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मंगलवार, 4 अप्रैल 2017

पूर्वाग्रह ३ : सीखना

इस शृंखला के पुराने भाग  देखें  :-
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पिछले दो भागों में हमने पढ़ा कि:

भाग १ -  पूर्वाग्रह का अर्थ है किसी वस्तु / व्यक्ति को देखने या जानने से पूर्व ही उसके बारे में एक धारणा बना लेना । यह पूर्वाग्रह भाषा ज्ञान से भी आता है, हमारे निजी अनुभव से भी बनता है । पूर्वाग्रह के बारे में अक्सर हमारे मन में एक पूर्वाग्रह है कि यह कोई "निंदनीय" चीज़ है, पूर्वाग्रह रखना कोई बुरी बात है । किन्तु यहाँ - इस शृंखला में मैं यह चाहूंगी कि आप इसके प्रति यह पूर्वाग्रह न रखें । यह हमारे पहचान और निर्णय की प्रक्रिया का एक भाग है । हमारे nervous system से ही प्रेरणा लेकर आजकल artificial intellegence के लिए सिस्टम्स बनाये जा रहे हैं - जो artificial neurons का उपयोग करते हैं । इन artificial electronic neurons को भी inputs और पूर्वाग्रह का उपयोग उसी प्रकार करना होता है जैसे हमारे मस्तिष्क की प्रक्रियाओं में होता है । मैंने दो तीन उदाहरण लिए पूर्वाग्रह के - जैसे, ....आम = मीठा पीला फल, .....हिंदी फिल्मों में " माँ " , .... सूर्य, ....चोट, ....दोस्त अदि ।

भाग २ - पूर्वाग्रह का पहचान और निर्णय की प्रक्रिया में क्या योगदान है । जैसे - यदि मैं मई के महीने में फल के बाज़ार में गयी और मुझे दूर से पीले फलों का ठेला दिखा - तो मैंने मान लिया कि यह आम हैं । यह तो पास जा कर ही जान पाऊंगी कि हैं , या नहीं हैं । तो मुझे एक तो यह पहचान करनी है कि यह फल आम है या नहीं, और दूसरा यह image मेरे मन में बने कि यह फल मुझे ख़ुशी की अनुभूति देगा (यदि मुझे आम पसंद हैं तो ) या नहीं (नापसंद हैं तो ) । निर्णय के दो आधार हैं - अभी क्या इनपुट आया और पहले से उस चीज़ के बारे में मेरा अनुभव कैसा रहा । neuron कैसे decide करे ? 
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यह दो चित्र आगे के लेख को समझने में सहायक होंगे - इन्हें याद रखने की आवश्यकता नहीं है - सिर्फ रेफेर करने में काम आयेंगे ।

हमारे शरीर के neuron  का एक उदाहरण यह है ।
natural neuron 


यह जो दोनों और, ऊपर और नीचे टहनियां और जडें सी दीखती हैं - ये हजारों की संख्या में हैं । ये synapse कहलाती हैं और neurons को एक दूसरे से जोडती हैं, और उनमे आपस में संकेत भेजने का भी काम करती हैं । जब जब भी दो neuron आपस में "बात" करते हैं - तो उनके बीच का सम्बन्ध और सुदृढ़ हो जाता है। जो बारम्बार बात करते हैं, उनके सम्बन्ध उतने अधिक प्रगाढ़ होते चले जाते हैं । 

इसके विरुद्ध, जो connection use  नहीं होता, वह कमज़ोर होता जाता है । हर एक neuron दुसरे हज़ारों neurons से इनपुट भी लेता है, और हजारों को output भी देता है । ( आपको शायद आश्चर्य होगा - किन्तु आज इलेक्ट्रोनिक / इंस्ट्रुमेंटेशन इंजिनियर / डॉक्टर हमारी जीभ के neurons - जो हम स्वाद के अनुभव के लिए use करते हैं - उन्हें नेत्रहीन लोगों के देखने के लिए प्रयुक्त करने का प्रयास कर रहे हैं - और कुछ हलकी सफलताएं मिलने भी लगी हैं । 

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artificial neuron कुछ ऐसा होता है - (यह natural वाले से बहुत ही कमतर है - किन्तु basic working को copy करता है ।)
Artificial  Neuron 

१.ये जो inputs दीख रहे हैं - ये असल inputs हैं । 
२.इस एक नयूरोन का सिर्फ एक ही output है ।
३.हर इनपुट को कितना महत्व (वजन, weight ) दिया जाएगा - यह बात न्यूरोन हर उदाहरण से सीखता है ।
४.यह सीखना अब तक के अनुभव की आधार पर होता है - यह वजन अनुभव के साथ बदलता है ।
५.जो इनपुट इस neuron के output के साथ में सकारात्मक रूप से काम करें - उन inputs का इस neuron में + महत्व बढ़ता जाता है, (+१ तक) , और जो इस output के साथ न हों / विरुद्ध हों, उनका घटता जाता है या - में बढ़ता है ( - १ तक)।
६.ये सारी चीज़ें (असर) जोड़ी जाती हैं ।
७.activation function का काम है इस जोड़ को (जो एक से अधिक हो सकता है - +-१ तक लिमिट करना। (अर्थात हाँ या ना में उत्तर बनाना )

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अब चलते हैं सीखने की प्रक्रिया की ओर - कि हर प्रविष्टि का वजन कैसे निर्धारित होता है और हर बार bias के वजन पर क्या असर होता है | 
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एक रोज़मर्रा का उदहारण लेते हैं : सोचिये की यह न्यूरोन एक नन्हा १० - ११ माह का बच्चा है जो घुटने चलता है । उसे कई तरह के अनुभव होते हैं - और अलग अलग स्थितयों के अनुसार सोचिये की उसे "हाँ" या "न" में चुनाव करना सीखना है ।
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एक बच्चे की सीखने की और निर्णय लेने की प्रक्रिया :
१. पहला इनपुट है - गर्म कूकर
२. दूसरा इनपुट है एक बजने वाला खिलौना
३. तीसरा इनपुट - पिता की थाली में परोसा हुआ अचार
..
..
bias (पूर्वाग्रह) बन रहा है इस बारे में कि माँ की बात in general माननी चाहिए, या नहीं माननी चाहिए ।


इनमे से हर एक इनपुट को एक के बाद एक लेते और समझते हैं । हम में से अधिकतर लोगों को ये experience हुए ही हैं - तो समझना आसान होगा ।
इसे पढने से पहले गुणा करने का एक मूलभूत सिद्धांत (जो हम सब जानते ही हैं ) ध्यान में ले आयें ---
        क    (+1).(+1) = +1  दो + संख्या / या दो - संख्या - अर्थात एक सी
        ख   (-1).(-1) = +1     संख्याएं आपस में गुणा हों तो उत्तर + होगा
       ---------------
        ग    (-1).(+1) = -1  अर्थात दो उलट प्रकार की संख्याएं (एक + दूसरी -)
        घ    (+1).(-1) = -1   गुणा हों तो उत्तर - होगा
       ---------------
       अर्थात - नकारात्मक और सकारात्मक (उलट स्वभाव की))संख्याएं आपस में गुणा की जायें तो परिणाम नकारात्मक होता है, और एक ही तरह की संख्याएं गुणा की जाएँ तो सकारात्मक ।
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१.
किचन में गर्म कुकर है - जिसे छूने बच्चे बार बार आगे जाते हैं । माँ मना करती है - बेटा मत छू - हाथ जलेगा। माँ सामने हो तो बच्चे अक्सर मान भी जाते हैं, परन्तु उनमे वह उत्सुकता बनी रहती है - कि छूना है । फिर किसी दिन माँ की नज़र न हो - तो छूते ही हैं - और हाथ में जलन के दर्द का अनुभव उन्हें तुरंत हाथ खींचने पर मजबूर करता है - रोने पर भी । कुछ देर बाद - हाथ धुलने से / दवा देने से राहत हो जाती है । कुछ दिन बच्चे को वह दर्द याद रहता है - और वह कुकर नहीं छूता । फिर यह repeat होता है - शायद अबकी बार किसी गर्म कढाई / गर्म दूध की भगोनी आदि के साथ । तो अनुभव पक्का होता जाता है, याददाश्त प्रगाढ़ होती जाती है ।

अब बच्चे ने दो तरह की बात सीखी - 
         (क) एक यह की किचन में गर्म चीज़ें जो प्लेटफोर्म पर / चूल्हे पर रखी हैं - उन्हें छूना दर्द देता है - तो उन्हें  नहीं छूना है । तो उस input के लिए वजन negative बन गया । 
         (ख) माँ जो कह रही थी - वह मेरे लिए सही था - तो माँ की बात मानने में भलाई है - नकारात्मकता (माँ ने मना किया था ) और नकारात्मकता (दर्द हुआ ) के गुणा होने से सकारात्मक परिणाम  (bias या माँ की बात का वजन बढ़ गया)
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(२)
दूसरा इनपुट एक बजता हुआ खिलौना है - माँ बच्चे को हंस हंस कर उससे खेलने को दे रही है । बच्चा उसे लेता है - खेलता है - और एन्जॉय करता है - फिर से दो बातें हिया हैं ।
       (क) खिलौने (input ) का वजन positive हो गया । 
       (ख) माँ की बात (bias ) का वजन भी बढ़ा - इस बार सकारात्मक (माँ ने खेलने दिया था) और सकारात्मक (मजा आया खेलने में )  के गुणा होने से + result आया है । 
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(३)
पिता की थाली में चटनी / अचार है - जबकि बच्चे को सिर्फ मीठी / फीकी /  हलकी नमकीन चीज़ें ही मिली हैं । बच्चे के ललचाने पर माँ कहती है - थोडा बड़ा हो जा - फिर मिलेगा । अभी मुह जलेगा । परन्तु बच्चा जिद करता है । फिर थोडा सा अचार चटाना ही पड़ा माता पिता को । उसे मिर्च लगी । अगली बार वह नहीं खाना चाहेगा (कुछ दिन तक ) । फिर से दो बातें हुईं 
         (क) तीखा अचार मुंह में जलन देता है - तो नहीं खाना है - neagtive वजन ।
         (ख) माँ की बात मान लेता तो तकलीफ न होती - bias का वजन फिर बढ़ा ।
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अब - इनमे से हर एक इनपुट - हर experience (अनुभव ) के बाद अपने ही वजन को प्रभावित कर रहा है - उसे + या - दिशा में बढ़ा रहा है । किस दिशा में - यह इस पर निर्भर है की अनुभव सुखदायी था या दुखदायी ।

इसके अलावा - इनमे से हर एक इनपुट के लिए माँ (bias ) ने जो कहा - यदि अनुभव उसके अनुरूप रहा - तो  bias का वजन बढ़ता चला जायेगा । यदि माँ ने न कहा था - और अनुभव कटु हुआ - तो बच्चा सीखेगा की माँ की बात न मानने में मेरा नुकसान है (नकरात्मक और नकरात्मक = सकारात्मक )। इसके ठीक उलट - यदि माँ ने हाँ कहा था और अनुभव मीठा रहा - तो बच्चे यह सीखते हैं की अरे वाह - माँ की बात मानने में बड़ा फायदा है (सकारात्मक और सकारात्मक = सकारात्मक )। इन दोनों ही रूप में bias का वजन + की दिशा में बढ़ता है । 
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इस सीखे हुए अनुभव का उपयोग कैसे होगा? एक समय में अक्सर एक ही इनपुट होगा, या तो गर्म कुकर है, या फिर बजने वाला बाजा । तो एक input =+१ है, बाकी के इनपुट शून्य हैं । तो जोड़ जो बनेगा - वह उस एक ही इनपुट के असर से बनेगा । और उसी के हिसाब से परिणाम या तो +१ आएगा (अर्थात हाँ ) या फिर -१ आएगा (अर्थात ना )।

अगले भाग में हम यह देखने का प्रयास करेंगे की यह bias या इनपुट के वजन जो हमने इंसानी दिमाग में देखे समझे - ये artificial neuron में कैसे घटाए और बढाए जाते हैं ।

जारी ........

पूर्वाग्रह २ : पहचान और निर्णय

पूर्वाग्रह भाग १ देखें 

पिछले भाग में मैंने (लेख और टिप्पणियों के discussion में) कहने की कोशिश की - कि 

१. शब्द जो छवि बनाते हैं हमारे मन मस्तिष्क में - उसमे से कुछ भाषाज्ञान है, और कुछ पूर्वाग्रह | 

२, आम - फल है | किन्तु - कैसा है ? यह हर वह व्यक्ति बता सकता है - जिसने आम खाया है (समझाना तो मेरे बस का नहीं है) यह भाषाज्ञान है |


३.  मैंने यह भी कहा ( पोस्ट में भी और टिप्पणियों में भी ) कि यह पोस्ट मैं सिर्फ हमारी (मनुष्यों की) मानसिक प्रक्रियाओं पर concentrate कर के नहीं लिख रही हूँ, बल्कि ये मानसिक प्रक्रियाएं सिर्फ एक background हैं - आगे मैं natural neurons , artificial neurons और artificial neural networks पर बात करने वाली हूँ | 
अब - आगे ....
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पहली बात तो यह कि आम पीला है - यह हमारी सोच प्रक्रिया में बना हुआ एक पूर्वाग्रह है | कृपया यह न सोचें कि मैं पूर्वाग्रह की निंदा कर रही हूँ - नहीं तो आगे जो बातें होनी हैं - वे इस निंदा की image [ पूर्वाग्रह में प्रति पूर्वाग्रह ? ... :) ] की ही वजह से निरर्थक हो जायेंगी | इस पोस्ट के सन्दर्भों में पूर्वाग्रह निंदनीय नहीं है - यह अक्सर सहायक है सही पहचान के लिए | यदि यह अड़चन बनने लगता है - तो धीरे धीरे यह ( हमारी मानसिक प्रक्रियाओं के द्वारा ) बदल भी जाता है | हर आम तो पीला नहीं होता ( दसहरी , लंगड़ा हरे आम हैं ) - फिर भी यह बात तो है ही कि आम सुन कर पीला फल ही मन में उभरता है | इससे उलट - यदि गर्मियों के मौसम में दूर से फल का ठेला दिखे - तो यदि उस पर पीले फल दिख रहे हों - तो आम ही लगते हैं |  

यह ऊपर - दो अलग बातें है - 

(अ) आम पीले होते हैं - यह छवि - "cognition " कहलाती है हमारी इलेक्ट्रोनिक की इमेज प्रोसेसिंग की भाषा में | 
(ब) ठेले पर जब दूर से पीले फल दिख रहे हों - तो वह आम का ठेला है - यह "recognition " कहलाता है | 

जब cognition होता है - तब हम मशीन को सिखाते हैं कि किस वस्तु (label) के साथ क्या properties associate की जाएँ | इसी तरह - छोटे बच्चे को हम सिखाते हैं - अ- अनार का ; आ - आम का - और उस पुस्तक में अनार और आम की छवि होती है | लेकिन न हम उसे अनार सिखा रहे थे, न आम, हम तो उसे सिखा रहे थे कि यह जो अक्षर लिखा है किताब में - इसे बोला किस तरह से जाता है | इसके उलट - यह जो हम बोल रहे हैं "अ", "आ" इसे लिखा कैसे जाए |


अब समझें - दो प्रकार के factors हैं, जो हमारे निर्णय को प्रभावित करते हैं (उदाहरण के लिए - यह चीज़ / व्यक्ति मुझे पसंद आएगा / नापसंद / या न्यूट्रल ? ) ............ अब जैसे - किसी को आम पसंद है / किसी को नहीं | तो उसी एक फल को देख कर पहली बात तो यह कि - कोई पहचानेगा कि यह आम है, कोई नहीं पहचानेगा | ............ इसके आगे - किसी के मन में पसंद की भावना होगी - किसी के मन में नापसंदगी की | 


अ) एक - तत्काल अभी उस से क्या input आ रहा है ? (जो सामने फल है - यह आम है या नहीं इसे पहचानने के लिए उसका रंग, रूप. आदि )
बी) और दूसरा - लॉन्ग टर्म में मैंने उसके बारे में क्या जाना है | ( मीठा ? खट्टा ? रसीला ? नर्म ? सख्त ? )


तत्काल अभी आए inputs को weigh कर के जो असर होता है - वह एक sum बनाता है | इसमें पहले के अनुभव से आये bias को जोड़ा जात है | तब - इस मिले जोड़ के आधार पर - निश्चय लिया जाता है |

अब आगे बढ़ते हैं - neuron की ओर - कि वह कैसे decision लेता है कि किस वस्तु को किस category में रखा जाए | हमारे शरीर में एक nervous system है , जिसके हिस्से हैं nerves , spinal chord और brain | ये सब नयूरोंस पर बने हैं | ये नन्हे नयूरोंस करोड़ों की संख्या में हैं - और इनकी कई शाखाएं एक दुसरे से जुडी हैं | ये जुडी हुई शाखाएं एक से दुसरे को chemicals के exchange द्वारा सन्देश देती हैं | 


शरीर का एक प्राकृतिक neuron हमारे engineers द्वार बनाए artificial neuron से बहुत अधिक advanced है     


- किन्तु उसी को समझ कर और उसकी working को कॉपी कर के ही हम artificial neron और neural network बनाते हैं | इन नयूरोंस पर बात होगी अगले अंक में - कि  कैसे बनते और कार्य करते हैं | 


और एक ध्यान देने वाली बात है कि - जिस computer पर हम अभी बैठे हैं , वह हमारे nervous system से बहुत पिछड़ा हुआ है | एक तो वह अपने आप कुछ सोच नहीं पाता - उसे हर काम करना सिखाना पड़ता है | दूसरे - वह intellegent  नहीं है | यदि उसे (कंप्यूटर को) हम neural network दें भी - तब भी अभी बहुत दूर है वह दिन जब इसकी intellegence एक चमगादड़ की intellegence से भी मुकाबला कर सके, मानव दिमाग तो और दूर है अभी |


 अब सोचिये - बटन भर के दिमाग से चमगादड़ - ultrasound sonar से अपने आसपास की चीज़ें न सिर्फ दूरी और दिशा के लिए sense कर लेगा, बल्कि उसका आकर भी जान लेगा | यह भी decide कर लेगा कि यह चीज़ मुझसे कितनी बड़ी / छोटी है - अर्थात यह decision कि इस पर झपट्टा मार कर इसे खाना है - या इससे बच कर भागना है :) | यही करने में हमारे highly modern sonars को उस बटन भर के दिमाग वाले प्राणी से हज़ारों गुना समय लग जाता है |


तो क्या artificial neuron slow हैं ???
 नहीं
ये हमारे दिमाग से तेज़ हैं, हमारे दिमाग के neurons की typical स्पीड मिली सेकण्ड में है जबकि आपके कंप्यूटर kee nanosecond में | 
फिर ??


फर्क है - energy  efficiency में | जहां दिमाग के natural neurons बहुत कम गर्म होते हैं (ऊर्जा का waste ) तो दिमाग में कई neuron एक साथ काम कर सकते हैं, वहीँ हमारे कंप्यूटर का जो दिमाग है - वह processor chip है तो तेज़, किन्तु energy efficiency कम है - तो कम parallel काम हो सकते हैं, यह गर्म हो जायेगी | शायद आप जानते ही हैं कि pentium chip - mounted पंखे के साथ ही आती है - उसे ठंडा रखने के लिए | :) | [
 जब हम लोग lab में कोई experiment करते हैं - तो breadboard पर circuit बनाते हैं - जिसमे IC chips लगी होती हैं | कभी गलती से कोई IC छू जाए - तो हाथ वैसे ही जलता है जैसे रोटी बनाते हुए तवा छू जाने से :) ]
........... लेकिन हमारा दिमाग आखिरी बार कब गर्म महसूस हुआ था ?? जब हम अपने पिछले exam की तैयारी में जुटे हुए १ महीने की पढ़ाई १ घंटे में करने का प्रयास कर रहे थे ? :) तो - अधिक न्यूरोन काम कर रहे थे न तब ? वह भी हल्का गर्म, तवे जैसा नहीं - क्योंकि हमारे रक्त का बहाव coolant  का काम करता है - तो उतनी heating dissipate हो जाती है | यही फर्क है हमारे दिमाग और processor के दिमाग में लगे नयूरोंस की efficiency में - कि वे उतना काम एक साथ नहीं कर सकते जितना हम | 


आगे अगले भाग में ..................

पूर्वाग्रह 1 - पूर्वाग्रह क्या होता है ?

यह श्रंखला आगे बढाने का सोच रही हूँ ( आशा है इस बार अधूरी न छोड़ दूँगी ) तो पुराने (पहले) भाग को आज  repost कर रही हूँ :

पूर्वाग्रह ?
इस शब्द को सुन कर पहले पहल क्या भाव आता है मन में ?


यह जो भी भावना आपके मन में आई , इस शब्द से जो भी अच्छी या बुरी छवि मन में उभरी - वह आपके मन का पूर्वाग्रह है - इस शब्द की परिभाषा को लेकर | यदि आपके मन में यह आया कि "पूर्वाग्रह का शाब्दिक अर्थ है - पूर्व + आग्रह = किसी चीज़ को देखे / समझे / तौले / जाने बिना उसके बारे में पहले ही से कोई धारणा (अच्छी या बुरी) कायम कर लेना " तो आप "पूर्वाग्रह" से रहित होकर इस शब्द को परिभाषित कर रहे हैं | :)


कुछ प्रचलित सर्व ज्ञात हिंदी शब्द :
१. आम ?? ..............= फल, मीठा, पीला, रसीला .....
२. सूर्य ??........... = रौशनी, गर्मी, दिन, जीवनस्त्रोत, ....
३. चोट लगना ?? ........... = दर्द, तकलीफ, एक्सीडेंट, .....
४. दोस्त ??......... = ख़ुशी, बांटना , साथ, अपनापन, .....

आदि कई उदहारण हैं, जहां एक शब्द पढ़ / सुन कर हमारे मन में  कोई छवि उभर आती है | क्या यह सब छवियाँ पूर्वाग्रह हैं ? शायद हाँ, शायद नहीं | 


आम - यदि हमने देखा है, खाया है, और हम हिंदी जानते हैं ( कि आम किसे कहते हैं ) | यदि हमने इसे देखा / खाया न हो, या हम सिर्फ फ्रेंच भाषा जानते हों - तो ? क्या तब भी यह शब्द यही छवि बनाएगा ? नहीं | इसका अर्थ यह लगता है की यह जो पूर्वाग्रह (?) है हमारा कि आम एक रसीला, मीठा, पीला फल है - पहली बात तो हर बार, हर आम के लिए सही नहीं है. दूसरे, यह पूर्वाग्रह भी कोई पूर्वाग्रह नहीं है, बल्कि हमारे पुराने अनुभव के आधार पर ही बना है | लेकिन हर आम तो पीला नहीं होता न ? (लंगड़ा आम? दसहरी आम? ) न ही हर आम मीठा / रसीला ही होता है | फिर भी इस शब्द से यह छवि क्यों उभरती है पहले पहल ? यह परिभाषा कैसे बनी ? यह कैसे बदल सकती है ?


एक और उदाहरण लेती हूँ - हिंदी फिल्मों से | ५० या ६० के दशक की फिल्मों में "माँ " शब्द क्या छवि बनाता था ? शायद एक पुरानी साडी में लिपटी हुई प्रेम की मूर्ती की ? जो अपनी सारी निजी ज़रूरतों और भावनाओं को परे कर सिर्फ बेटों (बेटियों जानते बूझते नहीं लिखा है ) के लिए जीती थी | फिर आज की फिल्मों की माँ ? वह इतनी त्यागिनी नहीं दिखाई जाते | दिखाई भी जाये -तो शायद एक्सेप्ट भी न हो | न ही उसे हमेशा साडी में दिखाया जाता है | टीवी के एडवरटाइज्मेंट्स / सीरिअल्स में भी देखें, तो २० साल पहले की माँ और अज के माँ में ज़मीन आसमान का फर्क है | यही फर्क बहू में भी है, नायक और नायिका में भी | 


तो क्या हम इस माँ, बहु, नायक, नायिका को एक्सेप्ट नहीं करते ? या उस समय वालों को ? एक जनरेशन के लिए जो नेचरल है, दूसरी के लिए नाटकीय क्यों है ? क्या यह सब पूर्वाग्रह का खेल है ? 


यही  बात बाकी के उदाहरणों पर भी लागू होती है - न हर शब्द का अर्थ हर बार, हर सन्दर्भ में वह होता है जो हम आमतौर पर स्वीकार करते हैं, न हर बार उससे विपरीत | इसी पूर्वाग्रह पर मैं इस शृंखला में चर्चा करूंगी।  इसके आगे फिर हमारे मानसिक पूर्वाग्रहों से आगे बात करेंगे की इलेक्ट्रोनिक्स में bias के क्या अर्थ हैं, fixed और varying bias क्या होते हैं | और neural networks में किस तरह से हमारे मानसिक पूर्वाग्रहों और decision Making के आधारों को प्रयुक्त कर के artificial intellegence बनाई जाती है - कैसे मशीन को सिखाया जाता है की वह भी हमारी ही तरह अलग अलग inputs के आधार पर निर्णय ले पाए कि किस स्थिति में क्या किया जाये | यह भी कि "पूर्वाग्रह" करना कैसे सीखती है मशीन |


आशा है इस शृंखला में आप मेरे साथ होंगे | 

मंगलवार, 16 अप्रैल 2013

सौर मंडल ४: मार्स / मंगल ग्रह


धरती से अगली कक्षा में हैं (चौथा ग्रह ) मार्स / मंगल ग्रह ।

यह धरती से मिलता जुलता है । कई अवधारणायें कहती हैं कीस पर जीवन था लेकिन बाद में यह सूर्य से दूर चला गया जिसकी वजह से जीवन समाप्त हो गया । किन्तु कोई साक्ष्य नहीं हैं । धरती की ही तरह यहाँ रेगिस्तान ज्वालामुखी पहाड़, और ध्रुवीय हिमखंड हैं ।

यह लाल ग्रह भी कहलाता है क्योंकि इसके धरातल पर लोहे की बहुतायत से यह लाल रंग का प्रतीत होता है । वायुमंडल बहुत पतला है । इस पर सौर मंडल के सभी ग्रहों में सबसे ऊंचा पहाड़ ( ओलिम्पस मोंस) और गहरी खाई ( वेल्स मेरिनारिस) हैं । उत्तरी अर्धांश में ४% हिस्सा समतल बोर्लेअस बेसिन में है - जो की किसी इम्पेक्ट से बना माना जाता है ।

इसके दो उपग्रह हैं :  फोबोस और दीमोस - जो दोनों ही गोलाकार न होकर इर्रेगुलर आकार के हैं । कुछ वैज्ञानिकों का मानना है कि ये क्षुद्र ग्रह थे जिन्हें मार्स ने अपने गुरुत्वाकर्षण से बाँध कर अपना उपग्रह बना लिया ।

ध्रुवीय प्रदेशों से आती रौशनी के बदलाव और रेखाओं के कारण पहले माना जाता था कि मार्स पर तरल पानी है और ये रेखाएं नदियाँ या सिंचाई की नहरें हैं । लेकिन मरिनर ४ की छवियों से ज्ञात हुआ की ये तापमान के बदलावों के चलते बने दृष्टिभ्रम भर हैं । लेकिन प्रोब्स ने यहाँ पानी के कण और अवशेष पाए हैं और आज माना जाता है कि कभी यहाँ बड़ी मात्रा में जल खंड थे।

आज मानव के भेजे ३ उपग्रह मार्स के आस पास कक्षाओं में हैं और दो सतह पर ।

नाम : मार्स / मंगल ग्रह
रेडियस (त्रिज्या ) : 3396.2 km
मास (द्रव्यमान ):   6.4185x10^23kg
वोल्यूम (आयतन):   1.6318 x 10^11 km^3
डेंसिटी (घनत्व):   3.9335 g/cm^3
ग्रेविटी (गुरुत्वाकर्षण ): 0.38 g
तापमान :  210 K
एक दिन (अपनी धुरी पर घूमने का समय) : 1.02 earth days
एक वर्ष (सूर्य का एक चक्कर पूरा करने का समय) : 686.98 earth days

कक्षा (orbit ) का सेमी मेजर एक्सिस (बड़ा अक्ष) : 1.52 AU
उपग्रह : 2 ( आगे देखिये )

वायुमंडल का कोम्पोजीशन (संरचना ):
     95.32% कार्बोन डाय ऑक्साइड
     2.7% नाइट्रोजन
      1.6% आर्गन
     0.13% ऑक्सीजन
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उपग्रह १ : फोबोस

त्रिज्या : 11   किमी
दिन: 0.31 धरती के दिन
वर्ष: 7.7
अक्ष : ९३७७  किमी
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उपग्रह २ :डीमोस :


त्रिज्या : 6.2 किमी
दिन: 1.26 धरती के दिन
वर्ष: 29.8
अक्ष : 23460  किमी


सोमवार, 15 अप्रैल 2013

सौर मंडल ३ : धरती , चन्द्रमा

सौर मंडल ३ : धरती

धरती - हमारी धरती ।

जैसा किहम सब जानते हैं, धरती सौर मंडल का तीसरा ग्रह है । प्रामाणिक जानकारी के अनुसार यही एकमात्र ग्रह है जहां जल तरल रूप में रह सकता है क्योंकि तापमान इसके लिए उपयुक्त है । वैसे कई वैज्ञानिक दावों और खोजों के अनुसार अन्य ग्रहों पर भी जल के दूसरे रूप है -  लेकिन तरल रूप में जल रहने योग्य तापमान सौर्य मंडल में और किसी ग्रह पर नहीं पाया जाता ।

माना जाता है कि धरती पर जीवन इसी तरल जल के कारण ही संभव हो पाया है ।

१. वैज्ञानिक विचारधारा कहती है कि जल और अन्य तत्वों के संयोजन से धरती पर जीवन प्रकट हुआ
और
२. धार्मिक विचारधारा कहती है कि पहले से जीवन था, लेकिन प्रकट न होकर सुशुप्त अवस्था में था । और वह जीवन सुशुप्त अवस्था में रहते हुए भी निर्जीव तत्त्वों को अपने प्राकट्य के लिए उपयुक्त रूप में आने को प्रेरित करता रहा , ढालता रहा । और इन्हें ढाल-ढाल कर इस जोड़ सामंजस्य तक ले आया कि , तत्त्व इस तरह के जोड़ बनाएं , जिसमे जीवन अपने लक्षण प्रकट कर सके ।

धरती पर atmosphere (वायुमंडल) , hydrosphere (जल मंडल) और lithosphere (ठोस धरामंडल) हैं । इन तीनों का जहां मिलन होता है - वह स्थिति जीवन के प्राकट्य (जन्म नहीं प्राकट्य) के लिए उपयुक्त होती है - इसे biosphere कहते हैं । ऐसी परिस्थितियों में जीवन जीवों के रूप में प्रकट होता है ।

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पृथ्वी / धरती :

नाम : पृथ्वी / धरती
रेडियस (त्रिज्या ) : 6371 km
मास (द्रव्यमान ):   5.97x10^24kg
वोल्यूम (आयतन):   1.08 x 10^12 km^3
डेंसिटी (घनत्व):   5.515 g/cm^3
ग्रेविटी (गुरुत्वाकर्षण ): 1 g
तापमान :  287 K
एक दिन (अपनी धुरी पर घूमने का समय) : 1 earth days
एक वर्ष (सूर्य का एक चक्कर पूरा करने का समय) : 365.25 earth days

कक्षा (orbit ) का सेमी मेजर एक्सिस (बड़ा अक्ष) : 1 AU
उपग्रह : 1 - चन्द्रमा
( आगे देखिये )

वायुमंडल का कोम्पोजीशन (संरचना ):
     78.08% नाइट्रोजन
     20.95% ऑक्सीजन
     1% भाप
     कम मात्राओं में कार्बन दे ऑक्साइड, आर्गन आदि
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धरती का उपग्रह : चन्द्रमा

नाम : चन्द्रमा  / मून / लूना
रेडियस (त्रिज्या ) :  1737.1 km
मास (द्रव्यमान ):   7.35x10^22kg
वोल्यूम (आयतन):   2.1958x10^10km^3
डेंसिटी (घनत्व):   3.3464g/cm^3
ग्रेविटी (गुरुत्वाकर्षण ):  0.16g
तापमान : 220 K
एक दिन (अपनी धुरी पर घूमने का समय) : 27.32 earth days
एक वर्ष (धरती का एक चक्कर पूरा करने का समय) : 27.32 earth days
    (देखिएगा : दिन और वर्ष की अवधि बराबर है )
कक्षा (orbit ) का सेमी मेजर एक्सिस (बड़ा अक्ष) :  384399 km

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शनिवार, 18 फ़रवरी 2012

रेलगाड़ी और सामान

एक रेलगाड़ी में एक सज्जन बैठे थे । वे अपना सारा सामान अपने सर पर रखे हुए थे - बड़े परेशान, थके हारे।परन्तु सामान नीचे रखने को तैयार ही नहीं थे । कई लोग उन्हें कह रहे थे कि सामान नीचे रख दें - पर वे सिर्फ बड़े दयाभाव से मुस्कुरा देते - परन्तु सामान नीचे न रखते । लोगों को लग रहा था की शायद सामान में कोई बेशकीमती चीज़ होगी जो ये नीचे रखने का खतरा मोल नहीं ले रहे ।

एक व्यक्ति ने उनसे कहा - "मैं तबसे देख रहा हूँ की आप सबके कहने से भी सामान नीचे नहीं रख रहे - सो मैं रखने को नहीं कहूँगा - परन्तु मैं यह जानना ज़रूर चाहता हूँ कि आप यह सामान उठाये क्यों बैठे हैं ?" इस पर उन ज्ञानी पुरुष का उत्तर था -

 "बेचारी रेलगाड़ी हम सब का और हम सब के सामान का बोझ उठाये हुए है - उसका भार कम करने के लिए मैं अपनी मदद दे रहा हूँ । कुछ सामान मैं भी उठा लूं ..... तो ट्रेन पर बोझ कम हो जाए "

.......उस व्यक्ति ने उन्हें समझाने का प्रयास किया कि - भले ही सामान आपने सर पर उठाया हो, फिर भी वह वजन ट्रेन पर तो है ही -क्योंकि आप स्वयं भी इसी ट्रेन में ही तो बैठे हैं । परन्तु उन सज्जन को बात समझ न आई । 

...............

ऐसे ही कई मित्र प्रकृति और ईश्वर की मदद करने के लिए मांसाहार ले रहे हैं -कि प्रकृति / ईश्वर इतनी बड़ी मानव जनसँख्या के लिए भोजन कैसे दे सकेगी ? उन्हें समझाने पर भी यह समझ ही नहीं आ पाता कि जो मांस खाया जायेगा, उन पशुओं / जीवों का शाकाहारी भोजन भी तो वही प्रकृति उपलब्ध करा रही है - तो क्यों वह मानवों के लिए समुचित शाकाहारी भोजन नहीं दे सकेगी ?

गुरुवार, 9 फ़रवरी 2012

खूब पर्दा है


पुनः प्रस्तुति
ब्लॉग की शुरुआत में यह लिखा था, एक बार फिर से प्रस्तुत है ,

खूब पर्दा है - कि चिलमन से लगे बैठे हैं
              साफ़ छुपते भी नहीं - नज़र आते भी नहीं .......

कभी कहीं पढ़ा था - तो ठीक से तो याद नहीं है कि क्या शब्द थे - पर अर्थ कुछ कुछ ऐसा ही निकल कर आता था. आजकल हमारी दोस्तियाँ भी इसी तरह हो गयी हैं - इन्टरनेट पर ही बातें शातें हुआ करती हैं - वह भी कोई टाइप करने की ज़हमत कभी कभार ही उठता है - ज्यादा तर तो मेल फॉरवर्ड ही करी जाती हैं .

एक परसन  को एक ग्रुप से मेल मिलती हैं - और वोही दूसरे दोस्तों को फॉरवर्ड कर दी जाती है - हाँ , इन्बोक्स में एक दूसरे के नाम बराबर दिखाई पड़ते रहते हैं - तो दूरी का एहसास नहीं होता - नज़र से आते रहते हैं - पर वह पुरानी  दोस्ती कहीं गुम सी हो जाती है - मन की बातों कि शेअरिंग तो अब जैसे होती ही नहीं - ..

ज़िन्दगी इतनी तेज़ दौडती है - कि कोई किसीसे बैठ कर बातें नहीं करता - वैसे इन्टरनेट की मेल सिस्टम में ऐसा कोई रूल तो है नहीं - कि आप अपने दोस्त को चिट्ठी नहीं लिख सकते. बल्कि , उसमे तो घर बैठ कर चैटिंग की भी चोईस है हमें - लेकिन हम अपनी ज़िन्दगी में इतने मसरूफ रहते हैं - कि टाइम ही नहीं है किसीको लम्बी चिट्ठी लिखने का - न ही बैठ कर बातें करने का . वही दोस्त जो पहले घंटो साथ गुज़ार देते हैं - यदि इंटर नेट पर दिख भी जाएँ कभी ऑनलाइन - तो एक छोटी सी हाई आपस में एक्स्चंज  करने के बाद - दोनों ही इंविसिबल  हो जाते हैं .. ....पहले लोग एक लाइन कि चिट्ठी तब लिखते थे जब कोई बुरा समाचार सुनाना हो - या कि किसी चीज़ की बधाइयाँ देनी हो - पर अब तो बातें ऐसे होती हैं -

"हाई - हाई , हाउ आर यू? और सुना - जीजाजी कैसे हैं? - बेटा ठीक  से पढ़ रहा है?  - - हाँ यार, सच में , आजकल पहले जैसी पढाई कहाँ !! -------- ओके - सी यू लेटर यार - बाय ///

और एक दूसरे के घर जा कर बैठ के बातें करने का चलन तो तब ही रुक गया था - जब टीवी आया था - अब तो हम पड़ोस के घर की खुशियों और तकलीफों से ज्यादा - टीवी के सीरिअलों के परिवारों के किरदारों के करीब महसूस करते हैं!! पड़ोस में कोई बीमार है  - तो हमें एक दिन एक बार मिलने जाने का टाइम निकालना मुश्किल होता है  - पर हाँ - टीवी सीरियल की हेरोइन अगर बीमार है  - तो हम पूरे पूरे हफ्ते उसके साथ रोज़ आधा घंटा गुज़र सकते हैं.... यह कहाँ आ गए हैं हम?

एक कहानी  याद आती  है यहाँ - एक मेल में ही पढ़ी थी - एक बच्चा अपनी माँ से पूछता है माँ , आपकी एक घंटे  की आमदनी कितनी है ? माँ ऑफिस  से थक कर आई है - काम निबटाने हैं - खाना पकाना है - फिर उसी बेटे का होमवर्क करवाना है -आखिर बच्चे के फ्यूचर के लिए भी तो माँए वरीड रहती हैं न !!!! तो माँ  काम के टेंशन में बच्चे के कणटिनयस क़्योएस्चन्स से चिढ कर उसे जोर से डांटती है - क्यों परेशान कर रहा है - दिखता नहीं - काम कर रही हूँ.. पर बच्चा नहीं मानता  - पूछता ही रहता है . आखिर  माँ कहती है - २००   रुपये. तब बच्चा कुछ परेशान सा हो जाता है - और चला जाता है वहां से .. तीन चार हफ्ते गुज़र जाते हैं - बच्चा फिर माँ के पास आता है - माँ फिर बिजी है - हमेशा के ही तरह - फिर चिढ जाती है.. तब बच्चा माँ को १०० रुपये देता है - उसके पास एक १०० का नोट भी नहीं - कभी कही कभी कही से बचाए - २ रुपये - पांच रुपये, दस रुपये , बीस रुपये के नोट हैं - कुल ९७ ही हो पाए हैं  - पर यदि १०० पूरे करने हों - तो एक हफ्ते और रुकना होगा - ...... तो बच्चा माँ को १०० रुपये दे कर कहता है - माँ - क्या अब आप आधा घंटा मेरे साथ बिता सकती हैं? ( बाकि ३ रुपये उधार  हैं ) तब   माँ को रीअलैज़ होता है - कि मैं अपने बच्चे का फ्यूचर बनाने में इतनी बिजी हूँ - कि उसका प्रेजेंट ख़राब हो रहा है - और मुझे पता तक नहीं चला -

तो शायद हम सबको सोचने के ज़रुरत है - कही हम भी - अनजाने ही सही - चिलमन से लगे तो नहीं बैठे - कि अपने अपनों को - साफ़ छुपते भी नहीं हों - और नज़र आते भी नहीं हो??

खैर , आज बस इतना ही .. ये तो कुछ ज्यादा ही लम्बी बात खिच गयी .. शायद सीरियल का टाइम  हो गया होगा - तो आप भी सीरियल देखें - मैं भी टीवी ऑन  करूँ - पर शायद - यदि किसी नेबर को ज़रुरत हो - या किसी पुराने दोस्त को,- या कि हमारे  बेटे / बेटी को कुछ  बात करनी हो - तो शायद टीवी सीरियल को छोड़ कर - उसके लिए वक़्त निकलना अच्छा हो.....

फिर मिलेंगे ...

शुक्रवार, 3 फ़रवरी 2012

दो तिनके

( पिछली पोस्ट की ही तरह - यह भी "आनंद" कथा ही है । इस बार approach अलग है । पिछली पोस्ट में कर्म योग था - इस बार - नहीं मैं नहीं कहती - आप बताइये पढ़ कर :) यह कहानी भी मेरी नहीं है - ओशो की सुनाई अनेक कहानियों में से एक है )

तो कहानी यूँ है की दो तिनके एक नदी में पड़ गए (जान बूझ कर ही "गिर" गए नहीं कहा है )। दोनों एक ही हवा के झोंके से उड़ कर एक ही साथ यहाँ आ पहुंचे थे - एक ही साथ थे - दोनों की परिस्थतियाँ बिलकुल समान थी। परन्तु दोनों की मानसिक स्थिति एक न थी । एक पानी में बहता था - सुख पूर्वक, तैरने का आनंद लेते हुए, आनंदित ... तो दूसरा - उसे किनारे पर पहुंचना था । बड़े प्रयास करता - पूरी ताकत लगाता - परन्तु नदी के शक्तिशाली बहाव के आगे बेचारे तिनके की ताकत ही क्या ? उसके सारे प्रयास व्यर्थ होते रहे - बहता तो वह उसी दिशा में रहा जिसमे नदी बहती थी - परन्तु, पहले तिनके की तरह सुखपूर्वक नहीं, बल्कि दुखी मन से । 

फिर कुछ आगे जाने पर नदी की धारा कुछ धीमी हुई , तो पहला तिनका दूसरे से बोला - आओ मित्र - अब प्रयास करने के लिए समय अनुकूल है, मिल कर कोशिश करें, किनारे पर घास उगी है - जो नदी के बहाव को रोक भी रही है, और कई लम्बे घास के blades तो नदी में काफी दूर तक उग आये हैं । थोडा प्रयास करने से हम इन मित्रों के सहयोग से अपनी दुनिया में पहुँच जायेंग ।

परन्तु दूसरा तिनका इतनी मेहनत कर चुका था - कि थक गया था - उससे अब आगे प्रयास न किया गया । परन्तु पहला तिनका अपने मित्र को मुसीबत में छोड़ कर किनारे न गया - उसके साथ अपने आप को उलझा कर थोड़ी शक्ति बढ़ी, फिर जोर लगाया - और किनारे से जुड़े हुए एक लम्बे घास को किसी तरह पकड़ लिया । फिर कुछ देर सुस्ताने के बाद दोनों उस जुड़े वाले के सहारे धीरे धारे सूखे किनारे पर पहुँच ही गए ।

पहला तिनका पुराने साथियों की मीठी यादों से खुश था, किनारे नए मित्रों के बीच प्रसन्न था । दूसरा तिनका अब भी अपने पुराने स्थान के साथी तिनकों से बिछड़ने के कारण उदास , डूबने की याद से परेशान, और भीगेपन से दुखी था ।

रविवार, 29 जनवरी 2012

आनंद

कहीं मंदिर बन रहा था । तीन श्रमिक धूप में बैठे पत्थर तोड़ने का काम कर रहे थे । एक राहगीर ने पहले मजदूर से पूछा -

"क्या कर रहे हो ?"
वह बड़े दुखी स्वर में बोला - "पत्थर तोड़ रहा हूँ ।" सच ही था - वह पत्थर ही तोड़ रहा था ।

दूसरे से पूछा - वह दुखी न था - उसने कहा - "आजीविका कमा रहा हूँ ।" वह बिलकुल संतुलित था - न दुखी, न सुखी । और सच ही था - वह आजीविका कमाने को ही तो श्रम कर रहा था ।

फिर तीसरे से पूछा  - वह आनंदित था - गीत गाते हुए पत्थर तोड़ रहा था । उसने अपना गीत बीच में रोक कर कहा - "मैं मंदिर बना रहा हूँ ।" आँखों में चमक थी, ह्रदय में गीत थे, और वाणी में शान्ति । निश्चित ही मंदिर गढ़ना कितना सौभाग्यपूर्ण है !! सृजन से बड़ा कौनसा आनंद है ?

जीवन के प्रति भी क्या यही तीन उत्तर हैं ? कोई पत्थर तोड़ रहा है, कोई आजीविका कमा रहा है, तो कोई मंदिर गढ़ रहा है । ............. धूप तो तीनों पर बराबर पड़ रही है - परन्तु आनंद सबके हिस्से नहीं आता । 

जीवन का आनंद जीने वाले की दृष्टी में होता है । वह भीतर है, बाहर से नहीं आता ।

शनिवार, 28 जनवरी 2012

सीखे हुए उत्तर

सीखे हुए उत्तर कभी काफी नहीं होते- क्योंकि प्रश्न हमेशा बदलते रहते हैं । इस दुनिया में अगर कोई चीज़ नित्य है - तो वह है बदलाव । इस सिलसिले में एक कहानी याद आती है -

दो मंदिर थे - और एक दूसरे से कही भी सहमत न होते थे ( अक्सर ऐसा ही होता देखा जाता है - सभी कहते हैं की परम सत्य एक है - किन्तु उसे ढूँढने वाले / जानने के दावे करने वाले - कभी भी एक दूसरे से सहमत नहीं दीखते ) उनमे से किसी भी एक मंदिर वाले कभी भी दूसरे मंदिर वालों से हारना न चाहते, जहां तक हो - एक दुसरे को avoid करने का ही प्रयास करते । किन्तु बच्चे तो फिर बच्चे होते हैं न - बड़े उन्हें कितना ही बिगाड़ने के प्रयत्न करें, उन्हें बिगड़ने में समय लगता है । वे मन में प्रेम के सागर भरे आए होते हैं, जिस सागर को ये "सत्यखोजी" मार्गों वाले बड़े / समझदार जन सुखाने के प्रयास करते हैं - और यह सूखने तक जो समय चाहिए - तब तक वह बच्चा बड़ा हो गया होता है । 

तो दोनों मंदिरों के समूहों के दो बच्चे - अक्सर राह में मिलते, तो बातें कर लेते । दोनों कुछ कुछ बड़े हो चले थे, सागर सूखने लगा था - किन्तु अभी इतना भी न सूखा था की एक दूसरे से नज़र बचा कर निकल जाएँ । हाँ, एक दूसरे से जीतना है, यह भावना ज़रूर पनपने लगी थी । 

एक दिन ये दोनों बच्चे राह में मिले । एक ने दूसरे से पूछा - "कहाँ जा रहे हो ?" वह भी शायद कुछ Poetic Mood में रहा होगा - तो बोला - "जहां हवाएं ले जाएँ।" अब पहले वाले को कुछ समझ न आया, आगे क्या बात करूँ - चुप ही रह गया। (वैसे मेरी नज़र में यह पहले बच्चे की हार नहीं है - कम से कम उसने बात शुरू करने की कोशिश तो की  - दूसरे बच्चे ने - जो यहाँ जीता हुआ दीखता है - (के उसने इस को चुप करा दिया ) - उसीकी हार लगती है मुझे तो - उसने दोस्ती के राह बंद कर दी संवाद को ख़त्म कर के - पर खैर - यह एक कहानी है )

 अब यह पहला बच्चा बड़ा परेशान हुआ , वापस लौट कर मंदिर में गुरु से कहा "आज मैं उस मंदिर वाले से हार गया" - और पूरी बात बताई । अब यह कैसे स्वीकार हो  कि  हम हार गए ? गुरु को बड़ा बुरा लगा - उसने कहा - "यह तो बहुत बुरी बात है - हम हार कैसे सकते हैं ? कल फिर पूछना - वह ऐसा कहे तो कहना - अगर हवा न चलती हो - तो कहाँ जाओगे ?" 

अगले दिन फिर मुलाकात हुई - यह बच्चा तैयार था - फिर पूछा - "कहाँ जाते हो ?" लेकिन अब वह दूसरा बोला - "जहां पैर ले जाएँ " तो सीखा हुआ जवाब व्यर्थ हो गया - क्या कहे ? फिर चुप रह जाना पडा । आज तो गुरु जी को और बुरा लगा - वे बोले "कल पूछना - कभी ऐसा भी हो सकता है की पैर न रहे - तब कहीं नहीं जाओगे क्या ? और वह जवाब बदल कर जो भी और जवाब दे - उसमे इसी तरह का कुछ पूछना - की यह न हो तो क्या करोगे ? हार कर नहीं आना ।"

अगले दिन यह बच्चा पूरी तैयारी के साथ गया । alternative उत्तर भी सब सोचे हुए थे - की ऐसा घुमावदार जवाब मिला - तो ऐसा पूछूंगा । आज फिर दोनों मिले 

और इसने पूछा "कहाँ जा रहे हो ?"

दूसरा बच्चा बोला "सब्जी लेने "

....

:)

तो - सीखे हुए उत्तर अक्सर काम नहीं आते । जीतने के कोशिश अपने आप में ही हार होती है । जीतने / हारने के प्रयास ही यह कह रहे हैं की चुनी हुई राह ही गलत है - हमारी मंजिल यदि दूसरे से जीतना / उसे हराना है - तो वह प्रेम का / एकत्व का पथ है ही नहीं - हार तो हो ही चुकी । अब ऊपर से जीते या हारे - इससे कोई फर्क ही नहीं पड़ता ।

सोमवार, 28 नवंबर 2011

क्रोध और पश्चाताप


इस पोस्ट से मैं पश्चात्ताप की महिमा को कम नहीं बता रही, बल्कि यह कह रही हूँ की बाद में पश्चात्ताप करने से बहुत बेहतर है पहले ही गुस्से पर काबू रखना | that prevention is better than cure ...

तो हुआ यूँ की एक बच्चे को बहुत गुस्सा आता था -वह खुद पर काबू न रख पाता था | बाद में शांत भी हो जाता - किन्तु गुस्सा करते वक्त सब भला बुरा भूल जाता |

एक दिन उसके पिता ने उसे कहा की बाहर की fencing (लकड़ी की होती हैं ) वह पेंट करे इस बार - तो उसे इनाम मिलेगा - बच्चे ने ख़ुशी ख़ुशी कर दी |

अब यह fence  बहुत सुन्दर लग रही थी |

पिता ने कहा - बेटे - यह मैं तुन्हें कीलों का एक डब्बा और एक हथौड़ी देता हूँ - जब जब तुम्हे बहुत गुस्सा आये - तब इस दीवार को ही अपना शत्रु समझना और इस पर एक कील ठोंक देना - एक महीने तक यही करते रहना |

बच्चे ने यही किया - और कहने की ज़रुरत नहीं की महीने भर बाद वह दीवार बहुत बुरी स्थिति में थी :(

अब बच्चा समझने लगा की क्रोध से खूबसूरत चीज़ें भी कुरूप दिखने लगती हैं - और क्रोध जब उन चीज़ों पर हम बरसाते हैं, तो वे आहत होती हैं, और धीरे धीरे वाकई बदसूरत होने लगती हैं |

उसने पिता से कहा की अब मैं समझ रहा हूँ - अब क्या करूँ - यह दीवार तो बहुत ही खराब लगने लगी है ?

पिता बोले - ठीक है बेटा - यदि तुम पछता रहे हो - तो अब से क्रोध में आकर कीले न ठोकना |

बेटा बोला -परन्तु दीवार तो फिर भी ऐसे ही रहेगी न ?

पिता बोले - तो ठीक है - जब तुम किसी पर क्रोध करो - और समझने के बाद पछताओ - माफ़ी मांगो - तब एक कील उखड लेना |

बच्चा यह भी करने लगा - और करते हुए उसे समझ में आया की क्रोध में कील ठोंक देना तो बहुत आसान है - पर उस गाड़ी हुई कील को पछतावे के कारण बाद में उखाड़ फेंकना (अर्थात माफ़ी माँगना, और फिर माफ़ी मिल पाना ) उससे कई गुना अधिक कठिन है |

फिर भी ५-६ महीनों में (क्योंकि अब उसमे अपने क्रोध पर अधिक काबू था - तो क्रोध की पुनरावृत्ति घट गयी थी - जितनी कीलें उसने सिर्फ एक महीने में ही ठोंक दी थीं, उतने बार क्रोध और माफ़ी होते हुए अब ज्यादा समय लगा) धीरे धीरे - पछतावे और कील निकलने की मेहनत के चलते - उस दीवार से सब कीलें निकल गयी थीं |

जब दीवार पूरी साफ़ हो गयी - तब बच्चा फिर से पिता को बुला कर बोला - यह दीवार कीलें निकलने से बेहतर तो हो गयी है - परन्तु यह पहले जैसी नहीं है |

पिता बोले - हाँ बेटा - the nails you hammer in in a fit of anger go in very deep without effort ... but repenting and taking them out (asking for and receiving forgiveness ) is much more difficult. Even when they do come out, they leave behind scars, which remain as ugly reminders of the incident life long ...

यह दोहा सुना होगा आपने - 

रहिमन धागा प्रेम का, मत तोड़ो चटकाय,
टूटे से फिर ना जुड़े, जुड़े तो गांठ परि जाय।

फिर मिलेंगे ....

आलू और गुस्सा


एक किंडरगार्टन स्कूल में टीचर बच्चों को भावनाओं को सही दिशा देना सिखाना चाहती थी |

जैसा कि होता है -कुछ बच्चे शांत स्वभाव के थे, कुछ चंचल, कोई हँसते खिलखिलाते, तो कोई गुस्से वाले आदि | और बच्चों को गुस्सा आता है - तो हम जानते ही हैं कि कैसे होता है :)

तो टीचर जी ने बच्चों से कहा कि "अब से जब जब हमें किसी पर गुस्सा आये - हम अपनी कापी में अंकित करेंगे - और इस हफ्ते के अंत तक कापी में जो गिनती हो - उतने आलू सोमवार को एक थैले में रख कर कक्षा को लाने हैं | सब बच्चे मान गए [अक्सर टीचर की बात मानना काफी सरल होता है बच्चों के लिए - माता पिता की मानना भले ही कुछ कठिन हो :) ]  

तो जो खुशमिजाज स्वाभाव के बच्चे थे - उन्हें तो कुछ लाना ही न पड़ा - या अधिक से अधिक एक या दो आलू | पर जो गुस्से वाले बच्चे थे - उन्हें कई आलू लाने पड़े | 

टीचर ने कहा - अब सब बच्चे अपने अपने आलुओं को दिन भर उठा कर घूमेंगे | इन्हें बिलकुल नीचे नहीं रखना है | बच्चों के लिए तो यह खेल ही था - ख़ुशी ख़ुशी मान गए | जो गुस्से वाले बच्चे थे - वे खुश भी थे - कि अब मेरे पास एक "भारी हथियार" है | जो सताए - उसे डराने के लिए "क्रोध का भारी थैला" | पर आखिर बच्चे तो ठहरे छोटे (किंडरगार्टन ) और आलू भारी होते हैं काफी | जिसके पास आलू नहीं थे - वे शुरू में कुछ डरे हुए थे - कि कोई गुस्से वाला हमें आलू भरी थैली मार दे तो ? पर कोई दो घंटे गुज़रते गुज़रते आलुओं का भार उन बच्चों को महसूस होने लगा - जो कई लोगों से नाराज़ थे | पर जो एक दो लोगों से ही नाराज़ थे - उन्हें यह भार महसूस होने तक शाम हो चली थी | ये बच्चे घर गए तो खुश थे कि चलो - बोझ से पीछा छूटा ( अगले दिन फिर स्कूल में अपने अपने थैले सम्हालने हैं ) | थैलियाँ स्कूल में ही छूट गयीं |

अगले दिन फिर अपने अपने थैले उठाने थे | अब बच्चे पहले ही परेशान थे , क्योंकि पिछले दिन के अनुभव से जान चुके थे कि क्या परेशानी होगी |

तीसरे दिन भी ऐसा ही चला | चौथे दिन दोपहर होते होते कुछ आलुओं के ख़राब होने से कक्षा में दुर्गन्ध फैलने लगी | अब तो जो बच्चे गुस्सा न भी होते थे - वे भी परेशान - कि आलू उठाये भले ही किसी और ने हों - दुर्गन्ध तो सबको आती थी न ? किन्तु जिसकी थैली में जितने आलू - उसकी परेशानी उतनी अधिक - कि तीव्रता दुर्गन्ध की उसके पास ज्यादा होनी ही है न ?

अब बच्चे टीचर से पूछने लगे - इन आलुओं से कैसे पीछा छुड़ाया जाये ? टीचर ने कहा - जिससे तुम गुस्सा हो - उस पर से गुस्सा हटाओं - यदि उससे झगडा किया था गुस्से में - तो माफ़ी मांग कर दोस्ती करो - तब एक आलू निकाल कर फेंक सकते हो |

अब - पहली मुसीबत तो यह कि माफ़ करो - और ऊपर से उससे माफ़ी मांगो जिससे आप नाराज़ थे | Adjust होने में कुछ समय गया  और माफ़ी मांगने में कुछ और समय गया - पर आख़िरकार प्रोब्लम सोल्व हो ही गयी |

तो दोस्तों - जब क्रोध आये - तो ध्यान दे - कि हमारा क्रोध उसे तो पल भर को तकलीफ देता है जिसपर क्रोध है - पर वह वजन उठाये हमें हर वक़्त घूमना पड़ता है | जितना गुस्सा - उतना वजन | शुरुआत में लगता है - कि यह क्रोध एक "भारी हथियार" है - जिससे मैं दूसरों को डरा कर काबू कर सकूं - और दूसरों को भी कुछ डर लगता है शुरुआत में ( जिसके पास जितना भारी हथियार हो , उससे उतना ज्यादा डर ) ...... यह क्रोध अधिक समय तक लाद कर घूमे - तो सड़ने लगता है - सडांध उठती है - जो सिर्फ क्रोध करने वाले को ही नही - उसके आसपास चुप रहने वालों को भी महसूस होती है | ( उस दुर्गन्ध की शिद्दत भले ही अलग हो )|  तो - शायद बेहतर हो कि हम अपने क्रोध को समझें और उसे handle करना सीखें - उसे justify कर के सही साबित करने से वह सही हो जाएगा क्या ?

रविवार, 27 नवंबर 2011

जो तुम न लो, वह तुम्हारा नहीं होता



एक बार एक महात्मा को कोई बड़ी गालियाँ और अपशब्द बोल गया | पर वे परेशान न हुए - अपने काम में लगे रहे |
उस व्यक्ति के जाने के बाद महात्मा के क्रोधित शिष्य कहने लगे - वह आप पर इतना कह गया - और आपने न खुद कुछ किया न हमें कुछ कहने दिया | तब वे बोले - कोई तुम्हे कुछ उपहार दे, तुम उसे न लो - तो वह तुम्हारा नहीं होता, उसी के पास रह जाता है - चाहे वह रख ले , या फेंक दे - या किसी और को दे दे |

शाम को उसे उसके दोस्तोंने समझाया - और वह पछताने लगा | अगले दिन बड़ा लज्जित हो कर उनके पास पहुंचा - और माफ़ी मांगी | महात्मा बोले - माफ़ी किस बात की ? यह जो नदी बह रही है - यह कल यह नहीं थी जो आज है - पूरा पानी जा चुका है, नया पानी है - जो लगातार जाता जा रहा है | वैसे ही - तुम जो आज माफ़ी मांगने आये हो - वह व्यक्ति नहीं ही हो जो कल अपशब्द कह रहे थे - वह व्यक्ति अब नहीं है यहाँ | तुम अब एक दूसरे व्यक्ति हो | अब जो कर रहे हो - वही तुम हो |

यही है जीवन - बह जाने दो जो कल हुआ | आज में जियो |

रेशम का एक सूत



मैं ओशो को बहुत पढ़ती हूँ - सब कुछ तो समझ में नहीं आता - पर अच्छा लगता है पढ़ कर ... वैसे समझ में न आने जैसा तो वे कुछ कहते नहीं - बहुत ही सरल सीढ़ी बातें होती हैं -- इतनी सरल , कि हमारे घुमावदार विचारों में घुस पाना मुश्किल हो जाता है कभी कभी... कहीं पढ़ा कुछ .. अच्छा लगा - तो कही बैठा रह गया दिमाग में ..... और न लगा -तो कुछ बिगड़ा तो नहीं ही !! यूँ ही कुछ याद आ रही है - धुंधली सी एक कहानी याद - उसमे कहाँ कहाँ मूल कहानी है ... और कहाँ मेरे कुछ  विचार  गड्ड मड्ड हुए हैं - ये तो मैं नहीं कह सकती  - पर सब हैं उसी में समाविष्ट .....

उन्होंने कहा था - अन्धकार से भरी रात्रि में - प्रकाश कि एक किरण का होना भी सौभाग्य है - क्योंकि जो उस का अनुसरण करे - वह उसके स्रोत तक पहुँच ही जाएगा.....( पता नहीं ऐसा क्यों कहते हैं लोग कि - धर्मं का प्रकाश हो - अन्धकार का नाश हो ... किसका नाश करोगे? अन्धकार तो वह है - जो है ही नहीं - और जो नहीं ही हो - उसका नाश कैसे हो? अन्धकार तो प्रकाश का अभाव भर है न - यदि प्रकाश हो - एल छोटी सी दिए कि लौ भी जला दी जाए - तो अन्धकार तो होगा ही नहीं - तो नाश किसका करोगे? और यदि नहीं जलाई - तो अन्धकार घिर आना ही है - उसका फिर भी नाश हो ही नहीं सकता !!! )प्रकाश की एक किरण के सहारे - उसका स्त्रोत्र निश्चित रूप से तलाशा भी जा सकता है - और पाया भी...

अब आखिर जब हम किसीको ढूँढते हैं - तो दिख जाने पर - पाया हुआ मानते हैं .. पा  लेने कि परिभाषा क्या है हमारे लिए? देख ही लेना न? और देखना क्या है - कि उस स्त्रोत्र से चली प्रकाश के किरणें हमारी आँख में पड़ीं - यही है "दिखना" ......किसी और प्रकार से अनुभूति पा लेना .. कि किसीको सुन लिया - कि दुर्योधन ने तेरहवे वर्ष के अज्ञात वास के अंत में - अर्जुन के शंख को सुना - और कहा - कि मैंने पांडवों को पा लिया!!!! या की हम किसी खोजी कुत्ते को लेकर किसी को तलाशना चाहें - और उसे उसकी गंध मिल जाए - तो हम कहते हैं की पा लिया समझो अब तो !! तो निष्कर्ष ये - की अनुभूति - किसी भी प्रकार के ही हो सही - ही हमारे "पा लेने " कि व्याख्या है! पांच ज्ञानेंद्रियें हैं - द सेन्सेज  ऑफ़ साईट, हीअरिंग, स्मेल, टच, टेस्ट .. (देखना, सुनना सूंघना, छूना , आस्वादन कर लेना ) इनमे से किसी भी एक प्रकार की अनुभूति ही हमारी "पा लिया" कि परिभाषा है!!  किसीसे आप बरसों से न मिले - और उसकी आवाज़ सुन ली फ़ोन पर - तो पा लिया, या कि उसका पत्र मिला - पढ़ लिया - तो पा लिया .. या कि कंप्यूटर ऑन किया - इन्टरनेट लगाया .. मेल या चैट  पर पढ़ लिया - तो भी पा लिया ही लगता है.... मेरे निकट तम  मित्र - जिनसे मैं मिलती ही नहीं कभी - मेल पर ही लगता है कि बस - मिले ही हुए हैं!!!! अब समझ आती है ओशो कि वह बात - जो कि उनके किसी प्रकाशित पत्र में पढ़ी थी..... कि प्रकाश की एक किरण का भी होना सौभाग्य है - एक अन्धकार भरी रात्रि के लिए...

एक कहानी है - एक राजा ने किसी बात पर नाराज़ हो कर अपने मंत्री को एक ऊंची मीनार पर कैद करवा दिया - कैद क्या - धीमी मौत कि ही सज़ा थी .. कि उस गगन चुम्बी ईमारत पर न तो कोई उसे खाना ही पहुंचा सकता था - न ही भाग निकलने का कोई रास्ता था... जब उसे कैद करके मीनार के ओर ले जाया जा रहा था - तो वह परेशान नहीं था - मुस्कुरा रहा था .. पत्नी ने बहुत रोते हुए पुछा कि वह इतना खुश क्यों है? तो उसने कहा - यदि रेशम का एक अत्यंत ही पतला सूत भी मुझ तक पहुँचाया जा सके - तो मैं बाहर आ जाऊं - और इतना तो तुम कर ही सकोगी...

तो वह भी तो आखिर उस ही के पत्नी थी - इतने साल साथ गुज़ारे थे - समझदारी के कोई कमी न थी -- सोचने लगी .. सोचती रही - पर हल न मिला ... पर कहते हैं न - सफलता के लिए सिर्फ अपने दिमाग का भरोसा लिया जाए - यह ज़रूरी नहीं .. आजकल तो हम - बच्चों के होमेवर्क के लिए भी - गूगल से विकिपीडिया से या किसी और वेबसाइट से हेल्प ढूँढते हैं .. ज़रूरी यह है - कि हम जानें - कि हेल्प ढूँढनी   कहाँ है.... तो वो कुछ देर सोचती रही - नहीं सूझा - तो एक बुद्धिमान फ़कीर से पुछा - आखिर सोचने ही में समय ख़राब किया - तो पति वहां भूखा प्यासा उतने समय तक...... तो फ़कीर ने कहा - एक भृंग (कीड़ा, इन्सेक्ट) को लो - और उसकी मूछों पर शहद लगा कर , पाँव में रेशम का धागा बांध, ऊपर के ओर मुंह कर के - मीनार पर छोड़ दो.. ऐसा ही किया भी गया .... अब शहद के लोभ में वह भृंग रात भर चढ़ता रहा - और ऊपर पहुँच गया.. फिर क्या - रेशम के धागे से सूत का धागा पहुंचा -- उस से डोरी , डोरी से रस्सी - फिर उस से मोटा रस्सा ऊपर पहुँचाया गया .. और वह कैद से बाहर हो गया ...

इसीलिए ... सूर्य को पाना हो - तो प्रकाश के एक किरण ही बहुत है - कि वह उसी का एक विस्तार है -- कि जिसने किरण को पाया - उसने सूर्य को पाने का उपाय पा लिया ... सूर्य को पाने के लिए सूर्य को पकड़ना थोड़े ही ज़रूरी है!!!! हमारे भीतर जो जीवन है - वह इश्वर की किरण है - और जो बोध है - बुद्धत्व की बूँद है - जो आनंद है - वह सच्चिदानंद की झलक है ....

तो - अगली बार मिलने तक ... सायोनारा , दसविदानिया ....

PARENTS ARE PRECIOUS!!



This was narrated by an IAF pilot at
a Seminar recently on Human Relations : 

Venkatesh Balasubramaniam (who works for IIT) describes how his gesture ofbooking an air ticket for his father, his maiden flight, brought forth a rush of emotions and made him (Venkatesh) realize that how much we all take for granted when it comes to our parents. 


My parents left for our native place on Thursday and we went to the airport to see them off. In fact, my father had never traveled by air before, so I just took this opportunity to make him experience the same. Inspite of being asked to book tickets by train, I got them tickets on Jet Airways. The moment I handed over the tickets to him, he was surprised to see that I had booked them by air. The excitement was very apparent on his face, waiting for the time of
travel. Just like a school boy, he was preparing himself on that day and we all went to the airport, right from using the trolley for his luggage, the baggage check-in and asking for a window seat and waiting restlessly for the security check-in to happen. He was thoroughly enjoying himself and I, too, was overcome with joy watching him experience all these things. 


As they were about to go in for the security check-in, he walked up to me with tears in his eyes and thanked me. He became very emotional and it was not as if I had done something great but the fact that this meant a great deal to him. When he said thanks, I told him there was no need to thank me. But later, thinking about the entire incident, I looked back at my life. As a child, how many of our dreams our parents have made come true. Without understanding the financial situation, we ask for cricket bats, dresses, toys, outings, etc. irrespective of their affordability, they have catered to all our needs. Did we ever think about the sacrifices they had to make to accommodate many of our wishes? Did we ever say thanks for all that they have done for us? Same way, today when it comes to our children, we always think that we should put them in a good school. Regardless of the amount of donation, we will ensure that we will have to give the child the best, theme parks, toys, etc. But we tend to forget that our parents have sacrificed a lot for our sake to see us happy, so it is our responsibility to ensure that their dreams are realized and what they failed to see when they were young. It is our responsibility to ensure that they experience all those and their life is complete. 


Many times, when my parents had asked me some questions, I had actually answered back without patience. When my daughter asked me something, I was very polite in answering. Now I realize how they would have felt at those moments. Let us realize that old age is a second childhood and just as we take care of our children, the same attention and same care needs to be given to our parents and elders. Rather than my dad saying thank you to me,I would want to say sorry for making him wait so long for this small dream. I do realize how much he has sacrificed for my sake and I will do my best to give the best possible attention to all their wishes. 


Just because they are old does not mean that they will have to give up everything and keep sacrificing for their grandchildren also. They have wishes,too. 




Take care of your parents. THEY ARE PRECIOUS. 

शनिवार, 26 नवंबर 2011

why we forward mails - beautiful



This is a BEAUTIFUL mail - which I recieved / and sent to most of my friends --- long back...........
just copy pasting it here.............. cheers
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This explains why you forward some jokes
A man and his dog were walking along a road. The man was enjoying the scenery, when it suddenly occurred to him that he was dead.
 
He remembered dying, and that the dog walking beside him had been dead for years. He  wondered where the road was leading them.

 
After a while, they  came to a high, white stone wall along one side of the road. It looked like  fine marble. At the top of a long hill, it was broken by a tall arch that  glowed in the sunlight.


When he was standing before it he saw a  magnificent gate in the arch that looked like mother-of-pearl, and the  street that led to the gate looked like pure gold. He and the dog walked  toward the gate, and as he got closer, he saw a man at a desk to one side.


When he was close enough, he called out, 'Excuse me, where are we?'
 

'This is Heaven, sir,' the man answered. 
'Wow! Would you happen to have some water?'  the man asked.
'Of course, sir. Come right in, and I'll have some ice water brought right up.' The man gestured, and the gate began to open. 
'Can my friend,' gesturing toward his dog, 'come in, too?' the traveler asked.
'I'm sorry, sir, but we don't accept  pets.'
 
The man thought a moment and then turned back toward the road and continued the way he had been going with his dog. After another long walk, and at the top of another long hill, he came to a dirt road leading through a farm gate that looked as if it had never been closed. There was no fence. As he approached the gate, he saw a man inside, leaning against a tree and reading a book....


'Excuse me!' he called to the man. 'Do you have any water?'
 
'Yeah, sure, there's a pump over there, come on in.'
 
'How about my friend here?' the traveler gestured to the dog.
 
'There should be a bowl by the pump.'
 
They went through the gate, and sure enough, there was an old-fashioned hand pump with a bowl beside it. The traveler filled the water bowl and took a long drink himself, then he gave some to the dog. When they were full, he and the dog walked back toward the man who was standing by the tree.

'What do you call this place?' the traveler asked. 
'This is Heaven,' he answered.
 
'Well, that's confusing,' the traveler said. 'The man down the road said that was Heaven, too.'
 
'Oh, you mean the place with the gold street andpearly gates? Nope.. That's hell.'
 
'Doesn't it make you mad for them to use your name like that?'
 
'No, we're just happy that they screen out the folks who would leave their best friends behind.'



Soooo. Now you see, sometimes, when we wonder why friends keep forwarding jokes to us without writing a word. Maybe this will explain it.
 

When you are very busy, but still want to keep in touch, guess what you do? You forward jokes.
When you have nothing to say, but still want to keep contact, you forward jokes. 
When you have something to say, but don't know what, and don't know how ... you forward jokes.
 
A forwarded joke lets you know that
 you are still remembered, you are still important, you arestill loved, you arestill cared for. 
So, next time if you get a joke, don't think that you've been sent just another forwarded joke, but that you've been thought of today and your friend on the other end of your computer wanted to send you a smile.

You are welcome at my water bowl anytime !

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why we forward mails - beautiful



This is a BEAUTIFUL mail - which I recieved / and sent to most of my friends --- long back...........
just copy pasting it here.............. cheers
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This explains why you forward some jokes
A man and his dog were walking along a road. The man was enjoying the scenery, when it suddenly occurred to him that he was dead.
 
He remembered dying, and that the dog walking beside him had been dead for years. He  wondered where the road was leading them.

 
After a while, they  came to a high, white stone wall along one side of the road. It looked like  fine marble. At the top of a long hill, it was broken by a tall arch that  glowed in the sunlight.


When he was standing before it he saw a  magnificent gate in the arch that looked like mother-of-pearl, and the  street that led to the gate looked like pure gold. He and the dog walked  toward the gate, and as he got closer, he saw a man at a desk to one side.


When he was close enough, he called out, 'Excuse me, where are we?'
 

'This is Heaven, sir,' the man answered. 
'Wow! Would you happen to have some water?'  the man asked.
'Of course, sir. Come right in, and I'll have some ice water brought right up.' The man gestured, and the gate began to open. 
'Can my friend,' gesturing toward his dog, 'come in, too?' the traveler asked.
'I'm sorry, sir, but we don't accept  pets.'
 
The man thought a moment and then turned back toward the road and continued the way he had been going with his dog. After another long walk, and at the top of another long hill, he came to a dirt road leading through a farm gate that looked as if it had never been closed. There was no fence. As he approached the gate, he saw a man inside, leaning against a tree and reading a book....


'Excuse me!' he called to the man. 'Do you have any water?'
 
'Yeah, sure, there's a pump over there, come on in.'
 
'How about my friend here?' the traveler gestured to the dog.
 
'There should be a bowl by the pump.'
 
They went through the gate, and sure enough, there was an old-fashioned hand pump with a bowl beside it. The traveler filled the water bowl and took a long drink himself, then he gave some to the dog. When they were full, he and the dog walked back toward the man who was standing by the tree.

'What do you call this place?' the traveler asked. 
'This is Heaven,' he answered.
 
'Well, that's confusing,' the traveler said. 'The man down the road said that was Heaven, too.'
 
'Oh, you mean the place with the gold street andpearly gates? Nope.. That's hell.'
 
'Doesn't it make you mad for them to use your name like that?'
 
'No, we're just happy that they screen out the folks who would leave their best friends behind.'



Soooo. Now you see, sometimes, when we wonder why friends keep forwarding jokes to us without writing a word. Maybe this will explain it.
 

When you are very busy, but still want to keep in touch, guess what you do? You forward jokes.
When you have nothing to say, but still want to keep contact, you forward jokes. 
When you have something to say, but don't know what, and don't know how ... you forward jokes.
 
A forwarded joke lets you know that
 you are still remembered, you are still important, you arestill loved, you arestill cared for. 
So, next time if you get a joke, don't think that you've been sent just another forwarded joke, but that you've been thought of today and your friend on the other end of your computer wanted to send you a smile.

You are welcome at my water bowl anytime !

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