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रविवार, 18 जनवरी 2015

spiritual revelations scientific discoveries

धर्म का अर्थ "उपासना पद्धति" करने वालों के लिए इस पोस्ट का कोई ख़ास अर्थ नहीं है - फिर चाहे वे आस्तिक कन्फूज़न में हों या नास्तिक कन्फ्यूज़न में :) आप पढ़ने के लिए सादर आमंत्रित हैं, लेकिन यह पोस्ट उपासना पद्धति की बात नहीं कर रही इसलिए किसी उपासना पद्धति पर मुझसे प्रश्न न कीजियेगा प्लीज़ :)

ओशो को सुनते हुए :

महावीर , बुद्ध , कृष्ण , जीज़स आदि …जैसे धार्मिक खोजियों ; और न्यूटन , आइंस्टाइन , बोस आदि ....  जैसे वैज्ञानिक खोजियों की खोज पद्धति में मूल फर्क क्या और क्यों है ? विज्ञान कभी नहीं कहता कि आज खोज सम्पूर्ण हुई - इसके आगे / पीछे जानने को कुछ नहीं बचा।  लेकिन धर्म की खोज का स्कोप timeless कहा जाता है।  बुद्ध की बातें आज भी प्रासंगिक ही हैं जबकि विज्ञान अपने वर्जन को बदलता रहता है।  कुछ समय पहले यह माना जाता था आज वह माना जाता है। पहले कहते थे प्रकाश वेव है, फिर कहा पार्टिकल है, फिर कहा ड्युअल नेचर है फिर कहा द्रव्यमान शून्य है फिर नहीं है और पता नहीं क्या क्या।


ओशो इसपर बहुत ही उपयुक्त निरूपण देते हुए लगते हैं।  वे कहते हैं - विज्ञान की खोज ऎसी है जैसे व्यक्ति एक दिया या लालटेन लेकर अँधेरे में कुछ खोजता हो।  अपने आगे और अपने पीछे का सीमित दायरा ही उसे दिखेगा।  उस रौशनी के घेरे में वह खोजी सब तरफ, हर कोण पर देख तो पायेगा , लेकिन निश्चित सीमा तक ही।  जहां तक प्रकाश, उतने दायरे के सत्य सत्य होंगे।  प्रकाश के दायरे से पीछे जो छूट गया - वह सत्य है या नहीं इस पर स्मृति के अलावा कोई साक्ष्य नहीं।

रामायण महाभारत आदि - स्मृतियाँ ही हैं ? या लोककहानियाँ ? या कवियों की कल्पनाएं ? या सत्य ? या कैसे तय हो ? हाँ - गांधी हुए थे यह माना जा सकता है आज - क्योंकि गांधी तक हमारे साक्ष्यों का प्रकाश दायरा अभी तक पहुँच रहा है।  जीज़स हुए या नहीं इस पर बहसें अब होने लगी हैं, जबकि कुछ समय पहले तक यही जीज़स एक ऐतिहासिक सत्य थे।

इसी तरह आगे की तरफ भी वैज्ञानिक खोजी उतना ही देख सकता है जितना उसकी वैज्ञानिक दृष्टि देख पाये।  उसके आगे सब कुछ असत्य ही है - आगे बढ़ने के बाद जब प्रकाश का दायरा आगे जाएगा - तब वहां नए सत्य उजागर होंगे।

इसके विपरीत - धार्मिक (उपासक नहीं , पंथ नहीं - धर्म ) खोजी जैसे महावीर और बुद्ध जो खोजते हैं वह दिए के प्रकाश को लेकर एक दायरे में खोजी गयी सीमित सच्चाई नहीं बल्कि revelation होता है।  जैसे व्यक्ति अँधेरे में खड़ा हो और पल भर में बिजली कौंधे, और जितनी दूर नज़र जाए सब कुछ प्रकाशित हो उठे।  व्यक्ति फिर वस्तुओं को दायरे में नहीं देखता बल्कि पूर्ण में सब कुछ उसे दिख जाता है।  वह फिर जान कर उन्हें बताता है जिन्होंने नहीं देखा - और यह संभव ही नहीं कि सदियों बाद उनकी देखि हुई विराट सच्चाई हम तक उसी रूप में पहुंचे।  हम अपने अपने चश्मों से सत्य के अलग अलग पहलुओं को देखते समझते और समझाते रहते हैं।  भूल होती ही चली जाती है।

इस तरह देखा जाये तो वैज्ञानिक खोज हर एक के निजी खोज के मार्ग में बेहतर है - क्योंकि कम से कम हर एक अपने दिए तो लेकर चल रहा है।  जबकि अधिकाँश पंथ अपने आप को "धर्म" मानते हुए अँधेरी रात में बिना दिए के सदियों पहले किसी और को हुए revelation  के समझाए मार्ग पर आँखों पर पट्टी बांधे चल रहे हैं ....


गुरुवार, 2 जनवरी 2014

yogi patanjali non-violence osho

पतंजलि सूत्र :

जब योगी पूर्णतः योग में डूब जाता है तब उसके पास की सम्पूर्ण सृष्टि अहिंसक हो जाती है :

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योगी भर ही तो योगी है -
आस पास की सृष्टि तो नहीं ?
फिर यह सूत्र क्या कह रहा है ?
यदि ऐसा है तो क्यों ,
जीज़स को सलीब और ,
सुकरात को जहर मिला ?
वे लोग जो इन योगियों के समीप थे ,
क्यों अहिंसक न हुए ?
क्या जीज़स या सोक्रेट्स ,
सनातन सत्य प्राप्त -
सच्चे योगी नहीं थे ?

क्यों लोगों ने महावीर और ,
बुद्ध पर लगाए लांछन ?
क्या उन्होंने आत्मबोध को नहीं पा लिया था ?

क्यों हुए कृष्ण और राम जैसे ,
ब्रह्मज्ञान युक्त योगियों के  ,
आस पास इतने भयंकर युद्ध ?
क्या यह सूत्र झूठा है ?

न - पतंजलि सिद्ध योगी हैं ,
उनका सूत्र झूठा कैसे हो सकता है ?
फिर ?

हाँ - सुना है यह भी हमने ,
कि जब मीरा को आया था,
विष का प्याला ,
तो विष ने अपना स्वभाव बदल ,
खुद को अमृत कर लिया था ,
और सांप ने स्वयं को बदल दिया
पुष्प माला में ।

सुना है मैंने कि ,
देवव्रत ने बुद्ध पर ,
बड़ा शिलाखंड गिरवाया था ,
लेकिन ठहर गया था शिलाखंड ,
बुद्ध को छूने से पहले ,
अपने स्वभाव के विपरीत ।

जब बुद्ध पर पागल हाथी लपकाया गया ,
तो वह शांत भाव से हुआ ,
चरणों की शरण।

सुना है बहुत कुछ जो ,
हुआ इन सिद्ध योगियों के निकट ,
जो सृष्टि के स्वाभाविक ,
नियमों के विरुद्ध हुआ ,
लेकिन ,
इन्हे चमत्कार मान लिया गया।

सुना मैंने यह भी है कि ,
एक व्यक्ति ने ,
लाखों लोगों के सामने ,
एक प्रयोग किया था ,
एक सांड के दिमाग में ,
बिठाया एक इलेक्ट्रोड ,
उसे बटन दबा कर क्रोधित किया गया ,
और वह लपका व्यक्ति को मारने ,
फिर कुछ फीट की दूरी पर ,
दूसरा बटन ,
और क्रोधित सांड एकदम शांत हुआ ,
आशंकायें मुस्कुराईं और ,
व्यक्ति को कुछ न हुआ।

तो क्या योगी के आस पास ,
निर्मित होता है कोई तेजमण्डल?
जो ऐसा ही कुछ प्रभाव करता है ,
आस पास की निर्जीव सजीव सृष्टि पर ?

जो पत्थर हैं और हैं पशु ,
उनके मस्तिष्क ,
स्वाभाविक हैं।
तो उनपर असर करता है ,
सतयोगी का प्रभा मंडल ,
वे आईने हो जाते हैं और ,
उनमे दिखती है योगी की ,
शांत छवि।
वे सम्पूर्ण अहिंसक हो जाते हैं।
उनका स्वभाव स्व न रह कर  ,
योगी स्वभाव का प्रतिरूप हो उठता है ,
योगी उन्हें नहीं बदलता ,
उनके आईने साफ़ होने से ,
वे स्वयं योगी का,
प्रतिबिम्बन करने लगते हैं।

लेकिन मानव ?
अनेकों आइनों पर धूल पड़ी है।

जो शांत और खुले मनुष्य हैं ,
वे ऐसे योगी के समीप ,
शांत हो जाते हैं ,
सम्बोधि भी प्राप्त कर लेते हैं।

लेकिन जिनके आईने धूलि धूसरित हैं ,
वे बिम्ब नहीं बनाते ,
वे स्वयं ही धूल में लिपटे ,
चुनाव करते हैं ,
हो वह हिन्दू आस्थाओं की धूल ,
या मुस्लिम ईमान की ,
धारणाओं में लिपटे मानव ,
प्रकाश को स्वयं तक आने ही नहीं देते।

यीशु का प्रेम सन्देश ,
तोते की तरह रट लेने वाले ,
नहीं मान सकते ,
युद्ध को उकसाते कृष्ण को ,
योगी।

और ,
धर्म के नाम पर
निरीह जीवों और जनों की ,
हत्या करना सीखे लोग ,
नहीं मान सकते महावीर के ,
अहिंसा के सन्देश को।
तो वे महावीर को,
योगी मान ही नहीं सकते।

अपने मानक योगी के ,
अपने विश्वासों के विरुद्ध हुई बातो के ,
तर्कसंगत औचित्य ढूंढ लेते हैं।
और दूसरे विश्वासों के योगियों के ,
वे नरक भेज देते हैं ,
अपने मानस मंडल में।

वे कृष्ण को मानें तो ,
रासलीला के अनेक तर्कसंगत कारण ,
गिना देते हैं क्योंकि ,
उनके आईने की धूल कहती है ,
कि योगी नहीं कर सकता रासलीला।
क्योंकि उनकी धूल के अनुसार तो ,
शारीरिक प्रेम सिर्फ पाप है।
फिर वे अपने मन में ही ,
अपने ईश्वर को - ढाल लेते हैं ,
और
उसके आस्था के विरुद्ध दीखते कर्मों के ,
कारण आरोपित करते हैं।

योगी यदि पूर्ण रूपेण ,
यॊगस्थित हो ,
तो अहिंसक हो जाती है उसके ,
उपवास करने वाली सम्पूर्ण सृष्टि।

कृष्ण की गोपिकाएं नाचने लगती हैं ,
सिंह और छौने संग आ जाते हैं।
अग्नियाँ शीतल हो जाती हैं ,
सीता के गुजरने के लिए।

राम के वनमार्ग के ,
कठोर कंटक कोमल पुष्प हो उठते है
तैरने लगते हैं सागर पर पत्थर।

मोज़ेस के संग जाते ,
ईजिप्शियनों से बच भागते ,
इज़राइलियों के लिए ,
सागर राह देता है ,
और उनके जाते ही ,
फिर पूर्ववत हो उठता है।

कृष्ण के स्पर्श से ,
कुब्जा सीधी हो उठती है ,
गुरुनानक जिधर पैर करें ,
उसी ओर ,
दीनवालों को काबा दीखता है।

लेकिन धूलभरे मानव आईने ,
अपने विश्वासों की धूल लिए ,
योगी के प्रकाश की ऊर्जा को ,
प्रतिबिंबित नहीं करते।
वे उसे ,
क्रोधाग्नि की ऊर्जा में ,
रूपांतरित कर लेते हैं ,
और करते हैं योगी पर हमले।

योग सूत्र सच ही है ,
किन्तु परन्तु  लेकिन ....

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ओशो रजनीश के वचनो से