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शनिवार, 6 जून 2015

शिवपुराण १४: बैजनाथ वैद्यनाथ बैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग

बैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग मंदिर या बैद्यनाथ धाम, शिव जी के द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से एक है।  यह झारखंड के देवगढ़ में है , और मंदिर परिसर में कुल २१ मंदिर हैं (इस मंदिर की भौगोलिक स्थिति के बारे में कुछ मतभेद हैं - आगे यह चर्चा है)।

कहा जाता है कि रावण ने शिव जी को प्रसन्न करने के लिए यहीं पर कडा तप किया था । शिव जी प्रकट न हुए तब रावण ने अपने सर काट काट कर अपने आराध्य को चढ़ाना शुरू किया। दस में से नौ सर कटने के बाद जब रावण अपना दसवां सर काटने को हुआ तब शिव जी प्रकट हुए।  उन्होंने "वैद्य" का रूप धार कर घायल रावण का इलाज़ किया इसीलिए वे वैद्य नाथ कहलाये। कहते हैं यहां प्रार्थना करने पर सब मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं इसलिए इसे "कामनालिंग" भी कहते हैं।  भक्त पवित्र गंगाजल सुल्तानगंज से लाते हैं और अभिषेक करते हैं।  श्रावण और भाद्रपद महीनों में यहां मेले लगते हैं।

इसके बारे में यह भी कहा गया है कि यह श्मशान भूमिं पर है और जलती चिताओं की राख शिव जी अपने शरीर पर मलते हैं।  यहां कापालिक साधनाएं भी होती हैं।  

इस ज्योतिर्लिंग की भौगोलिक स्थिति के बारे में थोड़ी अनिश्चितता है।  जहाँ एक तरफ यह 
१. देवगढ़ (झारखंड) में बैद्यनाथ रूप में माना गया है , वहीं इसे
२.  महाराष्ट्र में परली के वैजनाथ और इसे 
३. हिमाचल प्रदेश के बैजनाथ के रूप में भी कहा जाता है।

 परली महाराष्ट्र वैजनाथ मंदिर 
 देवगढ़ झारखंड का बैद्यनाथ मंदिर 
 हिमाचल प्रदेश का बैजनाथ मंदिर 

हिमाचल प्रदेश वाले शिवलिंग के बारे में कथा है कि रावण ने तपस्या कर शिव जी को प्रसन्न किया और माँगा कि वे उसके साथ चलें।  तब श्री शिव जी ने लिंग रूप लिया और रावण से कहा कि तुम इस शिवलिंग को जहां चाहे ले जाकर स्थापित कर लो।  किन्तु यह ध्यान रखना कि रास्ते में कहीं इसे भूमि पर न रखना क्योंकि एक बार रखने पर यह स्थापित हो आएगा और फिर न हिलेगा।  रावण जब शिवलिंग ले जा रहा था तब देवताओं को चिंता हुई कि यदि शिवलिंग लंका में रहे तो रावण को हरा पाना असम्भव होगा।  उन्होंने विचारविमर्श किया और वरुणदेव से प्रार्थना की।  वरुणदेव रावण के पेट में प्रविष्ट हुए और रावण को बेचैनी हुई।  वह जानता था कि शिवलिंग भूमि पर नहीं रखना है।  तब वह किसी को खोजने लगा और उसे एक ब्राह्ण  दिखे।  उसने उन्हें शिवलिंग कुछ पल पकड़ने को कहा और जब वह लौटा तो ब्राह्मण शिवलिंग को इतनी देर न उठा पानेका कारण कह कर कारण भूमि पर रख चुके थे।  रावण ने शिवलिंग को उठाने और आगे बढ़ने की कोशिश की तो शिवलिंग को उठा पाना संभव न हो पाया।  तबसे यह शिवलिंग यहीं स्थापित है। रावण ज्ब तक जीवित था रोज़ वहां आकर अर्चना करता था।  किन्तु रावण की मृत्यु के बाद लम्बे समय शिवलिंग यूँ ही उपेक्षित रहा।  तब एक "बैजू" नामक शिकारी को ये मिले और उसने उन्हें अपना इष्टदेव मान पुनः पूजा आरम्भ की  और स्थापित किया। इसलिए ये "बैजू के नाथ" या बैजनाथ नाम से प्रसिद्ध है। 

गुरुवार, 4 जून 2015

शिव पुराण १३ : त्रियम्बकेश्वर ज्योतिर्लिंग गोदावरी गौतमी गंगा


त्रियम्बकेश्वर मंदिर महाराष्ट्र के नाशिक जिले में स्थित हैं। गोदावरी नदी के उद्गम इस मंदिर के प्रांगण में एक कुशावर्त नामक कुण्ड है जो गोदावरी नदी का उद्गम स्थल कहा जाता है। गोदावरी नदी यहां से चल कर करीब डेढ़ हज़ार किलोमीटर का सफर करने के बाद आंध्र प्रदेश से होती हुई बंगाल की खाड़ी में प्रविष्ट होती हैं।

शिव पुराण में कहा गया है कि एक बार भयंकर सूखा पड़ा।  ब्रह्मपर्वत नामक पर्वत पर महर्षि गौतम अपनी पत्नी अहल्या के साथ निवास करते थे।  गौतम ऋषि और अहल्या जी ने वहां दस हज़ार वर्षों तक पति के संग तपस्या की थी । उस समय जब भयंकर सूखा पड़ा तो अकाल आया और पशु पक्षी और मनुष्य भूख प्यास से मरने लगे। तब श्री गौतम जी ने वरुण देव से प्रार्थना की कि वहां वर्षा करावें।  किन्तु यह वरुण देव के अधिकार क्षेत्र से बाहर था क्योंकि वे जल सामग्री के देव हैं किन्तु वर्षा और मेघ इंद्रदेव का अधिकार क्षेत्र है।  तब गौतम जी ने उनसे कहा कि वहां सदा बहने वाली झील हो जिससे उस स्थल पर कभी जल संकट न आये।  यह प्रदान कर वरुण देव अंतर्ध्यान हुए।  

देवी अहल्या पति सहित वहां रहतीं थीं ।  कहते हैं कि गौतम सुबह बीज बोते और दोपहर फसल काटते और सबऋषि मुनियों और साधारण जनों को भोजन करवाते।  इससे उनके पुण्य बहुत बढ़ने लगे और इंद्र को चिंता हुई।  तब इंद्र ने वहां वर्षा करवाई जिससे ब्राह्मण अपना भोजन के लिए गौतम पर ही निर्भर न रहें और गौतम का पुण्य और न बढे। किन्तु सब ठीक हो जाने पर भी गौतम जी ने आदर सहित मुनियों को वहीँ रहने को कहा और अपना पुण्यकार्य करते रहे। 

इधर वरुण देव द्वारा प्रदान की गयी पवित्र झील का जल सभी प्रयुक्त करते।  दूसरे मुनियों की पत्नियां वहां जातीं और जल लेटिन।  जब गौतम महर्षि के शिष्य वहां जाते तो वे उन्हें भगा देतीं।  यह जानने पर अहल्या जी स्वयं जल लेने जाने लगीं।  अन्य मुनिपत्नियां न चाहती थीं कि वे वहां से जल लें और वे उनपर अनेक व्यंग्य आदि करतीं किन्तु अहल्या जी चुप चाप जल लेकर लौट आतीं।  मुनि पत्नियां अपने पतियों से अहल्या की बुराई कहतीं।  धीरे धीरे सब यह मानने लगे कि गौतम और अहल्या ही गलत हैं।  तब सब मुनियों ने गणेश जी का आवाहन किया और उनसे माँगा कि गौतम और अहल्या को यहां से भगाए दिया जाए।  गणेश जी ने यह वरदान दे दिया। 

इधर शिव जी की पत्नी पार्वती थीं किन्तु गंगा जी शिव जी की जटाओं में बसी होती हैं।  पार्वती को यह अच्छा न लगता था , और शिव जी गनगा को अलग करने पर राजी न थे।  तब गणेश जी ने अपनी माता को सुख देने और मुनियों को दिए वरदान की पूर्ती करने के लिए एक स्वांग रचा।  पार्वती जी की एक सहेली थीं - जया।  गणेश जी ने उन्हें गाय का रूप लेने को कहा और कहा कि जब गौतम तुम्हे भगाने आएं तो मरने का स्वांग रचना।  तब जाया गाय बन कर गौतम जी के खेतों में घुस गयीं।  गौतम जी ने उन्हें हटाने के लिए कुशा घास से मार तो गाय मर कर गिर पड़ी।  यह देख कर मुनियों ने "गौहत्या" का आरोप लगा कर कहा कि ऐसे पापी के संग हम न रहेंगे।  हम जा रहे हैं।  गौतम जी ने उनसे प्रार्थना की कि वे वहीँ रहें और प्रायश्चित्त का तरीका पूछा।  

मुनियों ने कहा कि उन्हें पूरी पृथ्वी की परिक्रमा करनी होगी , फिर एक महीने कठिन तप और ब्रह्मपर्वत  सौ प्रदक्षिणाएँ। इसके पश्चात सौ पवित्र सरोवरों में स्नान।  यह सब गौतम जी और अहल्या जी ने किया ।  शिव जी उनके सम्मुख प्रकट हुए और उन्हें वरदान मांगने को कहा।  गौतम जी ने यह माँगा कि वे पार्वती जी सहित सदा वहां निवास करें , और गंगा जी इस क्षेत्र में बहें। 

तब शिव जी त्रियंबक लिंग के रूप में स्थापित हुए। शिव जी चाहते थे कि गंगा जी गौतम जी के मांगे वरदान के अनुरूप वहां प्रकट हों किन्तु गंगा जी शिव जी के सर चढ़ी थीं और उतरना न चाहती थीं।  क्रोधित हो शिव जी ने तांडव नृत्य किया और अपनी जटाएं पटकीं , जिससे गंगा जी छिटक गयीं।  किन्तु केशों से छिटके पानी के छींटों की तरह गंगा जी यहाँ वहां प्रकटतीं और लुप्त हो जातीं।  गौतम जी उनमे स्नान कर अपना गौहत्या का पाप धोना चाहते थे किन्तु गंगा इतनी देर कहीं न रुकतीं कि वे स्नान कर सकें।  तब गौतम जी ने ज्योतिर्लिंग के समीप ही "कुशा" घास में उन्हें बाँध दिया (आवर्त कर दिया) इसीसे इस सरोवर का नाम "कुशावर्त" हुआ। इस कुण्ड में बंधने के बाद गंगा जी वहां से बहने लगीं। इसीलिए गोदावरी जी को "गौतमी गंगा" भी कहते हैं। 

किन्तु शिव जी मुनियों के स्वांग को जानते थे और उन्हें दंड देना चाहते थे।  गौतम महर्षि ने उन मुनियों को क्षमादान दिलवाया। गोदावरी / गौतमी गंगा के माहात्म्य की कई कथाएं आगे आएंगी। किन्तु इनमे स्नान कर लाभ लेने वालों में श्री बलराम जी, चैतन्य महाप्रभु, आदि की कथाएं बड़ी प्रसिद्ध हैं। गोदावरी जी के किनारे ही बारह वर्षों में एक बार पुष्कर मेला लगता है।  



त्रियम्बकेश्वर मंदिर











गोदावरी जी का उद्गम - मंदिर के पास कुशावर्त सरोवर। 

शुक्रवार, 1 मार्च 2013

क्या हिन्दू धर्म हमें अपने आराध्यों की आलोचना का अधिकार देता है ?

आज रचना जी के ब्लॉग "बिना लाग लपेट के…" पर यह लेख पढ़ा : "ईश्वर - हिन्दू धर्म "। इसमें रचना जी ने हिन्दू धर्म में अवतारों के तत्कालीन सामाजिक बिहेवियर और उसपर हिन्दू धर्मावलम्बियों द्वारा होने वाली आलोचना और उसके लिए धार्मिक सम्मति पर लिखा है । इस पर टिप्पणी लिखने लगी , तो वह टिप्पणी पूरी पोस्ट ही बन गयी - इसलिए वहां लिंक दे कर यहाँ पोस्ट के रूप में पब्लिश कर रही हूँ ।

इससे पहले भी मैं इसी "हिन्दू धर्म में अवतारों" की आलोचना , उनकी "मानवीय गलतियों" की आलोचना आदि पर , इस ब्लॉग पर , यहाँ लिखा था , लिंक क्लिक कर आप फिर से पढ़ सकते हैं ।
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-त्रुटी सुधार 
पूरे लेख में "आलोचना" शब्द से अर्थ "निंदा की मंशा से की गयी आलोचना " पढ़ा जाए । यह सुधार आदरणीय सुज्ञ जी के दिए कमेन्ट और "आलोचना" और "निंदा" में फर्क के सन्दर्भ में है ।   
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यह हिन्दू धर्म की "खासियत" या "तारीफ़" की बात नहीं है की हम अपने आराध्यों की आलोचना करते हैं, बल्कि यह हमारी कमी है, कि हमने इसे इतना common बना लिया कि अब यह हमें normal लगने लगा है । एक रेपिस्ट के लिए रेप करना "normal" है, एक चोर के लिए चोरी करना "normal" है, एक डाकू के लिए डाका डालना भी normal है । इसका अर्थ यह नहीं है कि यह सब सच ही में नोर्मल है । .............. और इसी तरह से आराध्यों की आलोचना भी normal नहीं है, और "हिन्दू" या कोई भी समाज / धर्म इसे सही नहीं ही मानते हैं / ठहरा रहे हैं ।

हम ऐसा इसलिए समझने लगे हैं, कि हमें अपने धर्म के बारे में सही जानकारी ही नहीं है । 

जानकारी कैसे हो ? एक तरीका था कि हम धर्मग्रन्थ पढ़ कर जानते - लेकिन हमने तो अपने ग्रन्थ भी नहीं पढ़े (जिससे हम जान पाते) कि हमारा धर्म क्या कहता है (समय कहाँ है हमारे पास यह सब पोथियाँ पढने  के लिए ???) । और दूसरा तरीका था धर्म गुरुओं से आम इंसान धर्म के बारे में जान पाता । वह भी नहीं हुआ , क्योंकि गुरुओं से सीखना तो खैर आज के modern ज़माने में हमें अपनी तौहीन ही लगती है, और सच्चे गुरु भी इस कलियुग में मिलना बड़ा कठिन है :(  :(  ....... तो उस दिशा से भी हम कभी नहीं जान पाए कि "क्या हमें अधिकार है भी या नहीं यह "आलोचना" करने का ।"

अवतारों की आलोचना करने का अधिकार हमें "हिन्दू धर्म" नहीं देता - यह हमारा धर्म के बारे में अज्ञान है जो हम ऐसा सोचते हैं कि हमारा धर्म हमें इन अवतारों के बारे में "क्रिटिकल" होने का अधिकार देता है । तीन उद्धरण दे रही हूँ अपनी बात रखने के लिए ।

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१. रामायण में बाली राम से प्रश्न करता है कि आपने मुझ पर छुप कर वार क्यों किया - अर्थात आलोचना । राम उत्तर देते हैं कि मेरे निर्णय के कारण मैं जानता हूँ - तुम्हे प्रश्न करने का अधिकार ही नहीं है । अर्थात - जिसे मारा गया - उसे तक भी आलोचना का अधिकार नहीं है , हमारी और आपकी तो खैर बात ही छोड़ दीजिये ।
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२. गीता में कृष्ण कहते हैं कि

(४.६ से ४.९ 4.6 to 4.9 )
"सब जीवों का प्राणदाता, अजन्मा, ईश्वर हो कर भी , मैं , अपनी प्रकृति को अपने अधीन कर (धर्मरक्षा के लिए और अधर्म के नाश के लिए ) प्रकट होता हूं । जो मुझे और मेरे अवतरण को दिव्य जानते हैं, वे मुझे प्राप्त करते हैं"

( ४.१४ 4.14)
"मैं अपने कर्म में लिप्त नहीं होता - इसलिए कर्मफल में नहीं बंधता । और जो ज्ञानीजन इस बात को समझते हैं वे भी कर्म से नहीं बंधते "
****(आपके शब्दों में "कर्मों की आलोचना" - यह भी कर्म फल ही होता है , और यह ज्ञानीजन नहीं करते)****

(९ .९ से ९ . ११ 9.9 to 9.11 )
" मैं सब कर्मों को करते हुए भी उनमे आसक्ति नहीं रखता, तो कर्म मुझे नहीं बाँध सकते । जो "मूर्ख" इस बात को नहीं समझते, वे मूर्ख , मानव रूप में विचरण करते हुए मुझ "दिव्य" को नहीं पहचानते और मेरी आलोचना करते हैं । वे मोहित हुए (माया से, अपने अज्ञान को ज्ञान समझ कर के मोह में विमूढ़ / बेसुध हुए ) इन "राक्षसी" और "नास्तिकता की" बातों की ओर आकर्षित होते हैं, और मुक्ति की संभावनाओं से दूर होते जाते हैं ।
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३. रामचरित मानस में जब शिव जी सती जी को राम जी की लीलाएं सुनाते हैं तो सती जी इस "मानव अवतार" के "परमेश्वर" होने पर अविश्वास करती हैं, राम जी की मानवी लीलाओं की "आलोचना" करते हुए प्रश्न करती हैं , कि "ऐसे मूर्ख मानव संवेदनाओं में बहने वाले को आप परमेश्वर कहते हैं ?" तब शिव जी उन्हें बहुत समझाते हैं, कि यह सब लीला है और प्रभु की "आलोचना" करना महापाप है । 

किन्तु सती जी को समाधान नहीं होता और वे अपनी "आलोचना" पर मन ही मन अडिग रहती हैं । इस पर एक बहुत लंबा वर्णन है जिसके अंत में शिव द्वारा मानस रूप से सती जी का त्याग होता है, और आखिर सती जी भी मानव संवेदनाओं की ही लीला रचते हुए (जिन संवेदनाओं की उन्होंने राम जी में आलोचना की थी) अपने पिता की यज्ञशाला में आत्मदाह कर लेती हैं ।

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यह तीनों वर्णन कहने का मतलब है कि "धर्म" आपको , या मुझे , या किसीको भी , ईश्वर की / अवतारों की , "आलोचना" करने आ अधिकार नहीं देता । यह तो पिछले ६-७ शताब्दियों में विदेशी धर्मों के विदेशी प्रचारकों (और बाद में विदेशी प्रचारकों और देशी धर्मान्तरित अव्लम्बियो, जो भूल चुके थे कि उनके पुरखों को कैसे धर्मान्तरित  किया गया था ) की फैलाई हुई सीख है जो हिन्दुओं को इस भ्रान्ति में डाल रही है कि "तुम अपने आराध्यों की "आलोचना" करने को स्वतंत्र हो ।"

क्योंकि उस पराधीन कालखंड में (पहले मुग़ल और फिर ब्रिटिश राज्य के कालखंड ) यह "आलोचना" राज करने वालों "शक्तिवंतों" की ओर से आती थी , विरोध करने का अर्थ मृत्युदंड था ।  इसलिए यह सदियों तक सुनते सुनते जनमानस के मन में "acceptable" हो गयी । 

माता पिता भी सत्य बताते हुए डरते , कि आखिर बच्चे तो बच्चे होते हैं, उन्हें सत्य कहा , तो वे बाहर कह देंगे, और मारे जायेंगे । तो वे बच्चों को "बड़ा" होने पर बताने के लिए बात को टाले रखते । लेकिन विडम्बना यह है कि , बच्चे बड़े होने तक उनकी विचारधाराएं पक जाती है, उनके मन में "आलोचना" पक्की बैठ जाती है । यही हमारे धर्म के साथ हुआ ।

फिर देश में सरकार बनी जो हमें "secularism" की पट्टी पढ़ाती रही, इतिहास की पुस्तकों से वह सब क्रूरताएं छिपाई रखी गयीं कि किस तरह "हिन्दू" को जबरन धर्म के बारे में भ्रमित किया गया । इसलिए हम यही समझ रहे हैं कि यह "आलोचना" सही है, बल्कि इससे भी आगे बढ़ कर यह समझ रहे हैं कि हिन्दू धर्म की सीख ही है कि आराध्यों की आलोचना करो । जबकि यह अर्धसत्य है, जो झूठ से भी अधिक खतरनाक होता है ।

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"साम" "दाम" "दंड" "भेद" ये चार तरीके होते हैं मनुष्य को उसके विश्वासों से डिगाने के लिए । इस "धर्म निंदा और धर्मांतरण" के सिलसिले में, जब हिन्दू "गुलाम" थे और "दुसरे धर्मों वाले" हमारे राजा थे, इन चारों नीतियों को ऐसे इस्तेमाल किया गया । 

साम का अर्थ है समझाइश : हमें समझाया गया कि हमारे आराध्य "imperfect" हैं, उन्होंने तो बहुत सी "मानवीय भूलें" की हैं, वे आराधना के योग्य हैं ही नहीं ।

दाम का अर्थ है : जो गरीब / दरिद्र थे - उन्हें धन के बल पर / पैसे दे कर / जमीन दे कर आदि धर्मान्तरित किया गया ।

दंड अर्थ है - सजा के डर से (टार्चर) 
( गूगल इमेजेस में "gurudwara mahtiana sahab" डाल कर सर्च कीजिये । कुछ अंदाज़ होगा की धर्म परिवर्तन स्वीकार न करने पर किस तरह माओं के आगे उनके दुधमुंहे बच्चों को काटा गया - पहले एक हाथ , फिर दूसरा हाथ , फिर एक पैर ..... :( ।  देखिएगा , कैसे साधू को लकड़ियों में बाँध कर उनके शरीर को आरी से दो भागों में काटा गया, पानी / तेल के बड़े बर्तन में खडा कर के आग पर उबाला गया , कैसे सर की चमड़ी बालों सहित खींच कर उखाड़ ली गयी , आदि…। इसी सब से हिन्दू धर्म और समाज की रक्षा के लिए सिख गुरुओं ने "सिख" बनाए ।

पंजाब के हर "हिन्दू" परिवार का एक बेटा मोना (हिन्दू) होता तो दूजा बेटा सिख । लेकिन आगे औरंगजेब ने दसवें सिख गुरु, श्री गुरु गोबिंद सिंह जी, के सभी सुपुत्रों को मरवा दिया , तो गुरु परम्परा आगे न बढ़ सकी और हमें यह सिखा दिया गया कि "सरदार" के "मूर्ख" होने पर चुटकुले बनाए , सुनाएं, और उनकी हंसी उडाये - जिससे उनका मनोबल भी टूटे और हमसे "भेद:" भी हो ।:(

भेद का अर्थ है जनसँख्या के एक समूह को यह समझाना कि दूसरा समूह तुम्हारा शत्रु है, तुम्हारा शोषण कर रहा है । या इसके -उलट  की वह समूह मूर्ख है, तुमसे नीचा है । नफरत की ऐसी बेल बोई गयी कि "हिन्दू" भूल ही गया कि वह क्या था । वह स्त्री और पुरुष, उच्च वर्ग और निम्न वर्ग, सिख और हिन्दू , मद्रासी और हिंदी, जाति आदि में विभाजित हो कर "धर्म आलोचक" बन गया ।
"

मैं यह सब कह कर सिर्फ इतना समझाने का प्रयास कर रही हूँ कि हिन्दू धर्म हमें कदापि अपने आराध्यों की आलोचना करने की स्वतन्त्रता नहीं देता, यह हमें झूठी पट्टी पढ़ाई गयी है , समय आ गया है की अपनी आँखों पर बंधी पट्टी को हम उतार फेंकें ।

रविवार, 21 अक्टूबर 2012

कथा 5 : शिव पार्वती विवाह


पिछले भाग से आगे
(बाकी भाग पढने के लिए ऊपर "पुराणों की कहानियाँ " tab क्लिक करें )

देवी रति को कामदेव के प्रद्युम्न रूप में लौटने के बारे में बता कर शिव जी वहां से अंतर्ध्यान हो गए । पार्वती बहुत दुखी हुईं और उन्होंने शिव जी को प्राप्त करने के लिए पंचाक्षरी नाम जाप के साथ तपस्या करना शुरू किया । माता ने उन्हें "उमा" कह कर रोका- जिससे उनका नाम उमा हुआ ।

उमा ने बड़ी कठिन तपस्या की , पहले भोजन त्यागा, फिर फल आदि भी त्याग दिए और बाद में पत्र पुष्प भी । पर्ण भी त्याग देने से उनका नाjम "अपर्णा" हुआ । 3 हज़ार साल से अधिक होने पर भी शिव प्रसन्न न हुए, तब पार्वती जी और भी लगन के साथ अपनी साधना में लग गयीं ।

उनके तप ताप के तेज से पृथ्वी संतप्त हो उठी और प्राणियों को अत्यंत पीड़ा होने लगी  । उधर ताड़कासुर ने सब और अपना राज्य विस्तारित किया और इन्द्रासन पर भी आसीन हो गया । तब देवगण विष्णु जी और ब्रह्मा जी सहित शिव जी के पास गये और पार्वती से ब्याह करने को कहा, । शिव जी ने कहा कि  मैं योगी हूँ, मुझे विवाह में कोई रूचि नहीं, और फिर से ध्यान मग्न हो गए । देवताओं ने उन्हें फिर पुकारा और धरा पर मची हाहाकार से मुक्ति के लिए उनसे तप स्वीकारने की प्रार्थना की । तब शिव जी ने कहा कि यद्यपि विवाह में हमारे रूचि नहीं है, तथापि आओ सब के लिए हम यह स्वीकार कर सकते हैं , आप सब प्रसन्न मन से प्रस्थान कीजिये ।

देवताओं के जाने के बाद शिव जी ने सप्तर्षियों से काली के प्रेम और समर्पण की परीक्षा लेने को कहा, जिन्होंने उमा के आगे आ कर शिव जी के अवगुणों की बातें  कहीं। भवानी ने तनिक भी विचलित हुए बिना अपनी तपस्या जारी राखी ।

फिर शिव जी खुद वृद्ध ब्राह्मण वेश में उनके पास आये और माँ ने उनका आदर सत्कार किया । उन्होंने पूछा की हे सुन्दर राजकुमारी, आप यह किस उद्देश्य से इतना कठोर तप कर रही हैं । उमा के कारण बताने पर वे शिव जी की बड़ी भर्त्सना करने लगे और कहा की ऐसे वर से विवाह करने से तो अच्छा हो की तुम कुंवारी ही रहो । शिव जी की बुराई पर माता भवानी क्रोधित हो गयीं और ब्राह्मण को वहां से जाने का आदेश दिया, अपनी सखी से कहा कि इसे यहाँ से दूर रखो और चुप रखो  । जितना पाप श्री महादेव की बुराई करने में है, ऐसा ही पाप उसे सुनने में भी है । मैं लज्जित हूँ कि मैंने इस शिवद्रोही का स्वागत सत्कार किया, और यह कह कर शिवा वहां से जाने लगीं  । इस पर शिव अपने निज रूप में आये और शिव का सारा क्लेश जाता रहा  । शिव जी ने कहा कि हे देवी, आपसे हम अति प्रसन्न हैं, और आपसे असीमित प्रेम भी करते हैं । आपके बिना अब हम भी नहीं रहना चाहते। आपको जो चाहिए है, मांग लीजिये । तब गिरिजा ने उनसे पिता हिमवान से अपना हाथ मांगने को कहा ।

शिव जी बोले , की मांगने में समर्थ पुरुष का तेज घट जाता है । जैसे ही "देहि" (मांगने के लिए संस्कृत शब्द - दो / दीजिये) शब्द मुंह से निकले, पुरुष भिक्षुक की तरह हीन हो जाता है  । किन्तु माता भवानी ने कहा कि पिता से पुत्री को स्त्री रूप में मांगना पुरुष का अपनी स्व प्रकृति को प्राप्त करने का कर्म है, और शास्त्र सम्मत है ।  तब शिव उन्हें पिता के घर प्रसन्न मन से लौट जाने को कह कर चले गए और गिरिजा प्रसन्नचित्त से घर आ गयीं ।

शिव नट रूप में डमरू लेकर हिमवान के घर आये और अत्यंत दिव्य नृत्य किया । अति प्रसन्न होकर राजा रानी ने उन्हें जो चाहें लेने को कहा, तो उन्होंने देवी काली का नाम लिया । राजा रानी नट की उद्दंडता पर अति क्रोधित हुए और सैनिकों से उसे बाहर निकालने को कहा, किन्तु उनके दिव्य तेज से कोई भी उनके सम्मुख न पहुँच सका  । नटराज ने फिर उमा का हाथ स्वयं को सौंपने को कहा, किन्तु मैना और हिमवान के न करने पर वे वहां से अंतर्ध्यान हो गए ।

फिर गिरिजेश वैष्णव ब्राह्मण रूप में हिमवान के घर गए और शिव जी की इतनी तीव्र निंदा की कि मैना और हिमवान ने कहा कि हम अपनी बेटी को कुंवारी भले ही रखेंगे, किन्तु ऐसे वर को उसे न सौंपेंगे । बाद में शंकर जी की प्रेरणा से सप्तर्षि वहां गए और हिमवान को मनाया । मैना देवी फिर भी न मानें, तो उन्हें अरुंधती जी ने समझाया (अरुंधती जी ब्रह्मा पुत्री संध्या हैं, जो कामदेव के साथ ही ब्रह्मा के ह्रदय में से उत्पन्न हुईं थीं  । ब्रह्मा की अनुमति पा कर कामदेव ने बाण संधान किया, जिससे सभा में उपस्थित सभी देवों की दृष्टि काम्पूर्ण हो उठी और संध्या पर सकाम दृष्टि पडी । इससे संध्या का मन व्यथित हुआ और वे पित्राज्ञा से श्री वशिष्ठ जी से मन्त्र ले कर तपस्या को चली गयीं । संध्या को सूर्य ने प्रातः और सायं संध्या में विभक्त किया था । बाद में वे तपस्या करने वे चंद्रभाग पर्वत पर चली गयीं, जहां से चंद्रभागा नदी उत्पन्न हुईं । अगले जन्म में वे ऋषि मेधातिथि की पुत्री अरुंधती हुईं, और उनका ब्याह वशिष्ठ जी से हुआ )

बरात आई तो शिव जी ने मैना जी के अहंकार को नष्ट करने के लिए इतना भयंकर वेश धारण किया कि मैना उन्हें देख कर बेहोश हो गयीं  । चेतना लौटने पर बेटी से कहा कि ऐसे कुलक्षणी अशुभ से मैं तुम्हे नहीं बांधूंगी ।
वे अपनी बेटी उमा, नारद, सप्तर्षियों, सबको अपशब्द कहने लगीं की धिक्कार है कि मेरी कोमलांगी पुत्री को ऐसे अमंगल दूल्हा चुना गया । उसी समय मेरा गर्भ नष्ट हो जाता तो भला होता । मैं उमा को अपने हाथों से विष दे दूँगी परन्तु इस से उसे न ब्याहूंगी । नारद ने उन्हें समझाया की शिव रूप सर्व शुभ है , यह रूप तो उन्होंने कौतुकवश धारण किया है । किन्तु वे न मानीं और नारद को कहा कि तुम दुष्टों और अधर्मियों के शिरोमणि हो कि तुमने हमारी बेटी का जीवन खराब कर दिया । देवताओं और सप्तर्षियों के समझाने पर भी मैना अपनी बात पर अड़ी रहीं । हिमवान स्वयं भी समझाने गए तो मैना ने कहा की वे सहर्ष बेटी को गले में रस्सी बाँध कर पर्वत से लटका दें , किन्तु वे उसका ब्याह शिव से न होने देंगी ।

अब पार्वती ने कहा कि "हे माते, तुम्हारी वाणी और बुद्धि तो सदैव मंगलकारी हुआ करती थी । आज यह धर्म का अवलंब न कर भटक गयी है । हे माँ, रूद्र सर्वोत्पत्ति के कारण और साक्षात इश्वर हैं । मनोहारी रूप धारी, कल्याणकारी महेश्वर परमेश्वर हैं । विष्णु ब्रह्मा द्वारा सेवित हैं और देवता गण इनकी आराधना करते हैं । ये निर्विकार, अविनाशी और सनातन हैं । शिव जी के ही कारण आज आपके द्वार पर ब्रह्मा विष्णु और समस्त देवगण और ऋषि मुनि जन पधारे हैं । मैं मन वचन कर्म से उन्हें पति मान चुकी हूँ, और आप मेरा विवाह न भी करेंगे, तो भी मैं आजीवन उनकी ही पत्नी बन कर कुंवारी रहूंगी " पुत्री की इन बातों से मैना देवी अति क्रोधित हुईं और उसे (निर्लज्जता के लिए ) डांटने लगीं । विष्णु जी भी मैना के पास आये और उन्हें समझाया , कि पितरों की कन्या और शैलप्रिया होने से उम्का सम्बन्ध ब्रह्मा जी के कुल से है । विष्णु जी के समझाने से मैना का आवेश कम तो हुआ, किन्तु उन्होंने जिद न छोड़ी । किन्तु जब शिव जी ने अपनी माया हटाई, तो मैना ने उन्हें उत्तम स्वीकार किया और नारायण से प्रार्थन की कि शिव जी से निज रूप में आने को कहें । तब शिव अपने स्वरुप में आये और उस रूप में अति सुन्दर प्रकट हुए  । मैना ने अपने व्यवहार पर क्षमा मांगी और फिर शिव और शिव का विवाह संपन्न हुआ ।

नव दंपत्ति के दर्शनों को सोलह श्री नारियां आयीं : सरस्वती, लक्ष्मी सावित्री, गंगा, अदिति, लोपामुद्रा, अरुंधती, अहल्या, तुलसी, स्वाहा, रोहिणी, पृथ्वी, शतरूपा, संज्ञा और रति । फिर और भी अनेक दिव्य देवपत्नियाँ, नाग कन्याएं, मुनि कन्याएं आदि वहां आईं   । रति ने कामदेव की भस्म को शिव के आगे किया और विवाह के शुभ अवसर पर अपने पति को पुनर्जीवित करने को कहा, और बहुत रोने लगीं । उनके रोने से अन्य देवपत्नियाँ भी रोने लगीं और प्रभु की दयादृष्टि पड़ते ही भस्म से कामदेव अपने पूर्व रूप में आ अगये और रतिकाम ने शिव शिव की मधुर स्तुतियाँ की । विदाई के समय माँ ने पुत्री को पतिव्रता नारी के धर्म समझाए । फिर गिरिजकुमारी अपने पति के साथ हिमवान के देश से विदा हो गयीं ।

शिव पार्वती सुत कार्तिकेय जन्म की गाथा 
शम्भु शक्ति सुत  श्री गणेश गाथा 


शिवरात्रि की शुभकामनाएं