ज़िंदगी अधूरी तेरे बिन - भाग छब्बीस (26)
भाग 26
अंशुमन
दीपावली के पहले के दिन मैं सनशाइन होम्स रिज़ॉर्ट के सहायक रंजीत से मिला। इससे एक दिन पहले, मैं उसकी चचेरी बहन लीला और उसकी छोटी बेटी मीनू से भी मिला था। लीला ने मुझसे माफ़ी मांगी थी, उस दिन उन कमरों की सफाई करने के लिए, जब प्रियंका ने मुझसे कमरे साफ करने के लिए कहा था। यह कहते हुए कि उसे छुट्टी लेनी पड़ी थी, क्योंकि मीनू की तबीयत ठीक नहीं थी। मुझे यह सुनकर राहत मिली कि मेरी पत्नी के पास मदद करने के लिए लोग हैं, और मैंने लीला का धन्यवाद किया था।
रंजीत कमर पर एक टूल बेल्ट लटकाए हुए था। वह जवान बच्चा था, शाश्वत की उम्र का। मैंने अपना हाथ उसकी ओर बढ़ाया, "हाय, मैं अंशुमन हूं, प्रियंका का पति।"
उन्होंने तुरंत मुझसे हाथ मिलाया, उनके चेहरे पर मुस्कान थी। "आपसे मिलकर अच्छा लगा, मिस्टर राव-सिन्हा। मिस प्रियंका अद्भुत व्यक्तित्व हैं।"
"मुझे बस अंशुमन अंकल कहो, और हाँ, मेरी पत्नी अद्भुत है। उसने बताया कि तुम यहाँ के काम करते हो, और मैं पूछना चाहता था कि क्या मैं कुछ मदद कर सकता हूँ।" मैंने अपने हाथ अपनी जेब में डाले। "मैं आर्किटेक्ट हूँ, लेकिन मैंने पहले निर्माण कार्य भी किया है।" रंजीत ने सिर हिलाया, कुछ क्षण मेरी ओर देखा और फिर उस विशाल लॉन की ओर मुड़ा जो एक ओर चट्टानों की ओर जाता था और दूसरी ओर समुद्र तट की ओर ढलान पर था।
"आह .... शायद आप कुछ मदद कर सकें।"
"ठीक है, फिर बताओ मुझे?" उस ने बताया, "चट्टान के किनारे पर कटाव की बड़ी समस्या रहती है। हर तूफ़ान के बाद समुद्र और आगे आ जाता है और हम थोड़ी और ज़मीन समुद्र मेँ खो देते हैं। वहाँ रिटेनिंग दीवार है, लेकिन बहुत पुरानी है और ठीक नहीं बनी है, उतनी प्रभावी नहीं है।" मैं उसके पीछे चल पड़ा, और देखा कि जैसे-जैसे हम चट्टान के किनारे के पास पहुँच रहे थे, घास पतली होती जा रही थी। हमारे सामने पानी फैला हुआ था - नीले रंग का एक विशाल विस्तार, जो अपनी अंतहीनता में सुंदर भी था, और भयावह भी। रंजीत ने रिटेनिंग वॉल की ओर हाथ हिलाया, जो पत्थर और कंक्रीट से बनी एक ढहती हुई संरचना थी। वह निश्चित रूप से कटाव रोकने के लिए अपर्याप्त लग रही थी। ऐसा लग रहा था कि रंजीत ने कुछ पैच-अप का काम किया था। चारों ओर रेत की बोरियाँ थीं। "देखिये," उस ने आगे कहा, "दीवार की नींव ज्यादा गहरी नहीं है।"
मैंने दीवार का अध्ययन किया। यह एक गंभीर मुद्दा था; खराब तरीके से बनाई गई रिटेनिंग दीवार से ज़मीन का बहुत बड़ा नुकसान हो सकता था। रिज़ॉर्ट की निकटता के कारण, यह एक बड़ा जोखिम था, जिसे हम नहीं उठा सकते थे। "इसे फिर से डिज़ाइन करना पड़ेगा, कुछ ऐसा जो धरती को रोके रख सके और पानी के बहाव को बेहतर तरीके से संभाल सके।"
"हाँ?" वह घबराया हुआ लग रहा था। "मुझे नहीं पता कि यह सब कैसे करना है। मैं... आह... मैकेनिक बनने की पढ़ाई कर रहा हूँ। मैं यहाँ बस मदद करता हूँ। मुझे पता है कि पैसे की तंगी है, और हम किसी को काम पर नहीं रख सकते, खासकर साल के इस समय में, इसलिए मैं अपनी तरफ से पूरी कोशिश कर रहा हूँ, मिस्टर राव- ... अंशुमन अंकल। क्या आप इस काम को संभाल सकते हैं?"
"हाँ, मुझे लगता मैं संभाल सकता हूँ," मैंने हंस कर जवाब दिया, मेरे दिमाग में पहले से ही समाधान की रूपरेखा तैयार हो गई थी। "हमें मौजूदा नींव के चारों ओर खुदाई करनी होगी और इसे एक गहरे, मजबूत आधार के साथ मजबूत करना होगा। उचित जल निकासी भी महत्वपूर्ण है...ज्यादा बहाव और रिसाव को संभालने के लिए।" रंजीत प्रभावित दिख रहा था। "लगता है कि आप अपना काम अच्छी तरह जानते हैं। मैं मदद कर सकता हूँ, लेकिन यह इस बात पर निर्भर करेगा कि आप कब शुरू करेंगे। मिस प्रियंका ने कहा कि आप सब कर्नाटक में रहते हैं, और छुट्टियों के बाद वापस चले जाएंगे।"
"मैं वापस नहीं जा रहा रंजीत, अभी कुछ समय के लिए नहीं। हम कल शुरू कर सकते हैं" मैंने निर्णायक रूप से कहा। "मैं आज रात कुछ योजनाएँ बना लूँगा, और हम सुबह उन पर बात कर सकते हैं। हमें कुछ आपूर्तियाँ लाने की ज़रूरत होगी, लेकिन मुझे लगता है कि हम उस दीवार को बना कर यहाँ की ज़मीन को बचा सकते हैं।"
"बस ऐसे ही?" रंजीत आश्चर्यचकित दिख रहा था। मैंने मुस्कराते हुए कहा, "हाँ बेटा, ऐसे ही। तुम गैरेज के बजाय यहाँ क्यों काम करते हो?"
"मैं मिस श्रेया की मदद कर रहा हूँ, खास तौर पर अब जब वह बीमार हैं। लीला का घर पीछे ही है, इसलिए...मैं यहाँ रुक जाता हूँ।" रंजीत ने कुछ देर सोचा, फिर कहा, "अंशुमन अंकल ...आह...मैं आपको धन्यवाद देना चाहता था।"
"किस लिए?"
उसने अपने होंठ चाटे। "मेरे पास घर के किराये के पैसे कम पड़ रहे थे और लग रहा था लीला के साथ रहना होगा। मिस प्रियंका ने मुझे तुरंत एक हजार रुपए दिए, और यहाँ काम भी दिया, इसलिए मुझे लीला के साथ रहने की ज़रूरत नहीं पड़ी। लीला के पास मीनू है, और उसका घर छोटा है। मुझे नहीं पता कि मिस प्रियंका की मदद के बिना हम कैसे... "
मेरी प्रियंका और उसका बड़ा दिल! उसने घर से सिर्फ पाँच हज़ार रुपये लिए थे। उसके पास सिर्फ़ इतना ही पैसा था। नहीं, उसके पास हमारे परिवार का पूरा पैसा था लेकिन तब वह यह नहीं जानती थी। जब उसने रंजीत की मदद की तब वह तो यही सोच रही थी कि उसके पास पाँच हज़ार रुपये ही हैं, और वह भी किश्तों मेँ मुझे लौटाने की योजना बना रही थी। उसमें से कुछ उसने इस नौजवान बच्चे को दे दिया था। मैंने रंजीत के कंधे थपथपाए। "धन्यवाद की ज़रूरत नहीं, बेटा। तुम यहाँ बहुत मदद करते हो; यह तुमने कमाया है।"
हमने इस परियोजना को शुरू करने के लिए आवश्यक चीजों के बारे में बात की और रंजीत वापस रिसॉर्ट चला गया। मैं वहीं रुक गया और चट्टानों से टकराती लहरों को देखने लगा। प्रियंका के जाने के बाद पहली बार मुझे एक उद्देश्य का एहसास हुआ। यह सिर्फ़ एक प्रोजेक्ट से कहीं बढ़कर था; यह कुछ स्थायी योगदान देने और उसे यह दिखाने का मौका था कि मैं हर संभव तरीके से उसका समर्थन करने के लिए यहाँ हूँ। मैंने मुड़कर देखा तो यशस्वी बगीचे में समुद्र तट की ओर देख रहा था। मैं उसके पास गया।
"यशस्वी।"
वह मुड़ा और सिर हिलाया, "जी सर"
"बेटा, तुम अब भी मुझसे नाराज हो?" वह हैरान दिखा कि मैं इस मामले को गंभीरता से ले रहा था। प्रियंका के जाने के बाद मैंने एक बात सीखी थी, कि चुप रहने से स्थिति सुधरती नहीं, और बिगड़ती है। सब कुछ ठीक होने का दिखावा करने से मेरा परिवार टूट गया था - मैं अब किसी भी परिवार के सदस्य के साथ ऐसा नहीं करने वाला था। यशस्वी नीलिमा के लिए महत्वपूर्ण था, तो मेरे लिए भी था।
"जी हाँ।" उसने शान्त स्वर मेँ कहा।
मैंने सिर हिलाया "मैं नीलिमा की मदद करने, अपनी पत्नी के लिए समर्थन, और हम सब को यह एहसास दिलाने के लिए आभारी हूँ कि हमने प्रियंका के साथ कितनी बड़ी गलती की है।" मैं देख सकता था कि मेरी बात से वह चकित हो गया हैं। वह बहुत आश्चर्यचकित दिख रहा था, इतना कि शायद एक पंख की चोट से भी गिर जाएगा। "मैं तुम्हें भी वही कह रहा हूँ जो मैंने अपने बच्चों से कहा: कि मैं अब से प्रियंका और हमारे परिवार के लिए बेहतर करने वाला हूँ।" मैं एक नया कौशल सीख रहा था, एक ऐसे व्यक्ति के लिए जिसने कभी खुल कर मन की बातें नहीं कहीं। जिसने हमेशा मुश्किल चीजों को अनदेखा किया और निजी संघर्ष से दूर भागते हुए के जीवन में अपना रास्ता बनाया।
"बेहतर करने का क्या मतलब है, सर?" यशस्वी ने उसी नाराज लहजे मेँ पूछा। वह मुझ पर कोई नरमी नहीं बरत रहा था।
"मैंने काम से अस्थायी छुट्टी ले ली है।" उसने मेरी ओर देखा, उसका आश्चर्य स्पष्ट था। मैं मुस्कराया। "नीलिमा को अभी तक नहीं पता है। शाश्वत जानता है। अब वहाँ सीईओ के रूप में कोई और है। मैं यहाँ छह महीने के लिए हूँ... शुरूआत के लिए।" प्रियंका जिस तरह नाराज थी, मुझे नहीं लग रहा था कि उसे वापस पाने के लिए छह महीने पर्याप्त होंगे। अभी तो एक जीवन भी बहुत छोटा लग रहा था। वह गुस्से में थी, और मुझे पता नहीं था कि प्रियंका के इस रूप को कैसे संभालना है। वह हमेशा इतनी लचीली और सहज रहती थी कि उसके इस नए व्यक्तित्व को समझने में थोड़ा समय लग रहा था। अजीब यह था कि मुझे यह अच्छा भी लग रहा था। काश हम पहले से ही खुल कर अपने मन की बातें एक दूसरे से कहते होते। अब मुझे लगता था कि अगर वह अपनी भावनाओं के बारे में बताए और मैं उसे बता सकूँ कि मैं कैसा महसूस करता हूँ, तो शायद अब हमारी शादी बेहतर, अधिक ठोस होगी, जहाँ हम दोनों बराबरी के पायदान पर होंगे। क्योंकि पहले के जीवन मेँ तो यह स्पष्ट था कि प्रियंका को लगता था कि उसे मेरे द्वारा स्वीकार किए जाने के लिए कड़ी मेहनत करनी होगी और बेहतर बनना होगा। जबकि मैं सिर्फ़ अपने ‘राव-सिन्हा’ होने भर से सब पाने का हकदार हूँ। मैं एक क्रूर माँ का असली बेटा बना रहा था; इसमें कोई सवाल नहीं था।
"विश्वास करना कठिन है," यशस्वी ने धीरे से कहा, "आप को तो काम का नशा है।"
"लेकिन मैं काम नहीं कर सकता, क्योंकि मैं अपनी पत्नी के बिना नहीं रह सकता बेटे। अगर काम और प्रियंका के बीच कोई विकल्प चुनना हो तो वह हमेशा जीतेगी।"
यशस्वी ने सोचते हुए सिर हिलाया। "मुझे उम्मीद नहीं थी। जब नीलिमा ने मुझे बताया कि आप और शाश्वत यहाँ हो, तो मुझे लगा यह गणेश चतुर्थी जैसा ही बकवास समय होगा।"
"पिछले दो महीनों में हम उससे काफी आगे बढ़ चुके हैं।"
यशस्वी ने विनम्रता से कहा, "मुझे बताने के लिए शुक्रिया। मुझे आपकी पत्नी बहुत पसंद हैं। जानते हैं अंकल, आंटी ने मुझे क्या कहा कल? कि मुझे भी यह समझना होगा कि भले ही मैं नीलिमा के परिवार से नाराज होऊँ, लेकिन मुझे नीलिमा की खुशी को आगे रख कर उसकी खुशी के लिए उनसे मिलने जाना होगा, नीलिमा की इच्छा, मेरी अनिच्छा या नाराजगी के कारण उपेक्षित न हो, जैसा आंटी के साथ हुआ था। पति के पसंद न करने से नीलिमा को अपने परिवार से दूर न जाना पड़े, यह भी मुझे समझना होगा। मैं मनोविज्ञान का विद्यार्थी हूँ लेकिन मैं भी नीलिमा के साथ वही गलती कर रहा था जो आपने प्रियंका आंटी को श्रेया आंटी से दूर रख कर की थी। आंटी अपने लिए नाराज नहीं थीं लेकिन मुझे समझा रही थीं कि मैं यही गलती नीलिमा के साथ न करूँ। काश... काश मेरी भी ऐसी ही माँ होती।"
"काश मेरी भी?” मैं उदासी से हंसा.... “तो ... अब यशस्वी, मैं सोच रहा था कि क्या कल सुबह तुम्हारे पास समुद्र कटाव को रोकने के लिए दीवार खड़ी करने में मेरी मदद करने के लिए कुछ समय है?" उसने मेरी ओर प्रश्नवाचक दृष्टि से देखा।
मैंने उसका कंधा थपथपाया और कहा, "चलो मैं तुम्हें दिखाता हूँ।"