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गुरुवार, 27 सितंबर 2012

शहीदे आज़म भगत सिंह जी

शहीदे आज़म श्री भगत सिंह जी
shaheed martyr shri bhagat singh ji


आज शहीदे आज़म भगत सिंह जी का जन्म दिन है । इनका जन्म 27 सितम्बर 1907 को नवांशहर पंजाब में हुआ था ।

भगत सिंह भारत के एक स्वतंत्रता संग्राम के एक प्रमुख और मुखर सेनानी थे। उनका साहस आज के भारतीय युवकों के लिए एक बहुत बड़ा आदर्श है। इन्होंने केन्द्रीय संसद (सेण्ट्रल असेम्बली) में बम फेंककर भी भागने से मना कर दिया, और अपनी गिरफ़्तारी दी । जिसके फलस्वरूप इन्हें २३ मार्च, १९३१ को (आयु 23 बरस 5 महीने ) इनके दो अन्य साथियों, राजगुरु तथा सुखदेव के साथ फाँसी पर लटका दिया गया। हमारा भारत देश उनके बलिदान को आज भी बड़ी गम्भीरता से याद करता है । उनके जीवन और चरित्र पर कई हिन्दी फिल्में बनी हैं । कुछ फ़िल्में तो उनके नाम से बनाई गयीं हैं । मनोज कुमार की सन् १९६५ में बनी फिल्म शहीद भगत सिंह के जीवन पर बनायीं गयी फिल्म काफी प्रामाणिक फिल्म मानी जाती है।

भगत सिंह का जन्म 27 सितंबर, 1907, शनिवार सुबह ९ बजे लायलपुर ज़िले के बंगा गाँव (चक नम्बर १०५ जो अब पाकिस्तान में है) में हुआ था। ( कहीं कहीं इनकी जन्म तिथि 28 सितम्बर भी बताई गयी है ) उनका पैतृक निवास आज भी भारतीय पंजाब के नवाँशहर ज़िले के खटकड़कलाँ गाँव में स्थित है। उनके पिता का नाम सरदार किशन सिंह और माता का नाम विद्यावती कौर था , यह एक सिख परिवार था जिसने आर्य समाज को अपना लिया था।

लाहौर के नेशनल कॉलेज़ की पढ़ाई छोड़कर भगत सिंह ने भारत की आज़ादी के लिये नौजवान भारत सभा की स्थापना की । काकोरी काण्ड में राम प्रसाद 'बिस्मिल' सहित ४ क्रान्तिकारियों को फाँसी व १६ अन्य को कारावास की सजाओं से भगत सिंह उद्विग्न हुए , और उन्होंने १९२८ में अपनी पार्टी "नौजवान भारत सभा" का श्री चंद्रशेखर आज़ाद जी के "हिन्दुस्तान रिपब्लिकन ऐसोसिएशन" में विलय कर दिया और उसे एक नया नाम दिया "हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन"। इस संगठन का उद्देश्य सेवा,त्याग और पीड़ा झेल सकने वाले नवयुवक तैयार करना था। पहले लाहौर में साण्डर्स-वध और उसके बाद दिल्ली की केन्द्रीय असेम्बली में चन्द्रशेखर आजाद व पार्टी के अन्य सदस्यों के साथ बम-विस्फोट करके ब्रिटिश साम्राज्य के विरुद्ध खुले विद्रोह को बुलन्दी प्रदान की।

भगत सिंह ने राजगुरु के साथ मिलकर १७ दिसम्बर १९२८ को लाहौर में सहायक पुलिस अधीक्षक रहे अंग्रेज़ अधिकारी जे० पी० सांडर्स को मारा था। इस कार्रवाई में क्रान्तिकारी चन्द्रशेखर आज़ाद ने उनकी पूरी सहायता की थी। क्रान्तिकारी साथी बटुकेश्वर दत्त के साथ मिलकर भगत सिंह ने अलीपुर रोड दिल्ली स्थित ब्रिटिश भारत की तत्कालीन सेण्ट्रल एसेम्बली के सभागार में ८ अप्रैल १९२९ को अंग्रेज़ सरकार को जगाने के लिये बम और पर्चे फेंके थे। बम फेंकने के बाद वहीं पर दोनों ने अपनी गिरफ्तारी भी दी।

भगत सिंह करीब १२ वर्ष के थे जब जलियाँवाला बाग हत्याकाण्ड हुआ था। इसकी सूचना मिलते ही भगत सिंह अपने स्कूल से १२ मील पैदल चलकर जलियाँवाला बाग पहुँच गये। इस उम्र में भगत सिंह अपने चाचाओं की क्रान्तिकारी किताबें पढ़ कर सोचते थे कि इनका रास्ता सही है कि नहीं ? गांधी जी का असहयोग आन्दोलन छिड़ने के बाद वे गान्धी जी के अहिंसात्मक तरीकों और क्रान्तिकारियों के हिंसक आन्दोलन में से अपने लिये रास्ता चुनने लगे। गान्धी जी के असहयोग आन्दोलन को रद्द कर देने के कारण देश के तमाम नवयुवकों की भाँति उनमें भी रोष हुआ और अन्ततः उन्होंने देश की स्वतन्त्रता के लिये क्रान्ति का मार्ग अपनाना अनुचित नहीं समझा। उन्होंने जुलूसों में भाग लेना प्रारम्भ किया तथा कई क्रान्तिकारी दलों के सदस्य बने। बाद में वे अपने दल के प्रमुख क्रान्तिकारियों के प्रतिनिधि भी बने। दल के प्रमुख क्रान्तिकारियों में चन्द्रशेखर आजाद, भगवतीचरण व्होरा, सुखदेव, राजगुरु, इत्यादि थे।

१९२८ में साइमन कमीशन के बहिष्कार के लिये भयानक प्रदर्शन हुए। इन प्रदर्शनों मे भाग लेने वालों पर अंग्रेजी शासन ने लाठी चार्ज भी किया। इसी लाठी चार्ज से आहत होकर लाला लाजपत राय की मृत्यु हो गयी। अब इनसे रहा न गया। एक गुप्त योजना के तहत इन्होंने पुलिस सुपरिण्टेण्डेण्ट स्काट को मारने की योजना सोची। सोची गयी योजना के अनुसार भगत सिंह और राजगुरु लाहौर कोतवाली के सामने व्यस्त मुद्रा में टहलने लगे। उधर बटुकेश्वर दत्तअपनी साइकिल को लेकर ऐसे बैठ गये जैसे कि वो ख़राब हो गयी हो । दत्त के इशारे पर दोनों सचेत हो गये। उधर चन्द्रशेखर आज़ाद पास के डी० ए० वी० स्कूल की चहारदीवारी के पास छिपकर घटना को अंजाम देने में रक्षक का काम कर रहे थे। १७ दिस्मबर १९२८ को करीब सवा चार बजे, स्काट की जगह, ए० एस० पी० सॉण्डर्स के आते ही राजगुरु ने एक गोली सीधी उसके सर में मारी जिसके तुरन्त बाद वह होश खो बैठा। इसके बाद भगत सिंह ने ३-४ गोली दाग कर उसके मरने का पूरा इन्तज़ाम कर दिया। ये दोनों जैसे ही भाग रहे थे कि एक सिपाही चनन सिंह ने इनका पीछा करना शुरू कर दिया। चन्द्रशेखर आज़ाद ने उसे सावधान किया - "आगे बढ़े तो गोली मार दूँगा।" नहीं मानने पर आज़ाद ने उसे गोली मार दी। इस तरह इन लोगों ने लाला लाजपत राय की मौत का बदला ले लिया ।

भगत सिंह यद्यपि रक्तपात के पक्षधर नहीं थे परन्तु वे कार्ल मार्क्स के सिद्धान्तों से प्रभावित थे। वे समाजवाद के पोषक भी थे। इसी कारण से उन्हें पूँजीपतियों की मजदूरों के प्रति शोषण की नीति पसन्द नहीं आती थी। लेकिन याद रखने की बात है कि "समाजवाद" और "साम्यवाद" अलग अलग धाराएं हैं, COMMUNISM एंड SOCIALISM ARE DIFFERENT - भगतसिंह जी ने कभी कम्युनिस्ट पार्टी को ज्वाइन नहीं किया | उनकी अपनी बनाई पार्टी का नाम भी "हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन" है,कम्युनिस्ट नहीं है ।  (The word socialist also appears in the preamble of our constitution) उस समय चूँकि अँग्रेज ही सर्वेसर्वा थे तथा बहुत कम भारतीय उद्योगपति उन्नति कर पाये थे, अतः अँग्रेजों के मजदूरों के प्रति अत्याचार से उनका विरोध स्वाभाविक था। मजदूर विरोधी ऐसी नीतियों को ब्रिटिश संसद में पारित न होने देना उनके दल का निर्णय था। सभी चाहते थे कि अँग्रेजों को पता चलना चाहिये कि हिन्दुस्तानी जाग चुके हैं और उनके हृदय में ऐसी नीतियों के प्रति आक्रोश है। ऐसा करने के लिये ही उन्होंने दिल्ली की केन्द्रीय एसेम्बली में बम फेंकने की योजना बनायी थी।

भगत सिंह चाहते थे कि इसमें कोई खून खराबा न हो और अँग्रेजों तक उनकी 'आवाज़' भी पहुँचे। हालाँकि प्रारम्भ में उनके दल के सब लोग ऐसा नहीं सोचते थे पर अन्त में सर्वसम्मति से भगत सिंह तथा बटुकेश्वर दत्त का नाम चुना गया। निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार ८ अप्रैल, १९२९ को केन्द्रीय असेम्बली में इन दोनों ने एक ऐसे स्थान पर बम फेंका जहाँ कोई मौजूद न था, अन्यथा उसे चोट लग सकती थी। पूरा हाल धुएँ से भर गया। भगत सिंह चाहते तो भाग भी सकते थे पर उन्होंने पहले ही सोच रखा था कि उन्हें दण्ड स्वीकार है चाहें वह फाँसी ही क्यों न हो; अतः उन्होंने भागने से मना कर दिया। उस समय वे दोनों खाकी कमीज़ तथा निकर पहने हुए थे। बम फटने के बाद उन्होंने "इंकलाब! - जिन्दाबाद!! साम्राज्यवाद! - मुर्दाबाद!!" का नारा लगाया और अपने साथ लाये हुए पर्चे हवा में उछाल दिये। इसके कुछ ही देर बाद पुलिस आ गयी और दोनों को ग़िरफ़्तार कर लिया गया।

जेल में भगत सिंह ने करीब २ साल रहे। इस दौरान वे लेख लिखकर अपने क्रान्तिकारी विचार व्यक्त करते रहे। जेल में रहते हुए उनका अध्ययन बराबर जारी रहा। उनके उस दौरान लिखे गये लेख व सगे सम्बन्धियों को लिखे गये पत्र आज भी उनके विचारों के दर्पण हैं। अपने लेखों में उन्होंने कई तरह से पूँजीपतियों को अपना शत्रु बताया है। उन्होंने लिखा कि मजदूरों का शोषण करने वाला चाहें एक भारतीय ही क्यों न हो, वह उनका शत्रु है। जेल में भगत सिंह व उनके साथियों ने ६४ दिनों तक भूख हडताल की। उनके एक साथी यतीन्द्रनाथ दास ने तो भूख हड़ताल में अपने प्राण ही त्याग दिये थे।

२३ मार्च १९३१ को शाम में करीब ७ बजकर ३३ मिनट पर भगत सिंह तथा इनके दो साथियों सुखदेव व राजगुरु को फाँसी दे दी गई । फाँसी पर जाने से पहले वे लेनिन की नहीं बल्कि राम प्रसाद 'बिस्मिल' की जीवनी पढ़ रहे थे । कहा जाता है कि जेल के अधिकारियों ने जब उन्हें यह सूचना दी कि उनके फाँसी का वक्त आ गया है तो उन्होंने कहा था- "ठहरिये! पहले एक क्रान्तिकारी दूसरे से मिल तो ले।" फिर एक मिनट बाद किताब छत की ओर उछाल कर बोले - "ठीक है अब चलो ।"

फाँसी पर जाते समय वे तीनों मस्ती से गा रहे थे -

मेरा रँग दे बसन्ती चोला, मेरा रँग दे;
मेरा रँग दे बसन्ती चोला। माय रँग दे बसन्ती चोला।।

फाँसी के बाद कहीं कोई आन्दोलन न भड़क जाये इसके डर से अंग्रेजों ने पहले इनके मृत शरीर के टुकड़े किये फिर इसे बोरियों में भरकर फिरोजपुर की ओर ले गये जहाँ घी के बदले मिट्टी का तेल डालकर ही इनको जलाया जाने लगा। गाँव के लोगों ने आग जलती देखी तो करीब आये। इससे डरकर अंग्रेजों ने इनकी लाश के अधजले टुकड़ों को सतलुज नदी में फेंका और भाग गये। [ अब यह कैसे माना जाए कि यह उनका शव था भी या नहीं - आखिर सुभाष बाबू की मौत को लेकर भी तो कई सवाल हैं | हमने बस मान लिया जो बताया गया :( ] जब गाँव वाले पास आये तब उन्होंने इनके मृत शरीर के टुकड़ो कों एकत्रित कर विधिवत दाह संस्कार किया । और भगत सिंह हमेशा के लिये अमर हो गये। इसके बाद लोग अंग्रेजों के साथ-साथ गान्धी को भी इनकी मौत का जिम्मेवार समझने लगे । इस कारण जब गान्धी कांग्रेस के लाहौर अधिवेशन में हिस्सा लेने जा रहे थे तो लोगों ने काले झण्डों के साथ गान्धीजी का स्वागत किया । एकाध जग़ह पर गान्धी पर हमला भी हुआ, किन्तु सादी वर्दी में उनके साथ चल रही पुलिस ने बचा लिया।

कहा जाता है कि जेल में रहने के दौरान भगतसिंह जी ने एक पत्र लिखा था "मैं नास्तिक क्यों हूँ" किन्तु ऐसा कोई सबूत नहीं है कि ऐसा कोई पत्र है भी | यह एक सोची समझी भ्रामक बात लगती है | इसी भ्रम को और अधिक मज़बूत बनाने के लिए उनकी पगड़ी को लाल रंग कर यह दिखाने के प्रयास करे जा रहे हैं की वे कम्युनिस्ट थे - जो सरासर झूठ है । इस  के बारे में अपने विचार रखते हुए जल्द ही एक पूरी पोस्ट लिखूंगी ।

भगत सिंह को विश्वास था कि उनकी शहादत से भारतीय जनता और उद्विग्न हो जायेगी और ऐसा उनके जिन्दा रहने से शायद ही हो पाये । इसी कारण उन्होंने मौत की सजा सुनाने के बाद भी माफ़ीनामा लिखने से साफ मना कर दिया था। पं० राम प्रसाद 'बिस्मिल' ने अपनी आत्मकथा में जो-जो दिशा-निर्देश दिये थे, भगत सिंह ने उनका अक्षरश: पालन किया। कहा जाता है कि उन्होंने अंग्रेज सरकार को एक पत्र भी लिखा, जिसमें कहा गया था कि उन्हें अंग्रेज़ी सरकार के ख़िलाफ़ भारतीयों के युद्ध का प्रतीक एक युद्धबन्दी समझा जाये तथा फाँसी देने के बजाय गोली से उड़ा दिया जाये।

आज भी भारत और पाकिस्तान की जनता भगत सिंह को आज़ादी के दीवाने के रूप में देखती है जिसने अपनी जवानी सहित सारी जिन्दगी देश के लिये समर्पित कर दी।

भगत सिंह जी के जन्म दिवस पर उन्हें प्रणाम, नमन ।

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In reference to a comment by Shri Gaurav Rajasthan ka: 

इस लेख में लिखी जानकारी इन्टरनेट से ली गयी है।  जहां तक मेरी जानकारी है, ये जानकारियाँ सही हैं .

लेकिन यह एक प्रामाणिक जीवनी नहीं बल्कि मेरी तरफ से मेरे आदर्श व्यक्तित्व को एक निजी श्रद्धांजलि है।  

सन्दर्भ : विकिपीडिया और अन्य अंतरजाल स्रोत ।

शनिवार, 18 अगस्त 2012

नेताजी सुभाष चन्द्र बोस





नेताजी सुभाष चन्द्र बोस



श्री सुभाष चन्द्र जी के बारे में कौन नहीं जानता ?

जानकारी विकिपीडिया हिंदी से साभार।

भारत के स्वतंत्रता संग्राम के अग्रणी नेता, श्री सुभाषचन्द्र बोस "नेताजी" नाम से भी जाने जाते हैं | इनका जन्म 23 जनवरी 1897 को उड़ीसा के कटक शहर में मशहूर वकील जानकीनाथ बोस और उनकी पत्नी प्रभावती की नौवीं संतान और पाँचवें बेटे के रूप में हुआ था हुआ था । 18 अगस्त, 1945 को नेताजी लापता हो गए | कुछ लोग इसे इनकी मृत्यु की तिथि मानते हैं,किन्तु यह विवादित है | द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान, अंग्रेज़ों के खिलाफ लड़ने के लिये, जापान के सहयोग से नेताजी ने "आज़ाद हिन्द फौज" का गठन किया | उनके द्वारा दिया गया "जय हिन्द" का नारा, आज भारत का राष्ट्रीय नारा बन गया हैं।

१९४४ में अमेरिकी पत्रकार लुई फिशर से बात करते हुए, महात्मा गाँधी ने नेताजी को देशभक्तों का देशभक्त कहा था। नेताजी का योगदान और प्रभाव इतना तक कहा जाता हैं कि अगर 1947 में नेताजी भारत में उपस्थित रहते, तो शायद भारत का विभाजन न हुआ होता। 


कोलकाता के स्वतंत्रता सेनानी, देशबंधु चित्तरंजन दास के कार्य से प्रेरित होकर, सुभाष दासबाबू के साथ काम करना चाहते थे। इंग्लैंड से उन्होंने दासबाबू को खत लिखा, और उनके साथ काम करने की इच्छा प्रकट की। रवींद्रनाथ ठाकुर की सलाह के अनुसार,भारत वापस आने पर वे गाँधी जी से मिले, जिन्होंने उन्हें कोलकाता जाकर दासबाबू के साथ काम करने की सलाह दी। फिर सुभाषबाबू कोलकाता आए और दासबाबू से मिले।

तब  असहयोग आंदोलन चल रहा था, और दासबाबू इस का बंगाल में नेतृत्व कर रहे थे। सुभाषबाबू भी इस आंदोलन में सहभागी हो गए । 1922 में दासबाबू ने कांग्रेस के अंतर्गत स्वराज पार्टी की स्थापना की। विधानसभा के अंदर से अंग्रेज़ सरकार का विरोध करने के लिए, स्वराज पार्टी ने कोलकाता महापालिका का चुनाव लड़ा, और जीता भी । दासबाबू कोलकाता के महापौर बने , और सुभाषबाबू को महापालिका का प्रमुख कार्यकारी अधिकारी बने । सुभाषबाबू ने अपने कार्यकाल में कोलकाता महापालिका का पूरा ढाँचा और काम करने का तरीका ही बदल डाला। कोलकाता के रास्तों के अंग्रेज़ी नाम बदलकर, उन्हें भारतीय नाम दिए गए। स्वतंत्रता संग्राम में प्राण न्यौछावर करनेवालों के परिवार के सदस्यों को महापालिका में नौकरी मिलने लगी।

जल्द ही, सुभाषबाबू देश के एक महत्वपूर्ण युवा नेता बन गए। पंडित जवाहरलाल नेहरू के साथ सुभाषबाबू ने कांग्रेस के अंतर्गत युवकों की इंडिपेंडन्स लिग शुरू की।1928 में साइमन कमीशन के भारत आने पर जब कांग्रेस ने उसे काले झंडे दिखाए तब  कोलकाता में सुभाषबाबू ने इस आंदोलन का नेतृत्व किया था । साइमन कमीशन को जवाब देने के लिए, कांग्रेस ने भारत का भावी संविधान बनाने का काम आठ सदस्यीय आयोग को सौंपा था । पंडित मोतीलाल नेहरू इस आयोग के अध्यक्ष थे और सुभाषबाबू उसके एक सदस्य थे। इस आयोग ने नेहरू रिपोर्ट पेश की थी । 

1928 में कांग्रेस के वार्षिक अधिवेशन में सुभाषबाबू ने खाकी गणवेश धारण करके पंडित मोतीलाल नेहरू को सैन्य तरीके से सलामी दी। गाँधीजी तब पूर्ण स्वराज्य की मांग से सहमत नहीं थे। वे अंग्रेजों से डोमिनियन स्टेटस माँगना चाहते थे । सुभाषबाबू और पंडित जवाहरलाल नेहरू को पूर्ण स्वराज की मांग से पीछे हटना मंजूर नहीं था। यह तय हुआ कि अंग्रेज़ सरकार को डोमिनियन स्टेटस देने के लिए, एक साल का वक्त दिया जाए, और यदि एक साल में अंग्रेज़ सरकार यह मॉंग पूरी न करे, तो कांग्रेस पूर्ण स्वराज की मांग करेगी। ऐसा ही हुआ भी, मांग पूरी नहीं की गयी । 1930 में जब कांग्रेस का वार्षिक अधिवेशन पंडित जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में लाहौर में हुआ जहां तय किया गया कि 26 जनवरी का दिन स्वतंत्रता दिन के रूप में मनाया जाएगा।

26 जनवरी, 1931 के दिन कोलकाता में राष्ट्रध्वज फैलाकर एक विशाल मोर्चे का नेतृत्व करते हुए नेताजी पुलिस के लाठीचार्ज में घायल हुए, और गिरफ्तार हुए । सुभाषबाबू के जेल में रहते गाँधीजी ने अंग्रेज सरकार से समझौता किया । कुछ कैदियों को रिहा किया गया। लेकिन अंग्रेज सरकार ने सरदार भगत सिंह जैसे क्रांतिकारकों को रिहा नहीं दिया। भगत सिंह की फॉंसी माफ कराने के लिए, गाँधीजी ने सरकार से बात की। सुभाषबाबू चाहते थे कि इस विषय पर गाँधीजीअंग्रेज सरकार के साथ किया गया समझौता तोड दे। लेकिन गाँधीजी वचन तोडने को राजी नहीं थे। अंग्रेज सरकार अपने स्थान पर अडी रही और भगत सिंह और उनके साथियों को फॉंसी दी गयी। भगत सिंह को न बचा पाने पर, सुभाषबाबू गाँधीजी और कांग्रेस के तरिकों से बहुत नाराज हो गए थे ।

अपने सार्वजनिक जीवन में सुभाषबाबू को कुल ग्यारह बार कारावास हुआ। 1925 में गोपिनाथ साहा नामक एक क्रांतिकारी  को फॉंसी होने के बाद सुभाषबाबू बहुत रोये और शव का अंत्यसंस्कार किया। इससे अंग्रेज़ सरकार ने यह माना कि सुभाषबाबू ज्वलंत क्रांतिकारकों का स्फूर्तीस्थान हैं। अंग्रेज़ सरकार ने सुभाषबाबू को गिरफतार किया और बिना कोई मुकदमा चलाए, उन्हें अनिश्चित कालखंड के लिए म्यानमार के मंडाले कारागृह में बंदी बनाया। सुभाषबाबू ने  देशबंधू चित्तरंजन दास की मृत्यू की खबर मंडाले कारागृह में रेडियो पर सुनी। कारागृह में सुभाषबाबू को  तपेदिक हो गया। रिहा करने के लिए शर्त रखी गयी कि वे इलाज के लिए यूरोप चले जाए। लेकिन यह स्पष्ट नहीं किया गया कि इलाज के बाद वे भारत कब लौट सकते हैं। इसलिए सुभाषबाबू ने यह शर्त नहीं मानी । परिस्थिती इतनी कठिन हो गयी कि शायद वे कारावास में ही मर जायेंगे। अंग्रेज़ सरकार यह खतरा नहीं उठाना चाहती थी कि सुभाषबाबू की कारागृह में मौत हो जाए। इसलिए सरकार ने उन्हे रिहा किया। सुभाषबाबू इलाज के लिए डलहौजी चले गए।

यूरोप में सुभाषबाबू ने अपनी सेहत का ख्याल रखते हुए भी अपना कार्य जारी रखा। वे इटली के नेता मुसोलिनी से मिले, जिन्होंने भारत के स्वतंत्रता संग्राम में सहायता का वचन दिया। आयरलैंड के नेता डी वॅलेरा सुभाषबाबू के अच्छे दोस्त बन गए थे । सुभाषबाबू के यूरोप में रहते हुए पंडित जवाहरलाल नेहरू की पत्नी कमला नेहरू का ऑस्ट्रिया में निधन हो गया। सुभाषबाबू वहाँ जाकर पंडित जवाहरलाल नेहरू से मिले । बाद में सुभाषबाबू यूरोप में विठ्ठल भाई पटेल से भी मिले। विठ्ठल भाई पटेल के साथ सुभाषबाबू ने "पटेल-बोस" विश्लेषण प्रसिद्ध किया, जिस में उन दोनों ने गाँधीजी के नेतृत्व की बहुत गहरी निंदा की थी । बाद में विठ्ठल भाई पटेल का निधन हो गया।   विठ्ठल भाई पटेल ने अपनी वसीयत में अपनी करोडों की संपत्ती सुभाषबाबू के नाम कर दी। मगर उनके निधन के पश्चात, उनके भाई सरदार वल्लभ भाई पटेल ने इस वसीयत पर अदालत में मुकदमा चलाया। यह मुकदमा जीतकर, सरदार वल्लभ भाई पटेल ने वह संपत्ति गाँधीजी के हरिजन सेवा कार्य को भेट की ।

1934 में सुभाषबाबू को अपने पिता के मृत्युशय्या पर होने की खबर मिली, तब वे हवाई जहाज से कराची होकर कोलकाता लौटे। कराची में उन्हे पता चला की उनके पिता की मौत हो चुकी है । कोलकाता पहुँचते ही अंग्रेज सरकार ने उन्हे गिरफ्तार किया और कई दिन जेल में रखकर, वापस यूरोप भेज दिया।

1938 में कांग्रेस का ५१वा वार्षिक अधिवेशण हरिपुरा में तय हुआ था। इस अधिवेशण से पहले गाँधीजी ने कांग्रेस अध्यक्षपद के लिए सुभाषबाबू को चुना। अध्यक्ष सुभाषबाबू का स्वागत 51 बैलों ने खींचे हुए रथ में किया गया था । अपने अध्यक्षपद के कार्यकाल में सुभाषबाबू ने योजना आयोग की स्थापना की। पंडित जवाहरलाल नेहरू इस के अध्यक्ष थे। सुभाषबाबू ने सर विश्वेश्वरैय्या की अध्यक्षता में एक विज्ञान परिषद भी बनाई । 1937 में जापान ने चीन पर आक्रमण किया थातब सुभाषबाबू की अध्यक्षता में कांग्रेस ने, चीनी जनता की सहायता के लिए, डॉ द्वारकानाथ कोटणीस के नेतृत्व में वैद्यकीय पथक भेजने का निर्णय लिया था ।

युरोप में द्वितीय विश्वयुद्धके बादल छाए थे। सुभाषबाबू चाहते थे कि इंग्लैंड की इस कठिनाई का लाभ उठाकर, भारत का स्वतंत्रता संग्राम अधिक तीव्र किया जाए। उन्होने इस तरफ कदम उठाना भी शुरू कर दिया था। गाँधीजी इस विचारधारा से सहमत नहीं थे। 1939 में जब नया कांग्रेस अध्यक्ष चुनने का वक्त आया, तब सुभाषबाबू चाहते थे कि कोई ऐसा व्यक्ति अध्यक्ष बने , जो इस मामले में किसी दबाव के सामने न झुके। कोई दूसरा व्यक्ति सामने न आने पर, सुभाषबाबू ने खुद कांग्रेस अध्यक्ष बने रहना चाहा। लेकिन गाँधीजी अब उन्हे अध्यक्षपद से हटाना चाहते थे। गाँधीजी ने अध्यक्षपद के लिए प. सीतारमैय्या को चुना। रविंद्रनाथ ठाकूर, प्रफुल्लचंद्र राय और मेघनाद सहा जैसे वैज्ञानिक भी सुभाषबाबू को ही फिर से अध्यक्ष के रूप में देखना चाहतें थे। लेकिन गाँधीजी ने इस मामले में किसी की बात नहीं मानी। कोई समझौता न हो पाने पर, बहुत सालो के बाद, कांग्रेस अध्यक्षपद के लिए चुनाव हुए ।

सब समझते थे कि जब महात्मा गाँधी ने पट्टाभी सितारमैय्या का साथ दिया हैं, तब वे चुनाव आसानी से जीत जाएंगे। लेकिन गाँधीजी के विरोध के बावजूद सुभाषबाबू 203 मतों से यह चुनाव जीत गए। मगर चुनाव के साथ बात खत्म नहीं हुई। गाँधीजी ने इसे अपनी हार बताकर, अपने साथियों से कहा  कि अगर वें सुभाषबाबू से सहमत नहीं हैं, तो वें कांग्रेस से हट सकतें हैं। कांग्रेस कार्यकारिणी के 14 में से 12 सदस्यों ने इस्तीफा दे दिया। पंडित जवाहरलाल नेहरू तटस्थ रहें और अकेले शरदबाबू सुभाषबाबू के साथ रहे। परिस्थिती ऐसी बन गयी कि सुभाषबाबू कुछ काम ही न कर पाए। आखिर में तंग आकर, 29 अप्रैल, 1939 को सुभाषबाबू ने कांग्रेस अध्यक्षपद से इस्तीफा दे दिया। 3 मई, 1939 के दिन, सुभाषबाबू नें कांग्रेस के अंतर्गत फॉरवर्ड ब्लॉक के नाम से अपनी पार्टी की स्थापना की। कुछ दिन बाद, सुभाषबाबू को कांग्रेस से निकाल दिया गया। बाद में फॉरवर्ड ब्लॉक अपने आप एक स्वतंत्र पार्टी बन गयी।

द्वितीय विश्वयुद्ध शुरू होने से पहले, फॉरवर्ड ब्लॉक ने स्वतंत्रता संग्राम को तीव्र करने के लिए, जनजागृति शुरू की। अंग्रेज सरकार ने सुभाषबाबू सहितफॉरवर्ड ब्लॉक के सभी मुख्य नेताओ को कैद कर दिया। द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान सुभाषबाबू जेल में निष्क्रिय रहना नहीं चाहते थे। सरकार को उन्हे रिहा करने पर मजबूर करने के लिए सुभाषबाबू ने जेल में आमरण उपवास शुरू किया। सरकार ने उन्हे रिहा तो कर दिया, मगर उन्हे उनके ही घर में नजरकैद रखा। 16 जनवरी, 1941 को वे पुलिस को चकमा देकर, अपने घर से भाग निकले। शरदबाबू के बडे बेटे शिशिर, फॉरवर्ड ब्लॉक के एक सहकारी, मियां अकबर शाह, कीर्ती किसान पार्टी के भगतराम तलवार की मदद से सुभाषबाबू काबुल की ओर निकल पडे। पहाडियों में पैदल चलते हुए उन्होने यह सफर पूरा किया। काबुल उन्होने रूसी , जर्मन और इटालियन दूतावासों में प्रवेश पाने की कोशिश की। इटालियन दूतावास में उनकी कोशिश सफल रही। जर्मन और इटालियन दूतावासों ने उनकी सहायता की। आखिर में ओर्लांदो मात्सुता नामक इटालियन व्यक्ति बनकर, सुभाषबाबू काबुल से रेल्वे से निकलकर रूस की राजधानी मॉस्को होकर जर्मनी की राजधानी बर्लिन पहुँचे।

बर्लिन में सुभाषबाबू रिबेनट्रोप जैसे जर्मनी के अन्य नेताओ से मिले। उन्होने जर्मनी में भारतीय स्वतंत्रता संगठन और आजाद हिंद रेडिओ की स्थापना की। इसी दौरान वे नेताजी नाम से जाने जाने लगे। जर्मन सरकार के एक मंत्री एडॅम फॉन ट्रॉट सुभाषबाबू के अच्छे दोस्त बन गए। 29 मई, 1942 के दिन, सुभाषबाबू जर्मनी के सर्वोच्च नेता एडॉल्फ हिटलर से मिले। लेकिन हिटलर को भारत के विषय में विशेष रूची नहीं थी। उन्होने सुभाषबाबू को सहायता का कोई स्पष्ट वचन नहीं दिया। कई साल पहले हिटलर ने माईन काम्फ नामक अपना आत्मचरित्र लिखा था, जिस में उन्होने भारत और भारतीय लोगों की बुराई की थी। इस विषय पर सुभाषबाबू ने हिटलर से बात की जिसके फलस्वरूप हिटलर ने "माईन काम्फ" की अगली आवृत्ती से वह परिच्छेद निकालने का वचन दिया।

सुभाषबाबू को पता चल गया कि हिटलर और जर्मनी से उन्हे कुछ और नहीं मिलनेवाला । इसलिए 8 मार्च, 1943 को वे अपने साथी अबिद हसन सफरानी के साथ एक जर्मन पनडुब्बी में बैठकर, मादागास्कर के किनारे तक आये । वहां से वे दोनो खूँखार समुद्र में से तैरकर जापानी  पनडुब्बी  तक पहुँच गए। द्वितीय विश्वयुद्ध के काल में, किसी भी दो देशों की नौसेनाओ की  पनडुब्बी  के दौरान, नागरिको की यह एकमात्र बदली हुई थी। यह जापानी पनदुब्बी उन्हे इंडोनेशिया के पादांग तक लाई।

पूर्व एशिया पहुँचकर सुभाषबाबू ने सर्वप्रथम, वयोवृद्ध क्रांतिकारी रासबिहारी बोस से भारतीय स्वतंत्रता परिषद का नेतृत्व सँभाला। सिंगापुर के फरेर पार्क में रासबिहारी बोस नेभारतीय स्वतंत्रता परिषद का नेतृत्व सुभाषबाबू को सौंपा ।

जापान के प्रधानमंत्री जनरल हिदेकी तोजो ने, नेताजी के व्यक्तित्व से प्रभावित होकर, उन्हे सहकार्य करने का आश्वासन दिया।  नेताजी ने जापान की संसदडायट के सामने भाषण किया। 21 अक्तूबर, 1943 के दिन, नेताजी ने सिंगापुर में "अर्जी-हुकुमत-ए-आजाद-हिंद" (स्वाधीन भारत की अंतरिम सरकार) की स्थापना की। वे खुद इस सरकार के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और युद्धमंत्री बने। इस सरकार को कुल नौ देशों ने मान्यता दी। नेताजी आज़ाद हिन्द फौज के प्रधान सेनापति भी बन गए। फ़ौज में औरतो के लिए झाँसी की रानी रेजिमेंट भी बनायी गयी। पूर्व एशिया में नेताजी ने अनेक भाषण करके वहाँ स्थायिक भारतीय लोगों से आज़ाद हिन्द फौज में भरती होने का और उसे आर्थिक मदद करने का आवाहन किया। उन्होने अपने आवाहन में संदेश दिया "तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हे आजादी दूँगा।"

द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान आज़ाद हिन्द फौज ने जापानी सेना के सहयोग से भारत पर आक्रमण किया। अपनी फौज को प्रेरित करने के लिए नेताजी ने "चलो दिल्ली" का नारा दिया। फौजो ने अंग्रेजों से अंदमान और निकोबार द्वीप जीत लिए। यह द्वीप अर्जी-हुकुमत-ए-आजाद-हिंद के अनुशासन में रहें। नेताजी ने इन द्वीपों का "शहीद" और "स्वराज" द्वीप नामकरण किया। फौजो ने इंफाल और कोहिमा पर आक्रमण किया। लेकिन बाद में अंग्रेजों का पलडा भारी पडा और दोनो फौजो को पीछे हटना पडा। जब आज़ाद हिन्द फौज पीछे हट रही थी, तब जापानी सेना ने नेताजी के भाग जाने की व्यवस्था की। लेकिन नेताजी ने झाँसी की रानी रेजिमेंट की लडकियों के साथ सैकडो मील चल कर जाना पसंद किया। इस प्रकार नेताजी ने सच्चे नेतृत्व का एक आदर्श बनाया ।

6 जुलाई, 1944 को आजाद हिंद रेडिओ पर अपने भाषण के माध्यम से गाँधीजी से बात करते हुए, नेताजी ने जापान से सहायता लेने का अपना अर्जी-हुकुमत-ए-आजाद-हिंद तथा आज़ाद हिन्द फौज की स्थापना का उद्येश्य बताया। इस भाषण के दौरान, नेताजी ने गाँधीजी को राष्ट्रपिता बुलाकर अपनी जंग के लिए उनका आशिर्वाद माँगा । इस प्रकार, नेताजी ने गाँधीजी को सर्वप्रथम राष्ट्रपिता बुलाया। 

द्वितीय विश्वयुद्ध में जापान की हार के बाद, नेताजी ने रूस से सहायता माँगने का निश्चय किया । 18 अगस्त, 1945 को नेताजी हवाई जहाज से मांचुरिया की तरफ जा रहे थे। इस सफर के दौरान वे लापता हो गए। इस दिन के बाद वे कभी किसी को दिखाई नहीं दिये। 23 अगस्त, 1945 को जापान की दोमेई खबर संस्था ने दुनिया को खबर दी, कि 18 अगस्त के दिन, नेताजी का हवाई जहाज ताइवान की भूमि पर दुर्घटनाग्रस्त हो गया था और उस दुर्घटना में बुरी तरह से घायल होकर नेताजी ने अस्पताल में अंतिम साँस ले ली थी। नेताजी की अस्थियाँ जापान की राजधानी तोकियो में रेनकोजी नामक बौद्ध मंदिर में रखी गयी।


स्वतंत्रता के पश्चात, भारत सरकार ने इस घटना की जाँच करने के लिए, 1956 और 1977 में दो बार एक आयोग को नियुक्त किये । दोनो बार यही नतीजा निकला, कि नेताजी उस विमान दुर्घटना में ही मारे गये थे। लेकिन, इन दोनो आयोगो ने ताइवान देश की सरकार से तो बात ही नहीं की। 1999 में मनोज कुमार मुखर्जी के नेतृत्व में तीसरा आयोग बनाया गया। 2005 में ताइवान सरकार ने मुखर्जी आयोग को बता दिया कि 1945 में ताइवान की भूमि पर कोई हवाई जहाज दुर्घटनाग्रस्त हुआ ही नहीं था। 2005 में मुखर्जी आयोग ने भारत सरकार को अपनी रिपोर्ट पेश की, जिस में उन्होने कहा, कि नेताजी की मृत्यु उस विमान दुर्घटना में होने का कोई सबूत नहीं हैं। लेकिन भारत सरकार ने मुखर्जी आयोग की रिपोर्ट को अस्वीकार कर दिया। देश के अलग-अलग हिस्सों में आज भी नेताजी को देखने और मिलने का दावा करने वाले लोगों की कमी नहीं है। कई जगहों पर नेताजी के होने को लेकर कई दावे हुये हैं लेकिन इनमें से सभी की प्रामाणिकता संदिग्ध है। 

18 अगस्त, 1945 के दिन नेताजी कहाँ लापता हो गए और उनका आगे क्या हुआ, यह भारत के इतिहास का सबसे बडा अनुत्तरित रहस्य बन गया हैं।

आज 18 अगस्त के दिन सुभाष बाबु को शत सहस्र नमन , वंदन ।


इस लेख में लिखी जानकारी इन्टरनेट से ली गयी है।  जहां तक मेरी जानकारी है, ये जानकारियाँ सही हैं .लेकिन यह एक प्रामाणिक जीवनी नहीं बल्कि मेरी तरफ से मेरे आदर्श व्यक्तित्व को एक निजी श्रद्धांजलि है।  सन्दर्भ : विकिपीडिया और अन्य अंतरजाल स्रोत ।

मंगलवार, 31 जुलाई 2012

अमर शहीद : शहीद ऊधम सिंह जी


शहीद ऊधम सिंह जी भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के महान सेनानियों में से एक हैं । जलियाँ वाला बाग़ में गोलियां दागने का जो आदेश Brigadier General Reginald Dyer ने दिया था, उस आदेश को ऊपर से approve करने वाले Michael O'Dwyer, का वध करने के बाद इन्हें 31 जुलाई 1940 को फांसी दे दी गयी थी ।

इनका जन्म 26 दिसंबर 1899 को हुआ था । इनका नाम शेर सिंह रखा गया था । माता और पिता दोनों ही के देहावसान के बाद शेर सिंह, और इनके बड़े भाई मुक्त सिंह जी अमृतसर की केंद्रीय खालसा अनाथालय में दाखिल हुए और वहीँ पले बढे । वहां इनके नए नाम रखे गए । शेर सिंह उधम सिंह हो गए, और मुक्त सिंह साधू सिंह बन गए । 1917 में साधू सिंह जी भी गुज़र गए, और उधम सिंह जी अपनी पढ़ाई मेट्रिक तक पूरी कर के 1919 में अनाथालय से बाहर आये ।

13 अप्रैल 1919 को जलियांवाला बाग़ का भयंकर हादसा तो हम सब को याद है ही ।

इस दिन अपने नेताओं को रोव्लेट एक्ट के विषय में सुनने के लिए हज़ारों की संख्या में लोग ( बच्चे बूढ़े, महिलाएं और जवान ) शांतिपूर्ण सभा के लिए जलियांवाला बाग़ में एकत्रित हुए थे । उधम सिंह और अनाथालय के उनके अन्य मित्र यहाँ पीने का पानी बाँट रहे थे ।  

कुछ ही देर बाद सिपाही राइफले, खुखरी आदि से लैस यहाँ आये । साथ ही सेना की गाड़ियाँ भी थीं जो मशीन गनों से लैस थीं । बाग़ का प्रवेश द्वार छोटा था, सो गाड़ियाँ बाहर ही रुकी रही थीं । ब्रिगेडियर जनरल  Reginald Dyer  कमांड में था । शाम 5:15 पर सेना की टुकड़ी ने प्रवेश कर लिया था । एकत्रित भीड़ को हटने की कोई चेतावनी नहीं दी गयी । जनरल डायर ने अपने सैनिकों को गोली चलाने का हुक्म दिया, और दस मिनट तक निहत्थे लोगों पर गोलियों की बारिश होती रही । प्रवेश द्वार पर तो सैनिक थे, तो कोई बाहर नहीं भाग सकता था  । कुछ लोगों ने दीवार कूद कर भागने का प्रयास किया, तो कुछ जान बचाने के लिए कुँए में कूद गए - जिनके ऊपर और लोग भी कूदे - तो बचने की संभावनाएं तो हम समझ ही सकते हैं की क्या रही होंगी । वहां स्मृति पटल पर लिखा है कि  120 लाशें तो सिर्फ कुँए में से ही निकाली गयी थीं । 

यह जानना जरूरी है की बाग़ में तो कमांड ब्रिगेडियर जनरल Reginald  Dyer  के पास थी, किन्तु ऊपर से उन्हें उनकी इस कार्यवाही के लिए अनुमोदित किया था Michael O'Dwyer ने, जिनका वध बाद में ऊधम सिंह जी ने किया था । उन्होंने इस बारे में पूछी जाने पर की उन्होंने ऐसा क्यों किया, यह उत्तर दिया था : "to teach the Indians a lesson, to make a wide impression and to strike terror throughout Punjab"

इस घटना ने उधम सिंह जी के जीवन को पूरी तरह बदल दिया । उन्होंने अंग्रेजों से, और खास तौर पर Michael O'Dwyer से बदला लेने की कसम उठाई । वे राजनीति में उतारे, और क्रांतिकारी बन गए  । उन्होंने अपना नाम भी बदल कर राम मोहम्मद सिंह आज़ाद रखा - यह दर्शाने के लिए की वे तीनों धर्मों से अलग, तीनों धर्मों के फोलोएर हैं , लेकिन पहले आज़ादी के सेनानी हैं । अपने जीवन में उन्होंने और भी कई नाम इस्तेमाल किये,  जिनमे से कुछ नाम हैं - शेर सिंह, उधम सिंह, उधान सिंह, उदे सिंह, उदय सिंह, फ्रैंक ब्राज़ील। 

वे एक साधारण दिखने वाला जीवन जीते हुए छिपे तौर पर आज़ादी की लड़ाई में शामिल रहे । 30 August 1927 को इन्हें आर्म्स एक्ट के तहत गिरफ्तार किया गया । इनके पास से पुलिस ने हथियार, और ग़दर पार्टी के प्रतिबंधित अखबार "ग़दर इ गूँज" की प्रतियाँ बरामद कीं, और इन्हें 5 साल की कठोर कारावास की सजा हुई । 23 मार्च 1931 को जब भगत सिंह, राजगुरु, और सुखदेव को फांसी पर चढ़ाया गया, तब भी उधम सिंह जेल में ही थे । इन्हें जेल से 23 ओक्टोबर 1931 को रिहा किया गया । किन्तु अपने गाँव में भी इन्हें पुलिस द्वारा लगातार परेशान किया जाता रहा । इन्होने वहां पेंटर का काम भी किया । 3 साल तक ये पंजाब में अपने साधारण जीवन के साथ गुप्त रूप से क्रान्ति के भाग भी बने रहे, और लन्दन जा कर माइकल डॉवर के वध की योजना भी बनाते रहे । 1933 में ये अपने गाँव गए, और वहां से गुप्त रूप से कश्मीर चले गए । पुलिस की आँखों में धूल झोंक कर ये कश्मीर से जर्मनी चले गए । 1934 में ये लन्दन पहुंचे , और कमर्शियल रोड के पास रहने लगे ।

इन्होने अपनी कार, रिवोल्वर और बारूद आदि खरीद तो लिए, परन्तु वे अपने शत्रु का वध ऐसे समय पर करना चाहते थे जिससे यह ज्यादा से ज्यादा दुनिया की नज़र में आये, जिससे स्वाधीनता संग्राम की खबर अधिक फैले । 

13 मार्च 1940 को ईस्ट इंडिया असोसिएशन और सेन्ट्रल एशियन सोसाइटी की बैठक  10 Caxton Hall में आयोजित थी । वहां  Michael O'Dwyer. भी बैठक को संबोधित करने वाले थे । उधम सिंह ने एक किताब को काट कर रिवोल्वर छिपाने के लिए तैयार किया, और इसमें अपने भरी हुई रिवोल्वर छिपा कर वहां आये । बैठक के बाद जब सभा उठने लगी, तो माइकल  डॉवर, Zetland से बात करने मंच की और बढे, तब उधम सिंह जी ने अपने रिवोल्वर निकल कर उन पर गोलियां चला दीं । दो गोलियां निशाने पर लगीं, और वहीँ स्पोट दात हुई  । उधम सिंह जी Zetland पर भी गोलियां चलाएँ, अपर उन्हें सिर्फ मामूली चोट ही आई । Luis Dane को एक ही गोली लगी, परन्तु गंभीर चोट आने से वे भूमि पर गिर पड़े ।  Lord Lamington का दांया हाथ जख्मी हुआ । उधम सिंह जी का वहां से भागने का कोई इरादा नहीं था । उन्होंने अपनी गिरफ़्तारी दी, और बाद में बताया की यह उन्होंने सोच समझ कर जलियांवाला बाग़ में हुए हत्याकांड और भारत माता के अपमान का बदला लेने केलिए किया है । उनकी रिवोल्वर, चाकू, डाइरी और एक गोली अब भी स्कोट लैंड यार्ड के म्युज़िअम  में हैं । उन्होंने इस बात पर खेद जताया की वे सिर्फ एक ही शत्रु  का वध पाए क्योंकि उनके निशाने पर अन्य दो भी थे ।

भारत में उनके इस कार्य की मिली जुली प्रतिक्रिया रही । कोंग्रेस संचालित प्रेस ने उनके कार्य की भर्त्सना की ।  गांधी जी और नेहरु जी ने भी उस वक्त  इस हिंसा भर्त्सना की , लेकिन स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद प्रधानमन्त्री नेहरु ने उधम सिंह जी को राष्ट्रभक्त कह कर उन्हें प्रणाम भी किया । सुभाष चन्द्र बोस जी ने उस समय खुले दिल से उधम सिंह जी के कार्य का समर्थन किया । स्वतंत्र अखबारों ने उनके कार्य का समर्थन किया, और उन्हें नाज़ी कहे जाने का विरोध करते हुए लिखा की शायद आगे इतिहासकार जानेंगे की भारत में ब्रिटिश राज को ख़त्म करने वाले नाज़ी नहीं, बल्कि खुद अंग्रेजों की बरती क्रूरताएं थीं । कानपुर की एक आमसभा में एक वक्ता ने कहा की आखिर अब जलियांवाला बाग़ का दर्द कम हो सका है । भारत में मिली जुली प्रतिक्रिया रही, किन्तु यूरोप की प्रेस में अधिकतर छिपे शब्दों में उनका समर्थन ही किया गया । यूरोप के पत्रकारों को जलियांवाला बाग़ की भयानक घटना भूली नहीं थी, और यह इन रिपोर्टों में झलकता दिखा । कुछ प्रेस में छपी लाइनें :
** Times of London : "The Freedom Fighter" ...  and his action as "an expression of the pent-up fury of the downtrodden Indian People" 
**  Bergeret,  Rome : Courageous 
**  Berliner Borsen Zeitung  "The torch of the Indian freedom", 
** German radio : "The cry of tormented people spoke with shots". 
    and 
    "Like the elephants, the Indians never forgive their enemies. They strike them down even after 20 years".

तब ब्रिटेन खुद ही यूरोप में अपने अस्तित्व के लिए लड़ रहा था, और उधम सिंह जी के लिए पनपे समर्थन से उनकी भारत से आने वाली आपूर्ति पर इस मानसिकता का बहुत असर पडा । इस अँगरेज़ विरोधी भावना ने Quit India Movement की शुरुआत करने का माहौल मजबूत बनाया और 1942 में यह movement चली जिसके फल स्वरुप आखिर 1947 में हम आज़ाद हुए । 

1 अप्रैल 1940 को इन पर मुकदमा शुरू हुआ । कोर्ट में मुक़दमे के दौरान उन्होंने अपना नाम ""Ram Mohammad Singh Azad" बताया ।  31 जुलाई 1940 को इन्हें Pentonville Prison में फांसी दे दी गयी । इन्हें दूसरे  कैदियों की ही तरह वहीँ जेल में दफना दिया गया । जुलाई 1974 में सुल्तानपुर लोधी के  MLA साधू सिंह जी ने तत्कालीन प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी से कहा की वे तत्कालीन ब्रिटिश सरकार से उधम सिंह जी के पार्थिव शरीर के अवशेष भारत मंगवाएं । साधू सिंह जी खुद ब्रिटेन जा कर इन्हें लेकर आये, और इन्हें एक शहीद का सम्मान दिया गया । इनके लौटने के समय हवाई अड्डे पर शंकर दयाल शर्मा जी और जेल सिंह जी मौजूद थे । बाद में इनके जन्म स्थान - सुनाम पंजाब में इनका पूरे सम्मान के साथ अंतिम संस्कार किया गया और इनकी अस्थियों का विसर्जन गंगा जी में हुआ । 

वीर स्वतंत्रता सेनानी को नमन । 


इस लेख में लिखी जानकारी इन्टरनेट से ली गयी है।  जहां तक मेरी जानकारी है, ये जानकारियाँ सही हैं .लेकिन यह एक प्रामाणिक जीवनी नहीं बल्कि मेरी तरफ से मेरे आदर्श व्यक्तित्व को एक निजी श्रद्धांजलि है।  सन्दर्भ : विकिपीडिया और अन्य अंतरजाल स्रोत ।