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शुक्रवार, 6 मार्च 2026

ज़िंदगी अधूरी तेरे बिन - भाग तीस (30)

 

 ज़िंदगी अधूरी तेरे बिन - भाग तीस (30)


भाग 30

अंशुमन




दीपावली के बाद मेहमान लौट गए थे। बच्चे भी जा चुके थे। प्रियंका ने अभी के लिए रिज़ॉर्ट बंद किया हुआ था, क्योंकि वह अभी किसी भी तरह से व्यस्त नहीं रहना चाहती थी। वह श्रेया के साथ समय गुजारना चाहती थी; जो मेहमानों के रहते संभव नहीं होता, खासतौर पर क्रिसमस और नव वर्ष के समय।

श्रेया को सम्हालने मेँ मदद के लिए एक अंतिम चरण के नर्स को रखने के निर्णय ने हमें राहत के साथ कड़वी वास्तविकता की याद भी दिलाई, जिसका हम सामना कर रहे थे। विजय मध्यम आयु का व्यक्ति था, सौम्य व्यवहार, सक्षम और संवेदनशील। वह हर सुबह सूरज की पहली किरण के साथ आता, और एक मुस्कान से हमारा अभिवादन कर के श्रेया की देखभाल में जुट जाता। उसकी उपस्थिति हमारे दैनिक जीवन की बदलती परिस्थितियों में एक सुकून लाई थी। वह अपने कर्तव्यों को सावधानी से करता, दवाओं का प्रबंधन करता और श्रेया के आराम का स्तर की निगरानी करता। वह अपना हर काम बखूबी कर रहा था, जिसमें वह वर्षों से विशेषज्ञता रखता था। श्रेया के साथ उसका व्यवहार नर्म और अपनत्व भरा था, बातचीत विनम्र थी, जो उसकी वास्तविकता की कठोरता को कम करती थी।

प्रियंका और मैं अक्सर दिन भर श्रेया का साथ बैठते, उसका साथ देते, कहानियाँ साझा करते, या बस उस शांतिपूर्ण मौन मेँ रहते, जिसे बनाए रखने में विजय ने मदद की थी। प्रियंका की तरह श्रेया के साथ बैठने की अब मेरी बारी थी। कुछ ही दिनों में वह मेरी भी दोस्त बन गई। एक रात जब मैं श्रेया का साथ था, तो उसने मुझसे कहा, "वह तुम्हारे लिए कुछ भी कर सकती है।" वह लेटी हुई थी और मैं उसका बगल में बैठ गया। मैंने उसका हाथ वैसे पकड़ा जैसे मैंने प्रियंका को करते देखा था। "वह तुमसे बहुत प्यार करती है।"

"मैं जानता हूँ” .... “लेकिन उसे तब ही अपने लिए कुछ करने देना, जब तुम्हें लगे कि तुम इस लायक हो।" मैंने श्रेया का माथा को चूमा, काश कि वह जीवित रहे और मेरे पास रहे ताकि मुझे उसे जानने का मौका मिले; उसे अपने जीवन में शामिल करूँ, उससे सीखूँ। लेकिन विजय ने हमें बताया था कि यह अब कुछ ही हफ़्तों की बात है।

"मैं हर संभव प्रयास करूंगा," मैंने वादा किया।

"हम अतीत को ठीक नहीं कर सकते, अंशुमन। केवल वर्तमान को सुधारने और भविष्य को बेहतर बनाने का लिए कड़ी मेहनत कर सकते हैं।" मेरे दिल में उसके लिए बहुत सम्मान था। वह पक्का करना चाहती थी कि उसके जाने का बाद उसकी दोस्त का ख्याल रखा जाए। "तुम्हें उसके लिए उसकी ‘श्रेया’ बनना होगा" कहते हुए वह सो गई थी।

"मैं वादा करता हूँ।" विजय कमरे में वापस आया, और मैंने उसे सिर हिलाकर संकेत दिया। "वह सो गई है।"

"हाँ, वे थक गई हैं।" और उसका शरीर बंद हो रहा है, मैंने सोचा। विजय सक्षम था, और जब मैंने उसे श्रेया की देखभाल करते देखा, तो मैं उसकी करुणा की गहराई और उसकी लाई गई सूक्ष्म शक्ति से दंग रह जाता था। वह सिर्फ नर्स भर नहीं था; वह उस गरिमा का संरक्षक था जिसका हर कैंसर से लड़ता मरीज अपने अंतिम दिनों में हकदार होता है।

जैसे-जैसे शाम होने लगी और सूर्यास्त की सुनहरी छटा आसमान में फैलने लगी, विजय ने अपना सामान पैक कर लिया। वह हमेशा प्रियंका और मुझसे बात करने का लिए कुछ समय निकालता, हालातों की जानकारी और सौम्य आश्वासन देता और धैर्य और सहानुभूति से हमारे प्रश्नों का उत्तर देता। आज भी कुछ अलग नहीं था। "वे सहज हैं।" उसने हमें बताया, उसकी आवाज़ धीमी और शांत थी। "और अच्छी मनोदशा में हैं। यह अच्छा है कि आप लोग उन के साथ यहाँ हैं; इसका मतलब उससे कहीं ज़्यादा है जितना आप लोग सोच भी सकते हैं।" मैंने, उन शब्दों का वजन महसूस करते हुए सिर हिलाया। "धन्यवाद, विजय," मैंने कहा।

“आप श्रेया के लिए जो करते हैं उसके लिए धन्यवाद।” प्रियंका ने उसे गले लगा लिया।

विजय की अनुपस्थिति में घर चुप लग रहा था। हमारे चारों ओर का स्थान श्रेया का साथ बिताए गए समय के महत्व से भरा हुआ था। मैंने प्रियंका की तरफ देखा, उसके चेहरे पर प्यार और दुख दोनों था और वह श्रेया का कमरे की तरफ देख रही थी। आगे बढ़ते हुए, मैंने उसका हाथ थाम लिया, उसके स्पर्श की कंपन को महसूस किया। हम साथ-साथ श्रेया का पास वापस बैठ गए, हमारे चारों ओर का सन्नाटा खाली नहीं था, बल्कि अनकहे शब्दों और साझा दिल की धड़कनों से भरा हुआ था, हर पल पिछले पल से ज़्यादा कीमती था।



वर्ष का अंतिम दिन की अंतिम रोशनी फीकी पड़ रही थी, जब प्रियंका और मैं नवनिर्मित दीवार का पास खड़े समुद्र की ओर देख रहे थे। ताजी हवा में नमक की खुशबू और नए साल का वादा था। विजय श्रेया का साथ अंदर था, और प्रियंका मुझे दीवार पर काम खत्म करते देखने आई थी। "तुम इन कपड़ों मेँ बहुत सेक्सी लग रहे हो" उसने मुस्करा कर खुद से फुसफुसाया, लेकिन मैं सुन पाया था।

“अच्छा? तुम कहो तो मैं हर वक्त ये ही पहना करूँ?” उसने खुद ही मुझ पर हाथ रखा। यह अंतरंग था। हम पहले वाली स्थितियों मेँ वापस नहीं आए थे, लेकिन अब मुझे उम्मीद हो चली थी कि शायद वापस आ सकते हैं। काश, पहले भी हम इसी तरह बातें करते होते, जैसे अब करते हैं। लेकिन पुरानी बातें हमेशा वर्तमान से कहीं अधिक स्पष्ट होती हैं।

प्रियंका की आँखें क्षितिज को देखते हुए चिंतनशील थीं, जहाँ आकाश गोधूलि रंगों की बौछार में समुद्र से मिल रहा था। "मैं यहीं रहना चाहती हूँ, अंशुमन," उसने अचानक कहा, उसकी आवाज़ दृढ़ थी, फिर भी विनम्र "मैं यहाँ, इस रिसॉर्ट में, इस द्वीप पर जीना चाहती हूँ।" इन शब्दों ने मुझे चकित नहीं किया; मैंने उसे यहां जीवंत होते देखा था, जो मैंने वर्षों से नहीं देखा था। मैं कुदाल को नीचे रखा और उसके पास चला गया।

"ठीक है," मैंने जवाब दिया, मेरा हाथ उसका हाथ पर था, हमारी उंगलियाँ स्वाभाविक रूप से एक दूसरे में उलझ गईं। "फिर मैं भी तुम्हारे साथ यहीं रहूँगा।" वह मेरी ओर देखने लगी, उसकी आँखों में आश्चर्य और अनकहे सवाल थे। मैंने गहरी साँस ली और पिछले कुछ दिनों से मेरे मन में जो चल रहा था, उसे साझा करने के लिए तैयार हो गया। "प्रियंका, मैं इस बारे में बहुत सोचता रहा कि मेरे लिए क्या असल मायने रखता है। मैं वर्षों काम में डूबे रहकर सही मायने में जीने से वंचित रह गया। मैं सिर्फ़ चालीस साल का हूँ, रिटायर होने के लिए बहुत छोटा हूँ, लेकिन अब बदलाव का समय आ गया है।"

"क्या?" उसने मेरी ओर देखा और फिर अपना सिर हिलाया जैसे कि मैं कोई भूत-प्रेत हूँ। लहरें धीरे-धीरे किनारे से टकरा रही थीं, हमारी बातचीत का लिए एक सौम्य पृष्ठभूमि बना रही थी। मैंने उसका मुंह धीरे से चूमा क्योंकि उसने मुझे ऐसा करने दिया, और हर बार जब वह ऐसा करती, तो वह मेरे लिए सूर्योदय की किरणों की तरह होती।

"मैं कंपनी का रोज़मर्रा का कामों से पीछे हटने पर सोच रहा हूँ, ताकि प्रभाकर को कार्यकारी सीईओ और अध्यक्ष पद पर नियुक्त किया जा सके," मैंने आगे कहा। "मैं इसके बजाय बोर्ड के सीनियर सदस्य का रूप में अपनी भूमिका निभाऊँगा, और सिर्फ़ कुछ चुनिंदा प्रोजेक्ट संभालूँगा। इससे मुझे ज़्यादा खाली समय मिलेगा, प्रियंका। यहाँ, तुम्हारे साथ, इस रिज़ॉर्ट का हिस्सा बनने, जीने का समय।" प्रियंका की आँखें मेरी आँखों में कुछ तलाश कर रही थीं, निश्चितता की तलाश, शायद उस आदमी का संकेत भी जिसे वह जानती थी, जिसने कभी ऐसे विचार मन में नहीं लाए होंगे। "तुम बाद मेँ मुझसे नाराज़ हो जाओगे। मैं बस यह जानती हूँ," उसने कहा, उसकी आवाज़ एक पीड़ा भरी फुसफुसाहट थी।

"भविष्य में क्या होगा, इसका मैं वादा नहीं कर सकता; कोई भी नहीं कर सकता। लेकिन मैं गारंटी दे सकता हूँ कि मैं इसके लिए कभी भी तुम से नाराज़ नहीं होऊँगा। मैं खुद भी यही चाहता हूँ" मैंने उसे आश्वस्त करने की कोशिश की। "यहाँ बिताए इन दिनों ने मुझे दिखाया है कि मैंने कितना कुछ खो दिया है। मैं एक दिन पीछे मुड़कर देखते हुए यह महसूस नहीं करना चाहता कि मैंने न केवल अपने जीवन का कुछ हिस्से खो दिए हैं, बल्कि यह सब कारोबार जैसी एक महत्वहीन चीज़ ले लिए खोया है।"

उस ने कहा, "लेकिन तुम्हें बैंगलोर का तुम्हारा जीवन याद आएगा, तुम्हारे बिजनेस की व्यस्तता और जीत की उत्तेजना याद आएगी।"

"हमारा जीवन। हमारा बिजनेस। हम घर रखेंगे, जब मन करेगा तब वहाँ आएंगे जाएंगे।"

"लेकिन रिसॉर्ट?"

"बेब, हमारे पास मदद के लिए लोग रखने के लिए काफी धन संसाधन हैं।"

"नहीं अंशुमन। तुम्हारे पास संसाधन हैं, मेरे पास----"

"यह बात फिर से मत करो," मैंने उसकी बात काटते हुए चेतावनी दी।

"क्या बात?"

मैं उसका हाथ पकड़ उसे खींच कर अंदर ले गया। "अंशुमन," उसने विरोध किया। लेकिन मैं यह पैसे का भेद खत्म करना चाहता था। मुझे अपना फोन रसोई में मिला और मैंने तुरंत वकील को फोन किया। प्रियंका ने अपना हाथ मुझसे छुड़ाने की कोशिश की, लेकिन मैंने नहीं छोड़ा। मैं नाश्ते का कोने में बैठ गया और उसे अपनी गोद में बिठा लिया।

"मुखर्जी हियर" मेरे पारिवारिक वकील राजेश मुखर्जी की आवाज आई। विवेक कंपनी का वकील था लेकिन राजेश कि फर्म थी जो हमारे परिवार के मामले देखते थे।

"अरे राजेश, यहाँ राव-सिन्हा। नए साल की छुट्टियों मेँ फोन करने के लिए क्षमा करना।"

"नहीं-नहीं, ठीक है। मैं वैसे भी काम कर रहा हूँ। तुम ठीक हो?" प्रियंका शांत हो गई थी, लेकिन उसने मुझे घूर कर देखा। मैंने उसे आँख मारी, जिससे वह और भड़क गई।

"मुझे एक मदद चाहिए, यह ज़रूरी है और जल्द से जल्द होना चाहिए।"

"बताओ?"

"क्या तुम उस विवाह-पूर्व समझौते को जानते हो जिस पर हम ने हस्ताक्षर किये थे?"

"हाँ," वह हँसा, "तुम्हारी माँ एक क्रूर अमीर महिला थी... वैसे, हाँ, मुझे याद है।"

"मैं उस समझौते को रद्द करना चाहता हूं।"

"क्या?" राजेश को जैसे झटका लगा। "यार, क्या तुम क्या कह रहे हो? मैंने तो सुना है कि प्रियंका जी तुम्हें छोड़कर चली गई हैं, और तुम... सब कहते हैं कि तुम अपनी उस हॉट असिस्टेंट का साथ संबंध बनाने की योजना बना रहे हो।" प्रियंका ने नाक भौंह सिकोड़ी।

"राजेश, मेरा किसी और के साथ कोई संबंध नहीं है और जब से मैं बीस साल पहले अपनी पत्नी से मिला हूं, तब से मेरा कभी भी किसी का साथ कोई संबंध नहीं रहा" राजेश चुप हो गया। "मैं प्रियंका से प्यार करता हूँ। और मैं चाहता हूँ कि यह समझौता रद्द हो जाए।"

"यह इसके लिए सही समय नहीं है अंशु—"

"राजेश, मैं मुवक्किल हूँ और जानता हूँ कि मैं क्या कह रहा हूँ। इस प्री-नेपुटल समझौते को रद्द करवा दो और मुझे जिन कागज़ात पर हस्ताक्षर करने हैं, उन्हें ईमेल कर दो।"

मैंने राजेश को गहरी साँस लेते सुना। "पैसा तुम्हारा है, दोस्त। लेकिन अगर तुम दोनों बिना प्री-नेपुटल समझौते के अलग होते हो, तो सब कुछ आधा-आधा बँटेगा, क्योंकि तुम इतने लंबे समय से शादीशुदा हो। तुम्हारा घर, तुम्हारी विरासत भी, व्यवसाय भी।"

"मुझे पता है।" राजेश स्तब्ध और परेशान था। "तुम कर क्या रहे हो?"

प्रियंका ने मेरी ओर ऐसे देखा जैसे वह भी यही सोच रही हो। "हमारी शादी को बीस साल हो गए हैं, राजेश। अगर हम अलग हो गए, तो उसे हर चीज़ का आधा हिस्सा मिलना ही चाहिए, क्योंकि उसका बिना मेरे पास यह होता भी नहीं। इसलिए, इस अनुबंध को रद्द कर दो।"

"ठीक है," राजेश ने धीरे से कहा, "कल तक तुम्हें ईमेल मिल जाएगा। डिजिटल हस्ताक्षर के लिए डॉक्यूसाइन से आएगा।"

"क्या प्रियंका को कुछ साइन करने की ज़रूरत होगी?"

"नहीं। तुम्हारी माँ ने मेरे पेशेवर जीवन में अब तक का सबसे एकतरफा प्री-नेपुटल समझौता तैयार किया है।"

"धन्यवाद, राजेश, और नव वर्ष की शुभकामनाएं।" मैंने फोन रख दिया और प्रियंका को गले लगा लिया। "तो, प्यारी पत्नी जी, हमारे पास मदद का लिए संसाधन हैं," मैंने हमारी पिछली बातचीत को जारी रखा जैसे कि मैंने अभी-अभी अपने वकील से बात नहीं की थी।

"तुम पागल हो गए हो क्या?" वह फुसफुसाई।

"मैं तुमसे प्यार करता हूँ," मैंने उससे कहा। "बेशक- मैं - प्यार- करता- हूँ- तुमसे ।"

"तो, श्रीमान वर्कहॉलिक, तुम लक्षद्वीप में करोगे क्या?"

"अगर मेरी पत्नी मुझे इजाजत दे तो मैं हर रात उसके साथ प्यार करूंगा। मैं खाना बनाने और सफाई करने में उसकी मदद करूंगा। मैं उसके साथ सैर पर जाऊंगा। दिन में मैं यहीं से प्रोजेक्ट पर काम करूंगा। वैसे, हमें एक मजबूत वाई-फाई राउटर की जरूरत होगी। और मुझे घर में कहीं एक ऑफिस भी बनाना होगा" मैंने उसका मुंह को धीरे से चूमा। "जब मुझे यात्रा करनी हो, तो मैं चाहता हूं कि मेरी पत्नी मेरे साथ आए ताकि हम समय का आनंद ले सकें। मैं चाहता हूं कि जब भी मुझे ऑफिस जाना हो तो वह मेरे साथ बैंगलोर आए और हमारे परिवार के घर में रहे।" उसके आँसू बहने लगे। "बेबी?"

उसके प्यारे भीगे चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कान फैल गई, जिससे उसके सुंदर चेहरे पर चमक आ गई। "यह एक बढ़िया योजना लगती है, अंशुमन।" उसने अपना सिर मेरे कंधे पर टिकाया और रोने लगी। लेकिन मैं जानता था कि वह दुखी नहीं थी, बस अभिभूत थी। मैंने उसे सांत्वना दी। वह आश्रय जैसा स्नेह, जो उसने मुझे हमेशा दिया था।

गुरुवार, 5 मार्च 2026

भक्त पुंडलीक और भगवान विट्ठल की कथा


ईंट पर ठहरे विठोबा: माता पिता की सेवा में ईश्वर की खोज


   

दोस्तों, स्वागत है! आज, मैं आप सबके साथ एक बहुत ही दिल को छू लेने वाली कहानी शेयर करना चाहती हूँ। हम अक्सर भगवान को कोई दूर की चीज़ समझते हैं, एक ऐसी मौजूदगी जिसे पाने के लिए हमें बहुत दूर-दूर तक जाना पड़े। लेकिन हाल ही में, भारतीय संत पुंडलिक और भगवान विठोबा के बारे में कुछ खूबसूरत बातें पढ़ते हुए, मुझे एक गहरी सच्चाई याद आई: कभी-कभी, भगवान हमारे दरवाज़े के ठीक बाहर इंतज़ार कर रहे होते हैं। आइए, इस दिल को छू लेने वाली कहानी में एक साथ डूबते हैं।

अंधेरे से रोशनी का सफ़र

पुरानी कहानियों के अनुसार , एक बार पुंडलिक नाम का एक भला लड़का था जो अपने आध्यात्मिक माता-पिता, जानुदेव और सत्यवती के साथ रहता था। शुरू में, वह एक बहुत अच्छा था, लेकिन शादी के बाद उसका दिल कठोर हो गया। अपनी पत्नी के कहने पर, वह अपने माता-पिता के साथ बहुत बुरा बर्ताव करने लगा, उनसे घर के सारे काम करवाता था जबकि वह अपनी पत्नी के साथ आराम से रहता था। जब उसके दुखी माता-पिता ने शांति पाने के लिए पवित्र शहर काशी पैदल जाने का फैसला किया, तो पुंडलिक और उसकी पत्नी भी उनके पीछे चल पड़े, क्योंकि वह मुफ़्त के नौकर नहीं खोना चाहता था। लेकिन वे दोनों आराम से घोड़े पर सवार होकर जा रहे थे, जबकि उसके बूढ़े माता-पिता नंगे पैर खराब सड़कों पर चल रहे थे।

    

उनकी यात्रा रोज कहीं विश्राम को रुकती, और वे दोनों बेहतर आराम लेते जबकि उनके माता पिता किसी कोने मेँ पड़े रहते। कहते हैं कि रात को उन्हें घोड़े की सेवा भी करनी पड़ती थी। एक रात उनकी यात्रा कुक्कुट ऋषि (या कक्कुट मुनि) नाम के एक महान ऋषि के आश्रम पर रुकी। यहीं पर पुंडलिक ने आधी रात को एक चमत्कार देखा।

उसने तीन बहुत ही सुंदर स्त्रियों को आश्रम साफ करते देखा, जो देवियों जैसी तेजस्वी दिख रही थीं। लेकिन उनके शरीर और वस्त्र बहुत ही मलिन थे। आश्रम की सफाई के साथ साथ उनके शरीर और कपड़े दोनों स्वच्छ होते जा रहे थे । जब तक आश्रम पूर्ण रूप से साफ हुआ, वे और उनके वस्त्र पूरी तरह स्वच्छ हो चुके थे थे और दैवीय आभा से चमक रहे थे। पुंडलीक हैरान था। कहते हैं उसने यात्रा को तीन दिन आश्रम मेँ विश्राम दिया और लगातार तीन दिन यही दृश्य सामने आता रहा। आखिर वह जिज्ञासा को न रोक सका और उन देवियों से इसका रहस्य पूछा।
       

जब वह उनके पास गया, तो उन्होंने स्वयं को भारत की सबसे पवित्र नदियों: गंगा, यमुना और सरस्वती की त्रिवेणी देवी बताया। उन्होंने बताया कि वे तीर्थयात्रियों के पाप धो देती हैं, जिससे उनके शरीर और वस्त्र मलिन हो जाते हैं। लेकिन वे उस महान ऋषि की सेवा करके शुद्ध हो जाती हैं, जो अपने माता-पिता को खुद भगवान मानते हैं। और फिर, उन्होंने पुंडलिक को एक दर्दनाक सच बताया: वह सबसे बड़ा पापी था क्योंकि उसने उन्हीं माता-पिता को लगातार चोट पहुंचाई जिन्होंने उसे जीवन दिया था। उसका पाप तो त्रिवेणी स्नान से भी नहीं धुल सकता था।

      

प्यार की बदलने वाली ताकत

ये शब्द पुण्डलीक के दिल में चुभ गए। उसे बहुत बहुत ज़्यादा पछतावा हुआ। यह होने पर, पुंडलिक ने ऋषि से बात की, और उन्होंने उसे शिक्षा दी कि उसके लिए अपने पापों से छुटकारा पाने का एकमात्र तरीका अपने माता-पिता की पूरे दिल से सेवा करना है। ऋषि ने उसे प्यार से याद दिलाया कि माता-पिता अपने बच्चों से बिना किसी शर्त के, बिना किसी नफ़रत के प्यार करते हैं, चाहे कुछ भी हो जाए। उस पल से, पुंडलिक की ज़िंदगी पूरी तरह बदल गई। उसने अपने माता-पिता से माफ़ी मांगी और काशी यात्रा बीच मेँ ही छोड़ कर उन्हें लेकर घर की तरफ लौट चला। लेकिन इस बार माता पिता घोड़े पर थे और पुंडलीक अपनी पत्नी के साथ पैदल चल रहा था।

अब तो उसने अपने दिन-रात पूरे दिल से उनकी सेवा करने में लगा दिए, उन्हें भगवान का रूप मानते हुए उनकी सेवा करने लगा।

      

भगवान को ईंट पर प्रतीक्षा करवाना

पुंडलिक की मातृ-पितृ भक्ति इतनी पवित्र हो गई कि भगवान कृष्ण का ध्यान उसकी ओर गया। भगवान पुंडलिक को आशीर्वाद देने के लिए उसके साधारण से घर स्वयं चल कर गए। जब कृष्ण ने दरवाज़े से आवाज़ दी, तो पुंडलिक अपने रोज़ के प्रेम भरे सेवा कार्य में पूरी तरह डूबा हुआ था। उसके बूढ़े पिता सोने ही वाले थे, तो वह उनके पैर दबा रहा था ।

बाहर खड़े भगवान की दिव्य सुगंधी और उनके अलंकारों की छन-छन की आवाज से वह समझ गया था कि बाहर श्री कृष्ण पधारे हैं। लेकिन उन को पहचानकर भी, पुंडलिक ने सच में कुछ अनोखा किया। वह अपने पिता के प्रति अपना कर्तव्य नहीं छोड़ सकता था, और द्वार पर प्रभु खड़े थे। वर्षा ऋतु का समय था और ज़मीन गीली और कीचड़ वाली थी, और श्री कृष्ण कीचड़ मेँ परेशान होंगे यह सोचकर, उसने एक ईंट उठाई—जिसे मराठी में 'विटा' कहते हैं—और भगवान के खड़े होने के लिए उसे बाहर फेंक दिया ताकि उनके पैर सूखे रहें। उसने भक्तिपूर्ण स्वर से भगवान से कहा कि जब तक उसके पिता की सेवा पूरी न हो जाए, तब तक प्रतीक्षा करें।

     

और भगवान ने क्या किया? पुंडलिक के अपने माता-पिता को सबसे पहले रखने से बहुत प्रभावित होकर, श्री कृष्ण मुस्कुराए, अपने हाथ कमर पर रखे, और धैर्य से ईंट पर प्रतीक्षा मेँ खड़े हो गए। जब पुंडलिक ने अपनी प्रार्थना खत्म की और माफ़ी मांगने के लिए बाहर आया, तो भगवान ने उससे कहा कि अपने माता-पिता की सेवा ही उसकी सबसे बड़ी प्रार्थना है। पुंडलिक ने भगवान से कहा कि वे सभी सच्चे भक्तों को आशीर्वाद देने के लिए हमेशा वहीं रहें,वापस न जाएं। भगवान मान गए, और अपनी पत्नी रुक्मिणी के साथ विठोबा या विट्ठल के रूप में वहीं रहने लगे (विट्ठल – जो ईंट पर खड़ा है)


सेवा की यह धरोहर की विरासत आज, पवित्र शहर पंढरपुर में विठोबा मंदिर चंद्रभागा नदी के किनारे भक्ति की एक शानदार निशानी बनी हुई है। गहरे, विनम्र प्रेम की विरासत वहां आज भी जारी है। उदाहरण के लिए, मंदिर के पूर्वी दरवाज़े की पहली सीढ़ी को "संत नामदेव महाराज पायरी" के नाम से जाना जाता है। बाल-संत नामदेव भगवान के इतने भक्त थे कि जब भगवान ने आखिरकार उनकी प्रार्थना सुनी, तो नामदेव ने मंदिर की पहली सीढ़ी बनने के लिए कहा ताकि अनगिनत भक्त भगवान के दर्शन करने से पहले उन पर से जाएं जिससे उन्हें भक्त चरण रज मिल सके। यह इस बात की एक सुंदर याद दिलाता है कि कैसे आध्यात्मिक महानता विनम्रता में निहित है।

हर वर्ष, अक्षाधी अमावस्या पर "वारकरी" भक्तों की वारी पंढ़रपुर की तरफ चलती हैं। वे भक्ति मेँ मगन "श्री राम कृष्ण हरी" का कीर्तन गाते बजाते हुए विठोबा के पास जाते हैं। 

      

आखिरी बात दोस्तों, क्या यह सोचना बहुत अच्छा नहीं है कि जब हम अपने माता पिता की सेवा बिना किसी शर्त के प्यार से करते हैं, तो भगवान हमें मनाते हैं? पुंडलिक की कहानी हमें सिखाती है कि मोक्ष पाने के लिए हमें हमेशा बड़ी-बड़ी तीर्थ यात्राओं पर जाने की ज़रूरत नहीं है। बस अपने प्रियजनों की सच्ची भक्ति और सम्मान के साथ सेवा करके, हम भगवान को अपने घरों में बुलाते हैं। काश हम सभी आज अपने लिविंग रूम में उस पवित्र पंढरपुर भक्ति की थोड़ी सी झलक पा सकें।
          


 

भक्त अढ़ैया की कथा

भक्ति और प्रेम की सुंदर सादगी: प्रभु की कृपा की मिठास की खोज


नमस्कार दोस्तों! आज, आइए हम एक दिल को छू लेने वाली कहानी में अपने मन को डुबो दें, जो हमें याद दिलाती है कि भगवान सच में कितने आसानी से मिल सकते हैं। क्या आपको कभी लगा है कि भगवान तक पहुँचना बहुत मुश्किल है? हम अक्सर सोचते हैं कि भगवान सिर्फ़ बड़े-बड़े ऋषियों या ज्ञानियों को ही मिलते हैं, लेकिन सच तो यह है कि वे आसानी से उन लोगों को मिल जाते हैं जो बिल्कुल सीधे-सादे और मासूम होते हैं। आइए, अढैया नाम के एक साफ़ दिल वाले नौजवान की एक खूबसूरत कहानी में उतरें, और बच्चों जैसे विश्वास का जादू समझें।

आश्रय की तलाश में एक भोला मानव


एक छोटे से गाँव में एक सीधा-सादा और भोला-भाला लड़का रहता था। उसका असली नाम लगभग भुला दिया गया था। सब उसे "अढैया" कहते थे क्योंकि उसका हर बार का खाना ढाई किलो (अढैया) होता था। वह ज़्यादा काम नहीं करता था, और बहुत ज़्यादा खाता था, इसलिए धीरे-धीरे उसके घरवाले उससे परेशान होने लगे। भाभियों के लिए अपने देवर (छोटे देवर) के लिए रोज़-रोज़  इतना सारा खाना बनाना बहुत काम का काम था। आखिर उसके परिवार ने उससे कह दिया कि वह घर से बाहर कहीं चला जाए और अपनी ज़िंदगी खुद संभाले, कि वह एक बड़ा आदमी हो चुका था और उसे अपनी ज़िंदगी खुद चलानी चाहिए।

घर से निकाले जाने पर, यह मासूम इंसान पूरी तरह से खोया हुआ महसूस करने लगा। रहने की जगह ढूंढते हुए, वह एक संत के आश्रम में गया और विनम्रता से किसी भी तरह की सेवा के लिए रखने के लिए कहा, यह कहते हुए कि उसके पास कोई खास हुनर नहीं है, लेकिन वह कोई भी काम करने को तैयार है। जब आश्रम में रहने वालों ने उसकी बहुत ज़्यादा भूख के बारे में सुना, तो वे काफी हैरान हुए, लेकिन समझदार गुरु जी ने प्यार से उससे कहा कि वह उनके साथ रह सकता है। वह हर दिन आश्रम की रसोई से ज़रूरत के हिसाब से आटा, आलू वगैरह लेकर जंगल में जाकर गायें चराए, और वहाँ अपना खाना खुद बना कर वहीं खा लिया करे।

  

लेकिन, गुरु जी ने उसे एक बहुत ज़रूरी बात बताई: एक सख्त नियम का पालन करना होगा। एक भी निवाला खाने से पहले, उसे हमेशा ठाकुर जी (भगवान) को अपना भोग लगाना होगा और ठाकुर जी से प्रार्थना करनी होगी कि कि वे अपना भोग पा लें, इससे बाद ही अढ़ैया खुद प्रसाद खा सकता है। जब तक कि ठाकुर जी को भोग न चढ़ा दिया जाए, तब तक वह भी नहीं खा सकता।

रात के खाने के लिए एक दिव्य अतिथि

दोस्तों, अढैया को पूजा-पाठ, मंत्र या शास्त्र बिल्कुल नहीं पता थे। जंगल में अपने पहले ही दिन, उसने गाय के गोबर के कंडे जलाए और उनकी आग पर सादी बाटी और आलू का भर्ता बनाया। पूरी मासूमियत से, उसने गुरु के ठाकुर जी को बुलाया कि आओ और खाओ " गुरु जी के ठाकुर जी - आकर भोग लगा लो "। क्योंकि वह इतना मासूम था, उसे यह भी नहीं पता था कि ठाकुर जी सच मेँ आएंगे या नहीं, उसे विश्वास था कि कोई व्यक्ति जिसका नाम ठाकुर जी है वह आएगा और भोग लेगा। लेकिन भगवान तो भाव के ही भूखे हैं! क्योंकि वह भगवान को बुलाने के लिए पूरी तरह से सच्ची भावना में डूबा था, एक हैरान करने वाला चमत्कार हुआ: श्री राम, जिनसे उनके गुरु जी पूजा करते थे, सच में उनके सामने प्रकट हो गए! भगवान एक नील बादल की तरह चमक रहे थे, अपना बड़ा धनुष पकड़े हुए थे, और अपनी दयालु कमल जैसी आँखों से अढैया को बड़े स्नेह से देख रहे थे।

जहाँ बड़े-बड़े ऋषि-मुनि अपनी पूरी ज़िंदगी गहरे ध्यान में डूबे भगवान की एक झलक पाने के प्रयासों में बिता देते हैं, वहीं वे अढ़ैया के मासूम दिल की एक ही पुकार पर उनके सामने प्रकट हो गए। वे खुशी-खुशी बैठे और इस मासूम भक्त का सादा खाना खाया। भगवान को उसका प्रेम से बनाया खाना इतना पसंद आया कि उन्होंने सब कुछ खा लिया, जिससे उस दिन बेचारा अढ़ैया भूखा रह गया!

  

दिव्य परिवार बढ़ता जाता है

इसके बाद जो होता है वह बहुत ही मीठा है। जब अढैया ने गुरुजी से शिकायत की कि गुरुजी के ठाकुर जी (भगवान) ने पूरा खाना खा लिया है, तो उन्होंने कहा कि कोई बात नहीं तुम कल अपने और भगवान दोनों के लिए 5 किलो आटा ले कर जा सकते हो। उन्होंने रसोई चलाने वालों से कहा कि यह जितना चाहे इसे दे दिया करो, मुझसे बार बार पूछने की आवश्यकता नहीं है। उन्हें लगा कि शायद इसका पेट न भरा हो या कोई मित्र साथ हो, लेकिन पूछने मेँ शर्मा रहा हो। उधर भगवान ने वादा किया था कि अगर वह उन्हें बुलाता रहेगा तो वह हर दिन आएंगे। यह सोच कर, अढैया अगले दिन दोगुना आटा जंगल में ले गया।

अगली बार, वह पाँच किलो आता ले आया लेकिन इस बार भगवान अपनी पत्नी, माता सीता को लाए, जिन्होंने अढ़ैया को बहुत स्नेह और ममता से देखा। तो एक बार फिर 5 किलो खाना खत्म हो गया! अगले दिन वह लक्ष्मण जी को लाए तो 7.5 kg भी काफी नहीं था।

इस बार वह 2.5 kg ज़्यादा (कुल दस किलो) लाया ताकि उसे खाना मिल जाए लेकिन इस बार जो मेहमान आए वे हनुमान जी थे। अढैया बेसब्र हो रहा था, उसने राम जी से कहा कि मुझे पूरे परिवार की लिस्ट दे दो ताकि मैं सबके लिए काफ़ी खाना बना सकूँ! दिन-ब-दिन, मेहमानों की लिस्ट बढ़ती जा रही है!

अगले दिन अढैया ने सोचा कि हर दिन एक आदमी बढ़ जाता है, तो मैं 2.5 की जगह 5 kg ज़्यादा ले लूँ ताकि मुझे कुछ मिल जाए, लेकिन इस बार भरत और शत्रुघ्न दोनों शामिल हो गए! भगवान पहले अपनी पत्नी देवी सीता जी को लाए, फिर अपने छोटे भाई लक्ष्मण जी को, और फिर शक्तिशाली हनुमान जी को, जो अपनी भारी गदा के साथ एक शानदार, चमकदार रूप में प्रकट हुए। आखिरकार, भाई भरत और शत्रुघ्न भी इकट्ठा हो गए, और अढैया ने खुद को पूरे दिव्य परिवार के लिए पकाने के लिए आटे के बड़े-बड़े बैच लाते हुए पाया।

आश्रम के स्टोर इंचार्ज को हर दिन इस बढ़ती मांग पर संदेह हो रहा था, लेकिन वे गुरुजी के आदेश का पालन कर रहे थे और अढैया को जितना चाहिए उतना दे रहे थे। लेकिन अढैया उनकी अनकही नाराज़गी समझ रहा था!

   

प्रेम का परम चमत्कार

आखिर में, अढैया ने जंगल में आटे की एक बड़ी बीस किलो की बोरी लाने का फैसला किया। लेकिन इस बार, उसने खाना बिल्कुल बनाया ही नहीं। जैसे बच्चे अपने माता पिता से रूठ जाते हैं, ऐसे रूठते हुए उसने भगवान से कहा, कि जब उनका पूरा परिवार और सेवक भी मौजूद हैं, तो वह खाना क्यों बनाए? आज उन सब को खाना बनाना चाहिए! क्या आप सोच भी सकते हैं कि कोई भगवान को यह कहे?

भगवान मुस्कुराए, और जल्द ही, हनुमान जी लकड़ी इकट्ठा कर रहे थे, लक्ष्मण जी आग जला रहे थे, और माता सीता खुद, धुएं से आंखों में पानी लिए, रोटियां बनाने लगीं !

अढैया जोश में अपने गुरु को लाने के लिए आश्रम की तरफ भागा, और कहा कि उसने पूरे भगवान के परिवार को "फंसा" लिया है और उन्हें काम पर लगा दिया है। जब गुरु जंगल में पहुंचे, तो वह यह देखकर हैरान रह गए कि पूरा श्री राम दरबार वहां मौजूद था और खाना बना और परोस रहा था। गुरु जी श्रद्धा से ज़मीन पर लकड़ी की तरह गिर पड़े (दंडवत) और भगवान को प्रणाम किया । भगवान ने प्यार से गुरु को समझाया कि भले ही ज्ञानी और शास्त्रार्थ करने वाले उन्हें तर्क या बुद्धि से नहीं समझ सकते, लेकिन वे खुद उन लोगों के पास आ जाते हैं जो विनम्र, सीधे-सादे और साफ दिल वाले होते हैं।

   

समापन  

इस खूबसूरत चमत्कार के बाद, माता सीता ने अढैया को अपने करकमलों से ऐसे खिलाया जैसे एक माँ अपने बच्चे को खिलाती है। उनकी अपार कृपा से, उस के मन से सारी सांसारिकता धुल गई, और उसका मन पूरी तरह से पवित्र हो गया, जिससे उसे परम दिव्य अनुभूति हुई।

प्यारे दोस्तों, क्या यह कहानी आपके दिल में उम्मीद नहीं भरती? यह हमें बहुत अच्छे से दिखाती है कि भगवान को पाने के लिए हमें मुश्किल रस्मों या बहुत ज़्यादा ज्ञान की ज़रूरत नहीं है। हमें बस एक साफ़, सरल दिल और हमें दिए गए रास्ते पर एक मासूम भरोसे की ज़रूरत है। हम सभी को अपनी आध्यात्मिक यात्राओं में उस खूबसूरत, बच्चों जैसी सादगी और भक्ति को अपनाने की प्रेरणा मिले।

ज़िंदगी अधूरी तेरे बिन - भाग उनत्तीस (29)


 ज़िंदगी अधूरी तेरे बिन - भाग उनत्तीस (29)



भाग 29

प्रियंका


मैं डिनर के बाद हीटर चालू करके बरामदे में कोक का गिलास लेकर बैठी थी। यह एक शानदार दीपावली थी - परिवार और मेहमान अच्छी तरह से घुल मिल गए थे, और श्रेया खुश थी। मुझे पता था कि यह उसके लिए बहुत मायने रखता है कि वह आखिरकार छुट्टियों के लिए अपने घर पर मेरे परिवार की मेजबानी कर पा रही थी।

नीलिमा और शाश्वत वैसे ही थे जैसे वे पहले हुआ करते थे - मज़ेदार और मिलनसार। शाश्वत में पिछले कुछ सालों से जो तीखापन मैंने देखा था, वह अब नहीं रहा था। वह खुद को बेहतर ढंग से समझने और अपने व्यवहार को सुधारने के लिए ईमानदारी से प्रयास कर रहा था। डॉ. मिश्रा के अनुसार, सभी बच्चे अलग-अलग दौर से गुजरते हैं, और शाश्वत जिस तरह से व्यवहार कर रहा था, उसका कारण हमारे लालन पालन की कोई गलती नहीं थी। बल्कि, यह किशोरावस्था से वयस्कता की ओर बढ़ने की चुनौतियों के कारण था।

"क्या मैं तुम्हारे साथ शामिल हो सकता हूँ?" अंशुमन ने पूछा, खुद के बारे में इतना अनिश्चित कि इसने मुझे तोड़ दिया। मेरा पति एक आत्मविश्वासी व्यक्ति था, और अभी, मेरी वजह से, वह ऐसा अनिश्चित सा हो गया था। मेरे मन मेँ अचानक ग्लानि भर आई। मुझे शाश्वत अपना बच्चा होने से छोटा लगता था, मैंने उसकी गलतियाँ बिना प्रयास माफ कर दीं। फिर बेचारा अंशुमन भी तो करीब-करीब इसी उम्र का था न जब हमने शादी की थी? तो उसने भी कुछ गलतियाँ की थीं। वह अपनी माँ का विरोध नहीं कर पाया प्री-नेप के बारे मेँ, वह उनके अनुमोदन की आशा मेँ कोशिश करता रहा। फिर, बच्चों को मैंने जैसे प्यार दिया था, वे कहाँ अंशुमन को प्यार देती थीं? तो ठीक है, उससे गलतियाँ हुईं, लेकिन उसकी अकेले की गलती भी नहीं थी। मैंने भी तो कभी अपनी अपेक्षाओं के बारे मेँ उसे कुछ नहीं कहा। पिछले दो सालों मेँ जो हम दूर हुए वह उसकी अकेले की गलती नहीं थी, मेरी भी तो जिम्मेदारी थी कि मैं उससे गंभीरता से बात करती।

"हाँ, बिल्कुल, मेरे प्रिय अंशु..." मैंने खुद को उसे अपना ‘प्रिय अंशुमन’ कहने से रोका। हम अभी वहाँ नहीं पहुँचे थे, और मुझे चिंता थी कि हम कभी वहाँ नहीं पहुँच पाएंगे। यह सिर्फ़ उस अकेलेपन से छोटी सी राहत थी जो बच्चों और अंशुमन के अपने जीवन में वापस चले जाने के बाद होगा। बेशक, उसने कहा था कि वह यहाँ लंबे समय तक रहेगा, लेकिन मैं अपने पति को जानती थी, वह काम के प्रति बहुत ज़्यादा समर्पित था। उस काम के बिना, वह परेशान हो जाएगा, और फिर, मुझे डर था, वह मुझसे नाराज़ हो जाएगा, मुझे भागने के लिए दोषी ठहराएगा, क्योंकि उसे अपना काम छोड़ कर कहीं दूर तक मेरा पीछा करना पड़ा।

"यह एक खूबसूरत रात है," अंशुमन ने मेरे बगल में एक कुर्सी पर बैठते हुए कहा। इतना करीब कि मैं उसके इत्र की खुशबू महसूस कर रही थी, जिसकी खुशबू दो दशकों बाद भी मुझे अच्छी लगती है। मैंने सहमति की आवाज़ निकाली और कम्बल को अपने चारों ओर और कस लिया। वह सिर्फ़ जींस और स्वेटर में सहज था।

"अंशुमन, क्या तुम्हें मुझसे शादी करने का पछतावा है?" शब्द मेरे मुंह से निकल गए, इससे पहले कि मैं उन्हें रोक पाती। मैं हमेशा से पूछने से डरती थी, जवाब से भी डरती थी। लेकिन अब, मैं मजबूत महसूस कर रही थी - आगे जो भी आए उसे सुनने के लिए तैयार थी।

उसने मेरी ओर देखा। "मैंने तुमसे शादी की क्योंकि मैं तुमसे प्यार करता था। उस समय नहीं होती, तो हम बाद में शादी कर लेते, लेकिन करते। मुझे इस बात का पूरा यकीन है। मुझे लगता हैं हमने जल्दबाजी कर के गलती की, क्योंकि मैं समझदार नहीं था, अपनी पत्नी की अहमियत नहीं समझ पाया। शायद कुछ वर्षों बाद शादी करते तो मैं बेहतर पति होता?"

"भले ही आप माँ जी से डरते थे?" मैं व्यंग्यात्मक नहीं थी; यह सच्ची जिज्ञासा थी।

"मुझे लगता है कि अगर मैं उम्र मेँ बड़ा होता, कॉलेज में नहीं होता, अपने दम पर कमा रहा होता, तो अपनी पसंद खुद चुन पाना आसान होता।" उसने थोड़ी वाइन पी। "मैं तब अपने परिवार पर आर्थिक रूप से निर्भर था। इस निर्भरता से उनसे दबता था और कुछ समय के लिए तुमसे नाराज़ था। और यह नाराजगी बेवकूफी भी थी क्योंकि मैं अपने जीवन, अपने घर, अपने बच्चों और तुमसे प्यार करता था। लेकिन मैं कुछ समझ नहीं पाता था और इस बेचैनी की भावना को मैंने अपने अंदर समा जाने दिया।"

"क्या ऐसा इसलिए था क्योंकि मैं एक अच्छी पत्नी नहीं थी?" मैं इस सवाल का जवाब भी नहीं सुनना चाहती थी। इस बार वह क्या कहेगा? "तुम सबसे अच्छी पत्नी थीं, और हो, जो कोई भी आदमी चाह सकता है। और यह तथ्य कि मैं आदतन नाराजगी रखता था, मेरी कमज़ोरी है, मेरी कायरता है, इसका इस बात से कोई लेना-देना नहीं है कि तुम कितनी अद्भुत हो।" उसने स्पष्ट, शांत और सौम्यता के स्वर से यह बात की।

"तुम ये बातें ऐसे कहते हो तो लगता है जैसे तुम उन पर विश्वास करते हो।"

"हाँ। हाँ मैं यह मानता हूँ।" उसने मेरे हाथ पर हाथ रखा। "प्रियंका, तुमने मेरी ज़िंदगी बेहतर बना दी। तुमने हमेशा यही किया। मुझे पता था कि अगर मैंने हमारे समाज की किसी लड़की से शादी की होती, तो मैं भी अपने सभी दोस्तों की तरह दुखी जीता, जैसे रक्षित है। सचमुच, मेरा हर दोस्त तुम्हें ‘संत प्रियंका’ कहता है। उन्हें लगता है कि मैं एक क्रूर माँ का क्रूर लेकिन भाग्यशाली बेटा हूँ। सब को तुम्हारे साथ सहानुभूति है कि तुम ऐसे मूर्ख के साथ हो।"

मैं मुस्कराई. "मूर्ख?" ..... "हाँ, बेब! मैं ऐसा ही तो रहा हूँ”

"हमेशा तो मूर्ख नहीं थे।"

"नहीं," उसने सहमति जताई, "लेकिन हमारी शादी का टूटना, मुझे बिना यह तक पता चले कि हम मुश्किल मेँ भी हैं, बड़ी गलती है। मैं तो इस खुश-फहमी मेँ था कि हम बढ़िया हैं। "

मैं सारा दोष उस पर नहीं मढ़ सकती थी। यह उचित नहीं था। "मैंने भी तो कभी कुछ नहीं कहा। कभी तुम्हें नहीं बताया कि मैं कैसा महसूस कर रहा हूँ। मैं... नहीं जानती थी कि अपनी ज़रूरतें पूरी करने के लिए तुम्हें कैसे कहूँ।"

"मैंने तुम्हें कभी भी मुझसे बात करने के लिए सुरक्षित जगह नहीं दी," उसने जवाब दिया। "मुझे यह पता है।"

"हम दोनों को देखो, हम दोनों थेरेपी में हैं और बिल्कुल ऐसे बात कर रहे हैं जैसे हम दोनों थेरेपी में हों," मैंने अपना ग्लास नीचे रखते हुए हंसते हुए कहा। वह अभी भी मेरा खाली हाथ पकड़े हुए था, और मुझे यह अच्छा लगा। मैं उसे जाने नहीं देना चाहती थी।

“क्या तुम मेरे साथ जोड़े की थेरपी मेँ चलना चाहोगी? शायद बातें करना आसान हो?” वह धीरे से हंसा, "मैं तुम्हारी डॉक्टर मिश्रा से मिलने गया था।"

"क्या?"

"उन्होंने ही मुझे मेरे मनोचिकित्सक की सिफारिश की थी। उन्होंने, बेशक, तुम्हारी गोपनीयता बनाए रखी, लेकिन मुझे मेरे बारे में कुछ दिलचस्प बातें बताईं। उसने कहा कि मैं एक पुरुष मनोचिकित्सक के साथ बेहतर करूँगा क्योंकि मेरे भीतर एक पूर्वाग्रह है, पेशेवर भूमिकाओं में महिलाओं के खिलाफ अंतर्निहित पूर्वाग्रह।" मैंने सिर हिलाया और उसके आगे बोलने का इंतजार करने लगी। "तुम्हें आश्चर्य नहीं हुआ?" उसने आह भरी।

मैं मुस्करा दी। "यह जाहिर नहीं होता, लेकिन यह है। मुझे नहीं लगता कि तुम उनके साथ भेदभाव करते हो, लेकिन... शायद एक महिला को अपनी क्षमताओं के बारे में समझाने के लिए, तुम्हारे सामने एक पुरुष से ज्यादा प्रयास करना पड़ता है।"

"डॉ. मिश्रा से यह सुन कर मेरी अपने बारे मेँ गलतफहमी ध्वस्त हो गईं। धिक्कार है प्रियंका, मेरी एक बेटी और एक पत्नी है।"

"खैर, मैं तो नौकरीपेशा नहीं हूँ।" मैंने मजाक किया।

"तुम श्रेया को इस रिसॉर्ट को सफल बनाने में मदद कर रही हो, जब से यह खुला है।"

"नहीं, मैं तो बस----"

"बही खाते रखती हो, वेबसाइट चलाती हो, और सोशल मीडिया का प्रबंधन करती हो। मुझे नहीं पता कि तुमने ये सब करना कब और कैसे सीखा? और हम सब की देखभाल करते हुए कब काम करती थीं। अपनी खूबियों को स्वीकार करो बेब। तुम अपने आप को हल्के मेँ लोगी तो दूसरे भी यही करेंगे।" .. यह तारीफ़ सुनकर मुझे लगा कि मैं दस फीट ऊँची हो गई हूँ। मैंने सोचा था कि अगर उसे या बच्चों को कभी पता चलेगा तो वे मुझे नीची नज़र से देखेंगे; इसे एक छोटा सा शौक़ समझेंगे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। तब मैं श्रेया को वित्तीय स्थिरता और सुरक्षा दिलाना चाहती थी। और अब? अब उलटे श्रेया ने ही मेरी मदद की।

मैं उसकी तारीफ को नजरअंदाज करने ही वाली थी, लेकिन मैंने खुद को रोक लिया। "मैंने यह इसलिए किया ताकि उसके पास पैसे हों। और आज यही मेरे भी काम आया। अगर किसी दिन मुझे ज़रूरत पड़े, तो मेरे पास भी पैसे होंगे अब।" वह उदास और हताश लग रहा था। "तुम्हें चिंता थी कि अगर तुम चली गईं तो तुम्हारे पास कुछ नहीं होगा। और श्रेया के अलावा कोई नहीं होगा।"

मैंने जवाब दिया, "मेरे पास उसके अलावा कुछ भी नहीं है और कोई भी नहीं है।" मुझे उम्मीद थी कि अब वह चीखेगा-चिल्लाएगा और मुझे बताएगा कि मैं कितनी कृतघ्न हूं, क्योंकि वह और बच्चे मेरे साथ रहने के लिए यहां आए थे।

"तुम्हारे पास मैं हूँ, बेब।" वह शांत सौम्य था। "तुम्हारे पास हमारे बच्चे हैं। यशस्वी है। तुम अकेली नहीं हो। मैं तुम्हें कभी भी पैसे के लिए संघर्ष नहीं करने दूँगा, कभी नहीं।"

"मुझे बार-बार लगता है कि अब तुम अगली बात पर मुझसे नाराज़ हो जाओगे, लेकिन तुम नहीं होते।" मैंने स्वीकार किया।

"मैंने खुद से वादा किया है कि अब मैं आपा नहीं खोऊँगा, इससे मेरे इरादे झूठे पड़ जाएंगे।" उसने अपना हाथ मेरे गाल पर हाथ फेरा। "मैं अपनी पत्नी को वापस पाने की कोशिश कर रहा हूँ। मैं तुम्हारे लिए अपने घुटनों पर हूँ, बेब। मैं इसे बिगाड़ने नहीं वाला।"

"मैं नहीं चाहती कि तुम अपने आप से अलग कोई और बन जाओ," मैंने धीरे से कहा।

“मैं अपना ही बेहतर रूपान्तरण करने की कोशिश कर रहा हूँ, और यह मनोचिकित्सकों के शब्द हैं” आखिरी शब्द कहते हुए उसके चेहरे पर हंसी थी। मैं भी हंस पड़ी। वह अब भी मुझे हंसा सकता है, हमारे जीवन में हंसी भर सकता है। मुझे तो डर था कि हम इतने टूट चुके हैं कि फिर से ठीक नहीं किया जा सकता। "यह आदमी, वह आदमी जो चुटकुले सुनाता है और मेरे साथ समय बिताता है, यह अंशुमन कुछ साल पहले गायब हो गया था।" वह मेरे साथ ईमानदार होने का इतना प्रयास कर रहा था, तो मुझे भी वैसा ही करना पड़ा।

"मुझे पता है।" वह नीचे झुका और मेरे गाल को चूमा। "तुम्हारी त्वचा बहुत रेशमी है। जानती हो कि मैं तुम्हारे आस-पास इतना उत्तेजित हो जाता हूँ कि दर्द होता है?" मुझे लगा कि मेरे अंदर गर्मी बढ़ रही है। "मैं तुम्हें हर समय चाहता हूँ। यह वासना नहीं है, प्रियंका, यह प्यार है। इतने सालों के बाद यह वासना नहीं। तुम मेरे लिए सबसे आकर्षक हो और----"

"तुम मुझे उन सभी कार्य पार्टियों में अकेला क्यों छोड़ देते थे, जहाँ तुम मुझे जबरदस्ती घसीट कर ले जाते थे? तुम उस काव्या के साथ रहते थे और मुझे अकेला छोड़ देते थे।" ये शब्द और दर्द मेरे अंदर से बह निकले।

"जब तक कि रक्षित और प्रभाकर ने मुझे इस बारे में नहीं बताया, तब तक मुझे पता भी नहीं था कि मैं ऐसा कर रहा हूँ। हाँ, प्रियंका, मैं सच ही मेँ नहीं जानता था।" वह मुझे छूता रहा, मेरे गाल पर हाथ फेरता, मेरे कंधे पर हाथ रखता, या मेरे हाथ पर हाथ रखता जैसे कि वह रुक ही नहीं सकता, जैसे मुझे जाने नहीं देना चाहता। "मुझे बाद मेँ पता चला कि काव्या को भी लगा कि हमारे बीच कुछ चल रहा है। लेकिन जब मैंने कहा कि मैंने उसे ऐसा कोई संकेत नहीं दिया था, तो उसने स्वीकार किया कि मैंने कुछ नहीं किया था।"

"तो फिर उसने ऐसा क्यों सोचा?" मैंने पूछा।

"उसने कहा कि मैं एक ‘सभ्य भला आदमी’ हूं और अपनी पत्नी को धोखा नहीं दूंगा, इसलिए जब मेरी पत्नी चली जाएगी, तो उसने सोचा कि मैं उसके साथ हो जाऊंगा"

"यह तो थोड़ा काल्पनिक है, है न?" काव्या हमेशा से इतनी शांत चित्त दिखती थी कि यह बात उसके लिए आश्चर्य की बात थी।

"हाँ। छुट्टी लेने का फैसला करने से पहले ही, मुझे पता चला कि मुझे काव्या के बारे मेँ कुछ करना होगा। वह अफवाह बना रही थी कि हम साथ रहने वाले हैं। मुझे नहीं पता कि उसे क्या परेशानी है, लेकिन यह मेरी समस्या नहीं है और मैं इससे निपटना नहीं चाहता।"

मैंने आह भरी। "मेरे मनोचिकित्सक ने मुझसे पूछा, कि मैंने तुम्हें पहले क्यों नहीं बताया कि तुम मुझे इन आयोजनों में अकेला छोड़ रहे हो, और मुझे यह पसंद नहीं आता।" मैं बहुत देर तक चुप रही। "मैंने कहा कि मैं चुप रहती थी क्योंकि मुझे डर था कि तुम मुझसे उत्तर दोगे कि तुम मेरे साथ समय नहीं बिताना चाहते।"

"हे भगवान, प्रियंका," उसने कराहते हुए कहा। "मुझे तुम्हारे साथ समय बिताना बहुत पसंद है। हम हमेशा मौज-मस्ती करते हैं। तुम समय को बहुत मजेदार बना देती हो। बात यह है कि जब मेरे पिता बीमार पड़ने लगे, तो मुझे उन्हें यह दिखाने की ज़रूरत थी कि मैं उनसे कितना बेहतर था। उनके जाने बाद, मैं रुक नहीं पाया। मुझे और प्रोजेक्ट चाहिए थे, और प्रतिष्ठा... बस और-और-और। और फिर तुम चली गईं, तब जाकर मुझे एहसास हुआ कि इनमें से कोई भी बात मायने नहीं रखती। मैं सिर्फ तुम्हें चाहता हूँ।"

"तो, तुम्हें मेरी कीमत का एहसास तब तक नहीं हुआ जब तक मैं तुम्हें छोड़कर नहीं गई?" मैंने पूछा। "अगर मुझे पता होता, तो मैं सालों पहले ही तुमसे दूर न चली जाती?"

वह हंसा और मेरे बालों को सहलाया। "मैं तुम्हारे बिना नहीं रह सकता। मैंने भले ही हर समय काम किया हो, लेकिन सच तो यह है कि तुम मेरा इंतज़ार कर रही थी, अपनी बाहें फैलाए हुए, मुझे ‘मेरा प्रिय अंशुमन’ कहकर पुकारती थीं, यही मेरा आश्रय था। तुम मेरे लिए सुरक्षित स्थान थी, और हो। इतना कि मैं स्वार्थी हो गया था और तुम्हारी चुनौतियों को समझना नहीं चाहता था। मैं तुम्हारे साथ की शांति, और शांत रहना चाहता था। तुम्हारी चिंताएँ और परेशानियाँ नहीं। मैं तुम्हारा आश्रय नहीं बना, जबकि तुम मेरा शान्त आश्रय थीं।" वह खुद को बेपरदा कर रहा था - मुझे ऐसी बातें बता रहा था जो उसे अच्छी रोशनी में नहीं दिखाती थीं। अंशुमन जैसे स्वाभिमानी व्यक्ति के लिए, यह आसान नहीं था। "कठिन हिस्सा तुम्हें बताना नहीं है, बेबी। कठिन हिस्सा था खुद को देखना, अपनी कमियों को स्वीकार करना। मुझमें कोई गर्व नहीं, तुम्हारे आगे मेरे लिए कोई अहंकार नहीं। तुम मेरी शरणस्थली हो, मेरा आश्रय हो। मैं तुम्हारे साथ जी सकता हूँ, मेरी सांसें पूरी आती हैं। यह हमेशा सच रहा है। तुमने मुझे वैसे ही स्वीकार किया जैसा मैं था। तुम ही वह व्यक्ति हो जो मुझे जानता है और मुझसे सच्चा प्यार करता है।"

मैंने उसके हाथ पर हल्के से मारा, "तुममें इतना बुरा कुछ भी नहीं है।"

"हाँ प्रियंका, है। मैं पैसे पर गर्वित एक क्रूर माँ का सच्चा बेटा रहा हूँ - इतना हकदार कि मैंने कभी तुम्हारी सबसे अच्छी दोस्त से मिलने की जहमत नहीं उठाई, क्योंकि वह तुम्हारे अतीत से थी जब तुम लोग गरीब थे।" मुझे इसकी आशंका थी। लेकिन उसे श्रेया को ले जाते हुए, उसके लिए एक नर्स को नियुक्त करते हुए, उसकी देखभाल करते हुए देखना - यह स्पष्ट करता था कि वह यह भी जानता था कि लोगों का सम्मान उनके होने के आधार पर करना चाहिए, न कि इस आधार पर कि वे कहां से आए हैं।

"मुझे जाकर सिर्फ चार सप्ताह हुए," मैंने माहौल को हल्का करने के लिए कहा, "इतने ही समय मेँ तुम बहुत बदल गए हो।"

"तुम भी तो बदली हो बेबी।" उसने मुझे तुरंत जवाब दिया। "तुमने कभी मुझे नहीं डाँटा था। मुझ पर कभी चिल्लाई नहीं थीं। अब, तुम यह दोनों ही काम कर रही हो। और यह अच्छा है। मुझे अच्छा लग रहा है कि तुम अब अपने लिए खड़ी हो रही हो। अपनी सच्ची भावनाएं दिखने दे रही हो। मुझे यह सुनना अच्छा लगता है। मैं जानना चाहता हूँ।" उसने मेरे गाल को सहलाया, और मैं उसके स्पर्श में पिघल गई। "हमें एक और मौका दो, प्रियंका," उसने विनती की। "प्लीज बेबी, तुम जितना सोच सकती हो, उतना अच्छा पति बनूँगा।"

मैं हाँ कहना चाहती थी। मेरे अंदर सब कुछ अंशुमन को स्वीकार करने के लिए तैयार था। मेरा प्यार अथाह, गहरा था। लेकिन ..... "मैं इसके लिए अभी तैयार नहीं हूँ," मैं सच बोलते हुए फुसफुसाई।

यह साफ था कि मेरे शब्दों ने उसे चोट पहुंचाई, लेकिन वह अभी भी उदास मुस्कराहट मुस्करा रहा था। "लेकिन यह 'नहीं' तो नहीं ही था न? मैं इसे 'शायद' मानूँगा।"

"हाँ," मैंने कहा।

"मैं तुम्हारे लिए यहाँ हूँ। लेकिन मैं यहाँ ‘हमारे’ लिए भी हूँ। मुझे बहुत पछतावा है और—"

"चलो आगे बढ़ते हैं," मैंने उसे बीच में ही रोक दिया। "हम दोनों माफ़ी मांग सकते हैं या आरोप लगा सकते हैं या... जो भी हो। लेकिन मैं आगे बढ़ना चाहती हूँ। मैंने यही शाश्वत से कहा, और तुम्हें भी कह रही हूँ। पुरानी बातें भूल कर आगे की ओर देखते हैं, है न?"

"क्या तुम ऐसा कर सकती हो, उस सब के बाद भी?

मैंने अपना हाथ उसके गाल पर रखा और दिल से कहा, "हां, मुझे लगता है कि मैं कर सकती हूं। लेकिन इसमें समय लगेगा। क्या तुम धैर्य रख कर इंतजार कर सकते हो?"

"हां, प्रियंका, मैं तुम्हारा इंतजार कर सकता हूं, जैसा वह गाना है न ताजमहल फिल्म का। हम इंतजार करेंगे, तेरा कयामत तक, खुदा करे के कयामत हो और तू आए" उस ने वादा किया। फिर वह हंसा। “तो मैं इंतजार कर सकता हूँ, लेकिन धैर्य से नहीं, मैं तुम्हारे लिए बड़ा अधीर हूँ”। इस पर हम दोनों सहज होकर हंस पड़े।

मंगलवार, 3 मार्च 2026

ज़िंदगी अधूरी तेरे बिन - भाग अट्ठाईस (28)

 

ज़िंदगी अधूरी तेरे बिन - भाग अट्ठाईस (28)


भाग 28

अंशुमन


श्रेया दीपावली के दिन बरामदे में बैठना चाहती थी। मौसम साफ और ठंडा था। सूरज चमक रहा था, आसमान नीला था और हवा भी नहीं चल रही थी, मानो दीपावली पर आराम कर रही हो। नीलिमा ने उसकी कुर्सी को दो कंबलों में लपेटा और ऊपर ओढ़ने के लिए कुछ और कंबल भी रखे। मैंने श्रेया को गोद में उठा लिया। उसकी रोग प्रतिरोधक क्षमता कम हो गई थी, और एक सामान्य सर्दी भी उसे मार सकती थी। "पता नहीं कि तुम सब इस बात की चिंता क्यों कर रहे हो कि मैं बीमार पड़ जाऊंगी? मैं तो पहले ही बीमार हूं। मैं बहुत जल्द मर रही हूं।" जब मैंने श्रेया को बिस्तर पर लिटाया तो उसने शिकायत की।

"तुम अपना काम करो और हम लोगों को अपना करने दो", मैंने मुस्करा कर कहा।

थोड़ी देर बाद वह बोली, "जानते हो अंशुमन, मैंने कभी नहीं सोचा था कि मैं तुम्हें पसंद करूंगी। लेकिन अब, मिलने के बाद, समझ सकती हूँ कि वह तुमसे क्यों प्यार करने लगी।"

नीलिमा बगल की कुर्सी पर बैठ गई। "क्या आप पापा को तब से जानती हैं जब मम्मी उनसे डेट कर रही थीं?"

"नहीं। मैं तब पुणे में रहती थी।" श्रेया ने याद करते हुए बताया। "जब मैं एक वीकेंड पर मिलने आई थी, तो प्रियंका ने मुझे अंशुमन के बारे में बताया, वह कितना बढ़िया था। कितना हैंडसम। बाद में मुझे पता चला कि उसका बॉयफ्रेंड ‘अंशुमन राव-सिन्हा’ था। मैंने प्रियंका से बताया कि वह करोड़पति था, उसे तो यह पता भी नहीं था।"

नीलिमा हँसी। "मैंने माँ-पापा की शादी की तस्वीरें देखी हैं। उनमें आप नहीं थीं। ऐसा कैसे?"

श्रेया के जवाब देने से पहले ही मैंने सच बता दिया। आखिर मेरे परिवार ने ही तो यहाँ गड़बड़ की थी। "इसलिए कि दादी श्रेया को वहाँ नहीं चाहती थीं।"

नीलिमा ने भौंहें सिकोड़ीं, "क्यों? माँ का उनके अलावा कोई और परिवार नहीं था।"

"क्योंकि मैं तुम्हारी मां की तरह ही घटिया किस्म के गरीब परिवार की हूं।" आज उसका दिन अच्छा था और उसमें कुछ ऊर्जा थी, उसका तीखा हास्य भी सामने आया था।

"यह सब बकवास है, दादी रेसिस्ट थीं।" नीलिमा ने टिप्पणी की। "हाँ बेटा, तुम्हारी दादी में बहुत सारी खामियाँ थीं। मैंने भी प्रियंका के बहुत कहने पर भी उस की सहेली को बुलाने पर जोर नहीं दिया। मैं भी उनका ही बेटा था न!" मैंने सहमति दी।

"मिस श्रेया, मुझे बहुत दुख है कि मैंने आपसे पहले मिलने का समय नहीं निकाला।" नीलिमा ने ईमानदारी से कहा। "यह मेरी गलती थी... हम सब की गलती थी। इकलौती आप माँ का परिवार हैं, और हमने आपको अनदेखा किया... जैसे हमने उन्हें अनदेखा किया।"

"ओह, अपनी दुख भरी छोटी सी अपराध बोध की दुनिया से बाहर निकलो," श्रेया ने चिढ़कर कहा। "मैं मर रही हूँ। मैं दुख भरी कहानियाँ नहीं सुनना चाहती। अब मुझे यशस्वी के बारे में बताओ, वह कैसा आदमी है? दिखता तो सुंदर है।” कुछ देर बाद श्रेया ने आँखें बंद कर लीं, और मुझे पता था कि वह किसी भी क्षण सो जाएगी। मैं उसे उठाकर अंदर ले जाने ही वाला था, तभी मैंने उसकी धीमी आवाज सुनी, "मुझे खुशी है कि तुम सब यहाँ हो। आज प्रियंका के पास उसके परिवार का होना अच्छा है।" वह हमें एक परिवार की तरह मानती थी क्योंकि हम प्रियंका के थे। ऐसी बिना शर्त स्वीकृति से मैं परिचित नहीं था। मेरे परिवार मेँ कभी किसी को इस बात की परवाह नहीं थी कि प्रियंका मेरी पत्नी थी और उसकी खुशी और दुख मेरे भी साझे हैं। और उन्होंने अपनी नाराजगी और नापसंद छिपाने की कभी परवाह नहीं की थी। मेरे माता-पिता ने अपनी मृत्यु तक प्रियंका को स्वीकार नहीं किया। यहाँ श्रेया थी, जिसे हमने तिरस्कृत किया था; जिसे प्रियंका की शादी में आने तक की अनुमति नहीं दी थी। और उसने हमारा पूरी तरह से और खुले दिल से स्वीकार किया। जब मैं श्रेया को उसके कमरे में ले गया तो नीलिमा और प्रियंका भी मेरे पीछे आ गई थीं।

"थक गई?" प्रियंका ने श्रेया के बिस्तर पर जगह बनाई ताकि मैं उसे लिटा सकूं। जैसे ही मैंने उसे लिटाया, प्रियंका ने उसके गरम जूते उतार कर उसे रजाई उढ़ा दी, उसके गालों को सहलाया और मुझे देखा। "काश मैं उसके लिए और कुछ कर पाती," उसने फुसफुसाते हुए कहा। "उसे सहज बनाने के लिए और कुछ। मैं बस...."

"बेबी, गुस्सा मत होना ...," मैंने कहा, और उसने मेरी तरफ चिंता भरी निगाहों से देखा। मैंने आह भरी। वह हमेशा मुझसे सबसे बुरा करने की ही आशंका करती थी। और मैं भी यही कर रहा था, हर समय उससे गुस्सा होने की आशंका करता था। हम दोनों ही को इसे रोकने की जरूरत थी। क्या हम दोनों को अलग-अलग थेरपी के अलावा जोड़े की थेरपी भी लेनी चाहिए? "गुस्सा मत होना, लेकिन मैंने श्रेया के लिए एक नर्स को रखा है। उसे ऐसे मरीजों का अनुभव है। वह सुनिश्चित करेगा कि उसे घर पर ही इंजेक्शन मिल जाए, ताकि हमें उसे क्लिनिक में न ले जाना पड़े जिससे उसे यात्रा की तकलीफें न झेलनी पड़ें। और—--"

प्रियंका उछल कर मेरे पास आई और रोते हुए जैसे मेरी बाँहों में कूद पड़ी। मैंने उसे और खुद को बड़ी मुश्किल से संभाला। उसने मेरे मुंह को चूमा। "धन्यवाद। थैंक्स, थैंक्स, थैंक्स।"

"प्रियंका, मैं कम से कम इतना तो कर ही सकता हूँ।" मैंने उसे अपनी बाँहों में भर लिया। मुझे परवाह नहीं थी कि वह मेरी बाँहों में क्यों थी; मैं बस आभारी था कि वह थी। और मुझे यह बहुत अच्छा लगा था। "नहीं" उसने अपना सिर हिलाया, और उसके गालों पर आँसू बह निकले "तुम्हें उसके लिए कुछ भी करने की ज़रूरत नहीं है। वह तुम्हारी कुछ नहीं है।"

"आंटी परिवार हैं माँ," नीलिमा ने कहा, और हमारे तीन-तरफा आलिंगन में जुड़ गई।

यशस्वी, रंजीत और मैंने सुबह रिटेनिंग वॉल तैयार करने और अस्थायी सपोर्ट लगाने में बिताई। नहाने के बाद, मैं नीचे आया तो खाने और खाना पकाने की खुशबू आ रही थी। पहले, जब प्रियंका खाना बनाती थी, तो नीलिमा, शाश्वत और मैं अपना काम करते थे। प्रियंका अकेले ही हमारे लिए खाना बनाती थी - हमारी छुट्टियाँ सुंदर बनाती थी।

यह पहले से ऐसा नहीं रहा था। बच्चे छोटे थे तो उसके साथ रसोई में घूमते थे, और मैं भी। जैसे-जैसे वे बड़े होते गए, वे मेरी ओर अधिक आकर्षित होते गए। यह सब इतना धीरे-धीरे और स्वाभाविक रूप से हुआ कि मुझे कभी पता ही नहीं चला कि कब हमने प्रियंका को अकेला छोड़ दिया। अब नहीं। न इस दीपावली पर न ही और फिर कभी। अब नहीं!

सनशाइन होम्स रिज़ॉर्ट के रसोईघर में बहुत चहल-पहल थी, दीपावली के खाने की सुगंध और दीवारों से गूंजती हंसी की आवाजें। प्रियंका चूल्हे के पास खड़ी थी और एक बर्तन को संभाल रही थी। शाश्वत और नीलिमा किचन आइलैंड पर साथ थे, सब्जियाँ काट रहे थे और एक दूसरे को चिढ़ा रहे थे जैसा कि सिर्फ़ भाई-बहन ही कर सकते हैं। यशस्वी हाथ में वाइन का गिलास लिए किचन आइलैंड पर बैठा था। नीलिमा के अनुसार यशस्वी अच्छा कुक नहीं था और उसे खाने के आस-पास भी नहीं आने देना चाहिए, क्योंकि वह पता नहीं क्या कर देगा। मैं नीचे झुका और प्रियंका के गालों पर अपने होंठ फेर दिए। मैं तब तक स्वतंत्रता ले रहा था जब तक वह मुझे न रोके। उसकी मुस्कान और चेहरे की लाली देख कर मुझे भगवान से तोहफा मिलने जैसा लगा। "मैं कैसे मदद कर सकता हूँ?" मैं बुदबुदाया।

वह घबरा गई और उसने बच्चों की तरफ देखा जो हमें देख रहे थे। नीलिमा ने मुझे समझदारी और शैतानी भरी मुस्कान दी और शाश्वत तो ऐसा लग रहा था कि वह रो पड़ेगा। मैं जानता था कि प्रियंका के चले जाने के लिए वह खुद को दोषी मानता है। मैंने समझाया भी था कि गलती मेरी है, लेकिन उस पर बोझ था, और यह कोई बुरी बात भी नहीं थी। अच्छा ही था कि उसने अपने व्यवहार की जिम्मेदारी ली, जिससे वह हमेशा लोगों के साथ व्यवहार मेँ सावधान रहेगा। मैंने ईमानदारी से प्रियंका से कहा था कि वही हमारे परिवार का केंद्र है। उसके बिना, चाहे हम उसके साथ कैसा भी व्यवहार करते रहे हों, हम खोये हुए थे। उसकी शांत उपस्थिति हमारे जीवन में सब तरफ व्याप्त थी, भले ही हमने गलतियाँ की हों। "आलू छील सकते हो।" प्रियंका ने सिंक के पास रखे एक बैग की ओर इशारा किया। मैं काउंटर पर खड़ा होकर आलू छील रहा था, अपने परिवार को एक साथ काम करते हुए देख रहा था, कमरे में घर जैसा अहसास हो रहा था।

शाश्वत ने गलती से गाजर गिरा दी और नीलिमा ने उसे खूब चिढ़ाया। यह हंसी संक्रामक थी, जैसे वे फिर बच्चे थे, बेफिक्र, खुश, जैसे कि केवल बच्चे ही हो सकते हैं। प्रियंका की और मेरी नज़र मिली और वह मुस्कराई, एक सच्ची, दिल से निकली मुस्कान जो मेरे अंदर तक पहुँच गई, जिससे खुशी और अफसोस दोनों का एहसास हुआ। पिछले कुछ सालों में साथ समय न गुजर कर हमने कितना कुछ खो दिया! प्रियंका हमेशा हमारी पारिवारिक परंपराओं को जीवित रखने में अहम भूमिका निभाती रही। अब उसे देखकर, उत्साहित, व्यस्त, और बच्चों से घिरी हुई, पूरी तरह उनके सौहार्द का हिस्सा, जैसे मेरा स्वर्ग लौट आया हो। "आलू छीलने में मदद चाहिए, पापा?" शाश्वत की आवाज ने मेरे विचारों को तोड़ दिया, और मैंने उसे भी एक छिलका उतारने वाला चाकू थमा दिया। मैं इस अवसर के लिए ईश्वर का आभारी था, जिसमें हम सब शामिल थे। हम एक आरामदायक दिनचर्या में सरलता से छीलने और बात करने लगे, कमरा हंसी-मजाक से भर गया, पारिवारिक प्रेम का एक स्वर्ग। हम रसोई में साथ थे, हर कोई योगदान दे रहा था। मुझे एहसास हुआ कि यह खाना बनाने से कहीं ज़्यादा हमारे परिवार को एक धागे में पिरोने जैसा था, जो पिछले सालों से ज़्यादा मजबूत और जीवंत लग रहा था। यही तो छुट्टियों का मतलब है, यह एकता, यह हँसी, और मिलकर खाना बनाना, जो सिर्फ़ मेज़ पर रखे खाने से पेट भर लेने से कहीं ज़्यादा का प्रतीक था।