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रविवार, 1 मार्च 2026

ज़िंदगी अधूरी तेरे बिन - भाग सत्ताईस (27)

 

ज़िंदगी अधूरी तेरे बिन - भाग सत्ताईस (27)



भाग 27

प्रियंका


जब रंजीत ने मुझे बताया कि अंशुमन चट्टान के पास दीवार बनाने जा रहा है तो मैं गुस्से मेँ तेजी से सीढ़ियों से ऊपर पहुंची। आखिर उसने मुझसे बात किए बिना ऐसा कैसे सोचा? मैंने दरवाज़ा खटखटाया और बिना जवाब का इंतज़ार किए, अंशुमन के कमरे में घुस गई और अपने पीछे दरवाज़ा बंद कर लिया। मैं अभी अंदर गई ही थी कि वह बाथरूम से बाहर निकला, गीला और नग्न, तौलिया उसके हाथ में था।

मेरे फेफड़ों से सारी हवा निकल गयी। वह मुस्कराया। "यह किसी सस्ती फिल्म का दृश्य लग रहा है।" उसने खुद को ढकने की कोई कोशिश नहीं की। मैं अपनी नज़रें नहीं हटा पा रही थी। हमें अंतरंग हुए कई महीने हो गए थे। हम शादीशुदा थे, मैं उसे प्यार करती थी और वह मुझे, और मुझे उसके साथ अंतरंगता पसंद थी। मुझे उसकी हमेशा याद आती थी। हमेशा उसकी याद आती थी।

"कपड़े पहन लो और मुझसे बात करो। मैं पूछने आई थी कि तुम पीछे की दीवार पर काम क्यों कर रहे हैं?" मैं किसी तरह से बोल पाई।

उसने कपड़े पहनते हुए ही कहना शुरू किया। "रंजीत ने मुझे एक समस्या दिखाई, जो गंभीर है। और लगता है कि श्रेया के पास पहले से ही सारी सामग्री है। मैंने एक योजना बना ली है। हम कल साफ-सफाई करेंगे और खुदाई करेंगे और डिनर से पहले एक अस्थायी संरचना बनाएंगे। फिर..... "

"कल दीपावली का दिन है।"

"मुझे पता है। इसे श्रेया और तुम्हारे लिए मेरी तरफ से दीपावली का तोहफा समझो।" टी-शर्ट पहनते समय उसकी आवाज धीमी हो गई थी।

"अंशुमन, तुम बस ऐसे ही ऐसा नहीं कर सकते.... "

"मैं एक आर्किटेक्ट हूँ; मुझे पता है कि यह कैसे करना है। तुम मुझ पर भरोसा करती हो, है न? कम से कम दीवार को ठीक करने के लिए तो भरोसा कर सकती हो?" उसने मेरी तरफ इतनी गहराई से देखा कि मेरा सारा गुस्सा गायब हो गया। अब यह रोना-धोना शुरू करना क्षुद्र होगा कि तुमने अनुमति क्यों नहीं मांगी? वह मदद कर रहा था। यह ऐसा काम था जिसे श्रेया और मैं दोनों जानते थे कि हमें पूरा करना है। लेकिन हम छुट्टियों के दौरान मज़दूरों की बुकिंग नहीं कर पाए थे और रंजीत के पास यह हुनर नहीं था।

"मैं तुम पर भरोसा करती हूँ ... निर्माण संबंधी सामान के मामले में।" मैं वहाँ खड़ी एक बेवकूफ की तरह महसूस कर रही थी।

"धन्यवाद, बेब।" उसकी आँखों में खुशी दिख रही थी और वह दीपावली की सुबह के बच्चे जैसा लग रहा था। "मैं तुम्हें निराश नहीं करूँगा।"

भगवान! वह अब इतना प्यारा और अच्छा क्यों था? पिछले दो सालों का वह चिड़चिड़ा आदमी कहाँ गया, जो हमेशा मुझपर भड़कता रहता था? "जानती हूँ" मैंने कहा "रंजीत, लीला और मीनू हमारे साथ आज दीपावली के डिनर के लिए शामिल होंगे। मीनू जल्दी सो जाती है, इसलिए हम डिनर से पहले दीपावली के उपहार देने वाले हैं।"

पहले हम दीपावली की सुबह उपहार खोलने वाले थे। लेकिन चूंकि रंजीत और लीला, रंजीत की मां के साथ दोपहर के खाने के लिए जाने वाले थे, इसलिए हमने दीपावली की पूर्व संध्या पर ही उत्सव मनाने का निर्णय लिया था। मैंने नियम बनाया था: उपहार केवल बच्चों के लिए थे, जिसमें अब मेरे बच्चे और यशस्वी भी शामिल हो गए थे। सौभाग्य से, मेहमान आज एक घंटे देर से खाने पर आने वाले थे, इसलिए मुझे इस बात की चिंता नहीं करनी पड़ी कि वे अलग-थलग महसूस करेंगे या कुछ उपहार लाने के लिए बाध्य होंगे। हालाँकि, मैंने सभी के लिए सनशाइन होम्स की ओर से स्थानीय स्तर पर बने छोटे-छोटे उपहार खरीदे थे, जिन्हें मैं दीपावली की सुबह नाश्ते के समय उनकी थाली के साथ परोसने वाली थी।

हमारे साथ रहने वाले दोनों जोड़े दीपावली के अगले दिन लौट रहे थे, और उसके बाद हम नए साल तक मेहमान नहीं लेने वाले थे। नीलिमा और शाश्वत अभी कुछ दिन रहने वाले थे, जब तक उसके कॉलेज मेँ छुट्टियाँ थीं। इससे मैं बहुत खुश थी। अंशुमन? खैर, वह तो कह रहा था कि वह महीनों यहीं रुका रहेगा।

"मैं मान रहा हूँ कि तुमने सबके उपहारों का ध्यान रखा होगा," उसने धीरे से कहा, और मैंने उसकी आँखों में कुछ हलचल देखी।

"हाँ।" अंशुमन हमेशा उपहारों मेँ मुझे आभूषण देता था। अच्छे गहने, लेकिन मैं उस अमीर समाज की पत्नियों मेँ से एक नहीं थी। मैं गहने पसंद तो करती थी, लेकिन गहनों से ज्यादा मैं हमेशा कुछ और निजी चाहती थी। अंत में, जब मैं बाहर निकली तो मैंने सब कुछ पीछे छोड़ दिया। मैं उपहार के रूप में अनुभव खरीदती थी। एक साल, मैंने नीलिमा के लिए एक समुद्री गोताखोरी का एडवेंचर खरीदा ताकि वह व्हेल देख सके। एक साल, मैंने शाश्वत के लिए रेस-ट्रैक का गिफ्ट सर्टिफिकेट खरीदा था ताकि वह फेरारी गाड़ी चला सके। अंशुमन के लिए, मैं हमारे लिए छुट्टियाँ खरीदती थी। लेकिन उनमें से कई को रद्द करने के बाद, मैंने यह बंद कर दिया और सिर्फ़ उसके लिए अनुभव खरीदना शुरू कर दिया। उसे गोल्फ पसंद था, इसलिए मैंने उसके लिए ओपन फाइनल के दो टिकट खरीदे थे। और वह मेरे बजाय रक्षित को ले गया था, जो ठीक ही था। मुझे तो गोल्फ कोई खेल ही नहीं लगता था।

इस साल, मैंने पुराने तरीके से खरीदारी की, सुगंधित मोमबत्तियाँ, लोशन, परफ्यूम, हाथ से पेंट किए गए मेज़पोश, हाथ से बना कांच का फूलदान, सब स्थानीय रूप से बनी चीज़ें। श्रेया के लिए मैंने कश्मीरी शॉल खरीदा था ताकि वह उसके शरीर पर नरम रहे। मैं बस यह चाहती थी कि उसके पास खोलने के लिए उपहार हो, वह दीपावली की खुशी आखिरी बार महसूस कर सके। अंशुमन ने मेरे गाल पर हाथ रखा और मेरे होंठों पर एक चुम्बन दिया। "हमेशा यह सुनिश्चित करने के लिए धन्यवाद कि सभी को ऐसे उपहार मिले जो उन्हें पसंद आए। तुम बहुत विचारशील हो, बेब। तुम बेमिसाल हो।"

“तुम पहले यह सब क्यों नहीं कहते थे अंशुमन?” मेरी आँखों मेँ आँसू भर आए थे। अब क्यों? क्यों अब वह वैसा प्रेमपूर्ण आदमी बन गया है जैसा मैं हमेशा चाहती थी?

"मैं एक बिगड़ा अमीर लड़का था जो तुम्हें हल्के में लेता था, और फिर आदत बन गई।" जिस सहजता से वह खुद को उजागर कर रहा था, अपने व्यवहार की जिम्मेदारी ले रहा था, वह ईमानदारी से अप्रत्याशित था। मैं अंशुमन को जानती थी। मुझे पता था कि अगर वह इन बातों पर विश्वास नहीं करता तो ये बातें नहीं कहता। "मैं तुम्हें बहुत चाहता हूँ - हर समय। लेकिन मैं तब तक अपने आप को रोके रखूँगा जब तक तुम्हारा भरोसा नहीं जीत लूँ बेबी। क्योंकि मैं अब ‘तुम्हारा प्रिय अंशुमन’ नहीं हूँ।" उसकी आवाज़ में उदासी थी। "मुझे उस जगह को वापस पाना होगा।"

"मुझे तुम्हारे साथ रहना बहुत याद आता है," मैंने स्वीकार किया।

"लेकिन उतना भरोसा नहीं रहा, है न? मैं नहीं चाहता कि तुम्हें ऐसा लगे कि मैं तुमसे हमेशा की तरह कुछ ले रहा हूँ, बिना कुछ दिए।"

जब मैं नीचे रसोई में गई, तो मैं मुस्कराये बिना नहीं रह सकी। मैंने अपने पति के साथ फ़्लर्ट किया और अब मैं एक किशोरी की तरह हँसना चाहती थी।

शुक्रवार, 27 फ़रवरी 2026

ज़िंदगी अधूरी तेरे बिन - भाग छब्बीस (26)

 

ज़िंदगी अधूरी तेरे बिन - भाग छब्बीस (26)




भाग 26

अंशुमन


दीपावली के पहले के दिन मैं सनशाइन होम्स रिज़ॉर्ट के सहायक रंजीत से मिला। इससे एक दिन पहले, मैं उसकी चचेरी बहन लीला और उसकी छोटी बेटी मीनू से भी मिला था। लीला ने मुझसे माफ़ी मांगी थी, उस दिन उन कमरों की सफाई करने के लिए, जब प्रियंका ने मुझसे कमरे साफ करने के लिए कहा था। यह कहते हुए कि उसे छुट्टी लेनी पड़ी थी, क्योंकि मीनू की तबीयत ठीक नहीं थी। मुझे यह सुनकर राहत मिली कि मेरी पत्नी के पास मदद करने के लिए लोग हैं, और मैंने लीला का धन्यवाद किया था।

रंजीत कमर पर एक टूल बेल्ट लटकाए हुए था। वह जवान बच्चा था, शाश्वत की उम्र का। मैंने अपना हाथ उसकी ओर बढ़ाया, "हाय, मैं अंशुमन हूं, प्रियंका का पति।"

उन्होंने तुरंत मुझसे हाथ मिलाया, उनके चेहरे पर मुस्कान थी। "आपसे मिलकर अच्छा लगा, मिस्टर राव-सिन्हा। मिस प्रियंका अद्भुत व्यक्तित्व हैं।"

"मुझे बस अंशुमन अंकल कहो, और हाँ, मेरी पत्नी अद्भुत है। उसने बताया कि तुम यहाँ के काम करते हो, और मैं पूछना चाहता था कि क्या मैं कुछ मदद कर सकता हूँ।" मैंने अपने हाथ अपनी जेब में डाले। "मैं आर्किटेक्ट हूँ, लेकिन मैंने पहले निर्माण कार्य भी किया है।" रंजीत ने सिर हिलाया, कुछ क्षण मेरी ओर देखा और फिर उस विशाल लॉन की ओर मुड़ा जो एक ओर चट्टानों की ओर जाता था और दूसरी ओर समुद्र तट की ओर ढलान पर था।

"आह .... शायद आप कुछ मदद कर सकें।"

"ठीक है, फिर बताओ मुझे?" उस ने बताया, "चट्टान के किनारे पर कटाव की बड़ी समस्या रहती है। हर तूफ़ान के बाद समुद्र और आगे आ जाता है और हम थोड़ी और ज़मीन समुद्र मेँ खो देते हैं। वहाँ रिटेनिंग दीवार है, लेकिन बहुत पुरानी है और ठीक नहीं बनी है, उतनी प्रभावी नहीं है।" मैं उसके पीछे चल पड़ा, और देखा कि जैसे-जैसे हम चट्टान के किनारे के पास पहुँच रहे थे, घास पतली होती जा रही थी। हमारे सामने पानी फैला हुआ था - नीले रंग का एक विशाल विस्तार, जो अपनी अंतहीनता में सुंदर भी था, और भयावह भी। रंजीत ने रिटेनिंग वॉल की ओर हाथ हिलाया, जो पत्थर और कंक्रीट से बनी एक ढहती हुई संरचना थी। वह निश्चित रूप से कटाव रोकने के लिए अपर्याप्त लग रही थी। ऐसा लग रहा था कि रंजीत ने कुछ पैच-अप का काम किया था। चारों ओर रेत की बोरियाँ थीं। "देखिये," उस ने आगे कहा, "दीवार की नींव ज्यादा गहरी नहीं है।"

मैंने दीवार का अध्ययन किया। यह एक गंभीर मुद्दा था; खराब तरीके से बनाई गई रिटेनिंग दीवार से ज़मीन का बहुत बड़ा नुकसान हो सकता था। रिज़ॉर्ट की निकटता के कारण, यह एक बड़ा जोखिम था, जिसे हम नहीं उठा सकते थे। "इसे फिर से डिज़ाइन करना पड़ेगा, कुछ ऐसा जो धरती को रोके रख सके और पानी के बहाव को बेहतर तरीके से संभाल सके।"

"हाँ?" वह घबराया हुआ लग रहा था। "मुझे नहीं पता कि यह सब कैसे करना है। मैं... आह... मैकेनिक बनने की पढ़ाई कर रहा हूँ। मैं यहाँ बस मदद करता हूँ। मुझे पता है कि पैसे की तंगी है, और हम किसी को काम पर नहीं रख सकते, खासकर साल के इस समय में, इसलिए मैं अपनी तरफ से पूरी कोशिश कर रहा हूँ, मिस्टर राव- ... अंशुमन अंकल। क्या आप इस काम को संभाल सकते हैं?"

"हाँ, मुझे लगता मैं संभाल सकता हूँ," मैंने हंस कर जवाब दिया, मेरे दिमाग में पहले से ही समाधान की रूपरेखा तैयार हो गई थी। "हमें मौजूदा नींव के चारों ओर खुदाई करनी होगी और इसे एक गहरे, मजबूत आधार के साथ मजबूत करना होगा। उचित जल निकासी भी महत्वपूर्ण है...ज्यादा बहाव और रिसाव को संभालने के लिए।" रंजीत प्रभावित दिख रहा था। "लगता है कि आप अपना काम अच्छी तरह जानते हैं। मैं मदद कर सकता हूँ, लेकिन यह इस बात पर निर्भर करेगा कि आप कब शुरू करेंगे। मिस प्रियंका ने कहा कि आप सब कर्नाटक में रहते हैं, और छुट्टियों के बाद वापस चले जाएंगे।"

"मैं वापस नहीं जा रहा रंजीत, अभी कुछ समय के लिए नहीं। हम कल शुरू कर सकते हैं" मैंने निर्णायक रूप से कहा। "मैं आज रात कुछ योजनाएँ बना लूँगा, और हम सुबह उन पर बात कर सकते हैं। हमें कुछ आपूर्तियाँ लाने की ज़रूरत होगी, लेकिन मुझे लगता है कि हम उस दीवार को बना कर यहाँ की ज़मीन को बचा सकते हैं।"

"बस ऐसे ही?" रंजीत आश्चर्यचकित दिख रहा था। मैंने मुस्कराते हुए कहा, "हाँ बेटा, ऐसे ही। तुम गैरेज के बजाय यहाँ क्यों काम करते हो?"

"मैं मिस श्रेया की मदद कर रहा हूँ, खास तौर पर अब जब वह बीमार हैं। लीला का घर पीछे ही है, इसलिए...मैं यहाँ रुक जाता हूँ।" रंजीत ने कुछ देर सोचा, फिर कहा, "अंशुमन अंकल ...आह...मैं आपको धन्यवाद देना चाहता था।"

"किस लिए?"

उसने अपने होंठ चाटे। "मेरे पास घर के किराये के पैसे कम पड़ रहे थे और लग रहा था लीला के साथ रहना होगा। मिस प्रियंका ने मुझे तुरंत एक हजार रुपए दिए, और यहाँ काम भी दिया, इसलिए मुझे लीला के साथ रहने की ज़रूरत नहीं पड़ी। लीला के पास मीनू है, और उसका घर छोटा है। मुझे नहीं पता कि मिस प्रियंका की मदद के बिना हम कैसे... "

मेरी प्रियंका और उसका बड़ा दिल! उसने घर से सिर्फ पाँच हज़ार रुपये लिए थे। उसके पास सिर्फ़ इतना ही पैसा था। नहीं, उसके पास हमारे परिवार का पूरा पैसा था लेकिन तब वह यह नहीं जानती थी। जब उसने रंजीत की मदद की तब वह तो यही सोच रही थी कि उसके पास पाँच हज़ार रुपये ही हैं, और वह भी किश्तों मेँ मुझे लौटाने की योजना बना रही थी। उसमें से कुछ उसने इस नौजवान बच्चे को दे दिया था। मैंने रंजीत के कंधे थपथपाए। "धन्यवाद की ज़रूरत नहीं, बेटा। तुम यहाँ बहुत मदद करते हो; यह तुमने कमाया है।"

हमने इस परियोजना को शुरू करने के लिए आवश्यक चीजों के बारे में बात की और रंजीत वापस रिसॉर्ट चला गया। मैं वहीं रुक गया और चट्टानों से टकराती लहरों को देखने लगा। प्रियंका के जाने के बाद पहली बार मुझे एक उद्देश्य का एहसास हुआ। यह सिर्फ़ एक प्रोजेक्ट से कहीं बढ़कर था; यह कुछ स्थायी योगदान देने और उसे यह दिखाने का मौका था कि मैं हर संभव तरीके से उसका समर्थन करने के लिए यहाँ हूँ। मैंने मुड़कर देखा तो यशस्वी बगीचे में समुद्र तट की ओर देख रहा था। मैं उसके पास गया।

"यशस्वी।"

वह मुड़ा और सिर हिलाया, "जी सर"

"बेटा, तुम अब भी मुझसे नाराज हो?" वह हैरान दिखा कि मैं इस मामले को गंभीरता से ले रहा था। प्रियंका के जाने के बाद मैंने एक बात सीखी थी, कि चुप रहने से स्थिति सुधरती नहीं, और बिगड़ती है। सब कुछ ठीक होने का दिखावा करने से मेरा परिवार टूट गया था - मैं अब किसी भी परिवार के सदस्य के साथ ऐसा नहीं करने वाला था। यशस्वी नीलिमा के लिए महत्वपूर्ण था, तो मेरे लिए भी था।

"जी हाँ।" उसने शान्त स्वर मेँ कहा।

मैंने सिर हिलाया "मैं नीलिमा की मदद करने, अपनी पत्नी के लिए समर्थन, और हम सब को यह एहसास दिलाने के लिए आभारी हूँ कि हमने प्रियंका के साथ कितनी बड़ी गलती की है।" मैं देख सकता था कि मेरी बात से वह चकित हो गया हैं। वह बहुत आश्चर्यचकित दिख रहा था, इतना कि शायद एक पंख की चोट से भी गिर जाएगा। "मैं तुम्हें भी वही कह रहा हूँ जो मैंने अपने बच्चों से कहा: कि मैं अब से प्रियंका और हमारे परिवार के लिए बेहतर करने वाला हूँ।" मैं एक नया कौशल सीख रहा था, एक ऐसे व्यक्ति के लिए जिसने कभी खुल कर मन की बातें नहीं कहीं। जिसने हमेशा मुश्किल चीजों को अनदेखा किया और निजी संघर्ष से दूर भागते हुए के जीवन में अपना रास्ता बनाया।

"बेहतर करने का क्या मतलब है, सर?" यशस्वी ने उसी नाराज लहजे मेँ पूछा। वह मुझ पर कोई नरमी नहीं बरत रहा था।

"मैंने काम से अस्थायी छुट्टी ले ली है।" उसने मेरी ओर देखा, उसका आश्चर्य स्पष्ट था। मैं मुस्कराया। "नीलिमा को अभी तक नहीं पता है। शाश्वत जानता है। अब वहाँ सीईओ के रूप में कोई और है। मैं यहाँ छह महीने के लिए हूँ... शुरूआत के लिए।" प्रियंका जिस तरह नाराज थी, मुझे नहीं लग रहा था कि उसे वापस पाने के लिए छह महीने पर्याप्त होंगे। अभी तो एक जीवन भी बहुत छोटा लग रहा था। वह गुस्से में थी, और मुझे पता नहीं था कि प्रियंका के इस रूप को कैसे संभालना है। वह हमेशा इतनी लचीली और सहज रहती थी कि उसके इस नए व्यक्तित्व को समझने में थोड़ा समय लग रहा था। अजीब यह था कि मुझे यह अच्छा भी लग रहा था। काश हम पहले से ही खुल कर अपने मन की बातें एक दूसरे से कहते होते। अब मुझे लगता था कि अगर वह अपनी भावनाओं के बारे में बताए और मैं उसे बता सकूँ कि मैं कैसा महसूस करता हूँ, तो शायद अब हमारी शादी बेहतर, अधिक ठोस होगी, जहाँ हम दोनों बराबरी के पायदान पर होंगे। क्योंकि पहले के जीवन मेँ तो यह स्पष्ट था कि प्रियंका को लगता था कि उसे मेरे द्वारा स्वीकार किए जाने के लिए कड़ी मेहनत करनी होगी और बेहतर बनना होगा। जबकि मैं सिर्फ़ अपने ‘राव-सिन्हा’ होने भर से सब पाने का हकदार हूँ। मैं एक क्रूर माँ का असली बेटा बना रहा था; इसमें कोई सवाल नहीं था।

"विश्वास करना कठिन है," यशस्वी ने धीरे से कहा, "आप को तो काम का नशा है।"

"लेकिन मैं काम नहीं कर सकता, क्योंकि मैं अपनी पत्नी के बिना नहीं रह सकता बेटे। अगर काम और प्रियंका के बीच कोई विकल्प चुनना हो तो वह हमेशा जीतेगी।"

यशस्वी ने सोचते हुए सिर हिलाया। "मुझे उम्मीद नहीं थी। जब नीलिमा ने मुझे बताया कि आप और शाश्वत यहाँ हो, तो मुझे लगा यह गणेश चतुर्थी जैसा ही बकवास समय होगा।"

"पिछले दो महीनों में हम उससे काफी आगे बढ़ चुके हैं।"

यशस्वी ने विनम्रता से कहा, "मुझे बताने के लिए शुक्रिया। मुझे आपकी पत्नी बहुत पसंद हैं। जानते हैं अंकल, आंटी ने मुझे क्या कहा कल? कि मुझे भी यह समझना होगा कि भले ही मैं नीलिमा के परिवार से नाराज होऊँ, लेकिन मुझे नीलिमा की खुशी को आगे रख कर उसकी खुशी के लिए उनसे मिलने जाना होगा, नीलिमा की इच्छा, मेरी अनिच्छा या नाराजगी के कारण उपेक्षित न हो, जैसा आंटी के साथ हुआ था। पति के पसंद न करने से नीलिमा को अपने परिवार से दूर न जाना पड़े, यह भी मुझे समझना होगा। मैं मनोविज्ञान का विद्यार्थी हूँ लेकिन मैं भी नीलिमा के साथ वही गलती कर रहा था जो आपने प्रियंका आंटी को श्रेया आंटी से दूर रख कर की थी। आंटी अपने लिए नाराज नहीं थीं लेकिन मुझे समझा रही थीं कि मैं यही गलती नीलिमा के साथ न करूँ। काश... काश मेरी भी ऐसी ही माँ होती।"

"काश मेरी भी?” मैं उदासी से हंसा.... “तो ... अब यशस्वी, मैं सोच रहा था कि क्या कल सुबह तुम्हारे पास समुद्र कटाव को रोकने के लिए दीवार खड़ी करने में मेरी मदद करने के लिए कुछ समय है?" उसने मेरी ओर प्रश्नवाचक दृष्टि से देखा।

मैंने उसका कंधा थपथपाया और कहा, "चलो मैं तुम्हें दिखाता हूँ।"

शुक्रवार, 20 फ़रवरी 2026

ज़िंदगी अधूरी तेरे बिन - भाग पच्चीस (25)

 

ज़िंदगी अधूरी तेरे बिन - भाग पच्चीस (25)




भाग 25

प्रियंका


हम टहलने निकल गए, जो हम घर पर कभी नहीं करते थे। अंशुमन की इस पहल पर मुझे आश्चर्य भी हुआ, और खुशी भी। आसमान में ऊँचा और चमकीला चाँद, समुद्र तट पर चाँदी की चमक बिखेर रहा था, जब अंशुमन और मैं तट रेखा के किनारे-किनारे चल रहे थे। साथ-साथ, फिर भी दोनों अकेले। ठंडी हवा में समुद्र का नमक घुला हुआ था, हर साँस ठंडी, नमकीन चुम्बन की तरह थी। हम अपने कोट में लिपटे, ठंडी नर्म रेत पर चल रहे थे।


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हम कुछ देर तक चुपचाप चलते रहे; सिर्फ़ किनारे पर लहरों की टकराने, और कभी-कभी दूर से किसी रात के पक्षी की आवाज़ सुनाई दे रही थी। दुनिया खामोश और उत्सुक लग रही थी, मानो वह भी यह सुनने के लिए इंतज़ार कर रही हो कि हमारे बीच क्या होगा। अंततः अंशुमन ने चलना बंद कर दिया और मेरी ओर मुड़ा, उसका चेहरा चांदनी में भी पीला पड़ा हुआ और खिंचा हुआ दिख रहा था। "मुझे बताओ कि मैंने तुम्हें कैसे-कैसे चोट पहुंचाई?"

उन शब्दों ने मुझे झकझोर कर रख दिया। उसने पहले कभी ऐसा नहीं पूछा था। मुझे लगा कि मेरे अंदर भावनाओं का तूफान उमड़ रहा है, और मुझे नहीं पता था कि मैं बिना गुस्सा किए अपनी बात कैसे कहूँ। लेकिन हम यहाँ बात करने आए थे, और इसका मतलब था कि मुझे अपने अंदर के क्रूर क्रोध को शांत रखना था ताकि मैं सुसंगत रूप से बोल सकूँ। "मैं नहीं चाहती कि तुम्हें ऐसा लगे कि हमारी शादी में सब बुरा ही था ..." मैंने अपने विचारों को इकट्ठा करते हुए समझाया।

"जानता हूँ प्रियंका।" मैंने समुद्र तट पर बिखरी हुई बेंचों मेँ से एक बेंच की इशारा किया। हम धीरे-धीरे चलते हुए उस पर जा बैठे, एक तरफ वह और दूसरी तरफ मैं, हमारे बीच थोड़ी ही दूरी थी, लेकिन कितनी गहरी खाई भी!

"नीलिमा और शाश्वत के चले जाने के बाद तुम देर से घर आने लगे। जैसे घर पर तुम्हारी दिलचस्पी सिर्फ़ बच्चों में ही थी। जैसे मेरी कोई अहमियत ही नहीं थी।" मैं इंतज़ार कर रही थी कि वह कोई टिप्पणी करे या बचाव करे, लेकिन वह बस धैर्य से बैठा रहा, उसकी आँखें नर्म थीं, और शायद नम भी थीं? मैं सीधी बैठी रेत पर लहरों के मंद-मंद नृत्य को देखती रही। "जब भी मैं तुमसे बात करने की कोशिश करती, तो तुम चिड़चिड़ा जाते। यह बात परेशान करती थी। तुम हर बार यही दिखाते कि तुम व्यस्त हो, जैसे मैं बड़बड़ाने वाली पत्नी हूँ और तुम परेशान हो मुझसे।

"कभी नहीं," उस ने बीच में कहा। "कभी नहीं, प्रियंका।" मैंने उदास होकर सिर हिलाया।

"मैंने जो महसूस किया, वह वैसा ही था, और मैं इसे बदल नहीं सकती।"

"मैं समझता हूँ।" वह चुप हो गया, और मैंने उन सभी बातों को छान मारा जो मुझे पता था कि मुझे कहना था, लेकिन मुझे यकीन नहीं था कि वे शब्द कैसे उतरेंगे। मैं चाहती थी कि वह खुद से ही समझे कि मैंने उसे क्यों छोड़ा। शायद यह मेरी ओर से रक्षात्मक था, लेकिन मैं इसे बदल भी नहीं सकती थी।

"पिछले कुछ सालों से ऐसा लगने लगा था कि नीलिमा, शाश्वत और तुम एक परिवार हो और मैं सिर्फ़ खाना बनाने और सफ़ाई करने वाली बाहरी व्यक्ति हूँ। मैं कुछ कहती तो नीलिमा अनदेखा कर देती और शाश्वत... आँ... मेरा बच्चा शाश्वत मुझसे ऐसे बात करता जैसे मैं शर्मिंदगी की वस्तु हूँ।" मैं बोलते ही घबरा गई। "लेकिन तुम उसे यह नहीं बता सकते।"

"मैं नहीं बताऊँगा," उसने शान्त स्वर मेँ वादा किया।

मैंने अपने हाथों की ओर देखा। "तुमने उन्हें कभी नहीं रोका अंशुमन। जैसे उनका मुझसे ऐसे बात करना तुम्हें ठीक लगता था। मुझे हमेशा से ही लगता था कि तुम मुझसे शादी करने के लिए पछता रहे हो, लेकिन इन सालों में, मैं इस पर यकीन करने लगी। मुझे लगता कि तुम सोचते थे कि मैं तुम्हारी पत्नी बनने के लिए, राव-सिन्हा के लिए पर्याप्त नहीं हूँ।" मैं आत्म-हीनता में हँसी। "तुम जानते ही हो कि माँ जी अक्सर मुझसे ऐसा कहती थीं। मैंने बहुत कड़ी मेहनत की अंशुमन, एक अच्छी पत्नी बनने के लिए! मैंने खाना बनाना और वाइन को मिलाना सीखा कि कोई न कहे कि झुग्गी वाली उच्च समाज के लायक नहीं बन पाई।” मैंने आँखें बंद कर लीं क्योंकि उसे दिल की बात बताना, अपना दर्द दिखाना कठिन होता जा रहा था।

"तुम हमेशा से एक अद्भुत पत्नी रही हो," उसने धीरे से कहा। "यह मेरी गलती है कि तुमने यह महसूस नहीं किया। मेरी गलती है कि मैंने तुम्हें बताया नहीं, तुम्हें दिखाया नहीं।"

मैंने थूक निगल कर अपनी आँखें खोलीं। मैंने उसकी तरफ़ नहीं देखा। नहीं देख सकी। जब से मैं वहां से गई, मुझे लगा कि अंशुमन और बच्चे भी मुझे दोषी ठहराएंगे। लेकिन उन्होंने खुद को दोषी ठहराया। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि इसका क्या मतलब निकाला जाए। "तुम हमेशा कहते रहते थे कि यह ‘मेरा’ पैसा है। ‘यह ‘मेरी’ विरासत है।" अब मैं उसकी ओर मुड़ी। "तुम और तुम्हारी माँ ने हमेशा यह सुनिश्चित किया कि मैं समझ कर रहूँ कि मेरे पास कोई अधिकार नहीं है। तुम दोनों ने मेरे सामने विवाह-पूर्व समझौता थोप दिया। और अंशुमन, तुम मुझे बार-बार उसकी याद दिलाते रहे, अकेले मेँ भी और दूसरों के सामने भी।"

"मेरे पास जो कुछ भी है प्रिये, वह हमारा है," उसने तुरंत कहा। "मैंने तुमसे ‘हमारी’ बात कभी नहीं कही, यह मेरी गलती है... प्रियंका, यह मेरी ही गलती है। मैं पहले माँ को दिखाने के लिए यह कहता था, कि ऐसा दिखा कर कि मैं यह कह रहा हूँ उनकी स्वीकृति जीत लूँ। मैं उनसे डरता था। बचपन से ही। और बाद मेँ कब यह मेरी अपनी आदत बन गया मुझे सच ही मेँ पता नहीं चला। लेकिन मेरे मन मेँ यह नहीं था, मेरा विश्वास करो प्रियंका, मेरे लिए यह एक मजाक जैसा था। मन मेँ तो यही था कि तुम मुझसे प्यार करती हो और मैं सोच भी नहीं सकता था कि एक दिन तुम मुझसे नाराज होकर मुझे छोड़ भी सकती हो। वह समझौता मेरे लिए सिर्फ एक कागज था, मैंने उस पर गंभीरता से कभी नहीं सोचा। मैं तुम्हारे बिना कुछ भी नहीं हूँ। मैं तुम्हारे बिना अपनी कंपनी भी नहीं बना सकता था।"

"मुझे लगता है कि अब तुम मुझसे झूठ बोल रहे हो, शायद खुद से भी, क्योंकि तुम तलाक नहीं लेना चाहते। ‘लोग क्या कहेंगे’ सोचकर, जैसा तुमने उस दिन फोन पर कहा। और यह बात मुझे पागल कर देती है क्योंकि मुझे समझ नहीं आता कि तुम मुझे किस कारण से साथ रखना चाहते हो। जबकि तुम कुछ समय से ऐसे व्यवहार करते रहे हो जैसे... जैसे .... जैसे तुम मुझे जाते हुए देखकर खुश होगे।"

उसका जबड़ा कस गया। "तुम सही हो। मैं सोचता रहा कि मैं कितना भाग्यशाली हूँ कि मुझे तुम्हारी जैसी पत्नी मिली - मैंने कभी यह जानने की कोशिश नहीं की कि क्या तुम भी सोचती होगी कि तुम भी मेरे जैसा पति पाकर भाग्यशाली हो? तुम्हारे जाने के बाद जब मैंने अपने आस-पास के लोगों से बात की, तो मुझे पता चला कि सभी को ऐसा लगता है कि मेरा अपनी असिस्टेंट के साथ संबंध है और मैं चाहता हूँ कि तुम चली जाओ।"

"मुझे यह तो नहीं लगा, लेकिन यह लगता था कि तुम चाहते थे कि मैं परेशान होकर खुद ही चली जाऊँ। क्योंकि अगर तुम जाने के लिए कहोगे, तो मुझे पैसे देने होंगे।"

"मुझे उस विवाह-पूर्व समझौते को सालों पहले ही फाड़ देना चाहिए था," उसने बुदबुदाया। "प्रियंका, उस समझौते को खारिज हुआ समझो।"

"क्या?"

"हाँ, मान लो कि कोई विवाह-पूर्व समझौता नहीं है। अगर हम तलाक लेते हैं, तो वैवाहिक संपत्ति कानून के अनुसार सामान वितरण होगा। मेरा विश्वास करो, एक अच्छा वकील तुम्हें हर चीज़ का आधा हिस्सा दिला सकता है। असल में, अगर हम तलाक लेते हैं, तो मैं बिना बहस तुम्हें अपनी विरासत, कंपनी और घरों सहित हर चीज़ का आधा हिस्सा दूँगा।"

मैंने चिल्लाकर कहा, "मुझे तुम्हारे पैसे नहीं चाहिए।"

"हमारा पैसा, प्रियंका, हमारा। मेरा नहीं, हमारा। यह मेरा नहीं हमारा पैसा है। मेरी बात सुनो। मैं यह इसलिए नहीं कह रहा हूँ क्योंकि तुम चली गई हो; मैं यह इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि यह सच है। मैं उस बेवकूफ युवा लड़के का बचाव नहीं कर सकता जो मैं शादी के समय था... अरे, बेब, मैं उस बेवकूफ पुरुष का भी बचाव नहीं कर सकता जो मैं बड़ा होकर भी बना रहा। लेकिन पैसा हमारे बीच नहीं है।" वह इतना ईमानदार लग रहा था कि मैं उस पर विश्वास करना चाहती थी; मेरा एक हिस्सा उस पर विश्वास करना चाहता था।

"मैं नहीं जानती कि मैं क्या कहूं।"

"काश तुम मुझे एक मौका दे पातीं।"

"क्या करने का मौका?"

"सब सही करने का मौका। तुम्हें मुझसे फिर से प्यार मेँ पड़वाने का, मुझ पर फिर से भरोसा करवाने का, जिससे हम फिर से एक परिवार बन सकें।" वह मेरे करीब आकर बैठ गया और मेरे हाथों को अपने हाथों में ले लिया। "मैं तुम्हारे बिना खोया हुआ हूँ। मैं गहरी साँस भी नहीं ले पाता प्रियंका। मैं उस घर में नहीं रह सकता, तुम्हारे बिना तो बिल्कुल भी नहीं।"

उसकी आवाज़ में कंपन था और चाँदनी रात में मैंने उसकी आँखों में आँसू देखे।

"मैं वापस नहीं जा सकती," मैंने रोते हुए कहा। "अंशुमन ...मैं... "

उसने मुझे खींच कर गले लगा लिया। "मुझे पता है, बेब। मुझे पता है। मुझे बहुत खेद है।" वह माफ़ी मांग रहा था, वह सब कुछ कह रहा था जो मैं चाहती थी कि वह कहे, लेकिन वे सिर्फ़ शब्द थे। पुराने ज़ख्मों के जाने-पहचाने दर्द ने मेरे दिल को भारी कर दिया। उसने मुझे देखने के लिए खुद को दूर खींच लिया। "कृपया मुझसे नफरत मत करो... जितना तुम पहले से ही करती हो उससे ज्यादा नफरत मत करो" वह भी रो रहा था।

"अंशुमन, मैं तुमसे कभी नफरत नहीं कर सकती," मैंने कसम खाई। "कभी नहीं। मैंने हमेशा तुम्हें प्यार किया है, अब भी करती हूँ, हमेशा करती रहूँगी। लेकिन अब मैं उस जीवन मेँ नहीं लौट पाऊँगी। प्यार काफी नहीं होता, सम्मान और सँजोना भी आवश्यक है, विश्वास भी। यह सब टूट गया हैं अंशुमन.... "

"जब मैं बताऊँ कि मैंने क्या किया तब नफरत करोगी।" मैं यह सुनकर लगभग डर गई। क्या वह काव्या के साथ सोया था? किसी और के साथ? उसने क्या किया था? "मैंने तुम्हारा फोन देखा था।" क्या? "वही जिसे तुम घर पर छोड़ आई हो," उसने आगे कहा। "मैंने... तुम्हारी गोपनीयता भंग की।" मैंने सिर हिलाया, फिर भी मुझे समझ मेँ नहीं आया उसने यह क्यों सोचा कि इतनी सी बात पर मैं उससे नफरत करूँगी?

"मैंने डॉ. मिश्रा को भेजे गए ईमेल पढ़े।"

मुझे यह समझने में कुछ समय लगा कि वह क्या कह रहा था, और जब मैं समझी, तो मेरी सांस रुक गई। मैंने अपने हाथ उसके हाथों से खींचने की कोशिश की, लेकिन उसने मुझे ऐसा करने नहीं दिया। "क्या? क्या तुमने बच्चों को बताया? क्या तुम सब यहाँ इसलिए आए हो?" मैं अपनी आवाज़ को दबा नहीं सकी। मैं अपमानित और क्रोधित थी। वे यहाँ इसलिए नहीं आए थे क्योंकि वे मुझसे प्यार करते थे। शाश्वत इसलिए अच्छा व्यवहार नहीं कर रहा था क्योंकि उसे खेद था। वे मेरे अवसाद के बारे में जानते थे, और ...

"रुको," अंशुमन ने दृढ़ता से कहा, "प्रियंका, उस बकवास में मत उतरो। मैं और बच्चे तुम्हें वापस पाने के लिए पहले ही लड़ने वाले थे। उन ईमेल के बारे में पता चलने से पहले ही, हम योजनाएं बना रहे थे कि अपनी भूलें कैसे सुधारनी हैं। ठीक है?" मैंने फिर से अपने हाथ छुड़ाने की कोशिश की। क्रोध ने मुझे बहरा बना दिया। "प्रियंका," वह कोमल लेकिन अटल था। "बेब, मेरी बात सुनो। मैं जानता हूँ। और यह जानने से मुझे यह नहीं लगा कि तुम एक कमज़ोर औरत हो जो नर्वस ब्रेकडाउन के कगार पर थी, बल्कि मुझे पता चला कि तुम एक इतनी मजबूत औरत हो जो अपने प्रियजनों से दूर चली गई क्योंकि वे तुम्हारा सम्मान नहीं कर रहे थे। एक मजबूत, अद्भुत औरत जो अपनी मरती हुई दोस्त की अकेले देखभाल कर रही है। जो सालों से बिना किसी को बताए उसके लिए रिसॉर्ट व्यवसाय को आगे बढ़ा रही है।" ठीक है, तो उन तारीफ़ों ने मुझे खुशी दी। मैं स्वीकृति और मान्यता की भूखी थी, और अंशुमन से यह सुनना रोमांचक और अविश्वसनीय था!

मैंने खुद को शांत किया और पानी की ओर देखा, उसे अपने गर्म हाथों में मेरे ठंडे हाथ पकड़ने दिए, और लहरों पर चांदनी को नाचते देखा। "अंशुमन" मैंने बहुत देर बाद कहा, मेरी आवाज़ पहले से ज़्यादा स्थिर थी। "मैं माफ़ी की सराहना करती हूँ। मुझे लगता है कि यह ईमानदारी से मांगी गई माफ़ी है। लेकिन इसमें सिर्फ़ तुम ने क्या किया या क्या नहीं किया, उससे कहीं ज़्यादा कुछ है। मैंने भी इसमें भूमिका निभाई है। लंबे समय तक, मैं अपनी ज़रूरतों को व्यक्त करने में सुरक्षित या सहज महसूस नहीं करती थी। मैं खुद भी हमारे जीवन के परिदृश्य का हिस्सा बन गई, भागीदार नहीं।"

"अब मैं समझ गया हूँ," उसने धीरे से कहा। "और मैं तुम्हें ऐसा महसूस कराने के लिए बहुत पछता रहा हूँ।" मैंने आह भरी, मेरे अंदर दुख और राहत दोनों उमड़ रहे थे। मैंने उसका सामना किया, उसे दिखा पाई कि मैं कहाँ खड़ी हूँ। "यह कहने के लिए धन्यवाद। मुझे यह सब समझने के लिए कुछ समय चाहिए, खुद को तुम्हारी पत्नी और माँ होने से परे समझने के लिए। मैं अभी-अभी ही तो समझने लगी हूँ कि मैं अपने आप में हूँ कौन।"

अंशुमन ने अपना एक हाथ मेरे चेहरे पर रखा और मेरे गाल को धीरे से सहलाया। "क्या हम बात करते रह सकते हैं? सिर्फ़ आज नहीं, बल्कि शायद कल और परसों भी? हर दिन?"

उसकी आवाज़ में ईमानदारी साफ़ झलक रही थी, और मैंने उसके हाथ को हल्के से दबाते हुए सिर हिलाया। "हाँ, हम बात करते रह सकते हैं," मैंने सहमति जताई।

सोमवार, 16 फ़रवरी 2026

ज़िंदगी अधूरी तेरे बिन - भाग चौबीस (24)

 

ज़िंदगी अधूरी तेरे बिन - भाग चौबीस (24)





भाग 24

अंशुमन


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लिविंग रूम गर्म चमक में डूबा हुआ था। दीपावली की रोशनी; सजावटी मालाओं की खनक और छुट्टियों की खुशियों की मधुर फुसफुसाहट से भरी हुई थी। मेरी पत्नी ने कमरे को सजाया था, ठीक उसी तरह सजाया था जैसे वह बैंगलोर में हमारे घर को सजाती थी, जिससे हमारा घर संसार एक मंदिर जैसा बन गया था।

उत्तर भारतीय दंपत्ति एक सोफ़े पर बैठे थे, उनके ऊपर एक कम्बल ओढ़ा हुआ था। वृद्ध दंपत्ति रात्रि भोज के बाद सोने चले गए थे। यशस्वी और नीलिमा पिछली दोपहर को आ गए थे और प्रियंका के चेहरे पर जो भाव था, वह मेरे घायल दिल पर मरहम की तरह था। छुट्टियों के दौरान अपने बच्चों को और मुझे अपने साथ पाना, भले ही वह मेरे बारे मेँ स्वीकार न करे, उसके लिए बहुत महत्वपूर्ण था। वह हमेशा इसे खास बनाती थी, और वह यहाँ भी वैसा ही कर रही थी जैसा वह हमारे घर पर करती थी।

ऐसा लग रहा था कि शाश्वत ने यशस्वी के साथ शांति बना ली है, क्योंकि वे दोनों आरामदायक कुर्सियों पर एक दूसरे के बगल में बैठे बातें कर रहे थे। दुर्भाग्य से, यशस्वी ने मुझे शाश्वत की तरह राहत नहीं दी थी। जब मैंने नीलिमा को फोन किया था तो मैंने यशस्वी से बात करने की कोशिश की थी, लेकिन उसने मना कर दिया था। इस मेँ उसका कोई दोष भी तो नहीं था। मैं इस परिवार का मुखिया था, तो अगर हमारे परिवार के टूटने के लिए कोई जिम्मेदार था, तो मैं ही था। मैंने अपनी पत्नी की रक्षा नहीं की, अपने बच्चों का व्यवहार सुधारने के लिए कोई कदम नहीं उठाया।

श्रेया मेरे बगल में सोफे पर बैठी थी। वह तकिए पर बैठी थी, उसके पैर मेरी तरफ थे। वह पिछले दिन की तुलना में कमज़ोर दिख रही थी, और प्रियंका ने मुझे बताया कि उसके अच्छे और बुरे दिन होते थे। यह एक अच्छा दिन नहीं था। कमरा गर्म था, चिमनी जलने के कारण, लेकिन श्रेया ने अपनी टोपी और एक बड़ा स्वेटर पहना हुआ था। मैंने उसे कंबल से ढक दिया था, उसे अच्छे से ओढा दिया था। श्रेया डिनर के लिए आई थी, लेकिन पंद्रह मिनट बाद ही चली गई थी। मैं उसे उसके कमरे में ले गया और मुझे खुशी हुई कि उसने मुझे ले जाने दिया। प्रियंका ने मुझे धन्यवाद दिया क्योंकि वह नीलिमा और यशस्वी के साथ समय बिताना चाहती थी। श्रेया में बात करने की ऊर्जा नहीं थी और वह तुरंत सो गई। जब वह जागी, तो मैं उसे गोद मेँ उठाया कर वापस लिविंग रूम में ले गया। उसने तर्क देने की कोशिश की कि वह चल सकती है, लेकिन मैंने उसे बताया कि वह हल्की-फुलकी फूल सी है और मैं एक बड़ा, मजबूत आदमी हूँ। इससे वह हँस पड़ी, और उसे खांसी आने लगी।

प्रियंका ने मुझसे कहा था कि श्रेया के लिए अब कोई सुधार नहीं हो सकता है। उसने अपनी दोस्त की देखभाल करने वाले सभी डॉक्टरों से बात की थी, और जिस तरह से कैंसर फैल गया था, उसके बाद उसे अब अस्पताल ही भेजा जा सकता था। श्रेया अस्पताल नहीं जाने के लिए अड़ी हुई थी और प्रियंका भी। मुझे पता था कि यह प्रियंका को नाराज़ कर देगा, लेकिन जब मैं आज सुबह प्रियंका और श्रेया के साथ उसकी अपॉइंटमेंट के लिए गया था, तो मैंने डॉक्टर से बात की थी। उसने मुझे जीवन के अंतिम चरण की देखभाल में विशेषज्ञता रखने वाले एक पुरुष नर्स का संपर्क विवरण दिया था। मैंने नर्स को काम पर रख लिया था, जिसने कहा कि वह दीपावली के ठीक बाद काम शुरू कर देगा। मेरे पास अपनी पत्नी को यह समझाने के लिए दो दिन थे कि यह एक अच्छा विचार है। मुझे नहीं पता था कि वह मेरी मनमानी पर कैसी प्रतिक्रिया देगी, लेकिन श्रेया को आराम देने के लिए सभी तरह की दवाओं और इंजेक्शन्स की ज़रूरत थी, और प्रियंका इसमें मदद नहीं कर पाएगी। यह एक छोटा समुदाय था, इसलिए वहाँ स्वयंसेवक नर्सें नहीं थीं जो मदद कर सकें।

नीलिमा की उंगलियाँ पियानो की चाबियों पर शानदार तरीके से नाच रही थीं, जिससे कमरे में मधुर गीतों की धुनें गूंज रही थीं। ऐसा सुंदर दृश्य था जैसे किसी हॉलिडे कार्ड से लिया गया हो, और इसे देख मेरा दिल खुशी से झूम उठा। जैसे ही नीलिमा एक गाने से दूसरे गाने पर गई उसने मुड़कर अपनी माँ को अपने साथ आने का इशारा किया प्रियंका एक सेकंड के लिए झिझकी, फिर हमारी बेटी के पास जाकर खड़ी हो गई। दोनों ने एक युगल गीत शुरू किया। प्रियंका वास्तव में गायिका नहीं थी, लेकिन उसकी आवाज़ साफ़ और सुंदर थी और वह धुन को अच्छी तरह से गा पाती थी। पियानो की धुन के साथ गीत ने हम सभी को गर्म कंबल की तरह प्यार से लपेट लिया। यह आशा और आश्वासन का गीत था, और हर स्वर हवा में गूंजता हुआ प्रतीत होता था, जो कमरे में मौजूद हर दिल को छू गया था।

श्रेया की आँखें प्रियंका पर टिकी थीं और उनके चेहरे पर शांति का भाव था। यह जानते हुए भी, कि यह उनकी आखिरी दीपावली होगी, वह शांति से भरी हुई थी। मैंने आगे बढ़कर उसका हाथ थाम लिया, इस कदम को उसने हल्की मुस्कान के साथ स्वीकार किया। "तुम्हारी बेटी बहुत खूबसूरत है," श्रेया ने मुझसे कहा "हमारे यहाँ मेहमान आते हैं जो समय-समय पर पियानो का इस्तेमाल करते हैं। प्रियंका हमेशा मुझे बताती थी कि नीलिमा कितना अच्छा बजाती है। मुझे खुशी है कि मैं इसे देख पा रही हूँ..." उसके मरने से पहले! मैं वहाँ बैठा था, इस असाधारण महिला का हाथ थामे हुए जो मेरी पत्नी का परिवार थी। मेरा मन रो रहा था। काश मैंने श्रेया को पहले जानने का प्रयास किया होता, उसकी गहराई को समझा होता। वह वाकई असाधारण थी, और मैंने उसके साथ इतने वर्षों का समय खो दिया था।

दूसरा गाना खत्म हुआ और पूरा कमरा तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। श्रेया की आंखें नम थीं, मेरी भी। संगीत महज नोट्स और बोलों से आगे निकल गया था; यह हम सभी को जोड़ने वाला एक पुल था, जो हमें याद दिलाता था कि वास्तव में जीवन मेँ क्या मायने रखता है। उस पल, उत्सव की सजावट के बीच और दीपावली के पेड़ की कोमल रोशनी के नीचे, हम सिर्फ मेहमान या परिवार या दोस्त नहीं थे, हम एक आदर्श दुनिया का एक छोटा, क्षण भंगुर उदाहरण थे जहाँ प्यार, नुकसान और उम्मीद आपस में जुड़े हुए थे, जिससे हम सभी थोड़े और जुड़े हुए, एक दूसरे को समझ रहे थे। नीलिमा अभी भी बजा ही रही थी जब श्रेया सो गई। मैं उसे गोद मेँ उठाया कर उसके बेडरूम में ले गया और प्रियंका मेरे पीछे-पीछे आई। "धन्यवाद," उसने कृतज्ञता पूर्वक कहा।

"उसका वजन कुछ भी नहीं है," मैंने रुँधे स्वर में कहा। वह दुर्बल हो गई थी क्योंकि कैंसर ने उसके अंदरूनी हिस्से खा लिए थे। इससे मेरा दिल दुख रहा था।

"जानती हूँ।" प्रियंका ने श्रेया को सहज कराया और उसके माथे को चूमा। वह सीधी खड़ी हुई और मेरी तरफ़ देखने लगी। "यह... तुम सभी का यहाँ होना बहुत अच्छा लग रहा है।"

"हम और कहाँ होते, प्रियंका? तुम ही वह सूर्य हो जिसके इर्द-गिर्द हम सब घूमते हैं। हमने भले ही कृतज्ञता न दिखाई हो, लेकिन तुम्हारे बिना, हम सभी ठंडे और खोए हुए थे।"

"अंशुमन -"

"नहीं, बेब, मेरी बात सुनो," मैंने विनती की, इससे पहले कि वह मुझे बता पाती कि उसे मुझ पर विश्वास नहीं है। "मुझे पता है कि मैंने गलती की है। मुझे पता है। और मुझे पता है कि यह एक या दो दीपावली का मामला नहीं है। यह एक जीवन भर का मामला है। मैं...अपनी बाकी की जिंदगी इसकी भरपाई करने वाला हूँ।" वह काफी देर तक श्रेया को देखती रही और फिर मेरी ओर देखने लगी।

"क्या होगा अगर... क्या होगा अगर मैं ऐसा नहीं चाहूँ? अगर मैं आगे बढ़ना चाहूँ?” मेरा दिल टूट गया, और टूटने की आवाज़ मेरे भीतर गूंज उठी। मेरी प्रियंका आगे बढ़ना चाहती थी? कोई दूसरा आदमी ढूँढना चाहती थी? हुँह, ऐसा कुछ नहीं होने वाला था। कभी नहीं। लेकिन एक जंगली इंसान की तरह व्यवहार करने से मुझे कुछ हासिल नहीं होने वाला था - वास्तव में, मैं अपनी इसी सोच की वजह से इस झंझट में था। मुझे लगता था कि मैं सिर्फ़ इसलिए बड़ी हस्ती हूँ क्योंकि मैं मर्द हूँ और घर में पैसे मैं लाता हूँ।

"तो मैं तुम्हें शुभकामनाएं दूंगा, लेकिन मैं तब भी वहीं रहूंगा जहां तुम हो, उम्मीद है कि तुम मुझे एक मौका दोगी।"

"सच में?" उसने पूछा।

"हाँ।" मैंने आह भरी और कहा, "और मैं किसी भी अन्य आदमी को जो तुम में रुचि रखता हो, तुम्हारे लिए अरुचिकर कर दूंगा और सुनिश्चित करूंगा कि वह मेरी पत्नी से दूर रहे।"

वह आँखें मटका कर धीरे से हँसी, और मेरा दिल खिल गया। "अच्छा जी! ऐसा करोगे?"

"हाँ, बेब, मैं ऐसा ही करूँगा।"

प्रियंका ने सुझाव दिया, "चलो श्रेया को सोने दें।"

"प्रियंका? क्या हम बात कर सकते हैं?" मैंने पूछा, उम्मीद करते हुए कि मैं अपनी किस्मत को ज़्यादा नहीं आजमा रहा हूँ।

"हाँ।"

"अब?"

"ठीक है।" 

"धन्यवाद।"


शुक्रवार, 13 फ़रवरी 2026

ज़िंदगी अधूरी तेरे बिन - भाग तेईस (23)

 

ज़िंदगी अधूरी तेरे बिन - भाग तेईस (23)



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भाग 23

प्रियंका




जब मैंने श्रेया को नहला लिया और उसे जैम और मक्खन के साथ आधा बिस्कुट खाने के लिए मना लिया, तब उसे पुदीने की चाय के साथ उसकी कुर्सी पर बिठाने के बाद, समुद्र को देखते हुए, मैं अंशुमन की तलाश में चली।

वह ओशन व्यू रूम में से एक में तकियों को सीधा कर रहा था। यह कोई मजाक नहीं, वह तकिये जमा रहा था! उसने मेरी तरफ देखा और कमरे की तरफ में हाथ हिलाया। उसने बिस्तर बिछा दिया था, वैक्यूम कर दिया था, और फर्श पर पहले की निकली हुई चादरें और गंदे तौलिये पड़े थे। "क्या सब ठीक हुआ है?" उसने एक बच्चे की तरह पूछा, जो जानना चाहता था कि क्या वह अच्छा काम कर रहा था। यह आदमी था कौन?

"मदद के लिए धन्यवाद, अंशुमन ।" मैं सचमुच मन से यह कह रही थी। जब मैंने श्रेया को बताया था कि अंशुमन क्या कर रहा था, तो वह हंस पड़ी थी। मुझे अच्छा लगा कि वह अभी भी अपनी एक जोरदार हंसी हंस सकती है। जब जीने के लिए बहुत कुछ था, तो भगवान ने उसे हमसे दूर कर दिया, यह अन्याय था।

"मुझे खुशी है बेबी। मैंने पहले ही मेरिनर्स रेस्ट कमरे का काम ख़त्म कर लिया है। क्या तुम उसे देखना चाहोगी?" मैंने न मेँ सिर हिलाया। मैं उसके पास जाकर उसे गले लगाना चाहती थी। सच मेँ, मैं उसे गले लगाना चाहती थी। बताना चाहती थी कि मैं गुस्सा नहीं करना चाहती, और हमें घर चले जाना चाहिए। इतना कमज़ोर पड़ जाना डरावना था, क्योंकि जैसा कि मेरे मनोचिकित्सक ने कहा था, हमारा विवाह मेरी ज़रूरतों को पूरा नहीं कर रहा था।

"क्या तुम्हारे पास मेरे लिए कुछ और काम है? मैं तुम्हारी सेवा में हूँ।" वह मुस्कराया।

अंशुमन एक सुंदर आदमी था। वह लंबा, सुडौल शरीर वाला था और इस उम्र में, उसके बालों में थोड़ा सफेद रंग भी था, और उस पर बहुत अच्छा लगता था। उसकी गहरी आँखों और उस प्रभावशाली जबड़े के साथ वह हीरो जैसा दिख रहा था। शाश्वत अंशुमन जैसा था, जबकि नीलिमा भूरी आँखों वाली एक श्यामला थी, मेरी तरह। वह बहुत सुंदर थी। हमारे बच्चे हम दोनों से बेहतर दिखते थे। शायद अधिकांश लोग अपने बच्चों के बारे यही सोचते हैं।

"बेबी?" अंशुमन ने गंदे कपड़े उठाते हुए पूछा। "क्या और कुछ करना है?"

मैं इस नये अंशुमन को लेकर बहुत उलझन में थी। "मुझे दोपहर का खाना बनाना है," मैंने अचानक कहा। "मैं... दोपहर का खाना।"

"ठीक है। मैं ये वहाँ मेँ रख आता हूँ" उसने तौलियों की ओर इशारा किया- "और आकर तुम्हारी मदद करूँगा। मैं सब्जी काट सकता हूँ, धो सकता हूँ... जो भी तुम्हें चाहिए हो।" वह कपड़ों को ले गया, और मैं कक्ष का दरवाजा बंद करके, बिना हिले-डुले दरवाजे से टिकी खड़ी रही। जब वह वापस आया तो उसने मेरी ओर प्रश्नवाचक दृष्टि से देखा।

"तुम कर क्या रहे हो?" मैंने संदेह से पूछा। "तुम यहाँ क्यों हो? यह क्यों कर रहे हो?"

वह मेरे करीब आया और मेरे चेहरे से कुछ बाल हटा दिए। "मैं अपने जीवन के प्यार को वापस पाने, उसे मनाने के लिए आया हूँ।" अब जब मैंने आखिर उसे छोड़ने का साहस जुटा लिया है, तो अब आकर वह ऐसी बातें नहीं कह सकता। एक आंसू बह निकला, और उसने उसे पोंछ दिया, उसकी आंखें भी नम थीं। "मैं अपनी पत्नी को यह दिखाने आया हूं कि वह मेरे लिए कितनी मायने रखती है, और उसे मुझे वापस लेने के लिए राजी करना चाहता हूं।" मैंने अपना सिर हिलाया और मेरे चेहरे पर और आँसू बहने लगे। वह उन्हें पोंछता रहा। "मैं अपनी पत्नी को यह बताने आया हूँ कि मैं मूर्ख था। कि मैं एक साम्राज्य खड़ा कर रहा था और अपनी रानी का ख्याल रखना भूल गया।" वह नीचे झुका और अपने होंठ मेरे माथे पर रगड़े। "मैं यहाँ तुम्हें, प्रियंका, फिर से अपने प्यार मेँ पड़वाने के लिए, और मुझे गलतियाँ सुधारने का मौका देने के लिए मनाने आया हूँ।" मैं जड़-वत खड़ी रही। मैं कल्पना भी नहीं कर सकती थी कि वह आदमी जो हमेशा मेरे प्रति खीजा रहता था, हमेशा जल्दी में रहता था, अब यहाँ मुझसे वे सारी बातें कह रहा था, जिनके बारे में मैंने सपने देख सकती थी लेकिन कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि वह कभी कहेगा। मैंने अपने आप को मानसिक रूप से तमाचा मारा और अंशुमन की बुनी जा रही कल्पना से बाहर आ गई।

उसके जीवन का प्यार? यह सच नहीं था। "मुझे लगता है कि तुम मुझसे प्यार नहीं करते," मैंने जैसे ज़हर उगलते हुए कहा। मेरे दिल के चारों ओर कालापन छा गया था, जिस दिल को उसने अपनी बेरुखी और लापरवाही से तोड़ दिया था। "मैं... यह नहीं कर सकती।" मैं उससे दूर भागी। सीढ़ियों से नीचे उतरकर रसोई में पहुँची - मेरी शरणस्थली। बिलकुल वैसे ही जैसे बैंगलोर में हमारे घर में थी। वह मेरे पीछे-पीछे आया, और अगर मैंने सोचा होता कि वह यह बातचीत जारी रखे (पता नहीं निराशा होती या राहत?) तो उसने यह नहीं किया।

"हम दोपहर के भोजन के लिए क्या बना रहे हैं?" उसने सहजता से पूछा।

"मैं सैंडविच बनाने वाली थी.... हूँ। दूसरे मेहमान यहाँ दोपहर का खाना नहीं खाते," मैंने उससे कहा। "लेकिन अभी...मुझे पहले रात के खाने की तैयारी करनी है।"

"रात के खाने में क्या है?" वह रसोई के काउंटर पर हाथ रखे झुका हुआ था, आराम से, जैसे कि अभी-अभी कोई भावनात्मक बातचीत हुई ही नहीं हो।

"मैं चावल के साथ हरी बीन्स के साथ शेजवान बिरयानी बनाने वाली हूँ। श्रेया का पेट चावल को सबसे अच्छी तरह से पचा पाता है, इसलिए मैं इसे अपने मीनू में ज़्यादा शामिल करती हूँ।" मैं खाने जैसी सांसारिक बकवास के बारे में बात क्यों कर रही थी? हमें अपना जीवन सुलझाना था। उसने कहा था कि वह नहीं चाहता कि मैं दीपावली के लिए अकेली रहूँ। दीपावली दो दिन दूर थी। लेकिन फिर उसने यह भी कहा कि वह छह महीने के लिए यहाँ है। छह महीने? इसका क्या मतलब था?

"सुनने मेँ बड़ा स्वादिष्ट चुनाव लगता है।"

"मुझे नई रेसिपी मिली है जिसे मैं आजमाना चाहती हूँ। मैं इसे बहुत मसालेदार या कुछ भी नहीं बनाने वाली।" अंशुमन को बहुत मसालेदार खाना पसंद नहीं था, और जब मैंने कुछ व्यंजनों के साथ प्रयोग किये थे, तो उसने बहुत शिकायत की थी। "प्रियंका, तुम जो भी बनाओगी, मैं खुशी से खाऊँगा। मुझे तुम्हारा पकाया खाना बहुत पसंद है।" ओह प्लीज!

"कब से?" मेरी आवाज़ सामान्य प्रियंका से कुछ सप्तक ऊँची थी। "तुमने हमेशा हर चीज़ के बारे में शिकायत की है। हमेशा ही। यह मध्यम रूप से पका हुआ क्यों नहीं है? यह इतना नमकीन क्यों है? इसमें बहुत ज़्यादा मक्खन क्यों है? धिक्कार है, अंशुमन, अब जब मैं चली गई हूँ, तो तुम यहाँ आकर ऐसी बकवास नहीं कर सकते।"

उसने सिर हिलाया। "मुझे लगता है कि तुम एक बेहतरीन पकाती हो। मुझे खेद है कि मैंने हमेशा नुक्स निकाला - मुझे तुम्हारा खाना वाकई बहुत पसंद है, प्रियंका। सच मेँ। मैं हमेशा सबके सामने इसकी डींग हाँकता रहता हूँ।"

मैं दर्द को बाहर आने से नहीं रोक सकी। "ओह-हो, मुझे यकीन है कि तुमने ऐसा किया होगा। ‘वह बहुत अच्छी कुक है, इसके लिए भगवान का शुक्र है, क्योंकि बाकी सुधार का काम अभी चल रहा है’ ठीक यही तुम्हारी माँ ने कहा था, और तुम वहीं बैठे थे और ऐसे सिर हिलाया जैसे कि उनकी बात बिल्कुल सही हो।" वह तब मेरे करीब आया, और मैंने खुद को किसी भी चीज़ के लिए तैयार कर लिया। यदि मैं उसकी माँ के बारे में शिकायत करती थी तो उसे बहुत बुरा लगता, और वह मुझे करने भी नहीं देता था। इतना नीचा दिखाता था कि मैंने कुछ भी कहना बंद कर दिया और बस उनसे बचने के तरीके ढूँढ़ने लगी।

उसने मेरे कंधों पर हाथ रखा। "मुझे तुम्हारा उनसे बचाव करना चाहिए था। मुझे अपने माता-पिता को तुम्हारे साथ वैसा व्यवहार नहीं करने देना चाहिए था जैसा उन्होंने किया। मैं यह जानता हूँ। बदसूरत सच्चाई यह है कि मैं तब भी यह जानता था। लेकिन मेरे लिए उनसे शांति बनाए रखना आसान था, इसलिए मैंने ऐसा किया, यह सोचते हुए कि तुम संभाल लोगी। तुम्हें मनाना मेरे लिए आसान था, उनसे मैं डरता था।"

मैंने अपने हाथ उसकी छाती पर रखे और उसे दूर धकेल दिया। वह दो कदम पीछे हट गया। "संभाल लूँगी? वे मेरे साथ लगातार क्रूरता करते थे। लगातार अंशुमन। और तुमने उन्हें मुझे हर पल छोटा महसूस करवाने दिया, बल्कि उनकी हाँ मेँ हाँ मिलाते रहे। फिर, जब वे मर गए, तो जैसे मेरे बच्चों और तुमने उनकी जगह मुझे परेशान करने की जिम्मेदारी संभाल ली है।" मेरी छाती क्रोध से धड़क रही थी। "मैं पर्याप्त शिक्षित नहीं हूँ। पर्याप्त परिष्कृत नहीं हूँ। मैं बस पर्याप्त नहीं हूँ। इसलिए, अब मैंने तुम्हें छोड़ दिया है। जाओ कोई ऐसी पत्नी खोजो जो पर्याप्त हो।" मैं अब चिल्ला रही थी। “शायद तुम्हारी वह सहायक, जिसके बारे में हर कोई कहता है कि तुम उसके साथ हो। मुझे पता है कि वह तुम्हें चाहती है।"

"नहीं, प्रियंका, मैं---"

"तुम मज़ाक कर रहे हो, है न? उसने मुझे कभी तुमसे बात नहीं करने दी। उसने कभी मेरे संदेश तुम तक नहीं पहुँचाए। ऐसा नहीं है कि हम पति पत्नी के बीच संदेश सहायक को पहुंचाने की जरूरत पड़नी चाहिए थी। तुमने ही तो उसे यह अधिकार दिया न, कि वह तुम्हारी पत्नी के कॉल रोके, उसके संदेशों पर ध्यान न दे, न संदेश तुम्हें पहुंचाने की जहमत उठाए? यह छूट तुमने उसे दी, गलती उसकी नहीं, गलती तुम्हारी है। क्योंकि एक प्यार करने वाला सभ्य पति मेरे संदेशों को खुद ही पढ़ता और मुझे जवाब देता। अपनी सहायक को निर्देश देता, कि कोई भी स्थिति हो मेरी पत्नी के कॉल तुरंत कनेक्ट हों। लेकिन बात तो यह है, अंशुमन, तुमने उसे उलटे यह निर्देश दिया कि वह मेरी कॉल की परवाह न करे। तुमने मेरे संदेश पढे, बस तब तक जवाब नहीं दिया जब तक कि उसका ‘तुमसे’ कोई लेना-देना न हो। इसलिए कि तुम पति तो थे, लेकिन ‘प्यार करने वाले’ पति नहीं थे।" मैंने उसके भड़कने का इंतज़ार किया। जब हम छोटे थे, तो हम ऐसी स्थिति में झगड़ते थे, लेकिन मुझे एहसास हुआ कि कोई भी चिल्लाने की प्रतियोगिता नहीं जीत सकता और मैंने लड़ना छोड़ दिया। भगवान, मैंने इतनी सारी चीज़ों को जाने दिया कि मुझे यह भी नहीं पता था कि मैं क्या बन गई हूँ। "मुझे मालूम है, मेरी गलतियाँ हैं।" उसने धीरे से कहा।

इससे मैं और भी चिढ़ गई "तो? मालूम है फिर तुमने ऐसा क्यों किया?" मेरे दोनों हाथ मुट्ठियों में बंधे हुए थे, मेरा शरीर चट्टान की तरह कड़ा था।

"क्योंकि मैं तुम्हें हल्के में ले रहा था," उसने कहा, उसके व्यवहार में पछतावा साफ़ झलक रहा था। "क्योंकि मैं बेवकूफ़ और मूर्ख था। मुझे लगता था कि हमारी शादी खुशहाल है क्योंकि मैं खुश था, तुम्हारे साथ शादी करके बहुत खुश था। मैं तुमसे प्यार करता हूँ, और मुझे पता था कि तुम भी मुझसे प्यार करती हो। हमने अच्छा सेक्स किया। मुझे सच मेँ नहीं लगा कि हमारे बीच कोई परेशानियाँ हैं। मैं अंधा था, मैं सिर्फ पछता सकता हूँ अब।"

"लेकिन फिर हमने सेक्स करना बंद कर दिया, अंशुमन, क्योंकि तुम गेस्ट रूम में सोने लगे," मैंने बताया। "कोई और पत्नी सोचती कि तुम किसी और के साथ सेक्स कर रहे हो।"

"क्या तुमने ऐसा सोचा?" मैं झूठ बोलना चाहती थी और उसके पापों में इज़ाफा करना चाहती थी, लेकिन मैं ऐसा नहीं कर सकी। मैंने अपना सिर ‘न’ मेँ हिलाया।

"क्योंकि तुम मुझे जानती हो। मैं तुमसे प्यार करता हूँ, प्रियंका। किसी और से कभी नहीं किया... मैंने कभी नहीं किया, कभी नहीं। ... मैं ऐसा क्यों करूँगा प्रियंका? इतनी प्यार करने वाली पत्नी, तुम मेरे घर पर थीं, गर्मजोशी से भरी और इच्छुक, प्यार से भरी हुई। मैं ‘तुम्हारा प्रिय अंशुमन’ था, और इससे मुझे हर दिन बहुत खुशी मिलती थी। सच मेँ तुम मेरा स्वर्ग थीं प्रियंका।” उसकी आवाज मेँ आँसू थे।

"तो फिर क्यों?" मेरे अंदर की सारी लड़ाई खत्म हो गई थी, और मैं लगभग गिरने ही वाली थी "तो फिर क्यों, अंशुमन?" मैंने दयनीय भाव से पूछा।

उसने अपने होंठ चाटे। "उस दिन जब... मैं देर से घर आया था; मैंने मार्सेल के यहाँ डिनर किया था। मैं तुम्हें बहुत चाहता था। मैं - मैं जल्दी .... मैं .... मैं शर्मिंदा हो गया था।" उसका चेहरा लाल हो गया था और वह अनिश्चित दिख रहा था, बिल्कुल वैसा ही जैसा उस दिन शाश्वत दिख रहा था जब उसने इसी रसोईघर में मुझसे माफ़ी मांगी थी।

"तुमने मुझसे कुछ क्यों नहीं कहा?"

"मुझे ऐसा लगा कि यह पहली बार नहीं था जब यह हुआ हो। तुम्हें सुख नहीं मिला। मुझे डर लग रहा था कि मैं तुम्हें सुख नहीं दे पाता हूँ।"

"डर गए? और तुम??" अंशुमन राव-सिन्हा कभी डरता नहीं, कभी कमजोर नहीं पड़ता।

उसने झेंपते हुए मुस्करा कर कहा, "मुझमें तुमसे बात करने की हिम्मत नहीं थी; तुमसे पूछने की कि क्या---"

"मैंने कभी तुम्हारे साथ दिखावा नहीं किया।" मैं चाहती थी कि वह यह जान ले। "मैंने कभी भी दिखावा नहीं किया। हम बीस साल साथ रहे, अंशुमन, और मेरे लिए हमारा समागम सिर्फ यौन सुख या मुक्ति के बारे में नहीं था। यह अंतरंगता के बारे में था। इस बारे में था.... "

"बस इस बारे मेँ कि हम साथ थे," उसने मेरे लिए बात पूरी की।

"हाँ, और तुमने मुझसे यह छीन लिया, और यही वह आखिरी चीज़ थी जो हमें एक साथ बांधे हुए थी।"

"नहीं।" वह मेरी ओर बढ़ा। "नहीं। नहीं। नहीं प्रियंका। मैं तुमसे प्यार करता हूँ। तुम मुझसे प्यार करती हो। सिर्फ यही बात हमें एक साथ रखती है। तुम हमेशा कहती रहीं, मैंने जाने कब कहना बंद कर दिया। प्रियंका, भले ब्रह्मचारी बनना पड़े, (वैसे इस के लिए मैं अभी बहुत छोटा हूँ) फिर भी मैं तुमसे हमेशा प्यार करूँगा, करता रहूँगा।" जैसा कि मैंने श्रेया से कहा, ऐसा नहीं था कि हमारे साथ बिताए गए सभी बीस साल बुरे रहे हों। नहीं, हमने एक जोड़े और एक परिवार के रूप में खूब मज़ा भी किया था। यह आखिरी दो सालों का समय था जब यह सब और भी ज़्यादा मुश्किल होने लगा, क्योंकि बच्चे चले गए थे, और हमने एक साथ समय नहीं बिताया। वह कह रहा है, और शायद सोचता भी है, कि वह मुझसे प्यार करता है। लेकिन अगर वह करता, तो मुझे उसका प्यार महसूस होता, और यह नहीं हुआ।

"मुझे ऐसा महसूस नहीं होता कि तुम मुझसे प्यार करते हो," मैंने दोहराया।

"और यह मेरी ही गलती है। मैं इससे सुधारने का इरादा रखता हूं।" मैंने सिर हिलाया "तुमने कहा था कि कागज़ात पर हस्ताक्षर कर रहे हो? क्या हुआ?"

"मुझे तलाक नहीं चाहिए, प्रियंका। मैं सच कह रहा हूँ। मैं यहाँ हूँ, तुम्हारे साथ हूँ।"

"तुम यहाँ इसलिए आए हो क्योंकि बच्चे यहाँ हैं। तुम्हें पता था कि नीलिमा आ रही है, इसलिए तुमने आने का फैसला किया।" मैं उन व्यंग्यों को कैसे रोकूँ जो उसे झकझोर रहे हैं? मुझे एहसास भी नहीं था कि मेरे अंदर इतना गुस्सा है, जो सब बाहर आ रहा था।

“नहीं बेब, नहीं प्रिये! मैं ‘तुम्हारे साथ’ समय बिताना चाहता हूँ। वे दीपावली के बाद चले जाएंगे, लेकिन मैं महीनों यहाँ रहूँगा। मैं कहीं नहीं जा रहा, प्रियंका, तुम्हारे बिना नहीं।"

वह इतना दृढ़ लग रहा था कि जिस उम्मीद को मैंने एक बड़े पत्थर के नीचे कुचल दिया था, उसकी कोंपलें फूट कर बाहर आने लगी। मैं उसी उम्मीद को रोकने के लिए उस बड़े पत्थर पर बैठ गई क्योंकि यह एक खतरनाक भावना थी, जो मेरी भलाई के लिए अच्छी नहीं थी।

"मुझे तुम पर विश्वास नहीं है," मैंने अंततः स्वीकार किया। मुझे उस पर भरोसा नहीं था, यही सच्चाई थी। उसने अपने माता-पिता के खिलाफ़ मेरे लिए आवाज़ नहीं उठाई। उसने हमारे बच्चों को मेरे साथ बुरा व्यवहार करने दिया। उसने खुद मेरे साथ बुरा व्यवहार किया।

"मुझे पता है कि मैंने तुम्हारा विश्वास खो दिया है। मैं इसे वापस अर्जित करूँगा।" वह इतना ईमानदार था कि यह बात मुझे दुख पहुँचाती थी। "मुझे रात के खाने की तैयारी करनी है।" मैंने उससे मुंह मोड़ लिया, और जब उसने मुझे कुछ करने के लिए पूछा, तो मैंने उसे ढेर सारी हरी बीन्स की फलियाँ साफ करने को कहा। और उसने बिना शिकायत किए वैसा ही किया जैसा मैंने कहा था।