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बुधवार, 8 मई 2013

महादानी तेजस्वी सूर्यपुत्र कर्ण का जीवन इतना त्रासदियुक्त क्यों रहा ?

कई लोग कई जगह कई बार यह प्रश्न  हैं कि महाभारत  में कर्ण जैसे "हीरो" का जीवन इतना दुखद क्यों ? सूर्यपुत्र और ओजस्वी होकर भी उसे हमेशा सूतपुत्र पुकारा गया , माँ ने टोकरी में रख कर बहा दिया आदि आदि । (वैसे तो इसी तरह के प्रश्न भीष्म और धृतराष्ट्र के सम्बन्ध में भी उठते हैं - लेकिन उन पर बात कभी और सही) । इस प्रश्न का उत्तर श्री भागवतम में मिलता है ।

चार युग हैं : 

त्रेता युग में दो कहानियों के तार कर्ण से आ कर जुड़ते हैं । 

एक असुर था - दम्बोद्भव । उसने सूर्यदेव की बड़ी तपस्या की । सूर्य देव जब प्रसन्न हो कर प्रकट हुए और वरदान मांगने को कहा तो उसने "अमरत्व" का वरदान माँगा  । सूर्यदेव ने कहा यह संभव  नहीं है। तब उसने माँगा कि उसे एक हज़ार दिव्य कवचों की सुरक्षा मिले। इनमे से एक भी कवच सिर्फ वही तोड़ सके जिसने एक हज़ार वर्ष तपस्या की हो और जैसे ही कोई एक भी कवच को तोड़े, वह तुरंत मृत्यु को प्राप्त हो । 

सूर्यदेवता बड़े चिंतित हुए। वे इतना तो समझ ही पा रहे थे कि यह असुर इस वरदान का दुरपयोग करेगा, किन्तु उसकी तपस्या के आगे वे  मजबूर थे।उन्हे उसे यह वरदान देना ही पडा । 
इन कवचों से सुरक्षित होने के बाद वही हुआ जिसका सूर्यदेव को डर था । दम्बोद्भव अपने सहस्र कवचों की सहक्ति से अपने आप को अमर मान कर मनचाहे अत्याचार करने लगा । वह "सहस्र कवच" नाम से जाना जाने लगा  । 

उधर सती जी के पिता "दक्ष प्रजापति" ने अपनी पुत्री "मूर्ति" का विवाह ब्रह्मा जी के मानस पुत्र "धर्म" से किया । मूर्ति ने सहस्र्कवच के बारे में सुना  हुआ था - और उन्होंने श्री विष्णु से प्रार्थना की कि  इसे ख़त्म करने के लिए वे आयें । विष्णु जी ने उसे आश्वासन दिया कि वे ऐसा करेंगे ।  

समयक्रम में मूर्ति ने दो जुडवा पुत्रों को जन्म दिया जिनके नाम हुए नर और नारायण । दोनों दो शरीरों में होते हुए भी एक थे - दो शरीरों में एक आत्मा । विष्णु जी ने एक साथ दो शरीरों में नर और नारायण के रूप में अवतरण किया था । 

दोनों भाई बड़े हुए । एक बार दम्बोध्भव इस वन पर चढ़ आया । तब उसने  एक तेजस्वी मनुष्य को अपनी ओर आते देखा और भय का अनुभव किया । 

उस व्यक्ति ने कहा कि मैं "नर" हूँ , और तुमसे युद्ध करने आया हूँ । भय होते भी  दम्बोद्भव ने हंस कर कहा -  तुम मेरे बारे में जानते ही क्या हो ?  मेरा कवच सिर्फ वही तोड़ सकता है जिसने हज़ार वर्षों तक तप किया हो । 

नर ने हंस कर कहा कि मैं और मेरा भाई नारायण एक ही हैं - वह मेरे बदले तप कर रहे हैं, और मैं उनके बदले युद्ध कर रहा हूँ । 

युद्ध शुरू हुआ , और सहस्र कवच को आश्चर्य होता रहा कि सच ही में नारायण के तप से नर की शक्ति बढती चली जा रही थी ।  जैसे ही हज़ार वर्ष का समय  पूर्ण हुआ,नर ने सहस्र कवच का एक कवच तोड़ दिया । लेकिन सूर्य के वरदान के अनुसार जैसे ही कवच टूटा नर मृत हो कर वहीँ  गिर पड़े । सहस्र कवच ने सोचा, कि चलो एक कवच गया ही सही किन्तु यह तो मर ही गया । 

तभी उसने देखा की नर उसकी और दौड़े आ रहा है - और वह चकित हो गया । अभी ही तो उसके सामने नर की मृत्यु हुई थी और अभी ही यही जीवित हो मेरी और कैसे दौड़ा  आ रहा है ???

लेकिन फिर उसने देखा कि नर तो मृत पड़े हुए थे, यह तो हुबहु नर जैसे प्रतीत होते उनके भाई नारायण थे - जो दम्बोद्भव की और नहीं, बल्कि अपने भाई नर की और दौड़ रहे थे  । 

दम्बोद्भव ने अट्टहास करते हुए नारायण से कहा कि तुम्हे अपने भाई को समझाना चाहिए था - इसने अपने प्राण व्यर्थ ही गँवा दिए । 

नारायण शांतिपूर्वक मुस्कुराए । उन्होंने नर के पास बैठ कर कोई मन्त्र पढ़ा और चमत्कारिक रूप से नर उठ बैठे  । तब दम्बोद्भव की समझ में आया कि हज़ार वर्ष तक शिवजी की तपस्या करने से नारायण को मृत्युंजय मन्त्र की सिद्धि हुई है - जिससे वे अपने भाई को पुनर्जीवित कर सकते हैं । 

अब इस बार नारायण ने दम्बोद्भव को ललकारा और नर तपस्या में बैठे । हज़ार साल के युद्ध और तपस्या के बाद फिर एक कवच टूटा और नारायण की मृत्यु हो गयी । 

फिर नर ने आकर नारायण को पुनर्जीवित कर दिया, और यह चक्र फिर फिर चलता रहा । 

इस तरह ९९९ बार युद्ध हुआ । एक भाई युद्ध करता दूसरा तपस्या । हर बार पहले की मृत्यु पर दूसरा उसे पुनर्जीवित कर देता । 

जब 999  कवच टूट गए तो सहस्र्कवच समझ गया कि अब मेरी मृत्यु हो जायेगी । तब वह युद्ध त्याग कर सूर्यलोक भाग कर सूर्यदेव के शरणागत हुआ । 

नर और नारायण उसका पीछा करते वहां आये और सूर्यदेव से उसे सौंपने को कहा  । किन्तु अपने भक्त को सौंपने पर सूर्यदेव राजी न हुए। तब नारायण ने अपने कमंडल से जल लेकर सूर्यदेव को श्राप दिया कि आप इस असुर को उसके कर्मफल से बचाने का प्रयास कर रहे हैं, जिसके लिए आप भी इसके पापों के भागीदार हुए और आप भी इसके साथ जन्म लेंगे इसका कर्मफल भोगने के लिए । 

इसके साथ ही त्रेतायुग समाप्त हुआ और द्वापर का प्रारम्भ  हुआ । 

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 समय बाद कुंती जी ने अपने वरदान को जांचते हुए सूर्यदेव का आवाहन किया, और कर्ण का जन्म हुआ  । लेकिन यह आम तौर पर ज्ञात नहीं है, कि , कर्ण सिर्फ सूर्यपुत्र ही नहीं है, बल्कि उसके भीतर सूर्य और दम्बोद्भव दोनों हैं । जैसे नर और नारायण में दो शरीरों में एक आत्मा थी, उसी तरह कर्ण के एक शरीर में दो आत्माओं का वास है - सूर्य और सहस्रकवच ।  दूसरी ओर नर और नारायण इस बार अर्जुन और कृष्ण के रूप में आये । 

कर्ण के भीतर जो सूर्य का  अंश है,वही उसे तेजस्वी वीर बनाता है । जबकि उसके भीतर दम्बोद्भव भी होने से उसके कर्मफल उसे अनेकानेक अन्याय और अपमान मिलते है, और उसे द्रौपदी का अपमान और ऐसे ही अनेक अपकर्म करने को प्रेरित करता है ।  

यदि अर्जुन कर्ण का कवच तोड़ता, तो तुरंत ही उसकी मृत्यु हो  जाती ।इसिलिये इंद्र उससे उसका कवच पहले ही मांग ले गए थे । 

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एक और प्रश्न जो लोग अक्सर उठाते हैं - श्री कृष्ण ने (इंद्रपुत्र) अर्जुन का साथ देते हुए (सूर्यपुत्र) कर्ण को धोखे से क्यों मरवाया ?
..... कहते हैं कि श्री राम अवतार में श्री राम ने (सूर्यपुत्र) सुग्रीव से मिल कर (इंद्रपुत्र) बाली का वध किया था (वध किया था , धोखा नहीं । जब किसी अपराधी को जज मृत्युदंड की सजा देते हैं तो उसे सामने से मारते नहीं - यह कोई धोखे से मारना नहीं होता)- सो इस बार उल्टा हुआ । 
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यह कथा कर्ण के सम्बन्ध में थी - फिर कभी ऐसी ही दूसरी कथाओं पर बात होगी । 

गुरुवार, 28 फ़रवरी 2013

माता पिता, बच्चे , और दादाजी


यह कहानी मेरी नहीं, कई बार पढ़ी होगी आपने ..... एक बार और सही ....

एक घर में माता पिता ,  उनके दो बच्चे ,  और दादाजी रहते थे ।

दादाजी की उम्र बहुत हो गयी थी, और उनके हाथ कांपते थे । कभी हाथ से चम्मच गिर जाते, कभी दूध के ग्लास से दूध फ़ैल जाता । पति पत्नी आये दिन की परेशानी से तंग आ गये थे ।

एक दिन उन्होंने सोचा कि बहुत हो गया । यह रोज़ रोज़ खाने के बीच का खलल, बीच में रुक कर सफाई - यह सब कितने दिन चलेगा ? तो उन्होंने दादाजी के लिए कोने में एक दूसरी मेज का इंतज़ाम कर दिया । चीनी के बर्तन टूटने से बचाने के लिए उन्हें लकड़ी का बर्तन मिलता भोजन के लिए । 

बेचारे दादाजी - क्या करते ? किसीसे कुछ कहते नहीं थे, बस चुप से अपने कोने में बैठ कर भोजन करते । जब जब कुछ गिरता , बेटे बहु की क्रोधित बातें भी सुनते और चुप चाप खाते रहते । 

कुछ दिन गुज़रे , पोता बड़ा हो चला था । एक दिन पोता गराज में लकड़ी से कुछ बना रहा था - बड़े जतन से । माँ ने - पूछा बेटा - क्या बना रहे हो ? -जवाब आया  लकड़ी के बर्तन बना रहा हूँ । जब आप दोनों दादाजी जैसे बूढ़े हो जायेंगे ......

फिर ?
फिर क्या - पति पत्नी की आँख खुल गयी - अगले ही दिन बेटे ने बूढ़े पिता को बड़े प्रेम से अपने साथ बिठाया और बुजुर्ग व्यक्ति उस दिन से पूरे प्रेम के साथ बाकी परिवार के साथ बैठने लगे । 

क्या हम भी अपने लकड़ी के बर्तनों का इंतज़ार कर रहे हैं ?  या हम अपने पिताजी के कांपते हाथों को थामने को तैयार हैं ?

गुरुवार, 9 फ़रवरी 2012

खूब पर्दा है


पुनः प्रस्तुति
ब्लॉग की शुरुआत में यह लिखा था, एक बार फिर से प्रस्तुत है ,

खूब पर्दा है - कि चिलमन से लगे बैठे हैं
              साफ़ छुपते भी नहीं - नज़र आते भी नहीं .......

कभी कहीं पढ़ा था - तो ठीक से तो याद नहीं है कि क्या शब्द थे - पर अर्थ कुछ कुछ ऐसा ही निकल कर आता था. आजकल हमारी दोस्तियाँ भी इसी तरह हो गयी हैं - इन्टरनेट पर ही बातें शातें हुआ करती हैं - वह भी कोई टाइप करने की ज़हमत कभी कभार ही उठता है - ज्यादा तर तो मेल फॉरवर्ड ही करी जाती हैं .

एक परसन  को एक ग्रुप से मेल मिलती हैं - और वोही दूसरे दोस्तों को फॉरवर्ड कर दी जाती है - हाँ , इन्बोक्स में एक दूसरे के नाम बराबर दिखाई पड़ते रहते हैं - तो दूरी का एहसास नहीं होता - नज़र से आते रहते हैं - पर वह पुरानी  दोस्ती कहीं गुम सी हो जाती है - मन की बातों कि शेअरिंग तो अब जैसे होती ही नहीं - ..

ज़िन्दगी इतनी तेज़ दौडती है - कि कोई किसीसे बैठ कर बातें नहीं करता - वैसे इन्टरनेट की मेल सिस्टम में ऐसा कोई रूल तो है नहीं - कि आप अपने दोस्त को चिट्ठी नहीं लिख सकते. बल्कि , उसमे तो घर बैठ कर चैटिंग की भी चोईस है हमें - लेकिन हम अपनी ज़िन्दगी में इतने मसरूफ रहते हैं - कि टाइम ही नहीं है किसीको लम्बी चिट्ठी लिखने का - न ही बैठ कर बातें करने का . वही दोस्त जो पहले घंटो साथ गुज़ार देते हैं - यदि इंटर नेट पर दिख भी जाएँ कभी ऑनलाइन - तो एक छोटी सी हाई आपस में एक्स्चंज  करने के बाद - दोनों ही इंविसिबल  हो जाते हैं .. ....पहले लोग एक लाइन कि चिट्ठी तब लिखते थे जब कोई बुरा समाचार सुनाना हो - या कि किसी चीज़ की बधाइयाँ देनी हो - पर अब तो बातें ऐसे होती हैं -

"हाई - हाई , हाउ आर यू? और सुना - जीजाजी कैसे हैं? - बेटा ठीक  से पढ़ रहा है?  - - हाँ यार, सच में , आजकल पहले जैसी पढाई कहाँ !! -------- ओके - सी यू लेटर यार - बाय ///

और एक दूसरे के घर जा कर बैठ के बातें करने का चलन तो तब ही रुक गया था - जब टीवी आया था - अब तो हम पड़ोस के घर की खुशियों और तकलीफों से ज्यादा - टीवी के सीरिअलों के परिवारों के किरदारों के करीब महसूस करते हैं!! पड़ोस में कोई बीमार है  - तो हमें एक दिन एक बार मिलने जाने का टाइम निकालना मुश्किल होता है  - पर हाँ - टीवी सीरियल की हेरोइन अगर बीमार है  - तो हम पूरे पूरे हफ्ते उसके साथ रोज़ आधा घंटा गुज़र सकते हैं.... यह कहाँ आ गए हैं हम?

एक कहानी  याद आती  है यहाँ - एक मेल में ही पढ़ी थी - एक बच्चा अपनी माँ से पूछता है माँ , आपकी एक घंटे  की आमदनी कितनी है ? माँ ऑफिस  से थक कर आई है - काम निबटाने हैं - खाना पकाना है - फिर उसी बेटे का होमवर्क करवाना है -आखिर बच्चे के फ्यूचर के लिए भी तो माँए वरीड रहती हैं न !!!! तो माँ  काम के टेंशन में बच्चे के कणटिनयस क़्योएस्चन्स से चिढ कर उसे जोर से डांटती है - क्यों परेशान कर रहा है - दिखता नहीं - काम कर रही हूँ.. पर बच्चा नहीं मानता  - पूछता ही रहता है . आखिर  माँ कहती है - २००   रुपये. तब बच्चा कुछ परेशान सा हो जाता है - और चला जाता है वहां से .. तीन चार हफ्ते गुज़र जाते हैं - बच्चा फिर माँ के पास आता है - माँ फिर बिजी है - हमेशा के ही तरह - फिर चिढ जाती है.. तब बच्चा माँ को १०० रुपये देता है - उसके पास एक १०० का नोट भी नहीं - कभी कही कभी कही से बचाए - २ रुपये - पांच रुपये, दस रुपये , बीस रुपये के नोट हैं - कुल ९७ ही हो पाए हैं  - पर यदि १०० पूरे करने हों - तो एक हफ्ते और रुकना होगा - ...... तो बच्चा माँ को १०० रुपये दे कर कहता है - माँ - क्या अब आप आधा घंटा मेरे साथ बिता सकती हैं? ( बाकि ३ रुपये उधार  हैं ) तब   माँ को रीअलैज़ होता है - कि मैं अपने बच्चे का फ्यूचर बनाने में इतनी बिजी हूँ - कि उसका प्रेजेंट ख़राब हो रहा है - और मुझे पता तक नहीं चला -

तो शायद हम सबको सोचने के ज़रुरत है - कही हम भी - अनजाने ही सही - चिलमन से लगे तो नहीं बैठे - कि अपने अपनों को - साफ़ छुपते भी नहीं हों - और नज़र आते भी नहीं हो??

खैर , आज बस इतना ही .. ये तो कुछ ज्यादा ही लम्बी बात खिच गयी .. शायद सीरियल का टाइम  हो गया होगा - तो आप भी सीरियल देखें - मैं भी टीवी ऑन  करूँ - पर शायद - यदि किसी नेबर को ज़रुरत हो - या किसी पुराने दोस्त को,- या कि हमारे  बेटे / बेटी को कुछ  बात करनी हो - तो शायद टीवी सीरियल को छोड़ कर - उसके लिए वक़्त निकलना अच्छा हो.....

फिर मिलेंगे ...

बुधवार, 28 दिसंबर 2011

Does God Exist? - Christian story .... nice .....


The Atheist and the Bear

An atheist (one who does not beleive in God) was taking a walk through the woods. 'What majestic trees! What powerful rivers! What beautiful animals!', he said to himself. 
As he continued walking alongside the river he heard a rustling in the bushes. Turning to look, he saw a 7 foot grizzly charging towards him. 
He ran as fast as he could up the path. Looking over his shoulder he saw that the bear was closing in on him. His heart was pumping frantically and he tried to run even faster. 
He tripped and fell on the ground. He rolled over to pick himself up but saw the bear raising his paw to take a swipe at him.
At that instant the atheist cried out: 'Oh my God!...'
Time stopped.
The bear froze.
The forest was silent.
It was then that a bright light shone upon the man and a voice came out of the sky saying:
'You deny my existence for all of these years, teach others I don't exist and even credit creation to a cosmic accident.  Do you expect me to help you out of this predicament? Am I to count you as a believer?'
The atheist looked directly into the light.
'It would be hypocritical of me to suddenly ask you to treat me as a Christian now, but perhaps, could you make the BEAR a Christian?'
'Very well, 'said the voice. The light went out, and the sounds of the forest resumed.
And then the bear lowered his paw, bowed his head and spoke: 'Lord, bless this food which I am about to receive and for which I am truly thankful, Amen.'
............. courtesy - will and guy ....

सोमवार, 28 नवंबर 2011

राम, हनुमान केले का पत्ता - अद्वैतवाद एवं द्वैतवाद



आजकल "अद्वैतवाद" और "द्वैतवाद" पर बड़ा वाद विवाद होता रहता है | [[[कोई लोग तो कहते हैं कि ईश्वर हैं ही नहीं, तो वे इस वाद विवाद का हिस्सा नहीं हैं | ]]]  तो दूसरी ओर, जो मानते भी हैं कि ईश्वर हैं - वे भी दो तरह के हैं | एक वे जो मानते हैं कि ईश्वर एक अलग एंटिटी " परमात्मा " हैं और हम "जीवात्माएं" अलग जो उन्हें पूजें आदि ; और दूसरे वे जो मानते हैं कि "अहम् ब्रह्मास्मि" अर्थात - जब मैं अपने ज्ञान पर पड़े परदे से मुक्त हो जाऊंगा - तो मैं ही "ब्रह्म" हो जाऊंगा | मैं कोई व्यक्तिगत राय नहीं दे रही इस बारे में - दोनों ही दर्शन अपनी जगह सही हो सकते हैं | पर यहाँ इस जगह यह कहानी इस सिलसिले में सुनने में आती है | भूमिका यह है कि जहाँ हम रहते हैं, यह वह जगह है जहाँ किष्किन्धा थी - तो यह हनुमान जी की भूमि है - यहाँ वे "आंजनेय " नाम से अधिक जाने जाते हैं - उनकी माँ अंजना के नाम से ... तो कहानी कुछ यूँ है ....

जब रावण की सेना को हरा कर और सीता जी को लेकर श्री राम चन्द्र जी वापस अयोध्या पहुंचे - तो वहां उन सब के लौटने की ख़ुशी में एक बड़े भोज का आयोजन हुआ | वानर सेना के सभी लोग भी आमंत्रित थे - और बेचारे सब ठहरे वानर ही न ? तो सुग्रीव जी ने उन सब को खूब समझाया - देखो - यहाँ हम मेहमान हैं और प्रभु के गाँव के लोग हमारे मेजबान | तुम सब यहाँ खूब अच्छे से पेश आना - हम वानर जाती वालों को लोग शिष्टाचार विहीन न समझें, इस बात का ध्यान रखना | 

वानर भी अपनी जाती का मान रखने के लिए तत्पर थे, किन्तु एक वानर आगे आया और हाथ जोड़ कर श्री सुग्रीव से कहने लगा " प्रभो - हम प्रयास तो करेंगे कि अपना आचार अच्छा रखें, किन्तु हम ठहरे बन्दर | कहीं भूल चूक भी हो सकती है - तो अयोध्या वासियों के आगे हमारी अच्छी छवि रहे - इसके लिए मैं प्रार्थना करता हूँ कि आप किसी को हमारा अगुवा बना दें, जो न सिर्फ हमें मार्गदर्शन देता रहे, बल्कि हमारे बैठने आदि का प्रबंध भी सुचारू रूप से चलाये, कि कही इसी चीज़ के लिए वानर आपस में लड़ने भिड़ने लगें तो हमारी छवि धूमिल होगी |"

अब वानरों में सबसे ज्ञानी, व श्री राम के सर्वप्रिय तो हनुमान ही माने जाते थे - तो यह जिम्मेदारी भी उन पर आई |

भोज के दिन श्री हनुमान सबके बैठने वगैरह का इंतज़ाम करते रहे , और सब को ठीक से बैठने के बाद श्री राम के समीप पहुंचे, तो श्री राम के उन्हें बड़े प्रेम से कहा कि तुम भी मेरे साथ ही बैठ कर भोजन करो  | अब हनुमान पशोपेश में आ गए | उनकी योजना में प्रभु के बराबर बैठना तो था ही नहीं - वे तो अपने प्रभु के जीमने के बाद ही प्रसाद के रूप में भोजन ग्रहण करने वाले थे | न तो उनके लिए बैठने की जगह ही थी ना ही केले का पत्ता (अपने हिंदी भाषी साथियों को बताना चाहूंगी - जैसे उत्तर भारत में पत्तलों में भोज परोसे जाने का रिवाज़ है - उसी तरह यहाँ केले के पत्तों में भोजन परोसा जाता है उत्सवों में और भोजों में |)

तो हनुमान बेचारे पशोपेश में थे - ना प्रभु की आज्ञा ताली जाए, ना उनके साथ खाया जाए | प्रभु तो भक्त के मन की बात जानते हैं ना ? तो वे जान गए कि मेरे हनुमान के लिए केले का पत्ता नहीं है , ना स्थान है | उन्होंने अपनी कृपा से अपने से लगता हनुमान के बैठने जितना स्थान बढ़ा दिया (जिन्होंने इतने बड़े संसार की रचना की हो - वे कर सकते हैं ज़रा से और स्थान की रचना ) | लेकिन प्रभु ने एक और केले का पत्ता नहीं बनाया |

उन्होंने कहा " हे मेरे प्रिय अति प्रिय छोटे भाई या पुत्र की तरह प्रिय हनुमान | यूं मेरे साथ मेरी ही थाली (केले का पत्ता) में भोजन करो | क्योंकि भक्त और भगवान एक हैं - तो कोई हनुमान को भी पूजे तो मुझे ही प्राप्त करेगा (यह ऐक्वाद का शब्द है) |"

इस पर श्री हनुमान जी बोले - "हे प्रभु - आप मुझे कितने ही अपने बराबर बताएं, मैं कभी आप नहीं होऊँगा, ना तो कभी हो सकता हूँ - ना ही होने की अभिलाषा है | (यह है द्वैतवाद) - मैं सदा सर्वदा से आपका सेवक हूँ, और रहूँगा - आपके चरणों में ही मेरा स्थान था - और रहेगा | तो मैं आपकी थाल में से खा ही नहीं सकता | "

तब श्री राम ने अपने सीधे हाथ की मध्यमा अंगुली से ( मिडल फिंगेर ऑफ़ द राईट हैंड ) केले के पत्ते के मध्य में एक रेखा खींच दी - जिससे वह पत्ता एक भी रहा और दो भी हो गया | एक भाग में प्रभु ने भोजन किया -और दूसरे अर्ध में हनुमान को कराया | तो जीवात्मा और परमात्मा के ऐक्य और द्वैत दोनों के चिन्ह के रूप में केले के पत्ते आज भी एक होते हुए भी दो हैं - और दो होते हुए भी एक है |
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राम कथा - गिलहरी, राम सेतु के डूबते पत्थर


(1) गिलहरी की पीठ पर धारियां देखीं आपने?

इनके बारे में एक बड़ी ही प्यारी कहानी सुनी है मैंने - आप में से कुछ लोगों ने शायद सुनी होगी - पर यहाँ शेयर करने को जी चाहा मेरा ... तो कहानी पेश है -

जब श्री राम अपनी पत्नी व अनुज के साथ वन वास पर थे - तो रास्ते चलते हर तरह के धरातल पर पैर पड़ते रहे - कहीं नर्म घास भी होती, कहीं कठोर धरती भी, कही कांटे भी | ऐसे ही चलते हुए श्री राम का पैर एक नन्ही सी गिलहरी पर पडा - और वे ना जान पाए कि ऐसा हुआ है (यह सिर्फ एक कहानी है - हकीकत में तो प्रभु को कोई बात पता ना चले - यह संभव ही नहीं है | ) श्री राम के चरणों को कठोर धरती की अपेक्षा मखमली सी अनुभूति हुई - तो उन्होने एक पल को अपना चरण टेके रखा - फिर नीचे की ओर देखा तो चौंक पड़े | 

उन्हें दुःख हुआ कि इस छोटी सी गिलहरी को मेरे वजन से कितना दर्द महसूस हुआ होगा | उन्होंने उस नन्ही गिलहरी को उठा कर प्यार किया और बोले - अरे - मेरा पाँव तुझ पर पड़ा - तुझे कितना दर्द हुआ होगा ना?

गिलहरी ने कहा - प्रभु - आपके चरण कमलों के दर्शन कितने दुर्लभ हैं - संत महात्मा इन चरणों की पूजा करते नहीं थकते - मेरा सौभाग्य है कि मुझे इन चरणों की सेवा का एक पल मिला - इन्हें इस कठोर राह से एक पल का आराम मैं दे सकी |  [**********इस से याद आया -- अगली कहानी प्रभु चरणकमल , कछुए, केवट और सुदामा की होगी ****************]

प्रभु ने कहा - फिर भी - दर्द तो हुआ होगा ना ? तू चिल्लाई क्यों नहीं ?

गिलहरी बोली - प्रभु , कोई और मुझ पर पाँव रखता, तो मैं चीखती "हे राम!! राम राम !!! " , किन्तु , जब आप का ही पैर मुझ पर पडा - तो मैं किसे पुकारती? 

श्री राम ने गिलहरी की पीठ पर बड़े प्यार से उंगलिया फेरीं - जिससे उसे दर्द में आराम मिले | अब वह इतनी नन्ही है कि तीन ही उंगलियाँ फिर सकीं | तब से गिलहरियों के शरीर पर श्री राम की उँगलियों के निशान होते हैं | {{ अब यह मुझसे न पूछियेगा अद्वैतवाद वाली पोस्ट की तरह , कि क्या इससे पहले गिलहरियों की पीठ पर धारियां न थीं :) , क्योंकि यह एक कहानी है, और राम जी ने यह रेखाएं सृष्टि के आरम्भ में खींची या अब, इससे कोई फर्क पड़ता भी नहीं | उसी तरह वहां भी फर्क नहीं पड़ता कि केले के पत्ते के बीच की धारी सृष्टि के आरम्भ में बनाई गयी, या उस वक़्त :)  वैसे सुना है कि भारत के अलावा दूसरे देशों की गिलहरियों में यह धारियां नहीं मिलतीं ?}}
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श्री राम सेतु और डूबते पत्थर .........

जब श्री राम की वानर सेना लंका जाने के लिए सेतु बना रही थी, तब का एक वाकया है ...

श्री राम का नाम लिख कर वानर भारी भारी पत्थरों को समुद्र में डालते - और वे पत्थर डूबते नहीं - तैरने लगते | श्री राम ने सोचा कि मैं भी मदद करूँ - ये लोग मेरे लिए इतना परिश्रम कर रहे हैं | तो प्रभु ने भी एक पत्थर को पानी में छोड़ा | लेकिन वह तैरा नहीं , डूब गया | फिर से उन्होंने एक और पत्थर छोड़ा - यह भी डूब गया | यही हाल अगले कई पत्थरों का भी हुआ | प्रभु ने हैरान हो कर किसी से पूछा (मुझे याद नहीं किससे - यदि आपमें से किसी को पता हो तो बताएं ) - तो सेवक ने जवाब दिया :

" हे प्रभु | आप इस जगत रुपी भवसागर के तारणहार हैं | आपके "नाम" के सहारे कोई कितना भी बड़ा और (पाप के बोझ से) भारी पत्थर हो, वह भी इस भवसागर पर तैर कर तर जाएगा | किन्तु प्रभु - जिसे आप ही छोड़ दें - वह तो डूब ही जाएगा ना?"

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क्रोध और पश्चाताप


इस पोस्ट से मैं पश्चात्ताप की महिमा को कम नहीं बता रही, बल्कि यह कह रही हूँ की बाद में पश्चात्ताप करने से बहुत बेहतर है पहले ही गुस्से पर काबू रखना | that prevention is better than cure ...

तो हुआ यूँ की एक बच्चे को बहुत गुस्सा आता था -वह खुद पर काबू न रख पाता था | बाद में शांत भी हो जाता - किन्तु गुस्सा करते वक्त सब भला बुरा भूल जाता |

एक दिन उसके पिता ने उसे कहा की बाहर की fencing (लकड़ी की होती हैं ) वह पेंट करे इस बार - तो उसे इनाम मिलेगा - बच्चे ने ख़ुशी ख़ुशी कर दी |

अब यह fence  बहुत सुन्दर लग रही थी |

पिता ने कहा - बेटे - यह मैं तुन्हें कीलों का एक डब्बा और एक हथौड़ी देता हूँ - जब जब तुम्हे बहुत गुस्सा आये - तब इस दीवार को ही अपना शत्रु समझना और इस पर एक कील ठोंक देना - एक महीने तक यही करते रहना |

बच्चे ने यही किया - और कहने की ज़रुरत नहीं की महीने भर बाद वह दीवार बहुत बुरी स्थिति में थी :(

अब बच्चा समझने लगा की क्रोध से खूबसूरत चीज़ें भी कुरूप दिखने लगती हैं - और क्रोध जब उन चीज़ों पर हम बरसाते हैं, तो वे आहत होती हैं, और धीरे धीरे वाकई बदसूरत होने लगती हैं |

उसने पिता से कहा की अब मैं समझ रहा हूँ - अब क्या करूँ - यह दीवार तो बहुत ही खराब लगने लगी है ?

पिता बोले - ठीक है बेटा - यदि तुम पछता रहे हो - तो अब से क्रोध में आकर कीले न ठोकना |

बेटा बोला -परन्तु दीवार तो फिर भी ऐसे ही रहेगी न ?

पिता बोले - तो ठीक है - जब तुम किसी पर क्रोध करो - और समझने के बाद पछताओ - माफ़ी मांगो - तब एक कील उखड लेना |

बच्चा यह भी करने लगा - और करते हुए उसे समझ में आया की क्रोध में कील ठोंक देना तो बहुत आसान है - पर उस गाड़ी हुई कील को पछतावे के कारण बाद में उखाड़ फेंकना (अर्थात माफ़ी माँगना, और फिर माफ़ी मिल पाना ) उससे कई गुना अधिक कठिन है |

फिर भी ५-६ महीनों में (क्योंकि अब उसमे अपने क्रोध पर अधिक काबू था - तो क्रोध की पुनरावृत्ति घट गयी थी - जितनी कीलें उसने सिर्फ एक महीने में ही ठोंक दी थीं, उतने बार क्रोध और माफ़ी होते हुए अब ज्यादा समय लगा) धीरे धीरे - पछतावे और कील निकलने की मेहनत के चलते - उस दीवार से सब कीलें निकल गयी थीं |

जब दीवार पूरी साफ़ हो गयी - तब बच्चा फिर से पिता को बुला कर बोला - यह दीवार कीलें निकलने से बेहतर तो हो गयी है - परन्तु यह पहले जैसी नहीं है |

पिता बोले - हाँ बेटा - the nails you hammer in in a fit of anger go in very deep without effort ... but repenting and taking them out (asking for and receiving forgiveness ) is much more difficult. Even when they do come out, they leave behind scars, which remain as ugly reminders of the incident life long ...

यह दोहा सुना होगा आपने - 

रहिमन धागा प्रेम का, मत तोड़ो चटकाय,
टूटे से फिर ना जुड़े, जुड़े तो गांठ परि जाय।

फिर मिलेंगे ....

आलू और गुस्सा


एक किंडरगार्टन स्कूल में टीचर बच्चों को भावनाओं को सही दिशा देना सिखाना चाहती थी |

जैसा कि होता है -कुछ बच्चे शांत स्वभाव के थे, कुछ चंचल, कोई हँसते खिलखिलाते, तो कोई गुस्से वाले आदि | और बच्चों को गुस्सा आता है - तो हम जानते ही हैं कि कैसे होता है :)

तो टीचर जी ने बच्चों से कहा कि "अब से जब जब हमें किसी पर गुस्सा आये - हम अपनी कापी में अंकित करेंगे - और इस हफ्ते के अंत तक कापी में जो गिनती हो - उतने आलू सोमवार को एक थैले में रख कर कक्षा को लाने हैं | सब बच्चे मान गए [अक्सर टीचर की बात मानना काफी सरल होता है बच्चों के लिए - माता पिता की मानना भले ही कुछ कठिन हो :) ]  

तो जो खुशमिजाज स्वाभाव के बच्चे थे - उन्हें तो कुछ लाना ही न पड़ा - या अधिक से अधिक एक या दो आलू | पर जो गुस्से वाले बच्चे थे - उन्हें कई आलू लाने पड़े | 

टीचर ने कहा - अब सब बच्चे अपने अपने आलुओं को दिन भर उठा कर घूमेंगे | इन्हें बिलकुल नीचे नहीं रखना है | बच्चों के लिए तो यह खेल ही था - ख़ुशी ख़ुशी मान गए | जो गुस्से वाले बच्चे थे - वे खुश भी थे - कि अब मेरे पास एक "भारी हथियार" है | जो सताए - उसे डराने के लिए "क्रोध का भारी थैला" | पर आखिर बच्चे तो ठहरे छोटे (किंडरगार्टन ) और आलू भारी होते हैं काफी | जिसके पास आलू नहीं थे - वे शुरू में कुछ डरे हुए थे - कि कोई गुस्से वाला हमें आलू भरी थैली मार दे तो ? पर कोई दो घंटे गुज़रते गुज़रते आलुओं का भार उन बच्चों को महसूस होने लगा - जो कई लोगों से नाराज़ थे | पर जो एक दो लोगों से ही नाराज़ थे - उन्हें यह भार महसूस होने तक शाम हो चली थी | ये बच्चे घर गए तो खुश थे कि चलो - बोझ से पीछा छूटा ( अगले दिन फिर स्कूल में अपने अपने थैले सम्हालने हैं ) | थैलियाँ स्कूल में ही छूट गयीं |

अगले दिन फिर अपने अपने थैले उठाने थे | अब बच्चे पहले ही परेशान थे , क्योंकि पिछले दिन के अनुभव से जान चुके थे कि क्या परेशानी होगी |

तीसरे दिन भी ऐसा ही चला | चौथे दिन दोपहर होते होते कुछ आलुओं के ख़राब होने से कक्षा में दुर्गन्ध फैलने लगी | अब तो जो बच्चे गुस्सा न भी होते थे - वे भी परेशान - कि आलू उठाये भले ही किसी और ने हों - दुर्गन्ध तो सबको आती थी न ? किन्तु जिसकी थैली में जितने आलू - उसकी परेशानी उतनी अधिक - कि तीव्रता दुर्गन्ध की उसके पास ज्यादा होनी ही है न ?

अब बच्चे टीचर से पूछने लगे - इन आलुओं से कैसे पीछा छुड़ाया जाये ? टीचर ने कहा - जिससे तुम गुस्सा हो - उस पर से गुस्सा हटाओं - यदि उससे झगडा किया था गुस्से में - तो माफ़ी मांग कर दोस्ती करो - तब एक आलू निकाल कर फेंक सकते हो |

अब - पहली मुसीबत तो यह कि माफ़ करो - और ऊपर से उससे माफ़ी मांगो जिससे आप नाराज़ थे | Adjust होने में कुछ समय गया  और माफ़ी मांगने में कुछ और समय गया - पर आख़िरकार प्रोब्लम सोल्व हो ही गयी |

तो दोस्तों - जब क्रोध आये - तो ध्यान दे - कि हमारा क्रोध उसे तो पल भर को तकलीफ देता है जिसपर क्रोध है - पर वह वजन उठाये हमें हर वक़्त घूमना पड़ता है | जितना गुस्सा - उतना वजन | शुरुआत में लगता है - कि यह क्रोध एक "भारी हथियार" है - जिससे मैं दूसरों को डरा कर काबू कर सकूं - और दूसरों को भी कुछ डर लगता है शुरुआत में ( जिसके पास जितना भारी हथियार हो , उससे उतना ज्यादा डर ) ...... यह क्रोध अधिक समय तक लाद कर घूमे - तो सड़ने लगता है - सडांध उठती है - जो सिर्फ क्रोध करने वाले को ही नही - उसके आसपास चुप रहने वालों को भी महसूस होती है | ( उस दुर्गन्ध की शिद्दत भले ही अलग हो )|  तो - शायद बेहतर हो कि हम अपने क्रोध को समझें और उसे handle करना सीखें - उसे justify कर के सही साबित करने से वह सही हो जाएगा क्या ?

रविवार, 27 नवंबर 2011

जो तुम न लो, वह तुम्हारा नहीं होता



एक बार एक महात्मा को कोई बड़ी गालियाँ और अपशब्द बोल गया | पर वे परेशान न हुए - अपने काम में लगे रहे |
उस व्यक्ति के जाने के बाद महात्मा के क्रोधित शिष्य कहने लगे - वह आप पर इतना कह गया - और आपने न खुद कुछ किया न हमें कुछ कहने दिया | तब वे बोले - कोई तुम्हे कुछ उपहार दे, तुम उसे न लो - तो वह तुम्हारा नहीं होता, उसी के पास रह जाता है - चाहे वह रख ले , या फेंक दे - या किसी और को दे दे |

शाम को उसे उसके दोस्तोंने समझाया - और वह पछताने लगा | अगले दिन बड़ा लज्जित हो कर उनके पास पहुंचा - और माफ़ी मांगी | महात्मा बोले - माफ़ी किस बात की ? यह जो नदी बह रही है - यह कल यह नहीं थी जो आज है - पूरा पानी जा चुका है, नया पानी है - जो लगातार जाता जा रहा है | वैसे ही - तुम जो आज माफ़ी मांगने आये हो - वह व्यक्ति नहीं ही हो जो कल अपशब्द कह रहे थे - वह व्यक्ति अब नहीं है यहाँ | तुम अब एक दूसरे व्यक्ति हो | अब जो कर रहे हो - वही तुम हो |

यही है जीवन - बह जाने दो जो कल हुआ | आज में जियो |

रेशम का एक सूत



मैं ओशो को बहुत पढ़ती हूँ - सब कुछ तो समझ में नहीं आता - पर अच्छा लगता है पढ़ कर ... वैसे समझ में न आने जैसा तो वे कुछ कहते नहीं - बहुत ही सरल सीढ़ी बातें होती हैं -- इतनी सरल , कि हमारे घुमावदार विचारों में घुस पाना मुश्किल हो जाता है कभी कभी... कहीं पढ़ा कुछ .. अच्छा लगा - तो कही बैठा रह गया दिमाग में ..... और न लगा -तो कुछ बिगड़ा तो नहीं ही !! यूँ ही कुछ याद आ रही है - धुंधली सी एक कहानी याद - उसमे कहाँ कहाँ मूल कहानी है ... और कहाँ मेरे कुछ  विचार  गड्ड मड्ड हुए हैं - ये तो मैं नहीं कह सकती  - पर सब हैं उसी में समाविष्ट .....

उन्होंने कहा था - अन्धकार से भरी रात्रि में - प्रकाश कि एक किरण का होना भी सौभाग्य है - क्योंकि जो उस का अनुसरण करे - वह उसके स्रोत तक पहुँच ही जाएगा.....( पता नहीं ऐसा क्यों कहते हैं लोग कि - धर्मं का प्रकाश हो - अन्धकार का नाश हो ... किसका नाश करोगे? अन्धकार तो वह है - जो है ही नहीं - और जो नहीं ही हो - उसका नाश कैसे हो? अन्धकार तो प्रकाश का अभाव भर है न - यदि प्रकाश हो - एल छोटी सी दिए कि लौ भी जला दी जाए - तो अन्धकार तो होगा ही नहीं - तो नाश किसका करोगे? और यदि नहीं जलाई - तो अन्धकार घिर आना ही है - उसका फिर भी नाश हो ही नहीं सकता !!! )प्रकाश की एक किरण के सहारे - उसका स्त्रोत्र निश्चित रूप से तलाशा भी जा सकता है - और पाया भी...

अब आखिर जब हम किसीको ढूँढते हैं - तो दिख जाने पर - पाया हुआ मानते हैं .. पा  लेने कि परिभाषा क्या है हमारे लिए? देख ही लेना न? और देखना क्या है - कि उस स्त्रोत्र से चली प्रकाश के किरणें हमारी आँख में पड़ीं - यही है "दिखना" ......किसी और प्रकार से अनुभूति पा लेना .. कि किसीको सुन लिया - कि दुर्योधन ने तेरहवे वर्ष के अज्ञात वास के अंत में - अर्जुन के शंख को सुना - और कहा - कि मैंने पांडवों को पा लिया!!!! या की हम किसी खोजी कुत्ते को लेकर किसी को तलाशना चाहें - और उसे उसकी गंध मिल जाए - तो हम कहते हैं की पा लिया समझो अब तो !! तो निष्कर्ष ये - की अनुभूति - किसी भी प्रकार के ही हो सही - ही हमारे "पा लेने " कि व्याख्या है! पांच ज्ञानेंद्रियें हैं - द सेन्सेज  ऑफ़ साईट, हीअरिंग, स्मेल, टच, टेस्ट .. (देखना, सुनना सूंघना, छूना , आस्वादन कर लेना ) इनमे से किसी भी एक प्रकार की अनुभूति ही हमारी "पा लिया" कि परिभाषा है!!  किसीसे आप बरसों से न मिले - और उसकी आवाज़ सुन ली फ़ोन पर - तो पा लिया, या कि उसका पत्र मिला - पढ़ लिया - तो पा लिया .. या कि कंप्यूटर ऑन किया - इन्टरनेट लगाया .. मेल या चैट  पर पढ़ लिया - तो भी पा लिया ही लगता है.... मेरे निकट तम  मित्र - जिनसे मैं मिलती ही नहीं कभी - मेल पर ही लगता है कि बस - मिले ही हुए हैं!!!! अब समझ आती है ओशो कि वह बात - जो कि उनके किसी प्रकाशित पत्र में पढ़ी थी..... कि प्रकाश की एक किरण का भी होना सौभाग्य है - एक अन्धकार भरी रात्रि के लिए...

एक कहानी है - एक राजा ने किसी बात पर नाराज़ हो कर अपने मंत्री को एक ऊंची मीनार पर कैद करवा दिया - कैद क्या - धीमी मौत कि ही सज़ा थी .. कि उस गगन चुम्बी ईमारत पर न तो कोई उसे खाना ही पहुंचा सकता था - न ही भाग निकलने का कोई रास्ता था... जब उसे कैद करके मीनार के ओर ले जाया जा रहा था - तो वह परेशान नहीं था - मुस्कुरा रहा था .. पत्नी ने बहुत रोते हुए पुछा कि वह इतना खुश क्यों है? तो उसने कहा - यदि रेशम का एक अत्यंत ही पतला सूत भी मुझ तक पहुँचाया जा सके - तो मैं बाहर आ जाऊं - और इतना तो तुम कर ही सकोगी...

तो वह भी तो आखिर उस ही के पत्नी थी - इतने साल साथ गुज़ारे थे - समझदारी के कोई कमी न थी -- सोचने लगी .. सोचती रही - पर हल न मिला ... पर कहते हैं न - सफलता के लिए सिर्फ अपने दिमाग का भरोसा लिया जाए - यह ज़रूरी नहीं .. आजकल तो हम - बच्चों के होमेवर्क के लिए भी - गूगल से विकिपीडिया से या किसी और वेबसाइट से हेल्प ढूँढते हैं .. ज़रूरी यह है - कि हम जानें - कि हेल्प ढूँढनी   कहाँ है.... तो वो कुछ देर सोचती रही - नहीं सूझा - तो एक बुद्धिमान फ़कीर से पुछा - आखिर सोचने ही में समय ख़राब किया - तो पति वहां भूखा प्यासा उतने समय तक...... तो फ़कीर ने कहा - एक भृंग (कीड़ा, इन्सेक्ट) को लो - और उसकी मूछों पर शहद लगा कर , पाँव में रेशम का धागा बांध, ऊपर के ओर मुंह कर के - मीनार पर छोड़ दो.. ऐसा ही किया भी गया .... अब शहद के लोभ में वह भृंग रात भर चढ़ता रहा - और ऊपर पहुँच गया.. फिर क्या - रेशम के धागे से सूत का धागा पहुंचा -- उस से डोरी , डोरी से रस्सी - फिर उस से मोटा रस्सा ऊपर पहुँचाया गया .. और वह कैद से बाहर हो गया ...

इसीलिए ... सूर्य को पाना हो - तो प्रकाश के एक किरण ही बहुत है - कि वह उसी का एक विस्तार है -- कि जिसने किरण को पाया - उसने सूर्य को पाने का उपाय पा लिया ... सूर्य को पाने के लिए सूर्य को पकड़ना थोड़े ही ज़रूरी है!!!! हमारे भीतर जो जीवन है - वह इश्वर की किरण है - और जो बोध है - बुद्धत्व की बूँद है - जो आनंद है - वह सच्चिदानंद की झलक है ....

तो - अगली बार मिलने तक ... सायोनारा , दसविदानिया ....

काम वाली बाई

हमारे घर में झाड़ू पोछा और बर्तन करने एक काम वाली बाई आती है... अमूमन ज्यादातर भारतीय मध्यम वर्गीय परिवारों में ऐसी कोई न कोई मालती, चंपा, कस्तूरी , लक्ष्मी होती ही है... ज्यादातर की कहानी भी एक सी ही होती है ... वही गरीबी, वही मजबूरी, वही सपने... तो मैं आज उसकी कहानी कहती हूँ... नाम नहीं लूंगी ....वैसे नाम से कोई फर्क नहीं पड़ता ... ये कहानी थोड़े से फेर बदल के साथ कई ऐसी लड़कियों पर ठीक ही बैठती है!! पर बिना नाम के कहानी आगे कैसे बढे ? तो - इस कथानक के लिए हम उसे लक्ष्मी कह लें ......


तो लक्ष्मी मेरे यहाँ करीब करीब तीन साल से काम कर रही है... बहुत अच्छी है , दिखने में भी अच्छी ही है, और बातचीत तो बहुत ही हंस हंस कर करती है .... उसे देख कर या उससे मिल कर कोई नहीं कह सकता कि उसे दुःख या दर्द का कोई अनुभव होगा भी .... मेरी ज्यादातर सहेलियों के घर काम करने वाली बाइयों से अलग, वो छुट्टी तो बहुत ही कम करती है.... होली दिवाली भी काम पर एक वक़्त तो आ ही जाती है, शाम को नहीं आती.... उम्र होगी कुछ २४ - २५ साल , पर चेहरे पर मासूमियत है - हंसमुख है न!! हाँ, रंग ज़रूर कुछ दबा हुआ है - तो कभी कुछ कभी कुछ प्रयोग चलते ही रहते हैं.... हमारे मोहल्ले में कुछ ६-७ घरों में काम करती है - सुबह करीब ७:३० बजे जो यहाँ आती है - तो दोपहर के करीब १ बज जाते हैं उसे वापस जाते हुए....साथ ही उसकी माँ भी आती है - वह भी ४-५ घरों काम करती है - फिर दोनों साथ घर जाती हैं ....

लक्ष्मी का एक बेटा भी है - होगा कुछ ६-७ साल का .... पहले किसी ट्यूशन जाता था, पिछले साल से स्कूल जाने लगा है .... उसे मुन्ना कहूँगी मैं यहाँ - कहने कि ज़रुरत नहीं कि ये उसका असली नाम नहीं है..... तो लक्ष्मी चाहती है कि बेटा खूब पढ़े, उसके लिए वह कितनी भी मेहनत करने को तैयार है!!! स्कूल से आने के बाद बेटा फिर ट्यूशन जाता है - क्योंकि बेचारी माँ और नानी तो खुद ही नहीं पढ़ी हैं कुछ - उसे कैसे पढाएं? शाम को ५:३०  बजे के बाद वह उसे ट्यूशन छोडती है - फिर यहाँ आकर कुछ घरों में शाम के काम .... ७ बजे उसे ले जाने के वक़्त यहाँ से हो कर गुज़रती है - जब कभी सड़क से गुज़रती दिखे - हंस देती है.... कभी कभी बच्चा थक कर उनींदा सा हो जाता है - तो माँ की गोद में चढ़ जाता है - है तो बेचारा पतला दुबला सींक सा ही , पर आखिर ट्यूशन से घर का रास्ता कुछ डेढ़ किलोमीटर का तो होगा - इतनी दूर बच्चे को गोद में ले जाना - कोई हंसी खेल तो  नहीं है न !!! हम लोग तो अपने बच्चों को गोद में उठा कर बहुत कम चलते हैं.... पहले तो प्रैम्स, फिर स्कूटर या कार तो ज्यादातर लोगों के पास होती ही है ..... पर इन लक्ष्मी और माल्तियों के पास तो अपने पैरों कि ही गाड़ी है.... पिछले साल मेरे बेटे ने नयी साइकिल खरीदी - तो उसने पुरानी वाली ले ली - वह भी हज़ार रुपये देकर, मुफ्त में लेने में उसका स्वाभिमान सामने आता था!! पर शाम को लौटने तक अँधेरा अपना पर्दा फैला देता है - तो शाम को साइकिल ला नहीं पाती, पैदल ही आती जाती है ....

मैं सोच रही थी एक दिन - हम लोगों से तो अपने एक घर का काम अपने हाथ से नहीं होता, बाई रख लेते हैं - ये कैसे इतने घरों का काम कर लेती हैं!! सुबह ७ बजे घर छोडती होगी, उससे पहले घर में पानी भरना आदि काम तो होते ही होंगे न? फिर १:३० - २ बजे घर लौट कर खाना वगैरह पकाना, फिर बच्चे के साथ दुबारा लौटना आदि.... और कमाई कितनी होती होगी - ६-७  हज़ार रूपया महीना - माँ बेटी कि मिली जुली कमाई.... और जिन घरों में ये बेचारियाँ काम करती हैं - क्या वे कभी ख़ुशी से इनकी पगार बढ़ाएंगे? एक दिन मैंने पूछा - मुन्ना के पापा क्या करते हैं - तब वह नयी नयी आई थी - मैं कुछ जानती नहीं थी उसके बारे में - तो बोली - "ಎಲ್ಲಿ ಅಕ್ಕ - ಅವರು ನಮ್ಮ ಜೋಡಿ ಇಲ್ಲ - ಹಳ್ಳಿ ಊರ ಅಲ್ಲಿ ಇದಾರೆ - ನಮ್ಮಿಗೆ ಬಿಟ್ಟ ಬಿಟ್ಟರೆ - ನಾನ್ ಇಲ್ಲಿ ನಮ್ಮ ಅಮ್ಮ ಮನೆ ಗೆ ಇರ್ತೀನಿ " (कहाँ दीदी , वह मेरे साथ नहीं हैं - गाँव में रहते हैं - मुझे छोड़ दिया है - मैं यहाँ अपनी अम्मा के घर में रहती हूँ ) तब पता चला कि जिस हँसते चेहरे को मैं रोज़ देखती हूँ - वह अपने अन्दर क्या छुपाये है.....

अब तो उसके पति ने दूसरी शादी भी कर ली है - फिर भी बेचारी की आशा गयी नहीं है - अभी भी वह समय समय पर यहाँ आता है - तो लक्ष्मी के चेहरे पर बहार खिल उठती है - हर बार बेचारी नए प्रयोग करती है - कभी हल्दी रगडती है चेहरे पर - तो कभी मुझसे फेएर एंड लवली की ट्यूब मंगवाती है - वह आकर दो चार मीठी मीठी बातें करता है - फिर छोड़ जाता है -और इसका चेहरा फिर हो जाता है पहले की तरह - उस ही समय ये २-१  दिन की छुट्टी भी करती है - वैसे तो कहो भी कि अभी तुझे बुखार है - दो दिन घर में आराम कर ले - तो कहती है - घर काटने आता है - यहाँ काम करते वक़्त गुज़र जाता है - घर में तो टाइम जाता ही नहीं .... वह न कभी इसके लिए, न ही अपने बच्चे के लिए कुछ लाता है - बस मेहमान कि तरह खातिर करा कर चला जाता है .... कभी निशानी भी छोड़ जाता है - तो फिर लक्ष्मी डोक्टर के चक्कर लगाती रहती है पीछा छुड़ाने के लिए

... कहती है - एक ही बच्चा मैं किसी तरह पाल रही हूँ - एक और आ गया तो कैसे काम होगा - हम सब समझाते हैं कि उससे न मिला कर - या कुछ समझ से काम ले .... पर वह हर बार आने से पहले इसे बातों से मना लेता है - और ये फिर से साथ घर बसाने के सपने देखने लगती है .... "ಅಕ್ಕಾ , ಇವರು ಅಕ್ಕಿ ಜೊತಿಗೆ ಖುಷಿ ಇಲ್ಲ - ಅಕ್ಕಿ ಗೆ ಬಿಟ್ಟ ಈಗ ಇಲ್ಲಿ ಇರ್ತಾರೆ - ಇಲ್ಲೇ ಮನೆ ಮಾಡ್ತಾರೆ - ಕೆಲಸ ನು ಹುದುಕಾರೆ - ಈಗ ನಾವು ಜೊತಿಗೆ ಇರ್ತಿವಿ" (दीदी , ये उसके साथ खुश नहीं हैं - अब उसे छोड़ कर ये मेरे साथ यही रहेंगे , यहाँ काम भी ढूंढ लिया है - यही घर बना कर हम सब साथ रहेंगे )  और दो दिन बाद ही उसका सपना फिर टूट जाता है - वह शहर जिस काम से आया हो - वो पूरा होते ही गाँव लौट जाता है  ......... तो पतिदेव को यहाँ लोज का खर्चा बच जाता है - पत्नी सुख भी मिल जाता है - और घर का पका हुआ खाना भी - फिर लौट जाता है अपनी दूसरी पत्नी के पास (वहां भी वह बेचारी इसी धोखे में खुश रहती होगी कि पति मेरे साथ है - उसे क्या पता कि शहर में पति ये गुल खिला रहा है!!! )  ... और लक्ष्मी फिर काम पर आने लगती है..... दो तीन दिन बहुत उदास रहती है - फिर हंसने बोलने लगती है ... और सब पहले की ही तरह चलता रहता है....

PARENTS ARE PRECIOUS!!



This was narrated by an IAF pilot at
a Seminar recently on Human Relations : 

Venkatesh Balasubramaniam (who works for IIT) describes how his gesture ofbooking an air ticket for his father, his maiden flight, brought forth a rush of emotions and made him (Venkatesh) realize that how much we all take for granted when it comes to our parents. 


My parents left for our native place on Thursday and we went to the airport to see them off. In fact, my father had never traveled by air before, so I just took this opportunity to make him experience the same. Inspite of being asked to book tickets by train, I got them tickets on Jet Airways. The moment I handed over the tickets to him, he was surprised to see that I had booked them by air. The excitement was very apparent on his face, waiting for the time of
travel. Just like a school boy, he was preparing himself on that day and we all went to the airport, right from using the trolley for his luggage, the baggage check-in and asking for a window seat and waiting restlessly for the security check-in to happen. He was thoroughly enjoying himself and I, too, was overcome with joy watching him experience all these things. 


As they were about to go in for the security check-in, he walked up to me with tears in his eyes and thanked me. He became very emotional and it was not as if I had done something great but the fact that this meant a great deal to him. When he said thanks, I told him there was no need to thank me. But later, thinking about the entire incident, I looked back at my life. As a child, how many of our dreams our parents have made come true. Without understanding the financial situation, we ask for cricket bats, dresses, toys, outings, etc. irrespective of their affordability, they have catered to all our needs. Did we ever think about the sacrifices they had to make to accommodate many of our wishes? Did we ever say thanks for all that they have done for us? Same way, today when it comes to our children, we always think that we should put them in a good school. Regardless of the amount of donation, we will ensure that we will have to give the child the best, theme parks, toys, etc. But we tend to forget that our parents have sacrificed a lot for our sake to see us happy, so it is our responsibility to ensure that their dreams are realized and what they failed to see when they were young. It is our responsibility to ensure that they experience all those and their life is complete. 


Many times, when my parents had asked me some questions, I had actually answered back without patience. When my daughter asked me something, I was very polite in answering. Now I realize how they would have felt at those moments. Let us realize that old age is a second childhood and just as we take care of our children, the same attention and same care needs to be given to our parents and elders. Rather than my dad saying thank you to me,I would want to say sorry for making him wait so long for this small dream. I do realize how much he has sacrificed for my sake and I will do my best to give the best possible attention to all their wishes. 


Just because they are old does not mean that they will have to give up everything and keep sacrificing for their grandchildren also. They have wishes,too. 




Take care of your parents. THEY ARE PRECIOUS. 

The magical sandy shore



It was beautiful at the beach - the shifting silky sands. She sat at the edge of the waves - enjoying the gentle lapping of the cool waters on her feet, almost as if her loving pet puppy was playing at her feet .... but no - this was the sea playing with her - she reminded herself , not darling timmy!! Wave after wave curled at her feet,barely reaching them as it spent itself.....

She waded in deeper - the hard wet sands giving way to a cool shifting silkiness. Wriggling her toes happily, she giggled to herself .... unaware of the world ..... celebrating life. The sand sparked, and the waves danced ..... the magical diamonds in the sands flashing and glinting in the dancing sun rays. It was wonderful, wondrous!! She knew perfectly well  that there was only sand there, and these stones wouldn't be half as beautiful if she carried them home. But no diamonds could ever flash brighter than these stones mixed with the sand particles, no pearls could glitter more enticingly!!!!! This was heaven , her own personal heaven.... no one to call her, no waiting world....She dug into the treasure with her fingers under the wave, and brought out a handful of the sparkling diamonds .....

The sand oozed out of her unresisting fingers .... that was all it was .... this magical world - this treasure of precious diamonds and pearls ..... just a MAGICAL MESS OF MUD!!!!!

शनिवार, 26 नवंबर 2011

why we forward mails - beautiful



This is a BEAUTIFUL mail - which I recieved / and sent to most of my friends --- long back...........
just copy pasting it here.............. cheers
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This explains why you forward some jokes
A man and his dog were walking along a road. The man was enjoying the scenery, when it suddenly occurred to him that he was dead.
 
He remembered dying, and that the dog walking beside him had been dead for years. He  wondered where the road was leading them.

 
After a while, they  came to a high, white stone wall along one side of the road. It looked like  fine marble. At the top of a long hill, it was broken by a tall arch that  glowed in the sunlight.


When he was standing before it he saw a  magnificent gate in the arch that looked like mother-of-pearl, and the  street that led to the gate looked like pure gold. He and the dog walked  toward the gate, and as he got closer, he saw a man at a desk to one side.


When he was close enough, he called out, 'Excuse me, where are we?'
 

'This is Heaven, sir,' the man answered. 
'Wow! Would you happen to have some water?'  the man asked.
'Of course, sir. Come right in, and I'll have some ice water brought right up.' The man gestured, and the gate began to open. 
'Can my friend,' gesturing toward his dog, 'come in, too?' the traveler asked.
'I'm sorry, sir, but we don't accept  pets.'
 
The man thought a moment and then turned back toward the road and continued the way he had been going with his dog. After another long walk, and at the top of another long hill, he came to a dirt road leading through a farm gate that looked as if it had never been closed. There was no fence. As he approached the gate, he saw a man inside, leaning against a tree and reading a book....


'Excuse me!' he called to the man. 'Do you have any water?'
 
'Yeah, sure, there's a pump over there, come on in.'
 
'How about my friend here?' the traveler gestured to the dog.
 
'There should be a bowl by the pump.'
 
They went through the gate, and sure enough, there was an old-fashioned hand pump with a bowl beside it. The traveler filled the water bowl and took a long drink himself, then he gave some to the dog. When they were full, he and the dog walked back toward the man who was standing by the tree.

'What do you call this place?' the traveler asked. 
'This is Heaven,' he answered.
 
'Well, that's confusing,' the traveler said. 'The man down the road said that was Heaven, too.'
 
'Oh, you mean the place with the gold street andpearly gates? Nope.. That's hell.'
 
'Doesn't it make you mad for them to use your name like that?'
 
'No, we're just happy that they screen out the folks who would leave their best friends behind.'



Soooo. Now you see, sometimes, when we wonder why friends keep forwarding jokes to us without writing a word. Maybe this will explain it.
 

When you are very busy, but still want to keep in touch, guess what you do? You forward jokes.
When you have nothing to say, but still want to keep contact, you forward jokes. 
When you have something to say, but don't know what, and don't know how ... you forward jokes.
 
A forwarded joke lets you know that
 you are still remembered, you are still important, you arestill loved, you arestill cared for. 
So, next time if you get a joke, don't think that you've been sent just another forwarded joke, but that you've been thought of today and your friend on the other end of your computer wanted to send you a smile.

You are welcome at my water bowl anytime !

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why we forward mails - beautiful



This is a BEAUTIFUL mail - which I recieved / and sent to most of my friends --- long back...........
just copy pasting it here.............. cheers
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This explains why you forward some jokes
A man and his dog were walking along a road. The man was enjoying the scenery, when it suddenly occurred to him that he was dead.
 
He remembered dying, and that the dog walking beside him had been dead for years. He  wondered where the road was leading them.

 
After a while, they  came to a high, white stone wall along one side of the road. It looked like  fine marble. At the top of a long hill, it was broken by a tall arch that  glowed in the sunlight.


When he was standing before it he saw a  magnificent gate in the arch that looked like mother-of-pearl, and the  street that led to the gate looked like pure gold. He and the dog walked  toward the gate, and as he got closer, he saw a man at a desk to one side.


When he was close enough, he called out, 'Excuse me, where are we?'
 

'This is Heaven, sir,' the man answered. 
'Wow! Would you happen to have some water?'  the man asked.
'Of course, sir. Come right in, and I'll have some ice water brought right up.' The man gestured, and the gate began to open. 
'Can my friend,' gesturing toward his dog, 'come in, too?' the traveler asked.
'I'm sorry, sir, but we don't accept  pets.'
 
The man thought a moment and then turned back toward the road and continued the way he had been going with his dog. After another long walk, and at the top of another long hill, he came to a dirt road leading through a farm gate that looked as if it had never been closed. There was no fence. As he approached the gate, he saw a man inside, leaning against a tree and reading a book....


'Excuse me!' he called to the man. 'Do you have any water?'
 
'Yeah, sure, there's a pump over there, come on in.'
 
'How about my friend here?' the traveler gestured to the dog.
 
'There should be a bowl by the pump.'
 
They went through the gate, and sure enough, there was an old-fashioned hand pump with a bowl beside it. The traveler filled the water bowl and took a long drink himself, then he gave some to the dog. When they were full, he and the dog walked back toward the man who was standing by the tree.

'What do you call this place?' the traveler asked. 
'This is Heaven,' he answered.
 
'Well, that's confusing,' the traveler said. 'The man down the road said that was Heaven, too.'
 
'Oh, you mean the place with the gold street andpearly gates? Nope.. That's hell.'
 
'Doesn't it make you mad for them to use your name like that?'
 
'No, we're just happy that they screen out the folks who would leave their best friends behind.'



Soooo. Now you see, sometimes, when we wonder why friends keep forwarding jokes to us without writing a word. Maybe this will explain it.
 

When you are very busy, but still want to keep in touch, guess what you do? You forward jokes.
When you have nothing to say, but still want to keep contact, you forward jokes. 
When you have something to say, but don't know what, and don't know how ... you forward jokes.
 
A forwarded joke lets you know that
 you are still remembered, you are still important, you arestill loved, you arestill cared for. 
So, next time if you get a joke, don't think that you've been sent just another forwarded joke, but that you've been thought of today and your friend on the other end of your computer wanted to send you a smile.

You are welcome at my water bowl anytime !

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आग और धुंआ


यह कहानी भी मेरी नहीं है - कही पढ़ी है ....

एक जहाज  समुद्र में डूब गया - उसमे से एक आदमी किसी तरह तैर कर एक छोटे से द्वीप पर पहुँच गया | वह इश्वर से प्रार्थने करता रहा की कोई उसे बचाने आये पर कुछ हुआ नहीं ...

बेचारे ने किसी तरह लकड़ियाँ जोड़ कर धूप और बारिश से बचने के लिए एक छोटी सी झोपडी बना ली | लेकिन एक दिन वह जब खाने के लिए कुछ कुछ ढूंढ कर लौटा - तो उसकी झोपडी जल रही थी .... वह रो पड़ा और उसने इश्वर से कहा की तू मेरे साथ ऐसा कैसे कर सका?

जब अगले दिन की सुबह उसकी नींद खुली - तो एक जहाज की आवाज़ से - जो उसे बचाने आया था - 

उसने पूछा - तुम्हे कैसे पता चला की मैं यहाँ हूँ?
जवाब मिला - तुम्हारे धुंए के संकेत से .....

इसलिए - विश्वास रखो - कैसी भी परीक्षा की घडी क्यों न हो - उसे भगवान् का कोई संकेत समझो ....

टूटा घड़ा


यह कहानी कहीं पढ़ी थी कभी - शायद किसी ई मेल में .... यह एक चाइनीज़ प्रोवेर्ब (चीनी लोक कहावत ) पर आधारित है |


एक आदमी रोज़ नदी से पानी भर कर साहेब के घर तक ले जाया करता था. कन्धों पर एक लम्बी लकड़ी होती, जिसके दोनों सिरों पर एक एक घड़ा बंधा होता | उनमे से एक घड़ा थोडा सा क्रैक्ड था, तो सारे रास्ते उसमे से पानी रिसता रहता | तो मंजिल तक आते आते - एक घड़ा पूरा भरा होता, तो दूसरा सिर्फ आधा रह जाता | पहला घड़ा तो अपने पर्फोमेंस से काफी खुश था लेकिन यह घड़ा हमेशा हीन भावना में घिरा रहता |

एक दिन इस घड़े ने आदमी से कहा - तुम मुझे फेंक दो - और दूसरा घड़ा ले आओ - क्योंकि मैं अपना काम ठीक से नहीं कर पाता हूँ | तुम इतना भार उठा कर शुरू करते हो लेकिन पहुँचने तक मैं आधा खाली होता हूँ ....| 

इस पर आदमी ने उसे कहा - की आज जाते हुए तुम नीचे पगडण्डी को देखते चलना | घड़े ने ऐसा ही किया - रस्ते भर रंग बिरंगे फूलों से भरे पौधे थे | लेकिन मंजिल आते आते वह फिर आधा खाली हो जाने से दुखी था - उसने बोलना शुरू ही किया था की आदमी ने कहा - अभी कुछ मत कहो - लौटने के समय रास्ते की दूसरी तरफ भी देखते जाना | और लौटते हुए घड़े ने यह भी किया - लेकिन इस तरफ कोई फूल न थे....

नदी के किनारे अपने घर लौट कर उस आदमी ने घड़े को समझाया - मैं पहले से जानता हूँ की तुमसे पानी नहीं संभल पाता - पर यह बुरा ही हो ऐसा ज़रूरी तो नहीं !!! मैंने तुम्हारी और फूलों के पौधे रोप दिए थे - जिनमे तुम्हारे द्वारा रोज़ पानी पड़ता रहा - और वे खिलते रहे .... |

इसीलिए - हमें समझना है की जीवन में हर चीज़ परफेक्ट हो ऐसा कोई आवश्यक तो नहीं - ज़रुरत इस बात की है की हम हर कमी को पोजिटिव बना पाते हैं - या नहीं ..... | तो अब से हम - किसी को क्रैक्ड पोट कहने या- कोई हमें कहे तो हर्ट होने - से पहले यह कहानी याद करें .... 

रेत के महल


रेत के महल = Sand Castles .... 
बहती लहरें हैं, ठहरी भी...... रेत बिखरी है, बंधी भी..... | कुछ महल रेत के बनाए ..... लहरें आती रहीं, महल बनते बिखरते रहे ..... |रेत शाश्वत है, तब भी थी, अब भी है, अगली लहर के बाद भी रहेगी .....| महल धुलते जायेंगे - नित नए बनते जायेंगे .........| हर विसर्जन नए सर्जन के लिए होता है । ध्रुवनित्य है , सर्जन क्षणिक ....... |
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हम सब इस दुनिया में एक ही ज़िन्दगी जी रहे हैं  सिर्फ रंग अलग हैं --

एक बार एक समुद्र के किनारे कुछ बच्चे रेत में खेल रहे थे | कोई गेंद से , कोई कुछ, तो कोई कुछ ... और ज्यादातर बच्चे अपने अपने रेत के महल बना रहे थे | बाल्टी में ठसा ठस रेट भर कर - उसे रेतीले तट पर  उलट देते - और अपनी उँगलियों से महल के दरवाज़े खिड़कियाँ तराशने लगते| हर साइज़ के महल देखे जा सकते थे - और तरह तरह के नक़्शे - किसी महल में तरह तरह की कंगूरेदार खिड़कियाँ - तो किसीके महल में साधारण सी ....

बच्चों के एक ग्रुप ने आपस में शर्त लगाई थी - कि किसका महल सबसे शानदार बनता है - और बाकायदा घडी की सुइयों से उनका महल बनाने का टाइम पहले से ही बांधा गया था| समय पूरा होने से कुछ दस मिनट पूर्व वोर्निंग  बेल बजी - और फिर दस मिनट बाद समय समाप्ति की घंटी!! अब जज साहब (उनके माता पिताओं की ही एक टोली ) घूम घूम के सबके महल देखने लगे - पर जहां कुछ महल साधारण थे  (जिस बच्चे में ज्यादा रेत  उढेलने की या तो ताक़त न थी - या फिर इंटरेस्ट न था ) वहीँ बहुत से महल इतने शानदार थे कि किसीको भी दूसरे नम्बर पर रखना उसके रचनाकार का अपमान सा लगता| तो यह तय हुआ कि प्रथम पुरस्कार एक को न दे कर तीन बच्चों में बाँट दिया जाय - और द्वितीय पुरस्कार के तो खैर पांच विजेता थे!!! माता पिता तो यह निर्णय कर के अलग हो गए - परन्तु बच्चे तो फिर बच्चे हैं न - सामान रैंक वाले बच्चों में जंग छिड गयी - हर एक यही कहता ... मेरा महल तुझसे अच्छा है -|

यही चलते शाम हो चली -- और माता पिता के बुलाने पर बच्चे घर की ओर चले .....  महल वहीँ पड़े रह गए -- अपनी सारी शानो शौकत को लिए - और जो बच्चे उन पर इतना लड़ झगड़ रहे थे- वे भूल ही गए उनके बारे में अपने असली घर पहुँच कर कौन रेत के पीछे छूटे घरों को याद करता -? कोई कॉमिक्स पढने लगा नहा धो कर - कोई टीवी देखने में मसरूफ हो गया - तो कोई कुछ देर पहले के दुश्मन के साथ कैरम खेलता नज़र आया ....
ओर यहाँ तट पर - जैसे ही  शाम हुई - लहरों की ऊंचाई बढ़ने लगी - ओर आखिर लहरें महलों को बहा ले गयीं !!!

यह तो बच्चों की बात हुई - पर हमारे बारे में क्या? क्या हम सब ही यहाँ अपने असली घर को छोड़ कर रेत के महलों में नहीं उलझे? मेरा महल उससे बड़ा हो - इसी कोशिश में परेशान? असली घर को लौट कर इन महलों को भूल ही जाना है - जो आज परम शत्रु है - वही असली घर में कैरम खेलने वाला भाई - यह जान लें - तो जीवन की अधिकाधिक परेशानियां सुलझ जाएँ.....

यह एक कहानी है - यहाँ क्यों कही? मेरे इंग्लिश ब्लॉग के एक पाठक ने पूछा था - what is meant by the term "ret ke mahal" ? - (यहाँ ज्यादातर लोग हिंदी नहीं समझते ) - पर अभी इस पोस्ट को इंग्लिश में ट्रांसलेट करना है - और यहाँ के पाठकों के लिए फिर से पोस्ट करना है ....

फिर मिलेंगे .......

निष्काम कर्म


कई बार लोग पूछते हैं - यह गीता में बार बार "निष्काम कर्म" की बात क्यों होती है ? अर्जुन भी कई बार पूछता रहा कृष्ण से - यदि फल की इच्छा न हो, तो कोई कर्म करेगा ही क्यों? तो इस सन्दर्भ में यह कहानी बहुत सुन्दर है ....


एक नाई किसी के बाल बना रहा था | तभी फकीर जुन्नैद वहां आ गए और कहा " खुदा की खातिर मेरी भी हजामत कर दे " | तो नाई ने अपने गृहस्थ ग्राहक से कहा - "माफ़ कीजिये - मैं कुछ देर बाद आपकी सेवा फिर करता हूँ, खुदा की खातिर मुझे इस फकीर की सेवा पहले करनी चाहिए ..." फिर उस ने पहले जुन्नैद को बड़ी इज्ज़त के साथ बैठकर उनका काम किया, और उन्हें प्रेम से विदा किया, तब अपने ग्राहक की सेवा की| 
कुछ दिन बाद जुन्नैद को कही से कुछ पैसे मिले - तो वे नाई को पैसे देने गए | उसने कहा - "आपको शर्म नहीं आती ? आपने खुदा की खातिर कहा था - पैसों की खातिर नहीं "

जुन्नैद हमेशा अपने शागिर्दों से कहते रहे - निष्काम ईश्वर भक्ति मैंने उस नाई से सीखी है ...