फ़ॉलोअर

लघुकथा लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
लघुकथा लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

मंगलवार, 13 जनवरी 2015

सजा राजा को महंगी पड़ी - बड़ी महँगी :)


यह लघुकथा "लियो टॉलस्टॉय" की कहानी "Too Dear " पर आधारित है
-----------------

फ़्रांस और इटली के बॉर्डर पर एक नन्हा सा (खिलौना) राज्य था - मोनैको।  यहां एक राजा भी थे - उनका  दरबार, दरबारी, सेना, सेनाध्यक्ष, महल - सभी कुछ किसी और देश की ही तरह थे - बस एक छोटे पैमाने पर।  राज्य की जनसंख्या किसी छोटे शहर से भी कम थी - कुल ७०००।  और क्षेत्रफल तो इतना कम कि हर नागरिक पर एक एकड़ तक न आये।  फिर भी राज्य में अन्य किसी देश की ही तरह राजशाही थी और राजा का राज भी।

राज्य कार्य अधिक न था किन्तु दरबार अवश्य थे।  कायदे कानून भी थे और उन्हें लागू करवाने को पुलिस बल की तरह छोटी सी टुकड़ी भी - लेकिन राज्य के लोग भले थे तो नगर रक्षियों को कोई ख़ास काम न था।  सीमा सुरक्षा को सेना भी थी - कुल ६० जवानों की :) राज्य का खर्चा कर से चलता था। अब करों से कोई ख़ास आय तो थी नहीं क्योंकि अधिकांश नागरिक छोटे मोटे ही काम करते थे।  शराब सिगरेट आदि पर कर थे लेकिन इनकी तो खपत इतनी कम थी कि कोई ज्यादा आमदनी न होती थी।

एक आमदनी थी "गेमिंग हाउस" से - जहां रुलेट आदि खेले जाते।  चाहे लोग जीतते या हारते - कर तो दोनों ही सूरतों में आता।  पास पड़ोस के देशों में जुए पर पाबंदी लग चुकी थी क्योंकि जुए में हार (न सिर्फ अपना ही धन किन्तु उधार भी जुए में गँवा ) कर लोग हताशा में आत्महत्या तक कर लेते थे।  तो आस पास के देशों से भी जुआरी यहां आते जुआ खेलने - और सेना कोई रोक न करती क्योंकि उनकी आमदनी इन्ही के कारण आये कर से जो आती थी ।

अब एक बार हुआ यूँ कि राज्य में एक खून हो गया।  अपराधी पकड़ भी लिया गया और बड़ी शान शौकत से अदालत बुला कर मुकदमा चला।  मुकदमे से जुड़े सभी अधिकारी बड़े रुतबे से बैठे - आखिर उन्हें ऐसा मौका पहली बार मिला जो मिला था। क़ानून के अनुसार सब कार्यवाही हुई और अपराधी को अपराध सिद्ध होने पर मृत्युदंड दिया गया।  राजा के पास नतीजा गया और राजा साहब ने पूर्ण गंभीरता से यह कहा कि न्यायालय का निर्णय बिलकुल सही है और अवश्य ही इस जुर्म पर मृत्युदंड होना चाहिए।

अब आई असल मुसीबत।  मृत्युदंड देने के लिए न तो जल्लाद था राज्य के पास - और न ही औजार।  मृत्युदंड दे तो कौन दे ? सभा बुलाई गयी और विचार विमर्श हुआ।  तय पाया गया कि पडोसी देश फ्रांस से जल्लाद और सामान उधार / किराए पर लिया जाए।  चिट्ठी भेज कर किराए के बाबत पूछा गया तो जवाब आया - १६००० फ़्रैंक।  फिर से सभा बुलाई गयी और राजा ने निर्णय लिया कि यह तो बहुत महंगा पड़ेगा - क्योंकि प्रति नागरिक २ फ्रैंक से अधिक ही कर का बोझ बढ़ जाएगा - कहीं विद्रोह न हो जाए।  निर्णय हुआ कि इटली हमसे मित्र वत है उन्हें पूछा जाए - और इटली को पत्र भेजा गया।

इटली से जवाब आया १२००० :) ।  अब यह पहले से कम तो था- किन्तु फिर भी रकम बड़ी थी।  राजा ने फिर सभा बुलाई और तय पाया गया कि सेना के किसी सैनिक को यह काम करने को राजी किया जाए।  किन्तु सैनिकों ने यह करने से साफ़ इंकार कर दिया। अब आखिर यह तय हुआ कि - बेहतर है कि सजा को मृत्युदंड से आजीवन कारावास में बदल दिया जाए। यही हुआ भी।

अब आया अगला प्रश्न - आजीवन कारावास के लिए तो जेल चाहिए - और जेल थी नहीं।  एक हवलदार वाली एक हवालात थी जहां एक दो दिन के लिए लोगों को बंद किया जाता था।  लेकिन आजीवन? ऐसी तो कोई व्यवस्था ही नहीं थी !!! तो - फिर एक बार सभा बैठी।  तय पाया गया कि एक कमरेनुमा जेल होगी जिसमे कैदी रहेगा और उसके रखवाले के रूप में एक व्यक्ति रहेगा।

ऐसा ही किया गया।  कैदी जेल में रहता और बाहर पहरा देने पहरेदार।  वही पहरेदार महल के भोजनालय से कैदी और अपने लिए भोजन भी लाता, जिससे अलग से रसोई न करनी पड़े। साल बीतने पर हिसाब हुआ तो मालूम हुआ कि खर्चा आया ६०० फ्रैंक।  यह तो बहुत अधिक था , और कैदी भी अभी भरा पूरा जवान था - आजीवन तो पता नहीं कितने वर्ष हो जाए। इतना अतिरिक्त बोझ तो अधिक होगा।

तय हुआ कि पहरेदार को हटा लिया जाए।  "फिर तो कैदी भाग जाएगा न?" …  "अरे भागे तो भाग जाए - खर्च बचेगा।" तो पहरेदार हटा लिया गया।  लेकिन हुआ यूँ कि भोजन के समय कैदी खुद ही द्वार खोल बाहर आया और महल के भोजनालय से भोजन लिया, भोजन करके पात्र लौटाए और वापस कमरे में आकर खुद हो बंद हो गया।  कुछ दिन यही सिलसिला चला।

एक सभागर ने उस से पूछा - अजीब आदमी हो - दरवाजा खुला है - भाग क्यों नहीं जाते? कैदी बोला - मैं क्यों भागूं? यहाँ आराम से घर है, बढ़िया महल का भोजन मिलता है - मैं तो नहीं भागता।  अब क्या हो ? फिर तो लोग भेजे गए उसे भगाने को मनाने के लिए।

इस बार वह क्रोधित हो गया।  बोला - देखिये , पहले आपने मुझे मृत्युदंड दिया - मैंने चुपचाप स्वीकार कर लिया।  फिर उसे आजीवन कारावास में बदला - मैं कुछ न बोला।  फिर आपने पहरेदार हटा दिया - मैं फिर भी चुप रहा, उसका काम भी खुद करने लगा।  अब तो हद हो गयी।  मैं क्यों कानून तोड़ कर भागूँ ? आप लोगों को देश के क़ानून का कोई ख्याल नहीं ?

आखिर बैठकें चलीं और एक बड़ी पेंशन की बात तय हुई।  साल की पेंशन का तिहाई हिस्सा दे कर उसे "रिहा" किया गया और वह सीमा के पास घर बना कर रहने लगा।  उस पैसे से उसने घर और खेत लिए, और और खेती करने लगा , लेकिन पेंशन लेने सही समय पर आता ।  फिर कुछ धन रुलेट खेलने में इस्तेमाल करता - जीते या हारे। और अपने खेत पर लौट जाता।

किस्मत उसकी अच्छी थी कि उसने यही ह्त्या किसी ऐसे देश में न की जो असला देश होता और वहां सब इंतज़ाम होते - कि उसने यह अपराध उस टॉय स्टेट में किया  ……

-----------------
यह लघुकथा "लियो टॉलस्टॉय" की कहानी "Too Dear " पर आधारित है
-----------------

शनिवार, 18 फ़रवरी 2012

रेलगाड़ी और सामान

एक रेलगाड़ी में एक सज्जन बैठे थे । वे अपना सारा सामान अपने सर पर रखे हुए थे - बड़े परेशान, थके हारे।परन्तु सामान नीचे रखने को तैयार ही नहीं थे । कई लोग उन्हें कह रहे थे कि सामान नीचे रख दें - पर वे सिर्फ बड़े दयाभाव से मुस्कुरा देते - परन्तु सामान नीचे न रखते । लोगों को लग रहा था की शायद सामान में कोई बेशकीमती चीज़ होगी जो ये नीचे रखने का खतरा मोल नहीं ले रहे ।

एक व्यक्ति ने उनसे कहा - "मैं तबसे देख रहा हूँ की आप सबके कहने से भी सामान नीचे नहीं रख रहे - सो मैं रखने को नहीं कहूँगा - परन्तु मैं यह जानना ज़रूर चाहता हूँ कि आप यह सामान उठाये क्यों बैठे हैं ?" इस पर उन ज्ञानी पुरुष का उत्तर था -

 "बेचारी रेलगाड़ी हम सब का और हम सब के सामान का बोझ उठाये हुए है - उसका भार कम करने के लिए मैं अपनी मदद दे रहा हूँ । कुछ सामान मैं भी उठा लूं ..... तो ट्रेन पर बोझ कम हो जाए "

.......उस व्यक्ति ने उन्हें समझाने का प्रयास किया कि - भले ही सामान आपने सर पर उठाया हो, फिर भी वह वजन ट्रेन पर तो है ही -क्योंकि आप स्वयं भी इसी ट्रेन में ही तो बैठे हैं । परन्तु उन सज्जन को बात समझ न आई । 

...............

ऐसे ही कई मित्र प्रकृति और ईश्वर की मदद करने के लिए मांसाहार ले रहे हैं -कि प्रकृति / ईश्वर इतनी बड़ी मानव जनसँख्या के लिए भोजन कैसे दे सकेगी ? उन्हें समझाने पर भी यह समझ ही नहीं आ पाता कि जो मांस खाया जायेगा, उन पशुओं / जीवों का शाकाहारी भोजन भी तो वही प्रकृति उपलब्ध करा रही है - तो क्यों वह मानवों के लिए समुचित शाकाहारी भोजन नहीं दे सकेगी ?

शुक्रवार, 3 फ़रवरी 2012

दो तिनके

( पिछली पोस्ट की ही तरह - यह भी "आनंद" कथा ही है । इस बार approach अलग है । पिछली पोस्ट में कर्म योग था - इस बार - नहीं मैं नहीं कहती - आप बताइये पढ़ कर :) यह कहानी भी मेरी नहीं है - ओशो की सुनाई अनेक कहानियों में से एक है )

तो कहानी यूँ है की दो तिनके एक नदी में पड़ गए (जान बूझ कर ही "गिर" गए नहीं कहा है )। दोनों एक ही हवा के झोंके से उड़ कर एक ही साथ यहाँ आ पहुंचे थे - एक ही साथ थे - दोनों की परिस्थतियाँ बिलकुल समान थी। परन्तु दोनों की मानसिक स्थिति एक न थी । एक पानी में बहता था - सुख पूर्वक, तैरने का आनंद लेते हुए, आनंदित ... तो दूसरा - उसे किनारे पर पहुंचना था । बड़े प्रयास करता - पूरी ताकत लगाता - परन्तु नदी के शक्तिशाली बहाव के आगे बेचारे तिनके की ताकत ही क्या ? उसके सारे प्रयास व्यर्थ होते रहे - बहता तो वह उसी दिशा में रहा जिसमे नदी बहती थी - परन्तु, पहले तिनके की तरह सुखपूर्वक नहीं, बल्कि दुखी मन से । 

फिर कुछ आगे जाने पर नदी की धारा कुछ धीमी हुई , तो पहला तिनका दूसरे से बोला - आओ मित्र - अब प्रयास करने के लिए समय अनुकूल है, मिल कर कोशिश करें, किनारे पर घास उगी है - जो नदी के बहाव को रोक भी रही है, और कई लम्बे घास के blades तो नदी में काफी दूर तक उग आये हैं । थोडा प्रयास करने से हम इन मित्रों के सहयोग से अपनी दुनिया में पहुँच जायेंग ।

परन्तु दूसरा तिनका इतनी मेहनत कर चुका था - कि थक गया था - उससे अब आगे प्रयास न किया गया । परन्तु पहला तिनका अपने मित्र को मुसीबत में छोड़ कर किनारे न गया - उसके साथ अपने आप को उलझा कर थोड़ी शक्ति बढ़ी, फिर जोर लगाया - और किनारे से जुड़े हुए एक लम्बे घास को किसी तरह पकड़ लिया । फिर कुछ देर सुस्ताने के बाद दोनों उस जुड़े वाले के सहारे धीरे धारे सूखे किनारे पर पहुँच ही गए ।

पहला तिनका पुराने साथियों की मीठी यादों से खुश था, किनारे नए मित्रों के बीच प्रसन्न था । दूसरा तिनका अब भी अपने पुराने स्थान के साथी तिनकों से बिछड़ने के कारण उदास , डूबने की याद से परेशान, और भीगेपन से दुखी था ।

रविवार, 29 जनवरी 2012

आनंद

कहीं मंदिर बन रहा था । तीन श्रमिक धूप में बैठे पत्थर तोड़ने का काम कर रहे थे । एक राहगीर ने पहले मजदूर से पूछा -

"क्या कर रहे हो ?"
वह बड़े दुखी स्वर में बोला - "पत्थर तोड़ रहा हूँ ।" सच ही था - वह पत्थर ही तोड़ रहा था ।

दूसरे से पूछा - वह दुखी न था - उसने कहा - "आजीविका कमा रहा हूँ ।" वह बिलकुल संतुलित था - न दुखी, न सुखी । और सच ही था - वह आजीविका कमाने को ही तो श्रम कर रहा था ।

फिर तीसरे से पूछा  - वह आनंदित था - गीत गाते हुए पत्थर तोड़ रहा था । उसने अपना गीत बीच में रोक कर कहा - "मैं मंदिर बना रहा हूँ ।" आँखों में चमक थी, ह्रदय में गीत थे, और वाणी में शान्ति । निश्चित ही मंदिर गढ़ना कितना सौभाग्यपूर्ण है !! सृजन से बड़ा कौनसा आनंद है ?

जीवन के प्रति भी क्या यही तीन उत्तर हैं ? कोई पत्थर तोड़ रहा है, कोई आजीविका कमा रहा है, तो कोई मंदिर गढ़ रहा है । ............. धूप तो तीनों पर बराबर पड़ रही है - परन्तु आनंद सबके हिस्से नहीं आता । 

जीवन का आनंद जीने वाले की दृष्टी में होता है । वह भीतर है, बाहर से नहीं आता ।

शनिवार, 28 जनवरी 2012

सीखे हुए उत्तर

सीखे हुए उत्तर कभी काफी नहीं होते- क्योंकि प्रश्न हमेशा बदलते रहते हैं । इस दुनिया में अगर कोई चीज़ नित्य है - तो वह है बदलाव । इस सिलसिले में एक कहानी याद आती है -

दो मंदिर थे - और एक दूसरे से कही भी सहमत न होते थे ( अक्सर ऐसा ही होता देखा जाता है - सभी कहते हैं की परम सत्य एक है - किन्तु उसे ढूँढने वाले / जानने के दावे करने वाले - कभी भी एक दूसरे से सहमत नहीं दीखते ) उनमे से किसी भी एक मंदिर वाले कभी भी दूसरे मंदिर वालों से हारना न चाहते, जहां तक हो - एक दुसरे को avoid करने का ही प्रयास करते । किन्तु बच्चे तो फिर बच्चे होते हैं न - बड़े उन्हें कितना ही बिगाड़ने के प्रयत्न करें, उन्हें बिगड़ने में समय लगता है । वे मन में प्रेम के सागर भरे आए होते हैं, जिस सागर को ये "सत्यखोजी" मार्गों वाले बड़े / समझदार जन सुखाने के प्रयास करते हैं - और यह सूखने तक जो समय चाहिए - तब तक वह बच्चा बड़ा हो गया होता है । 

तो दोनों मंदिरों के समूहों के दो बच्चे - अक्सर राह में मिलते, तो बातें कर लेते । दोनों कुछ कुछ बड़े हो चले थे, सागर सूखने लगा था - किन्तु अभी इतना भी न सूखा था की एक दूसरे से नज़र बचा कर निकल जाएँ । हाँ, एक दूसरे से जीतना है, यह भावना ज़रूर पनपने लगी थी । 

एक दिन ये दोनों बच्चे राह में मिले । एक ने दूसरे से पूछा - "कहाँ जा रहे हो ?" वह भी शायद कुछ Poetic Mood में रहा होगा - तो बोला - "जहां हवाएं ले जाएँ।" अब पहले वाले को कुछ समझ न आया, आगे क्या बात करूँ - चुप ही रह गया। (वैसे मेरी नज़र में यह पहले बच्चे की हार नहीं है - कम से कम उसने बात शुरू करने की कोशिश तो की  - दूसरे बच्चे ने - जो यहाँ जीता हुआ दीखता है - (के उसने इस को चुप करा दिया ) - उसीकी हार लगती है मुझे तो - उसने दोस्ती के राह बंद कर दी संवाद को ख़त्म कर के - पर खैर - यह एक कहानी है )

 अब यह पहला बच्चा बड़ा परेशान हुआ , वापस लौट कर मंदिर में गुरु से कहा "आज मैं उस मंदिर वाले से हार गया" - और पूरी बात बताई । अब यह कैसे स्वीकार हो  कि  हम हार गए ? गुरु को बड़ा बुरा लगा - उसने कहा - "यह तो बहुत बुरी बात है - हम हार कैसे सकते हैं ? कल फिर पूछना - वह ऐसा कहे तो कहना - अगर हवा न चलती हो - तो कहाँ जाओगे ?" 

अगले दिन फिर मुलाकात हुई - यह बच्चा तैयार था - फिर पूछा - "कहाँ जाते हो ?" लेकिन अब वह दूसरा बोला - "जहां पैर ले जाएँ " तो सीखा हुआ जवाब व्यर्थ हो गया - क्या कहे ? फिर चुप रह जाना पडा । आज तो गुरु जी को और बुरा लगा - वे बोले "कल पूछना - कभी ऐसा भी हो सकता है की पैर न रहे - तब कहीं नहीं जाओगे क्या ? और वह जवाब बदल कर जो भी और जवाब दे - उसमे इसी तरह का कुछ पूछना - की यह न हो तो क्या करोगे ? हार कर नहीं आना ।"

अगले दिन यह बच्चा पूरी तैयारी के साथ गया । alternative उत्तर भी सब सोचे हुए थे - की ऐसा घुमावदार जवाब मिला - तो ऐसा पूछूंगा । आज फिर दोनों मिले 

और इसने पूछा "कहाँ जा रहे हो ?"

दूसरा बच्चा बोला "सब्जी लेने "

....

:)

तो - सीखे हुए उत्तर अक्सर काम नहीं आते । जीतने के कोशिश अपने आप में ही हार होती है । जीतने / हारने के प्रयास ही यह कह रहे हैं की चुनी हुई राह ही गलत है - हमारी मंजिल यदि दूसरे से जीतना / उसे हराना है - तो वह प्रेम का / एकत्व का पथ है ही नहीं - हार तो हो ही चुकी । अब ऊपर से जीते या हारे - इससे कोई फर्क ही नहीं पड़ता ।

शनिवार, 26 नवंबर 2011

आग और धुंआ


यह कहानी भी मेरी नहीं है - कही पढ़ी है ....

एक जहाज  समुद्र में डूब गया - उसमे से एक आदमी किसी तरह तैर कर एक छोटे से द्वीप पर पहुँच गया | वह इश्वर से प्रार्थने करता रहा की कोई उसे बचाने आये पर कुछ हुआ नहीं ...

बेचारे ने किसी तरह लकड़ियाँ जोड़ कर धूप और बारिश से बचने के लिए एक छोटी सी झोपडी बना ली | लेकिन एक दिन वह जब खाने के लिए कुछ कुछ ढूंढ कर लौटा - तो उसकी झोपडी जल रही थी .... वह रो पड़ा और उसने इश्वर से कहा की तू मेरे साथ ऐसा कैसे कर सका?

जब अगले दिन की सुबह उसकी नींद खुली - तो एक जहाज की आवाज़ से - जो उसे बचाने आया था - 

उसने पूछा - तुम्हे कैसे पता चला की मैं यहाँ हूँ?
जवाब मिला - तुम्हारे धुंए के संकेत से .....

इसलिए - विश्वास रखो - कैसी भी परीक्षा की घडी क्यों न हो - उसे भगवान् का कोई संकेत समझो ....

टूटा घड़ा


यह कहानी कहीं पढ़ी थी कभी - शायद किसी ई मेल में .... यह एक चाइनीज़ प्रोवेर्ब (चीनी लोक कहावत ) पर आधारित है |


एक आदमी रोज़ नदी से पानी भर कर साहेब के घर तक ले जाया करता था. कन्धों पर एक लम्बी लकड़ी होती, जिसके दोनों सिरों पर एक एक घड़ा बंधा होता | उनमे से एक घड़ा थोडा सा क्रैक्ड था, तो सारे रास्ते उसमे से पानी रिसता रहता | तो मंजिल तक आते आते - एक घड़ा पूरा भरा होता, तो दूसरा सिर्फ आधा रह जाता | पहला घड़ा तो अपने पर्फोमेंस से काफी खुश था लेकिन यह घड़ा हमेशा हीन भावना में घिरा रहता |

एक दिन इस घड़े ने आदमी से कहा - तुम मुझे फेंक दो - और दूसरा घड़ा ले आओ - क्योंकि मैं अपना काम ठीक से नहीं कर पाता हूँ | तुम इतना भार उठा कर शुरू करते हो लेकिन पहुँचने तक मैं आधा खाली होता हूँ ....| 

इस पर आदमी ने उसे कहा - की आज जाते हुए तुम नीचे पगडण्डी को देखते चलना | घड़े ने ऐसा ही किया - रस्ते भर रंग बिरंगे फूलों से भरे पौधे थे | लेकिन मंजिल आते आते वह फिर आधा खाली हो जाने से दुखी था - उसने बोलना शुरू ही किया था की आदमी ने कहा - अभी कुछ मत कहो - लौटने के समय रास्ते की दूसरी तरफ भी देखते जाना | और लौटते हुए घड़े ने यह भी किया - लेकिन इस तरफ कोई फूल न थे....

नदी के किनारे अपने घर लौट कर उस आदमी ने घड़े को समझाया - मैं पहले से जानता हूँ की तुमसे पानी नहीं संभल पाता - पर यह बुरा ही हो ऐसा ज़रूरी तो नहीं !!! मैंने तुम्हारी और फूलों के पौधे रोप दिए थे - जिनमे तुम्हारे द्वारा रोज़ पानी पड़ता रहा - और वे खिलते रहे .... |

इसीलिए - हमें समझना है की जीवन में हर चीज़ परफेक्ट हो ऐसा कोई आवश्यक तो नहीं - ज़रुरत इस बात की है की हम हर कमी को पोजिटिव बना पाते हैं - या नहीं ..... | तो अब से हम - किसी को क्रैक्ड पोट कहने या- कोई हमें कहे तो हर्ट होने - से पहले यह कहानी याद करें .... 

रोज़ एक टोकरी अँधेरा फेंक आओ, अँधेरा ख़त्म हो जाएगा


बहुत पुरानी बात है - एक गाँव था | वहां के लोग आग को नहीं जानते थे ... पर अँधेरा तो तब भी था न ...| और अँधेरे की वजह से रात के वक्त सब काम रुक जाते , और कभी किसी ज़रूरी काम से किसी को बाहर जाना ही पड़ता, तो स्वाभाविक है की कोई न कोई दुर्घटना कभी कभी घट ही जाती |

तो एक दिन गाँव वालों ने सभा बुलाई | एक समझदार व्यक्ति ने सुझाया की कल से सब एक एक टोकरी अँधेरा फेंक आयेंगे - धीरे धीरे अँधेरा ख़त्म हो जाएगा | तो यह प्रथा ही बन गयी - अँधेरा तो खैर क्या ख़त्म होता - यह अंधी प्रथा ज़रूर बन गयी |

कई बरस गुज़र गए | गाँव का एक लड़का कहीं बाहर गया - और एक युवती से प्रेम विवाह कर के लौटा | युवती की ससुराल में जो पहली रात हुई - घर की बड़ी औरतें उसे रिवाज़ समझाने लगीं - और उसे अँधेरा फेंकने को कहा | लड़की को बड़ी हंसी आई - उसने रुई मांगी, बत्ती बनाई, एक कटोरी में तेल डाला , और कोई दो पत्थर टकरा कर दिया जला दिया |......... 
अँधेरा भी गया और प्रथा भी ..... :)

तो हम यह न सोचें की बुरे को गालियाँ देते रहने से, बुरा कहने से ठोकर मारने से या भला बनने से अँधेरा जाने वाला है | यदि अँधेरे को जीतना है - तो दिया जलाओ - किसी रामदेव की तरह - किसी विवेकानंद की तरह ---|
दिया परफेक्ट है या नहीं - यह मायने नहीं रखता - मायने रखता है - रौशनी को जलाना - यदि पहला दिया परिपूर्ण न हो - तो कोई बात नहीं - एक से दूसरा दिया जल जायेगा | लेकिन अगर हम दिया ही न जलाएं, या फिर  पहले ही दिए से यह मांग हो की वह खामीराहित हो - तो अँधेरा कभी दूर नहीं हो पायेगा .........

डॉक्टर बेहतर जानते हैं या तू ?


एक बार मुल्ला नसीरुद्दीन की बीवी बहुत बीमार हो गयी | डॉक्टर की दवाइयां भी कुछ ख़ास असर न कर रही थीं | एक दिन तबियत ज्यादा बिगड़ने पर मुल्ला ने डॉक्टर को बुलाया | पत्नी बेहोश हो गयी थी | डॉक्टर ने आ कर सब चेक किया और नसीरुद्दीन से कहा "मुझे बहुत खेद है, किन्तु मैं आपकी पत्नी को बचा नहीं सका | ये चल बसी हैं | " मुल्ला बड़ा दुखी हुआ | डॉक्टर उसे सांत्वना दे रहे थे, की तब तक...
                     .....
 पत्नी होश में आ गयी और उनकी बातें सुन कर बोली "नहीं जी, मैं तो जिंदा हूँ|"

मुल्ला ने उसे डांटते हुए कहा - "चुप कर ! तू ज्यादा जानती है , या डॉक्टर ? "........
------------------------

बीमारी में वह बार बार पूछती - तुम मेरे बाद दूसरी शादी तो नहीं करोगे? तो मुल्ला अपने प्यार की दुहाई देता ....
"शादी तो नहीं करोगे .... "
:शादी नहीं करूंगा ...."
"उसे इस घर में तो नहीं लाओगे "
:शादी नहीं करूंगा ...."
"इस कमरे में तो न लाओगे?"
:शादी नहीं करूंगा ...."
मेरे गहने तो न दोगे?"
:शादी नहीं करूंगा ...."
मेरे कपडे तो न दोगे?"
".......  उसे फिट नहीं होंगे....." 
:)

is 2012 the end?


कल किसी ने पूछा - २०१२ में दुनिया का अंत होने वाला है - इसे आप मानती हैं? मैंने कहा - पता नहीं | उन्होंने पूछा - आपको पता नहीं ? लेकिन यदि हो - तो कितनी भयावह स्थिति है यह !! डर नहीं लगता आपको ? तो मुझे एक बड़ी प्यारी कहानी याद हो आई | [[ लेकिन कहानी से पहले एक बात - यदि हो भी जाए अंत - तो क्या हुआ ? क्या हो जाएगा अधिक से अधिक? आखिर अभी जितने भी लोग हैं इस दुनिया में - आज से तकरीबन सौ वर्षों के भीतर तो हम सब को जाना है ही - किसी को भी पता नहीं कि मैं कब जाने वाला / वाली हूँ | तो क्या होगा - शायद मेरी मौत २०१२ में हो - क्या फर्क पड़ जाएगा ? थोडा आगे या थोडा पीछे सही !! फर्क सिर्फ इतना होगा कि सब एक साथ जायेंगे - तो इसमें क्या बड़ी डरने की बात है ? अच्छा ही होगा शायद - किसी को अपने प्रियजनों से बिछड़ने का दुःख ना झेलना होगा !!  :) ]]

तो कहानी कुछ यूँ है - एक युवक की नयी- नयी शादी हुई थी - और वह और उसकी नव-वधू समुद्र यात्रा पर थे | रात में घना अन्धकार था, और जोरों का तूफ़ान भयानक रूप में था | ऐसा लगता कि जहाज़ अब डूबा - तब डूबा | युवक ज़रा भी घबराया हुआ नहीं था | 

पत्नी ने आकुल हो कर पूछा : "तुन्हें डर नहीं लगता ? नहीं देखते कैसा तूफ़ान है - जीवित भी बचेंगे या नहीं क्या मालूम ?"
युवक ने म्यान से तलवार निकाली और पत्नी की गर्दन पर रख दी | पर वह बिल्कुल भी डरी नहीं तनी हुई तलवार से | युवक ने पूछा - "तुम्हे डर नहीं लगता ? मैंने तुम्हारी गर्दन पर तलवार रखी है ? तुम्हारे प्राण संकट में हैं |"

पत्नी हंसने लगी और बोली - "मैं क्यों डरूं? तलवार तुम्हारे हाथ में है - और मैं जानती हूँ तुम मुझसे कितना प्रेम करते हो | तुम ऐसा कुछ कर ही नहीं सकते - जिससे मेरा कुछ भी बुरा हो |" 

युवक भी हंस पड़ा और बोला " मुझे जब से परमात्मा की गंध मिली है - मैं भी इतने ही विश्वास से जानता हूँ की मेरी नाव की पतवार ईश्वर के हाथ है | जैसा तुम्हे मेरे प्रेम पर भरोसा है - वैसा ही मुझे उसके प्रेम पर विश्वास है | तो किस बात से डरूं -?? वह मेरा बुरा कभी नहीं होने देगा |" [श्री हरिओमशरण का एक गीत है - "तेरा राम जी करेंगे बेडा पार - उदासी मन - काहे को करे ...... " -यु ट्यूब का  लिंक यह है - आप देख और सुन सकते हैं ] ; 
[ और जो मित्र विश्वास करते हैं कि ईश्वर है ही नहीं - उन्हें तो खैर डरने की वैसे भी ज़रुरत ही नहीं - जब हम सिर्फ कुछ केमिकल्स से बने हैं , इसके अलावा कुछ है ही नहीं - तो तय है कि एक दिन इन केमिकल्स को विघटित हो ही जाना है , बिखर ही जाना है | तो फिर डर किस बात का ? ]

प्रेम अभय है , अप्रेम भय है | यदि हम समस्त के प्रति प्रेम से भर जाते हैं, तो समस्त के प्रति स्वीकार्य भाव आ जाता है | जीवन के प्रति भी और मृत्यु के प्रति भी | सुख के दिनों के लिए भी वही भाव , और दुःख की रात्रियों के लिए भी | फिर डर और परेशानी का कोई स्थान नहीं रह जाता मन के भीतर | चेतना के इस द्वार से प्रेम और विश्वास भीतर आता है - तो उस द्वार से भय बाहर हो जाता है | जलता दिया जहाँ वास करे - वहां अँधेरे को स्थान छोड़ना ही पड़ता है |

टेलीफोन नंबर


एक अच्छी सी कहानी याद आ रही है - किसी ने सुनाई थी कभी....

तो हुआ यूँ की एक महिला का टेलीफोन नंबर काफी सालों से चला आ रहा था - और अब उनके ही शहर में एक बड़ा होटल खुला था. उस होटल को भी मिलता जुलता सा नंबर दिया गया | अब तो आये दिन सुबह शाम महिला के पास उस होटल के फोन कॉल आते और वह रोंग नंबर कह कह कर परेशान होती रहतीं | उन्होंने कई तरह कोशिश की की टेलीफोन कंपनी होटल को कोई और नंबर दे दे - क्योंकि वह इतने सालों से यह नंबर इस्तेमाल करती रही हैं, और इसे नहीं बदलना चाहतीं ! लेकिन टेलीफोन कम्पनी ने उनकी बात पर ध्यान नहीं दिया | उन्होंने होटल वालों से भी रिक्वेस्ट की - लेकिन उनके तो सारे नोटपेड वगैरह बदलने की प्रॉब्लम थी |

तो कुछ हल निकल नहीं रहा था, और महिला अपना नंबर बदलना नहीं चाहती थीं |

अब उन्होंने ये किया - कि जो कॉल आते - वे कुछ भी जवाब एक्सेप्ट कर लेतीं - जैसे किसी ने फोन किया की थर्ड फ्लोर पर कमरा नंबर ३०५ एक हफ्ते के लिए बुक करिए - तो हाँ - और किसी और को भी उस ही कमरे के लिए हाँ!! कोंफेरेंस हाल एक ही समय पर शादी के लिए भी बुक और किसी और सगाई के लिए भी | अब आश्चर्य की कोई बात ही नहीं की कुछ ही महीनों में होटल कंगाली की कगार पर पहुँच गया था | 

अब महिला के पास फोन आया - " हमने सुना है की आप यह होटल बेच रहे हैं - क्या आपको ____ रुपये में सौदा मंज़ूर है?" महिला ने कहा "ज़रूर - शर्त सिर्फ इतनी है की आपको होटल खरीदते ही अपना फोन नंबर बदल लेंगे !!!" 

फिर मिलेंगे 
:)
:)
:)

The Politician and the Horsefly


Once a politician was being driven by a farmer in a buggy. A Horsefly started circling the politician's head.
He asked the farmer, "What insect is this?"
The farmer replied "A horsefly"

P: "What is a horsefly"
F: "An insect which circles the heads of horses, mules and jackasses"

P: (Angrily) "You mean I am a horse?"
F: "No sir"

P: (Still more angrily) "Then you are calling me a mule??"
F (Little irritated, but hiding it) "No sir, I didn't mean that either."

P: (Infuriated) "Are you calling me a jackass???"
F: (Thoroughly irritated now) "No sir. I am not calling you any of those things sir. ..... But you see, you can't fool a horsefly".............

चूहेदानी




एक कहानी याद आती है ... कभी मेल में आई थी ...

चूहे ने झिर्री से झाँका तो देखा क़ि किसान एक बड़ा डिब्बा लाया है | उसे बड़ी उत्सुकता हुई की यह क्या नया खाने का सामान है ...  तो किसान और उसकी पत्नी की बातें सुनने लगा | किसान अपनी पत्नी से कह रहा था - मैं एक चूहेदानी  लाया हूँ | बेचारा चूहा -- बड़ा घबराया | भाग कर अपने दोस्तों को बताने लगा इस बारे में |
       
        मुर्गे ने उसकी परेशानी सुन कर कहा - "अरे मित्र - मुझे तुम्हारे लिए बहुत दुःख है - मैं ज़रूर तुम्हारे लिए प्रार्थना करूंगा|"
         
        सांप यह सुन रहा था - खुश हुआ क्योकि वह कई दिनों से इस चूहे को खाना चाहता था, लेकिन पकड़ न सका था |

        अब बेचारा डर के मारे बकरे के पास गया - तो उसने कहा "मुझे तुम्हारे लिए बड़ा दुःख है - किन्तु यह मेरी परेशानी नहीं है|"

         इसी तरह बड़े बैल ने भी कोई सहानुभूति नहीं दिखाई |


रात हुई - पट से चूहेदानी की आवाज़ आई तो सब सोचने लगे की क्या फंसा होगा| किसान की पत्नी भागी आई और चूहेदानी के पास जांचने पहुंची| उसमे एक सांप की पूँछ फंसी थी| जब वह वहां पहुंची - तो सांप ने उसे काट लिया | किसान भागा आया , सांप को मार दिया और पत्नी को अस्पताल ले गया | लेकिन लौटने पर भी उसे बुखार था |  अब यह तो सभी जानते हैं बुखार में - मुर्गे का शोरबा {चिकन सूप) फायदेमंद होता है - तो मुर्गा बेचारा कट गया|

         पत्नी की तबियत ठीक नहीं हो रही थी - तो तीमारदारी के लिए कुछ रिश्तेदार आये - इतने लोग - तो अब कटने की बारी बकरे की आई |

          दुर्भाग्य से पत्नी बची नहीं - तो अंतिम क्रिया के लिए कई लोग आये | तो अब - मिस्टर बैल जी शहीद हुए ....

           इसलिए -- जब कोई एक व्यक्ति घर में परेशानी में हो - और हम आराम से बैठे हों - तो यह समझें की अगली बारी शायद ..... 
         

corruption and anna ji's rally

माँ : आज चिंटू के एडमिशन के लिए स्कूल गयी थी , ६ दिन से रोज़ जा रही हूँ | पर हेड मिस्ट्रेस अन्ना जी की रैली में बिजी हैं | ६ दिन से रोज़ सुन रही हूँ कि भ्रष्टाचार विरोधी बैनर आदि बन रहे हैं, मेडम बिजी हैं|"

पापा : तो फिर ? क्या कहा ? कब मिलेंगी ? एडमिशन मिलने की क्या चांसेस हैं ? ऑफिस वालों से कुछ पता चला ?

माँ : हाँ - वो मेडम का अटेंडर कह रहा था - मेडम का एक और बैंक अकाउंट है | स्कूल फीस वाला नहीं - दूसरा अकाउंट | किसी और नाम से | यदि हम इंट्रेस्टेड हैं, तो उस अकाउंट के डिटेल दे देगा - उसमे २०,००० रुपये जमा करवा दें, एडमिशन हो जाएगा |

ग्रास ऑन अदर साइड



प्रकाश : आज मूड बहुत ख़राब है मेरा | आज ऑफिस में स्पंदना यह कह कर गयी कि "Sir, i have finished the work for the day. I am proceeding for tour from tomorrow, will be outstation for about two weeks. in the meanwhile - anushka will look after whatever arises." " सर, मैंने आज का काम ख़त्म कर लिया है ... कल से मैं टूर पर जा रही हूँ - करीब दो हफ्ते बाहर रहूंगी | इस बीच अनुष्का यहाँ जो भी काम होंगे वह संभालती रहेगी " .......... 
अब उसे कैसे कहूं कि उसकी जगह कोई भी नहीं ले सकता? सोचेगी - बॉस लाइन मार रहे हैं - या कुछ और | पर सच में अब उसके बिना रहना बहुत मुश्किल लगता है मुझे | दो हफ्ते कैसे कटेंगे उसके बिना?

क्या मेंटेन करती है अपने आप को - अगर मैंने उसका बायोडाटा खुद स्क्रूटीनाय्ज़ न किया होता - तो कभी नहीं मानता कि वह ३० इयर ओल्ड है - २५ से ज्यादा की तो लगती ही नहीं | और एक मेरी सुषमा है - है तो ३१ की - पर लगती है ३६ की | और रोज़ शाम को वही "हेल्लो डार्लिंग - कैसा रहा आज ऑफिस में आपका दिन ?" और चाय के कप के साथ वही घिसा पिटा - "आय लव यू" ........ 
पहले उसका यही कहना कितना अच्छा लगता था - अब खीज आती है | पता नहीं क्या सोच कर उससे शादी कर ली मैंने मम्मी पापा से झगडा कर के !!! अच्छी भली पढ़ी लिखी है - कॉलेज के दिनों में सबसे स्मार्ट लगती थी - पर अंकिता के बाद जो जॉब छोड़ी - तो फिर अपने आप को मेंटेन करना छोड़ ही दिया ....!!                              
 ------------
स्पंदना : प्रकाश सर कितने स्मार्ट हैं | इतनी यंग एज में आलरेडी जनरल मैनेजर हैं | अच्छी खासी इनकम है - प्रेस्टीज है | सर की वायफ भी कितनी सुन्दर हैं - उस दिन पार्टी में मिली थीं - कैसे हंस हंस के सबसे बातें कर रही थीं | कौन कहेगा जी एम की वायफ हैं - कोई शो ऑफ़ नहीं |
------------
सुषमा : अरे , आज भी शाम के चार बज गए - आज भी अंकिता के स्कूल की फीस, और प्रोजेक्ट का सामान लेते लेते लेट होने से पार्लर जाना रह गया | रोज़ कुछ न कुछ हो ही जाता है | कल अंकुर का वैक्सीनेशन था | चलो - अब उसके सारे वैक्सीन्स हो गए - एक बार कन्फर्म करना होगा डोक्टर से - वैसे अंकिता को जो लगे थे वह तो सारे हो गए हैं -पर आजकल नए भी तो आ गए हैं कुछ वैक्सीन्स | कल ज़रूर पार्लर जाऊंगी - मालती बाई से कह दूँगी - सब घरों का काम निबटा कर ही यहाँ आये - बारह बजे तक अंकुर सो भी जाएगा - जब तक मालती अपना काम निब्टाएगी - मैं वापस आ जाऊँगी - अंकुर को तो पता भी नहीं चलेगा कि मैं बाहर गयी थी | वैसे मैं हूँ लकी - मालती बहुत ही अच्छी लड़की है - तो ऐसे में प्रॉब्लम नहीं होती | 
             वेट भी बढ़ रहा है - दो साल बाद अंकुर भी स्कूल जाने लगे - तो जिम ज्वाइन कर लूंगी | वैसे ये (प्रकाश) कितने प्यारे हैं - कभी नहीं कहते कि मैं अपने आप को ठीक से मेंटेन नहीं करती | पर मुझे करना तो चाहिए न.... अब इनका नाश्ता रेडी कर के तैयार हो जाऊं - ये आते ही होंगे ऑफिस से | 
------------
(शाम का नाश्ता रेडी होने तक अंकुर रोने लगता है - तो रेडी होने के नाम पर सुषमा सिर्फ मुह धो कर कंघी कर पाती है , उसे कपडे बदलने को भी समय नहीं मिल पाटा - जो कपडे पहन कर बहार गयी थी - वो पूरी तरह मुरझा गए हैं - वह खुद भी कम्फर्टेबल नहीं है - लेकिन वक्त नहीं है की शावर कर के कपडे बदल पाए ... पति के लौटने का वक्त है )
------------
प्रकाश : अरे सुषमा - अंकिता कहाँ है - खेलने चली गयी इतनी धूप में? तुमसे कितनी बार कहा है - उसे ६ से पहले बाहर मत भेजा करो - ?
सुषमा : नहीं - वह कुछ स्कूल का प्रोजेक्ट था - तो यह चार जनों के ग्रुप में शालिनी के घर पर ही बना रहे हैं -आपका दिन कैसा रहा आज ऑफिस में ? आप कितने थके और स्ट्रेंड लग रहे हैं - टेंशन मत लिया कीजिये इतना - आय लव यु .... |
प्रकाश : हम्म्म्म  .... ठीक ही रहा दिन - | ....(( ... अब इसे क्या कहूं कि इसी के कारण दिन ख़राब होता है मेरा - देखो कैसे भूतनी बनी बैठी है - और स्पंदना के बाल कैसे सेट रहते हैं हमेशा - मजाल है कि एक बाल भी यहाँ का वहां हो जाए ..... ड्रेस प्रेस तक नहीं करी है - ऐसे ही पहन ली - और स्पंदना ...))
सुषमा : आप आराम कर लीजिये - मैं चाय लाती हूँ | 
-------------
एक महीने बाद - ऑफिस में टार्गेट से ज्यादा टर्नओवर होने की पार्टी है - सैटर्डे रखी है जिससे सब लोग आराम से एन्जॉय कर सकें |
सुषमा और स्पंदना साथ हैं ....
स्पंदना :आप इतने अच्छे से कैसे मेंटेन करती हैं खुद को? और कितने लम्बे और घने बाल हैं आपके - ऐसा हेयर स्टायल तो मैं सोच भी नहीं सकती - मैं तो हर १५ डेज़ में पार्लर जाती हूँ और बाल कट करा कर सेट करा कर आती हूँ | अभी तो सब ठीक है - शादी और बच्चों के बाद क्या होगा पता नहीं ? टाइम कैसे मिलता है आपको दो छोटे बच्चों के साथ अपने आप को ऐसे मेंटेन करने के लिए ? ............... अगले महीने मेरी और रोहित की एंगेजमेंट है - तीन महीने बाद शादी | फिर मैं यहाँ से शिफ्ट हो जाऊंगी | रोहित मेरे कॉलेज में ही था - पर कभी ऐसा लगा नहीं कि वी आर फॉर ईच अदर - वह तो यहाँ पिछले एक साल से काम करते हुए लगा कि उसे मिस कर रही हूँ - और जब टूर्स और कांफेरेंसेस में मुलाकात होती - तब पुरानी बातें याद करते | वैसे उसकी मम हमारे साथ रहेंगी - क्योंकि हम दोनों ही जॉब में रहेंगे तो घर देखने के लिए | आंटी बहुत ही अंडर्स्टेडिंग टायप की हैं - खुद ही कहा कि मैं घर संभाल लूंगी - तुम अभी करियर पर कांसेंट्रेट करो |..............बोम्बे में अच्छी जॉब ओपनिंग भी मिल रही है ... नेक्स्ट 21st को रेज़िगनेशन  नोटिस दे रही हूँ - वैसे अनुष्का को सब काम ठीक से सिखा दिया है - होप सर को ज्यादा प्रॉब्लम नहीं होगी | शी इज आल्सो वेरी कॉम्पीटेंट | ........... सुषमा मैम - आय विल बी इन टच विद यु ओन ई मेल | सर को अभी मत बताइयेगा मेरे रेजिग्नेशन के बारे में - मैं कल ऑफिस में बता दूँगी |
------------
अंकुर : मामी - स्पंदना आंती कैछी पली जैसी छुन्दल हैं न? कल उन्होंने मुझे डेली मिल्क दी पालटी में - और अंकिता दीदी को बी - औल उन्होंने कहा कि चोकलेट के हात छे छेक हैंड नइ कलते हैं  - टिशु पेपल से हात  पोछ्ते हैं - आप तो गोदी में ले कर पानी से हाथ धुलाती हो ...
------------

प्रकाश : "i am sure spandana is also as attracted to me as i am to her (मुझे पक्का पता है की जितना मैं स्पंदना की और आकृष्ट हों, वह भी मेरी तरफ है ) - पर यह मुसीबत जो गले पड़ी हुई है - सुषमा - तो कैसे प्रोपोज करूँ स्पंदना को? इसीलिये बेचारी रेज़ाय्न कर के बोम्बे जा रही है - आय विश आय कुड चेंज थिंग्स - पर बच्चे भी तो हैं - उनकी लाय्फ़ ख़राब हो जायेगी | यह पत्नी कैसी भी हो - माँ तो अच्छी है - मुझे बच्चों का कुछ देखना ही नहीं पड़ता कभी ......

..................... --------- ..................... ---------- .............. ---------................

हवा और पंखा


पंखे ने हवा से कहा - "तू बड़ी आलसी है रे !! तभी चलती है जब मैं घूमता हूँ और तुझे घुमाता हूँ ,नहीं तो चलती ही नहीं!! अगर बिजली चली जाए - तो कमरे में सब परेशान होते रहते हैं - और तू है की घूमने का नाम ही नहीं लेती | सब मेरी और देख देख कर बिजली का इंतज़ार करते रहते हैं - कि  कब बिजली आये और मैं घूमूं, तो तू चले | दादी माँ तो कागज़ य पत्रिका लेकर तुझे जोर जोर से मारती भी हैं (हाथ से पंखा करना) - पर तू पूरी बट्ठर है - हिलने का नाम ही नहीं लेती !!!

यह सुन कर हवा खूब हंसी | बेचारे कमरे तक की सिमटी दुनिया में अपना पूरा जीवन गुज़र देने वाले पंखे को वह कैसे समझाती - की पवन तो चंचलता और स्फूर्ति का प्रतीक मानी जाती है? उसने कहा - तू मनुष्य का बनाया हुआ उपकरण है जो एक मनुष्य की सिमटी दुनिया (कमरा) में मनुष्य की सीमित ऊर्जा (बिजली की सप्लाय) पर चलता है - एक दिन नया आता है - कुछ वर्षों का जीवन गुज़ार कर चूँ चां करने लगता है - और बूढा हो कर अपने काम से रिटायर कर दिया जाता है - फिर कोई नया पंखा तेरी जगह आ जाता है|

मैं तुझे इस कमरे से बाहर की दुनिया के बारे में कैसे समझाऊँ ? बाहर ईश्वर की बनाई एक अपार दुनिया है - जिसमे मैं निरंतर चलती हूँ - कभी नहीं रुकती ! अनादि काल (सृष्टि की शुरुआत) से चल  रही  हूँ और अनंत काल (प्रलय - और कुछ पुराण कहते हैं कि प्रलय के बाद भी पवन देव स्थिर नहीं होते) तक चलती रहूंगी | और ऐसे वैसे नहीं - पूरे नियम कायदे से चलती हूँ | जहाँ भी मेरी शक्ति (प्रेशर) कम हो - तो मैं आस पास के पूरे घेरे से उस जगह का प्रेशर सामान्य करने दौड़ पड़ती हूँ | ज्यादा प्रेशर से कम प्रेशर की ओर दौड़ने और सब जगह बराबरी स्थापित करने के लिए मुझे किसी बाहरी बिजली की सप्लाय की ज़रुरत नहीं पड़ती - मेरे रचनाकार (ईश्वर) ने मुझे किसी और ऊर्जा पर निर्भर नहीं रखा है, मेरी अपनी ऊर्जा है - जिससे मैं पूरी तरह स्वयंचालित हूँ - ना मुझे पेट्रोल चाहिए चलने को, ना न्यूक्लीयर पावर ना ही तेरी तरह बिजली !"


यह सुन कर पंखा खूब हंसा और बोला - " गप्प भी सोच समझ कर मारनी चाहिए - तू - जो इस छोटे से कमरे में नहीं घूम सकती मेरे धकेले बिना - तू कह रही है यह सब ! अजब झूठी है रे तू तो!!!"


और पंखा हँसता रहा - जब तक बिजली आ नहीं गयी और वह अपने काम में लग नहीं गया (घूमने लगा) उसे यह सोच रह रह कर गुदगुदाती रही कि हवा आलसी होने के साथ ही साथ कितनी झूठी और गप्पी है!!!


(कुँए के मेंढक कि कहानी तो आपने ज़रूर सुनी होगी - जिसमे मेंढक को कोई सागरवासी मिलता है और वह मेंढक उस नए दोस्त से यह समझने कि कोशिश करता है कि सागर कितना बड़ा होगा - लेकिन उसकी अधिकतम सोच अपने संसार (कुँए) से बड़ी कभी नहीं हो पाती  )

शुक्रवार, 25 नवंबर 2011

I am Michelle's husband :) :) :D


From Sanjay Mehta :) , thanks

: VERRRRRRRY FUNNY 


TRANSLATION PROBLEMS :)


This is a story from the Japanese Embassy in US.. 
 
A few days ago, Prime Minister Mori was given some Basic English conversation training before he visitsWashington and meets president Barack Obama... 
The instructor told Mr Prime Minister, when you shake hand with President Obama, please say 



'how r u'. 

Then Mr. Obama should say, 'I am fine, and you?' 



Now, you should say 'me too'. Afterwards we, translators, will do the work for you.' 


It looks quite simple, but the truth is... 


......


When Mori met Obama, he mistakenly said


'who r u?' (Instead of 'How r u?'.) [ 'WHO' AND 'HOW' SOUND QUITE SIMILAR TO SOMEONE WHO DOES NOT KNOW ENGLISH , FOLKS )


Mr. Obama was a bit shocked but still managed to react with humor: 
'Well, I'm Michelle's husband, ha-ha...' 


Then Mr. Mori replied 'me too, ha-ha.. .'. 


Then there was a long silence in the meeting room.