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गुरुवार, 17 सितंबर 2026

Ramcharitmanas Stuti Song - Balkand 35.185

श्री राम चरित मानस बाल कांड 35.185  

श्री रामचरितमानस में अनेक स्तुतियाँ हैं। यह स्तुति बालकांड में आती है। 

श्री शिव जी यह कथा माता पार्वती को सुना रहे हैं। वे कहते हैं कि श्री राम अवतार से पूर्व धरती माता पापियों के पापों का बोझ न उठा पाने की बात लेकर, गौ रूप धारण कर देवताओं और संतों के पास गईं । वे सब मिलकर ब्रह्मा जी के गए। शिव जी गिरिजा जी से कहते हैं कि उस चर्चा में मैं भी था और मैंने ब्रह्मा जी से कहा कि श्री नारायण सब भक्तों की प्रार्थना सुन कर उन्हें तारते हैं। 

यह सुन ब्रह्मा जी भक्ति भाव में लीं हुए और उन्होंने नारायण स्तुति गाई जिसके बाद श्री विष्णु ने राम अवतार की रूप में आने का आश्वासन दिया । 

यह विडिओ यूट्यूब पर हैं और मानस जी के दोहों और छंदों को ही एक गीत के रूप मेँ ढाला गया है । आशा है आप लोगों को पसंद आएगा । 

 
The sacred Hari Stuti (जय जय सुरनायक जन सुखदायक) from Goswami Tulsidas Ji's Sri Ramcharitmanas (Bala Kanda, Doha 185 and Chhands 1–4). 🌸 STORY CONTEXT: Lord Shiva explains to Goddess Parvati how Lord Brahma rejoiced upon hearing that Lord Vishnu is omnipresent and revealed through pure love. Overflowing with devotion and tears of joy, Lord Brahma raises his hands in prayer to praise Lord Narayan on behalf of all Devas, Sages, and Mother Earth. सुनि बिरन्चि मन हरष तन पुलकि नयन बह नीर। अस्तुति करत जोरि कर सावधान मतिधीर ॥ जय जय सुरनायक जन सुखदायक प्रनतपाल भगवन्ता। गो द्विज हितकारी जय असुरारी सिन्धुसुता प्रिय कन्ता॥ पालन सुर धरनी अद्भुत करनी मरमु न जानइ कोई। जो सहज कृपाला दीनदयाला करउ अनुग्रह सोई ॥ जय जय अबिनासी सब घट बासी व्यापक परमानन्दा। अबिगत गोतीतम् चरित पुनीतम् मायारहित मुकुन्दा॥ जेहि लागि बिरागी अति अनुरागी बिगतमोह मुनिबृन्दा। निसि बासर ध्यावहिं गुनगन गावहिं जयति सच्चिदानन्दा ॥ जेहिं सिरिष्टि उपाई त्रिबिध बनाई संग सहाइ न दूजा। सोइ करउ अघारी चिन्त हमारी जानिय भगति न पूजा॥ जो भव भय भन्जन मुनि मन रन्जन गन्जन बिपति बरूथा। मन बच क्रम बानी छाड़ि सयानी सरन सकल सुर जूथा ॥ सारद श्रुति सेषा रिषय असेषा जा कहुँ कोउ नहिं जाना। जेहि दीन पिआरे बेद पुकारे द्रवउ सो श्रीभगवाना॥ भव बारिधि मन्दर सब बिधि सुन्दर गुनमन्दिर सुखपुन्जा। मुनि सिद्ध सकल सुर परम भयातुर नमत नाथ पद कन्जा ॥

शनिवार, 28 मार्च 2026

ज़िंदगी अधूरी तेरे बिन - भाग चौंतीस (34) समापन अंक

 

 ज़िंदगी अधूरी तेरे बिन - भाग चौंतीस (34)

समापन अंक 



भाग 34

प्रियंका


उस शाम, मैंने ऐसे पार्टी वाले कपड़े पहने जो मैंने काफी समय से नहीं पहने थे, और जिन्हें मैं द्वीप पर नहीं ले गई थी। वहाँ ऐसी कोई जरूरत भी नहीं थी।

मैंने लैवेंडर शिफॉन की ड्रेस पहनी जो मुझे पता था कि मुझ पर अच्छी लगेगी। मैंने कुछ गहने भी पहने जो अंशुमन ने मेरे लिए पहले खरीदे थे। मैंने सोचा था कि मैं जाकर अपने बाल ठीक करवा लूं जैसा कि मैं आमतौर पर ऐसी पार्टियों के लिए करती थी, लेकिन मैंने ऐसा न करने का फैसला किया। मेरे बाल मुझे अंशुमन की अच्छी पत्नी या साथी नहीं बनाते थे। इसलिए, मैंने अपने बालों को अपने कंधों का आसपास खुला छोड़ दिया और उन्हें चमक देने का लिए खूब ब्रश किया। "तुम एक दर्शनीय दृश्य हो बेबी" वह बुदबुदाया।

"चूमना नहीं," मैंने नखरे से कहा, "मेरी लिपस्टिक..."

"लिपस्टिक को भाड़ में भेजो पत्नी-श्री.... ।" उसने मुझे गहराई से चूमा और मेरी लिपस्टिक को पूरा फैला दिया, जैसा कि हम दोनों जानते थे कि वह ऐसा ही करेगा। उसने अपनी करतूत को देखने का लिए मुझे कंधों से थाम कर कुछ दूर किया। "मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूँ, बेब।" मुझे लगा कि मेरे अंदर से गर्मी निकल रही है और मैं उत्तेजित हो रही हूँ। दो दशक बाद भी मेरे पति में यह क्षमता थी।

"अगर तुम चाहो तो हम अभी .... " मैं शैतानी से मुस्कराई। लेकिन उसने मुझे थाम लिया।

"समय नहीं है।"

"खेल बिगाड़ू खिलाड़ी।" मैंने हँसते हुए अपना बैग उठाया और कुछ टिश्यू लिए ताकि मैं अपना चेहरा ठीक कर सकूं, क्योंकि अंशुमन ने मेरी लिपस्टिक को बहुत खराब कर दिया था।

जब हम होटल पहुँचे और बॉल रूम में जाने ही वाले थे, मैंने अंशुमन की बाँह पकड़ ली। "तुम मुझे सारी रात अकेली नहीं छोड़ोगे, है न?" पुराने डर अभी भी थे, और पार्टी के दबाव मेँ, वे सामने आ गए। अंशुमन के लिए भी यही था, उसे चिंता थी कि अगर उसने अनजाने में कोई गलती की तो मैं उसे छोड़ दूंगी। लेकिन हम अब अपने डर पर खुल कर बातें करते थे।

"केवल बाथरूम जाने के लिए, बेब।" वह मुस्कराते हुए बोला।

मैंने मुंह बनाया। "तुम कोमल भावनाओं को बढ़िया व्यक्त करते हो जी!"

"मैं जानता हूं जी। यह एक कौशल है।" वह शरारत से मुस्कराया, और इस बात ने मुझे सहज कर दिया। उसने मेरी ज़रूरतों या मेरी इच्छाओं को नजरअंदाज नहीं किया, लेकिन उसने इसे कोई बड़ी बात भी नहीं बनाया; बस इतना कहा कि वह मेरे लिए हमेशा मौजूद रहेगा और आगे बढ़ गया। हम पुराने जीवन मेँ वापस नहीं जा रहे थे, हम आगे बढ़ रहे थे।

यह एक शानदार पार्टी थी और हम दोनों ने पहले से कहीं अधिक आनंद उठाया। फिर अंशुमन मंच पर गया। वहाँ उसे सीईओ और अध्यक्ष पद से स्थायी रूप से हटने की घोषणा करनी थी। "आज रात यहाँ आने का लिए आप सभी का धन्यवाद।" वह बहुत आकर्षक था, और अपने पति को कमरे पर नियंत्रण करते देख मुझे रोमांच महसूस हुआ।

दुर्भाग्य-वश, तभी काव्या ने मुझे ढूंढ कर मुझसे बातें करने का निर्णय लिया। वह अभी भी कंपनी में थी, हालांकि अब वह अंशुमन की असिस्टेन्ट नहीं थी। "नमस्ते, प्रियंका जी।"

मैंने उसे एक सतही मुस्कान दी और जवाब में सिर हिलाया, फिर अपना ध्यान वापस अपने पति की ओर लगाया। अंशुमन की आंखें चिंता से चमक उठी थी, लेकिन मैंने अपना सिर हिलाया और उसे चुपचाप दूर से ही आँखों से उसे समझाया कि वह चिंता न करे। मुझे अब तुम्हारे सहारे का भरोसा मिल गया है, मेरे प्यारे अंशुमन।

"जब मैं मौज-मस्ती करता रहा हूँ, उस दौरान प्रभाकर ने शानदार काम किया है," अंशुमन ने कहा, उसकी नज़रें मुझसे हटकर अपने उत्तराधिकारी पर चली गईं। "यहाँ आओ, प्रभाकर।"

जैसे ही प्रभाकर मंच पर चढ़ा, काव्या ने कहा, "मैं आप दोनों को एक साथ देखकर आश्चर्यचकित हूं।"

मैंने काव्या की उपेक्षा करते हुए अंशुमन की बात पर ताली बजाई।

"प्रियंका जी, मैं----"

"शशशश, काव्या, अंशुमन बोल रहे हैं। बाद मेँ बात करें?" मैंने दृढ़ता से कहा।

भगवान, लेकिन वह नासमझ थी, मैंने सोचा। बहुत दर्दनाक। वह जवान लड़की थी, भ्रमित थी, और अपने बॉस का प्रति आसक्त थी। उसका शादीशुदा बॉस। मुझे उसके लिए बुरा लगा। मुझे लगा था कि मेरे जाने का बाद अंशुमन का साथ उसके उस व्यवहार के लिए मुझे गुस्सा या नाराजगी महसूस होगी, लेकिन सिर्फ दया आई। वह उम्र बढ़ने पर समझदार हो जाएगी, और मुझे उम्मीद थी कि वह इस समय को बिना ज्यादा झिझक के याद कर सकेगी।

"मैं जानता हूँ कि मैंने कहा था कि मैं गर्मियों में वापस आऊंगा, लेकिन मैंने सीईओ और अध्यक्ष पद से हटने का फैसला किया है।" सभा में हैरानी भरी कानाफूसी चल पड़ी। "जैसा कि आप में से कुछ लोग जानते हैं, मेरी पत्नी लक्षद्वीप में एक रिसॉर्ट चलाती है, और हम अब वहीं रह रहे हैं, हालांकि हम अभी भी यहाँ अपने घर से आते-जाते रहेंगे। मैं राव-सिन्हा-आर्किटेक्ट्स-एण्ड-बिल्डर्स के बोर्ड में काम करना जारी रखूंगा और उन परियोजनाओं पर काम करूंगा जिनमें प्रभाकर मुझे शामिल करने का फैसला करेंगे" अंशुमन ने प्रभाकर की ओर मुस्कराते हुए कहा "लेकिन अब इस कंपनी की बागडोर और आप सब की भलाई को किसी और को सौंपने का समय आ गया है। मैं प्रभाकर को अपना मित्र और असाधारण सहकर्मी मानता हूँ।" सभी ने तालियाँ बजाईं। मैं भी उनमें शामिल हो गई।

"आप उनकी ज़िंदगी बर्बाद कर रही हैं। वह कंपनी का साथ बहुत बढ़िया काम करने वाले थे, कंपनी को और ऊंचा ले जाने वाले थे," काव्या आक्रोश मेँ फुसफुसाई, "और आप----"

"शश, काव्या," मैंने इस बार कड़े लहजे मेँ कहा। "अंशुमन अभी भी बोल रहे हैं न?” मैंने उससे कभी इस रुखाई से बात नहीं की थी। लेकिन मैं एक नई महिला बन चुकी थी।

"प्रियंका, डार्लिंग, यहाँ आओ, बेब," मैंने अंशुमन को कहते सुना।

मैं स्टेज पर गई और उस ने मेरा हाथ थाम लिया और मुझे धीरे से माइक्रोफोन की ओर ले गया। उसे पता था कि मुझे ध्यान का केंद्र बनना पसंद नहीं है, लेकिन उसने पहले ही मुझसे इस बारे में बात की थी। उसने कहा, "मैं सबसे शेयर करना चाहता हूँ कि हमारी शादी के बीस साल पूरे हो चुके हैं। मेरी पत्नी प्रियंका और मैं बीस साल से शादीशुदा हैं।"

पूरे कमरे में बधाई की तालियाँ और सीटियाँ बजने लगीं।

"वह सबसे खूबसूरत इंसान है जिसे मैं जानता हूं।" उसने मुझे नहीं बताया था कि वह मेरे बारे में बात करेगा। मुझे लगा था कि वह हमारे रिसॉर्ट के बारे में ही कुछ कहेगा। "प्रियंका सर्वश्रेष्ठ पत्नी है जो इस दुनिया का कोई भी आदमी पा सकता हो। वह सबसे अच्छी माँ है जिसका कोई भी बच्चे सपने देख सकते हों। मैं उसके साथ एक नई यात्रा शुरू करने के लिए रोमांचित हूँ।" फिर उसने मुझे चूम लिया, जिस पर कमरे में तालियाँ गूंज उठीं। मैं शरमा गई। "राव-सिन्हा-आर्किटेक्ट्स-एण्ड-बिल्डर्स को आज की आधुनिक कंपनी बनाने में मदद करने का लिए आप सभी का धन्यवाद। मैं अभी कुछ दिन यहाँ रहूँगा, और मुझे उम्मीद है कि जब भी मैं कार्यालय में आऊँगा, आप सभी से मिलूँगा।"

उसने मुझे बांहों में भर लिया और फुसफुसाया, “घर जाने का समय हो गया है डार्लिंग।” मैं कान से कान तक मुस्करा रही थी। जब प्रभाकर ने माइक्रोफोन संभाला तो अंशुमन मुझे लेकर मंच से उतर आया।

प्रभाकर ने अंशुमन को इस निर्णय और नेतृत्व की घोषणा का लिए धन्यवाद दिया, और पूरा कमरा फिर एक बार तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। जैसा कि योजना थी, जैसे ही प्रभाकर ने राव-सिन्हा आर्किटेक्चर कंपनी के लिए अपने दृष्टिकोण की रूपरेखा तैयार करना शुरू किया, अंशुमन और मैं चुपचाप बॉल रूम से बाहर निकल गए। अब समय आ गया था कि कंपनी नए नेतृत्व के तहत आगे बढ़े।

"मैं घर पहुँचने का इंतजार नहीं कर सकता" अंशुमन ने मुझे तिरछी नजर से देखते हुए पार्किंग की ओर जाते हुए अपने होंठ मेरे कान पर रगड़े।

मैंने उसकी ओर देखकर मुस्कराई। "मैं तुमसे प्यार करती हूँ, मेरे प्यारे अंशुमन।"

“मैं तुमसे प्यार करता हूँ, मेरी प्यारी प्रियंका।"

और हम अपनी नई शुरुआत की तरफ चल पड़े।

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अस्वीकरण/ Disclaimer

यह एक पूरी तरह काल्पनिक कहानी है। इसका किसी भी जीवित या मृत व्यक्ति, या परिवार से कोई संबंध नहीं है। 

This is a work of fiction. It is not relevant to any person(s), or families




गुरुवार, 26 मार्च 2026

ज़िंदगी अधूरी तेरे बिन - भाग तैंतीस (33)

 

 ज़िंदगी अधूरी तेरे बिन - भाग तैंतीस (33)




भाग 33

प्रियंका


दीपावली से पहले मेरे बैंगलोर से चले जाने के बाद, हम पहली बार मई महीने के अंत में बैंगलोर आए। अंशुमन आधिकारिक तौर पर कंपनी की बागडोर प्रभाकर को सौंप रहा था, और एक आलीशान होटल के बड़े कॉन्फ्रेंस हॉल में इस से जुड़ा कार्यक्रम चल रहा था।

मैं अंशुमन के साथ बैंगलोर आने को लेकर कुछ घबराई हुई थी। मुझे चिंता थी कि एक बार हम यहाँ आ गए, तो मेरा प्रिय अंशुमन फिर से उसी अजनबी व्यक्ति में बदल जाएगा जिससे मैं पिछले कुछ सालों से परेशान हो गई थी। मैंने उससे इस बारे में खुलकर बात की, अब हम बातचीत करने लगे थे। हम जोड़ों की काउंसलिंग के लिए भी गए थे, जिससे हमें एक-दूसरे से बेहतर संवाद करना सीखने में मदद मिली। बातचीत करना एक बहुत ही सरल काम है, और फिर भी खुल कर बात करना सीखने में हमें बीस साल लग गए। हमारे यहाँ मानसिक चिकित्सकों के पास जाने के विरुद्ध एक पूर्वाग्रह है। सौभाग्य से हम इस पूर्वाग्रह से निकल कर यह मदद ले पाए थे।

हमारे घर पहुँचने के अगले दिन रक्षित ने हमें अपने घर पर दोपहर के खाने के लिए आमंत्रित किया था। देविका ने अपने खूबसूरत बगीचे में भोजन का आयोजन किया था। उनके घर पर एक बड़ा कर्मचारी दल था, जिसमें एक रसोइया, या यूँ कहें कि शेफ, शामिल था, जैसा कि देविका उसे संबोधित किया करती थी।

रक्षित ने पारिवारिक व्यवसाय में बिल्कुल हाथ नहीं डाला था और अपना अलग रास्ता चुन कर बड़ी मात्रा में धन कमाया था। जब अंशुमन ने अपने पिता से कार्यभार संभाला, तब रक्षित ने राव-सिन्हा-आर्किटेक्ट्स-एण्ड-बिल्डर्स कंपनी की अपनी पूरी हिस्सेदारी अंशुमन को बेच दी थी। देविका अभी भी इस बात से परेशान होती थी, क्योंकि तब से अब तक कंपनी बहुत बड़ी हो गई थी। उसे लगता था कि उसे और रक्षित को हिस्सा मिलना चाहिए। रक्षित को इसकी परवाह नहीं थी। मैं समझ नहीं पाती थी कि देविका को इसकी परवाह क्यों थी, जबकि उनके पास पहले से ही बहुत धन था। इस महिला का लिए इतना कुछ पर्याप्त क्यों नहीं था? "मेरा भाई एक नया आदमी बन गया है, प्रियंका," रक्षित ने मुझे कहा, जब हम शैंपेन का साथ एक खूबसूरत मेज का चारों ओर बैठे थे। “मुझे तो यह वही पुराना आदमी लगता है।" मैं अंशुमन की ओर झुकते हुए मुस्कराई, जिसने अपना हाथ मेरे गले में डाल रखा था।

"क्या तुम्हें उस उजड़े हुए द्वीप पर बैंगलोर की रौनक याद नहीं आती?" देविका ने कहा।

"वह उजड़ा हुआ नहीं है। और हाँ, कभी-कभी याद आती भी है, इसीलिए तो हम यहाँ हैं।" अंशुमन बोला। वह वैसा ही स्नेही हो गया था, जब हम पहली बार मिले थे। लेकिन अब कुछ अलग था। हमारे रिश्ते में एक परिपक्वता, एक शांति विकसित हुई थी, जो पहले नहीं थी, एक दूसरे पर विश्वास और आस्था पर आधारित एक स्थिरता की भावना।

"प्रियंका, अच्छा हुआ कि तुमने अंशुमन को वापस पा लिया, है न? क्योंकि तुम लोग अलग हो जाते तो तुम्हारे पास कुछ भी नहीं बचता।" देविका की आँखों में जलन और दुर्भावना भरी चमक थी। और मुझे इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ा। वह मेरे लिए कोई नहीं थी, कोई मायने नहीं रखती थी, पहले भी नहीं रखती थी। मैं उसे सिर्फ इसलिए बर्दाश्त करती थी, क्योंकि वह परिवार की सदस्य थी, लेकिन उसने मुझे कभी प्रभावित नहीं किया। खासकर अब, जब मैं अपनी शादी में इतना सुरक्षित महसूस कर रही हूँ।

"देविका," अंशुमन की आवाज़ तीखी थी, उसने मेरे कंधे को अपने हाथ से दबाया, "प्रियंका अगर चली गई होती तो हमारी सारी संपत्ति का आधा हिस्सा उसे मिलता।"

देविका ने उपहास किया। "मैं तुम्हारे प्री-नेपुटल समझौते का बारे में सब जानती हूँ, अंशुमन। श्रीमती राव-सिन्हा ने मुझसे कहा था ---"

"उस प्री-नेपुटल समझौते का अब कोई अर्थ नहीं है। मैं खुद अपनी पत्नी को जीवन के बीस वर्षों बाद ऐसे नहीं जाने देता। और हाँ देविका, यह याद रखना कि मैं उसे मनाने वहाँ गया था, वह मुझे मनाने नहीं आई थी। उस समझौते का अब कोई अर्थ ही नहीं रह गया है। यदि मेरे मनाने से वह राजी न होती, तो मैं अपनी हर चीज का आधा हिस्सा उसे देता" उसने बीच में ही बात काट दी, और मैंने देविका की आँखों में आश्चर्य और निराशा देखी।

"क्या? लेकिन वह कानूनी समझौता था, जिसके अनुसार ...." उसने विरोध किया।

“क्यों नहीं? वह समझौता प्रियंका पर बाध्य था, मुझ पर नहीं। मैं उसे आधा हिस्सा देना चाहता, तो कोई समझौता मुझे नहीं रोक सकता था। वैसे भी, मैंने उसे रद्द कर दिया है” अंशुमन ने कंधे उचका दिए। "अब ऐसा कोई समझौता नहीं है। वैसे भी, तुम्हें नहीं लगता कि एक सुखद लंच के दौरान ऐसी बातें उठाना अशिष्टता है?"

"क्या तुम पागल हो गए हो?" देविका ने झल्लाकर रक्षित की ओर देखा। "क्या तुम्हें इस बारे में पता है?" रक्षित ने आह भरी। "हाँ, देविका, पता है। इसमें हमारा कोई लेना-देना नहीं है, इतनी शिष्टता तो समझती होगी? अंशुमन का पैसा उसका है, बल्कि उन दोनों का है।"

"तुम ने अंशुमन को ऐसा मूर्खता पूर्ण काम करने की अनुमति कैसे दी?" देविका ने ऊंची आवाज में कहा। फिर वह अंशुमन की ओर मुड़ी। "तुम ऐसी मूर्खता कैसे कर सकते हो?"

अंशुमन उठ गया और उसने अपना हाथ मेरी ओर बढ़ाया। मैंने भी हाथ पकड़ लिया और खड़ी हो गई। "हम जा रहे हैं," अंशुमन ने घोषणा की।

"लेकिन हमने अभी तक खाना नहीं खाया है," देविका चिल्लाई।

अंशुमन ने उसे अनदेखा किया और अपने भाई की ओर मुड़ा। "मैं तुमसे मिलूंगा, हाँ?"

रक्षित ने उदास होकर अपना शैंपेन का गिलास उठाया। "हाँ, अंशुमन। देविका के इस व्यवहार के लिए माफ़ करना, प्रियंका। और यह जान लो कि आप लोगों ने भले ही तलाक का विचार रद्द कर दिया है लेकिन मैं देविका को तलाक दे रहा हूँ। हमारा समझौता रद्द नहीं हुआ है और अब मैं इस क्रूरता के स्वभाव के साथ गुजारा नहीं कर सकता। "

"यहाँ क्या हो रहा है?" देविका ने चीखते हुए पूछा।

"तुम बहुत बुरा व्यवहार कर रही हो, देविका। और हमेशा से करती रही हो। यही हो रहा है, और मैं नहीं चाहता कि मेरे भाई की पत्नी तुम्हारी बकवास का शिकार बने, इसी अशिष्टता और क्रूरता की बात मेरा वकील तलाक के मुकदमे मेँ ‘कारण’ के रूप मेँ लिखेगा।"

“मैं भी तुम्हें अब अपनी पत्नी के लिए इस अपमानजनक व्यवहार की अनुमति नहीं दे सकता। तो अब यह बकवास बिल्कुल पूरी तरह बंद कर दो। इसका ध्यान रखना कि कहीं मुझे तुम पर प्रियंका की मान हानि का मुकदमा न करना पड़े।” अंशुमन ने शांति से कहा, लेकिन उसकी आवाज में कठोरता साफ झलक रही थी। देविका दंग रह गई। उसे पुराने अंशुमन की आदत थी। वह अंशुमन जो बातचीत को आगे बढ़ाने का लिए बात टाल देता था और मेरे अपमान को अनदेखा करता था। उसे इस सख्त अंशुमन की अपेक्षा नहीं थी। "मैं आपकी पत्नी के साथ अपमानजनक व्यवहार नहीं कर रही हूँ----"

"हाँ, तुम कर रही हो, देविका," मैंने धीरे से कहा। "तुम हमेशा से ऐसा ही करती रही हो। मुझे नहीं पता क्यों। शायद तुम्हें अच्छा लगता हो, लेकिन अब यह नहीं चलेगा। शुभ दिन।" घर जाते समय मैं हंस रही थी। "मैं ऐसी नहीं हूं, लेकिन यह बहुत अच्छा लगा," मैंने कहा।

अंशुमन ने मेरा हाथ अपने हाथ में लिया। "मुझे खेद है कि मैंने यह पहले नहीं किया। मुझे यह काम सालों पहले करना चाहिए था।"

"पुरानी बुरी यादें छोड़ कर हम आगे देख रहे हैं, है ना?"

"हाँ, बेब।" उसने मेरा हाथ अपने मुँह पर ले जाकर उसे चूम लिया। तभी उसका फ़ोन बज उठा, और उसने कार का ब्लूटूथ पर फ़ोन उठाया। "रक्षित, तुम स्पीकर पर हो। प्रियंका मेरे साथ है," उसने अपने भाई को चेतावनी दी।

"यार, मुझे माफ़ कर दो।"

"हम दोनों को तुमसे तो कोई शिकायत ही नहीं है रक्षित" अंशुमन ने कहा।

"प्रियंका? क्या तुम ठीक हो?"

"इससे बेहतर कभी नहीं थी, रक्षित। पूछने का लिए धन्यवाद।"

वह हंसा। "लग रहा है कि तुम दोनों एक जोड़े के रूप मेँ पहले कभी इतने अच्छे नहीं रहे। शायद मुझे लक्षद्वीप आना चाहिए, शायद मेरे मानसिक स्वास्थ्य के लिए अच्छा होगा"

"अपने बच्चों को भी लाना, उन्हें बहुत पसंद आएगा। गर्मियों का मौसम बहुत मजेदार होता है। और अंशुमन जल्द ही एक बड़ी नौका खरीदने वाला है," मैंने उत्साह से कहा।

अंशुमन ने मुझे सही करते हुए कहा, "नहीं प्रियंका। ‘मैं’ नहीं, ‘हम’ एक नौका खरीद रहे हैं। हाँ, रक्षित, तुम्हें आना चाहिए।"

"देविका को भी साथ ले आना। तलाक के बारे मेँ जल्दबाजी मत करो, जोड़े मेँ मनोचिकित्सक से मिल कर देखो। शायद कुछ बदल जाए?" मैंने कहा। वह परिवार की सदस्य थी।

"प्रियंका, तुम्हारा दिल बहुत बड़ा है" रक्षित ने आह भरते हुए कहा। कॉल खत्म होने का बाद, जब हम लाल बत्ती पर रुके, अंशुमन ने मेरी तरफ देखा। "वह सही कह रहा है। तुम्हारा दिल सच मेँ बहुत बड़ा है।" "वह सब भूल जाओ अंशुमन" मैंने कहा। अंशुमन हँस पड़ा। "हाँ, श्रेया," मैंने सोचा, "तुम सही थीं। वह मुझसे सच्चा प्यार करता है ।"

सोमवार, 23 मार्च 2026

ज़िंदगी अधूरी तेरे बिन - भाग बत्तीस (32)

 

 ज़िंदगी अधूरी तेरे बिन - भाग बत्तीस (32)



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भाग 32
अंशुमन

एक महीने बाद, फरवरी का एक गर्म दिन, हमने श्रेया की अस्थियों को विश्राम दिया और उसे अंतिम विदाई दी।

सूरज ने समुद्र पर एक शानदार चमक बिखेर दी थीं, जिससे पानी सोने और नीले रंग के विशाल कैनवस में बदल गया। साल के इस समय के लिए यह आश्चर्यजनक रूप से गर्म दिन था, और हवा में नमक की गंध और समुद्री पक्षियों की हल्की आवाजें थी। प्रियंका और मैं उस छोटी नाव के डेक पर एक-दूसरे का बगल में खड़े थे, जिसे हमने उस दिन के लिए किराए पर लिया था। हमारे हाथ आपस मेँ जुड़े हुए थे, हम दोनों संकल्प और शांति के मिश्रण के साथ क्षितिज को देख रहे थे।

जैसे ही कप्तान हमें उस जगह पर ले गया जिसे श्रेया हमेशा से पसंद करती थी - पानी का एक शांत विस्तार जहाँ अक्सर डॉल्फ़िन दिखाई देती थीं - मैंने भावनाओं की लहरों के बीच शांति की एक अंतर्निहित धारा महसूस की। यहीं, समुद्र की विशालता से घिरे हुए, हमने श्रेया की समुद्र में शामिल होने की अंतिम इच्छा का सम्मान करने का इरादा किया था।

प्रियंका ने मुझे अस्थि कलश थमा दिया। कुछ पल उसकी उंगलियाँ चिकनी सतह पर टिकी रहीं और फिर उसने छोड़ दिया। हमने मिलकर कलश खोला। जब हमने श्रेया की अस्थियाँ समुद्र में बिखेरीं, समुद्र ने उसका खुली बाँहों से स्वागत किया, चमकता हुआ पानी उसकी जीवंत आत्मा का लिए एक उपयुक्त श्रद्धांजलि थी। "हम तुम्हें याद करेंगे, श्रेया," मैंने धीरे से कहा। हवा ने मेरी विदाई को उड़ा दिया। प्रियंका ने मेरा हाथ हल्के से दबाया। उसकी आँखें बिना बहे आँसुओं से चमक रही थीं, साथ ही एक शांत कृतज्ञता से भी।

"ज़िंदगी बहुत छोटी है," प्रियंका ने मेरे कंधे पर सिर टिकाते हुए कहा। "हमें जीना है, अंशुमन। सच में जीना है। सिर्फ़ अपने लिए नहीं, बल्कि उसके लिए भी।"

“हाँ प्रियंका” हमने श्रेया की अस्थियों को गहरे नीले रंग में विलीन होते देखा, तो हम एक गहन मौन में डूब गए। उस शांति में, जब सूरज हमारे चेहरों को गर्म कर रहा था और हमारे सामने अंतहीन रूप से फैला विशाल सागर था, हमने भविष्य के लिए एक वायदा किया।

"हम अपना सर्वश्रेष्ठ जीवन जीएंगे, बेबी," मैंने वादा किया। "हम अपनी शादी को सफल बनाने के लिए अपना सब कुछ दे देंगे। हमें खुद के लिए और श्रेया के लिए वह जीवन जीना है जो वह खुद नहीं जी सकी।" वापस किनारे की ओर जाते हुए हमने अपने भविष्य के बारे में बात करने, योजनाएँ बनाने और आगे आने वाले बदलावों पर चर्चा करने में समय बिताया। बातचीत सहजता से आगे बढ़ी, पिछली शिकायतों का बोझ से मुक्त और उम्मीदों और साझा सपनों से भरी हुई। ऐसा लगा कि यह एक नई शुरुआत है या शायद उस स्थिति में वापसी है जिसकी हमने कभी कल्पना की थी।

जैसे ही नाव किनारे लगी और हम ठोस जमीन पर वापस आए, प्रियंका और मैं एक-दूसरे का हाथ थामे चल पड़े, हमारे कदम एक नई शुरुआत के वादे के साथ हल्के थे। वह अपनी मोहक मुस्कान मुस्कराई, जिसकी मुझे बहुत याद आती थी। "मेरे प्यारे अंशुमन ।"

मैं अपनी आंखों में आंसू भर आने से नहीं रोक पाया, और मेरे चेहरे पर आंसू बहने लगे। "मैंने कभी नहीं सोचा था कि मैं इस सम्बोधन को वापस पा सकूंगा।"

वह पंजों पर ऊंची उठी और मुझे चूमा "अगर तुम रोने वाले हो, तो मैं जाती हूँ।”

मैंने हंसते हुए कहा, "महीनों हो गए हैं, बेब, और मैं तुम्हें बहुत चाहता हूँ।” मुझे एहसास था कि मैं अपनी पत्नी को खोने ही वाला था, यह घर वापसी की भावना खोने वाला था जो मुझे किसी और के साथ नहीं मिल सकती थी। मैंने हमारे बंधन को मजबूत किया जिसे मैंने खुद ही मूर्खता से तोड़ दिया था।

वह लिविंग रूम मेँ चाय लेकर आई। मैं उसके बगल में पैर मोड़कर बैठ गया। मैंने अपनी हथेली खोली, और बाहर से आ रही रोशनी उसकी सगाई की अंगूठी पर पड़ी। मैंने सगाई की अंगूठी दिखाई और पूछा, "प्रियंका सिंह राव-सिन्हा, क्या तुम मेरी पत्नी बनोगी?"

उसने शांति से मेरी ओर देखा, "हाँ, मेरे प्यारे अंशुमन, मैं तुम्हारी पत्नी बनूँगी। मैं तुमसे बहुत प्यार करती हूँ मेरे प्यारे अंशुमन"

"हमेशा के लिए?"

"हाँ अंशुमन, हमेशा-हमेशा के लिए"

मैं हंस पड़ा। जब मैंने उसकी उंगली में अंगूठी पहनाई, मुझे लगा कि अब सब ठीक हैं।

उस रात, जब मैं फिर से उसे अपनी बाँहों में लेकर लेटा था, मैंने श्रेया को हमें फिर से साथ लाने का लिए धन्यवाद दिया - हमें बेहतर और मजबूत बनाने में मदद करने का लिए। और मुझे पता था कि अगर वह हमें देख रही होती, तो वह हँसते हुए कुछ ऐसा कहती, "अंशुमन, मेरी दोस्त का ध्यान रखना। चलो बाद में बात करते हैं, ठीक है न?"

बुधवार, 18 मार्च 2026

ज़िंदगी अधूरी तेरे बिन - भाग इकत्तीस (31)

  

 ज़िंदगी अधूरी तेरे बिन - भाग इकत्तीस (31)


भाग 31

प्रियंका

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श्रेया ने हमारे साथ नये साल का जश्न मनाया।

विजय हमारे साथ नए साल की पूर्व संध्या पर डिनर पर शामिल हुआ और हमने श्रेया के कमरे में शैंपेन के साथ मजे किए। उसने अपना पूरा ज़ोर लगा दिया लेकिन मुझे पता था कि उसका समय लगभग खत्म हो गया था। मैं उस रात श्रेया के साथ रही, और हमने उसी तरह बातें कीं जैसे हम बचपन में करते थे, उसकी या मेरी झुग्गी में, छिपकर, अपने माता-पिता से बचते हुए और हवाई महल बनाते हुए।

"तुम्हें वह दीपावली याद है जब मैंने अपने पापा से पैसे चुराए थे?" श्रेया ने कहा।

"हाँ, हमने पंजाबी ढाबे पर खूब ठूंस कर खाना खाया था। और फिर पिटाई भी तो हुई थी"

वह हंस पड़ी। "फ्राइड चिकन और तंदूरी रोटियाँ। ओह प्रियंका, अब तो मैं अपनी पसंदीदा चीजें भी नहीं खा सकती।" हम दोनों करवट लेकर लेटे हुए थे, बिस्तर का पास का लैंप धीरे-धीरे जल रहा था, जिससे हम एक-दूसरे को देख सकते थे।

"मुझे पता है," मैंने धीरे से कहा।

"अंशुमन कहता है कि वह तुम्हारे साथ यहीं रहने वाला है।"

"हाँ, वह कहता है! लेकिन बाद मेँ वह उकता जाएगा और मुझसे नफरत करने लगेगा।"

"बस करो, बुद्धू लड़की।" श्रेया अपनी कमज़ोर हालत में भी गुस्से से भर गई। "मैं यह कहने की कल्पना भी नहीं कर सकती थी, लेकिन वह आदमी तुमसे सच्चा प्यार करता है। अगर मैंने खुद नहीं देखा होता तो मैं इस पर यकीन नहीं करती।"

"तुम्हें सच मेँ ऐसा लगता है?"

"हाँ, प्रियंका। और तुम्हारे बच्चे भी। अरे, वे तो बहुत ही प्यारे हैं। शाश्वत ने जाने से पहले मुझसे बात की थी, मुझे गले लगाया। वह मुझे ‘श्रेया आंटी’ कहकर बुलाता है।"

मैंने उसका गाल को छुआ और कहा, "मुझे बहुत खेद है कि यह इतनी देर से हुआ।"

"खेद मत करो। खुश रहो कि अब तो ऐसा हुआ। मैं तो खुश हूं। पुरानी बातें याद कर के दुखी होना मूर्खता है जब अभी हमारे पास खुशी के लिए कई नियामतें हैं। "

"मैं तुमसे प्यार करती हूँ, श्रेया।"

"मैं भी तुमसे प्यार करती हूँ, प्यारी लड़की।"

यही हमारी आखिरी बातचीत थी। श्रेया गहरी नींद में सो गई, और जब वह जागी तो वह बेसुध थी, उसे होश नहीं था। विजय दिन-रात रिज़ॉर्ट में ही रहा, उसने मेरा कमरा ले लिया। मैं अंशुमन के साथ रहने लगी। वैसे भी हम ज़्यादा नहीं सोते थे। जब सोते तो जितना हो सके, श्रेया के पास ही सोते थे।

नया साल शुरू होने का एक सप्ताह बाद ही श्रेया की नींद में ही मौत हो गई। वह उस रात का बाद कभी नहीं जागी जब उसने मुझे कहा था कि अंशुमन मुझसे प्यार करता है।

उसकी मौत का बाद की सुबह गमगीन थी, महासागर का ऊपर घने बादलों की चादर छाई हुई थी, जो श्रेया को जानने वाले सभी लोगों का सामूहिक दुख को दर्शा रही थी। लहरों का टकराना शोकपूर्ण से ज़्यादा सम्मानजनक लग रहा था, यह मेरी प्यारी दोस्त के लिए एक स्वाभाविक श्रद्धांजलि थी।

अंतिम संस्कार गृह ने श्रेया को हमसे छीन लिया था, लेकिन मैंने कसम खाई कि उसकी आत्मा मेरे साथ रहेगी, जिसने मुझे मेरे दुख में भी मजबूत बना दिया। अंशुमन मेरे साथ था, उस की उपस्थिति शक्ति का एक मौन स्तंभ थी। शाश्वत और नीलिमा भी उस समय के लिए मेरे साथ आए, और मैं आभारी थी क्योंकि उनके आने से मुझे सुकून मिला। हम सभी ने श्रेया को खोया था, और हम सभी उसके लिए शोक मनाने और उस जीवन का जश्न मनाने के लिए एक साथ आए थे। मुझे पता था कि वह इसकी सराहना करेगी। जब वह जा रही थी, तो मुझे पता था कि वह मेरे बारे में चिंतित थी। लेकिन अंशुमन और बच्चों को देखकर उसे यकीन हो गया था कि अब मैं ठीक रहूँगी। मुझे पता था कि उसने अंशुमन से मेरी देखभाल करने का वादा करने का लिए कहा था; उसने मुझे बताया कि अंशुमन ने बिना किसी शर्त के यह वादा किया था।

"आपको कुछ तो खाना पड़ेगा, माँ।" नीलिमा ने अपना हाथ मेरे गले में डाल दिया, जब मैं लिविंग रूम की बड़ी खिड़कियों से बाहर देख रही थी, जहाँ हमने श्रेया का साथ परिवार का रूप में दीपावली मनाई थी। "जानती हूँ, लेकिन मुझे भूख नहीं है, बेबी।" मैंने अपना सिर उसके कंधे पर टिका दिया। अपने बच्चों को फिर से पाकर बेहतर लगा था - अंशुमन को यहाँ पाकर भी। जैसे श्रेया ने अपने जीवन के अंतिम दिनों की योजना बनाई थी ताकि मैं अपने परिवार को फिर से ठीक कर सकूँ, हमें एक साथ ला सकूँ।

"आंटी ने मुझसे कहा था कि वह आपकी अभिभावक देवदूत है, और आप उनकी अभिभावक देवदूत हो," नीलिमा ने मेरे बालों को सहलाते हुए फुसफुसाते हुए कहा।

"मैं कहाँ उसकी अभिभावक देवदूत थी? मैंने तो उसकी कुछ कीमो भी मिस कर दीं।“

"माँ, ऐसा मत सोचो। वे जानती थीं कि आप आना चाहती थीं। जैसे कि, उसी तरह, आज यशस्वी नहीं आ पाया है। मैं समझती हूँ कि उसकी व्यस्तता है। इससे हमें प्यार करने वाले नाराज नहीं होते माँ। माँ, यशस्वी को खेद है कि वह नहीं आ सका।"

"मुझे पता है, उसने आज सुबह मुझे फ़ोन किया था। उसे भी श्रेया पसंद थी। हर कोई उसे पसंद करता था। कोई उसे पसंद न करे यह संभव ही नहीं। वह थी ही इतनी अच्छी।"

"बिलकुल आपकी तरह, मम्मा।" नीलिमा ने मुझे झकझोरा। "हम सभी आपसे प्यार करते हैं, आपको पता है न? यहाँ तक कि अंकल रक्षित भी।"

"लेकिन चाची देविका नहीं," मैंने चिढ़ाते हुए कहा। "और तुम्हारी दादी भी थीं।"

"सच कहा" हम कुछ देर तक चुपचाप खड़े होकर समुद्र की लहरों को देखते रहे।

"माँ," नीलिमा ने चुप्पी तोड़ी, "मैं आपसे प्यार करती हूँ।"

"मेरे बेबी, मुझे भी तुम से प्यार है।"

"नहीं-नहीं माँ। मैं कह रही हूँ कि मैं आपसे प्यार करती हूँ। आप ने हमें एक दूसरे से ऐसा कहना सिखाया, लेकिन मुझे यह एहसास हुए काफी समय हो चुका है, कि मैंने लंबे समय से आप से ऐसा नहीं कहा था, क्योंकि मैंने आपके साथ समय बिताना ही बंद कर दिया था। लेकिन मैं बताना चाहती हूँ कि आपके बिना, हम वह परिवार नहीं होते जो गले मिलते हैं, चूमते हैं और एक दूसरे से कहते हैं कि ‘मैं तुमसे प्यार करता हूँ’। हम अंकल रक्षित और आंटी देविका की तरह रूखे परिवार होते, जिनके बच्चे स्नेह का भूखे हैं।"

"रानी बिटिया, पुरानी बातें छोड़ दो। हम आगे की ओर देखते हैं," मैंने धीरे से कहा। "अब पीछे मुड़कर नहीं देखना है।"

"आपका दिल बहुत बड़ा है माँ।"

"तुमने, शाश्वत और अंशुमन ने मुझे वह बनने में मदद की है जो मैं हूं।"

"और श्रेया आंटी ने भी"

"वह मेरे दिल की बहन थी। मुझे उसकी बहुत याद आएगी।" मैं फूट-फूट कर रोने लगी और नीलिमा ने मुझे थाम लिया। जल्द ही, मैंने महसूस किया कि पहले शाश्वत ने, और फिर अंशुमन ने भी मुझे अपनी बाँहों में जकड़ लिया है। हम तीनों रो रहे थे, एक परिवार की तरह एक साथ खड़े थे, एक-दूसरे को थामे हुए, शोक मना रहे थे।