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शनिवार, 9 जनवरी 2021

Upanishad5 उपनिषद सन्देश 5

एक बार बहुत पहले द्वैत और अद्वैत पर कुछ लिखा था।  उसी श्रंखला में आगे .... 

हिन्दू चिंतकों के बहुत से पथ रहे हैं, ईश्वरवादी, अनीश्वरवादी, मूर्तिपूजक ,और भी अनेक राहें उपलब्ध हैं।  

दो विचारप्रवाह हैं, दो धाराएं बहती हैं।  द्वैत को मानने वाले कहते हैं - मैं जीव तुम ईश्वर।  सदा ही पृथक, मैं पूजक तुम पूज्य, मैं पथिक तुम ध्येय, आदि।  लेकिन अद्वैत वादी कहते हैं, कोई पृथक हैं ही नहीं।  मैं ही तुम हूँ और तुम ही मैं, जब एक हो जाएं तब मोक्ष।  या तो मैं न रहूँ - तुम ही तुम हो, और वह न हो तो "अहं  ब्रह्मास्मि" का नाद। इस ही संदर्भ में वेदान्त से पांच कथाएं कहूँगी 

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१ राजा जनक की कथा 
राजा जनक अत्यधिक सम्माननीय महापुरुष हुए।  एक बार शत्रु का आक्रमण हुआ, युद्ध हुआ और राजा जनक की पराजय हुई।  शत्रु भी सिद्धांतों को मानने वाला हुआ , सो राजा को प्राण दंड न देकर देश निकाला दिया गया।  राजा जनक चल पड़े। वे घायल थे, भूखे प्यासे थके हुए चलते रहे, भिक्षा मांगते तो प्रजा जन डरते कि नए राजा क्रोधित होंगे, तो उन्हें किसी ने कुछ न दिया। 

राजा चलते रहे और पड़ोसी राज्य जा पहुंचे। वहां एक अन्नक्षेत्र था जहां खिचड़ी रुपी भोजन भिक्षुकों को दिया जा रहा था।  राजा कतार में खड़े रहे, लेकिन जब तक उनकी बारी आई, भोजन ख़त्म हो चुका थे।   भोजन परोसने वाले ने कहा - भोजन नहीं है लेकिन उनकी स्थिति देख  कर उसने किसी तरह बर्तन के तले से एक दोने में  खिचड़ी उन्हें दी. जब वे उसे खाते, एक पक्षी ने उनके हाथ से दोना गिरा दिया और खिचड़ी मिटटी में मिल गयी।  जनक जी का मन हाहाकार करने लगा और वे चीत्कार करते भूमि पर गिर पड़े।   उसी समय संतरी भागता हुआ उनके कक्ष में आया और उन्हें जगाया।  उनकी निद्रा और स्वप्न टूट गया।  संत्री पूछने लगा क्या हुआ तो वे बोले "वह सच या ये सच?" सिर्फ यही कहते रहे ....  

संत्री भागा गया और रानी माँ को बुला लाया - उन्हें भी राजा यही कहते रहे "वो सच या ये सच?" ... 

वैद्य , रानी सब पूछते रहे क्या हुआ, क्या हुआ।  लेकिन राजा यही कहते रहे "वह सच या ये सच?" सबको लगने लगा राजा जी को कुछ हो गया है , उनके बारे में कथाएं चल पड़ीं। 

एक दिन अष्टावक्र जी ने यह सुना और वहां आए - उन्होंने राजा से वार्ता की।  राजा फिर बोले "वह सच या ये सच?"
अष्टावक्र जी तो सर्वज्ञ रहे, तो वे जान गए राजा के भीतर क्या चल रहा है।  उन्होंने पूछा "राजन - क्या वह सब यहां दीखता है - शत्रु,पराजय , भिक्षा, खिचड़ी, अन्नक्षेत्र, भूख, थकान ?" राजा ने कहा - नहीं 

अष्टावक्र जी ने अब पूछा "वहां भी तुम ही थे न?" राजा ने कहा - हाँ मैं ही था।  

"तब क्या वहां यह सब था?  दरबार,मंत्रीगण, संत्री, रानी .. यह सब वहां था??" .... राजा ने कहा - नहीं 

अब अष्टावक्र बोले - इसलिए राजन - न वो सच , न ये सच।  सिर्फ तुम ही सच।  

बस वही एक है अद्वैत - कुछ सच नहीं - सिर्फ "मैं" ...... जो "मैं" मैं अनुभव करती हूँ , वही "मैं"  हर जीव अनुभव करता है।  बस वही एक है।  एक ही अद्वैत।  सिर्फ "मैं"

अहं ब्रह्मास्मि ही है अद्वैत का उद्बोधन  ...... 

गुरुवार, 13 दिसंबर 2018

Upanisha4 Katha Upanishad उपनिषद सन्देश 4

कठ उपनिषद, हिन्दू धर्म के प्रमुख ११  उपनिषद् संदेशों में एक है।  बालक नचिकेता ने यमराज से जो शिक्षा पायी उस ज्ञान की यह कथा है। 

उद्दालक जी ने महान यज्ञ किया, जिसमे अपना सब कुछ दान करना होता है।  किन्तु वे मोहवश प्रिय दुधारू गायें न दान कर, बूढी जर्जर गायों का दान कर रहे थे।  यह देख नचिकेता को लगा की यह पिताजी को पुण्य नहीं, बल्कि पाप दिशा में भेज रहा है।  नचिकेता बार बार पूछने लगा कि मैं आपका अत्यंत प्रिय हूँ - तो आप मुझे किसे दान देंगे ? चिढ कर पिता ने कह दिया कि मैं तुम्हे यमराज को देता हूँ।  बुद्धिमान नचिकेता पिता की आज्ञा मान कर तुरंत यमराज की तरफ चल पड़ा।

जब नचिकेता वहां पहुंचा तो यमराज वहां न थे, और बालक  बिना कुछ भी खाये पिए ३ दिन उनका रास्ता देखता रहा। जब यमराज लौटे तो उन्हें यह देख बड़ा दुःख हुआ कि यह ब्राह्मण बालक मेरे घर ३ दिन से भूखा प्यासा  है। उन्होंने अतिथि ब्राह्मण के अपने घर भूखे रहने के कारण बड़ी ग्लानि अनुभव की। उन्होंने नचिकेता को प्रणाम कर स्वागत किया और ३ वरदान मांगने को कहा।  इन्ही प्रश्नों के उत्तर इस उपनषद का सन्देश हैं। 

प्रथम वरदान के रूप में नचिकेता यह माँगता है कि मेरे पिता जी का क्रोध और उद्विग्नता दूर हो, जो यमराज सहर्ष प्रदान करते हैं। 

दूसरा वरदान : नचिकेता ने कहा स्वर्ग में मृत्यु और वृद्धावस्था का कोई भय नहीं है।  इस स्वर्ग को प्राप्त होने की साधन अग्नि की विद्या और रहस्य मुझे समझाइये।  यमराज ने इस उत्तम विद्या को नचिकेता को प्रदान किया।  उन्होंने विश्व के कारण रूप अग्नि यज्ञ की विधि, विद्या, आदि सब उस बालक को समझाया।  फिर यमराज ने उसे पूछा कि क्या तुम इस विद्या और विधि को अच्छी प्रकार समझ गए हो ? तब बालक ने ठीक जैसे यमराज ने कहा था, सारा ज्ञान ऐसे ही कह सुनाया।  यह देख यमराज बालक की कुशाग्र बुद्धि पर अति प्रसन्न हुए और उन्होंने अपनी तरफ से यह वरदान दिया कि अब से यह अग्नि नचिकेता अग्नि कहलाएगी। 

तीसरे और अंतिम वरदान में बालक ने प्रश्न किया कि मृत्यु के बाद क्या होता है यह मुझे समझाइए।  कई जन कहते हैं कि मृत्यु के बाद हम रहते हैं,और कई कहते हैं कि नहीं रहते।  सत्य क्या है मुझे समझाइये।  यमराज ने बालक को इस प्रश्न से हटाने का प्रयास किया और कहा कि यह तो देवताओं के भी ज्ञान सीमा से बाहर का ज्ञान है, इसे छोड़ो और जो कुछ चाहो मांग लो।  जितना लंबा जीवन चाहो, दीर्घजीवी संतान, धन, राज्य, संपत्ति, अद्वितीय सुंदर स्त्रियां सब मांग लो लेकिन यह वरदान बदल दो। लेकिन नचिकेता किसी प्रलोभन में न आया और विनम्रता से बोला - हे यमदेव, आप ही ने कहा कि यह ज्ञान अद्वितीय है और देवताओं को भी दुर्लभ है।  तब मैं आपसे बेहतर गुरु कहाँ पाऊंगा ? आप मुझे यही वरदान दीजिये।  बहुत प्रयास पर भी बालक को अडिग देख यमराज अति प्रसन्न हुए और कहा, हे बालक, तुमने बड़े से बड़े प्रलोभन में न आकर ज्ञान की दृढ़ इच्छा पर अपना मन स्थिर रखा।  मूर्ख लोग अज्ञान में भटक जाते हैं लेकिन तुम अपने लक्ष्य की मार्ग पर अडिग हो, और मैं तुम्हारे जैसा पात्र पा कर अति प्रसन्न हूँ, और मैं तुम्हे यह गूढ़ ज्ञान देता हूँ। 

आत्मा के बारे में शिक्षा चाहने वाले, और इस ज्ञान को देने और समझा पाने वाले भी दुर्लभ है।  यह ज्ञान सिर्फ सद्गुरु द्वारा ही मिलेगा, विचार, तर्क आदि से नहीं। तुम जैसा शिष्य पाकर मैं प्रसन्न हूँ, तुमने मेरे द्वारा दिखाई अपनी सभी इच्छाओं की पूर्ति , अति उच्च धार्मिक कर्मों के फल स्वरूप पाया जाने वाला स्वर्ग, कर्मों की उच्चता से प्राप्त होने वाली ख्याति, यह सब ऐ बुद्धिमान नचिकेता, मेरे दिखाने पर तुमने यह सब देख लिया और देख कर भी इसे जाने दिया है, त्याग दिया है।  तुम इस ज्ञान को प्राप्त करने के लिए सब प्रकार सुपात्र हो।

आत्मचिंतन और कठिनता से मिलने वाले परमात्मा को पाकर जीव सुख दुःख से पार हो कर परम आनंद स्रोत को पा लेता है।  नचिकेता पूछता है - सही गलत के, कर्म अकर्म के और भूत भविष्य के ऊपर आप क्या देखते हैं ?

यमराज कहते हैं - वह जिसे वेद प्रमाणित करते हैं और तप घोषित करते हैं, जिसके लिए लोग ब्रह्मचर्य का जीवन बिताते हैं - वह है -  अक्षर "ॐ" ... चिरस्थायी अमर आत्मा है "ॐ"।  यही परम् उद्देश्य है, यही परम् लक्ष्य है।  इस एक "ॐ" मनुष्य का सबसे श्रेष्ठ सहारा है - इससे व्यक्ति ब्रह्म प्राप्ति कर सकता है। 

ज्ञानरूप आत्मा न जन्मती है, न मरती है, न यह किसीसे जन्मी है, न ही इससे कोई जन्म लेता है।  यह शाश्वत है।  शरीर के मारे जाने या मर जाने पर यह नहीं मरती।  जो समझते हैं की यह मारता है या मारा जाता है, वे दोनों ही नहीं जानते हैं।  आत्मा छोटे से भी छोटी और महान से भी महान है, यह प्रत्येक जीव के हृदय में वास करती है ।

एक रथ के बारे में विचार करें तो जैसे, रथ का स्वामी आत्मा है।   इन्द्रियाँ रथ के अश्व हैं और इन्द्रियों के विषय वे मार्ग जिन पर घोड़े रथ को ले जा रहे हैं।  मन लगाम और बुद्धि सारथी है। जिस रथ के अश्व सारथी के नियंत्रण में हैं वह रथी  सुख पूर्वक अच्छे रास्ते पर रमण करती है, और जो घोड़े सारथी  के नियंत्रण में नहीं, वह रथ पथ से हट जाता है और रथी उस राह पर जाता है।  आत्मा मन और बुद्धि से जुड़ कर भोक्ता बन जाती है।  जो आत्मा मन से अलिप्त है वह रथ के मार्ग से प्रभावित नहीं होती, लेकिन जब लिप्त हो जाती है तो अश्वों के ही मार्ग पर भटक जाती है और जन्म मरण के मार्गों पर भटकता रहता है।  जो अलिप्त है वह इस सब से छूट जाता है और लक्ष्य तक पहुँच जाता है।  वह परम् लक्ष्य है - परम् ब्रह्म परमेश्वर परमात्मा का परम् धाम।

इन्द्रियों के विषय इन्द्रियों से बलवान हैं, उनसे बलवान है मन, उससे बलवान है बुद्धि। बुद्धि से श्रेष्ठ है महान आत्मा उससे बड़ी है भगवान की माया, अव्यक्त प्रकृति।  इस सब से श्रेष्ठ है परमेश्वर।  उससे महान कुछ भी नहीं , वह परम लक्ष्य है।  आत्मा सब जीवों में है, लेकिन सब पर प्रकट नहीं होती।  सिर्फ उन महान ऋषि मुनि जो सूक्ष्म तत्व को जानते हैं, सिर्फ वे भगवान के आश्रय से अपने भीतर स्थित आत्मा को देख पाते हैं। 

व्यक्ति को चाहिए कि वह इन्द्रियों को मन में, मन को बुद्धि में, बुद्धि को महान आत्मा में और आत्मा को परमात्मा में शांत करे। 

उठो - अपने वरदानों को समझो।  उस्तरे से भी तेज धार इस ज्ञान पर तुम चलो और अपने लक्ष्य को प्राप्त करो।

जो इस ज्ञान को सुनेगा, समझेगा और दूसरों को समझाएगा, वह महान हो जाएगा।  जो इसे ब्राह्मणो को, और मृत्यु पर आयोजित समारोह में समझाएगा, वह अपने लक्ष्य को प्राप्त करेगा।

इस आत्मा का निवास भीतर है और इन्द्रियाँ बहिर्मुखी हैं।  इसलिए इन्द्रियों द्वारा आत्मा को नहीं जाना जा सकता है। लेकिन बुद्धिमान जिज्ञासु व्यक्ति ने अपनी दृष्टि भीतर को मोड़  दे तो उस द्वारा आत्मा के दर्शन किये जा सकते हैं ।  ज्ञानी आत्मा को विवेक से समझ कर अस्थिर अस्थायी संसार में अलिप्त हो जाता है।  आत्मा द्वारा ही सब कुछ अनुभव किया जाता है, इससे कुछ भी छिपा नहीं।  परमात्मा की वजह से व्यक्ति जागते सोचते सब कुछ अनुभव करता है - शोक का कोई कारण नहीं है।  परमात्मा सब पर शासन करते हैं, जो व्यक्ति उन परमात्मा को भीतर जान ले वह फिर कहीं नहीं भागता।

प्राचीन काल में परमात्मा जल से ब्रह्मा के रूप में प्रकट थे।  वे अपने संकल्प से सब जीवों के हृदय में वास करते हैं। देव माता अदिति सब जीवों के साथ जन्मी है और उनके हृदय में रहती है।  जातिवेदा अग्नि जो आग की छड़ों में वैसे ही छिपी है जैसे गर्भवती स्त्री अपने गर्भ में संतान को छुपाए हुए रहती है।  यही अग्नि परमेश्वर रूप है।  सूर्य जहाँ से आते है और जहां विश्राम करते हैं, यही परमेश्वर हैं। 

जो इस लोक में है वह सब उस लोक में भी है, और जो वहां है वह यहां भी है।  जो इन में भिन्नता देखे वह भटकता रहता है।  इसमें कोई विविधता नहीं - जो इसे विविधता में देखे वह भटक जाता है।  भूत वर्तमान और भविष्य को नियंत्रित करने वाला परमात्मा मनुष्य के हृदय  निवास करता है। वह हमेशा था, है,  और रहेगा।  वह अमर और सदा रहने वाला है।  जैसे वर्षा कहीं भी हो, पानी नीचे को बह आखिर एक ही स्थान पहुंचता है - ऐसे ही  अन्ततः हर व्यक्ति अंततः परम ब्रह्म में विलीन होता है ।

शरीर एक ११ द्वारों वाला शहर है।  व्यक्ति इस में लिप्त नहीं हो तब ही परम धाम पहुंचता है। परमात्मा हर जीव के साथ उसके मन में निवास करता है जैसे दो पक्षी एक डाल पर बैठे हैं। जीवात्मा वह  पक्षी है जो फल खा रही है, और परमात्मा वह पक्षी है जो इस पक्षी को फल खाते देख रहा है। 

एक ही वायु , जो सारे संसार में अपना निराकार अस्तित्व रखती है, वह जिसमे प्रवेश लेती है उसका आकार ले लेती है। ऐसे ही आत्मा भी अलग अलग आकार लेती है। सूर्य सकल विश्व की आँख है - और आँख अपने स्वारा देखे गए दृश्यों से दूषित नहीं होती।  ऐसे ही परमात्मा सब में है लेकिन लिप्त नहीं होता।  जो ज्ञानी अपने भीतर के परमात्मा को निरंतर देखते हैं वे उसके प्रकाश से प्रकाशित हैं।  उस परमात्मा के लोक में सूर्य  नहीं चमकते, क्योंकि ये सब उस  प्रकाश  से ही तो प्रकाशित होते हैं।

यह प्राचीन पीपल का पेड़ है जिसकी जड़ें ऊपर और टहनियां नीचे को हैं। सब इसी मूल पर टिके हैं।  सब कुछ परम् में ही जन्मता है , उसी में चेष्टा करता है, उस में स्थापित है।  इसी परमात्मा के भय से इंद्र, वायु सूर्य अपने अपने निर्धारित कर्म करते हैं ।जो व्यक्ति इस शरीर में रहते हुए परमात्मा को देख लेता है वह मुक्त हो जाता। है  जैसे साफ़ शीशे में वस्तुएं दिखती हैं, मैले शीशे में नहीं,ऐसे ही शुद्ध बुद्धि मन ही परमात्मा का दर्शन कर सकता है ।

इन्द्रियाँ प्रकृति में विहार करती हैं. शांत परमात्मा में नहीं पहुंचती हैं।  परमात्मा बिना किसी प्रकृति का है, वह मनुष्य की दृष्टि की सीमा से बाहर है - उसे मानवीय आँखों से नहीं देखा जा सकता।  उसे सिर्फ चिंतन, ज्ञान, कर्म और भक्ति से देखा जा सकता है।  सब चेष्टाओं को त्याग कर इन्द्रियों के दृढ़ और संतुलित नियंत्रण से परमेश्वर पर ध्यान स्थित होता है - यही योग है।  परमात्मा को मन वाणी या दृष्टि से नहीं पाया जाता - उसके अस्तित्व को स्वीकारने उसकी उत्कट अभिलाषा रखने पर ही उसे पाया जा सकता है।    गांठें काट कर नश्वर जीव अमर हो जाता है।  हृदय से सर के शिखर को जाने वाली एक नाड़ी "सूक्ष्मणा" मनुष्य को उच्च दिशाओं में ले जाती है, और अन्य सब नाड़ियाँ नीचे के लोकों में ले जाती हैं।  परमेश्वर को शरीर से अलग सही रूप में पवित्र और अमर रूप में जानो।

तब नचिकेता यमराज के वचन सुन बरम ज्ञान को प्राप्त हुआ।  इस उपनिषद को सुन और समझ सकने वाला व्यक्ति भी परम् लक्ष्य को प्राप्त होगा। 

ॐ शान्ति शान्ति शान्ति ॐ



मंगलवार, 4 अप्रैल 2017

न्यूरल नेटवर्क के सीखने की प्रक्रियाएं -4

पुराने भाग 1, 2, 3

यह श्रंखला artificial intelligence या neural networks से सम्बंधित है । कमोबेश यह उसी प्रकार होता है, जैसे प्राणियों में सीखना होता है ।

इससे पहले के भागों में हमने देखा कि पूर्वाग्रह क्या होता है, पहचान और निर्णय कैसे होते हैं, और "सीखना" कैसे होता है । इस भाग में हम -

1. सीखने  के प्रकार (learning paradigms ) पर बात करते हैं , और

2. सीखने की विधियों ( learning algorithms ) के नाम देखेंगे (इनकी विस्तृत चर्चा अगले भाग में करूंगी, यह पोस्ट अधिक लम्बी हो जायेगी )।

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Learning paradigms : यह वे तरीके हैं, जिनसे न्यूरल नेटवर्क अपने आस पास की बाहरी दुनिया के बारे में जानकारी प्राप्त करता है । यह बाहर की दुनिया के साथ interaction करने के प्रकार हैं, भीतर से सीखने के नहीं ।   इनमे तीन मुख्य प्रकार हैं -

1. Learning with a teacher (गुरु की मदद से सीखना)
2. Learning without teacher with supervision (with critic ) (आलोचक / समीक्षक की सहायता से गुरु के बिना सीखना )
3. Unsupervised learning (स्वयं सीखना)

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1. Learning With Teacher

Learning With Teacher
इस प्रकार की प्रक्रिया इस तरह से काम करती है कि , "शिष्य" और "गुरु" दोनों ही नेटवर्क्स को बाहरी परिवेश से एक ही इनपुट वेक्टर मिलता है, और दोनों अपना अपना निर्णय लेते हैं । फिर दोनों के निर्णय के तुलना की  जाती है  । शिष्य और गुरु नेटवर्क में फर्क क्या है ?? कुछ भी नहीं, सिवाय इसके की , गुरु नेटवर्क पहले बना है, और वह परिवेश के बारे में पहले से सीख चुका है । यही बात इस तरह से देखिये - जीवन में मैं "teacher" के रूप में कार्य कर रही हूँ, और "शिष्यों" को पढ़ाती हूँ । क्या फर्क है मुझमे और उनमे ? सिर्फ - the accident of the date of birth  :) । यदि वे मुझसे 20 साल पहले जन्म लेकर पढ़ आये होते, तो आज वे मुझे पढ़ा रहे होते, मैं उनकी शिष्य होती ।

तो - "गुरु" नेटवर्क परिवेश के बारे में पहले ही सीख चुका है । वह इनपुट के सम्बन्ध में जो भी निर्णय ले वह "सही "निर्णय या desired output माना जाएगा । और शिष्य का निर्णय इसके साथ जांचा जाएगा । यदि तो शिष्य का उत्तर गुरु के उत्तर के साथ मिल रहा हो,. तो शिष्य को कुछ नहीं करना है । किन्तु यदि उत्तर आपस में न मिलें, तब ? तब बदलाव गुरु में नहीं, सिर्फ शिष्य में आने वाला है इस परिस्थिति में, क्योंकि गुरु feedback loop में नहीं है । सोचिये की एक शिक्षक नन्हे बच्चों को
      अ - अनार का,
      आ - आम का,
       इ - इमली का आदि सिखाता है ।

अब परिवेश से इनपुट आता है यह चित्र ---

* यह इनपुट परीक्षा के लिए प्रधानाध्यापक जी ने दिया है -
* यह प्रश्न " teacher" और "student " दोनों को मिला है ।
* Teacher (जो पहले से सीख चुका है, वह "इसके आगे "आ" (आम का)  अक्षर होना चाहिए" ही कहेगा । 
* यदि
शिष्य भी "आ" (आम का)  लिखे - तो उसे कोई बदलाव करने की आवश्यकता नहीं क्योंकि "error "सिग्नल शून्य है

* लेकिन
यदि शिष्य "आ " न लिख कर कोई और अक्षर लिखे - तो उसे और सीखना होगा ।

ध्यान दीजिये - इसमें - सारी प्रक्रिया गुरु के सही होने पर निर्भर है । यदि गुरु स्वयं ही गलत जानकारी रखता हो, तो वह शिष्य को सही नहीं सिखाएगा, बल्कि उल्टा, शिष्य यदि पहले से थोडा बहुत जानता हो और इसे "आ" कहना चाहे लेकिन गुरु गलती से इसे "अ" मान रहा है - तो शिष्य को जबरदस्ती यह सीखना होगा कि  यह "अ" ही है । ऊपर चित्र में देखिये - गुरु फीडबैक लूप में है ही नहीं - वह नहीं बदलेगा ।

शिष्य तब तक पास नहीं हो सकेगा - जब तक गुरु उसे "सीख चुका" घोषित न करे । { मज़ाक नहीं है यह - हम कर्नाटक में रहते हैं - मेरे बेटे को कई साल पहले यहाँ के एक सर हिंदी पढ़ाते थे जो हिंदी नहीं जानते थे । तो उन्हें मुहावरों के अर्थ सिखाते हुए ऐसे बड़े मज़ेदार (?) किस्से होते रहे । मैं यदि बेटे को सही अर्थ सिखा भेजती भी थी तो वहां लिखने पर उसके अंक कट जाते थे ) कल परसों ही सुज्ञ जी की एक पोस्ट पर यह लिखा मैंने टिप्पणी  में कि आजकल बोर्ड परीक्षाओं में कई शिक्षक खुद नक़ल कराते हैं - तो शिष्यों के यह कैसे सिखाया जाए कि नक़ल करना बुरा है ?

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2. Learning without a teacher, in the presence of a critic :

Learning without a teacher, in the presence of a critic  
यह प्रक्रिया ऊपर वाली प्रक्रिया से भिन्न है । पहली बात तो यह है कि शिष्य का उत्तर "गुरु" जांच नहीं रहा है - गुरु तो कोई है ही नहीं । शिष्य को जानने वाले "एक्सपर्ट" से "सलाह" मिल रही है की ऐसा होना चाहिए, ऐसा नहीं । किन्तु वह बाध्य नहीं है इसे मानने के लिए । शिष्य का आउट पुट वापस वातावरण को प्रभावित करता है । और वातावरण क्रिटिक को । तो समय के साथ वातावरण भी बदल सकता है, क्रिटिक भी बदल सकता है, शिष्य भी, और यह भी हो सकता है की दोनों ही न बदलें । जो "reinforcement " है, वह शिक्षण नहीं है । वह सिर्फ एक माहौल है, जो उस समय उन परिस्थितियों में "सही" माना जा रहा है । स्टुडेंट नेटवर्क 100 में से 95 स्थतियों में इसे मान भी लेगा , लेकिन शत प्रतिशत ऐसा नहीं होगा । तो नेटवर्क खुद तो सीखेगा ही, किन्तु सीखते हुए जब वह क्रिटिक से सहमत न होगा, तब नेटवर्क के साथ ही परिवेश भी धीरे धीरे बदलता रहेगा ।

इसके उदाहरण मानवीय सन्दर्भों में । हम जब स्कूल में थे, तब रंग को अंग्रेजी में colour लिखा जाता था । यदि color  लिखा, तो अंक कट जाते थे । लेकिन आज word processors, colour लिखने पर उसे गलत और color को सही बताते हैं । इसी तरह से schedule  को शेड्यूल न पढ़ कर स्केड्यूल पढ़ा जाता है । programme शब्द अब program  बन चुका है । हिंदी फिल्मों की हिरोइन साडी की जगह सलवार कमीज़ पहनने लगी, फिर अब वेस्टर्न ड्रेसेज में ही दिखती है । पिता बूढ़े, थके, सफ़ेद बालों वाले, और धोती कुरते में नहीं, सूटेड बूटेड और कनपटी पर हलकी सफेदी लिए नज़र आते हैं । 

ध्यान दीजिये - विज्ञापनों की माएं भी बदली हैं, परन्तु उतनी नहीं जितनी फिल्मों की । क्योंकि दोनों के टार्गेट औडीएन्स अलग हैं । विज्ञापन अधिकतर गृहिणियों के अपना उत्पाद बेचने के लिए हैं, परिवेश अलग है, क्रिटिक अलग है । तो विज्ञापनों की बेटियां और माएं यदि अधिक ग्लैमरस हुईं, तो अपने दर्शको (उपभोक्ताओं) को दूर कर देंगी । सो वहां परिवेश कम बदला है । वे अब भी थोड़ी मोडर्न तो हैं , लेकिन अल्ट्रा मोडर्न नहीं हैं । लेकिन फिल्म की हिरोइन दर्शकों को टिकट खिड़की पर लाने के लिए है । तो वहां का परिवेश अधिक तेज़ी से बदला, क्योंकि ज्यादा तादाद में "स्टुडेंट" नेटवर्क्स ने परिवेश को समझने वाले  क्रिटिक के विरुद्ध जाने का रिस्क लिया, तो लर्निंग रेट तेज़ रहा । 

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3. Unsupervised Learning  

Unsupervised Learning 
इसमें कोई किसीको नहीं सिखाता । स्टुडेंट सीखना चाहे और सीख पाए - तो सीखेगा । नहीं, तो नहीं सीखेगा । लेकिन परिवेश कभी नहीं बदलेगा, feedback है ही नहीं । यदि नहीं सीखे, तो survival कठिन है । इसके उदाहरण हैं, जैसा की हमने कहानी सुनी है, मोगली / टार्ज़न की । एक बालक कुछ सीखने समझने की उम्र से पहले ही जंगल में खो जाता है । उसे सिखाने को न वहां गुरु है, न ही क्रिटिक । उसे अपने आप ही सीखना है  ।वह सीखे या न सीखे, परिवेश नहीं बदलने वाला  । कोई उसे बताने वाला भी नहीं की उसने जो सीखा वह सही है, गलत है या कुछ और । वह सीख लेगा, तो जीवित रहेगा, नहीं सीखेगा तो पता नही क्या होगा । यह है अन्सुपर्वाइज्ड लर्निंग ।

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अगले भाग में हम learning algorithms देखेंगे ।
इनमे प्रमुख हैं -
1. error correction learning,
2. hebbian learning,
3. competetive learning and
4. memory based learning

यदि यह श्रंखला बहुत टेक्नीकल हो रही हो, तो मुझे बताइये । प्रयास तो कर रही हूँ इसे सिम्पल रखने का, पर नहीं जानती की यह कैसा हो पा रहा है  ।

अगले भाग तक तक - विदा ।

पूर्वाग्रह ३ : सीखना

इस शृंखला के पुराने भाग  देखें  :-
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पिछले दो भागों में हमने पढ़ा कि:

भाग १ -  पूर्वाग्रह का अर्थ है किसी वस्तु / व्यक्ति को देखने या जानने से पूर्व ही उसके बारे में एक धारणा बना लेना । यह पूर्वाग्रह भाषा ज्ञान से भी आता है, हमारे निजी अनुभव से भी बनता है । पूर्वाग्रह के बारे में अक्सर हमारे मन में एक पूर्वाग्रह है कि यह कोई "निंदनीय" चीज़ है, पूर्वाग्रह रखना कोई बुरी बात है । किन्तु यहाँ - इस शृंखला में मैं यह चाहूंगी कि आप इसके प्रति यह पूर्वाग्रह न रखें । यह हमारे पहचान और निर्णय की प्रक्रिया का एक भाग है । हमारे nervous system से ही प्रेरणा लेकर आजकल artificial intellegence के लिए सिस्टम्स बनाये जा रहे हैं - जो artificial neurons का उपयोग करते हैं । इन artificial electronic neurons को भी inputs और पूर्वाग्रह का उपयोग उसी प्रकार करना होता है जैसे हमारे मस्तिष्क की प्रक्रियाओं में होता है । मैंने दो तीन उदाहरण लिए पूर्वाग्रह के - जैसे, ....आम = मीठा पीला फल, .....हिंदी फिल्मों में " माँ " , .... सूर्य, ....चोट, ....दोस्त अदि ।

भाग २ - पूर्वाग्रह का पहचान और निर्णय की प्रक्रिया में क्या योगदान है । जैसे - यदि मैं मई के महीने में फल के बाज़ार में गयी और मुझे दूर से पीले फलों का ठेला दिखा - तो मैंने मान लिया कि यह आम हैं । यह तो पास जा कर ही जान पाऊंगी कि हैं , या नहीं हैं । तो मुझे एक तो यह पहचान करनी है कि यह फल आम है या नहीं, और दूसरा यह image मेरे मन में बने कि यह फल मुझे ख़ुशी की अनुभूति देगा (यदि मुझे आम पसंद हैं तो ) या नहीं (नापसंद हैं तो ) । निर्णय के दो आधार हैं - अभी क्या इनपुट आया और पहले से उस चीज़ के बारे में मेरा अनुभव कैसा रहा । neuron कैसे decide करे ? 
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यह दो चित्र आगे के लेख को समझने में सहायक होंगे - इन्हें याद रखने की आवश्यकता नहीं है - सिर्फ रेफेर करने में काम आयेंगे ।

हमारे शरीर के neuron  का एक उदाहरण यह है ।
natural neuron 


यह जो दोनों और, ऊपर और नीचे टहनियां और जडें सी दीखती हैं - ये हजारों की संख्या में हैं । ये synapse कहलाती हैं और neurons को एक दूसरे से जोडती हैं, और उनमे आपस में संकेत भेजने का भी काम करती हैं । जब जब भी दो neuron आपस में "बात" करते हैं - तो उनके बीच का सम्बन्ध और सुदृढ़ हो जाता है। जो बारम्बार बात करते हैं, उनके सम्बन्ध उतने अधिक प्रगाढ़ होते चले जाते हैं । 

इसके विरुद्ध, जो connection use  नहीं होता, वह कमज़ोर होता जाता है । हर एक neuron दुसरे हज़ारों neurons से इनपुट भी लेता है, और हजारों को output भी देता है । ( आपको शायद आश्चर्य होगा - किन्तु आज इलेक्ट्रोनिक / इंस्ट्रुमेंटेशन इंजिनियर / डॉक्टर हमारी जीभ के neurons - जो हम स्वाद के अनुभव के लिए use करते हैं - उन्हें नेत्रहीन लोगों के देखने के लिए प्रयुक्त करने का प्रयास कर रहे हैं - और कुछ हलकी सफलताएं मिलने भी लगी हैं । 

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artificial neuron कुछ ऐसा होता है - (यह natural वाले से बहुत ही कमतर है - किन्तु basic working को copy करता है ।)
Artificial  Neuron 

१.ये जो inputs दीख रहे हैं - ये असल inputs हैं । 
२.इस एक नयूरोन का सिर्फ एक ही output है ।
३.हर इनपुट को कितना महत्व (वजन, weight ) दिया जाएगा - यह बात न्यूरोन हर उदाहरण से सीखता है ।
४.यह सीखना अब तक के अनुभव की आधार पर होता है - यह वजन अनुभव के साथ बदलता है ।
५.जो इनपुट इस neuron के output के साथ में सकारात्मक रूप से काम करें - उन inputs का इस neuron में + महत्व बढ़ता जाता है, (+१ तक) , और जो इस output के साथ न हों / विरुद्ध हों, उनका घटता जाता है या - में बढ़ता है ( - १ तक)।
६.ये सारी चीज़ें (असर) जोड़ी जाती हैं ।
७.activation function का काम है इस जोड़ को (जो एक से अधिक हो सकता है - +-१ तक लिमिट करना। (अर्थात हाँ या ना में उत्तर बनाना )

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अब चलते हैं सीखने की प्रक्रिया की ओर - कि हर प्रविष्टि का वजन कैसे निर्धारित होता है और हर बार bias के वजन पर क्या असर होता है | 
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एक रोज़मर्रा का उदहारण लेते हैं : सोचिये की यह न्यूरोन एक नन्हा १० - ११ माह का बच्चा है जो घुटने चलता है । उसे कई तरह के अनुभव होते हैं - और अलग अलग स्थितयों के अनुसार सोचिये की उसे "हाँ" या "न" में चुनाव करना सीखना है ।
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एक बच्चे की सीखने की और निर्णय लेने की प्रक्रिया :
१. पहला इनपुट है - गर्म कूकर
२. दूसरा इनपुट है एक बजने वाला खिलौना
३. तीसरा इनपुट - पिता की थाली में परोसा हुआ अचार
..
..
bias (पूर्वाग्रह) बन रहा है इस बारे में कि माँ की बात in general माननी चाहिए, या नहीं माननी चाहिए ।


इनमे से हर एक इनपुट को एक के बाद एक लेते और समझते हैं । हम में से अधिकतर लोगों को ये experience हुए ही हैं - तो समझना आसान होगा ।
इसे पढने से पहले गुणा करने का एक मूलभूत सिद्धांत (जो हम सब जानते ही हैं ) ध्यान में ले आयें ---
        क    (+1).(+1) = +1  दो + संख्या / या दो - संख्या - अर्थात एक सी
        ख   (-1).(-1) = +1     संख्याएं आपस में गुणा हों तो उत्तर + होगा
       ---------------
        ग    (-1).(+1) = -1  अर्थात दो उलट प्रकार की संख्याएं (एक + दूसरी -)
        घ    (+1).(-1) = -1   गुणा हों तो उत्तर - होगा
       ---------------
       अर्थात - नकारात्मक और सकारात्मक (उलट स्वभाव की))संख्याएं आपस में गुणा की जायें तो परिणाम नकारात्मक होता है, और एक ही तरह की संख्याएं गुणा की जाएँ तो सकारात्मक ।
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१.
किचन में गर्म कुकर है - जिसे छूने बच्चे बार बार आगे जाते हैं । माँ मना करती है - बेटा मत छू - हाथ जलेगा। माँ सामने हो तो बच्चे अक्सर मान भी जाते हैं, परन्तु उनमे वह उत्सुकता बनी रहती है - कि छूना है । फिर किसी दिन माँ की नज़र न हो - तो छूते ही हैं - और हाथ में जलन के दर्द का अनुभव उन्हें तुरंत हाथ खींचने पर मजबूर करता है - रोने पर भी । कुछ देर बाद - हाथ धुलने से / दवा देने से राहत हो जाती है । कुछ दिन बच्चे को वह दर्द याद रहता है - और वह कुकर नहीं छूता । फिर यह repeat होता है - शायद अबकी बार किसी गर्म कढाई / गर्म दूध की भगोनी आदि के साथ । तो अनुभव पक्का होता जाता है, याददाश्त प्रगाढ़ होती जाती है ।

अब बच्चे ने दो तरह की बात सीखी - 
         (क) एक यह की किचन में गर्म चीज़ें जो प्लेटफोर्म पर / चूल्हे पर रखी हैं - उन्हें छूना दर्द देता है - तो उन्हें  नहीं छूना है । तो उस input के लिए वजन negative बन गया । 
         (ख) माँ जो कह रही थी - वह मेरे लिए सही था - तो माँ की बात मानने में भलाई है - नकारात्मकता (माँ ने मना किया था ) और नकारात्मकता (दर्द हुआ ) के गुणा होने से सकारात्मक परिणाम  (bias या माँ की बात का वजन बढ़ गया)
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(२)
दूसरा इनपुट एक बजता हुआ खिलौना है - माँ बच्चे को हंस हंस कर उससे खेलने को दे रही है । बच्चा उसे लेता है - खेलता है - और एन्जॉय करता है - फिर से दो बातें हिया हैं ।
       (क) खिलौने (input ) का वजन positive हो गया । 
       (ख) माँ की बात (bias ) का वजन भी बढ़ा - इस बार सकारात्मक (माँ ने खेलने दिया था) और सकारात्मक (मजा आया खेलने में )  के गुणा होने से + result आया है । 
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(३)
पिता की थाली में चटनी / अचार है - जबकि बच्चे को सिर्फ मीठी / फीकी /  हलकी नमकीन चीज़ें ही मिली हैं । बच्चे के ललचाने पर माँ कहती है - थोडा बड़ा हो जा - फिर मिलेगा । अभी मुह जलेगा । परन्तु बच्चा जिद करता है । फिर थोडा सा अचार चटाना ही पड़ा माता पिता को । उसे मिर्च लगी । अगली बार वह नहीं खाना चाहेगा (कुछ दिन तक ) । फिर से दो बातें हुईं 
         (क) तीखा अचार मुंह में जलन देता है - तो नहीं खाना है - neagtive वजन ।
         (ख) माँ की बात मान लेता तो तकलीफ न होती - bias का वजन फिर बढ़ा ।
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अब - इनमे से हर एक इनपुट - हर experience (अनुभव ) के बाद अपने ही वजन को प्रभावित कर रहा है - उसे + या - दिशा में बढ़ा रहा है । किस दिशा में - यह इस पर निर्भर है की अनुभव सुखदायी था या दुखदायी ।

इसके अलावा - इनमे से हर एक इनपुट के लिए माँ (bias ) ने जो कहा - यदि अनुभव उसके अनुरूप रहा - तो  bias का वजन बढ़ता चला जायेगा । यदि माँ ने न कहा था - और अनुभव कटु हुआ - तो बच्चा सीखेगा की माँ की बात न मानने में मेरा नुकसान है (नकरात्मक और नकरात्मक = सकारात्मक )। इसके ठीक उलट - यदि माँ ने हाँ कहा था और अनुभव मीठा रहा - तो बच्चे यह सीखते हैं की अरे वाह - माँ की बात मानने में बड़ा फायदा है (सकारात्मक और सकारात्मक = सकारात्मक )। इन दोनों ही रूप में bias का वजन + की दिशा में बढ़ता है । 
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इस सीखे हुए अनुभव का उपयोग कैसे होगा? एक समय में अक्सर एक ही इनपुट होगा, या तो गर्म कुकर है, या फिर बजने वाला बाजा । तो एक input =+१ है, बाकी के इनपुट शून्य हैं । तो जोड़ जो बनेगा - वह उस एक ही इनपुट के असर से बनेगा । और उसी के हिसाब से परिणाम या तो +१ आएगा (अर्थात हाँ ) या फिर -१ आएगा (अर्थात ना )।

अगले भाग में हम यह देखने का प्रयास करेंगे की यह bias या इनपुट के वजन जो हमने इंसानी दिमाग में देखे समझे - ये artificial neuron में कैसे घटाए और बढाए जाते हैं ।

जारी ........

पूर्वाग्रह २ : पहचान और निर्णय

पूर्वाग्रह भाग १ देखें 

पिछले भाग में मैंने (लेख और टिप्पणियों के discussion में) कहने की कोशिश की - कि 

१. शब्द जो छवि बनाते हैं हमारे मन मस्तिष्क में - उसमे से कुछ भाषाज्ञान है, और कुछ पूर्वाग्रह | 

२, आम - फल है | किन्तु - कैसा है ? यह हर वह व्यक्ति बता सकता है - जिसने आम खाया है (समझाना तो मेरे बस का नहीं है) यह भाषाज्ञान है |


३.  मैंने यह भी कहा ( पोस्ट में भी और टिप्पणियों में भी ) कि यह पोस्ट मैं सिर्फ हमारी (मनुष्यों की) मानसिक प्रक्रियाओं पर concentrate कर के नहीं लिख रही हूँ, बल्कि ये मानसिक प्रक्रियाएं सिर्फ एक background हैं - आगे मैं natural neurons , artificial neurons और artificial neural networks पर बात करने वाली हूँ | 
अब - आगे ....
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पहली बात तो यह कि आम पीला है - यह हमारी सोच प्रक्रिया में बना हुआ एक पूर्वाग्रह है | कृपया यह न सोचें कि मैं पूर्वाग्रह की निंदा कर रही हूँ - नहीं तो आगे जो बातें होनी हैं - वे इस निंदा की image [ पूर्वाग्रह में प्रति पूर्वाग्रह ? ... :) ] की ही वजह से निरर्थक हो जायेंगी | इस पोस्ट के सन्दर्भों में पूर्वाग्रह निंदनीय नहीं है - यह अक्सर सहायक है सही पहचान के लिए | यदि यह अड़चन बनने लगता है - तो धीरे धीरे यह ( हमारी मानसिक प्रक्रियाओं के द्वारा ) बदल भी जाता है | हर आम तो पीला नहीं होता ( दसहरी , लंगड़ा हरे आम हैं ) - फिर भी यह बात तो है ही कि आम सुन कर पीला फल ही मन में उभरता है | इससे उलट - यदि गर्मियों के मौसम में दूर से फल का ठेला दिखे - तो यदि उस पर पीले फल दिख रहे हों - तो आम ही लगते हैं |  

यह ऊपर - दो अलग बातें है - 

(अ) आम पीले होते हैं - यह छवि - "cognition " कहलाती है हमारी इलेक्ट्रोनिक की इमेज प्रोसेसिंग की भाषा में | 
(ब) ठेले पर जब दूर से पीले फल दिख रहे हों - तो वह आम का ठेला है - यह "recognition " कहलाता है | 

जब cognition होता है - तब हम मशीन को सिखाते हैं कि किस वस्तु (label) के साथ क्या properties associate की जाएँ | इसी तरह - छोटे बच्चे को हम सिखाते हैं - अ- अनार का ; आ - आम का - और उस पुस्तक में अनार और आम की छवि होती है | लेकिन न हम उसे अनार सिखा रहे थे, न आम, हम तो उसे सिखा रहे थे कि यह जो अक्षर लिखा है किताब में - इसे बोला किस तरह से जाता है | इसके उलट - यह जो हम बोल रहे हैं "अ", "आ" इसे लिखा कैसे जाए |


अब समझें - दो प्रकार के factors हैं, जो हमारे निर्णय को प्रभावित करते हैं (उदाहरण के लिए - यह चीज़ / व्यक्ति मुझे पसंद आएगा / नापसंद / या न्यूट्रल ? ) ............ अब जैसे - किसी को आम पसंद है / किसी को नहीं | तो उसी एक फल को देख कर पहली बात तो यह कि - कोई पहचानेगा कि यह आम है, कोई नहीं पहचानेगा | ............ इसके आगे - किसी के मन में पसंद की भावना होगी - किसी के मन में नापसंदगी की | 


अ) एक - तत्काल अभी उस से क्या input आ रहा है ? (जो सामने फल है - यह आम है या नहीं इसे पहचानने के लिए उसका रंग, रूप. आदि )
बी) और दूसरा - लॉन्ग टर्म में मैंने उसके बारे में क्या जाना है | ( मीठा ? खट्टा ? रसीला ? नर्म ? सख्त ? )


तत्काल अभी आए inputs को weigh कर के जो असर होता है - वह एक sum बनाता है | इसमें पहले के अनुभव से आये bias को जोड़ा जात है | तब - इस मिले जोड़ के आधार पर - निश्चय लिया जाता है |

अब आगे बढ़ते हैं - neuron की ओर - कि वह कैसे decision लेता है कि किस वस्तु को किस category में रखा जाए | हमारे शरीर में एक nervous system है , जिसके हिस्से हैं nerves , spinal chord और brain | ये सब नयूरोंस पर बने हैं | ये नन्हे नयूरोंस करोड़ों की संख्या में हैं - और इनकी कई शाखाएं एक दुसरे से जुडी हैं | ये जुडी हुई शाखाएं एक से दुसरे को chemicals के exchange द्वारा सन्देश देती हैं | 


शरीर का एक प्राकृतिक neuron हमारे engineers द्वार बनाए artificial neuron से बहुत अधिक advanced है     


- किन्तु उसी को समझ कर और उसकी working को कॉपी कर के ही हम artificial neron और neural network बनाते हैं | इन नयूरोंस पर बात होगी अगले अंक में - कि  कैसे बनते और कार्य करते हैं | 


और एक ध्यान देने वाली बात है कि - जिस computer पर हम अभी बैठे हैं , वह हमारे nervous system से बहुत पिछड़ा हुआ है | एक तो वह अपने आप कुछ सोच नहीं पाता - उसे हर काम करना सिखाना पड़ता है | दूसरे - वह intellegent  नहीं है | यदि उसे (कंप्यूटर को) हम neural network दें भी - तब भी अभी बहुत दूर है वह दिन जब इसकी intellegence एक चमगादड़ की intellegence से भी मुकाबला कर सके, मानव दिमाग तो और दूर है अभी |


 अब सोचिये - बटन भर के दिमाग से चमगादड़ - ultrasound sonar से अपने आसपास की चीज़ें न सिर्फ दूरी और दिशा के लिए sense कर लेगा, बल्कि उसका आकर भी जान लेगा | यह भी decide कर लेगा कि यह चीज़ मुझसे कितनी बड़ी / छोटी है - अर्थात यह decision कि इस पर झपट्टा मार कर इसे खाना है - या इससे बच कर भागना है :) | यही करने में हमारे highly modern sonars को उस बटन भर के दिमाग वाले प्राणी से हज़ारों गुना समय लग जाता है |


तो क्या artificial neuron slow हैं ???
 नहीं
ये हमारे दिमाग से तेज़ हैं, हमारे दिमाग के neurons की typical स्पीड मिली सेकण्ड में है जबकि आपके कंप्यूटर kee nanosecond में | 
फिर ??


फर्क है - energy  efficiency में | जहां दिमाग के natural neurons बहुत कम गर्म होते हैं (ऊर्जा का waste ) तो दिमाग में कई neuron एक साथ काम कर सकते हैं, वहीँ हमारे कंप्यूटर का जो दिमाग है - वह processor chip है तो तेज़, किन्तु energy efficiency कम है - तो कम parallel काम हो सकते हैं, यह गर्म हो जायेगी | शायद आप जानते ही हैं कि pentium chip - mounted पंखे के साथ ही आती है - उसे ठंडा रखने के लिए | :) | [
 जब हम लोग lab में कोई experiment करते हैं - तो breadboard पर circuit बनाते हैं - जिसमे IC chips लगी होती हैं | कभी गलती से कोई IC छू जाए - तो हाथ वैसे ही जलता है जैसे रोटी बनाते हुए तवा छू जाने से :) ]
........... लेकिन हमारा दिमाग आखिरी बार कब गर्म महसूस हुआ था ?? जब हम अपने पिछले exam की तैयारी में जुटे हुए १ महीने की पढ़ाई १ घंटे में करने का प्रयास कर रहे थे ? :) तो - अधिक न्यूरोन काम कर रहे थे न तब ? वह भी हल्का गर्म, तवे जैसा नहीं - क्योंकि हमारे रक्त का बहाव coolant  का काम करता है - तो उतनी heating dissipate हो जाती है | यही फर्क है हमारे दिमाग और processor के दिमाग में लगे नयूरोंस की efficiency में - कि वे उतना काम एक साथ नहीं कर सकते जितना हम | 


आगे अगले भाग में ..................

पूर्वाग्रह 1 - पूर्वाग्रह क्या होता है ?

यह श्रंखला आगे बढाने का सोच रही हूँ ( आशा है इस बार अधूरी न छोड़ दूँगी ) तो पुराने (पहले) भाग को आज  repost कर रही हूँ :

पूर्वाग्रह ?
इस शब्द को सुन कर पहले पहल क्या भाव आता है मन में ?


यह जो भी भावना आपके मन में आई , इस शब्द से जो भी अच्छी या बुरी छवि मन में उभरी - वह आपके मन का पूर्वाग्रह है - इस शब्द की परिभाषा को लेकर | यदि आपके मन में यह आया कि "पूर्वाग्रह का शाब्दिक अर्थ है - पूर्व + आग्रह = किसी चीज़ को देखे / समझे / तौले / जाने बिना उसके बारे में पहले ही से कोई धारणा (अच्छी या बुरी) कायम कर लेना " तो आप "पूर्वाग्रह" से रहित होकर इस शब्द को परिभाषित कर रहे हैं | :)


कुछ प्रचलित सर्व ज्ञात हिंदी शब्द :
१. आम ?? ..............= फल, मीठा, पीला, रसीला .....
२. सूर्य ??........... = रौशनी, गर्मी, दिन, जीवनस्त्रोत, ....
३. चोट लगना ?? ........... = दर्द, तकलीफ, एक्सीडेंट, .....
४. दोस्त ??......... = ख़ुशी, बांटना , साथ, अपनापन, .....

आदि कई उदहारण हैं, जहां एक शब्द पढ़ / सुन कर हमारे मन में  कोई छवि उभर आती है | क्या यह सब छवियाँ पूर्वाग्रह हैं ? शायद हाँ, शायद नहीं | 


आम - यदि हमने देखा है, खाया है, और हम हिंदी जानते हैं ( कि आम किसे कहते हैं ) | यदि हमने इसे देखा / खाया न हो, या हम सिर्फ फ्रेंच भाषा जानते हों - तो ? क्या तब भी यह शब्द यही छवि बनाएगा ? नहीं | इसका अर्थ यह लगता है की यह जो पूर्वाग्रह (?) है हमारा कि आम एक रसीला, मीठा, पीला फल है - पहली बात तो हर बार, हर आम के लिए सही नहीं है. दूसरे, यह पूर्वाग्रह भी कोई पूर्वाग्रह नहीं है, बल्कि हमारे पुराने अनुभव के आधार पर ही बना है | लेकिन हर आम तो पीला नहीं होता न ? (लंगड़ा आम? दसहरी आम? ) न ही हर आम मीठा / रसीला ही होता है | फिर भी इस शब्द से यह छवि क्यों उभरती है पहले पहल ? यह परिभाषा कैसे बनी ? यह कैसे बदल सकती है ?


एक और उदाहरण लेती हूँ - हिंदी फिल्मों से | ५० या ६० के दशक की फिल्मों में "माँ " शब्द क्या छवि बनाता था ? शायद एक पुरानी साडी में लिपटी हुई प्रेम की मूर्ती की ? जो अपनी सारी निजी ज़रूरतों और भावनाओं को परे कर सिर्फ बेटों (बेटियों जानते बूझते नहीं लिखा है ) के लिए जीती थी | फिर आज की फिल्मों की माँ ? वह इतनी त्यागिनी नहीं दिखाई जाते | दिखाई भी जाये -तो शायद एक्सेप्ट भी न हो | न ही उसे हमेशा साडी में दिखाया जाता है | टीवी के एडवरटाइज्मेंट्स / सीरिअल्स में भी देखें, तो २० साल पहले की माँ और अज के माँ में ज़मीन आसमान का फर्क है | यही फर्क बहू में भी है, नायक और नायिका में भी | 


तो क्या हम इस माँ, बहु, नायक, नायिका को एक्सेप्ट नहीं करते ? या उस समय वालों को ? एक जनरेशन के लिए जो नेचरल है, दूसरी के लिए नाटकीय क्यों है ? क्या यह सब पूर्वाग्रह का खेल है ? 


यही  बात बाकी के उदाहरणों पर भी लागू होती है - न हर शब्द का अर्थ हर बार, हर सन्दर्भ में वह होता है जो हम आमतौर पर स्वीकार करते हैं, न हर बार उससे विपरीत | इसी पूर्वाग्रह पर मैं इस शृंखला में चर्चा करूंगी।  इसके आगे फिर हमारे मानसिक पूर्वाग्रहों से आगे बात करेंगे की इलेक्ट्रोनिक्स में bias के क्या अर्थ हैं, fixed और varying bias क्या होते हैं | और neural networks में किस तरह से हमारे मानसिक पूर्वाग्रहों और decision Making के आधारों को प्रयुक्त कर के artificial intellegence बनाई जाती है - कैसे मशीन को सिखाया जाता है की वह भी हमारी ही तरह अलग अलग inputs के आधार पर निर्णय ले पाए कि किस स्थिति में क्या किया जाये | यह भी कि "पूर्वाग्रह" करना कैसे सीखती है मशीन |


आशा है इस शृंखला में आप मेरे साथ होंगे | 

रविवार, 29 नवंबर 2015

शिवपुराण २१ : नंदिकेश्वर और अत्रीश्वर


हमने पहले ज्योतिर्लिंगों के विषय में पढ़ा। इनके अतिरिक्त भी शिव आराधना में बहुत से तीर्थ सुविख्यात हैं। आज हम नंदिकेश्वर और अत्रीश्वर तीर्थ स्थलों पर चर्चा करते हैं।
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नंदिकेश्वर :
कर्णकी नामक शहर में एक ब्राह्मण रहते थे । वह अपने दो पुत्रों को अपनी पत्नी को सौंप कर वाराणसी की यात्रा को गए और वहां से उनकी मृत्यु की ही खबर आई। ब्राह्मणी ने बड़े यत्न से पुत्रों का लालन पालन किया और उनके विवाह किये। ब्राह्मणी वृद्धा हो चुकी थीं किन्तु शरीर के अति शिथिल हो जाने पर भी उनके प्राण न छूटते थे। एक दिन उनके बड़े पुत्र ने सप्रेम पूछा कि माँ आपकी क्या इच्छा है जो अधूरी है ? तब माँ ने कहा कि पुत्र मैं वाराणसी जाना चाहती थी किन्तु जा न सकी। माता ने पुत्रों से वचन लिया कि उनका अस्थि विसर्जन वाराणसी में ही किया जाए और शांत मन से विदा हुईं।

अंतिम संस्कार के बाद बेटा "सुवधि" माँ की अस्थियां ले वाराणसी को चला। राह में वह एक ब्राह्मण के घर रुका। सुवधि ने देखा कि जब ब्राह्ण गाय को दुहने आया तो बछड़ा माँ को न छोड़ता था। तब ब्राह्मण ने एक लकड़ी से मार कर बछड़े को दूर किया और गौ को दूहा। ब्राह्मण के जाने के बाद सुवधि ने देखा कि शुभ्र गाय अपने बछड़े से बोली कि तुझे मारने से मैं बहुत क्रोधित हूँ और कल मैं इस ब्राह्मण के पुत्र को मार दूँगी।

अगले दिन ब्राह्मण का बेटा आया तो गाय ने अपने सींगों से उसे मार डाला। लेकिन यह ब्रह्महत्या हुई। इससे गाय का रंग तुरंत सफ़ेद से काला हो गया। सुवदि हैरान थे। उन्होंने देखा कि गाय बाहर चली और वे उसके पीछे गए। उन्हें बहुत आश्चर्य हुआ जब उन्होंने देखा कि गाय जाकर नदी में डुबकी लगा कर निकली और फिर से धवल हो गयी थी। इसका अर्थ इस जगह ब्रह्महत्या का पाप भी धुल गया था। ब्राह्मण अचरज करते लौटने लगे तो एक स्त्री प्रकट हुईं और उनसे प्रश्न किया कि कहाँ जाते हो। जब सुवधि ने वाराणसी की बात कही तो स्त्री ने कहा मैं ही गंगा हूँ और यह बहुत सशक्त तीर्थ है। तुम अपने माँ की अस्थियां यहीं विसर्जित करो।

सुवधि ने यही किया और तुरंत अपनी माँ को आकाश में प्रकट देखा। वे बहुत प्रसन्न थीं और बोलीं कि अच्छा हुआ तुमने यह किया। अब मैं स्वर्ग जा रही हूँ। यहां एक कन्या ऋषिका ने शिव जी की तपस्या की थी जिसके प्रभाव से यह स्थल अति पवित्र तीर्थ हुआ है। और वे अंतर्ध्यान हुईं।

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अत्रीश्वर तीर्थ

कमद नामक वन में सौ वर्षों तक वर्ष न होने से भयंकर सूख पड़ा था। इसके लिए अत्रि मुनि और उनकी पत्नी अनुसूया ने कठोर तप किया। कई वर्षों के तप के बाद अत्रि जी की समाधि टूटी। उन्हें प्यास महसूस हुई और अनुसूया जी पति के लिए जल लेने गयीं। तब उनके सम्मुख गंगा जी प्रकट हुईं और कहा कि वे प्रसन्न हैं।तब सती अनुसूया जी ने उन्हें वहीँ सरोवर में रहने को कहा। फिर उस सरोवर का जल वे पति के लिए लेकर गयीं। अमृतमय जल पीने पर अत्रि जी पत्नी सहित वहां आये और उन दोनों के तप के पुण्य प्रभाव से गंगा जी उसी सरोवर में वहां बस गयीं।

उधर शिव जी ने प्रकट होकर अनुसूया जी से वरदान मांगने को कहा। अनुसूया जी ने शिव जी को सदा वहां बसने को कहा। इस वजह से यहाँ शिव जी का निवास है और यह पुण्यभूमि है।

गुरुवार, 30 जुलाई 2015

शिवपुराण २० : गणेश shivapurana20 ganesh

कैलाश पर्वत पर पार्वती माता के कक्ष के द्वार की रक्षा भी शिवजी के ही गण करते थे। लेकिन शिव जी किसी भी समय आएं उनके गण उन्हें भीतर जाने से न रोकते थे और इस कारण पार्वती जी असहज महसूस करती थीं। उनकी सहेलियों को भी यह अच्छा न लगता था और वे माता को समझातीं कि उनकी द्वारसेवा को उनका अपना गण होना चाहिए। तब एक दिन माँ ने मिटटी से (कहीं कहा गया है कि अपनी उबटन से) एक सुंदर बालक की मूरत गढ़ी और उसमें प्राण प्रवाहित कर दिए। बालक ने प्रणाम किया और पूछा - "हे माते - मेरे लिए क्या आज्ञा है ?"उमा जी ने पुत्र को गणेश नाम दिया और एक दण्ड प्रदान करते हुए कहा कि तुम द्वार की रक्षा करो और किसी को भी भीतर न आने देना। बालक द्वार की रक्षा करने लगा और माता जी स्नान को चली गयीं।

इधर शिव जी आये और हमेशा की तरह भीतर जाने लगे। बालक गणेश ने उन्हें रोक कर कहा कि आप भीतर नहीं जा सकते क्योंकि मेरी माता की आज्ञा नहीं है। इस पर शिव जी हँसे और बालक से बोले कि यह मेरी पत्नी का कक्ष है और मैं कभी भी भीतर जा सकता हूँ। मैं शिव हूँ और इस कैलाश का अधिपति हूँ। किन्तु गणेश ने कहा कि मैं सिर्फ अपनी माता को जानता हूँ , शिव कौन हैं यह मुझे नहीं मालूम। आप भीतर नहीं जा सकते हैं। शिव जी थोड़े क्षुब्ध हुए और अपने गणों को इस उद्दंड बालक को राह से हटाने को कहा। गणों ने प्रयास किया किन्तु गणेश ने उनकी दण्ड से पिटाई कर दी :) इस पर भी शिव जी भीतर जाने लगे तो गणेश ने उन्हें भी डंडा लेकर मार दिया।

अब देवतागण और ब्रह्मा विष्णु जी भी वहां आये किन्तु ब्रह्मा जी जब बालक को समझाने गए तो बालक ने उन्हें भी मारना शुरू कर दिया , वे वापस आ गए। देवताओं और शिवगणों ने बालक पर हमले किये किन्तु बालक के आगे सब हार गए।  उधर शक्ति माता भी इस युद्ध को अपनी प्रतिष्ठा से जोड़ कर देख रही थीं और पुत्र को अस्त्र शस्त्र प्रदान करती जा रही थीं।

इधर विष्णु जी ने शिव जी से कहा कि यह कोई साधारण बालक नहीं लगता इसे चाल से हराना होगा। तब विष्णु जी ने गणेश पर हमला किया और जब गणेश उनसे युद्ध कर रहे थे तब पीछे से शिव जी ने त्रिशूल से उनका सर काट दिया। त्रिशूल से कटा सर कहीं दूर खो गया और बालक का धड़ मृत होकर गिर पड़ा।

इस प्रकार धोखे से अपने पुत्र की मृत्यु होती देख माता कुपित हुईं और उन्होंने करोड़ों शक्तियां भेज दीं जो देवताओं को खाने लगीं और चहुँ ओर विध्वंस करने लगीं। देवता घबरा गए और माता को मनाने के लिए ब्रह्मा विष्णु महेश्वर से विनती की। किन्तु माता ने कहा कि जब तक मेरा पुत्र पुनर्जीवन न किया जायेगा तब तक मैं शांत नहीं होउंगी। तब शिव जी ने सेवकों को कहा कि आप जाइए और जो पहला जीव दिखे उसका सर लेकर आइये। संयोग से पहला प्राणी एक हाथी मिला और वे लोग उसका सर काट कर ले आये। शिव जी ने सर जोड़ कर बालक को पुनर्जीवित किया किन्तु माता ने कहा कि बालक इससे अधिक का अधिकारी है। तब गणेश "गणपति" (गणों के अधिपति) नियुक्त हुए और साथ ही यह निश्चय हुआ कि वे प्रथम पूज्य होंगे। कोई भी शुभ कार्य उनकी पूजा से ही आरम्भ हो सकेगा।

परिवार सुखपूर्वक कैलाश पर रहता था। एक बार कार्तिकेय और गणेश में पहले किसका विवाह हो इस पर बहस छिड़ गयी। इसकी पूरी कथा इस भाग में है (लिंक)

जारी ………




मंगलवार, 28 जुलाई 2015

शिवपुराण १९ : कार्तिकेय और ताड़कासुर

शिव जी और पार्वती जी के विवाह (लिंक) के उपरांत नवदम्पत्ति लम्बे समय तक हिमवान जी के ही घर में रहे। फिर एक दिन शिव जी ने हिमालय जी और मैना जी से आज्ञा ली और अपनी संगिनी श्री पार्वती जी सहित कैलाश पर लौट आये। दोनों लम्बे समय तक बहुत सुखपूर्वक दाम्पत्य जीवन का आनंद लेते हुए कैलाश पर निवास करते रहे। इधर तारकासुर के संहारक के आने के लिए देवगण व्याकुलता से प्रतीक्षा करते थे। उन्होंने ब्रह्मा जी से सहायता मांगी और वे सब ब्रह्मा जी को संग लेकर विष्णु जी के पास पहुंचे और उनसे कहा कि विवाह को इतना समय बीतने के बाद भी शिवपुत्र का जन्म अब भी प्रतीक्षित ही है। देवताओं ने विष्णु जी से प्रार्थना की कि वे शिव जी के पास जाएँ और उन्हें अपने विवाह के पीछे के देवकल्याण हेतु की याद दिलाएं। विष्णु जी नवदम्पत्ति के नवजीवन में विघ्न नहीं डालना चाहते थे किन्तु देवताओं के आग्रह पर देवताओं सहित शिवधाम को आये।

देवगणों ने शिव जी के सम्मुख अपनी प्रार्थना की। शिव जी के वीर्य की कुछ बूँदें छिटक कर धरती पर गिरीं और अग्निदेव ने तुरंत पक्षी बन उन्हें चुग लिया। पार्वती अत्यंत क्रुद्ध हुईं कि मेरी होने वाली संतान की आस में आप लोगों ने विघ्न पहुंचाया है। इस बात पर क्षुब्ध होकर श्री पार्वती जी ने देवताओं को श्रापित किया कि उनकी पत्नियां भी निःसंतान ही रहेंगी।

अग्निदेव तो तेज और ऊष्मा के ही स्वामी देव हैं किन्तु शिव वीर्य के तेज ताप को वे सहन नहीं कर पा रहे थे तब उन्हें शिव जी ने अनुमति दी कि वे इस वीर्य को एक तेजस्विनी स्त्री के गर्भ में स्थापित कर सकते हैं। अग्निदेव ने वीर्य को ६ स्त्रियों के गर्भ में उनके रोमकूपों के माध्यम से पहुंचाया। किन्तु वे भी इसे न धारण कर सकीं , और हिमालय पर बर्फ की ठंडक में इसे त्याग दिया। किन्तु इन बूंदों के ताप ने हिमालय की न ही सिर्फ बर्फ को पिघलाया , बल्कि पत्थरों को पिघला दिया और हिमालय की धरा धातु सी दहकने लगीं। तब इन्हे हिमालय नंदिनी श्री गंगा जी के बहाव सौंपा गया किन्तु जल में तपन आने से शीतल गंगा भी उबल पड़ीं।

गंगा जी की धारा के पास की ईखों सरकंडों के बीच मार्घशीर्ष के शुक्ल पक्ष की षष्ठी के रोज तेजस्वी बालक का जन्म हुआ। उधर से गुज़रती कृतिकाओं की नज़र बालक पर पड़ी और वे सब उस बालक को अपना दूध पिलाना चाहती थीं और आपस में लड़ पड़ीं। तभी बालक के ६ मुख हुए और सभी माताओं ने प्रसन्नतापूर्वक दुग्धपान करवाया। कृतिकाओं ने अपना दूध पिला कर बालक को पाल पोस कर बड़ा किया। इस कारण बालक "कार्तिकेय" हुए। श्री विश्वामित्र जी ने बालक को "गुहा" नाम दिया और ब्रह्मज्ञान भी दिया - साथ ही आशीष दिया कि वे ब्रह्मर्षि होंगे। अग्निदेव ने बालक को शक्ति नामक अस्त्र प्रदान किया। गुहा क्रौंच पर्वत पर गए और अपने अस्त्र से प्रहार किया। पर्वत बिखरने लगा और उसमे वास करने वाले असुरों ने बालक पर हमला किया जिन्हे बालक ने आसानी से मार दिया। बालक की वीरता सुन कर इंद्र उन पर हमला करने आये। इंद्र ने बालक के पर वज्र प्रहार किया तो दाहिने पक्ष से "शाख" प्रकट हुए, बाहिने अंग से "विशाख" उत्पन्न हुए और छाती पर प्रहार करने से "नैगम" हुए। गुहा और इन तीनों ने इंद्र की तरफ कदम लिए तो देवसेना भाग खड़ी हुई।

एक दिन पार्वती माँ ने शिव जी से प्रश्न किया कि उस दिन जो वीर्य की बूँदें धरा पर छिटकी थीं उनका क्या हुआ। तब शिव जी ने देवताओं से प्रश्न किया और कार्तिकेय के बारे में जान कर अति प्रसन्न हुए। तब शिव जी ने अपने शिवगणों को कृतिकाओं के पास से पुत्र को लाने भेजा और माताओं से अनुमति लेकर कार्तिकेय कैलाश आये। कैलाश पर उत्सव हुआ और देवताओं ने कार्तिकेय जी को अपने अपने अस्त्र और शक्तियां भेंट कीं। शिव जी ने ब्राह्मणों से कार्तिकेय जी का राज्याभिषेक करवाया और तबसे कार्तिकेय कैलाशपुरी के अधिपति हुए।

एक बार नारद जी कार्तिकेय जी के पास आये और यज्ञ के लिए निर्धारित हुई बकरी के खो जाने की बात कही। उन्होंने कहा कि मैंने संकल्प लिए है और वह बकरी न मिली तो यज्ञ अधूरा रह जाएगा। कार्तिकेय जी ने बकरी तलाशी तो वह धरती पर न थी। उसे खोजते हुए वे विष्णुलोक पहुंचे जहां उसने ऊधम मचा रखा था। वह उनपर अपने सींगों से हमला करने लगी। तब कार्तिकेय जी उसकी पीठ पर सवार हुए और तीनों लोकों से होते हुए उसे वापस ले आये। किन्तु नारद जी ने जब बकरी मांगी तो उन्होंने अखा कि आपका यज्ञ सफल हो ही गया है - अब आप इस बेचारी के प्राण न लीजिये। तब नारद जी प्रसन्न मन से वहां से चले गए।

इधर कार्तिकेय के शौर्य को देख देख कर देवता बहुत प्रसन्न थे। आत्म विश्वास से परिपूर्ण होकर देवताओं ने कार्तिकेय जी से देव सेना के प्रधान बनने का आग्रह किया। उनके नेतृत्व में देवताओं ने तारकासुर पर हमला किया किन्तु उसके सामने देवता फीके थे। इंद्र और सभी लोकपाल उसके आक्रमणों से बेहोश हो गए। श्री वीरभद्र और विष्णु जी भी पराजित हुए। तब कार्तिकेय जी आगे आये तो तारकासुर ने छोटे बालक के पीछे छिपने के लिए देवताओं को धिक्कारा और कहा कि यदि यह बालक युद्ध में मेरे हाथो मार जाए तो आप ही उत्तरदायी होंगे। किन्तु जब युद्ध हुआ तो मुकाबला बराबरी का लगता था। दोनों योद्धा लहू लुहान हुए। फिर कार्तिकेय जी ने शक्ति के प्रहार से तारकासुर का वध किया।


जारी …

बुधवार, 22 जुलाई 2015

शिव पुराण १८ : केतकी और चम्पक के फूल


केतकी और चम्पक के फूल शिव जी को नहीं चढ़ाये जाते। इस भाग में इन फूलों से ही सम्बंधित तीन कथाएं पढ़ते हैं।

१: ब्रह्मा, विष्णु, शिवलिंग और केतकी
२. सीता और केतकी
३. नारद, ब्राह्मण और चम्पक

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१: ब्रह्मा विष्णु शिवलिंग और केतकी

(brahmaa vishnu altercation and shivalinga and the ketaki flower )

पहली कथा है कि प्रलय के बाद जब सृष्टि नहीं हुई थी तब एक बार विष्णु जी और ब्रह्मा जी में बहस छिड़ गयी कि दोनों में कौन बड़ा है, कौन पूजनीय है । उन महाशक्तियों की क्रोधित बहस से संसार डोलने लगा। देवगण दौड़े हुए शिव जी के पास गए और उनसे सहायता मांगी।

शिव जी उन दोनों के मध्य प्रकाश लिंग के रूप में प्रकट हुए और गंभीर शब्द हुआ कि आप दोनों इस प्रकाश स्तम्भ का ओर छोर खोजिये। जो खोज ले वही महानतम होगा।

तब ब्रह्मा जी ने श्वेत हंस का रूप लिया और विष्णु जी ने श्वेत वराह का। हंस रूपी ब्रह्मा ऊपर को उड़ चले और वराह के रूप में विष्णु जी नीचे को गए। लम्बे समय बाद भी दोनों को कोई अंत न मिला। तब विष्णु जी लौट आये। किन्तु ब्रह्मा जी जब ऊपर जाते थे तो उन्हें ऊपर से गिरता केतकी का फूल मिला।ब्रह्मा जी ने केतकी से पूछा क्या तुम शीश से आई हो? केतकी ने कहा इस प्रकाश लिंग का कोई अंतिम सिरा है ही नहीं, यह अनादि अनंत है। जहां से मैं गिरा हूँ उससे भी बहुत ऊपर तक यह प्रकाश स्तम्भ दीखता है। कहाँ तक है इसका कोई पता नहीं।

ब्रह्मा जी ने केतकी से कहा कि हमारी स्पर्धा में मैं हारना नहीं चाहता। सो मैं कहूँगा कि मैंने सिरे को पा लिया और तुम्हे वहीँ से लाया हूँ। तुम साक्ष्य देना। केतकी मान गई। वे दोनों वहां लौटे जहां विष्णु जी थे। ब्रह्मा जी की बात और केतकी के प्रमाण पर विश्वास कर विष्णु जी ने ब्रह्मा जी को पूज्य स्वीकार किया। तब वहां शिव जी प्रकट हुए। उन्होंने कहा कि जब हमारा कोई सिरा है ही नहीं तब आपने सिरा कैसे पाया ? पूज्य होने के लोभ में आपने हमारे अंत को पाने के संदर्भ में असत्य कहा। सो अब धरती पर आप की पूजा नहीं होगी। और केतकी ने भी इस झूठ में समर्थन दिया था सो यह फूल हमारी अर्चना में कभी स्वीकार्य नहीं होगा। तब से केतकी के फूल शिव जी को नहीं चढ़ाये जाते।

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कथा २: सीता और केतकी :
(Seeta and the ketaki flower)

कथा सुनाते हुए श्री रोमहर्षण जी ने कहा कि शिवपूजा में कभी भी केतकी या चम्पक प्रयुक्त नहीं किये जाने चाहिए। मुनियों ने कारण पूछा तब उन्होंने यह कथाऐं कही।

जब श्री राम सीता और लक्ष्मण वन को चले गए तो यह दुःख श्री दशरथ जी के लिए असह्य हो गया। जीवन जीने की जिजीविषा त्याग उन्होंने स्वर्ग को प्रस्थान किया। यह खबर चित्रकूट पहुंची जहां श्री राम पत्नी और भाई सहित पर्णकुटी में निवास कर रहे थे। श्री राम दशरथ जी के ज्येष्ठ पुत्र थे और उन्हें अपरा अनुष्ठान करने थे। राम जी ने लक्ष्मण जी को सामग्रियाँ लेने गाँव भेजा किन्तु वे समय से न लौटे। दोपहर होती देख श्री राम स्वयं ही सामग्री लेने चले किन्तु उन्हें भी देर हो गयी। दोपहर से पहले संस्कार करना आवश्यक था और दोनों भाई अब तक न आये थी। सीता बहुत चिंतित थीं। आखिर समय बीतता देख सीता जी ने स्वयं ही संस्कार करने का निर्णय लिया। उन्होंने फाल्गु नदी में स्नान किया और भीगे वस्त्रों में मिटटी का दिया जलाकर पूर्वजों को पिंड अर्पित किया।

तुरंत आकाश वाणी हुई कि हे सीता , हम तुम्हारे चढ़ावे से प्रसन्न हैं और तुम्हे आशीष देते हैं (जो नारीवादी कहते हैं कि भारतीय संस्कृति स्त्री को श्राद्ध आदि का अधिकार नहीं देती वे कृपया ध्यान दें - सीता जी ने स्वयं यह अनुष्ठान किया था)। तब आकाश से दो हाथ प्रकट हुए जिन्होंने सामग्री स्वीकार की। सीता जी ने अपने आप को सम्हाला और आकाशवाणी से प्रश्न किया कि आअप कौन हैं ? शब्द हुआ कि हम ही अयोध्या पति दशरथ हैं और आपके श्वसुर हैं। हम संस्कार से तृप्त हैंआपका तर्पण स्वीकार कर रहे हैं। सीता ने चकित हो कर पूछा - हे पिताश्री। आपके सुपुत्र श्री राम और लक्ष्मण मेरी इस बात पर कैसे विश्वास करेंगे कि आकाश से हाथ आये और उन्होंने पिंडदान स्वीकारा ? वे हँसेंगे कि मैंने कैसे ऐसे हाथों को हमारे पिता दशरथ जी के हाथ मान लिया ?
श्री दशरथ बोले कि जब यह सत्य है ही तो उन्हें मानना ही होगा। फिर भी तुम चाहो तो तुम्हारे चार साक्षी होंगे। ये फाल्गु नदी जो बाह रही है , वह गाय जो वहां चर रही है , ये अग्नि जिससे तुमने यह संस्कार किया , और यह केतकी की झाडी जिसमे केतकी के फूल खिले हैं। इसके बाद वाणी थम गयी और हाथ अंतर्ध्यान हुए ।

शीघ्र ही श्री राम और लक्ष्मण सामग्री लेकर लौटे और उन्होंने सामग्री सीता को देकर जल्दी पकाने को कहा , क्योंकि बहुत समय हो चला था। बार बार कहने पर भी वे दोनों न माने कि सीता जी संस्कार कर चुकी हैं। चारों साक्षियों ने भी मना कर दिया कि उन्होंने कुछ नहीं देखा। तब सीता जी ने पति के कहने पर वह सामग्री पकाई और तब श्री राम तर्पण करने लगे। दोबारा आकाशवाणी हुई कि सीता श्राद्ध कर तो चुकी हैं और हम उनके तर्पण को स्वीकार भी कर चुके हैं। तब आप दोबारा हमें क्यों पुकारते हैं? किन्तु श्री राम को विश्वास नहीं हुआ और उन्होंने साक्ष्य माँगा । तब वाणी ने कहा कि जब हम सूर्यवंशी हैं तो आप सूर्यदेव से ही पूछ लें। तब सूर्यदेव ने कहा कि सीता सत्य कह रही हैं और चारों साक्षी असत्य कह रहे थे (नारीवादी ध्यान दें - श्री सीता जी स्त्री हैं - उनकी बात सत्य और अग्नि और गौ जैसे साक्षियों को अविश्वसनीय माना गया)।
श्री राम और लक्ष्मण जी ने श्री सीता जी से उन पर अविश्वास जताने के लिए क्षमा मांगी। अब सीता जी ने उनकी बात तो स्वीकारी किन्तु स्वयं को झूठा साबित करने दिए चारों साक्षियों को दंड में श्राप दिया ।

१. फाल्गु नदी श्रापित हुई कि अब वह सिर्फ भूगर्भ में बहेगी, बाहर नहीं।
२. केतकी कभी शिव जी को नहीं चढ़ाई जायेगी , चढ़ाई भी जाए तो अस्वीकृत होगी।
३. गाय ने अपने मुंह से झूठ कहा था। तो गाय का का मुंह अब से अशुद्ध माना जाएगा (बाकी शरीर पहले ही की तरह शुद्ध मान्य होगा - दूध, गोमूत्र और गोबर भी। )
४. अग्निदेव भी भय से काँप रहे थे कि उन्हें क्या श्राप मिलेगा। सीता जी ने कहा कि आप अब से हर वस्तु को अविवेकी होकर ग्रहण कर लेंगे - चाहे वह शुद्ध हो या अशुद्ध।

तबसे केतकी के फूल शिव जी को नहीं चढ़ाये जाते।
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चम्पक का पेड़ और नारद
(Narada and the champak tree )

गोकर्णं में एक प्रसिद्ध शिव मंदिर है। एक बार नारद जी वहां आये और वे शिव जी की पूजा करना चाहते थे। राह में उन्होंने एक चम्पक का पेड़ देखा जो बहुत सुंदर फूलों से लदा हुआ था। नारद प्रसन्न मन से उसे देख रहे थे कि ये फूल शिव जी के लिए लेकर जाएँ। तभी एक ब्राह्मण वहां आया किन्तु नारद जी के सामने फूल तोड़ने में संकोच में पड़ गया। नारद जी ने पूछा - हे ब्राह्मण , आप कहाँ जाते हैं ? ब्राह्मण ने झूठ ही कह दिया कि मैं भिक्षा मांगने जा रहा हूँ। तब नारद जी मंदिर को गए और उनके जाते ही ब्राह्मण ने सारे फूल तोड़ लिए। अपनी डलिया को वस्त्र से ढंक कर वह लौटने लगा तो मंदिर से लौटते नारद जी से फिर भेंट हुई। नारद जी ने फिर पूछा अब कहाँ जाते हो ? तो फिर ब्राह्मण ने फिर झूठ कहा - घर जाता हूँ। नारद जी को विश्वास न हुआ। उन्होंने चम्पक पेड़ से प्रश्न किया - क्या उस ब्राह्मण ने तुम्हारे फूल लिए ? चम्पक ने कहा - "क्या? कौन ब्राह्मण? आप किसकी बात कर रहे हैं ? मैं किसी ब्राह्मण को नहीं जानता। "

तब नारद जी वापस मंदिर गए जहां उन्होंने वे ही फूल शिवलिंग पर देखे। तब उन्होंने वह प्रार्थना करते दूसरे भक्त से पूछा कि ये फूल कौन लाया था?

उस व्यक्ति ने उत्तर दिया - वही दुष्ट ब्राह्मण लाया था जो अभी आपके आगे आगे आया। वह रोज़ चम्पक पुष्पों से शिव पूजा करता है और शिव जी की उस पर कृपा है। इस शिव कृपा के कारण उसने गोकर्ण के राजा को अपने चंगुल में ले रखा है और बहुत धन सम्पत्ति बनाई है। वह दुसरे ब्राह्मणों का अपमान भी करता है।

तब नारद जी ने शिव जी से प्रश्न किया कि आप क्यों ऐसे दुष्ट का साथ देते हैं ? शिव जी बोले कि यदि कोई चम्पक पुष्पों से मेरी पूजा करे तो मैं कुछ नहीं कर सकता - मुझे उसकी पूजा स्वीकार करनी ही होगी।
तब नारद जी ने सोचा ऐसे दुष्टों को शिव जी से दूर रखना आवश्यक है। उन्होंने झूठ बोलने वाले चम्पक को श्रापित किया कि अब कभी चम्पक फूल शिव जी को नहीं चढ़ेंगे। और उस ब्राह्मण को अगले जन्म में राक्षस होने का श्राप मिला। अगले जन्म में राक्षस हुआ वह ब्राह्मण शिव जी के ही हाथों से मृत्यु को प्राप्त हुआ और पुनः ब्राह्मण हुआ।

शनिवार, 4 जुलाई 2015

upsc परीक्षा में लड़कियों ने बाजी मारी। क्यों?

यह पोस्ट पूरीपढ़े बिना ओपिनियन न बनाइये कि मैं क्या कह रही हूँ।

सब जगह पढ़ रही हूँ आईएस में टॉप 4 लड़कियाँ/ पहले भी ऐसा पढ़ती सुनती रही कि यहाँ लड़कियां वहां लड़कियाँ।ऐसे कवरेज है जैसे कोई जश्न की बात हो। लेकिन मुझे यह कुछ ठीक नही लगता।क्यों? 

क्योंकि यदि यह कोई गर्व की बात नहीं कि माँ हमेशा इस बात पर खुश हो कि बेटे ने बेटी को मात दे दी ; तो उसी तरह हर बार इस पर खुश होना भी गलत है कि बेटी ने बेटे को। नारी बराबरी होनी चाहिए लेकिन इस का अर्थ बेटों को नीचा बना कर बेटियों पर फख्र करना नहीं है। 

फिर इस साल किसी बोर्ड रिज़ल्ट पर टीवी चैनलों पर मैदान मारने सा सेलिब्रेशन था कि "आखिर इस बार पछाड़ ही दिया लड़कों ने लड़कियों को" - यूँ लगा कि कोई "शत्रु" बरसों से "हमें" हराता रहा आखिर हम ने उसे मात दे ही दी। दुःख हुआ।

आपको कभी यह ख्याल नहीं आया कि क्यों? लड़कियां आगे क्यों निकलती हैं हर बार? और इस बार ऐसा क्यों?

नारीवाद और पुरुषवाद से इतर सोचिये। क्यों? क्यों आखिर??

इसलिए कि वे प्रेशर में हैं। वे अपने आप को प्रूव कर रही हैं।उनपर शायद sabconscious प्रेशर है कि उन्हें पढ़ने का "मौक़ा?" देकर उनके परिवार/ समाज/ समाज सुधारक/ आदि आदि ने जो "अहसान स्त्री जाति" पर किया है उसे उन्हें सिद्ध करना है। उन्हें प्रूव करना है कि वे इस लायक हैं। 

वे क्यों अव्वल आती हैं बार बार सोचिये? probability से तो ऐसा नहीं होना चाहिए न? क्यों नहीं वे पढाई को in my stride ले पातीं? क्यों उनपर अव्वल आने का इतना दबाव है कि बार बार बार बार बार यह पैटर्न रिपीट हो? 

लड़कियों - इस प्रेशर को परे करो। हाँ!!! ज़रूर आओ अव्वल। बहुत अच्छा है। हर बार आओ तो भी बहुत अच्छा है। लेकिन हर बार आना "जरूरी" नहीं। एन्जॉय यूर लाइफ। पढाई करो कि यह भली है। लेकिन अव्वल आने का प्रेशर न हो तो और अच्छी।

और मित्रों। मैं ईश्वर नहीं। मैं गलत हो सकती हूँ। मुझे बस ऐसा लगा तो मैंने लिखा। इस पोस्ट को नारीवाद या पुरुषवाद से न जोड़ें। दोनों बच्चे हमारे हैं। क्या लड़की क्या लड़का। मानती हूँ यह कोइन्सिडेंस हो सकता है किन्तु प्रोबेबिलिटी लॉज़ नहीं कहतीं कि कोइन्सिडेंस से हर बार एक ही सम्भावना पूर्ण होती रहे। कहीं कुछ गड़बड़ तो है ही।सोचियेगा? 

प्रोबेबिलिटी थियरि से दोनों आउटकम बराबर होने चाहिए।

When any "random" event is done in "fair" circumstances with "2" possible outcomes; the probability of occurrence of "any one of the two outcomes" is 1/2

90% occurrence of any one of two possible outcomes suggests that there is an unfairness built in somewhere. We need to analyse this. Instead of being almost proud of it.


Every year every exam - no. There is something definitely and seriously wrong here. Which we are trying to avoid looking at by convincing ourselves that it is normal.

शुक्रवार, 26 जून 2015

शिव पुराण १७ : / घुुष्णेश्वर /घृष्णेश्वर / घुश्मेश्वर ज्योतिर्लिंगम्

इस ज्योतिर्लिंग की भौगोलिक स्थिति के बारे में भी अलग अलग मत हैं . कोई इन्हें महाराष्ट्र के औरंगाबाद के पास बताते हैं तो कोई कहते हैं कि श्री घुश्मेश्वर राजस्थान के शिवालय (शिवाड ) ग्राम में विराजमान है . यह ज्योतिर्लिंग स्वयम्भू है अर्थात यह किसी के द्वारा निर्मित नहीं किया गया , अपितु स्वयं उत्पन्न है . 

कथाएँ कहती हैं कि दक्षिण भारत में देवगिरी नामक पर्वत  पर एक ब्राह्मण "ब्रह्मवेत्ता सुधर्म" अपनी पत्नी "सुदेह" के संग वास करते थे।  उन दोनों के कोई संतान न थी जिसके कारण सुदेह दुखी रहती थीं।  उन्होंने कई व्रत उपवास किये और भी बहुत कुछ किया किन्तु संतान न हुई। सुधर्म ने ईश्वर का नाम लेकर दो पुष्प पवित्र अग्नि के समक्ष रखे और अपने मन में एक के संतान होने और दूसरे के संतान न होने के साथ सम्बन्ध जोड़ा।  उन्होंने सुदेह जी से एक पुष्प चुनने को कहा और सुदेह ज ने जो पुष्प उठाया वह संतान न होने वाला था।  तब सुधर्म जी ने मान लिया कि हमारे संतान न होगी और इस बात को स्वीकार कर शांत रहे।  उन्होंने सुदेह जी को भी नियति को मान लेने के लिए समझाया किन्तु वे बहुत दुखी हो गयीं और इसे स्वीकार न कर पा रही थीं। सुदेह को हमेशा पुत्रहीन होने से अन्य स्त्रियों द्वारा अपमानित महसूस होता।

ब्राह्मणी सुदेह चाहती थीं कि सुधर्म दूसरा विवाह कर लें किन्तु वे न मानते थे।  सुदेह अपनी भांजी (किसी कथा में भतीजी तो कहीं बहन लिखा आता है ) घूष्णा (कहीं नाम घुश्मा तो कहीं घृष्णा लिखा आता है ) से बहुत स्नेह रखती थीं।  उन्होंने अपने पति से प्रार्थना की कि घूष्णा से मेरा इतना प्रेम है , इससे तो आप विवाह कर लीजिये , इसकी संतान मेरी अपनी जैसी ही होगी और मैं उससे भी प्रेम कर सकूँगी।  सुधर्म जी ने सुदेह जी को समझाया कि अभी तुम्हे ऐसा लगता है । किन्तु जब संतान होगी तब अवश्य तुम्हे ईर्ष्या होगी और तुम अब से अधिक दुखी हो जाओगी।  किन्तु सुदेह न मानीं और ज़िद कर के दोनों का ब्याह करा दिया।

घूष्णा जी परम शिवभक्तिनि थीं।  वे रोज प्रातः शिव उपासना करतीं और १०१ शिवलिंग बना कर उनकी पूजा अर्चना करतीं।  फिर पास ही के सरोवर में उन शिवलिंगों ससम्मान विसर्जन कर देतीं।  जब एक लाख शिवलिंग बन चुके तब घूष्णा ने एक सुंदर पुत्र को जन्म दिया।  कुछ समय तो सब ठीक रहा किन्तु अब सुदेह जी को लगने लगा कि पुत्रवती घूष्णा बदल गयी है और पति भी मेरी उपेक्षा कर उसी से अधिक प्रेम करने लगे हैं।  जैसा सुधर्म जी ने पहले कहा था, सुदेह अब ईर्ष्यालु हो चलीं और घूष्णा में उन्हें अपनी सौत नज़र आने लगी।

ईर्ष्या की मारी सुदेह ने एक रात, जब सब सोये हुए थे, चाक़ू से काट कर उस बालक की ह्त्या कर दी और उसे उसी ताल में फेंक दिया जिसमे घूष्णा शिवलिंगों का विसर्जन करती थी। सुबह रोज की तरह घूष्णा पूजा करने लगीं। इधर दासी (कहीं कहीं बहु लिखा मिलता है) ने बालक को न पाया और उसके बिछौने को रक्त रंजित पाया तो सब रोने लगे।  दासी ने आकर घूष्णा जी को बताया तब वे शिव जी की अर्चना कर रही थीं।  इतनी बड़ी बात सुन कर भी घूष्णा जी ने आपा न खोया और कहा कि , जो बालक मुझे शिवकृपा से मिला उसकी रक्षा भी शिव जी ही करेंगे।  और वे अपनी पूजा तटस्थ रह कर करती रहीं।

पूजा के बाद जब वे शिवलिंग विसर्जन को गयीं तो उनका पुत्र सरोवर से निकल उनकी तरफ आता मिला।  इस पर भी वे निर्मोही ही रहीं और शिव में ही उनका ध्यान रहा।  शिव जी प्रकट हुए और उन्होंने उन्हें बताया कि किस प्रकार सुदेह जी ने यह घोर अपकर्म किया।  किन्तु घूष्णा जी ने सुदेह जी के लिए शिव जी से क्षमा मांग ली।  प्रसन्न होकर शिव जी ने उनसे एक वरदान मांगने को कहा।  तब घूष्णा जी ने उनसे वहीँ रहने को कहा और वे घुश्मेश्वर / घुष्णेश्वर / घुुष्णेश्वर / घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग के रूप में स्थापित हुए।

एक और कथा है कि , एक परम शिवभक्त "घुश्म" को यहां एक साप की बाम्बी में खजाना मिला था इस धन से उन्होंने यह घुष्णेश्वर मंदिर और शिखरशिंगणपुर का सरोवर बनवाया।  बाद में श्रीमती अहल्याबाई होल्कर (इंदौर  की महारानी) ने इस मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया था।

  

गुरुवार, 25 जून 2015

शिवपुराण १६: रामेश्वरम रामेश्वर रमेस्वरम राम्मिसेरम ज्योतिर्लिंग


रामेश्वरम नामक शहर/ क़स्बा तमिल नाडु के रामनाथपुरम जिले में स्थित है।  यह पम्बन या रामेश्वरम नामक द्वीप है जो भारतीय उप महाद्वीप से विलग है और श्री लंका के मनणार द्वीप से ५० किमी की दूरी पर है। पम्बन या रामेश्वरम द्वीप भारत की मुख्य भूमि से पम्बन सेतु द्वारा जुड़ा हुआ है।

कथा है कि यह वही जगह है जहां से श्री राम ने अपनी प्रिया सीता जी को रावण से छुड़ाने के लिए सेतु बनाया था।  एक कथा कहती है कि श्री राम ने यहाँ सेतुबंध से पूर्व शिवलिंग स्थापित कर शिव जी की उपासना की थी।  लेकिन दूसरी कथा कहती है कि सीता जी को वापस ले जाते हुए श्री राम यहां शिव पूजन करना चाहते थे।  वे यहां भारतवर्ष का सर्वोच्च शिवलिंग स्थापित करना चाहते थे, जिसके लिए उन्होंने हनुमान जी को हिमालय से शिला लाने भेजा।  किन्तु समय अधिक बीत जाने से सीता माई ने छोटे शिवलिंग की स्थापना की और तत्पश्चात वही ज्योतिर्लिंग हुआ।  दोनों ही कथाएँ कही सुनी जाती हैं।  रामेश्वरम हिन्दू "चार धाम" में से एक है और वैष्णव और शैव दोनों ही द्वारा पवित्र माना जाता है , और पूजित है।

चौदहवीं सदी में अलाउद्दीन ख़िलजी के सेनापति मलिक कफ़ूर पंड्यान राजाओं को हराते हुए यहाँ तक पहुँच गया था और यहां मस्जिद बनाई।  बाद में पन्दहवीं सदी में पंड्यान राजाओं ने फिर से यह जगह जीत ली और इसके उपरान्त यह विजयनगर साम्राज्य का हिस्सा हुआ। मदुरै नायकों में से अलग हुए सेतुपति वंशजों को सेतु के संरक्षक माना जाता है।

रामनाथस्वामी मंदिर बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक है।  यहाँ के स्तम्भ नायक शैली के हैं।  (मदुरै मीनाक्षी अम्मा मंदिर में भी यही शैली है) मंदिर का गलियारा १७ से २२ फ़ीट चौड़ा और २५ फ़ीट ऊंचा है। रामेश्वरम में चौदह तीर्थ हैं।  इनमे २४ प्रमुख हैं।  इनमे भी २२ मंदिर की परिसीमा में ही हैं।  इन जलाशयों में स्नान करना तपस्या के बराबर माना जाता है।  इनमे एक है "अग्नितीर्थम" - बंगाल की खाड़ी।  एक और है "जड़ायु / जटायु तीर्थम" - माना जाता है कि जटायु ने सीता को बचाने के लिए रावण से युद्ध किया और रावण ने उनके पंख काट दिए - तब वे इस तीर्थ में गिर पड़े थे।  "विलूंदी तीर्थम" का शाब्दिक अर्थ है "धंसा हुआ धनुष।  कहते हैं सीता जी की प्यास बुझाने के लिए श्रीराम ने यहाँ अपना धनुषसागर सागर में आप्लावित किया था। इसके अतिरिक्त हनुमान तीर्थम, सुग्रीव तीर्थम , लक्ष्मण तीर्थम प्रमुख हैं। यही पास ही गन्धमादन पर्वत भी है जहां श्री राम चरण के निशान हैं।

द्वीप का दक्षिणी छोर है धनुष्कोडी।  यहां कोटान्द्रमास्वामी मंदिर है। १९६४ के चक्रवात तूफानों में धनुष्कोडी समुद्र में डूब गया था किन्तु मंदिर अक्षुण्ण रहा।  यह नगर मध्य से १८ किमी दूरी पर है।  कहते हैं यहीं विभीषण ने श्री राम के सम्मुख आकर आत्म समर्पण किया था। चार धाम (बद्रीनाथ, पुरी, द्वारका और रामेश्वरम) यात्रा में रामेश्वरम का प्रमुख महत्व है।  बनारस की यात्रा भी यहाँ आये बिना अपूर्ण मानी जाती है।

यहाँ यह कहे बिना नहीं रहा जा सकता कि "सेतुसमुद्रम" नामक समुद्री नहर बनाने का प्रोजेक्ट विचाराधीन है।  लेकिन हिन्दू धार्मिक दल और पर्यावरण सेवी दल इसका विरोध कर रहे हैं। भारत के उच्चतम न्यायालय में यह केस २०१० से रुका हुआ है क्योंकि भारत सरकार ने यह स्पष्ट नहीं किया कि यह राष्ट्रीय स्मारक है या नहीं है।

 मंदिर   

 स्तम्भ / गलियारा

  अग्नितीर्थ   जटायु तीर्थ 

मंगलवार, 23 जून 2015

शिवपुराण १५ : नागेश्वर जगेश्वर ज्योतिर्लिंग


कथा है कि दारुक नामक एक राक्षस था जिसकी स्त्री का नाम दारुकी था।  दारुकी ने अपनी तपस्या से माता पार्वती को प्रसन्न किया और वरदान पाया कि वह जहां जाए वहीँ वन हो जाएगा।  इस वरदान के प्रभाव से दारुक बहुत उत्पात करने लगा।  वह चाहे जहां लोगों / ऋषि / मुनियों को परेशान करता, यज्ञ भंग करता , और फिर दारुकी के संग चला जाता।  वन उत्पन्न हो जाने से उसे कोई न पकड़ पाता। उसके उत्पात से परेशान होकर लोग और्वा ऋषि की शरण में गये।  उन्होंने राक्षस जोड़े को श्राप दिया कि जैसे ही वे धरती पर कोई हिंसा करेंगे, वे स्वयं विनष्ट हो जायेंगे।

राक्षसों के सम्मुख बड़ी समस्या आन पड़ी।  देवताओं को यह पता चला तो उन्होंने हमला कर दिया।  राक्षस अब न लड़ें तो देवता उन्हें नष्ट कर दें और लड़ें तो श्राप से नष्ट हो जाएँ।  यह स्थिति भांप कर राक्षस सागर में प्रविष्ट हुए।  माँ पार्वती  के आशीष से सागर में वन उत्पन्न हो गया जहां वे सुखपूर्वक रहने लगे , और यहां ऋषि श्राप का भी भी न रहा।  जल मग्न रह कर ही वे शिकार पकड़ते।  बस्ती की बस्ती पकड़ लेते और क्रूरता करते।

एक बार उनकी पकड़ में एक वैश्य "सुप्रिय " को भी पकड़ लिया , जो बड़ा शिवभक्त था। उस शिवभक्त वैश्य ने वहीं शिवलिंग स्थापित किया और "ॐ नमः शिवाय" का उच्चारण प्रारम्भ किया।  दारुक उसे मारने दौड़ा तो शिव जी तत्क्षण प्रकटे और पाशुपत अस्त्र से उन राक्षसों को खत्म किया (अन्य कथा के अनुसार शिव जी ने सुप्रिय को पाशुपत दिया जिससे उस शिवभक्त ने ही राक्षसों का विनाश किया) . इसके पश्चात सुप्रिय की प्रार्थना पर शिव जी ने वहीं ज्योतिर्लिंग रूप में निवास किया।

एक कथा है मंदिर के उलटे होने की।  कहते हैं कि नामदेव जी एक बार यहां कीर्तन करते थे।  तब किसी ने उन्हें राह छोड़ने को कहा - कि वे भगवान के दर्शन की राह में अड़ रहे हैं।  तब नामदेव जी ने उन व्यक्ति को कहा कि आप ही मुझे ऐसे जगह कर दें जहाँ प्रभु मार्ग न हो।  गुस्साए लोगों ने उन्हें मंदिर के दक्षिण में धकेल दिया लेकिन जब दर्शन करने लौटे तो द्वार घूम कर नामदेव की तरफ हो गया था।  इसीलिए मंदिर में नंदी जी की मूरत और मंदिरों की तरह मंदिर के प्रवेश द्वार पर नहीं बल्कि उलटी दिशा में हैं। इसीलिए इन्हे "औंधा" नागनाथ भी कहते हैं।

नागेश्वर ज्योतिर्लिंग की भगोलिक स्थिति के बारे में भी अलग अलग मत हैं।  कोई इन्हे महाराष्ट्र के औंध में बताते हैं , तो कोई उत्तराखंड के जगेश्वर , और कोई कोई द्वारका के पश्चिम में नागेश्वर को ज्योतिर्लिंग बताते हैं।


 औंधा नागनाथ महाराष्ट्र
  नागेश्वर द्वारका



 जगेश्वर दारुक वन अल्मोड़ा उत्तराखंड





शनिवार, 6 जून 2015

शिवपुराण १४: बैजनाथ वैद्यनाथ बैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग

बैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग मंदिर या बैद्यनाथ धाम, शिव जी के द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से एक है।  यह झारखंड के देवगढ़ में है , और मंदिर परिसर में कुल २१ मंदिर हैं (इस मंदिर की भौगोलिक स्थिति के बारे में कुछ मतभेद हैं - आगे यह चर्चा है)।

कहा जाता है कि रावण ने शिव जी को प्रसन्न करने के लिए यहीं पर कडा तप किया था । शिव जी प्रकट न हुए तब रावण ने अपने सर काट काट कर अपने आराध्य को चढ़ाना शुरू किया। दस में से नौ सर कटने के बाद जब रावण अपना दसवां सर काटने को हुआ तब शिव जी प्रकट हुए।  उन्होंने "वैद्य" का रूप धार कर घायल रावण का इलाज़ किया इसीलिए वे वैद्य नाथ कहलाये। कहते हैं यहां प्रार्थना करने पर सब मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं इसलिए इसे "कामनालिंग" भी कहते हैं।  भक्त पवित्र गंगाजल सुल्तानगंज से लाते हैं और अभिषेक करते हैं।  श्रावण और भाद्रपद महीनों में यहां मेले लगते हैं।

इसके बारे में यह भी कहा गया है कि यह श्मशान भूमिं पर है और जलती चिताओं की राख शिव जी अपने शरीर पर मलते हैं।  यहां कापालिक साधनाएं भी होती हैं।  

इस ज्योतिर्लिंग की भौगोलिक स्थिति के बारे में थोड़ी अनिश्चितता है।  जहाँ एक तरफ यह 
१. देवगढ़ (झारखंड) में बैद्यनाथ रूप में माना गया है , वहीं इसे
२.  महाराष्ट्र में परली के वैजनाथ और इसे 
३. हिमाचल प्रदेश के बैजनाथ के रूप में भी कहा जाता है।

 परली महाराष्ट्र वैजनाथ मंदिर 
 देवगढ़ झारखंड का बैद्यनाथ मंदिर 
 हिमाचल प्रदेश का बैजनाथ मंदिर 

हिमाचल प्रदेश वाले शिवलिंग के बारे में कथा है कि रावण ने तपस्या कर शिव जी को प्रसन्न किया और माँगा कि वे उसके साथ चलें।  तब श्री शिव जी ने लिंग रूप लिया और रावण से कहा कि तुम इस शिवलिंग को जहां चाहे ले जाकर स्थापित कर लो।  किन्तु यह ध्यान रखना कि रास्ते में कहीं इसे भूमि पर न रखना क्योंकि एक बार रखने पर यह स्थापित हो आएगा और फिर न हिलेगा।  रावण जब शिवलिंग ले जा रहा था तब देवताओं को चिंता हुई कि यदि शिवलिंग लंका में रहे तो रावण को हरा पाना असम्भव होगा।  उन्होंने विचारविमर्श किया और वरुणदेव से प्रार्थना की।  वरुणदेव रावण के पेट में प्रविष्ट हुए और रावण को बेचैनी हुई।  वह जानता था कि शिवलिंग भूमि पर नहीं रखना है।  तब वह किसी को खोजने लगा और उसे एक ब्राह्ण  दिखे।  उसने उन्हें शिवलिंग कुछ पल पकड़ने को कहा और जब वह लौटा तो ब्राह्मण शिवलिंग को इतनी देर न उठा पानेका कारण कह कर कारण भूमि पर रख चुके थे।  रावण ने शिवलिंग को उठाने और आगे बढ़ने की कोशिश की तो शिवलिंग को उठा पाना संभव न हो पाया।  तबसे यह शिवलिंग यहीं स्थापित है। रावण ज्ब तक जीवित था रोज़ वहां आकर अर्चना करता था।  किन्तु रावण की मृत्यु के बाद लम्बे समय शिवलिंग यूँ ही उपेक्षित रहा।  तब एक "बैजू" नामक शिकारी को ये मिले और उसने उन्हें अपना इष्टदेव मान पुनः पूजा आरम्भ की  और स्थापित किया। इसलिए ये "बैजू के नाथ" या बैजनाथ नाम से प्रसिद्ध है।