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शुक्रवार, 20 फ़रवरी 2026

ज़िंदगी अधूरी तेरे बिन - भाग पच्चीस (25)

 

ज़िंदगी अधूरी तेरे बिन - भाग पच्चीस (25)




भाग 25

प्रियंका


हम टहलने निकल गए, जो हम घर पर कभी नहीं करते थे। अंशुमन की इस पहल पर मुझे आश्चर्य भी हुआ, और खुशी भी। आसमान में ऊँचा और चमकीला चाँद, समुद्र तट पर चाँदी की चमक बिखेर रहा था, जब अंशुमन और मैं तट रेखा के किनारे-किनारे चल रहे थे। साथ-साथ, फिर भी दोनों अकेले। ठंडी हवा में समुद्र का नमक घुला हुआ था, हर साँस ठंडी, नमकीन चुम्बन की तरह थी। हम अपने कोट में लिपटे, ठंडी नर्म रेत पर चल रहे थे।


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हम कुछ देर तक चुपचाप चलते रहे; सिर्फ़ किनारे पर लहरों की टकराने, और कभी-कभी दूर से किसी रात के पक्षी की आवाज़ सुनाई दे रही थी। दुनिया खामोश और उत्सुक लग रही थी, मानो वह भी यह सुनने के लिए इंतज़ार कर रही हो कि हमारे बीच क्या होगा। अंततः अंशुमन ने चलना बंद कर दिया और मेरी ओर मुड़ा, उसका चेहरा चांदनी में भी पीला पड़ा हुआ और खिंचा हुआ दिख रहा था। "मुझे बताओ कि मैंने तुम्हें कैसे-कैसे चोट पहुंचाई?"

उन शब्दों ने मुझे झकझोर कर रख दिया। उसने पहले कभी ऐसा नहीं पूछा था। मुझे लगा कि मेरे अंदर भावनाओं का तूफान उमड़ रहा है, और मुझे नहीं पता था कि मैं बिना गुस्सा किए अपनी बात कैसे कहूँ। लेकिन हम यहाँ बात करने आए थे, और इसका मतलब था कि मुझे अपने अंदर के क्रूर क्रोध को शांत रखना था ताकि मैं सुसंगत रूप से बोल सकूँ। "मैं नहीं चाहती कि तुम्हें ऐसा लगे कि हमारी शादी में सब बुरा ही था ..." मैंने अपने विचारों को इकट्ठा करते हुए समझाया।

"जानता हूँ प्रियंका।" मैंने समुद्र तट पर बिखरी हुई बेंचों मेँ से एक बेंच की इशारा किया। हम धीरे-धीरे चलते हुए उस पर जा बैठे, एक तरफ वह और दूसरी तरफ मैं, हमारे बीच थोड़ी ही दूरी थी, लेकिन कितनी गहरी खाई भी!

"नीलिमा और शाश्वत के चले जाने के बाद तुम देर से घर आने लगे। जैसे घर पर तुम्हारी दिलचस्पी सिर्फ़ बच्चों में ही थी। जैसे मेरी कोई अहमियत ही नहीं थी।" मैं इंतज़ार कर रही थी कि वह कोई टिप्पणी करे या बचाव करे, लेकिन वह बस धैर्य से बैठा रहा, उसकी आँखें नर्म थीं, और शायद नम भी थीं? मैं सीधी बैठी रेत पर लहरों के मंद-मंद नृत्य को देखती रही। "जब भी मैं तुमसे बात करने की कोशिश करती, तो तुम चिड़चिड़ा जाते। यह बात परेशान करती थी। तुम हर बार यही दिखाते कि तुम व्यस्त हो, जैसे मैं बड़बड़ाने वाली पत्नी हूँ और तुम परेशान हो मुझसे।

"कभी नहीं," उस ने बीच में कहा। "कभी नहीं, प्रियंका।" मैंने उदास होकर सिर हिलाया।

"मैंने जो महसूस किया, वह वैसा ही था, और मैं इसे बदल नहीं सकती।"

"मैं समझता हूँ।" वह चुप हो गया, और मैंने उन सभी बातों को छान मारा जो मुझे पता था कि मुझे कहना था, लेकिन मुझे यकीन नहीं था कि वे शब्द कैसे उतरेंगे। मैं चाहती थी कि वह खुद से ही समझे कि मैंने उसे क्यों छोड़ा। शायद यह मेरी ओर से रक्षात्मक था, लेकिन मैं इसे बदल भी नहीं सकती थी।

"पिछले कुछ सालों से ऐसा लगने लगा था कि नीलिमा, शाश्वत और तुम एक परिवार हो और मैं सिर्फ़ खाना बनाने और सफ़ाई करने वाली बाहरी व्यक्ति हूँ। मैं कुछ कहती तो नीलिमा अनदेखा कर देती और शाश्वत... आँ... मेरा बच्चा शाश्वत मुझसे ऐसे बात करता जैसे मैं शर्मिंदगी की वस्तु हूँ।" मैं बोलते ही घबरा गई। "लेकिन तुम उसे यह नहीं बता सकते।"

"मैं नहीं बताऊँगा," उसने शान्त स्वर मेँ वादा किया।

मैंने अपने हाथों की ओर देखा। "तुमने उन्हें कभी नहीं रोका अंशुमन। जैसे उनका मुझसे ऐसे बात करना तुम्हें ठीक लगता था। मुझे हमेशा से ही लगता था कि तुम मुझसे शादी करने के लिए पछता रहे हो, लेकिन इन सालों में, मैं इस पर यकीन करने लगी। मुझे लगता कि तुम सोचते थे कि मैं तुम्हारी पत्नी बनने के लिए, राव-सिन्हा के लिए पर्याप्त नहीं हूँ।" मैं आत्म-हीनता में हँसी। "तुम जानते ही हो कि माँ जी अक्सर मुझसे ऐसा कहती थीं। मैंने बहुत कड़ी मेहनत की अंशुमन, एक अच्छी पत्नी बनने के लिए! मैंने खाना बनाना और वाइन को मिलाना सीखा कि कोई न कहे कि झुग्गी वाली उच्च समाज के लायक नहीं बन पाई।” मैंने आँखें बंद कर लीं क्योंकि उसे दिल की बात बताना, अपना दर्द दिखाना कठिन होता जा रहा था।

"तुम हमेशा से एक अद्भुत पत्नी रही हो," उसने धीरे से कहा। "यह मेरी गलती है कि तुमने यह महसूस नहीं किया। मेरी गलती है कि मैंने तुम्हें बताया नहीं, तुम्हें दिखाया नहीं।"

मैंने थूक निगल कर अपनी आँखें खोलीं। मैंने उसकी तरफ़ नहीं देखा। नहीं देख सकी। जब से मैं वहां से गई, मुझे लगा कि अंशुमन और बच्चे भी मुझे दोषी ठहराएंगे। लेकिन उन्होंने खुद को दोषी ठहराया। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि इसका क्या मतलब निकाला जाए। "तुम हमेशा कहते रहते थे कि यह ‘मेरा’ पैसा है। ‘यह ‘मेरी’ विरासत है।" अब मैं उसकी ओर मुड़ी। "तुम और तुम्हारी माँ ने हमेशा यह सुनिश्चित किया कि मैं समझ कर रहूँ कि मेरे पास कोई अधिकार नहीं है। तुम दोनों ने मेरे सामने विवाह-पूर्व समझौता थोप दिया। और अंशुमन, तुम मुझे बार-बार उसकी याद दिलाते रहे, अकेले मेँ भी और दूसरों के सामने भी।"

"मेरे पास जो कुछ भी है प्रिये, वह हमारा है," उसने तुरंत कहा। "मैंने तुमसे ‘हमारी’ बात कभी नहीं कही, यह मेरी गलती है... प्रियंका, यह मेरी ही गलती है। मैं पहले माँ को दिखाने के लिए यह कहता था, कि ऐसा दिखा कर कि मैं यह कह रहा हूँ उनकी स्वीकृति जीत लूँ। मैं उनसे डरता था। बचपन से ही। और बाद मेँ कब यह मेरी अपनी आदत बन गया मुझे सच ही मेँ पता नहीं चला। लेकिन मेरे मन मेँ यह नहीं था, मेरा विश्वास करो प्रियंका, मेरे लिए यह एक मजाक जैसा था। मन मेँ तो यही था कि तुम मुझसे प्यार करती हो और मैं सोच भी नहीं सकता था कि एक दिन तुम मुझसे नाराज होकर मुझे छोड़ भी सकती हो। वह समझौता मेरे लिए सिर्फ एक कागज था, मैंने उस पर गंभीरता से कभी नहीं सोचा। मैं तुम्हारे बिना कुछ भी नहीं हूँ। मैं तुम्हारे बिना अपनी कंपनी भी नहीं बना सकता था।"

"मुझे लगता है कि अब तुम मुझसे झूठ बोल रहे हो, शायद खुद से भी, क्योंकि तुम तलाक नहीं लेना चाहते। ‘लोग क्या कहेंगे’ सोचकर, जैसा तुमने उस दिन फोन पर कहा। और यह बात मुझे पागल कर देती है क्योंकि मुझे समझ नहीं आता कि तुम मुझे किस कारण से साथ रखना चाहते हो। जबकि तुम कुछ समय से ऐसे व्यवहार करते रहे हो जैसे... जैसे .... जैसे तुम मुझे जाते हुए देखकर खुश होगे।"

उसका जबड़ा कस गया। "तुम सही हो। मैं सोचता रहा कि मैं कितना भाग्यशाली हूँ कि मुझे तुम्हारी जैसी पत्नी मिली - मैंने कभी यह जानने की कोशिश नहीं की कि क्या तुम भी सोचती होगी कि तुम भी मेरे जैसा पति पाकर भाग्यशाली हो? तुम्हारे जाने के बाद जब मैंने अपने आस-पास के लोगों से बात की, तो मुझे पता चला कि सभी को ऐसा लगता है कि मेरा अपनी असिस्टेंट के साथ संबंध है और मैं चाहता हूँ कि तुम चली जाओ।"

"मुझे यह तो नहीं लगा, लेकिन यह लगता था कि तुम चाहते थे कि मैं परेशान होकर खुद ही चली जाऊँ। क्योंकि अगर तुम जाने के लिए कहोगे, तो मुझे पैसे देने होंगे।"

"मुझे उस विवाह-पूर्व समझौते को सालों पहले ही फाड़ देना चाहिए था," उसने बुदबुदाया। "प्रियंका, उस समझौते को खारिज हुआ समझो।"

"क्या?"

"हाँ, मान लो कि कोई विवाह-पूर्व समझौता नहीं है। अगर हम तलाक लेते हैं, तो वैवाहिक संपत्ति कानून के अनुसार सामान वितरण होगा। मेरा विश्वास करो, एक अच्छा वकील तुम्हें हर चीज़ का आधा हिस्सा दिला सकता है। असल में, अगर हम तलाक लेते हैं, तो मैं बिना बहस तुम्हें अपनी विरासत, कंपनी और घरों सहित हर चीज़ का आधा हिस्सा दूँगा।"

मैंने चिल्लाकर कहा, "मुझे तुम्हारे पैसे नहीं चाहिए।"

"हमारा पैसा, प्रियंका, हमारा। मेरा नहीं, हमारा। यह मेरा नहीं हमारा पैसा है। मेरी बात सुनो। मैं यह इसलिए नहीं कह रहा हूँ क्योंकि तुम चली गई हो; मैं यह इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि यह सच है। मैं उस बेवकूफ युवा लड़के का बचाव नहीं कर सकता जो मैं शादी के समय था... अरे, बेब, मैं उस बेवकूफ पुरुष का भी बचाव नहीं कर सकता जो मैं बड़ा होकर भी बना रहा। लेकिन पैसा हमारे बीच नहीं है।" वह इतना ईमानदार लग रहा था कि मैं उस पर विश्वास करना चाहती थी; मेरा एक हिस्सा उस पर विश्वास करना चाहता था।

"मैं नहीं जानती कि मैं क्या कहूं।"

"काश तुम मुझे एक मौका दे पातीं।"

"क्या करने का मौका?"

"सब सही करने का मौका। तुम्हें मुझसे फिर से प्यार मेँ पड़वाने का, मुझ पर फिर से भरोसा करवाने का, जिससे हम फिर से एक परिवार बन सकें।" वह मेरे करीब आकर बैठ गया और मेरे हाथों को अपने हाथों में ले लिया। "मैं तुम्हारे बिना खोया हुआ हूँ। मैं गहरी साँस भी नहीं ले पाता प्रियंका। मैं उस घर में नहीं रह सकता, तुम्हारे बिना तो बिल्कुल भी नहीं।"

उसकी आवाज़ में कंपन था और चाँदनी रात में मैंने उसकी आँखों में आँसू देखे।

"मैं वापस नहीं जा सकती," मैंने रोते हुए कहा। "अंशुमन ...मैं... "

उसने मुझे खींच कर गले लगा लिया। "मुझे पता है, बेब। मुझे पता है। मुझे बहुत खेद है।" वह माफ़ी मांग रहा था, वह सब कुछ कह रहा था जो मैं चाहती थी कि वह कहे, लेकिन वे सिर्फ़ शब्द थे। पुराने ज़ख्मों के जाने-पहचाने दर्द ने मेरे दिल को भारी कर दिया। उसने मुझे देखने के लिए खुद को दूर खींच लिया। "कृपया मुझसे नफरत मत करो... जितना तुम पहले से ही करती हो उससे ज्यादा नफरत मत करो" वह भी रो रहा था।

"अंशुमन, मैं तुमसे कभी नफरत नहीं कर सकती," मैंने कसम खाई। "कभी नहीं। मैंने हमेशा तुम्हें प्यार किया है, अब भी करती हूँ, हमेशा करती रहूँगी। लेकिन अब मैं उस जीवन मेँ नहीं लौट पाऊँगी। प्यार काफी नहीं होता, सम्मान और सँजोना भी आवश्यक है, विश्वास भी। यह सब टूट गया हैं अंशुमन.... "

"जब मैं बताऊँ कि मैंने क्या किया तब नफरत करोगी।" मैं यह सुनकर लगभग डर गई। क्या वह काव्या के साथ सोया था? किसी और के साथ? उसने क्या किया था? "मैंने तुम्हारा फोन देखा था।" क्या? "वही जिसे तुम घर पर छोड़ आई हो," उसने आगे कहा। "मैंने... तुम्हारी गोपनीयता भंग की।" मैंने सिर हिलाया, फिर भी मुझे समझ मेँ नहीं आया उसने यह क्यों सोचा कि इतनी सी बात पर मैं उससे नफरत करूँगी?

"मैंने डॉ. मिश्रा को भेजे गए ईमेल पढ़े।"

मुझे यह समझने में कुछ समय लगा कि वह क्या कह रहा था, और जब मैं समझी, तो मेरी सांस रुक गई। मैंने अपने हाथ उसके हाथों से खींचने की कोशिश की, लेकिन उसने मुझे ऐसा करने नहीं दिया। "क्या? क्या तुमने बच्चों को बताया? क्या तुम सब यहाँ इसलिए आए हो?" मैं अपनी आवाज़ को दबा नहीं सकी। मैं अपमानित और क्रोधित थी। वे यहाँ इसलिए नहीं आए थे क्योंकि वे मुझसे प्यार करते थे। शाश्वत इसलिए अच्छा व्यवहार नहीं कर रहा था क्योंकि उसे खेद था। वे मेरे अवसाद के बारे में जानते थे, और ...

"रुको," अंशुमन ने दृढ़ता से कहा, "प्रियंका, उस बकवास में मत उतरो। मैं और बच्चे तुम्हें वापस पाने के लिए पहले ही लड़ने वाले थे। उन ईमेल के बारे में पता चलने से पहले ही, हम योजनाएं बना रहे थे कि अपनी भूलें कैसे सुधारनी हैं। ठीक है?" मैंने फिर से अपने हाथ छुड़ाने की कोशिश की। क्रोध ने मुझे बहरा बना दिया। "प्रियंका," वह कोमल लेकिन अटल था। "बेब, मेरी बात सुनो। मैं जानता हूँ। और यह जानने से मुझे यह नहीं लगा कि तुम एक कमज़ोर औरत हो जो नर्वस ब्रेकडाउन के कगार पर थी, बल्कि मुझे पता चला कि तुम एक इतनी मजबूत औरत हो जो अपने प्रियजनों से दूर चली गई क्योंकि वे तुम्हारा सम्मान नहीं कर रहे थे। एक मजबूत, अद्भुत औरत जो अपनी मरती हुई दोस्त की अकेले देखभाल कर रही है। जो सालों से बिना किसी को बताए उसके लिए रिसॉर्ट व्यवसाय को आगे बढ़ा रही है।" ठीक है, तो उन तारीफ़ों ने मुझे खुशी दी। मैं स्वीकृति और मान्यता की भूखी थी, और अंशुमन से यह सुनना रोमांचक और अविश्वसनीय था!

मैंने खुद को शांत किया और पानी की ओर देखा, उसे अपने गर्म हाथों में मेरे ठंडे हाथ पकड़ने दिए, और लहरों पर चांदनी को नाचते देखा। "अंशुमन" मैंने बहुत देर बाद कहा, मेरी आवाज़ पहले से ज़्यादा स्थिर थी। "मैं माफ़ी की सराहना करती हूँ। मुझे लगता है कि यह ईमानदारी से मांगी गई माफ़ी है। लेकिन इसमें सिर्फ़ तुम ने क्या किया या क्या नहीं किया, उससे कहीं ज़्यादा कुछ है। मैंने भी इसमें भूमिका निभाई है। लंबे समय तक, मैं अपनी ज़रूरतों को व्यक्त करने में सुरक्षित या सहज महसूस नहीं करती थी। मैं खुद भी हमारे जीवन के परिदृश्य का हिस्सा बन गई, भागीदार नहीं।"

"अब मैं समझ गया हूँ," उसने धीरे से कहा। "और मैं तुम्हें ऐसा महसूस कराने के लिए बहुत पछता रहा हूँ।" मैंने आह भरी, मेरे अंदर दुख और राहत दोनों उमड़ रहे थे। मैंने उसका सामना किया, उसे दिखा पाई कि मैं कहाँ खड़ी हूँ। "यह कहने के लिए धन्यवाद। मुझे यह सब समझने के लिए कुछ समय चाहिए, खुद को तुम्हारी पत्नी और माँ होने से परे समझने के लिए। मैं अभी-अभी ही तो समझने लगी हूँ कि मैं अपने आप में हूँ कौन।"

अंशुमन ने अपना एक हाथ मेरे चेहरे पर रखा और मेरे गाल को धीरे से सहलाया। "क्या हम बात करते रह सकते हैं? सिर्फ़ आज नहीं, बल्कि शायद कल और परसों भी? हर दिन?"

उसकी आवाज़ में ईमानदारी साफ़ झलक रही थी, और मैंने उसके हाथ को हल्के से दबाते हुए सिर हिलाया। "हाँ, हम बात करते रह सकते हैं," मैंने सहमति जताई।

सोमवार, 16 फ़रवरी 2026

ज़िंदगी अधूरी तेरे बिन - भाग चौबीस (24)

 

ज़िंदगी अधूरी तेरे बिन - भाग चौबीस (24)





भाग 24

अंशुमन


अगर आपको यह कहानी पसंद आ रही हो तो प्लीज ऐमज़ान पर जाकर इसका रिव्यू लिख आइए। 
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लिविंग रूम गर्म चमक में डूबा हुआ था। दीपावली की रोशनी; सजावटी मालाओं की खनक और छुट्टियों की खुशियों की मधुर फुसफुसाहट से भरी हुई थी। मेरी पत्नी ने कमरे को सजाया था, ठीक उसी तरह सजाया था जैसे वह बैंगलोर में हमारे घर को सजाती थी, जिससे हमारा घर संसार एक मंदिर जैसा बन गया था।

उत्तर भारतीय दंपत्ति एक सोफ़े पर बैठे थे, उनके ऊपर एक कम्बल ओढ़ा हुआ था। वृद्ध दंपत्ति रात्रि भोज के बाद सोने चले गए थे। यशस्वी और नीलिमा पिछली दोपहर को आ गए थे और प्रियंका के चेहरे पर जो भाव था, वह मेरे घायल दिल पर मरहम की तरह था। छुट्टियों के दौरान अपने बच्चों को और मुझे अपने साथ पाना, भले ही वह मेरे बारे मेँ स्वीकार न करे, उसके लिए बहुत महत्वपूर्ण था। वह हमेशा इसे खास बनाती थी, और वह यहाँ भी वैसा ही कर रही थी जैसा वह हमारे घर पर करती थी।

ऐसा लग रहा था कि शाश्वत ने यशस्वी के साथ शांति बना ली है, क्योंकि वे दोनों आरामदायक कुर्सियों पर एक दूसरे के बगल में बैठे बातें कर रहे थे। दुर्भाग्य से, यशस्वी ने मुझे शाश्वत की तरह राहत नहीं दी थी। जब मैंने नीलिमा को फोन किया था तो मैंने यशस्वी से बात करने की कोशिश की थी, लेकिन उसने मना कर दिया था। इस मेँ उसका कोई दोष भी तो नहीं था। मैं इस परिवार का मुखिया था, तो अगर हमारे परिवार के टूटने के लिए कोई जिम्मेदार था, तो मैं ही था। मैंने अपनी पत्नी की रक्षा नहीं की, अपने बच्चों का व्यवहार सुधारने के लिए कोई कदम नहीं उठाया।

श्रेया मेरे बगल में सोफे पर बैठी थी। वह तकिए पर बैठी थी, उसके पैर मेरी तरफ थे। वह पिछले दिन की तुलना में कमज़ोर दिख रही थी, और प्रियंका ने मुझे बताया कि उसके अच्छे और बुरे दिन होते थे। यह एक अच्छा दिन नहीं था। कमरा गर्म था, चिमनी जलने के कारण, लेकिन श्रेया ने अपनी टोपी और एक बड़ा स्वेटर पहना हुआ था। मैंने उसे कंबल से ढक दिया था, उसे अच्छे से ओढा दिया था। श्रेया डिनर के लिए आई थी, लेकिन पंद्रह मिनट बाद ही चली गई थी। मैं उसे उसके कमरे में ले गया और मुझे खुशी हुई कि उसने मुझे ले जाने दिया। प्रियंका ने मुझे धन्यवाद दिया क्योंकि वह नीलिमा और यशस्वी के साथ समय बिताना चाहती थी। श्रेया में बात करने की ऊर्जा नहीं थी और वह तुरंत सो गई। जब वह जागी, तो मैं उसे गोद मेँ उठाया कर वापस लिविंग रूम में ले गया। उसने तर्क देने की कोशिश की कि वह चल सकती है, लेकिन मैंने उसे बताया कि वह हल्की-फुलकी फूल सी है और मैं एक बड़ा, मजबूत आदमी हूँ। इससे वह हँस पड़ी, और उसे खांसी आने लगी।

प्रियंका ने मुझसे कहा था कि श्रेया के लिए अब कोई सुधार नहीं हो सकता है। उसने अपनी दोस्त की देखभाल करने वाले सभी डॉक्टरों से बात की थी, और जिस तरह से कैंसर फैल गया था, उसके बाद उसे अब अस्पताल ही भेजा जा सकता था। श्रेया अस्पताल नहीं जाने के लिए अड़ी हुई थी और प्रियंका भी। मुझे पता था कि यह प्रियंका को नाराज़ कर देगा, लेकिन जब मैं आज सुबह प्रियंका और श्रेया के साथ उसकी अपॉइंटमेंट के लिए गया था, तो मैंने डॉक्टर से बात की थी। उसने मुझे जीवन के अंतिम चरण की देखभाल में विशेषज्ञता रखने वाले एक पुरुष नर्स का संपर्क विवरण दिया था। मैंने नर्स को काम पर रख लिया था, जिसने कहा कि वह दीपावली के ठीक बाद काम शुरू कर देगा। मेरे पास अपनी पत्नी को यह समझाने के लिए दो दिन थे कि यह एक अच्छा विचार है। मुझे नहीं पता था कि वह मेरी मनमानी पर कैसी प्रतिक्रिया देगी, लेकिन श्रेया को आराम देने के लिए सभी तरह की दवाओं और इंजेक्शन्स की ज़रूरत थी, और प्रियंका इसमें मदद नहीं कर पाएगी। यह एक छोटा समुदाय था, इसलिए वहाँ स्वयंसेवक नर्सें नहीं थीं जो मदद कर सकें।

नीलिमा की उंगलियाँ पियानो की चाबियों पर शानदार तरीके से नाच रही थीं, जिससे कमरे में मधुर गीतों की धुनें गूंज रही थीं। ऐसा सुंदर दृश्य था जैसे किसी हॉलिडे कार्ड से लिया गया हो, और इसे देख मेरा दिल खुशी से झूम उठा। जैसे ही नीलिमा एक गाने से दूसरे गाने पर गई उसने मुड़कर अपनी माँ को अपने साथ आने का इशारा किया प्रियंका एक सेकंड के लिए झिझकी, फिर हमारी बेटी के पास जाकर खड़ी हो गई। दोनों ने एक युगल गीत शुरू किया। प्रियंका वास्तव में गायिका नहीं थी, लेकिन उसकी आवाज़ साफ़ और सुंदर थी और वह धुन को अच्छी तरह से गा पाती थी। पियानो की धुन के साथ गीत ने हम सभी को गर्म कंबल की तरह प्यार से लपेट लिया। यह आशा और आश्वासन का गीत था, और हर स्वर हवा में गूंजता हुआ प्रतीत होता था, जो कमरे में मौजूद हर दिल को छू गया था।

श्रेया की आँखें प्रियंका पर टिकी थीं और उनके चेहरे पर शांति का भाव था। यह जानते हुए भी, कि यह उनकी आखिरी दीपावली होगी, वह शांति से भरी हुई थी। मैंने आगे बढ़कर उसका हाथ थाम लिया, इस कदम को उसने हल्की मुस्कान के साथ स्वीकार किया। "तुम्हारी बेटी बहुत खूबसूरत है," श्रेया ने मुझसे कहा "हमारे यहाँ मेहमान आते हैं जो समय-समय पर पियानो का इस्तेमाल करते हैं। प्रियंका हमेशा मुझे बताती थी कि नीलिमा कितना अच्छा बजाती है। मुझे खुशी है कि मैं इसे देख पा रही हूँ..." उसके मरने से पहले! मैं वहाँ बैठा था, इस असाधारण महिला का हाथ थामे हुए जो मेरी पत्नी का परिवार थी। मेरा मन रो रहा था। काश मैंने श्रेया को पहले जानने का प्रयास किया होता, उसकी गहराई को समझा होता। वह वाकई असाधारण थी, और मैंने उसके साथ इतने वर्षों का समय खो दिया था।

दूसरा गाना खत्म हुआ और पूरा कमरा तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। श्रेया की आंखें नम थीं, मेरी भी। संगीत महज नोट्स और बोलों से आगे निकल गया था; यह हम सभी को जोड़ने वाला एक पुल था, जो हमें याद दिलाता था कि वास्तव में जीवन मेँ क्या मायने रखता है। उस पल, उत्सव की सजावट के बीच और दीपावली के पेड़ की कोमल रोशनी के नीचे, हम सिर्फ मेहमान या परिवार या दोस्त नहीं थे, हम एक आदर्श दुनिया का एक छोटा, क्षण भंगुर उदाहरण थे जहाँ प्यार, नुकसान और उम्मीद आपस में जुड़े हुए थे, जिससे हम सभी थोड़े और जुड़े हुए, एक दूसरे को समझ रहे थे। नीलिमा अभी भी बजा ही रही थी जब श्रेया सो गई। मैं उसे गोद मेँ उठाया कर उसके बेडरूम में ले गया और प्रियंका मेरे पीछे-पीछे आई। "धन्यवाद," उसने कृतज्ञता पूर्वक कहा।

"उसका वजन कुछ भी नहीं है," मैंने रुँधे स्वर में कहा। वह दुर्बल हो गई थी क्योंकि कैंसर ने उसके अंदरूनी हिस्से खा लिए थे। इससे मेरा दिल दुख रहा था।

"जानती हूँ।" प्रियंका ने श्रेया को सहज कराया और उसके माथे को चूमा। वह सीधी खड़ी हुई और मेरी तरफ़ देखने लगी। "यह... तुम सभी का यहाँ होना बहुत अच्छा लग रहा है।"

"हम और कहाँ होते, प्रियंका? तुम ही वह सूर्य हो जिसके इर्द-गिर्द हम सब घूमते हैं। हमने भले ही कृतज्ञता न दिखाई हो, लेकिन तुम्हारे बिना, हम सभी ठंडे और खोए हुए थे।"

"अंशुमन -"

"नहीं, बेब, मेरी बात सुनो," मैंने विनती की, इससे पहले कि वह मुझे बता पाती कि उसे मुझ पर विश्वास नहीं है। "मुझे पता है कि मैंने गलती की है। मुझे पता है। और मुझे पता है कि यह एक या दो दीपावली का मामला नहीं है। यह एक जीवन भर का मामला है। मैं...अपनी बाकी की जिंदगी इसकी भरपाई करने वाला हूँ।" वह काफी देर तक श्रेया को देखती रही और फिर मेरी ओर देखने लगी।

"क्या होगा अगर... क्या होगा अगर मैं ऐसा नहीं चाहूँ? अगर मैं आगे बढ़ना चाहूँ?” मेरा दिल टूट गया, और टूटने की आवाज़ मेरे भीतर गूंज उठी। मेरी प्रियंका आगे बढ़ना चाहती थी? कोई दूसरा आदमी ढूँढना चाहती थी? हुँह, ऐसा कुछ नहीं होने वाला था। कभी नहीं। लेकिन एक जंगली इंसान की तरह व्यवहार करने से मुझे कुछ हासिल नहीं होने वाला था - वास्तव में, मैं अपनी इसी सोच की वजह से इस झंझट में था। मुझे लगता था कि मैं सिर्फ़ इसलिए बड़ी हस्ती हूँ क्योंकि मैं मर्द हूँ और घर में पैसे मैं लाता हूँ।

"तो मैं तुम्हें शुभकामनाएं दूंगा, लेकिन मैं तब भी वहीं रहूंगा जहां तुम हो, उम्मीद है कि तुम मुझे एक मौका दोगी।"

"सच में?" उसने पूछा।

"हाँ।" मैंने आह भरी और कहा, "और मैं किसी भी अन्य आदमी को जो तुम में रुचि रखता हो, तुम्हारे लिए अरुचिकर कर दूंगा और सुनिश्चित करूंगा कि वह मेरी पत्नी से दूर रहे।"

वह आँखें मटका कर धीरे से हँसी, और मेरा दिल खिल गया। "अच्छा जी! ऐसा करोगे?"

"हाँ, बेब, मैं ऐसा ही करूँगा।"

प्रियंका ने सुझाव दिया, "चलो श्रेया को सोने दें।"

"प्रियंका? क्या हम बात कर सकते हैं?" मैंने पूछा, उम्मीद करते हुए कि मैं अपनी किस्मत को ज़्यादा नहीं आजमा रहा हूँ।

"हाँ।"

"अब?"

"ठीक है।" 

"धन्यवाद।"