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शनिवार, 7 फ़रवरी 2026

ज़िंदगी अधूरी तेरे बिन - भाग उन्नीस (19)

 

ज़िंदगी अधूरी तेरे बिन - भाग उन्नीस (19)



भाग 19

प्रियंका




"मैं यहाँ मर रही हूँ, और तुम मुझसे लड़ना चाहती हो?" श्रेया ने मुस्कराते हुए कहा।

"मुझे विश्वास नहीं हो रहा है कि तुम अपने कैंसर का इस तरह से इस्तेमाल कर रही हो," मैं चिढ़ कर बोली।

"ऐ लड़की, अगर मैं अभी इसका इस्तेमाल नहीं कर सकती, तो इसका फायदा क्या? मैं मरने के बाद भी तो इसका इस्तेमाल नहीं कर पाऊँगी न!" श्रेया ने हँसते हुए कहा। वह चिमनी के पास पुदीने की चाय का प्याला लिए कुर्सी पर बैठी थी, खिड़की की तरफ मुँह करके अंधेरे में देख रही थी जहाँ लहरों का सफ़ेद झाग रात में घूमते बादलों की तरह लग रहा था।

"तुमने अंशुमन से मेरे पीछे से बात की," मैंने आरोप लगाया। उसने हाँ मेँ सिर हिलाया। "उसने मुझे फ़ोन किया था। विनती की कि मैं उसे अपनी गलती सुधारने का मौक़ा दूँ।"

मैंने भौंहें चढ़ाईं। "विनती? श्रेया, मजाक मत करो, वह विनती का मतलब भी नहीं जानता।" उसने नाक भौंह सिकोड़ी। "क्रूर हो रही हो तुम। मेरी बात सुनो, वह रो रहा था फोन पर। तुम चाहती क्या हो? जानती हो न, मैं मौत के करीब होने से नर्म-दिल हो गई हूँ।"

"हे भगवान, हम फिर से मौत की बात पर आ गए," मैं बुदबुदाई।

श्रेया ने चाय की चुस्की ली। "मैं चाहती थी कि दीपावली पर तुम्हारा परिवार तुम्हारे साथ रहे। सिर्फ़ नीलिमा ही नहीं; मैं चाहती थी कि शाश्वत और अंशुमन भी यहाँ हों। और मैं उनसे मिलना भी चाहती थी। जानती हो न... मरने से पहले।" मैंने आँखें घुमाईं, लेकिन वह सही थी; मैं उससे नाराज़ नहीं हो सकती थी। वह मर रही थी, और सच कहूँ तो, यह जानकर मेरा दिल थोड़ा हल्का हो गया कि मेरी शादी टूटने के बाद इस पहले साल, हम दीपावली पर साथ हैं। उन्हें यहाँ, सनशाइन होम्स में पाकर अच्छा लग रहा था। शुक्र है कि मैंने उस दिन शाश्वत और अंशुमन के लिए भी उपहार खरीद लिए थे।

जब अंशुमन ने लोगों को घर पर बुलाना शुरू किया था, तब मैंने केटरिंग की क्लास शुरू की थी, ताकि मैं सीख सकूँ कि एक अच्छी मेजबान कैसे बना जाता है। इसमें मैं अच्छी थी, और अब उसी के कारण मैं यहाँ मेहमानों के लिए मेजबान की भूमिका निभा रही थी जिसमें मैं खुश थी। खासकर इसलिए, क्योंकि अब मैं यहाँ थी और मैं रिज़ॉर्ट के रेस्तरां मेँ कॉकटेल और मार्टीनी के लिए अच्छी खासी फीस लेती थी। ड्रिंक लेने के लिए यहाँ बहुत ज़्यादा जगहें नहीं थीं, और श्रेया के पास शराब का लाइसेंस था। आय का यह नया स्रोत खोलकर हमें बड़ी खुशी हुई थी। श्रेया रोमांचित होने के साथ-साथ खुश भी थी। "बढ़िया खाना और शानदार पेय! ए लड़की, तुम मेरे रिज़ॉर्ट को प्रसिद्ध बना दोगी। मुझे पता है।" उसने चाय का प्याला साइड टेबल पर रख दिया "उसे फिर से देखना कैसा लगा?"

"मुझे बहुत ख़ुशी है कि शाश्वत—"

"मैं जानती हूँ कि बेटे को देखकर कैसा लगा होगा लड़की। मैं अंशुमन की बात कर रही हूँ।" मैं समझ गई थी कि वह किसके बारे में बात कर रही थी। मैंने घड़ी की ओर देखा और वह मुझ पर गुर्राई। "क्या?" मैंने मासूमियत से पूछा, "खाना एक घंटे में -- ।"

"प्रियंका?"

"हाँ-हाँ। यह अच्छा था, ठीक है। बहुत अच्छा। उसकी खुशबू अच्छी है।"

श्रेया हंस पड़ी, "क्या? उसकी खुशबू अच्छी है? "

मैं आह भर कर कुर्सी पर लेट गई। "उसकी खुशबू हमेशा बहुत अच्छी होती है। उसका इत्र” मैंने कश लेने का अभिनय किया, “दिव्य है।”

"सूँघना बंद करो," श्रेया ने हँसते हुए कहा। मैं संयत हो गई। "श्रेया, मुझे गुस्सा आ गया और मैंने कुछ ऐसा बोल दिया जो मैंने कभी किसी को नहीं बताया... सिवाय मेरे मनोचिकित्सक को।" मैंने चिमनी की तरफ देखा और अपने सीने में वही जानी-पहचानी जलन महसूस की, जब मुझे याद आया कि अंशुमन ने अपने भाई से क्या कहा था, जब उसे नहीं पता था कि मैं सुन रही हूँ। "यह कुछ साल पहले की बात है। यह रक्षित का जन्मदिन था। वह और अंशुमन, रक्षित और देविका के बगीचे के सिट-आउट मेँ बैठे सिगार पी रहे थे।"

"वही सिट-आउट जिसकी कीमत सोलह लाख रुपये थी?" श्रेया ने व्यंग्यात्मक लहजे में पूछा।

"हाँ।" मैंने तब उसे बताया था कि कैसे देविका उस महँगे घर के बारे में चुप नहीं रह सकती थी। उस शाम मैं बगीचे में घूम रही थी, अंदर के लोगों से परेशान। रक्षित और अंशुमन ने मुझे नहीं देखा था। मैं बिना किसी से बात किए चुपके से निकल जाना चाहती थी। मैं बस अंशुमन के दिखावटी अमीर दोस्तों और परिवार से पीछा छुड़ाना कर घर जाना चाहती थी। श्रीमती राव-सिन्हा अंदर थीं, और जब दूसरे लोग आस-पास हों तो मैं उनसे दूर रहने की कोशिश करती थी। इसलिए नहीं कि वह दर्शकों के सामने दुष्टता करती हों, बल्कि इसके विपरीत। वह बहुत ज़्यादा विनम्र हो जातीं, "देखो मैं झोंपड़-पट्टी की लड़की के साथ कितनी अच्छी हूँ" के तरीके से विनम्रता का दिखावा करती थीं। इससे मेरी रूह काँप उठती थी।

"मैं बूढ़ा हो रहा हूँ," रक्षित ने धुआँ छोड़ते हुए शिकायत की।

अंशुमन ने अपने सिगार का एक कश लिया। वह धूम्रपान करता तो था, लेकिन बहुत कम, और मैं ऐसी पत्नी नहीं थी जो उसके खाने, पीने या धूम्रपान के बारे में उसे परेशान करती। वह एक वयस्क व्यक्ति था, और वह जो चाहे कर सकता था। मैं चाहती थी कि मुझे भी यह स्वतंत्रता मिले। मेरी सास का व्यवहार हमेशा क्रूर होता था, जिसे मैं संभाल सकती थी, लेकिन फिर यदि अंशुमन भी उनके साथ शामिल हो जाता था, उनसे सहमत होता था, और इससे मैं टूट जाती थी। श्रीमती राव-सिन्हा के रडार पर रहने की तुलना में उनसे दूर रहना आसान था, जो मैंने वर्षों के अनुभव के बाद कुशलता से सीख लिया था।

"मैं तुमसे उम्र मेँ बड़ा हूँ, कमीने," अंशुमन ने हँसते हुए विरोध किया।

"मैं अपने जीवन के बारे में सोच रहा हूँ। उम्र सिर्फ वर्षों मेँ नहीं बढ़ती भाई! तुम्हारे पास जो है, तुम्हारी उम्र नहीं बढ़ती। वह मेरे पास नहीं। मैं बस बूढ़ा होता जा रहा हूँ, और मुझे आश्चर्य है कि क्या मेरे पास कभी वह होगा जो तुम्हारे पास है।"

"मतलब?" अंशुमन ने पूछा। "तुम्हारी पत्नी का निश्छल प्यार। देविका मुझसे प्यार नहीं करती, अंशुमन...." अंशुमन ने असहमति की आवाज़ निकाली। "हाँ अंशुमन। उसे ‘मिसेज राव-सिन्हा’ बनना तो पसंद है, लेकिन मुझसे प्यार नहीं है," उसने दोहराया और फिर कहा, "वैसे नहीं जैसे प्रियंका तुमसे प्यार करती है।" मैं चुप थी, मेरा दिल तेजी से धड़क रहा था।

"हाँ, मैं भाग्यशाली आदमी हूँ," अंशुमन ने धीरे से कहा। मुझे पता था कि उसने शराब पी रखी थी। वह पूरी तरह नशे में नहीं था, लेकिन काफी नशे में था। मैं मुस्कराई। हे भगवान। अंशुमन ने कहा कि वह मेरे साथ होने के लिए भाग्यशाली है। रक्षित ने आगे कहा, "मैं पहले प्रियंका को पसंद नहीं करता था, लेकिन अब मैं देख सकता हूं कि वह तुम्हारा और बच्चों का कितना अच्छा ख्याल रखती है।"

"हाँ वह ख्याल करती है।" अंशुमन ने धुएं के छल्ले छोड़े। "उसे कभी सिरदर्द नहीं होता और वह किसी भी तरह से मेरे सेक्स सुख के लिए तैयार रहती है, जैसा भी मैं चाहता हूँ।"

"अंशुमन, तुम क्रूर हो। बेहद अमीर घर के भाग्यशाली पुत्र।" रक्षित ने आह भरी।

"श्रेया, मुझे जैसे लकवा मार गया था। मैं कुछ देर तक हिल तक नहीं पाई थी; जैसे मेरे परों मेँ पाला पड़ गया हो। रक्षित ने कहा कि मैं उसका ख्याल रखती हूँ, और अंशुमन का जवाब था कि मैंने उसके साथ कैसे-कैसे सेक्स संबंध बनाए हैं।" मैं अभी भी उस अपमान को महसूस कर सकती थी जो तब महसूस किया था। "वह नशे में था, प्रियंका।"

"मुझे पता है, लेकिन उसने ऐसा सोचा था, तब ही तो कहा? है न?"

“उसे दोष नहीं दिया जा सकता। तुम हो ही इतनी सेक्सी" श्रेया ने हँसते हुए कहा और खाँसने लगी। मैंने उसकी पीठ थपथपाई और खांसी गुज़रने का इंतज़ार किया। उसके बाद, वह लगभग गिर ही पड़ी, उसकी साँसें तेज़ चल रही थीं। "उफ्फ़ .... मुझे ऐसे जीना पसंद नहीं, प्रियंका।"

"मुझे पता है, प्रिये।"

उसने मेरी ओर देखा, "अब ज़्यादा समय नहीं बचा है न?" मेरी आँखों में आँसू भर आए। मैंने सिर हिलाया। मैं क्या कह सकती थी? मत जाओ, यहीं रहो? मुझे पता है कि तुम दर्द में हो, लेकिन कृपया मुझे मत छोड़ो। तुम मेरा परिवार हो, एकमात्र व्यक्ति जो मुझे बिना किसी शर्त के प्यार करता हो। ओह, श्रेया, मैं तुम्हारे बिना कैसे रह पाऊंगी? मुझे पता था कि मैं ऐसा कुछ नहीं कह सकती। यह उचित नहीं होता, इसलिए मैंने फीकी मुस्कान दी। "अब तुम आराम करो, और फिर हमारे साथ डिनर करना।" इससे पहले कि वह विरोध कर पाती, मैंने आगे कहा, "कुछ खा लो, और शाश्वत से मिल लो।"

"ठीक है, मेरी प्यारी लड़की। मैं थोड़ी देर की झपकी ले लूँगी।"

"बिस्तर पर ले जाऊँ?"

उसने अपना न मेँ सिर हिलाया, और मैंने उसे ओट्टोमन पर पैर रखकर लेटने में मदद की। मैंने उस पर एक कंबल डाला और देखा कि वह सो गई थी। मैं उसके कमरे से बाहर निकली तो देखा कि अंशुमन लाउंज में एक पेंटिंग देख रहा था। "हमारे घर पर इस कलाकार की कलाकृतियाँ हैं," मुझे देख कर उसने कहा।

मैंने सिर हिलाया "यह लक्षद्वीप का एक स्थानीय कलाकार है. मुझे उसके लैंडस्केप से प्यार हो गया है"

"श्रेया कैसी है?" उसने पूछा। वह जींस और गहरे नीले रंग के कश्मीरी स्वेटर में अच्छा लग रहा था, जिससे उसकी आँखें और भी गहरी हो गई थीं। मैंने कुछ सालों पहले दीपावली पर उसके लिए वह स्वेटर खरीदा था। "वह आराम कर रही है, लेकिन मुझे लगता है कि वह रात के खाने के लिए तैयार हो जाएगी।"

"प्रियंका, मैं---"

"मिस प्रियंका," किसी ने मुझे पुकारा, और मैं उस युवा जोड़े का अभिवादन करने के लिए मुड़ी जो रिज़ॉर्ट में दीपावली के दिन तक के लिए ठहरे हुए थे। वे उत्तर भारत से थे, उन्होंने लक्षद्वीप आने का फैसला इसलिए किया क्योंकि मैंने यह विज्ञापन दिया था कि हम रिज़ॉर्ट में एक परिवार की तरह दीपावली कैसे मनाते हैं।

"हाय इंद्र, हे गीतिका। तट पर सैर कैसी रही?" वे प्यार में डूबे हुए थे। इंद्र एक सुंदर युवक था और हमेशा अपनी गीतिका का हाथ थामे रहना चाहता था। गीतिका मुखर और जीवन से भरपूर थी। वे पिछली रात आए थे और नाश्ते के दौरान अपने बारे में कहानियाँ सुना रहे थे तो बड़ा मजा आया था। "बहुत ठंड थी, लेकिन बहुत मज़ा आया।" गीतिका ने अपने हाथ आपस में रगड़े। "हमने एक व्हेल भी देखी, मिस प्रियंका," इंद्र ने उत्साह से कहा।

गीतिका ने मुझे बताया, "फिर हम रस्टी नेल गए और कुछ गर्म कॉफी पी। क्योंकि मेरे हाथ पूरी तरह से जम गए थे।" उन दोनों को एहसास हुआ कि हम अकेले नहीं थे और उन्होंने अंशुमन की तरफ देखा। वह उनके पास आया और अपना हाथ आगे बढ़ाया। "हाय, मैं अंशुमन राव-सिन्हा, प्रियंका का पति हूँ।" मुझे गुस्सा आया कि उसने अपना यह परिचय दिया। ‘भगवान के लिए, प्रियंका, कानूनी तौर पर हम अभी भी पति-पत्नी हैं’ मैंने अपने आप को डाँटा। लेकिन सच तो यह था कि भले ही मुझे गुस्सा आया, लेकिन यह सुनकर मुझे खुशी भी हुई कि वह खुद को मेरा पति कह कर संबोधित कर रहा है।

"अरे वाह। हमें नहीं पता था कि आप भी आ रहे हैं। मिस प्रियंका ने यही कहा था कि उनकी बेटी आने वाली है," गीतिका ने चहकते हुए कहा। सभी ने हाथ मिलाया और परिचय हुए। मैंने अपने हाथ अपनी जींस पर पोंछे क्योंकि ठंड के बावजूद वे पसीने से चिपचिपे थे। अंशुमन यहाँ था। इसका क्या मतलब था? और इसका कि वह छह महीने यहाँ है? वह आदमी जो एक सप्ताहांत की छुट्टी लेकर छोटी छुट्टी पर नहीं जाता था, वह पूरे छह महीने की छुट्टी ले रहा था। "मैं खाना देखने जा रही हूँ।" मैं आगे बढ़ने ही वाली थी, कि मैं रुक गई, न जाने क्यों, और कहा, "अंशुमन, क्या तुम इंद्र और गीतिका के लिए कुछ ड्रिंक्स बना सकते हो?" उसने मेरी ओर देखा, पहले आश्चर्य से और फिर कृतज्ञता से। "हाँ, बिल्कुल।"

"लिविंग रूम में पूरी तरह से भरा हुआ बार है।" मैंने मुख्य लिविंग एरिया की ओर हाथ हिलाया। "हाँ, जरूर।" वह लगभग खुश दिख रहा था, और मुझे खुद पर ही बुरा लगा। क्या मैं उसे बहका रही थी, उससे कह रही थी कि वह मेहमानों की वैसे ही देखभाल करे जैसे हम घर पर करते हैं? या मैं खुद को गुमराह कर रही थी?

अरे, किसके पास समय है यह सब सोचने समझने का? मैंने राजमा भिगो रखा था, खाना बनाना था।

सोमवार, 2 फ़रवरी 2026

ज़िंदगी अधूरी तेरे बिन - भाग अठारह (18)

 

ज़िंदगी अधूरी तेरे बिन - भाग अठारह  (18)


भाग 18

अंशुमन




प्रियंका सफ़ेद कपड़ों मेँ बहुत खूबसूरत लग रही थी। उसके बाल उसके कंधों पर खुले हुए थे, और मैं खुद को उन बालों में लपेटना चाहता था और उन्हें फिर से छूने का अधिकार चाहता था, कि मैं उसके रसीले मुँह को चूम कर उसे यह कहते हुए सुन पाऊँ कि ‘मेरे प्यारे अंशुमन, मैं तुमसे प्यार करती हूँ’। क्या मैं अपनी गलतियों को सुधार पाऊँगा? "हाय, प्रियंका।" मैं उस जगह पर गया, जहां मुझे लगा कि वह चेक-इन डेस्क है, जहां एक सुंदर कंप्यूटर स्क्रीन और सर्दियों के फूलों का एक बड़ा फूलदान था।

वह पूरी तरह स्तब्ध होकर देखती रही। "क्या… कैसे…?"

मैंने मुस्कराते हुए कहा, "मेरे और शाश्वत के लिए एक बुकिंग है।"

मैंने उसकी आँखों में आँसू देखे जैसे उसके अंदर आशा की किरण जागी हो "शाश्वत?"

"हाँ, वह गाड़ी से सामान उतार रहा है।"

"क्या? क्या वह यहाँ है? मेरा बच्चा यहाँ है?"

लानत है! वह कितनी अनिश्चित लग रही थी, वह अपने बच्चों से कितना प्यार करती थी, और मेरे कारण बच्चों ने उसके साथ कैसा व्यवहार किया था। "बेशक, वह है। हम तुम्हें हमारे बिना छुट्टियां बिताने नहीं दे सकते, बेब।" उसने आँसू पोंछे और फिर चौंककर बोली, "तो इसका मतलब? क्या.... क्या तुम दोनों ही श्रेया के दोस्त हो?"

मैं मुस्कराया। "हाँ। उसने कहा कि वह सुनिश्चित करेगी कि तुम हमारे लिए दो कमरे अलग रख लो।" मैंने क्रेडिट कार्ड निकाला, और वह उसे घूरने लगी। "मैं तुम्हारा पैसा नहीं ले सकती," उसने फुसफुसाते हुए कहा। "तुम... श्रेया ने कहा है कि तुम उसके दोस्त हो, पैसा नहीं लेना है।" और हम तुम्हारे पति और बेटा भी तो हैं प्रियंका, भूल गईं? मैंने अपना कार्ड वापस पर्स में रख कर जेब में डाल लिया। मैं उससे इस बात पर लड़ने वाला नहीं था। अगर वह मेरे पास, हमारे पास, वापस आ जाए, तो मैं उससे कभी किसी बात पर नहीं लड़ने वाला।

तभी शाश्वत अंदर आया और प्रियंका के चेहरे पर मुस्कान आ गई।

"मेरा बच्चा।" वह उसकी तरफ दौड़ने लगी। पहले तो उसके कदम तेज दौड़े से थे और फिर अनिश्चित हो कर धीरे हो गए, जैसे कि उसे यकीन न हो कि शाश्वत कैसी प्रतिक्रिया देगा। शाश्वत ने भी मेरी तरह ही इस झिझक को महसूस किया और मुझे उसका दर्द महसूस हुआ। उसने अपनी बाहें खोलीं और प्रियंका ने दौड़ कर खुद को उनमें लपेट लिया। उसने उसे जोर से गले लगा लिया, पंजों के बल ऊंची खड़ी हुई और उसके चेहरे को पकड़ कर कई चुम्बन दिए। "मेरा बच्चा, मेरा बेटा ... ओह मेरा बच्चा यहाँ है। ओह, शाश्वत। ओह धन्यवाद। भगवान का शुक्र है। मुझे तुम्हारी बहुत याद आती थी बेटे। आने के लिए ..... ओ मेरे बेटे, शुभ दीपावली, प्रिय।" शाश्वत माँ से आलिंगन कर खड़ा था। उसने अपनी ठुड्डी उसके कंधे पर टिका दी, और आंखों में आंसू लिए मेरी ओर देखने लगा।

खुशकिस्मत, उसे माफ़ी मांगने की भी ज़रूरत नहीं पड़ी थी, और वह उसे गले लगा रही थी। अगर मैंने उसे अपनी बाँहों में खींचने की कोशिश की, तो पूरी संभावना थी कि मैं अपनी बाहें ही खो दूँगा। लेकिन मैं उन्हें साथ देखकर खुश था और मुझे पूरी उम्मीद थी कि वे अपने बीच की दरार को पाट सकेंगे; और जब नीलिमा और यशस्वी यहां आएंगे तो हम सब मिल जुलकर प्रियंका को दिखा सकेंगे कि वह हमारे लिए कितनी महत्वपूर्ण है। प्रियंका दूर हट गई और शाश्वत के कंधे थाम कर उसे निहारती रही कुछ देर। फिर मेरी ओर देखने लगी। उसने जोर से थूक निगला। "दीपावली की शुभकामनाएं, बेब।" मैं उसकी ओर बढ़ा और वह एक कदम पीछे हट गई, जिससे मेरे दिल में एक तीर सा चुभ गया।

"अंशुमन," उसने सांस ली। सिर्फ अंशुमन। उसने ‘मेरे प्रिय अंशुमन’ नहीं कहा था। मुझे बहुत अच्छा लगता था जब वह मुझे ‘मेरे प्रिय’ कहती थी। यहाँ तक कि जब उसने मेरे लिए एक नोट छोड़ा, तो उसमें भी उसने मुझे अपना प्रिय अंशुमन कहा। और मैंने उसे खो दिया। मैं इसे सही करना चाहता था, लेकिन मुझे यह भी नहीं पता था कि कहाँ से शुरू करूँ। मुझे नहीं पता था कि मैं जो कुछ भी कहना चाहता था, उसे कैसे कहूँ। उसे कैसे यह विश्वास दिलाऊँ कि मैं फिर कभी ऐसी मूर्खता नहीं करूंगा क्योंकि चार हफ़्तों में पहली बार मैं पूरी साँस ले पा रहा था। मेरी प्रियंका मेरे सामने थी। वह भले ही मुझसे नाराज हो, लेकिन वह यहाँ थी, मेरे सामने। मैं उसकी अनूठी खुशबू सूंघ सकता था, और इससे मुझे सुकून मिला।

प्रियंका हमें एक गलियारे से ले गई, जिसमें समुद्री दृश्यों की फ़्रेमयुक्त पेंटिंग्स समुद्र को सीधे घर में लाती हुई लग रही थीं। हम प्रियंका के पीछे-पीछे लकड़ी की सीढ़ियों से होते हुए रिसॉर्ट की ऊपरी मंजिल पर पहुँच गए। इस मंजिल पर हवा ठंडी थी, समुद्र की हल्की, नमकीन गंध से भरी हुई। वह अंत में एक दरवाज़े के सामने रुकी। मुझे इस तरह के सुसज्जित जगह की उम्मीद नहीं थी। मैंने हर जगह अपनी पत्नी के सलीकेदार स्पर्श को देखा। मुझे पूरा यकीन था कि उसने ही इसे सजाया था। भव्य, शांत कला, जिस तरह सब कुछ तारतम्य लिए एक साथ था, छुट्टियों की सजावट, यह सामंजस्य प्रियंका के स्पर्श की लिखावट थी।

उसने हमारे घर में भी ऐसा ही किया था। उसके बिना, वह घर जो कभी मुझे बहुत पसंद था, ठंडा, वीरान खंडहर लगने लगा था। वह अब घर ही नहीं लगता था, मुझसे उसके बिना वहाँ सांस भी नहीं ली जा रही थी। यहाँ उसे अपने पास पाकर एहसास हुआ कि हमारे घर का एहसास सिर्फ़ उसकी सौम्य सजावट के कारण नहीं, बल्कि प्रियंका की उपस्थिति ही थी जिसने हमारे घर में गर्मजोशी लाई, और यहाँ सनशाइन होम्स रिज़ॉर्ट में भी। उसने एक दरवाज़ा खोला जहाँ बोर्ड पर लिखा था, ‘सैंडी कोव रूम’। "शाश्वत, बेबी, यह तुम्हारा कमरा है।"

"सैंडी कोव?" वह बुदबुदाया। वह हंस पड़ी। "हाँ, मैंने सभी कमरों का नाम तब रखा था जब श्रेया ने पहली बार इसे रिज़ॉर्ट बनाया था। हम इसे सैंडी कोव कहते हैं क्योंकि यहाँ से आपको रेतीले समुद्र तट और टीलों का नज़ारा दिखता है।" शाश्वत ने कमरे की ओर देखा और प्रशंसा मेँ सिर हिलाया। "धन्यवाद, माँ।" उसने माँ के गाल को चूमा, और मैंने उसके कंधे की पीछे फिर से उसकी आँखों में पछतावे की हताशा देखी।

"तुम लोग नहाकर आराम क्यों नहीं कर लेते? खाना एक घंटे में है, और... उसके बाद, शायद हम बात कर सकें?" प्रियंका ने प्यार से सुझाव दिया। वह ऐसी ही थी, प्यार करने वाली और देखभाल करने वाली। वह शाश्वत पर झपट नहीं रही थी, उसे यह नहीं कह रही थी कि उसका व्यवहार बहुत बुरा रहा है और उसे सुधरना चाहिए। ऐसा नहीं कि यह गलत होता। उसे उसके पिछले व्यवहार के लिए यह करने का पूरा अधिकार था। लेकिन प्रियंका ऐसी नहीं थी। वह एक कोमल आत्मा थी, जिसने बिना माफी मांगे ही शाश्वत को माफ कर दिया था। शाश्वत के अपने कमरे में चले जाने के बाद वह मुझे हॉल के दूसरे छोर पर स्थित कमरे में ले गई। मेरे दरवाजे पर लिखा था, ‘सनराइज हेवन’। "यह आपका कमरा है," प्रियंका ने कहा, उसकी आवाज़ में हल्की गर्मजोशी थी जब उसने दरवाज़ा खोला। "यह एक कोने वाला कमरा है। यहाँ समुद्र पर आपको सूर्योदय दिखेगा।"

"इसलिए इसका नाम सनराइज हेवन रखा गया?" ..... "हाँ।"

अंदर कदम रखते ही, मैं कमरे के शांत, स्वागत करते माहौल से मंत्रमुग्ध हो गया। इसे समुद्र तट की तरह नर्म रेतीले रंगों में रंगा गया था। बड़ा बिस्तर कुरकुरे सफेद लिनेन और एक मोटे, गहरे नीले कम्फ़र्टर से बना था, जो थके हुए यात्री को आराम करने के लिए आमंत्रित करता था। दोनों तरफ, मेल खाते हुए नाइट स्टैंड में साधारण सिरेमिक लैंप रखे हुए थे जो एक नर्म रोशनी देते थे। बड़ी-बड़ी खिड़कियाँ ध्यान खींच रही थीं क्योंकि उनसे संध्या के समय महासागर का अद्भुत दृश्य दिखाई दे रहा था, जिसका विशाल जल क्षितिज में अंतहीन रूप से फैला हुआ था। तट से टकराती लहरों की आवाज़ मेरे कानों तक पहुँच रही थी, एक प्राकृतिक लोरी जो आरामदायक रातों का वादा कर रही थी। एक कोने में एक आरामदायक कुर्सी रखी हुई थी, जिसके साथ एक छोटी लकड़ी का बुकशेल्फ़ था, जिसमें समुद्री इतिहास से लेकर क्लासिक फिक्शन तक की कई किताबें रखी थीं। यह एक अच्छी कहानी में खो जाने या बस बैठकर समुद्र को देखने के लिए एकदम सही जगह लग रही थी। दीवारों पर समुद्र की थीम पर आधारित कलाकृतियाँ थीं, जिनमें समुद्र के ऊपर डूबते हुए सूर्य का एक आकर्षक चित्र भी था, जिसके रंग चमकीले और सजीव थे।

"यह बहुत ही खूबसूरत है।" मैंने विस्मय से चारों ओर देखा। "मुझे ऐसा लग रहा है...."

"जैसे क्या?" उसने धीरे से पूछा, लगभग शरमाते हुए जब मैंने अपने शब्द रोक लिए।

"जैसे मैं घर आ गया हूँ प्रियंका। जैसे यहाँ खिड़कियों के बाहर फैली विशाल सुंदरता के सामने दुनिया की सारी चिंताएँ अर्थहीन हो गई हैं" मैंने अपना सूटकेस नीचे रखा और महसूस किया कि मेरे कंधों से वजन उतर गया है। मैं अपनी पत्नी के साथ था और घर पर था। प्रियंका ही मेरा घर थी। वह जहां हो वहीं मेरा घर था। मैं यह पहले क्यों नहीं समझ पाया?

"मुझे बहुत खुशी है कि तुम्हें पसंद आया," उसने फुसफुसाते हुए कहा।

मैं अपनी पत्नी के खूबसूरत चेहरे को आँख भर देखता रहा। "बेब, .... मैं.... मैं .... "

"मैं बात करने के लिए तैयार नहीं हूँ, अंशुमन" उसने शांत तरीके से कहा। "प्लीज।"

मेरा गला रुंध गया। मैंने सिर्फ सिर हिलाया। "तुम समय लो, बेब। मैं कहीं नहीं जा रहा।"

उसकी भौंहें उठ गईं, और वह हैरान दिख रही थी "क्या मतलब?"

"मैंने... आ ...श्रेया ने तुम्हें नहीं बताया? मैंने छह महीने के लिए कमरा बुक किया है," मैंने कहा, जानते हुए कि मामला बिगड़ सकता है। मैं समझ नहीं पा रहा था कि क्या उम्मीद करूँ। जो प्रियंका पिछले बीस सालों से मेरे साथ रही थी, उससे मैं उम्मीद नहीं करता था कि वह हमें छोड़ जाएगी। मैं हमेशा से जानता था कि वह मजबूत है; मैं बस इस मजबूती को भूल गया था क्योंकि वह मजबूती उसके प्रेम के आँचल मेँ छिपी रही इतने वर्षों।

"छह महीने?" उसकी आवाज़ में आश्चर्य साफ़ था। "लेकिन... तुम्हारे काम का क्या?"

मैंने कंधे उचकाए। "प्रभाकर ने कार्यवाहक सीईओ का पदभार संभाल लिया है।"

"क्या?" वह मेरी ओर देखती रही। "क्यों?" और फिर मैंने देखा कि उसकी आँखों में घबराहट और चिंता के बादल छा गए "क्या तुम ठीक हो? ..... क्या तुम्हारी तबीयत ठीक है?"

"बेबी, मैं ठीक हूँ। दिल टूट गया है, लेकिन बाकी सब ठीक है," मैंने जल्दी से कहा, क्योंकि मैं नहीं चाहता था कि वह घबरा जाए। चूंकि उसकी सहेली बीमार थी, इसलिए मैं समझ गया कि उसका दिमाग कहाँ गया होगा "मैं सिर्फ तुम्हारे साथ रहना चाहता हूँ।"

उसने मेरी ओर प्रश्नवाचक दृष्टि से देखा, "मैं समझ नहीं पा रही।"

"जब तक तुम यहां हो, मैं लक्षद्वीप पर ही रहूंगा।"

"क्या? लेकिन क्यों?" मैं चुपचाप खड़ा रहा। बात दोहराने के बजाय मैं उसे देखता रहा। उसने मेरी बात ठीक सुनी थी, भले ही बात पसंद न आई हो "तुम- तुम ऐसा नहीं कर सकते"

"क्यों?"

"यह... आह... यह रिज़ॉर्ट मेहमानों के लिए है।"

"प्रियंका, मैं कमरे का किराया देने को तैयार हूं।"

"मैंने पहले ही तुमसे कहा था, मुझे तुम्हारा पैसा नहीं चाहिए," उसने कहा, और मैंने उसके अंदर वही आग देखी, जिसे मैंने फोन पर सुना था और जब उसने बताया था कि वह हमारी शादी से कितनी नाखुश थी।

"मैं जानता हूं, मेरा विश्वास करो" मैंने दुखी होकर कहा। उसे एक पैसा भी नहीं चाहिए था। प्रियंका के बारे में माँ की सभी बातों के बावजूद, मेरी पत्नी ईमानदारी से मुझसे मेरे लिए प्यार करती थी, मेरे परिवार के नाम के लिए नहीं। मुझे यह पता था, लेकिन मैंने अपनी माँ के सामने कभी यह बात नहीं कही - मुझे कहना चाहिए था। शादी के शुरुआती दिनों में मैं माँ को नाराज़ करने से डरता था। लेकिन उसके बाद, मुझे कोई परवाह नहीं रही थी। "अंशुमन तुम यहाँ इतने दिन नहीं रुक सकते।" वह दरवाज़े की ओर चली गई। "मैं... अच्छा, चलो बाद में बात करते हैं। लेकिन तुम यहाँ नहीं रह सकते।"

"प्रियंका, अगर तुम मुझे इस रिज़ॉर्ट से बाहर निकाल दोगी तो मुझे द्वीप पर कोई और जगह ढूंढनी पड़ेगी। लेकिन मैं वहीं रहूँगा जहाँ तुम हो।" इस पर उसने मुझ पर व्यंग्य किया। व्यंग्य! वह कभी-कभार ही रूखी होती थी, इसलिए यह चौंकाने वाला था। "देखते हैं, अंशुमन। मुझे यकीन है कि जब भी काव्या किसी संकट के बारे में फोन करेगी, तो तुम उलटे पैरों भाग जाओगे।" जिस तरह से उसने काव्या का नाम लिया, मैं परेशान हो गया। "प्रियंका, मैंने तुम्हें कभी धोखा नहीं दिया, न शारीरिक रूप से, न भावनात्मक रूप से। कभी नहीं।"

उसका जबड़ा कस गया। "हाँ, तो तुम ऐसा करते क्यों, अंशुमन? क्या मैं हमेशा ‘अच्छी पत्नी’ नहीं थी जिसे कभी बहाने का ‘सिरदर्द’ नहीं हुआ और जो हमेशा तुम्हारे साथ ‘वैसे ही सेक्स’ करती रही जैसा-जैसा तुम अपनी तृप्ति के लिए चाहते थे?" हैं? प्रियंका इस तरह बात नहीं करती थी। यह क्या था? "तुम्हें आश्चर्य हो रहा है? मैंने तुम्हें एक बार रक्षित से ऐसा कहते हुए सुना था। तुमने हमारे पति पत्नी के अंतरंग पलों को अपने भाई के सामने एक सस्ता मजाक बना दिया, जैसे कि मैं कोई.... " मैं हांफने लगा। वह कह नहीं पा रही थी, लेकिन अर्थ यही था कि मैंने उसके बारे मेँ एक बाजारी औरत की तरह अपने भाई से बात की थी, अब शर्मिंदा होने से क्या होगा, मैंने ही तो यह किया था।

"मैं....मैं .... " मैं खुद का बचाव भी नहीं कर सका क्योंकि ऐसा लग रहा था कि मैंने कुछ गिलास पी लिए होंगे और यह बका होगा। क्या मैंने प्रियंका को कभी ऐसे देखा था? मेरा दिल धड़क उठा। नहीं। मैंने अठारह साल की लड़की से शादी की, और उसे कभी किशोरी होने का मौका ही नहीं मिला। वह हाई स्कूल और सरकारी कॉलेज मेँ भी पैसों की जरूरत के लिए कोई न कोई काम करती रही। उसे कभी बच्ची होने का समय ही नहीं मिला; यह मैं जानता था। और मैंने उसे किशोरी होने का मौका भी नहीं दिया, क्योंकि मैंने ‘प्यार करता हूँ’ कह कर विवाह कर लिया, और फिर अपनी शेरनी जैसी माँ की मांद में फेंक दिया।

"कुछ साल पहले की बात है," उसने आगे कहा। "रक्षित की बर्थडे पार्टी थी उनके घर पर। मैं आना नहीं चाहती थी, लेकिन तुमने कहा कि मुझे आना ही होगा। 'लोग कहेंगे कि तुम कहाँ हो, प्रियंका। मैं उस बकवास से निपटना नहीं चाहता’ उसने आखिरी हिस्सा मेरे ही लहजे मेँ नकल सी करते हुए कहा। "प्रियंका, मुझे बहुत खेद है," मैंने कहा, उस पार्टी की यादें वापस आ गईं। मैंने खुद को रक्षित से उनके बगीचे में बात करते हुए देखा। मुझे ठीक-ठीक बातचीत याद नहीं आ रही थी, बस इतना पता था कि यह उम्र बढ़ने के बारे में थी। यह लगभग चार साल पहले की बात है। "क्या तुम्हें याद भी है कि तुमने क्या कहा था?" उसने मुझे चुनौती दी। मैंने अपना सिर हिलाया। "मुझे नहीं पता। बिल्कुल नहीं। क्या तुम मुझे बताओगी?" उसकी आँखों में आँसू भर आए। उसने अपना सिर हिलाया। "खाना साढ़े छह बजे तैयार हो जाएगा। केसर के चावल पर राजमा, भुनी हुई सब्जियाँ मुख्य कोर्स है, बाकी सामान्य।“

"धन्यवाद, प्रियंका।" वह बहुत ही बढ़िया और दिलचस्प खाना बनाती थी। बच्चे बढ़िया खाना खाकर बड़े हुए थे। उनके जाने के बाद भी वह खाना बनाती रही, लेकिन मैं रात के खाने के लिए घर कम ही आता था। अगर बच्चे होते तो मैं हमेशा घर पर रहता - लेकिन अगर वे नहीं होते तो... कई मायनों में, मैंने अपनी पत्नी को बिना कुछ कहे ही बता दिया था कि वह महत्वपूर्ण नहीं है, बच्चे महत्वपूर्ण हैं। मैं एक बेवकूफ़ था।

उसके जाने के बाद, उसकी खुशबू कमरे में बनी रही, और मैंने उसे सांसों में महसूस किया। मैं आसमान में अंधेरा छाने के साथ ही टूटती लहरों को देखता रहा, सोचता रहा कि मैं उसे कैसे वापस जीत सकता हूँ, जबकि मुझे लग रहा था कि मैं उसे जानता ही नहीं। सिर्फ़ चार हफ़्तों में, वह ज़्यादा मुखर और तर्क शील हो गई थी। इसने मुझे उलझन में डाल दिया, क्योंकि यह वह प्रियंका नहीं थी जिसके साथ मैं बीस सालों से रह रहा था। अगर वह पहले भी मेरे सामने इस तरह खड़ी होती, इतनी जोरदार होती, तो क्या मैं बेहतर व्यवहार करता? ऐसा नहीं है कि उसे ऐसा करने की ज़रूरत होनी चाहिए थी, मुझे अपनी पत्नी के साथ बिना इसके ही ठीक से पेश आना चाहिए था, चाहे कुछ भी हो। यह मेरी ज़िम्मेदारी थी।

लेकिन मैं अभी भी सोचता था कि अगर हम कभी इस बारे में बात कर पाते कि हम वास्तव में कैसा महसूस करते हैं, तो चीज़ें कैसी होतीं? यह सब मैं उस रिज़ॉर्ट से नज़ारे की मन ही मन प्रशंसा सोचते हुए सोच रहा था, जहाँ मैं सालों से जाने से इनकार करता रहा था।

ज़िंदगी अधूरी तेरे बिन - भाग सत्तरह (17)

 

ज़िंदगी अधूरी तेरे बिन - भाग सत्तरह (17)

 


भाग 17

प्रियंका




मैं अपनी खुशी रोक नहीं पा रही थी कि नीलिमा और यशस्वी कल यहां होंगे। चौबीस घंटे से भी कम समय में सनशाइन होम्स में उनके पहुँचने की आशा से मुझे ऊर्जा मिल रही थी, जिस से मैंने रिसॉर्ट को उत्सव के अजूबे में बदल दिया। यह पहली दीपावली थी जो मैं श्रेया और अपने बच्चों में से सिर्फ़ एक के साथ मनाने वाली थी। यह श्रेया की आखिरी दीपावली भी थी। मैं चाहती थी कि यह हम सभी के लिए जितना संभव हो उतना खास और यादगार हो। मैं कभी यह पछतावा नहीं चाहती थी कि मैंने श्रेया के लिए उसके आखिरी दिन जितना संभव हो सके उतने अच्छे नहीं बनाए।

रिज़ॉर्ट का हर कोना मौसम की रौनक से जगमगा उठा था। लीला और मैंने मुख्य लाउंज में चांदी के रंग की झालरें लटकाई थीं, प्रत्येक कोण रोशनी से चमक रहा था। लाल और सुनहरे रंग के गहने मालाओं से लटके हुए थे। त्यौहार के पके हुए मजेदार व्यंजनों के कारण मीठी नमकीन खुशबू हवा में फैली हुई थी। विशाल लिविंग रूम के खिड़की-दरवाजों पर दीपावली की रोशन झालरें जगमगा रही थीं। सब कुछ श्रेया के वर्षों से एकत्र किए गए सजावट के सामानों के मिश्रण से सजा था। सबसे ऊपर, एक चांदी का सितारा प्रकाश बिखेर रहा था, जिससे पूरे कमरे में कोमल प्रतिबिंब नाच रहे थे।

बाहर, रंजीत की बदौलत, छत और खिड़कियों के किनारों पर सफ़ेद रोशनी लगी हुई थी, जिससे रिज़ॉर्ट खुशी का प्रतीक बन गया था। मैंने चारों ओर के बरामदे पर आलीशान कालीन और कंबल बिछा रखे थे, जहाँ मेरी कल्पना मेँ नीलिमा, श्रेया और मैं तारों भरी रात में गर्म कोको साथ बैठ कर पीएंगे। रिज़ॉर्ट की दूसरी तरफ नीले रंग की झालरें थीं और नीली रोशनी में लिपटा हुआ सब कुछ बहुत सुंदर लग रहा था।

मुख्य लाउंज में कंप्यूटर के सामने मुझे अपने हाथों के काम को देख कर बहुत संतुष्टि हुई। यह जगह, जो मेरा घर बन गई थी, अब मुझे एक सच्चे घर जैसी लग रही थी, प्यार और गर्मजोशी से भरपूर! मैं अपनी बेटी और उसके मंगेतर का इस शानदार रिट्रीट में स्वागत करने के लिए तैयार थी। क्या मैं चाहती थी कि शाश्वत और अंशुमन भी यहाँ होते? बिल्कुल। मुझे छुट्टियाँ बहुत पसंद थीं और मैंने बैंगलोर में अपने घर को हमेशा सजाया था, जिससे वह आरामदायक और उत्सवपूर्ण लगे। मैं दीपावली से पहले और दीपावली की पूर्व संध्या तक पूरे सप्ताह मिठाइयां बनाती थी और एक दीपावली के व्यंजन सब को खिलाती थी।

इस साल, मैं यशस्वी और नीलिमा के लिए उपहार खरीदने के लिए पास मेँ छोटे शहर के चौराहे पर गई। मैंने श्रेया, रंजीत, लीला और उसकी लड़की मीनू के लिए पहले ही उपहार खरीद लिए थे। अंशुमन और शाश्वत के लिए कुछ चीजें भी खरीदीं, यह सोच कर कि नीलिमा और यशस्वी मेरे लिए ले जाएंगे। वे यहाँ के लिए सीधी उड़ान भर रहे थे, और हवाई अड्डे से कार किराए पर लेने वाले थे। मुझे पता था कि यशस्वी शाश्वत और अंशुमन से नाराज़ है, लेकिन उम्मीद थी कि वे बाद मेँ घर वापस जाएंगे, जिससे नीलिमा अपने परिवार से मिल सके। और मुझे नीलिमा के हाथ से शाश्वत को यह संदेश देने का मौका मिलेगा कि भले ही अंशुमन और मैं साथ न हों, लेकिन वे दोनों मुझे बहुत प्रिय थे।

मेरा दिल दुख रहा था। मैंने अपनी छाती रगड़ी। अंशुमन के बिना मैं जीवन कैसे जियूँगी? श्रेया के अनुसार, शाश्वत मेरे पास वापस आने का अपना रास्ता खोज लेगा - लेकिन मुझे पता था कि अंशुमन ऐसा नहीं करेगा। वह आगे बढ़ जाएगा। उसे अपने लायक कोई पत्नी मिल जाएगी। मुझे लगा कि आंसू आ रहे हैं, और मैंने पलकें झपकाईं। नहीं, मैं पछतावे के रास्ते पर नहीं जाऊँगी। मैंने अपने लिए सही किया है। मैंने कंप्यूटर पर फिर से देखा और नोट किया कि श्रेया के दोस्त जल्द ही आ रहे हैं। नोट में लिखा था कि वे शाम तक यहाँ आएंगे और हमारे साथ डिनर पर शामिल होंगे।

मैं रात के खाने के लिए काला राजमा बना रही थी। मैं एक बार अंशुमन के साथ एक रेस्टोरेंट में गई थी, जहाँ उन्होंने राजमा को केसर चावल के साथ भुनी हुई सब्जियों सुंदर सलाद के साथ परोसा था। श्रेया ने तब मजाक किया था जब उसने मुझे भोजन कक्ष में चॉक बोर्ड पर लिखते देखा था कि अगले दिन रात के खाने और नाश्ते में क्या मिलेगा। "तुम बढ़िया खाना बनाती हो, प्रियंका। अब मेहमान भी इसकी उम्मीद करेंगे और तुम खुद से ही प्रतिस्पर्धा करोगी," उसने मुझे छेड़ते हुए कहा।

"मुझे पकाने का बहुत शौक है; तुम जानती ही हो।" मैंने नाश्ते का मीनू लिखने पर ध्यान केंद्रित किया: मिर्च सॉस के साथ कढ़ाई पनीर और मूसली, ब्लू बेरी और शहद के साथ दही।

"क्या तुम्हारे परिवार को तुम्हारा खाना पसंद आता था?" वह चिमनी के पास लगी कुर्सी पर बैठ गई। ठंड होने लगी थी। बैंगलोर की यादें, वहाँ इस समय बहुत ठंड नहीं पड़ती। हमारे साथ बिताए गए जीवन के सभी बीस साल बुरे नहीं थे। प्यार और हंसी-मज़ाक भी था। वास्तव में, बुरे सालों और दिनों से ज़्यादा अच्छे साल और दिन थे। पिछले कुछ सालों में, खासकर बच्चों के जाने के बाद से, सब मुश्किल हो गया था और मेरी ज़िंदगी असहनीय हो गई थी। .... ओह अंशुमन, मुझे तुम्हारी याद आती है।

दरवाज़े पर लगी घंटी की आवाज़ से मेरे चेहरे पर मुस्कान आ गई; श्रेया के रहस्यमयी दोस्त पहुँच गए थे, मैंने खुशी से सोचा। लेकिन जब अंशुमन को अंदर आते देखा तो मेरी मुस्कान गायब हो गई।

शनिवार, 31 जनवरी 2026

ज़िंदगी अधूरी तेरे बिन - भाग सोलह (16)

ज़िंदगी अधूरी तेरे बिन - भाग सोलह (16)

 

भाग 16

अंशुमन




घबराहट से मेरी नसें टूट रही थीं। मैं जैसे बिना किसी राह के अंधेरे मेँ भाग रहा था, मुझे कुछ भी समझ नहीं आ रहा था कि मैं क्या कर रहा हूँ। प्रियंका से जुदाई के एक महीने के बाद और उस फोन कॉल के दो हफ़्ते बाद मुझे देखने पर प्रियंका की प्रतिक्रिया क्या होगी, यह कोई भी अनुमान लगा सकता था। मैंने उसे फिर से कॉल नहीं किया था; मैं फिर वही गलती करने का जोखिम नहीं उठाना चाहता था।

मुझे मदद की ज़रूरत थी। मैं मनोचिकित्सक डॉक्टर राहुल वर्मा के सामने बैठा था। मैं शाश्वत के साथ अपनी पत्नी को बताए बिना ही दीपावली के लिए लक्षद्वीप जा रहा था, और जाने के दो दिन पहले मैंने उनसे मिलने के लिए अपॉइंटमेंट ले लिया था। वे एक सख्त दिखने वाले व्यक्ति थे। निगाहें ऐसी, कि लगता था कि वे आपकी आत्मा की परतों को उधेड़ देंगी, लेकिन उनकी आवाज़ अप्रत्याशित रूप से कोमल थी। डॉ. वर्मा ने कहा, "अंशुमन, आपने फॉर्म में लिखा है कि आपने पहले कभी थेरेपी नहीं ली है।"

"हाँ बस डॉ. मिश्रा के साथ तीस मिनट का परिचय सत्र, उन्होंने आपका रेफ़रल दिया।" मैं सोफे पर बैठा खुद को बेवकूफ़ महसूस कर रहा था। क्या मुझे डॉक्टर के क्लिनिक मेँ ऐसे लेटकर अपनी भावनाओं के बारे में बात करनी चाहिए? बकवास! हम उच्च समाज के मजबूत पुरुष थे; हम इस सब मेँ शांत रहने में विश्वास करते थे। ‘मजबूत पुरुष थेरपी नहीं लेते’ मेरे मन मेँ मेरी माँ की लानतें गूंज रही थी।

डॉ. वर्मा मुस्कराए। "आपने जो फॉर्म भरा है, उसमें आपने लिखा है कि आपकी पत्नी आपको छोड़कर चली गई है, और इसीलिए आप थेरेपी ले रहे हैं।"

"हाँ... और मेरे लिए... मेरी अपनी मानसिक शांति और तरक्की के लिए भी," मैंने कहा। "उसके जाने से मेरे पास खुद के बारे में जितने जवाब हैं, उससे कहीं ज़्यादा सवाल हैं।"

हमने कुछ देर बात की और मैंने उन्हें बताया कि प्रियंका और मेरे साथ क्या हो रहा है, और सिर्फ़ मेरे साथ भी। वह हर शब्द पर ध्यान देते रहे। कैसे दुनिया के लिए प्रियंका पीड़ित पत्नी थी, और मैं एक मूर्ख पति था जो नहीं जानता था कि उसके पास सब कितना अच्छा था।

फिर हम डॉ. मिश्रा द्वारा दिए गए होम वर्क पर पहुंचे, जिसके बारे में मैंने डॉ. वर्मा को बताया। "ठीक है, तो चलिए इस बारे में बात करते हैं कि आपने अतिथि कक्ष में सोना क्यों शुरू कर दिया," उन्होंने शान्त स्वर मेँ कहा, उनका स्वर सपाट लेकिन सहानुभूति पूर्ण था।

मैंने सिर हिलाया, और मेरे मुंह से परिचित बहाना निकल गया। "मैं देर से घर आता था या स्टडी में देर तक काम करता था। वह तब तक सो रही होती थी, और मैं गेस्ट रूम में सो जाता था, इसलिए कि मैं उसे परेशान नहीं करूँ।" लेकिन क्या मैं यह नहीं जानता था कि अलग सोने से मैं उसे और परेशान कर रहा हूँ? डॉ. वर्मा थोड़ा आगे झुके, उनकी उंगलियाँ आपस में उलझी हुई थीं। “क्या आपने पहले से ही ऐसा ही इंतजाम रखा है?”

मैंने अपना सिर हिलाया। कमरा अचानक से तंग लगने लगा, हवा घनी हो गई। "नहीं। बस पिछले कुछ महीनों से...शायद एक साल या उसके आसपास, मुझे लगता है।"

"क्या कोई विशेष घटना घटी जब यह शुरू हुआ?"

मैं झिझका, जब मैं आखिरकार बोला तो मेरी आवाज़ सिर्फ़ फुसफुसाहट सी थी। "मैं इस बारे में बहुत सोच रहा था, और मुझे यकीन नहीं है। या शायद मैं निश्चित हूँ। कुछ तो हुआ था, ऐसा कुछ जो तब समझ में नहीं आया लेकिन अब समझ में आ रहा है।" वर्मा ने सिर हिलाया और मेरे आगे बोलने की प्रतीक्षा करने लगे।

मैं फिर से देर से घर आया था ... प्रियंका सो रही थी, लेकिन उसने उस छोटी सी मेज पर एक नोट छोड़ा था जहाँ मैं अपनी चाबियाँ रखता था। मेरे प्यारे अंशुमन, अगर आपने खाना नहीं खाया है तो आपके लिए फ्रिज में प्लेट में खाना रखा हुआ है। आपको बस इसे माइक्रोवेव में एक मिनट के लिए रखना है। साथ में पेकन पाई भी है। -प्रियंका

अपराध बोध ने मुझे अंदर से कुतर दिया। वह इतनी प्यार भरी क्यों थी? मैंने देर रात काम करने के बाद काव्या और कुछ अन्य सहकर्मियों के साथ मार्सेल रेस्तरां मेँ खाना खा लिया था। वास्तव में हमने एक बोतल वाइन के साथ एक बढ़िया डिनर किया था। मैं अपनी कार को काम पर छोड़कर टैक्सी से वहाँ गया था और फिर घर आया था। जब भी मेरी शाम की योजनाएँ बदलती थीं, मैंने प्रियंका को बताने की कभी ज़हमत नहीं उठाई, भले ही वह हर सुबह मुझे शाम के डिनर के बारे में पूछती थी। यदि पहले से डिनर का कोई प्रोग्राम होता तब मैं उसे पहले ही बता देता था, लेकिन अगर दिन में कोई योजना बनती तब नहीं। आज भी कुछ अलग नहीं था, मेरी डिनर योजनाएँ बन गईं, और प्रियंका घर पर घर के बने खाने की प्लेट लेकर अपने पति का इंतज़ार कर रही थी, जो नहीं आया था।

वह मुझसे प्यार करती थी और मेरा ख्याल रखती थी। प्रियंका ने मेरे लिए जो कुछ भी चाहिए था, वह किया। मेरे सूट ड्राई-क्लीन किए गए। मेरी शर्ट इस्त्री की गई। मेरे जूते पॉलिश किए गए। अगर मैं लोगों को रात के खाने के लिए घर पर आमंत्रित करता, तो वह बढ़िया खाना बनाती और उसे बढ़िया वाइन के साथ परोसती। प्रियंका की मेजबानी के हुनर से हर कोई प्रभावित था। अगर मुझे बात करने की ज़रूरत होती, तो वह वहाँ होती। मुझे जो भी चाहिए या जो भी चाहिए, प्रियंका ने दिया।

मैं थका हुआ बेडरूम में गया, उम्मीद कर रहा था कि प्रियंका सो गई होगी ताकि मुझे अपने विचारहीन व्यवहार का सामना न करना पड़े। लेकिन वह नाइट शर्ट और शॉर्ट्स में जाग रही थी, पढ़ रही थी। उसकी नीली झीनी नाइटवियर मेँ उसकी रेशमी त्वचा चमक रही थी। मेरी पत्नी बहुत खूबसूरत थी। उसने अपना आईपैड एक तरफ रख दिया और मेरी तरफ देखकर मुस्कराई। "तुम थके लग रही हो, बेब। क्या तुमने खाना खाया?"

जब वह बिस्तर से उठने वाली थी, मैंने उसकी ओर हाथ हिलाया। "मैंने खाना खा लिया। हम कुछ लोग मार्सेल रेस्तरां गए थे।" जैसे ही रेस्तरां का नाम निकला, मैं उसके चेहरे पर पल भर का तनाव देख सकता था, जो एक पल भर मेँ गायब हो गया, तथा उसकी जगह उसकी मुस्कान ने ले ली। इस बारे में ज्यादा सोचने की जरूरत नहीं थी कि वह उस क्षण क्यों आहत दिखी। क्या पिछले शुक्रवार को ही प्रियंका ने मार्सेल में आरक्षण करवा कर मुझसे नहीं कहा था? हाँ, यह पिछले शुक्रवार की बात है। सिर्फ़ चार दिन पहले, मैंने उसे साफ़-साफ़ कह दिया था कि मेरे पास डिनर या कुछ और करने का समय नहीं है। मैं एक लंबे हफ़्ते के बाद थक गया था और बस सोना चाहता था। उसने मुस्कराते हुए मुझे बताया था कि वह इसलिए जाना चाहती थी क्योंकि शेफ ने उसे आमंत्रित किया था। वह उससे तब मिली थी जब वह एक आश्रय गृह में स्वयं सेवा करती थी, और उनकी दोस्ती हो गई थी।

मैं इतना लापरवाह कैसे हो सकता था? लेकिन मैं था।

"हम जल्द ही साथ मेँ चलेंगे," मैंने अपना गला साफ़ किया। "आह...मुझे नहाना है।" मैं बाथरूम में भाग गया। जब मैं बिस्तर पर आया, तो वह मेरी तरफ मुँह करके लेटी थी। उसकी आँखें बंद थीं, लेकिन मुझे पता था कि वह जाग रही है। मैं उसके बगल में बैठ गया और तुरंत उसे देख उत्तेजित होने लगा। बुरी तरह! हमेशा की तरह मैं उसके लिए भूखा था। मैं पीठ के बल लेट गया और एक हाथ आगे बढ़ाया। उसने तुरंत अपना सिर मेरे कंधे पर रख दिया, उसके छोटे, नाजुक हाथ मेरी छाती पर थे। मैंने उससे विनती की, "बेब, मैं .... "

उसने अपनी बाहें फैलाईं और पैर फैलाए, "हाँ, मेरे प्यारे अंशुमन।" मेरे पास उसके लिए धैर्य नहीं था, जो मैं लगभग हमेशा करता था। इस बार नहीं। मेरा दिन लंबा और तनावपूर्ण था, और वह मेरा इनाम थी - मेरी कमबख्त मुक्ति। "मैं रुक नहीं सकता बेबी।" उसने मेरी पीठ पर हाथ फेरा और मेरा स्वागत किया। बस इतना ही आमंत्रण था जिसकी मुझे जरूरत थी। मैंने अपनी आवश्यकता पूरी कर ली। मैं जानता था कि उसके लिए यह नहीं हुआ था। मैंने फुसफुसाते हुए कहा, ‘सॉरी।‘ अपराध बोध पर अपराध बोध की परतें चढ़ती गईं। वह मुस्कराई और मेरे मुंह को चूमा। "मुझे तुम्हारा मेरे अंदर होना, तुम्हें अपने इतने करीब महसूस करना बहुत अच्छा लगता है।"

"लेकिन मैं हमेशा तुम्हें भी सुख देता हूँ।"

उसकी आँखें घूम गईं और मैंने पलकें झपकाईं, "प्रियंका?"

"हाँ .... हाँ देते हो न .... तुम्हें पता है," उसने कहा, लेकिन मैं जानता था कि वह झूठ था। मैंने उसे चूमा। मैं उसके लिए सब कुछ ठीक कर दूँगा; मैंने खुद से वादा किया, जब इतना थका हुआ नहीं रहूँगा। वैसा करूँगा, जैसा कि मैं पहले करता था।"

“तो, आपकी पत्नी को संभोग सुख नहीं मिला, और आप दोषी महसूस कर रहे थे," डॉ. वर्मा ने अनुमान लगाया। मैंने होंठ चाटे। "और उसके कहने के तरीके से मुझे एहसास हुआ कि यह पहली बार नहीं था जब मैंने उसका ख्याल नहीं रखा था। मुझे एक गधे जैसा लगा।"

"क्या आपने उससे इस बारे में बात की?"

मैं आत्म-ग्लानि में हंसा। "चलो, डॉक्टर, मैं एक मजबूत पुरुष हूँ, हम ऐसी बातों के बारे में बात नहीं करते।" डॉक्टर ने गंभीरता से सिर हिलाया। "नहीं डॉक्टर। मैंने उससे इस बारे में बात नहीं की," मैंने उदास होकर कहा। "मुझे लगा जैसे उसने मुझे अभी-अभी बताया हो कि मैं एक घटिया प्रेमी था, और शायद इसीलिए... मैंने अतिथि कक्ष में सोना शुरू किया।"

"क्या उन्होंने सचमुच ऐसा कहा था?"

"नहीं, नहीं" मैंने चिल्लाकर कहा। "नहीं। उसने नहीं कहा। प्रियंका... वह बहुत प्यारी है। यह सब मेरी गलती थी। मुझे अपराध बोध हो रहा था, और मैं जानता था कि अगर मैं उसके साथ बिस्तर पर गया, तो मैं फिर यही करूंगा। मैं उसके साथ अपने आप को रोक नहीं सकता। मेरे दोस्त शिकायत करते हैं कि उनकी पत्नियाँ उन्हें उत्तेजित नहीं करती हैं, और वे किसी अजनबी के साथ यह करना चाहते हैं। मैं उनकी बात बिल्कुल नहीं समझ पाता। मैं प्रियंका को देखता हूँ, और उत्तेजित हो जाता हूँ।" डॉ. वर्मा पीछे झुक गए मानो वे मेरे कुछ और कहने का इंतजार कर रहे हों और दुर्भाग्य से और भी कुछ हुआ। यह गड़बड़ मैंने खुद ही की। "मुझे संदेह था कि वह खुश नहीं थी, और शायद इसीलिए वह संतृप्त नहीं हुई। मैं हमारे बीच बढ़ती दूरी को महसूस कर सकता था। अलग-अलग सोना इसका सामना करने से ज़्यादा आसान लग रहा था।"

"प्रियंका जी के जाने के बाद से आप कहाँ सो रहे हैं?"

मुझे लगा कि मेरी आँखों में आँसू आ गए हैं। "बिस्तर के उसकी वाली तरफ़।"

“क्यों?” डॉ. वर्मा ने पूछा, उनका स्वर सहानुभूति पूर्ण किन्तु साथ ही जांच पूर्ण था।

"क्योंकि मैं वहां उसकी गंध महसूस कर सकता हूं, और मैं कम अकेला और अधिक सुरक्षित महसूस करता हूं।" मैंने हाउस कीपर से कहा था कि चादरें न बदलें। मैं अपनी प्रियंका को यथासंभव लंबे समय तक अपने पास रखना चाहता था।

"अंशुमन, यह तो बिल्कुल स्पष्ट है कि आप अपनी पत्नी से प्यार करते हैं।"

"बहुत ज़्यादा," मैंने भर्राई हुई आवाज़ में कहा। "बहुत-बहुत, बहुत ही ज़्यादा।"

"आपको क्या लगता है कि इस प्यार के बावजूद आप उनके साथ ऐसा व्यवहार क्यों करते आ रहे हैं, जिसके बारे में आपके आस-पास के सभी लोग सोचते हैं कि यह उन्हें दूर भगाने के लिए किया गया था?" पिछले कुछ सप्ताहों से मैं इस विषय में बहुत सोच रहा था, जब से मेरी पत्नी चली गयी थी। पहले तो मुझे लगा कि वह नाटकीय हो रही है। फिर मैंने खुद को यकीन दिलाया कि वह किसी भी दिन वापस आ जाएगी। लेकिन, आखिरकार, मैं खुद के साथ ईमानदार हो गया कि मैं एक पति और एक आदमी के रूप में कौन था।

"जब हमारी शादी हुई तो मुझे डर था कि वह मेरे लिए एक गलत पत्नी है। मुझे उम्मीद थी कि एक दिन मोह भंग हो जाएगा और मैं उसे तलाक दे दूंगा।" यह याद करके मुझे हमेशा खुद से नफरत होती थी। "मैं उसे तलाक नहीं देना चाहता था, डॉक्टर। मैं उससे प्यार करता था, तब भी। लेकिन…... " .....

"लेकिन?"

मैंने आह भरी, "लेकिन, प्रियंका गलत समाज से है, और मैं राव-सिन्हा खानदान का हूँ।" उन्होंने सिर हिलाया, लेकिन कुछ न कहा, वे जानते थे कि मुझे अभी बहुत कुछ कहना है। "मेरी माँ उससे घृणा करती थी। पहले दो साल तो मुश्किल भरे थे, लेकिन फिर प्रियंका ने," मैं मुश्किल से शब्द निकाल पाया, "उनके अनुरूप होकर चुप रहना शुरू कर दिया।" मैंने अपनी प्यारी, मासूम, प्यारी पत्नी को अपनी माँ के क्रूर हाथों में छोड़ दिया था, जिनसे मैं भी डरता था, क्योंकि मैं कायर था। उस सारी दबंग आदमी वाली बातों और बकवास के बावजूद, मैं एक असफल व्यक्ति था जिसने अपनी पत्नी को अपनी माँ के नीचे रहने दिया। मेरी माँ, जो किसी से प्यार करने या देखभाल करने का अर्थ भी नहीं जानती थी।

"मुझे बताओ कि इस समय तुम्हारे साथ क्या हो रहा है?" डॉ. वर्मा ने पूछा।

मैंने उन की ओर देखा, मेरे गाल आँसुओं से भीगे हुए थे। "मुझे खुद से नफरत है।"

"क्यों?"

"क्योंकि मैंने अपनी पत्नी को उसके हाल पर छोड़ दिया था। क्योंकि मैंने उसे मजबूर किया कि वह मेरे लिए जिए, मेरी ज़रूरतें पूरी करे, लेकिन उससे कभी नहीं पूछा, एक बार भी नहीं पूछा, कि उसे क्या चाहिए।" जब भी हम बहस करते, मैं उस पर झल्लाता, "मैंने तुमसे शादी की है, है न? तुम और क्या चाहती हो?" जैसे मैंने उसे अपनी पत्नी बनाकर उस पर सबसे बड़ा एहसान किया हो।

"क्यों, अंशुमन? आप एक सभ्य आदमी हैं। आप अपने बच्चों से प्यार करते हैं, उनकी देखभाल करते हैं। आपका उनके साथ एक सच्चा और प्रामाणिक रिश्ता है। आपका अपने भाई के साथ भी अच्छा रिश्ता है। प्रियंका जी में ऐसा क्या था जो आपको —"

"मुझे दोषी महसूस हो रहा है," मैंने अचानक कहा। "ठीक है? और मैं दोषी हूँ। मुझे पता था कि उसके साथ क्या हो रहा था, लेकिन तब मुझे लगता था कि वह इसी के लायक थी। उसने उस समाज से आकर भी मुझ जैसे शहजादे को प्यार मेँ फंसा कर मुझसे से शादी कर ली; उसकी उसे कीमत चुकानी ही थी।" अब मैं इस बात से शर्मिंदा था, लेकिन एक समय था जब मैं, अपनी माँ की बातों से प्रभावित था और सच मेँ ऐसा ही सोचता था।

"क्या आप ने कोई कीमत चुकाई?"

मैंने सिर हिलाया। "मैं तो जैसे सोने की खान में गिर गया था। मुझे सबसे अच्छी पत्नी मिली जो एक आदमी चाह सकता है। मेरे बच्चों को एक बहुत प्यार करने वाली माँ मिली जिसने उन्हें बेहतर करने के लिए प्रेरित किया लेकिन कभी भी उन्हें चोट नहीं पहुँचाई, उनका अपमान नहीं किया, जैसा कि मेरे माता-पिता ने किया था। जैसा मेरे आस पास कई पत्नियाँ करती हैं। वह मेरे लिए हमेशा मौजूद थी। सिर्फ़ बिस्तर पर ही नहीं बल्कि हर जगह। वह मेरी सबसे अच्छी दोस्त है, डॉक्टर, लेकिन मैं उसका दोस्त नहीं रहा हूँ।" डॉ. वर्मा ने टिश्यू का डिब्बा मेरी ओर बढ़ाया और इस स्थिति का निचोड़ सोच कर मुझे हंसी आ गई। एक मनोचिकित्सक के दफ़्तर में रोना! लेकिन मुझे शर्मिंदगी महसूस नहीं हुई। नहीं, मुझे लगा... मुझे हल्का पन महसूस हुआ। "मैंने उसे खुद को सम्हालने के लिए छोड़ दिया क्योंकि मैं नहीं जानता था कि उसे कैसे खुश किया जाए, और मैं सीखना भी नहीं चाहता था। उसे टालना, हमारी समस्याओं को टालना, यह स्वीकार करने से कहीं अधिक आसान था कि मैंने एक पति के रूप में उसे निराश किया है" मैंने स्वीकार किया, शब्दों का वजन मेरे पेट में पत्थरों की तरह था।

डॉ. वर्मा ने फिर से ऊपर देखने से पहले अपने नोट्स में कुछ लिखा। "जब चीजें वास्तविक हो जाती हैं, तो बच निकलना ही आपकी आदत रही है। आपने अपने माता-पिता के साथ ऐसा किया, आप प्रियंका जी के साथ भी ऐसा कर रहे हैं, और मुझे यकीन है कि आप अपने जीवन में हर रिश्ते के इर्द-गिर्द इसी तरह बचते बचाते जीते हैं। लेकिन समस्या यह है कि यदि युद्ध मेँ आप पर्याप्त गोलियों से बच निकलते हैं, और आप खुद को युद्ध क्षेत्र में अकेला पाएंगे। अगर आप प्रियंका जी के साथ चीजों को बचाने का कोई मौका चाहते हैं, तो आपको स्क्रिप्ट को पलटना होगा। स्थिति का सामना करना होगा। अपनी सारी बातें कहनी होंगी, और फिर चुप होकर उनकी बात भी सुननी होगी - वास्तव में सुननी होगी, कि ‘वह’ क्या कह रही हैं। भागना नहीं, छिपना नहीं। सामना करना होगा। अगर आप प्रियंका जी के साथ चीजों को सच मेँ बचाने का कोई मौका चाहते हैं, तो।”

"मैं उसे फिर से कैसे पाऊँ?" मेरी आवाज़ में हताशा थी। "मैं उसे वापस कैसे जीतूँ?"

"अब, अंशुमन, स्पष्ट है कि आप एक लक्ष्य-उन्मुख व्यक्ति हैं, और आप अपनी मंजिल तक पहुँचना चाहते हैं और अपनी पत्नी को वापस जीतना चाहते हैं" उन्होंने एक छोटी सी मुस्कान के साथ कहा। "लेकिन आपको अपनी मानसिकता बदलनी होगी। आप प्रियंका जी को खुश नहीं कर सकते। केवल वह खुद को खुश कर सकती हैं - आपको यह सुनिश्चित करना होगा कि आप की तरफ से उसे कोई दर्द न हो, ताकि वह अपनी खुशी तक पहुँच सके। इसका कोई त्वरित समाधान नहीं है।"

"मुझे इस बात का डर था," दुखी होकर मैंने मज़ाक करने का प्रयास किया।

"अंशुमन, ऐसा नहीं है कि आपकी शादी के सभी बीस साल बुरे रहे हों। अच्छे समय भी होंगे?

मैंने अपना सिर हिलाया और फिर कंधे उचका दिए। "मेरे लिए तो अच्छे थे। प्रियंका के लिए? मुझे नहीं पता।"

"मैं जो देख सकता हूँ, और यह सच है कि यह हमारा पहला सेशन है, आपके बीच अच्छे और बुरे दोनों ही दौर रहे हैं। मुझे लगता है कि बुरे से ज़्यादा अच्छे दौर तब तक रहे जब तक कि आपके बच्चे चले नहीं गए। आप दोनों खाली घोंसले वाले पंछी हो गए और अपने रिश्ते को बनाए रखने के लिए ज़रूरी प्रयास नहीं किया। आपके बच्चों ने सहज रूप से आप दोनों के बीच दरार को देखा और आपका पक्ष ले लिया।" मैंने अपने हाथ में इस्तेमाल किए गए टिशू को कुचल दिया। जिस चीज को टूटने में सालों लग गए थे, उसे कुछ दिनों में ठीक नहीं किया जा सकता था। मुझे यह पता था। लेकिन रिश्ता ठीक करने के हम दोनों मेँ यह करने की इच्छा होनी चाहिए। और मुझे डर था कि उसमें वह इच्छा नहीं बची है। मुझे नहीं पता था कि अगर वह रिश्ता वापस नहीं जोड़ना चाहती, तो मैं क्या करता।

डॉ. वर्मा ने आगे कहा, "यदि आप अपनी पत्नी को वापस लाना चाहते हैं तो इसकी शुरुआत उनकी ज़रूरतों, इच्छाओं और चाहतों को समझने से होगी। आपको उन्हें विश्वास दिलाना होगा, और करके भी दिखाना होगा कि आप प्रतिबद्ध हैं। सच तो यह है कि आप अपनी पत्नी को खुश नहीं कर सकते और न ही वह आपको खुश कर सकती हैं। खुशी हमारे भीतर से आती है। आपको जिस चीज़ पर ध्यान केंद्रित करने की ज़रूरत है, वह है बिना क्रोधित हुए एक-दूसरे की बात सुनना, सीखना, एक-दूसरे की ज़रूरतों को सही मायने में सुनना और समझना, और उन्हें पूरा करने के लिए मिलकर काम करना।"


ज़िंदगी अधूरी तेरे बिन - भाग पंद्रह (15)

 

ज़िंदगी अधूरी तेरे बिन - भाग पंद्रह (15)


भाग 15

प्रियंका

 

"श्रेया, तुम ने दीपावली के सप्ताह के लिए दो कमरे बुक किए हैं, कोई नाम या क्रेडिट कार्ड नहीं है," मैंने श्रेया को पुकारा जब वह धीरे-धीरे लाउंज में आई जहाँ मैं जा रही थी। वह अपने लैपटॉप पर बुकिंग कर रही थी। "मुझे पता है। वे मेरे दोस्त हैं। कोई पेमेंट नहीं होगी इसलिए क्रेडिट कार्ड की जरूरत नहीं है।"

मैंने भौंहें चढ़ाईं, "अच्छा? मुझे नहीं पता था कि मेरे अलावा भी तुम्हारे और दोस्त हैं।"

"ए लड़की, मेरे पास दोस्त भी हैं और प्रेमी भी हैं," उसने शरारती अंदाज में कहा। "बस उस बुकिंग को वैसा ही छोड़ दो और उस की चिंता मत करो।" मैंने श्रेया के दोस्तों के लिए कमरे दर्ज किए और साप्ताहिक मीनू देखना शुरू किया, तथा जो किराने का सामान मुझे खरीदना था उसे एक नोट पर लिख लिया।

"नीलिमा और यशस्वी कब पहुंचेंगे?" श्रेया ने पूछा।

मैं मुस्कराई, अपनी बच्ची को जल्द ही देखने की खुशी में झूम रही थी। "शुक्रवार को। यकीन नहीं हो रहा कि नीलिमा सनशाइन होम्स में होगी। मैं विश्वास ही नहीं कर सकती।"

श्रेया ने मेरे हाथ पर हाथ रखा। "प्रियंका, तुम एक बहुत अच्छी माँ हो। तुम्हारे बच्चों ने भले ही बुरा व्यवहार किया हो, लेकिन मुझे लगता है कि एक बार जब उन्हें एहसास होगा कि उन्होंने तुम्हें कितना दुख पहुँचाया है, तो वे दोनों तुम्हारे पास लौट आएंगे।"

"तुम्हें लगता है?" मैं यह उम्मीद भी नहीं कर रही थी कि शाश्वत बदलेगा। उस दिन के बाद उसने फ़ोन नहीं किया। काश मैंने उस पर इतना कठोर व्यवहार न किया होता। मैं उसे मैसेज करके माफ़ी मांगना चाहती थी, लेकिन डॉ. मिश्रा ने मुझे अपनी सीमाएँ बनाए रखने की सलाह दी थी। बच्चे मेरे साथ वैसा ही व्यवहार करेंगे जैसा मैं उन्हें करने देती हूँ। मुझे कठोर शब्दों से खुद को बचाने के लिए सुरक्षा कवच लगाने की ज़रूरत थी। इससे मैं बुरी माँ नहीं बनी, बल्कि एक अच्छी माँ बनी। अपने बच्चों को लोगों का, ख़ासकर अपने माता-पिता का, सम्मान करना सिखाना एक अच्छा सबक था जिसे उन्हें अवश्य सीखना चाहिए।

इन सबके बावजूद, मुझे शाश्वत की याद आती थी। मुझे नीलिमा की याद आती थी। मुझे अंशुमन की याद आती थी - सबसे ज़्यादा उसकी ही। मुझे बिस्तर पर उसकी बाँहों में लिपटे रहने की याद आती थी। मुझे उसके साथ प्यार करना याद आता था। मुझे वह याद आता था जब वह मुझसे बात करता था। मुझे उसकी खुशबू याद आती थी।

श्रेया सोफ़े पर बैठ गई। अपने कमरे से लाउंज तक का छोटा सा रास्ता उसे थका देता था। "मुझे पक्का पता है कि तुम्हारे बच्चे तुम्हारे पास वापस आएंगे, प्यारी लड़की। मुझे लगता है कि मौत के इतने करीब होने से मैं भविष्य वक्ता हो रही हूँ।" उसने हँस कर कहा। उसका चेहरा पीला और मुरझाया हुआ था। यह सिर्फ़ दो-तीन महीनों या शायद इससे भी कम समय की बात थी; डॉक्टर ने मुझे एक दिन पहले ही चेतावनी दी थी जब हम उसकी नियमित जाँच के लिए गए थे। डॉक्टर ने एक बार फिर मुझे श्रेया को अस्पताल ले जाने के बारे में सोचने को कहा, और मैंने एक बार फिर कहा कि श्रेया अपने घर में ही मरना चाहती है। मैं नर्स का खर्च नहीं उठा सकती थी, और हमें उसकी ज़रूरत भी नहीं थी। मैं ही उसकी नर्स थी। मैं ही उसकी माँ थी, बेटी भी और बहन भी। हम दोनों एक दूसरे की सब कुछ थीं। मैं उसे नहलाती, साफ़ करती, जो भी ज़रूरी होता वो करती। मैं उसके लिए मौजूद थी।

मैं सोफे पर उसके बगल में बैठी थी और घड़ी पर नज़र रखे हुए थी। मैंने ओवन में कुछ रखा हुआ था और आठ मेहमानों को एक घंटे में खाना परोसा जाना था: दो जोड़े और एक किशोर परिवार। मैंने पूछा, "तुम्हें कुछ दर्द निवारक दवाएँ चाहिए?" उसने अपना सिर हिलाया।

"वे दर्द तो दूर करते हैं, लेकिन मुझे नींद भी आने लगती है। मेरे पास बहुत कम समय बचा है, मैं कुछ समय तक जागना चाहती हूँ।" मैंने उसका हाथ अपने हाथ में लिया और हम लाउंज की बड़ी खिड़कियों से सामने के बगीचे और उसके आगे समुद्र को देखने लगे। "क्या तुमने अंशुमन से कुछ सुना?" श्रेया ने आगे पूछा।

"उस कॉल के बाद से नहीं जब उसने मुझ पर चिल्लाया था।"

"मुझे पता है कि तुम उससे प्यार करती हो, लड़की।" उसने अपने हाथ से मेरा हाथ थपथपाया। "लेकिन मुझे नहीं लगता कि तुम मानती हो कि वह तुमसे प्यार करता है ।"

"नहीं करता।" अब यह निश्चित हो गया था। वह तलाक के कागज़ात पर हस्ताक्षर करने जा रहा था, जैसा कि उसने कहा था। ईशानी ने कहा था, जल्द ही कुछ मिलेगा। कुछ महीने लगेंगे। लेकिन मैं पहले ही घर से निकल चुकी थी और अंशुमन से कुछ नहीं चाहती थी, इसलिए सब सरल होने वाला था। तो, इस तरह मेरी बीस साल की शादी बिना किसी परेशानी के खत्म हो गई। यही तो तलाक लेने वाला हर व्यक्ति चाहता था, है न? यह अच्छी बात थी, है न? अंशुमन से झगड़ा मुझे बर्बाद कर देता। मुझे पता था कि टूटी शादी से उबरने में मुझे बहुत समय लगेगा। और, श्रेया जाएगी तब मैं सचमुच अकेली हो जाऊँगी, तब मुझे फिर से खुद को संभालना होगा। यह आसान नहीं होने वाला था।

श्रेया ने मुझे आश्चर्यचकित करते हुए पूछा, "अंशुमन को तुम्हें अपने प्यार का यकीन दिलाने के लिए क्या करना होगा?" मेरे मनोचिकित्सक ने भी मुझसे यही प्रश्न पूछा था, और मेरे पास इसका कोई स्पष्ट उत्तर नहीं था।

"मुझे नहीं पता," मैंने स्वीकार किया। "लेकिन सवाल निरर्थक है, श्रेया। वह मुझसे प्यार नहीं करता, और वह मुझे मनाने के लिए एक उंगली भी नहीं हिलाएगा। उसके अनुसार, मुझे बस अपने घर चले जाना चाहिए और इतना ‘नाटक करना’ बंद कर देना चाहिए।"

श्रेया ने रूखे स्वर में कहा, "मैडम, आप ‘रियल हाउस वाइव्स’ सीरियल की कड़वी पत्नियों में से एक लगती हैं।"

"हाँ तो? मैं उनमें से एक हूँ," मैंने हँस कर कहा। "मैं उन अमीरों के बीच ही रहती थी।"

श्रेया हँसी और फिर संभल गई। "शुरू में, मुझे लगा कि अमीरी से तुम बदल जाओगी। उन जैसी ही बन जाओगी। लेकिन तुम कभी नहीं बदलीं। तुम हमेशा तुम ही रही हो।"

"यह सच नहीं है," मैंने धीरे से कहा। "मैंने खुद को खो दिया, श्रेया। अदृश्य हो गई। शादी के बारे में कोई भी यह नहीं बताता कि आपको खुद को पूरी तरह से इसके लिए समर्पित करना होगा। हम निस्वार्थ भाव से यह करते हैं। हमारे बच्चे, पति, वे ही हमारी ज़िंदगी बन जाते हैं। लेकिन ‘हम’ उनकी ज़िंदगी नहीं बन पाते। कोई ‘धन्यवाद’ भी नहीं कहता। ऐसा लगता है कि मुझसे माँ और पत्नी बनने के लिए खुद अपनी पहचान को खो देने की उम्मीद की गई थी। मैं अब खुद भी नहीं जानती कि ‘प्रियंका सिंह’ कौन है। यह सच है कि उन्होंने मुझे नहीं देखा, लेकिन गड़बड़ तो है यह है श्रेया, कि मैंने भी खुद को नहीं देखा।"

श्रेया झुकी और मैंने उसके माथे को चूमा, उसके पतले, कमज़ोर शरीर को अपने पास समेटा। उसकी खुशबू पुदीने जैसी थी। "मैं नहीं चाहती कि जब मैं चली जाऊं तो तुम यहां... इस दुनिया में अकेली रहो।" उसने अपने मुंह से मौत का बदबूदार स्वाद (उसके शब्द) दूर करने के लिए पुदीने की पत्तियों को चबाना शुरू कर दिया था। "तुम ने ही कहा था कि ‘अकेले रहना ठीक है, बस अकेलापन नहीं।’ मैं यहाँ अकेलेपन मेँ नहीं रहूंगी प्रिय श्रेया।"

"मुझे बुरा लग रहा है कि तुम दुखी हो, प्रियंका। मुझे इस बात से नफरत है।" उसने मेरा हाथ कसकर पकड़ लिया। "लेकिन मैं तुम्हें एक बात बताऊँगी जो मुझे पक्का पता है कि सच है। तुम्हारा परिवार तुमसे प्यार करता है। हो सकता है कि उन्होंने हाल ही अपनी हरकतों और बातों में इसे दिखाया न हो, लेकिन वे करते हैं।" यह अच्छी कल्पना थी। लेकिन मुझे नहीं लगता था कि यह सच है। मैं रोमांचित थी कि नीलिमा आ रही थी, लेकिन यह सिर्फ उसके अपराध बोध के कारण था। मैं यह जानती थी और मुझे इसकी परवाह नहीं थी। मैं किसी भी कारण से अपने बच्चे को अपने साथ चाहती थी। शाश्वत ने तो मुझसे संपर्क करने की भी जहमत नहीं उठाई थी। और फिर अंशुमन का फोन पर व्यवहार भी तो एक संकेत था।

"जब वे छोटे थे, बच्चे भी और अंशुमन भी, तब उन्हें मेरी ज़रूरत थी, ताकि वह काम कर सकें, और मैं घर की देखभाल करूँ।" मैंने एक अच्छी माँ और पत्नी बनने के लिए बहुत मेहनत की थी। और इस सबके बाद, मैं यहाँ, अड़तीस साल की उम्र मेँ अकेली थी। "अब, उनका अपना जीवन है। मैं यह समझती हूँ। मैं बस यही चाहती हूँ कि वे मुझे चाहते, भले ही उन्हें मेरी ज़रूरत न हो, फिर भी वे मुझे मेरे लिए चाहते, प्यार करते, सम्मान करते।" मैंने डॉ. मिश्रा से इस बारे में अक्सर बात की थी, कि कैसे मैं अक्सर एक पत्नी, माँ और वेश्या की तरह महसूस करती हूँ, जिसकी अपनी कोई निजता नहीं है। वहाँ कोई प्रियंका नहीं थी, बस उसके अलग-अलग अवतार थे जो परिवार की सेवा करते थे।

श्रेया की सांसें धीमी हो गई, और मैं समझ गई कि वह सो गई है। मैंने उसके सिर को कुशन पर इस तरह से एडजस्ट किया कि वह आराम कर सके। वह बड़े सोफे पर छोटी सी लग रही थी। मैंने उसके ऊपर एक कंबल डाला और उसे सोने के लिए छोड़ दिया, जबकि मैंने अपने ओवन की जाँच की और एक नए अवतार में आ गई। एक रिज़ॉर्ट की मालकिन- प्रियंका सिंह, जो खाना बनाना, साफ-सफाई करना और एक बेहतरीन परिचारिका बनना जानती थी - लेकिन इस बार, इस सब की सराहना होती थी। इस बार मैं यह सब अपने लिए कर रही थी, और यह एक आज़ादी जैसा था।