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बुधवार, 11 फ़रवरी 2026

ज़िंदगी अधूरी तेरे बिन - भाग इक्कीस (21)

 

ज़िंदगी अधूरी तेरे बिन - भाग इक्कीस (21)




भाग 21

प्रियंका




"हेलो प्यारी माँ।" मैंने शाश्वत को सुबह की दौड़ के कपड़े पहने रसोई में आते देखा। उसे अंशुमन की ही तरह सुबह दौड़ना पसंद था। मैं जल्दी उठ गई थी; दरअसल, मैं ठीक से सो नहीं पाई थी। इसलिए मैं उठ कर तैरने गई और दिन जल्दी शुरू करने का फैसला किया।

"सुप्रभात, बेबी। भूख लगी है?" उसने ‘न’ मेँ सिर हिलाया और नाश्ते के कोने में बैठ गया। "लेकिन एक कप कॉफी और थोड़ा संतरे का जूस पीने में कोई आपत्ति नहीं है।"

मुझे अपने परिवार की देखभाल करना बहुत पसंद था और यह मेरे लिए एक सपना सच होने जैसा था, कि मैं सनशाइन होम्स की रसोई में यह कर पा रही थी। मैंने उसके सामने उसकी पसंदीदा कम दूध वाली एक कप कॉफी और एक गिलास ताजा संतरे का जूस रख दिया। “तुम जानते हो न, संतरे के जूस के साथ कॉफी नहीं पीनी चाहिए?” मैं मुस्कराती हुई फिर से नाश्ते के पराँठों के लिए आटा सानने लगी। ताज़े गूँथे आटे के सिंकते पराँठों की खुशबू से बढ़कर कुछ नहीं। मुझे हमारे घर, और अब यहाँ भी, यह मधुर खुशबू अच्छी लगती है।

"माँ, क्या आपके पास बात करने का समय है?" शाश्वत ने विनम्रता से पूछा।

"किसी भी समय, बेटा।" मैंने मुस्कराते हुए उसे शर्मीली नज़र से देखा। "बस मुझे इन्हें सेंकने को पाँच मिनट दो, और फिर मैं पूरी तरह से तुम्हारी बात सुन पाऊँगी।" मेरा दिल तेज़ी से धड़कने लगा। मैं इस बात से घबरा रही थी कि वह क्या कहने वाला है। क्या वह कहेगा कि मैं एक बहुत खराब माँ रही हूँ? मेरा सबसे बड़ा डर यह था कि मुझ पर इसका आरोप लगाएगा। या कि मैं एक बुरी पत्नी हूँ। और आखिरकार, अगर वह ऐसा कहता भी है, तो वह गलत नहीं होगा। आखिर मैं अपने संघर्षों के बारे में कोई बात किए बिना घर से भाग गई थी न? मैं एक कप ब्लैक कॉफी लेकर शाश्वत के सामने बैठ गई।

जैसे ही मैंने अपनी कॉफी टेबल पर रखी, मेरे बेटे ने मेरे दोनों हाथ अपने हाथों में ले लिए, जिससे मैं हैरान रह गई। "माँ, मुझे माफ कर दो प्लीज। मुझे बहुत खेद है।"

मैंने आँसू पोंछे। "क्यों, बेबी? तुम्हारे पास माफी मांगने को तो कुछ भी नहीं है-"

"है माँ। मैं जानता हूँ," उसने बीच में ही टोका। "आप एक असाधारण महिला हो। देखो न, आप इस रिसॉर्ट को कैसे चलाती हो; आप ने घर पर भी तो हमेशा यह सुनिश्चित किया कि हमारे घर में वह सब कुछ हो जो हम चाहते थे। हमारे दोस्त हमारे यहाँ आना पसंद करते थे क्योंकि आप सब का इतना ख्याल रखती थी। मैं ......” उसने बोलना बंद कर दिया, और उसकी आँखों में आँसू भर आए जिससे मेरा दिल दुखने लगा "माँ मैं जानता हूँ मैंने.... मैंने आपके साथ बुरा व्यवहार किया है। हमेशा... हमेशा आपको छोटा महसूस कराता, यह कहकर कि.... कि आप कभी यूनिवर्सिटी नहीं गईं। और.... और ..."

"नहीं," मैंने विरोध किया, हमारे हाथ उलझे हुए थे, इसलिए अब मैं उसका हाथ पकड़ सकती थी। "मुझे उच्च शिक्षित न होने की हीन भावना तो है ही। यह तुम पर नहीं है। और —"

"मैं थेरेपी के लिए गया, माँ।" वह फीकी मुस्कान के साथ बोला। "मैं आपके साथ बहुत बुरा व्यवहार करता रहा हूँ। यह मत कहना कि मैंने नहीं किया, क्योंकि यह झूठ होगा।"

मैं अपने बेटे के अतीत को उजागर करके उसे दुख नहीं पहुँचाना चाहती थी, लेकिन वह सही था; मुझे उसके साथ ईमानदार होना था। मैंने अपनी सच्चाई न बताकर खुद पर यह सब लाद लिया था। "हाँ, बेटा, मैं झूठ नहीं बोलूँगी। मुझे बहुत दुख पहुँचता था जब तुमने मेरा मजाक उड़ाते। कि मैंने कोई उद्धरण गलत दिया था, या किसी ऐसी बात के बारे में बात की थी जिसके बारे में तुमने सोचा था कि मुझे उस पर चर्चा करने का अधिकार नहीं है।"

यह ऐसा था जैसे मैं अपनी छाती को चीरकर उसे अंदर देखने दे रही और चोट, घाव, सब कुछ देखने दे रही हूँ। मैंने उसके हाथ छोड़ दिए। ये बातें कहना बहुत मुश्किल था। तब तो और भी मुश्किल, जब मैं उसे छू रही थी। मैं उसे दिलासा देने के अलावा और कुछ नहीं चाहती थी। "यह जानकर दुख होता था कि मेरे बच्चे मेरा सम्मान नहीं करते।" मैंने अंशुमन का ज़िक्र नहीं किया, क्योंकि मैं बच्चों के सामने उसके बारे में कभी बुरा नहीं बोलूँगी।

उसने सिर हिलाया। "मुझे पता है। मैं आपका सम्मान नहीं करता था, माँ, लेकिन...यह मेरी गलती है, आपकी नहीं। असल मेँ मैं - मैं अपनी पढ़ाई मेँ संघर्ष कर रहा हूँ।"

"क्या?" उसने सिर हिलाया और मुझे आत्म-हीनता से भरी आधी मुस्कान दी। "मैं पढ़ाई में संघर्ष कर रहा हूँ। पढ़ाई जितना मैंने सोचा था उससे कहीं ज़्यादा कठिन थी, और मुझे खुद पर शर्म आ रही थी। .... मैंने पापा को नहीं बताया क्योंकि वे एक होशियार आर्किटेक्ट हैं। मुझे नहीं लगता कि मैं कभी इतना अच्छा बन पाऊँगा। नीलिमा डॉक्टर बनने वाली है। इसलिए, खुद को बेहतर महसूस कराने का एकमात्र तरीका था...कि ... कि.... मुझे बहुत खेद है माँ। ... खुद को बेहतर महसूस कराने का एकमात्र तरीका था कि परिवार में कोई और मुझसे भी नीचे हो, ताकि मैं सबसे पीछे न रहूँ।" उसकी ईमानदारी आश्चर्यजनक थी। यह स्पष्ट था कि वह थेरेपी के लिए गया था, मैंने कुछ राहत के साथ सोचा। थेरेपी ने मेरे लिए बहुत बड़ा बदलाव किया था, और मुझे पता था कि इससे उसे मदद मिलेगी।

"किस समस्या से जूझ रहे हो?" मैंने पूछा। वह तीखी हंसी हंसा। "मैंने आपको इतनी चोट पहुंचाई, और आप अभी भी जानना चाहती हो कि मुझे क्या परेशान कर रहा है? माँ क्या आप नहीं देख सकती कि आप कितनी अद्भुत हो? आप बहुत उदार हो, माँ, और मैं लोगों को उनकी अच्छाई के बजाय उनकी शिक्षा और पैसे के आधार पर आंक रहा था। लेकिन आप? आप हम में से सबसे अच्छी हो। आप स्वेच्छा से काम करती हो, हमेशा सबके लिए मौजूद रहती हो। अरे माँ, आप तो बुआ, चाची और यहाँ तक कि दादी के साथ भी विनम्र रहती थीं, जबकि वह आपके साथ बहुत कमीनी थीं।" ये वो शब्द थे जो मैंने कभी नहीं सोचा था कि मैं अपने बच्चों या पति से सुनूँगी। मैंने कभी नहीं सोचा था कि किसी ने भी इस बात पर ध्यान दिया होगा कि मैंने क्या किया, और एक अच्छी माँ और पत्नी बनने के लिए मैंने कितनी मेहनत की। सच तो यह था कि उसने मेरे दिल को थोड़ा हल्का कर दिया था।

"अपनी दादी को ऐसे मत कहो," मैंने धीरे से डांटा।

"वह एक .... थीं" वह बुदबुदाते हुए बोला। "कोई बात नहीं, शाश्वत।" मैंने उसके हाथों पर हाथ रखा। "तुम मेरे बेटे हो, और मैं तुमसे बिना किसी शर्त के प्यार करती हूँ। यह कभी नहीं बदलेगा।" मैंने हल्के से हँसते हुए कहा, अपने लहज़े में मज़ाक करते हुए, "हो सकता है कि ‘पसंद’ समय-समय पर बढ़ती घटती हो, लेकिन मेरा प्यार कभी नहीं घट सकता।"

वह मुस्कराया। "मैं भी आपसे प्यार करता हूँ, माँ। और मुझे बहुत खेद है। मैं वादा करता हूँ कि मैं आपके साथ हर दिन बेहतर बनूँगा, हर दिन।" अब वह एक साफ-सुथरी हंसी हंसा। "हाँ, माँ। मैं आपके सामने भाषा को शालीन रखूँगा।" फिर वह संभला। "आपने ही हमें बड़ा किया है, हमें सही और गलत के बीच का अंतर सिखाया, और फिर भी मैंने बहुत बड़ी गलती की। मुझे इसके लिए खेद है।" मैंने उसका हाथ थपथपाया। "जाने दो शाश्वत। मैं तो भुला भी दिया है। हम आगे देखते हैं, ठीक है? पीछे के बजाय आगे देखने के लिए बहुत कुछ है।"

"मुझे अपने आप को माफ करने में समय लगेगा कि मैं आपके साथ क्या बन गया था, और मैं कभी भी दोषी महसूस करना बंद नहीं करूंगा, लेकिन आखिरकार मैं इसे पीछे छोड़ दूंगा, लेकिन इसके लिए समय लगेगा।"

"जितना समय चाहिए ले लो बेटा। मैं कहीं नहीं जा रही हूँ।" उसने अपनी भौंह उठाई और हाथ घुमा कर याद दिलाया कि हम किस घर में हैं, मैं पहले ही जा चुकी हूँ। मैं हंस पड़ी। "ठीक है, कम से कम भावनात्मक रूप से तो नहीं जा रही।"

"क्या आपको यहाँ रहना पसंद है?" उसने पूछा।

"बहुत ज़्यादा। मुझे यह द्वीप, यह घर बहुत पसंद है। श्रेया... वह रिज़ॉर्ट मेरे लिए छोड़ रही है। सब कागजात साफ़-साफ़ हैं तो चिंता की कोई बात नहीं है।"

"आप... आह... आप यहाँ ही रहना चाहती हैं?"

"हाँ, मैं इस जगह को चलाना चाहती हूँ. मैं इसमें अच्छी भी हूँ। मैं श्रेया की किताबों का ख्याल सालों से रख रही हूँ. उसकी वेबसाइट, बुकिंग और बाकी सब संभालती रही हूँ," मैंने रसोई के चारों ओर और बड़ी खिड़कियों से उगते हुए दिन को देखा. "मुझे यहाँ शांति मिलती है। मुझे जीविकोपार्जन और स्वतंत्र होने का विचार पसंद है।"

शाश्वत ने बताया, "माँ, पैसा तो पापा के पास बहुत है।"

मैंने गहरी साँस ली और कहा, "यह तुम्हारे पापा का पैसा है, शाश्वत, मेरा नहीं।"

"यह क्या बात हुई? यह सब आपका ही पैसा है। आपकी शादी को बीस साल हो गए हैं।"

"और हमारे विवाह-पूर्व समझौते में स्पष्ट रूप से कहा गया था कि अगर मैं छोड़ जाऊँ, तो मुझे कुछ नहीं मिलेगा। और मुझे इससे कोई परेशानी भी नहीं है। मुझे कुछ नहीं चाहिए। मेरे पास तुम और नीलिमा हैं; मुझे और क्या चाहिए?" इस बातचीत से असहज महसूस करते हुए, मैं उठकर रसोई मेँ दूसरी ओर चली गई।

"माँ, पापा आपको निश्चित ही पैसे देंगे," शाश्वत ने विश्वास से कहा। मैंने कल रात फ्रिज में रखा दही का बड़ा कटोरा निकाला। मैं अपना दही खुद बनाती थी, मलाईदार। यह दुकान से खरीदे गए दही से बेहतर था, और मेहमानों को बहुत पसंद था। "माँ?" शाश्वत ने पूछा।

"प्रिय, कुछ बातें तुम्हारे पापा और मेरे बीच हैं, ठीक है? बस इतना जान लो कि मेरा ख्याल रखा जाएगा चाहे कुछ भी हो। तुम्हारे पापा और मैं दोनों ही तुमसे बिना किसी शर्त के प्यार करते हैं, चाहे हमारी वैवाहिक स्थिति कुछ भी हो।"

शाश्वत ने सिर झुका लिया, "आप सचमुच पापा को छोड़ दोगी माँ?"

"मैंने पहले ही छोड़ चुकी हूँ, शाश्वत," मैंने उसे याद दिलाया। "मैं उस जीवन में वापस नहीं जाने वाली हूँ। मैं... मुझे नहीं पता कि मुझे इस बारे में तुमसे बात करनी चाहिए या नहीं। यह तुम्हारा, इस उम्र का, बोझ नहीं है।" .....

"लेकिन मैं जानना चाहता हूँ," शाश्वत ने जोर देकर कहा।

मैंने दही के कटोरे में थोड़ी गाढ़ी मलाई डाली और उसे धीरे-धीरे फेंटना शुरू किया। "जब सभी घर पर थे, तो सब ठीक था, अच्छा भी, कभी-कभी बढ़िया भी। बस उतार-चढ़ाव आते रहते थे। लेकिन उसके बाद, मुझे ऐसा लगा कि मैं गायब हो रही हूँ, अदृश्य सी।"

"पापा ने मुझे बताया कि जब हम घर पर होते थे, तो वे हमेशा रात के खाने के लिए आते थे, लेकिन हमारे जाने के बाद वे अधिक से अधिक घंटों तक काम करने लगे।" मैंने भौंहें उठाईं। अंशुमन कभी किसी से अपनी भावनाओं के बारे में बात नहीं करता था। शाश्वत मुस्कराया। "कल जब हम यहाँ आये तो हमारी काफी लंबी बातचीत हुई। पापा जानते हैं कि उन्होंने बहुत बड़ी गलती की है। कि उन्होंने आपको बहुत अकेला महसूस कराया है।"

"कोई भी आपके साथ ऐसा नहीं कर सकता; यह आप खुद के साथ करते हैं," मैंने झट से कहा। जैसे ही अंशुमन का नाम बातचीत में शामिल हुआ, मेरी शांति और ठंडक गर्म तवे पर पड़े पानी की तरह वाष्पित हो गई। "क्योंकि तुम उससे नाराज हो, प्रियंका। उससे बहुत नाराज हो और यह उचित भी है," डॉ. मिश्रा ने हमारे नवीनतम टेलीथेरेपी सत्र में कहा था।

मैंने आपत्ति जताते हुए कहा था, "मैं क्रोध को अपने अंदर नहीं रखती। मैं ऐसी नहीं हूं।"

“प्रियंका, हम सब ऐसे ही हैं। हो सकता है कि आपके पति ने कोई गलत काम न किया हो, लेकिन उन्होंने जो किया, वह आपको अपने साथ विश्वासघात जैसा लगता है। ऐसा, जैसे उन्होंने आपकी शादी मेँ हर कदम पर आपको अकेला छोड़ दिया, और आपने अकेले ही सभी समझौते किए। आपने एक अच्छी पत्नी बनने के लिए कड़ी मेहनत की, लेकिन आपकी नज़र में उन्होंने एक अच्छा पति बनने के लिए कुछ नहीं किया।"

"वह अधिकांश समय एक अच्छे पति थे," मैंने बचाव करते हुए कहा।

"कोई भी व्यक्ति पूरी तरह से अच्छा या बुरा नहीं होता, प्रियंका। यह ज़रूरतों को पूरा करने के बारे में है। जब से बच्चे चले गए, आपकी ज़रूरतें बदल गईं, और उनकी भी। आप अभी भी उसकी ज़रूरतें पूरी कर रही हैं, लेकिन वह आपकी ज़रूरतें पूरी नहीं कर रहे हैं, और जब तक आप खुद उन्हें नहीं बताएंगी, तब तक उन्हें यह पता नहीं चलेगा।"

"लेकिन अब बहुत देर हो चुकी है, है न?"

"लोगों को यह बताने में कभी देर नहीं होती कि आप उनकी परवाह करते हैं और वे आप पर क्या प्रभाव डालते हैं। चाहे आपकी शादी में कुछ भी हो, आप दोनों को एक-दूसरे से ईमानदारी से बात करनी चाहिए।"

लेकिन मैंने बात नहीं की थी। मैं जानती थी कि बात करने पर वह मुझे नजरअंदाज कर देगा और मुझे और चोट लगेगी। मैं एक कायर की तरह बिना बात किए निकल पड़ी थी। यदि मैंने बात की होती तो? क्या हुआ होता? क्या वह समझता? क्या हमारी शादी किसी और मोड पर खड़ी होती? उसने उस दिन फोन पर जैसे मुझसे बात की थी उससे तो नहीं लगता। लेकिन फिर वह यहाँ भी तो आया है न? यह भी तो वही है न? उफ्फ़, अनंत प्रश्न चिन्ह थे। लेकिन ......

सोमवार, 9 फ़रवरी 2026

ज़िंदगी अधूरी तेरे बिन - भाग बीस (20)

 

ज़िंदगी अधूरी तेरे बिन - भाग बीस (20)



भाग 20

अंशुमन




वह बहुत खूबसूरत लग रही थी, मेज़ के किनारे, रसोई के दरवाज़े के पास बैठी हुई। बिल्कुल वैसे ही जैसे वह हमारे घर पर होती थी। वह, अपने अनूठे मीठे अंदाज से, सब की सेवा कर रही थी। अद्भुत भोजन और वह भी इस शालीनता के साथ।

इन्द्र, गीतिका और शाश्वत की तुरंत ही अच्छी दोस्ती हो गई थी। इंद्र मैकेनिकल इंजीनियरिंग में मास्टर्स कर रहा था, जबकि गीतिका एस्ट्रोफिजिक्स में। वे होशियार युवा बच्चे थे, शाश्वत से कुछ साल बड़े। दूसरा जोड़ा बड़ी उम्र का था, पचास के करीब। उनके बच्चे नहीं थे, वे हर साल दीपावली पर रिज़ॉर्ट आते थे। वे श्रेया से हंस बोल कर बात कर रहे थे, जिसे वे कई सालों से जानते थे। वह कमज़ोर और थकी हुई दिख रही थी, लेकिन उसका हंसमुख स्वभाव अब भी झलक रहा था। प्रियंका अपनी दोस्त की देखभाल बिना किसी परेशानी और सहजता के करती। मानो उन दोनों के बीच सालों से एक-दूसरे को जानने की वजह से एक लय थी। मैंने श्रेया को जानने की कोशिश क्यों नहीं की, जो मेरी पत्नी के लिए इतनी मायने रखती थी? मेरे अंदर पछतावा उबल रहा था, कच्चा और आंतरिक।

कुछ दिन पहले जब मैंने श्रेया को फोन किया तो वह उदास थी, लेकिन दृढ़ भी थी। "हम एक दूसरे को अच्छी तरह से नहीं जानते, अंशुमन। लेकिन मैं प्रियंका को उतना ही जानती हूँ जितना कि मैं खुद को जानती हूँ। तुमने उसके अंदर कुछ मार दिया है। उससे उसकी खुशियाँ छीन ली हैं," उसने मुझे साफ़-साफ़ कहा था।

"मुझे तो यह भी एहसास नहीं था कि मैं क्या कर रहा था," मैंने कबूल किया। "लेकिन मैं उससे प्यार करता हूँ, श्रेया। मेरी जिंदगी से भी ज्यादा उससे प्यार करता हूँ।“

"साबित करो," उसने कहा। "मेरे जाने से पहले इस प्यार को साबित करो। मैं उसे अकेले नहीं देखना चाहती। मैं चाहती हूँ कि उसके बच्चे उसका सम्मान करें और उसका पति उसका ध्यान रखे। क्या तुम यह कर सकते हो अंशुमन?"

"हां, मैं अपनी और अपने बच्चों की ओर से वादा करता हूं।"

"ठीक है।"

"ठीक है? मैंने सोचा था कि तुम इससे ज्यादा विरोध करोगी?" मैंने चकित होकर कहा।

"मैं मर रही हूँ, अंशुमन। मेरे पास ज्यादा विरोध का समय कहाँ है? क्या प्रियंका ने तुम्हें बताया नहीं है?"

"हां मैम, बताया है।"

"मैं अपनी दोस्त को खुश देखना चाहती हूँ। अभी तो वह सोचती है कि वह तुम्हारे बिना अपना जीवन बना लेगी। लेकिन वह तुमसे बहुत प्यार करती है, अपने बच्चों से बहुत प्यार करती है। यह अंततः उसे तोड़ देगा। वह अभी मेरे बारे में इतनी चिंतित है कि ठीक से सोच नहीं पा रही, लेकिन मेरे जाने के बाद ---" श्रेया को खांसी आने लगी और उसे दोबारा बोलने में तीन मिनट से ज्यादा समय लगा। "जब तुम वापस आओ, तो कारण समझ कर आना कि तुम अपनी शादी क्यों बचाना चाहते हो? उसे सच्चा कारण समझ मेँ आना चाहिए। क्या तुम्हें पता है कि क्यों बचाना है?" मैंने मूर्खता पूर्ण तरीके से सिर हिलाया, हालाँकि वह फोन पर मुझे देख नहीं सकती थी। "मैं उससे प्यार करता हूँ," मैंने अचानक कहा।

"यह कहना भर तो काफी नहीं होगा," उसने कहा। "जब तुम यहाँ आओ तो तुम्हारे पास इससे ज़्यादा कुछ होना चाहिए।"

"मैं यह सुनिश्चित करूंगा।"

मैं आभारी था कि श्रेया ने मेरे परिवार और मुझे सुधार करने का एक मौका दिया। मैं राव-सिन्हा-आर्किटेक्ट्स-एण्ड-बिल्डर्स को एक साम्राज्य बनाने में इतना व्यस्त कैसे हो गया कि मैं अपनी सम्राज्ञी का ही ख्याल रखना भूल गया? मैं पैसे के पीछे नहीं भाग रहा था, पैसा तो हमारे पास पहले ही बहुत था - नहीं, मैं सफलता के जुनून के पीछे भाग रहा था। मैं कंपनी को उससे भी बड़ा और बेहतर बनाना चाहता था, जितना मेरे पिता सोच सकते थे। उन्हें यह दिखाने का कि मैं उनसे बेहतर था। और वे तो अब जा ही चुके थे, और इससे कोई फर्क नहीं पड़ता था कि मैं व्यवसाय में उससे बेहतर था या नहीं। कम से कम माँ ने तो उन्हें कभी नहीं छोड़ा था जैसे मेरी पत्नी ने मुझे छोड़ दिया था। तो, हम दोनों मेँ कौन हारा था?

"दुर्भाग्य से, मेरे पार्टी के दिन खत्म हो गए हैं।" श्रेया उठ खड़ी हुई और प्रियंका तुरंत उसके पास आ गई। श्रेया ने उसका हाथ दूर धकेल दिया। "तुम अपना खाना खत्म किया बिना ही उठ जाओगी, प्रियंका?" प्रियंका ने आँखें घुमाईं। "और तुम मेरी तरफ़ आँखें भी मत घुमाना," उसने बुदबुदाते हुए कहा। उसने सीधे मेरी तरफ़ देखा। "अंशुमन, क्या तुम मुझे मेरे कमरे तक ले जा सकते हो?" मेरी पत्नी ने अपनी सहेली को घूरकर देखा और श्रेया ने अपनी जीभ बाहर निकाली। मैं मुस्करा दिया। उसने मुझे चेतावनी भरी नज़र से देखा और कहा, मेरी सहेली को परेशान मत करना, और शाश्वत के पास वापस बैठ गई। मैंने श्रेया के लिए अपना हाथ बढ़ाया और उसने अपना कमजोर हाथ मेरी कोहनी पर रखते हुए नाक सिकोड़ी। जब हम उसके कमरे में पहुंचे तो वह बिस्तर पर बैठ गई और भारी साँसें लेने लगी। मैंने उसे तकिए के सहारे लिटाया और ऊपर रजाई डाल दी। उसने ऊनी टोपी पहनी हुई थी। मुझे कैंसर के बारे में पता था; मेरे कुछ रिश्तेदार इससे पीड़ित थे। मुझे पता था कि कीमो शरीर की आंतरिक तापमान को नियंत्रित करने की क्षमता को प्रभावित करता है। "क्या आपको ठंड लग रही हैं?"

उसने सिर हिलाया "मुझे आप नहीं, तुम कहो। मैं प्रियंका की परिवार हूँ, तो तुम्हारी भी। हाँ, मुझे अभी ठंड लग रही है, लेकिन एक मिनट रुको; फिर मुझे गर्मी लग रही होगी" मैंने उसके बिस्तर के पास चिमनी के पास रखी एक कुर्सी खींच ली।

उस ने धीरे से कहा, "प्रियंका ने मुझे चिमनी वाला कमरा देने पर जोर दिया था।"

"उसे चिमनी पसंद है।"

श्रेया ने हंसते हुए कहा, "जब हम बड़े हो रहे थे, तो सर्दियों में तापमान बहुत गिर जाता था। उसकी माँ भगवान जाने कहाँ चली जाती थी और मेरे माता-पिता शराब के नशे में धुत रहते थे। हमें बहुत ठंड लगती थी। हम बिस्तर पर एक साथ लिपटे रहते थे और गर्म रहने के लिए अपने सारे कपड़े पहन लेते थे।"

मैंने सिर हिलाया. "हाँ, मुझे पता है। उसने मुझे बताया था।"

"उसने तुम्हें बताया कि कैसे एक बार उसकी माँ के साथ वाले एक आदमी ने मेरे साथ कुछ करने की कोशिश की थी?" मैंने अपना सिर हिलाया। "हाँ। हमारी प्रियंका ने उसे सॉस पैन से बुरी तरह पीट दिया था।"

"आप लोग तब किस उम्र के थे?"

"बारह।" श्रेया की साँस थोड़ी उखड़ी हुई थी। उफ्फ़, मेरी प्रियंका ने बचपन में क्या-क्या झेला होगा। उसने मुझे कुछ कहानियाँ सुनाईं, लेकिन स्पष्ट रूप से, उसने मुझे सब कुछ नहीं बताया। एक समय था, जब हम करीब थे और अपनी शादी के दौरान कभी-कभी फिर से जुड़ जाते थे। लेकिन हमने कम उम्र में ही शादी कर ली थी - मैं अभी भी पढ़ रहा था, और उसके पास सम्हालने के लिए जुड़वाँ बच्चे थे। हमें कभी भी एक-दूसरे को जानने का मौका भी नहीं मिला, जैसा कि अन्य जोड़ों को मिलता है। इसके बजाय, हम एक पल में एक परिवार बन गए। मेरे माता-पिता के घर में रहने के कारण तनाव और ज्यादा रहता था। प्रियंका वहाँ कभी सहज नहीं थी, और ईमानदारी से कहूँ तो मैं अपनी डिग्री हासिल करने से पहले अलग घर बसाने के लिए तैयार नहीं था। जब मैंने अपनी कंपनी में काम करना शुरू किया, तो हम अलग घर मेँ चले गए। माँ बहुत नाराज़ हुई थीं, लेकिन जब मैंने उनसे कहा कि मुझे जगह की ज़रूरत है, तो वे नरम पड़ गईं। अगर मैं उनसे कहता कि प्रियंका दुखी है, तो वे कभी सहमत नहीं होतीं। लेकिन वह दुखी थी, और मैंने आखिरकार यह देख ही लिया था। हालाँकि, मुझे इसमें थोड़ा समय लगा। मैं रो पड़ा। मैंने कैसे चीजों को इतना आगे बढ़ने दिया कि मेरी पत्नी इतनी उदास हो गई थी? यह कमबख्त मेरी ही गलती थी। अगर उसने मुझे माफ़ नहीं किया, और मैं उसे वापस नहीं जीत सका, तो मैं इसी का हकदार था।

"अच्छा। मैं चाहती हूँ कि तुम चाहे कुछ भी कर के उसका हालचाल पूछते रहो।"

"क्या वह मुझसे बात करेगी?" मैंने पूछा।

"अगर तुम उसके साथ ईमानदारी से बात करोगे, तो हाँ। लेकिन वह अब तुम्हें अपने ऊपर हावी नहीं होने देगी," उसने मुझे चेतावनी दी। "वह दबने-झुकने वाली प्रियंका अब चली गई है। थेरेपी और एंटी-डिप्रेसेंट के बीच, वह दिन-ब-दिन मजबूत होती जा रही है।" वह एंटी-डिप्रेसेंट ले रही थी और मुझे यह पता नहीं चला था।

"मैंने इसकी झलक देखी है।" मैं हंसा।

"और क्या तुम अब भी उसे चाहते हो?

मैं मुस्कराया "हाँ ...."

"वह अब तुम्हारी दासी नहीं बनी रहेगी, अंशुमन ।"

इससे मैं परेशान हो गया। "वह दासी नहीं है। मैं---" श्रेया ने मुझे चुप कराने के लिए हाथ उठाया। मैंने वैसा ही किया।

वह हंस पड़ी। "यह ‘मैं मर रही हूँ’ का कार्ड कमाल का है। मैं इसे निकालती हूँ, और हर कोई हार जाता है। हाँ अंशुमन, तुम्हारी और तुम्हारे परिवार की नजर मेँ वह तुम्हारी दासी थी, यह कड़वा सच है। उस सच्चाई को हम न झुठलाएं। यह सिर्फ़ तुम्हारी गलती नहीं है; हालाँकि, तुमने बहुत गड़बड़ की है। प्रियंका ने खुद भी कभी अपनी खुद की कीमत नहीं समझी। ज़रूर, अपने प्रियजनों की रक्षा के लिए, वह किसी के सिर पर सॉस पैन मार सकती है, लेकिन जब बात खुद की आती है, तो वह मान लेती है कि उसके साथ अच्छी चीजें नहीं होती।" श्रेया प्रियंका की आत्मा की आवाज की तरह थी, और मैं कोशिश कर रहा था कि जितना संभव हो सके उतना उसे जान सकूँ, ताकि मैं अपनी पत्नी को वापस पा सकूं। "तुमने उससे शादी कर ली, और वह आभारी थी। मैं आभारी थी। तुम्हारी माँ, भगवान उसकी आत्मा को शांति दे, एक कमीनी औरत थी।" मैं खुद को रोक नहीं सका, हंस पड़ा। मेरी माँ के बारे मेँ निश्चित रूप से यह सही था। "वह हर समय प्रियंका को धमकाती रहती थी।" मैंने अपनी आँखें बंद कर लीं; ये शब्द सुनना, ये बातें सुनना मेरे लिए बहुत दर्दनाक था। मैंने इसे न तो देखा था और न ही सुना था, लेकिन मैं जानता था। मैंने प्रियंका को अकेले ही अपनी माँ का सामना करने दिया, घर संभालने दिया, जैसा कि एक अच्छी पत्नी को करना चाहिए, और इसे अपनी समस्या कभी नहीं समझा। "तुमने उसकी अपनी चुड़ैल माँ से कभी रक्षा नहीं की।"

"हाँ श्रेया, जानता हूँ। मैंने नहीं किया।" ये शब्द तेज़ाब की तरह थे, लेकिन सच थे।

"क्यों?"

मैंने भी इस बारे में बहुत सोचा था और कुछ-कुछ समझ पाया था, जिसे मैं श्रेया के साथ साझा करने में खुश था, भले ही इससे मेरी छवि खराब हो।

"जब मैं बच्चा था, तो मुझे अपने माता-पिता से डर लगता था। बड़े होने के बाद भी, मैं उनके साथ कोई भी टकराव नहीं करना चाहता था। मैंने अपने आप ही यह तय कर लिया कि प्रियंका उन्हें अच्छे से संभाल सकती है," मैंने कहा, और फिर जोड़ा, "श्रेया, मैं बहुत डरपोक था, और आलसी भी। मैं बस संघर्ष नहीं चाहता था। मेरे पास प्रियंका को मनाने के तरीके तो थे; लेकिन अपने माता-पिता के साथ विवाद सुलझाने का कोई तरीका नहीं था। बस इसलिए मैं कायर की तरह उसे अकेला छोड़ कर पीछे रहता था।"

"हह्मम्म। उसके माता-पिता नहीं थे, तुम्हारे थे। और फिर भी, तुम दोनों को ही नुकसान हुआ है, क्योंकि तुम दोनों को ही उन लोगों का प्यार नहीं मिला जो बड़े होने के दौरान मिलना चाहिए था, जो लोग तुम्हें सबसे ज़्यादा प्यार करने वाले होने चाहिए थे।" वह मुस्कराई “मैं थोड़े समय के लिए थेरेपी में गई थी, इसलिए मुझे थेरेपी की भाषा का ज्ञान हो गया है।" मेरे पास आर्थिक सुरक्षा थी, लेकिन बड़े होते हुए मुझे प्यार नहीं मिला। वैसा नहीं जैसा मेरे बच्चों को प्रियंका से मिला। "वह तुम्हारे साथ खुश थी। मेरा मतलब है, सभी जोड़ों के बीच कुछ न कुछ होता रहता है। मेरा पति मुझे मारता था। दुर्भाग्य से, प्रियंका उसका सिर फोड़ने के लिए वहां नहीं थी। लेकिन पुलिस ने मेरे लिए यह किया, इसलिए यह बहुत बुरा नहीं था। लेकिन..." श्रेया ने अपनी आँखें बंद कर लीं और बोलना बंद कर दिया। वह थकी हुई थी और मुझे लगा कि वह बीच वाक्य में ही सो गई। मैं उठने ही वाला था कि मैंने उसे सुना, "लेकिन जब बच्चे बड़े हो गए - तो वे ऐसे घमंडी मूर्ख बन गए जो अपनी माँ के साथ ऐसा व्यवहार करने लगे, जैसे माँ बेवकूफ हो। और तुम इसे बढ़ावा देते रहे।"

"हाँ, मैम।" मेरे पास और कोई जवाब नहीं था।

"यह पहले ही शुरू हो चुका था, लेकिन बच्चों के पढ़ने बाहर चले जाने के बाद यह और तीव्र हो गया। वह ज़्यादातर समय तुम्हारे साथ खुश ही थी अंशुमन। मैं चाहती हूँ कि वह फिर से खुश रहे। बच्चे अब चले गए हैं, अंशुमन, इसलिए तुम्हें ही आगे आना होगा।"

"मैं करूँगा। मैं... मैंने कंपनी किसी और के हाथों में छोड़ दी है। मैं कम से कम छह महीने के लिए यहाँ हूँ," और फिर, क्योंकि मुझे यह पता था, मैंने कहा, "सच कहूं तो, मुझे लगता है इससे अधिक समय लगेगा, यदि ऐसा हो तो मैं और रहने के लिए मन से तैयार हूँ।"

श्रेया ने आँखें बंद करके सिर हिलाया। "मैंने उसके लिए अपनी वसीयत मेँ यह रिज़ॉर्ट छोड़ दिया है।" मुझे अंदाज़ा था। "वह तुम से पैसे नहीं लेगी, और मेरे पास बस इतना ही है। मैं चाहती हूं कि वह आर्थिक रूप से सुरक्षित रहे।" मेरी आँखों में आँसू भर आए और मेरे गालों पर लुढ़क गए। मेरे पास करोड़ों रुपए थे, और मेरी पत्नी को उसकी सहेली आर्थिक सुरक्षा दे रही थी। अगर अमीर होने का अर्थ दिल का आकार हो, तो श्रेया सबसे अमीर व्यक्ति थी जिसे मैं जानता था। "लेकिन ध्यान रखना वह अपना परिवार न खो दे, ठीक है?"

"मैं वादा करता हूँ, श्रेया।" वह मुस्कराई और सो गई। मैं उसके बिस्तर के पास बैठा, उसे देखता और सोचता रहा। आधे घंटे बाद, मैंने रोशनी कम कर दी और अपनी पत्नी की अदम्य मित्र को आराम करने के लिए छोड़ दिया।