूँ, और भली तरह जानती हूँ कि मुझमे अपनी बहुत सी कमियां और कमजोरियां हैं । मैं कई ऐसे इश्वर में आस्था न रखने वाले व्यक्तियों को जानती हूँ , जो वेदों की ऋचाओं को भली प्रकार प्रस्तुत करते हैं । कृपया सिर्फ इस मिल बाँट कर इस अमृतमयी गीता के पठन करने के प्रयास के कारण मुझे विदुषी न समझें (न पाखंडी ही) | कृष्ण गीता में एक दूसरी जगह कहते हैं की चार प्रकार के लोग इस खोज में उतरते हैं, और उनमे से सर्वोच्च स्तर है "ज्ञानी" - और मैं उस श्रेणी में नहीं आती हूँ ।

श्रीमद्भगवद्गीता २.६


न चैतद्विद्मः कतरन्नो गरीयो-
यद्वा जयेमः यदि वा नो जयेयुः |
यानेव हत्वा न जिजीविषाम -
स्ते अवस्थिताः प्रमुखे धार्तराष्ट्राः |६|
-------------------

अर्जुन ने आगे कहा - हम ये भी नहीं जानते कि क्या बेहतर है (क्या होगा नहीं , बल्कि क्या बेहतर है ) यह कि हम उन पर विजय पाएं, या फिर ये कि हम उनसे हार जाएँ | ये प्रियजन जिन्हें हम मारना नहीं चाहते - जिनकी हत्या कर के जीने की इच्छा ही ना बचेगी - वे ही ध्रुतराष्ट्र के पुत्र आज युद्ध में हमारे सम्मुख उपस्थित हैं |
------------------------------------------------------------

अर्जुन की समस्या है उसका अपने परिवार के प्रति मोह | कृपया याद करें, पांडव (युधिष्ठिर नहीं - बाकी चारों भाई ) दुर्योधन और दुःशासन से बहुत क्रोधित हैं | इन दोनों ने हमेशा पांडवों के साथ छल किया | परन्तु बाकी के कौरव भाइयों से अर्जुन की कोई शत्रुता नहीं है | आखिर ये सब चचेरे भाई हैं, एक ही साथ खेलते कूदते बड़े हुए हैं, एक ही गुरुकुल में पढ़े | कई बहुत ही निकट के सम्बन्ध भी रहे होंगे भाइयों के आपस में | किन्तु जब स्थिति युद्ध की आ पहुंचे, तो स्वाभाविक तौर पर अधिकतर कौरव भाई दुर्योधन की ओर खड़े हैं | यदि दुर्योधन तक पहुंचना हो (युद्ध के सही समापन के लिए यह ज़रूरी है अर्जुन की नज़र में ) - तो इन सारे भाइयों को मारना ही होगा |

असलियत में , अधिकतर भाइयों की मृत्यु भीम के माध्यम के द्वारा आयी , अर्जुन को ज्यादा प्रिय जनों को मारना नहीं पडा | ........उसने भीष्म पर बाण अवश्य चलाये , किन्तु उनकी मृत्यु इच्छा मृत्यु थी, ........सभी कौरव भाइयों को भीम ने मारा - सभी को , ........गुरु द्रोण को धृष्टद्युम्न ने मारा | हाँ , कर्ण को अवश्य अर्जुन ने मारा, परन्तु तब वह नहीं जानता था कि कर्ण उसका बड़ा भाई है |

और भीम कभी अपना धर्म निभाने में विचलित नहीं हुए, न ९८ कौरवों (जिनसे कोई शत्रुता न थी) को मारने में, न गुरु से झूठ बोलने में | क्योंकि भीम जानते थे कि वे अपने लिए नहीं - धर्म के लिए यह सब कर रहे हैं | तो वे विचलित नहीं होते थे | सिर्फ दुर्योधन और दुःशासन को मारने में भीम का निज "मैं" शामिल था, और वही उनका फल युक्त कर्म था इस पूरे युद्ध में | बाकी भाइयों से लड़ने से पहले भीम उन्हें चेताते भी थे कि "हे भाई, तुमसे मेरी कोई शत्रुता नहीं , पर दुर्योधन तक पहुँचने के लिए तुमसे लड़ना पड़ेगा ही | यदि तुम मुझे न रोको , तो मैं तुमसे न लडूं |" परन्तु वे अपने धर्म पर थे, और दुर्योधन को बचाने के लिए उन्होंने अपने प्राणों की आहुति दी |

एक और बात - अर्जुन यह नहीं कह रहा कि "अपने भाइयों" को कैसे मारूं | वह कह रहा है कि "ध्रुतराष्ट्र के पुत्रों" को कैसे मारूं, क्या मारना उचित है ? यह अर्जुन की मनः स्थिति दर्शाता है | यदि अब भी ध्रुतराष्ट्र समझ गया होता (यह सब कुछ संजय ध्रुतराष्ट्र को ही सुना रहे हैं ) तो यह युद्ध यहाँ तक आ कर भी रोका जा सकता था | क्योंकि यह जो सेना युद्ध में उतारी है - यह दुर्योधन की नहीं, ध्रुतराष्ट्र की सेना है |

इस गीता आलेख के बाकी भागों (इससे पहले और बाद के) के लिए ऊपर गीता tab पर क्लिक करें

जारी
---------------------------------------
disclaimer:

कई दिनों से इच्छा थी, कि भगवद गीता की अपनी समझ पर लिखूं - पर डर सा लगता है - शुरू करते हुए भी - कि कहाँ मैं और कहाँ गीता पर कुछ लिखने की काबिलियत ?| लेकिन दोस्तों - आज से इस लेबल पर शुरुआत कर रही हूँ - यदि आपके विश्लेषण के हिसाब से यह मेल ना खाता हो - तो you are welcome to comment - फिर डिस्कशन करेंगे .... यह जो भी लिख रही हूँ इस श्रंखला में, यह मेरा interpretation है, मैं इसके सही ही होने का कोई दावा नहीं कर रही
-----------------------------------------------
मेरे निजी जीवन में गीता जी में समझाए गए गुण नहीं उतरे हैं । मैं गीता जी की एक अध्येता भर हूँ, और साधारण परिस्थितियों वाली उतनी ही साधारण मनुष्य हूँ जितने यहाँ के अधिकतर पाठक गण हैं (सब नहीं - कुछ बहुत ज्ञानी या आदर्श हो सकते हैं) । गीता जी में कही गयी बातों को पढने / समझने / और आपस में बांटने का प्रयास भर कर रही हूँ , किन्तु मैं स्वयं उन ऊंचे आदर्शों पर अपने निजी जीवन में खरी उतरने का कोई दावा नहीं कर रही । न ही मैं अपनी कही बातों के "सही" होने का कोई दावा कर रही हूँ। मैं पाखंडी नहीं हूँ, और भली तरह जानती हूँ कि मुझमे अपनी बहुत सी कमियां और कमजोरियां हैं । मैं कई ऐसे इश्वर में आस्था न रखने वाले व्यक्तियों को जानती हूँ , जो वेदों की ऋचाओं को भली प्रकार प्रस्तुत करते हैं । कृपया सिर्फ इस मिल बाँट कर इस अमृतमयी गीता के पठन करने के प्रयास के कारण मुझे विदुषी न समझें (न पाखंडी ही) | कृष्ण गीता में एक दूसरी जगह कहते हैं की चार प्रकार के लोग इस खोज में उतरते हैं, और उनमे से सर्वोच्च स्तर है "ज्ञानी" - और मैं उस श्रेणी में नहीं आती हूँ ।

श्रीमद्भगवद्गीता २.५


गुरूनहत्वा हि महानुभावान्
श्रेयो भोक्तुं भैक्ष्यमपीह लोके |
हत्वार्थ कामान्स्तु गुरूनिहैव
भुञ्जीय भोगान् रुधिरप्रदिग्धान |५|

अर्जुन बोला : बड़ों को न मार कर (अच्छे लोगो के लिए) बेहतर है कि भीख मांग कर जियें, रहे | धन / किसी भी सांसारिक लाभ की प्राप्ति के लिए इन गुरुजनों को यदि हम मारते हैं, तो जो भी फल हम प्राप्त करेंगे, उसे भोगना ऐसा होगा जैसे हम उनके रक्त से सने फल भोग रहे हों |

------------------------------
गीता के कुछ संस्करणों में इसका शब्दार्थ मैंने यह भी पढ़ा है की "यद्यपि वे अर्थ और काम के लोभ में हैं, किन्तु हैं तो वे गुरुजन ही" ....

परन्तु मेरे हिसाब से यह गलत अर्थ है | यह इसलिए कि - यहाँ बोलने वाला वह लेखक नहीं है जो गीता पर अपना भावार्थ रख रहा है, कि वह कहा जाए जो लेखक को ठीक लगे | यहाँ वक्ता मूल रूप से अर्जुन है, जो पिछले श्लोक के विस्तार में ही यहाँ गुरु द्रोण और पितामह भीष्म की बात कर रहा है | वह इन दोनों के विषय में ऐसा कहना तो बहुत दूर की बात है , वह इनके लिए ऐसा सोच भी नहीं रहा है | इनके अलावा वह सोच रहा है कृपाचार्य के विषय में, जो कुलगुरु हैं | जहाँ द्रोण शस्त्र गुरु थे, वहीँ कृपाचार्य नीति गुरु | और अर्जुन उनमे नहीं है जो अपने गुरुओं को उनकी गलतियों की तुला पर तोले | एक और (अर्जुन के लिए) गुरुजन (अर्थात बड़े, शिक्षक नहीं) उस ओर हैं मद्र नरेश, अर्जुन की छोटी माँ मादरी के भाई | ये पहले निकले तो थे युधिष्ठिर की ओर से लड़ने, परन्तु छल से शकुनी ने उन्हें दुर्योधन की ओर आने को मजबूर कर दिया | तो अर्जुन की दृष्टी में कोई भी "गुरु" (बड़े) जन ऐसे नहीं हैं जो अर्थ और काम के लिए उस ओर खड़े हों |

अब देखिये ...

यहाँ अब अर्जुन एक महान वैराग्य प्राप्त सन्यासी की तरह कह रहा है कि मैं अपने बड़ों के विरुद्ध रक्त पात करने की अपेक्षा यह समझता हूँ कि भीख माग कर खाऊँ तो बेहतर है | याद रखिये- यह वही अर्जुन है जो महीने भर पहले तक युद्ध के लिए व्याकुल था, अपने बड़े भाई युधिष्ठिर पर दबाव डाल रहा था | और तब भी इतना तो वह जानता था ही कि उसे किनके विरुद्ध खडा होना है - क्योंकि यह बात तो द्रोण और भीष्म दोनों ही उसे द्रौपदी चीरहरण के अगले रोज़ ही साफ़ बता चुके थे | वह तो तब ही दुर्योधन से युद्ध को उद्यत हो उठा था , परन्तु रोक दिया गया था |

परन्तु श्री कृष्ण जानते थे कि यह अर्जुन का क्षणिक मोह है - वे सही और गलत को सही रूप में देखते समझते थे, और रिश्तों से ऊपर भी धर्म को निभाना कितना ज़रूरी है, यह भी जानते थे | तो वे अपने परम भक्त को कैसे ऐसी गलती करने देते ? पल भर को मान ले, यदि उस क्षणिक अंधेपन में अर्जुन युद्ध से हट जाता - तो क्या वह होश आने के बाद अपने आप को माफ़ कर पाता ? दूसरों की नज़र में नीचा होना तो झेला जा सकता है, परन्तु स्वयं अपनी नज़र में गिर कर अर्जुन शान्ति पा सकता था? यदि मेरी आँख में कुछ पड़ जाए और मुझे न दिखे कि मेरे अगले कदम पर खाई है, मैं कदम बढ़ाना चाहूँ और मेरे साथ मेरा परम सखा हो - तो क्या वह मुझे खाई में गिर जाने देगा, या रोकेगा ? इसी तरह श्री कृष्ण ने अर्जुन को क्षणिक अन्धता के वश हो कर कर्त्तव्य विमुखता की खाई में गिरने से रोका, बचाया |

अगले श्लोक को लेकर फिर मिलते हैं ...

इस गीता आलेख के बाकी भागों (इससे पहले और बाद के) के लिए ऊपर गीता tab पर क्लिक करें

जारी
----------------------------------------

disclaimer:

कई दिनों से इच्छा थी, कि भगवद गीता की अपनी समझ पर लिखूं - पर डर सा लगता है - शुरू करते हुए भी - कि कहाँ मैं और कहाँ गीता पर कुछ लिखने की काबिलियत ?| लेकिन दोस्तों - आज से इस लेबल पर शुरुआत कर रही हूँ - यदि आपके विश्लेषण के हिसाब से यह मेल ना खाता हो - तो you are welcome to comment - फिर डिस्कशन करेंगे .... यह जो भी लिख रही हूँ इस श्रंखला में, यह मेरा interpretation है, मैं इसके सही ही होने का कोई दावा नहीं कर रही
----------------------------------------------

मेरे निजी जीवन में गीता जी में समझाए गए गुण नहीं उतरे हैं । मैं गीता जी की एक अध्येता भर हूँ, और साधारण परिस्थितियों वाली उतनी ही साधारण मनुष्य हूँ जितने यहाँ के अधिकतर पाठक गण हैं (सब नहीं - कुछ बहुत ज्ञानी या आदर्श हो सकते हैं) । गीता जी में कही गयी बातों को पढने / समझने / और आपस में बांटने का प्रयास भर कर रही हूँ , किन्तु मैं स्वयं उन ऊंचे आदर्शों पर अपने निजी जीवन में खरी उतरने का कोई दावा नहीं कर रही । न ही मैं अपनी कही बातों के "सही" होने का कोई दावा कर रही हूँ। मैं पाखंडी नहीं हूँ, और भली तरह जानती हूँ कि मुझमे अपनी बहुत सी कमियां और कमजोरियां हैं । मैं कई ऐसे इश्वर में आस्था न रखने वाले व्यक्तियों को जानती हूँ , जो वेदों की ऋचाओं को भली प्रकार प्रस्तुत करते हैं । कृपया सिर्फ इस मिल बाँट कर इस अमृतमयी गीता के पठन करने के प्रयास के कारण मुझे विदुषी न समझें (न पाखंडी ही) | कृष्ण गीता में एक दूसरी जगह कहते हैं की चार प्रकार के लोग इस खोज में उतरते हैं, और उनमे से सर्वोच्च स्तर है "ज्ञानी" - और मैं उस श्रेणी में नहीं आती हूँ ।

श्रीमद्भगवद्गीता २.४

अर्जुन उवाच

कथं भीष्ममहं संख्ये द्रोणं च मधुसूदन |
इषुभिः प्रतियोत्स्यामि पूजार्हावरिसूदन |४|

अर्जुन ने कहा - हे मधुसूदन मैं कैसे भीष्म और द्रोण की तरफ (प्रत्युत्तर में भी ) तीर कैसे चलाऊँगा , (क्योंकि), हे अरिसूदन, वे दोनों पूजनीय हैं |

अब हम अर्जुन के दर्द के मर्म को पहुँच रहे हैं | सारे पांडव भाइयों में शायद अर्जुन सबसे अधिक भावुक है | उसे अपने पितामह और गुरु दोनों से अत्यधिक प्रेम है - जो यहाँ आसक्ति बन कर प्रकट हो रहा है | इतना - की युद्ध में बाद में जब धृष्टद्युम्न ने गुरु द्रोण को मारा, तो अर्जुन उसे मार देने के लिए दौड़ा | और यह भी कि जबकि अर्जुन ने खुद अपने ही हाथों से भीष्म को घायल कर के गिराया, किन्तु इस क्रूर कर्त्तव्य को निभाने में वह बहुत दुखी हुआ था | किन्तु धर्म की जय के लिए यह करना ज़रूरी था, तो उसने यह किया | अपने निजी लाभ के लिए नहीं - अपने धर्मं (कर्त्तव्य)के लिए | अर्जुन ने जो भी किया इस युद्ध में, अपना कर्त्तव्य मान कर किया, कुछ पाने के लिए नहीं |

{
युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन और दोनों माद्री पुत्र अलग अलग तरह की प्रवृत्तियों को दर्शाते हैं |

(१) युधिष्ठिर - ये धर्मराज के पुत्र कहे गए हैं, स्वयं भी धर्मराज हैं | ये ज्ञानी हैं, और इन्हें अपनी शिक्षा और अर्जित ज्ञान पर पूर्ण भरोसा है | यह "ज्ञान मार्ग" के यात्री हैं | इनका विश्वास है कि ये जानते हैं और समझते हैं वह समस्त बातें जो इन्हें अपने पथ का ज्ञान कराती हैं | ये अपने ज्ञान से -सोच समझ कर - निर्णय लेते हैं - फिर उस निर्णय पर चलते हैं | अपने निर्णय की पूरी ज़िम्मेदारी को ये स्वयं उठाते हैं - चाहे वह सही हो या कोई गलती हो | यह अपनी गलती को पीठ नहीं दिखाते - अपने ज्ञान से जो "पश्चाताप" इन्हें जिस गलती का करना चाहिए - ये करते हैं | जैसे द्यूत के बाद जो हुआ - उसके उत्तरदायित्व से यह भागे नहीं, इन्होने "पश्चाताप " किया - और १३ वर्ष के वनवास को "सज़ा" के रूप में स्वीकारा | यह बात और है कि वह सज़ा इनके साथ इनके भाइयों और पत्नी को भी सहनी पड़ी, किन्तु उन्होंने इन लोगों को बाध्य नहीं किया कि तुम भी मेरे साथ भुगतो सज़ा | वे लोग ही इनसे इतना प्रेम करते थे कि उन्होंने इनके साथ को चुना | पर यह उनके भी "किसी पुराने कर्म का फल है " यह मान कर युधिष्ठिर कभी उद्विग्न नहीं हुए |

(2) भीम : - भीम पवन पुत्र कहे गए हैं | पवन देवता के बारे में माना जाता है की प्रलय के बाद जब सब कुछ ब्रह्मा में लीन भी हो जाता है, तब भी पवन देव शांत नहीं होते (तीन तरह की प्रलय बताई गयी हैं - हर मन्वंतर पर, ब्रह्मा के हर दिन की समाप्ति पर और ब्रह्मा के जीवन काल के शांत होने पर - ब्रह्मा के शांत होने वाली महाप्रलय तक पवनदेव शांत नहीं होते - यह कहा गया है )| तो पवन देव का "ज्ञान" कभी नहीं खोता, और यह गुण भीम में है | किन्तु - पवन देव कभी अपने आप को ज्ञानी नहीं दिखाते, न भीम दिखाते हैं, न हनुमान ही ऐसा दिखाते हैं | परन्तु यह तीनो ही रूप शक्ति और ज्ञान के अनंत रूप हैं |

तो भीम ज्ञानी तो हैं - लेकिन ऊपरी , दिखावटी ज्ञान नहीं जो अपने श्रेष्ठ का आदर भूल जाएँ | उन्हें यह भी ज्ञान है कि कृष्ण कौन हैं, वे स्वयं के ज्ञान को सर्वोपरि नहीं मानते | वे जानते तो हैं कि उन्हें क्या करना है, परन्तु यदि श्री कृष्ण या युधिष्ठिर मौजूद हों, तो वे उनके कहे अनुसार चलते हैं | यदि नहीं - तो वे वह करते हैं जो उनका ज्ञान उन्हें करने को कहे | जैसे - जब कृष्ण ने कहा कि द्रोण से कहना है की "अश्वत्थामा मारा गया " तो भीम ने अपनी बुद्धि को कृष्ण से श्रेष्ठ न जाना- उन्होंने आज्ञा का पालन किया | यही देखने में आया - जरासंध वध के समय, और दुर्योधन की जंघा तोड़ते समय भी | भीम ने कोई सवाल नहीं किया - गदायुद्ध में जांघ पर कैसे मारूं? गुरु से झूठ कैसे कहूं ? लेकिन युधिष्ठिर ऐसा नहीं करते यदि भीम की जगह होते - वह वैसा करते जैसा उनका ज्ञान उन्हें कहता|

(३) अर्जुन - ज्ञान है - पर मोह भी | नर नारायण में अर्जुन नर को दर्शाता है | वह मोहित भी होता है, भ्रमित भी होता है , | अपनी बुद्धि भी लगाता है - अपने विवेक से सोच कर कृष्ण की बात पर सवाल भी करता है | कृष्ण के कह भर देने से जैसे भीम मान जाते हैं - अर्जुन नहीं मानता - उसे यह विश्वास दिलाना होता है की यह क्यों करना है - तब वह करता है - नहीं तो नहीं करता (भीम के साथ ऐसा नहीं है) | कई उदाहरण हैं जब उसने नहीं भी मानी कृष्ण की बात क्योंकि उसे ठीक नहीं लगी | पर यदि कृष्ण उसे समझा पाएं तो वह सुनने और मानने को तैयार है (युधिष्ठिर को समझाया नहीं जा सकता - वे वही करेंगे जो वे सही जानते हैं - नहीं - तो नहीं करेंगे ) |
यह "आधुनिक धार्मिकता " जैसा ही है कुछ कुछ | आज कई लोग हैं, जो धर्म के उतने स्वरुप को मानने के लिए तैयार हैं - जो "साइन्टीफिकली " उन्हें समझाया जा सके की यह क्यों होना चाहिए | गीता में आगे श्री कृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि "मैंने यह ज्ञान बहुत पहले सूर्य को दिया, उसने मनु को और मनु ने इक्ष्वाकु को ( जो श्री रामचंद्र वाले सूर्यकुल में हुए ) -- किन्तु समय के साथ यह ज्ञान लुप्त हो गया - आज मैं तुझे फिर से बता रहा हूँ" - उसे फिर से बताने की ज़रुरत इसलिए पड़ी की सुनते सुनते कई बातें गम हो जाती हैं - तो अब जो ज्ञान है, उसका विज्ञान (साइन्स ) खो गया है | कृष्ण यह भी कहते हैं अर्जुन से "मैं तुझे यह गूढ़ और गुप्त ज्ञान तुझे विज्ञान सहित समझा रहा हूँ, क्योंकि तू द्वेष रहित स्वीकारने और समझने के लिए खुला हुआ है |यह ज्ञान समझने के बाद तेरी सब शंका और दुःख दूर हो जायेंगे |"

इन तीनों को ऐसे समझें की - जब अर्जुन कृष्ण के कहने से कुछ करता है - तो फिर बाद में उसका भार अपने ऊपर नहीं रखता - यह ऐसा है कि जैसे वह रेलगाड़ी में बैठने से पहले यह चेक तो करता है की यह गाडी सही है भी या नहीं ; पर गाड़ी में बैठे के बाद कहता है की रेलगाड़ी मुझे और सामान दोनों को ही उठाये चल रही है - तो मुझे अपने सामान को सर पर उठाने की आवश्यकता नहीं है | भीम आंख बंद कर के उस रेल में चढ़ जाते हैं जो कृष्ण दिखाएं, और सामान तो वे साथ लेकर ही नहीं चलते !! और युधिष्ठिर - वे गाडी चुनते भी खुद हैं और सामान को सर पर भी रखे रहते हैं | वे अपने सामान का भार स्वयं उठाये रहते हैं | अपने कर्मों (शुभ और अशुभ दोनों कर्मों ) से सबसे अधिक युधिष्ठिर ही जुड़े हैं | अर्जुन ( कृष्ण के निर्देश में किये कर्मों से )कुछ कम जुड़ा है , और भीम ( कृष्ण के निर्देश में किये कर्मों से ) बिलकुल नहीं | हाँ जब भीम स्वयं निर्णय लेते हैं (जब कृष्ण और युधिष्ठिर दोनों न हों) - तब वे अपने कर्म का पूरा दायित्व लेते हैं |

(४) माद्री के दोनों पुत्र जैसा बड़े कहें, वैसा करते हैं | ये साधारण मानव को दर्शाते हैं | किन्तु अधिकतर "करना" ज्ञान / विज्ञान / सोच (यह तीनो शब्द पर्यायवाची नहीं हैं) के साथ नहीं - जैसे कि आज बड़े कहते हैं कि रोज़ दो अगरबत्ती जलानी है - इसलिए जला तो दी - पर क्यों, सोचे बिना | इसमें अपने किये कर्म से बंधन अधिक है क्योंकि हर कर्म के और उसके फल के मोह्बंधन बंधते जाते हैं |

}

युधिष्ठिर धर्मराज थे, और आखरी पल तक भी (जबकि उनके भाई, पत्नी द्रौपदी और सारे शुभचिंतक उन पर युद्ध का दबाव दाल रहे थे) उन्होंने और श्री कृष्ण ने युद्ध रोकने की पूरी कोशिश की | वे जानते थे की एक राजा के रूप में मेरा कर्त्तव्य है अपने नागरिकों को रक्तपात से बचाना | तो सब तरफ से दबाव के होते हुए भी उन्होंने हर संभव प्रयास किया युद्ध न होने देने के लिए | उन्होंने अपनी एक भूल - जो उन्होंने द्यूत क्रीडा में की थी - के लिए पश्चाताप के रूप में १३ वर्ष का वनवास पूरी इमानदारी से निभाया | यदि युधिष्ठिर और कृष्ण धर्म पर और युद्ध रोकने पर इतने अटल न होते - तो यह युद्ध बहुत पहले हो गया होता | दुर्भाग्य से इन दोनों के अनेक प्रयासों से भी युद्ध टाला नहीं जा सका |

एक और गौर करने लायक बात यह है कि - जो अर्जुन अचानक अपने प्रियजनों को मृत्यु के सामने खड़ा देख कर "अहिंसावादी " हो गया है अचानक, युद्ध की मांग करने में वही सबसे ज्यादा मुखर था भीम के साथ !! युद्ध के शुरू होने से कुछ ही दिन पहले तक यही हाल था | और जो कृष्ण अर्जुन को अब यहाँ युद्ध करने के लिए समझा रहे हैं, सिर्फ वे अकेले ही युधिष्ठिर के साथ थे इस तबाही को रोकने के लिए |

उदहारण के लिए सोचिये - एक पिता पुत्र हैं | पिता जानते हैं की मेरे बेटे का कौशल अर्थशास्त्र में है | तो वह चाहता है की बारहवी के बाद बेटा अर्थशास्त्र पढ़े , किन्तु पुत्र देख रहा है कि सब कह रहे हैं डॉक्टर बनना चाहिए | पिता यह ठीक नहीं समझता, और बच्चे को समझाता है - पर वह नहीं मानता और मेडिकल में एडमिशन ले लेता है | अब फाइनल इयर की परीक्षा के समय बेटा नर्वस हो कर कहे की मैं यह छोड़ दूं और अर्थशास्त्र पढूं, तो पिता उसे कहेंगे की नहीं - अभी तेरा कर्त्तव्य है कि मन लगा कर पढ़ - जैसा भी तुझसे बने | तू मेहनत (कर्म) कर और पढ़ , ज्ञान सीख और परीक्षा लिख | परीक्षा का परिणाम भले ही कुछ भी निकले, कोई बात नहीं - अभी तू पढ़ - फिर चाहे तुझे १००% अंक मिले या की ० अंक मिले - कोई बात नहीं | तू अपनी पढाई कर | परिणाम तेरे हाथ में नहीं है | उसकी फ़िक्र न कर |

इस गीता आलेख के बाकी भागों (इससे पहले और बाद के) के लिए ऊपर गीता tab पर क्लिक करें

जारी
----------------------------------------

disclaimer:

कई दिनों से इच्छा थी, कि भगवद गीता की अपनी समझ पर लिखूं - पर डर सा लगता है - शुरू करते हुए भी - कि कहाँ मैं और कहाँ गीता पर कुछ लिखने की काबिलियत ?| लेकिन दोस्तों - आज से इस लेबल पर शुरुआत कर रही हूँ - यदि आपके विश्लेषण के हिसाब से यह मेल ना खाता हो - तो you are welcome to comment - फिर डिस्कशन करेंगे .... यह जो भी लिख रही हूँ इस श्रंखला में, यह मेरा interpretation है, मैं इसके सही ही होने का कोई दावा नहीं कर रही
-----------------------------------------------
मेरे निजी जीवन में गीता जी में समझाए गए गुण नहीं उतरे हैं । मैं गीता जी की एक अध्येता भर हूँ, और साधारण परिस्थितियों वाली उतनी ही साधारण मनुष्य हूँ जितने यहाँ के अधिकतर पाठक गण हैं (सब नहीं - कुछ बहुत ज्ञानी या आदर्श हो सकते हैं) । गीता जी में कही गयी बातों को पढने / समझने / और आपस में बांटने का प्रयास भर कर रही हूँ , किन्तु मैं स्वयं उन ऊंचे आदर्शों पर अपने निजी जीवन में खरी उतरने का कोई दावा नहीं कर रही । न ही मैं अपनी कही बातों के "सही" होने का कोई दावा कर रही हूँ। मैं पाखंडी नहीं हूँ, और भली तरह जानती हूँ कि मुझमे अपनी बहुत सी कमियां और कमजोरियां हैं । मैं कई ऐसे इश्वर में आस्था न रखने वाले व्यक्तियों को जानती हूँ , जो वेदों की ऋचाओं को भली प्रकार प्रस्तुत करते हैं । कृपया सिर्फ इस मिल बाँट कर इस अमृतमयी गीता के पठन करने के प्रयास के कारण मुझे विदुषी न समझें (न पाखंडी ही) | कृष्ण गीता में एक दूसरी जगह कहते हैं की चार प्रकार के लोग इस खोज में उतरते हैं, और उनमे से सर्वोच्च स्तर है "ज्ञानी" - और मैं उस श्रेणी में नहीं आती हूँ ।