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बुधवार, 17 अक्टूबर 2012

नवरात्र व्रत कथा : देवी कथाएँ 1


यह कहानी मेरी नहीं है ।

यह नवरात्र व्रत कथा व्रत करने वाले लोग आपस में एक दूसरे से कहते हैं । कहते हैं कि यह कथा बृहस्पति जी के पूछने पर ब्रह्मा जी ने उन्हें सुनाई थी

पीठत नाम के गाँव में अनाथ नामक एक ब्राह्मण रहता था । अवह भगवती दुर्गा का भक्त था और रोज़ उनकी पूजा मिया करता था । उस ब्राह्मण की सुमति नामक एक बेटी थी , जो रोज़ पिता की पूजा में शामिल होती थी।

एक दिन अपनी सहेलियों से खेलने लगी और समय का भान न होने से पूजा में नहीं आई । इस बात पर पिता अत्यधिक क्रुद्ध हुए, और उसे कहा, की हे दुष्ट पुत्री, तूने आज भगवती का पूजन नहीं किया, जिसके लिए मैं किसी कुष्ठी दरिद्र से तेरा ब्याह करूंगा ।

सुमति को बहुत दुःख हुआ, और उसने कहा, हे पिताजी, आपकी कन्या होने से मैं सब तरह से आपके अधीन हूँ । आप जिससे चाहें मेरा ब्याह कर सकते हैं, किन्तु होगा वही जो मेरे भाग्य में लिखा होगा । यह सुन कर पिता का क्रोध और बढ़ गया , जैसे आग में सूखे तिनके पड रहे हों  हो । उसने बेटी का ब्याह एक दरिद्र कुष्ठ रोगी से कर दिया ( यह कथा में है ) ।

वह रात उन दोनों ने जंगल में बड़े दुःख तकलीफ से गुजारी । उसकी ऐसी दशा देख भगवती पूर्व कर्म प्रताप से प्रकट हुईं , और उस से कहा, कि हे दीन ब्राह्मणी, मैं तुझ पर प्रसन्न हूँ, जो माँगना हो मांग ले । सुमति के पूछने पर देवी ने बताया की मैं ही आदि शक्ति माँ हूँ, ब्रह्मा, विद्या और सरस्वती हूँ । तुझ पर मैं पूर्व जन्म के पुण्य से प्रसन्न हूँ ।

पिछले जन्म में तू निषाद की स्त्री थी, और अति पतिव्रता थी । एक दिन तेरे पति निषाद ने चोरी की , और सिपाहियों ने तुम दोनों को जेलखाने में बंद कर दिया । वहां उन्होंने तुम दोनों को खाने को भी न दिया । तब नवरात्र  के दिन थे , और तुम दोनों का नौ दिन का व्रत हो गया। उस व्रत के प्रभाव से मैं तुम्हे मनोवांछित वास्तु दे रही हूँ, मांगो । तब सुमति ने अपने पति को स्वस्थ्य करने की कामना की । देवी ने उसे एक दिन के व्रत के प्रभाव को अर्पित करने को कहा, और सुमति ने "ठीक है" कहा । तुरंत ही उसका पति निरोगी हो गया और उन दोनों ने देवी की अत्यधिक स्तुति की । इसके पश्चात "उदालय"नामक पुत्र शीघ्र प्राप्त होने का आशीष देकर और व्रत विधि बता कर देवी अंतर्ध्यान हो गयीं । 

गुरुवार, 27 सितंबर 2012

शहीदे आज़म भगत सिंह जी

शहीदे आज़म श्री भगत सिंह जी
shaheed martyr shri bhagat singh ji


आज शहीदे आज़म भगत सिंह जी का जन्म दिन है । इनका जन्म 27 सितम्बर 1907 को नवांशहर पंजाब में हुआ था ।

भगत सिंह भारत के एक स्वतंत्रता संग्राम के एक प्रमुख और मुखर सेनानी थे। उनका साहस आज के भारतीय युवकों के लिए एक बहुत बड़ा आदर्श है। इन्होंने केन्द्रीय संसद (सेण्ट्रल असेम्बली) में बम फेंककर भी भागने से मना कर दिया, और अपनी गिरफ़्तारी दी । जिसके फलस्वरूप इन्हें २३ मार्च, १९३१ को (आयु 23 बरस 5 महीने ) इनके दो अन्य साथियों, राजगुरु तथा सुखदेव के साथ फाँसी पर लटका दिया गया। हमारा भारत देश उनके बलिदान को आज भी बड़ी गम्भीरता से याद करता है । उनके जीवन और चरित्र पर कई हिन्दी फिल्में बनी हैं । कुछ फ़िल्में तो उनके नाम से बनाई गयीं हैं । मनोज कुमार की सन् १९६५ में बनी फिल्म शहीद भगत सिंह के जीवन पर बनायीं गयी फिल्म काफी प्रामाणिक फिल्म मानी जाती है।

भगत सिंह का जन्म 27 सितंबर, 1907, शनिवार सुबह ९ बजे लायलपुर ज़िले के बंगा गाँव (चक नम्बर १०५ जो अब पाकिस्तान में है) में हुआ था। ( कहीं कहीं इनकी जन्म तिथि 28 सितम्बर भी बताई गयी है ) उनका पैतृक निवास आज भी भारतीय पंजाब के नवाँशहर ज़िले के खटकड़कलाँ गाँव में स्थित है। उनके पिता का नाम सरदार किशन सिंह और माता का नाम विद्यावती कौर था , यह एक सिख परिवार था जिसने आर्य समाज को अपना लिया था।

लाहौर के नेशनल कॉलेज़ की पढ़ाई छोड़कर भगत सिंह ने भारत की आज़ादी के लिये नौजवान भारत सभा की स्थापना की । काकोरी काण्ड में राम प्रसाद 'बिस्मिल' सहित ४ क्रान्तिकारियों को फाँसी व १६ अन्य को कारावास की सजाओं से भगत सिंह उद्विग्न हुए , और उन्होंने १९२८ में अपनी पार्टी "नौजवान भारत सभा" का श्री चंद्रशेखर आज़ाद जी के "हिन्दुस्तान रिपब्लिकन ऐसोसिएशन" में विलय कर दिया और उसे एक नया नाम दिया "हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन"। इस संगठन का उद्देश्य सेवा,त्याग और पीड़ा झेल सकने वाले नवयुवक तैयार करना था। पहले लाहौर में साण्डर्स-वध और उसके बाद दिल्ली की केन्द्रीय असेम्बली में चन्द्रशेखर आजाद व पार्टी के अन्य सदस्यों के साथ बम-विस्फोट करके ब्रिटिश साम्राज्य के विरुद्ध खुले विद्रोह को बुलन्दी प्रदान की।

भगत सिंह ने राजगुरु के साथ मिलकर १७ दिसम्बर १९२८ को लाहौर में सहायक पुलिस अधीक्षक रहे अंग्रेज़ अधिकारी जे० पी० सांडर्स को मारा था। इस कार्रवाई में क्रान्तिकारी चन्द्रशेखर आज़ाद ने उनकी पूरी सहायता की थी। क्रान्तिकारी साथी बटुकेश्वर दत्त के साथ मिलकर भगत सिंह ने अलीपुर रोड दिल्ली स्थित ब्रिटिश भारत की तत्कालीन सेण्ट्रल एसेम्बली के सभागार में ८ अप्रैल १९२९ को अंग्रेज़ सरकार को जगाने के लिये बम और पर्चे फेंके थे। बम फेंकने के बाद वहीं पर दोनों ने अपनी गिरफ्तारी भी दी।

भगत सिंह करीब १२ वर्ष के थे जब जलियाँवाला बाग हत्याकाण्ड हुआ था। इसकी सूचना मिलते ही भगत सिंह अपने स्कूल से १२ मील पैदल चलकर जलियाँवाला बाग पहुँच गये। इस उम्र में भगत सिंह अपने चाचाओं की क्रान्तिकारी किताबें पढ़ कर सोचते थे कि इनका रास्ता सही है कि नहीं ? गांधी जी का असहयोग आन्दोलन छिड़ने के बाद वे गान्धी जी के अहिंसात्मक तरीकों और क्रान्तिकारियों के हिंसक आन्दोलन में से अपने लिये रास्ता चुनने लगे। गान्धी जी के असहयोग आन्दोलन को रद्द कर देने के कारण देश के तमाम नवयुवकों की भाँति उनमें भी रोष हुआ और अन्ततः उन्होंने देश की स्वतन्त्रता के लिये क्रान्ति का मार्ग अपनाना अनुचित नहीं समझा। उन्होंने जुलूसों में भाग लेना प्रारम्भ किया तथा कई क्रान्तिकारी दलों के सदस्य बने। बाद में वे अपने दल के प्रमुख क्रान्तिकारियों के प्रतिनिधि भी बने। दल के प्रमुख क्रान्तिकारियों में चन्द्रशेखर आजाद, भगवतीचरण व्होरा, सुखदेव, राजगुरु, इत्यादि थे।

१९२८ में साइमन कमीशन के बहिष्कार के लिये भयानक प्रदर्शन हुए। इन प्रदर्शनों मे भाग लेने वालों पर अंग्रेजी शासन ने लाठी चार्ज भी किया। इसी लाठी चार्ज से आहत होकर लाला लाजपत राय की मृत्यु हो गयी। अब इनसे रहा न गया। एक गुप्त योजना के तहत इन्होंने पुलिस सुपरिण्टेण्डेण्ट स्काट को मारने की योजना सोची। सोची गयी योजना के अनुसार भगत सिंह और राजगुरु लाहौर कोतवाली के सामने व्यस्त मुद्रा में टहलने लगे। उधर बटुकेश्वर दत्तअपनी साइकिल को लेकर ऐसे बैठ गये जैसे कि वो ख़राब हो गयी हो । दत्त के इशारे पर दोनों सचेत हो गये। उधर चन्द्रशेखर आज़ाद पास के डी० ए० वी० स्कूल की चहारदीवारी के पास छिपकर घटना को अंजाम देने में रक्षक का काम कर रहे थे। १७ दिस्मबर १९२८ को करीब सवा चार बजे, स्काट की जगह, ए० एस० पी० सॉण्डर्स के आते ही राजगुरु ने एक गोली सीधी उसके सर में मारी जिसके तुरन्त बाद वह होश खो बैठा। इसके बाद भगत सिंह ने ३-४ गोली दाग कर उसके मरने का पूरा इन्तज़ाम कर दिया। ये दोनों जैसे ही भाग रहे थे कि एक सिपाही चनन सिंह ने इनका पीछा करना शुरू कर दिया। चन्द्रशेखर आज़ाद ने उसे सावधान किया - "आगे बढ़े तो गोली मार दूँगा।" नहीं मानने पर आज़ाद ने उसे गोली मार दी। इस तरह इन लोगों ने लाला लाजपत राय की मौत का बदला ले लिया ।

भगत सिंह यद्यपि रक्तपात के पक्षधर नहीं थे परन्तु वे कार्ल मार्क्स के सिद्धान्तों से प्रभावित थे। वे समाजवाद के पोषक भी थे। इसी कारण से उन्हें पूँजीपतियों की मजदूरों के प्रति शोषण की नीति पसन्द नहीं आती थी। लेकिन याद रखने की बात है कि "समाजवाद" और "साम्यवाद" अलग अलग धाराएं हैं, COMMUNISM एंड SOCIALISM ARE DIFFERENT - भगतसिंह जी ने कभी कम्युनिस्ट पार्टी को ज्वाइन नहीं किया | उनकी अपनी बनाई पार्टी का नाम भी "हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन" है,कम्युनिस्ट नहीं है ।  (The word socialist also appears in the preamble of our constitution) उस समय चूँकि अँग्रेज ही सर्वेसर्वा थे तथा बहुत कम भारतीय उद्योगपति उन्नति कर पाये थे, अतः अँग्रेजों के मजदूरों के प्रति अत्याचार से उनका विरोध स्वाभाविक था। मजदूर विरोधी ऐसी नीतियों को ब्रिटिश संसद में पारित न होने देना उनके दल का निर्णय था। सभी चाहते थे कि अँग्रेजों को पता चलना चाहिये कि हिन्दुस्तानी जाग चुके हैं और उनके हृदय में ऐसी नीतियों के प्रति आक्रोश है। ऐसा करने के लिये ही उन्होंने दिल्ली की केन्द्रीय एसेम्बली में बम फेंकने की योजना बनायी थी।

भगत सिंह चाहते थे कि इसमें कोई खून खराबा न हो और अँग्रेजों तक उनकी 'आवाज़' भी पहुँचे। हालाँकि प्रारम्भ में उनके दल के सब लोग ऐसा नहीं सोचते थे पर अन्त में सर्वसम्मति से भगत सिंह तथा बटुकेश्वर दत्त का नाम चुना गया। निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार ८ अप्रैल, १९२९ को केन्द्रीय असेम्बली में इन दोनों ने एक ऐसे स्थान पर बम फेंका जहाँ कोई मौजूद न था, अन्यथा उसे चोट लग सकती थी। पूरा हाल धुएँ से भर गया। भगत सिंह चाहते तो भाग भी सकते थे पर उन्होंने पहले ही सोच रखा था कि उन्हें दण्ड स्वीकार है चाहें वह फाँसी ही क्यों न हो; अतः उन्होंने भागने से मना कर दिया। उस समय वे दोनों खाकी कमीज़ तथा निकर पहने हुए थे। बम फटने के बाद उन्होंने "इंकलाब! - जिन्दाबाद!! साम्राज्यवाद! - मुर्दाबाद!!" का नारा लगाया और अपने साथ लाये हुए पर्चे हवा में उछाल दिये। इसके कुछ ही देर बाद पुलिस आ गयी और दोनों को ग़िरफ़्तार कर लिया गया।

जेल में भगत सिंह ने करीब २ साल रहे। इस दौरान वे लेख लिखकर अपने क्रान्तिकारी विचार व्यक्त करते रहे। जेल में रहते हुए उनका अध्ययन बराबर जारी रहा। उनके उस दौरान लिखे गये लेख व सगे सम्बन्धियों को लिखे गये पत्र आज भी उनके विचारों के दर्पण हैं। अपने लेखों में उन्होंने कई तरह से पूँजीपतियों को अपना शत्रु बताया है। उन्होंने लिखा कि मजदूरों का शोषण करने वाला चाहें एक भारतीय ही क्यों न हो, वह उनका शत्रु है। जेल में भगत सिंह व उनके साथियों ने ६४ दिनों तक भूख हडताल की। उनके एक साथी यतीन्द्रनाथ दास ने तो भूख हड़ताल में अपने प्राण ही त्याग दिये थे।

२३ मार्च १९३१ को शाम में करीब ७ बजकर ३३ मिनट पर भगत सिंह तथा इनके दो साथियों सुखदेव व राजगुरु को फाँसी दे दी गई । फाँसी पर जाने से पहले वे लेनिन की नहीं बल्कि राम प्रसाद 'बिस्मिल' की जीवनी पढ़ रहे थे । कहा जाता है कि जेल के अधिकारियों ने जब उन्हें यह सूचना दी कि उनके फाँसी का वक्त आ गया है तो उन्होंने कहा था- "ठहरिये! पहले एक क्रान्तिकारी दूसरे से मिल तो ले।" फिर एक मिनट बाद किताब छत की ओर उछाल कर बोले - "ठीक है अब चलो ।"

फाँसी पर जाते समय वे तीनों मस्ती से गा रहे थे -

मेरा रँग दे बसन्ती चोला, मेरा रँग दे;
मेरा रँग दे बसन्ती चोला। माय रँग दे बसन्ती चोला।।

फाँसी के बाद कहीं कोई आन्दोलन न भड़क जाये इसके डर से अंग्रेजों ने पहले इनके मृत शरीर के टुकड़े किये फिर इसे बोरियों में भरकर फिरोजपुर की ओर ले गये जहाँ घी के बदले मिट्टी का तेल डालकर ही इनको जलाया जाने लगा। गाँव के लोगों ने आग जलती देखी तो करीब आये। इससे डरकर अंग्रेजों ने इनकी लाश के अधजले टुकड़ों को सतलुज नदी में फेंका और भाग गये। [ अब यह कैसे माना जाए कि यह उनका शव था भी या नहीं - आखिर सुभाष बाबू की मौत को लेकर भी तो कई सवाल हैं | हमने बस मान लिया जो बताया गया :( ] जब गाँव वाले पास आये तब उन्होंने इनके मृत शरीर के टुकड़ो कों एकत्रित कर विधिवत दाह संस्कार किया । और भगत सिंह हमेशा के लिये अमर हो गये। इसके बाद लोग अंग्रेजों के साथ-साथ गान्धी को भी इनकी मौत का जिम्मेवार समझने लगे । इस कारण जब गान्धी कांग्रेस के लाहौर अधिवेशन में हिस्सा लेने जा रहे थे तो लोगों ने काले झण्डों के साथ गान्धीजी का स्वागत किया । एकाध जग़ह पर गान्धी पर हमला भी हुआ, किन्तु सादी वर्दी में उनके साथ चल रही पुलिस ने बचा लिया।

कहा जाता है कि जेल में रहने के दौरान भगतसिंह जी ने एक पत्र लिखा था "मैं नास्तिक क्यों हूँ" किन्तु ऐसा कोई सबूत नहीं है कि ऐसा कोई पत्र है भी | यह एक सोची समझी भ्रामक बात लगती है | इसी भ्रम को और अधिक मज़बूत बनाने के लिए उनकी पगड़ी को लाल रंग कर यह दिखाने के प्रयास करे जा रहे हैं की वे कम्युनिस्ट थे - जो सरासर झूठ है । इस  के बारे में अपने विचार रखते हुए जल्द ही एक पूरी पोस्ट लिखूंगी ।

भगत सिंह को विश्वास था कि उनकी शहादत से भारतीय जनता और उद्विग्न हो जायेगी और ऐसा उनके जिन्दा रहने से शायद ही हो पाये । इसी कारण उन्होंने मौत की सजा सुनाने के बाद भी माफ़ीनामा लिखने से साफ मना कर दिया था। पं० राम प्रसाद 'बिस्मिल' ने अपनी आत्मकथा में जो-जो दिशा-निर्देश दिये थे, भगत सिंह ने उनका अक्षरश: पालन किया। कहा जाता है कि उन्होंने अंग्रेज सरकार को एक पत्र भी लिखा, जिसमें कहा गया था कि उन्हें अंग्रेज़ी सरकार के ख़िलाफ़ भारतीयों के युद्ध का प्रतीक एक युद्धबन्दी समझा जाये तथा फाँसी देने के बजाय गोली से उड़ा दिया जाये।

आज भी भारत और पाकिस्तान की जनता भगत सिंह को आज़ादी के दीवाने के रूप में देखती है जिसने अपनी जवानी सहित सारी जिन्दगी देश के लिये समर्पित कर दी।

भगत सिंह जी के जन्म दिवस पर उन्हें प्रणाम, नमन ।

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In reference to a comment by Shri Gaurav Rajasthan ka: 

इस लेख में लिखी जानकारी इन्टरनेट से ली गयी है।  जहां तक मेरी जानकारी है, ये जानकारियाँ सही हैं .

लेकिन यह एक प्रामाणिक जीवनी नहीं बल्कि मेरी तरफ से मेरे आदर्श व्यक्तित्व को एक निजी श्रद्धांजलि है।  

सन्दर्भ : विकिपीडिया और अन्य अंतरजाल स्रोत 

शनिवार, 18 अगस्त 2012

नेताजी सुभाष चन्द्र बोस





नेताजी सुभाष चन्द्र बोस



श्री सुभाष चन्द्र जी के बारे में कौन नहीं जानता ?

जानकारी विकिपीडिया हिंदी से साभार।

भारत के स्वतंत्रता संग्राम के अग्रणी नेता, श्री सुभाषचन्द्र बोस "नेताजी" नाम से भी जाने जाते हैं | इनका जन्म 23 जनवरी 1897 को उड़ीसा के कटक शहर में मशहूर वकील जानकीनाथ बोस और उनकी पत्नी प्रभावती की नौवीं संतान और पाँचवें बेटे के रूप में हुआ था हुआ था । 18 अगस्त, 1945 को नेताजी लापता हो गए | कुछ लोग इसे इनकी मृत्यु की तिथि मानते हैं,किन्तु यह विवादित है | द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान, अंग्रेज़ों के खिलाफ लड़ने के लिये, जापान के सहयोग से नेताजी ने "आज़ाद हिन्द फौज" का गठन किया | उनके द्वारा दिया गया "जय हिन्द" का नारा, आज भारत का राष्ट्रीय नारा बन गया हैं।

१९४४ में अमेरिकी पत्रकार लुई फिशर से बात करते हुए, महात्मा गाँधी ने नेताजी को देशभक्तों का देशभक्त कहा था। नेताजी का योगदान और प्रभाव इतना तक कहा जाता हैं कि अगर 1947 में नेताजी भारत में उपस्थित रहते, तो शायद भारत का विभाजन न हुआ होता। 


कोलकाता के स्वतंत्रता सेनानी, देशबंधु चित्तरंजन दास के कार्य से प्रेरित होकर, सुभाष दासबाबू के साथ काम करना चाहते थे। इंग्लैंड से उन्होंने दासबाबू को खत लिखा, और उनके साथ काम करने की इच्छा प्रकट की। रवींद्रनाथ ठाकुर की सलाह के अनुसार,भारत वापस आने पर वे गाँधी जी से मिले, जिन्होंने उन्हें कोलकाता जाकर दासबाबू के साथ काम करने की सलाह दी। फिर सुभाषबाबू कोलकाता आए और दासबाबू से मिले।

तब  असहयोग आंदोलन चल रहा था, और दासबाबू इस का बंगाल में नेतृत्व कर रहे थे। सुभाषबाबू भी इस आंदोलन में सहभागी हो गए । 1922 में दासबाबू ने कांग्रेस के अंतर्गत स्वराज पार्टी की स्थापना की। विधानसभा के अंदर से अंग्रेज़ सरकार का विरोध करने के लिए, स्वराज पार्टी ने कोलकाता महापालिका का चुनाव लड़ा, और जीता भी । दासबाबू कोलकाता के महापौर बने , और सुभाषबाबू को महापालिका का प्रमुख कार्यकारी अधिकारी बने  सुभाषबाबू ने अपने कार्यकाल में कोलकाता महापालिका का पूरा ढाँचा और काम करने का तरीका ही बदल डाला। कोलकाता के रास्तों के अंग्रेज़ी नाम बदलकर, उन्हें भारतीय नाम दिए गए। स्वतंत्रता संग्राम में प्राण न्यौछावर करनेवालों के परिवार के सदस्यों को महापालिका में नौकरी मिलने लगी।

जल्द ही, सुभाषबाबू देश के एक महत्वपूर्ण युवा नेता बन गए। पंडित जवाहरलाल नेहरू के साथ सुभाषबाबू ने कांग्रेस के अंतर्गत युवकों की इंडिपेंडन्स लिग शुरू की।1928 में साइमन कमीशन के भारत आने पर जब कांग्रेस ने उसे काले झंडे दिखाए तब  कोलकाता में सुभाषबाबू ने इस आंदोलन का नेतृत्व किया था । साइमन कमीशन को जवाब देने के लिए, कांग्रेस ने भारत का भावी संविधान बनाने का काम आठ सदस्यीय आयोग को सौंपा था । पंडित मोतीलाल नेहरू इस आयोग के अध्यक्ष थे और सुभाषबाबू उसके एक सदस्य थे। इस आयोग ने नेहरू रिपोर्ट पेश की थी । 

1928 में कांग्रेस के वार्षिक अधिवेशन में सुभाषबाबू ने खाकी गणवेश धारण करके पंडित मोतीलाल नेहरू को सैन्य तरीके से सलामी दी। गाँधीजी तब पूर्ण स्वराज्य की मांग से सहमत नहीं थे। वे अंग्रेजों से डोमिनियन स्टेटस माँगना चाहते थे । सुभाषबाबू और पंडित जवाहरलाल नेहरू को पूर्ण स्वराज की मांग से पीछे हटना मंजूर नहीं था। यह तय हुआ कि अंग्रेज़ सरकार को डोमिनियन स्टेटस देने के लिए, एक साल का वक्त दिया जाए, और यदि एक साल में अंग्रेज़ सरकार यह मॉंग पूरी न करे, तो कांग्रेस पूर्ण स्वराज की मांग करेगी। ऐसा ही हुआ भी, मांग पूरी नहीं की गयी । 1930 में जब कांग्रेस का वार्षिक अधिवेशन पंडित जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में लाहौर में हुआ जहां तय किया गया कि 26 जनवरी का दिन स्वतंत्रता दिन के रूप में मनाया जाएगा।

26 जनवरी, 1931 के दिन कोलकाता में राष्ट्रध्वज फैलाकर एक विशाल मोर्चे का नेतृत्व करते हुए नेताजी पुलिस के लाठीचार्ज में घायल हुए, और गिरफ्तार हुए । सुभाषबाबू के जेल में रहते गाँधीजी ने अंग्रेज सरकार से समझौता किया । कुछ कैदियों को रिहा किया गया। लेकिन अंग्रेज सरकार ने सरदार भगत सिंह जैसे क्रांतिकारकों को रिहा नहीं दिया। भगत सिंह की फॉंसी माफ कराने के लिए, गाँधीजी ने सरकार से बात की। सुभाषबाबू चाहते थे कि इस विषय पर गाँधीजीअंग्रेज सरकार के साथ किया गया समझौता तोड दे। लेकिन गाँधीजी वचन तोडने को राजी नहीं थे। अंग्रेज सरकार अपने स्थान पर अडी रही और भगत सिंह और उनके साथियों को फॉंसी दी गयी। भगत सिंह को न बचा पाने पर, सुभाषबाबू गाँधीजी और कांग्रेस के तरिकों से बहुत नाराज हो गए थे ।

अपने सार्वजनिक जीवन में सुभाषबाबू को कुल ग्यारह बार कारावास हुआ। 1925 में गोपिनाथ साहा नामक एक क्रांतिकारी  को फॉंसी होने के बाद सुभाषबाबू बहुत रोये और शव का अंत्यसंस्कार किया। इससे अंग्रेज़ सरकार ने यह माना कि सुभाषबाबू ज्वलंत क्रांतिकारकों का स्फूर्तीस्थान हैं। अंग्रेज़ सरकार ने सुभाषबाबू को गिरफतार किया और बिना कोई मुकदमा चलाए, उन्हें अनिश्चित कालखंड के लिए म्यानमार के मंडाले कारागृह में बंदी बनाया। सुभाषबाबू ने  देशबंधू चित्तरंजन दास की मृत्यू की खबर मंडाले कारागृह में रेडियो पर सुनी। कारागृह में सुभाषबाबू को  तपेदिक हो गया। रिहा करने के लिए शर्त रखी गयी कि वे इलाज के लिए यूरोप चले जाए। लेकिन यह स्पष्ट नहीं किया गया कि इलाज के बाद वे भारत कब लौट सकते हैं। इसलिए सुभाषबाबू ने यह शर्त नहीं मानी । परिस्थिती इतनी कठिन हो गयी कि शायद वे कारावास में ही मर जायेंगे। अंग्रेज़ सरकार यह खतरा नहीं उठाना चाहती थी कि सुभाषबाबू की कारागृह में मौत हो जाए। इसलिए सरकार ने उन्हे रिहा किया। सुभाषबाबू इलाज के लिए डलहौजी चले गए।

यूरोप में सुभाषबाबू ने अपनी सेहत का ख्याल रखते हुए भी अपना कार्य जारी रखा। वे इटली के नेता मुसोलिनी से मिले, जिन्होंने भारत के स्वतंत्रता संग्राम में सहायता का वचन दिया। आयरलैंड के नेता डी वॅलेरा सुभाषबाबू के अच्छे दोस्त बन गए थे । सुभाषबाबू के यूरोप में रहते हुए पंडित जवाहरलाल नेहरू की पत्नी कमला नेहरू का ऑस्ट्रिया में निधन हो गया। सुभाषबाबू वहाँ जाकर पंडित जवाहरलाल नेहरू से मिले । बाद में सुभाषबाबू यूरोप में विठ्ठल भाई पटेल से भी मिले। विठ्ठल भाई पटेल के साथ सुभाषबाबू ने "पटेल-बोस" विश्लेषण प्रसिद्ध किया, जिस में उन दोनों ने गाँधीजी के नेतृत्व की बहुत गहरी निंदा की थी । बाद में विठ्ठल भाई पटेल का निधन हो गया।   विठ्ठल भाई पटेल ने अपनी वसीयत में अपनी करोडों की संपत्ती सुभाषबाबू के नाम कर दी। मगर उनके निधन के पश्चात, उनके भाई सरदार वल्लभ भाई पटेल ने इस वसीयत पर अदालत में मुकदमा चलाया। यह मुकदमा जीतकर, सरदार वल्लभ भाई पटेल ने वह संपत्ति गाँधीजी के हरिजन सेवा कार्य को भेट की ।

1934 में सुभाषबाबू को अपने पिता के मृत्युशय्या पर होने की खबर मिली, तब वे हवाई जहाज से कराची होकर कोलकाता लौटे। कराची में उन्हे पता चला की उनके पिता की मौत हो चुकी है । कोलकाता पहुँचते ही अंग्रेज सरकार ने उन्हे गिरफ्तार किया और कई दिन जेल में रखकर, वापस यूरोप भेज दिया।

1938 में कांग्रेस का ५१वा वार्षिक अधिवेशण हरिपुरा में तय हुआ था। इस अधिवेशण से पहले गाँधीजी ने कांग्रेस अध्यक्षपद के लिए सुभाषबाबू को चुना। अध्यक्ष सुभाषबाबू का स्वागत 51 बैलों ने खींचे हुए रथ में किया गया था । अपने अध्यक्षपद के कार्यकाल में सुभाषबाबू ने योजना आयोग की स्थापना की। पंडित जवाहरलाल नेहरू इस के अध्यक्ष थे। सुभाषबाबू ने सर विश्वेश्वरैय्या की अध्यक्षता में एक विज्ञान परिषद भी बनाई । 1937 में जापान ने चीन पर आक्रमण किया थातब सुभाषबाबू की अध्यक्षता में कांग्रेस ने, चीनी जनता की सहायता के लिए, डॉ द्वारकानाथ कोटणीस के नेतृत्व में वैद्यकीय पथक भेजने का निर्णय लिया था ।

युरोप में द्वितीय विश्वयुद्धके बादल छाए थे। सुभाषबाबू चाहते थे कि इंग्लैंड की इस कठिनाई का लाभ उठाकर, भारत का स्वतंत्रता संग्राम अधिक तीव्र किया जाए। उन्होने इस तरफ कदम उठाना भी शुरू कर दिया था। गाँधीजी इस विचारधारा से सहमत नहीं थे। 1939 में जब नया कांग्रेस अध्यक्ष चुनने का वक्त आया, तब सुभाषबाबू चाहते थे कि कोई ऐसा व्यक्ति अध्यक्ष बने , जो इस मामले में किसी दबाव के सामने न झुके। कोई दूसरा व्यक्ति सामने न आने पर, सुभाषबाबू ने खुद कांग्रेस अध्यक्ष बने रहना चाहा। लेकिन गाँधीजी अब उन्हे अध्यक्षपद से हटाना चाहते थे। गाँधीजी ने अध्यक्षपद के लिए प. सीतारमैय्या को चुना। रविंद्रनाथ ठाकूर, प्रफुल्लचंद्र राय और मेघनाद सहा जैसे वैज्ञानिक भी सुभाषबाबू को ही फिर से अध्यक्ष के रूप में देखना चाहतें थे। लेकिन गाँधीजी ने इस मामले में किसी की बात नहीं मानी। कोई समझौता न हो पाने पर, बहुत सालो के बाद, कांग्रेस अध्यक्षपद के लिए चुनाव हुए ।

सब समझते थे कि जब महात्मा गाँधी ने पट्टाभी सितारमैय्या का साथ दिया हैं, तब वे चुनाव आसानी से जीत जाएंगे। लेकिन गाँधीजी के विरोध के बावजूद सुभाषबाबू 203 मतों से यह चुनाव जीत गए। मगर चुनाव के साथ बात खत्म नहीं हुई। गाँधीजी ने इसे अपनी हार बताकर, अपने साथियों से कहा  कि अगर वें सुभाषबाबू से सहमत नहीं हैं, तो वें कांग्रेस से हट सकतें हैं। कांग्रेस कार्यकारिणी के 14 में से 12 सदस्यों ने इस्तीफा दे दिया। पंडित जवाहरलाल नेहरू तटस्थ रहें और अकेले शरदबाबू सुभाषबाबू के साथ रहे। परिस्थिती ऐसी बन गयी कि सुभाषबाबू कुछ काम ही न कर पाए। आखिर में तंग आकर, 29 अप्रैल, 1939 को सुभाषबाबू ने कांग्रेस अध्यक्षपद से इस्तीफा दे दिया। 3 मई, 1939 के दिन, सुभाषबाबू नें कांग्रेस के अंतर्गत फॉरवर्ड ब्लॉक के नाम से अपनी पार्टी की स्थापना की। कुछ दिन बाद, सुभाषबाबू को कांग्रेस से निकाल दिया गया। बाद में फॉरवर्ड ब्लॉक अपने आप एक स्वतंत्र पार्टी बन गयी।

द्वितीय विश्वयुद्ध शुरू होने से पहले, फॉरवर्ड ब्लॉक ने स्वतंत्रता संग्राम को तीव्र करने के लिए, जनजागृति शुरू की। अंग्रेज सरकार ने सुभाषबाबू सहितफॉरवर्ड ब्लॉक के सभी मुख्य नेताओ को कैद कर दिया। द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान सुभाषबाबू जेल में निष्क्रिय रहना नहीं चाहते थे। सरकार को उन्हे रिहा करने पर मजबूर करने के लिए सुभाषबाबू ने जेल में आमरण उपवास शुरू किया। सरकार ने उन्हे रिहा तो कर दिया, मगर उन्हे उनके ही घर में नजरकैद रखा। 16 जनवरी, 1941 को वे पुलिस को चकमा देकर, अपने घर से भाग निकले। शरदबाबू के बडे बेटे शिशिर, फॉरवर्ड ब्लॉक के एक सहकारी, मियां अकबर शाह, कीर्ती किसान पार्टी के भगतराम तलवार की मदद से सुभाषबाबू काबुल की ओर निकल पडे। पहाडियों में पैदल चलते हुए उन्होने यह सफर पूरा किया। काबुल उन्होने रूसी , जर्मन और इटालियन दूतावासों में प्रवेश पाने की कोशिश की। इटालियन दूतावास में उनकी कोशिश सफल रही। जर्मन और इटालियन दूतावासों ने उनकी सहायता की। आखिर में ओर्लांदो मात्सुता नामक इटालियन व्यक्ति बनकर, सुभाषबाबू काबुल से रेल्वे से निकलकर रूस की राजधानी मॉस्को होकर जर्मनी की राजधानी बर्लिन पहुँचे।

बर्लिन में सुभाषबाबू रिबेनट्रोप जैसे जर्मनी के अन्य नेताओ से मिले। उन्होने जर्मनी में भारतीय स्वतंत्रता संगठन और आजाद हिंद रेडिओ की स्थापना की। इसी दौरान वे नेताजी नाम से जाने जाने लगे। जर्मन सरकार के एक मंत्री एडॅम फॉन ट्रॉट सुभाषबाबू के अच्छे दोस्त बन गए। 29 मई, 1942 के दिन, सुभाषबाबू जर्मनी के सर्वोच्च नेता एडॉल्फ हिटलर से मिले। लेकिन हिटलर को भारत के विषय में विशेष रूची नहीं थी। उन्होने सुभाषबाबू को सहायता का कोई स्पष्ट वचन नहीं दिया। कई साल पहले हिटलर ने माईन काम्फ नामक अपना आत्मचरित्र लिखा था, जिस में उन्होने भारत और भारतीय लोगों की बुराई की थी। इस विषय पर सुभाषबाबू ने हिटलर से बात की जिसके फलस्वरूप हिटलर ने "माईन काम्फ" की अगली आवृत्ती से वह परिच्छेद निकालने का वचन दिया।

सुभाषबाबू को पता चल गया कि हिटलर और जर्मनी से उन्हे कुछ और नहीं मिलनेवाला । इसलिए 8 मार्च, 1943 को वे अपने साथी अबिद हसन सफरानी के साथ एक जर्मन पनडुब्बी में बैठकर, मादागास्कर के किनारे तक आये । वहां से वे दोनो खूँखार समुद्र में से तैरकर जापानी  पनडुब्बी  तक पहुँच गए। द्वितीय विश्वयुद्ध के काल में, किसी भी दो देशों की नौसेनाओ की  पनडुब्बी  के दौरान, नागरिको की यह एकमात्र बदली हुई थी। यह जापानी पनदुब्बी उन्हे इंडोनेशिया के पादांग तक लाई।

पूर्व एशिया पहुँचकर सुभाषबाबू ने सर्वप्रथम, वयोवृद्ध क्रांतिकारी रासबिहारी बोस से भारतीय स्वतंत्रता परिषद का नेतृत्व सँभाला। सिंगापुर के फरेर पार्क में रासबिहारी बोस नेभारतीय स्वतंत्रता परिषद का नेतृत्व सुभाषबाबू को सौंपा ।

जापान के प्रधानमंत्री जनरल हिदेकी तोजो ने, नेताजी के व्यक्तित्व से प्रभावित होकर, उन्हे सहकार्य करने का आश्वासन दिया।  नेताजी ने जापान की संसदडायट के सामने भाषण किया। 21 अक्तूबर, 1943 के दिन, नेताजी ने सिंगापुर में "अर्जी-हुकुमत-ए-आजाद-हिंद" (स्वाधीन भारत की अंतरिम सरकार) की स्थापना की। वे खुद इस सरकार के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और युद्धमंत्री बने। इस सरकार को कुल नौ देशों ने मान्यता दी। नेताजी आज़ाद हिन्द फौज के प्रधान सेनापति भी बन गए। फ़ौज में औरतो के लिए झाँसी की रानी रेजिमेंट भी बनायी गयी। पूर्व एशिया में नेताजी ने अनेक भाषण करके वहाँ स्थायिक भारतीय लोगों से आज़ाद हिन्द फौज में भरती होने का और उसे आर्थिक मदद करने का आवाहन किया। उन्होने अपने आवाहन में संदेश दिया "तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हे आजादी दूँगा।"

द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान आज़ाद हिन्द फौज ने जापानी सेना के सहयोग से भारत पर आक्रमण किया। अपनी फौज को प्रेरित करने के लिए नेताजी ने "चलो दिल्ली" का नारा दिया। फौजो ने अंग्रेजों से अंदमान और निकोबार द्वीप जीत लिए। यह द्वीप अर्जी-हुकुमत-ए-आजाद-हिंद के अनुशासन में रहें। नेताजी ने इन द्वीपों का "शहीद" और "स्वराज" द्वीप नामकरण किया। फौजो ने इंफाल और कोहिमा पर आक्रमण किया। लेकिन बाद में अंग्रेजों का पलडा भारी पडा और दोनो फौजो को पीछे हटना पडा। जब आज़ाद हिन्द फौज पीछे हट रही थी, तब जापानी सेना ने नेताजी के भाग जाने की व्यवस्था की। लेकिन नेताजी ने झाँसी की रानी रेजिमेंट की लडकियों के साथ सैकडो मील चल कर जाना पसंद किया। इस प्रकार नेताजी ने सच्चे नेतृत्व का एक आदर्श बनाया ।

6 जुलाई, 1944 को आजाद हिंद रेडिओ पर अपने भाषण के माध्यम से गाँधीजी से बात करते हुए, नेताजी ने जापान से सहायता लेने का अपना अर्जी-हुकुमत-ए-आजाद-हिंद तथा आज़ाद हिन्द फौज की स्थापना का उद्येश्य बताया। इस भाषण के दौरान, नेताजी ने गाँधीजी को राष्ट्रपिता बुलाकर अपनी जंग के लिए उनका आशिर्वाद माँगा । इस प्रकार, नेताजी ने गाँधीजी को सर्वप्रथम राष्ट्रपिता बुलाया। 

द्वितीय विश्वयुद्ध में जापान की हार के बाद, नेताजी ने रूस से सहायता माँगने का निश्चय किया । 18 अगस्त, 1945 को नेताजी हवाई जहाज से मांचुरिया की तरफ जा रहे थे। इस सफर के दौरान वे लापता हो गए। इस दिन के बाद वे कभी किसी को दिखाई नहीं दिये। 23 अगस्त, 1945 को जापान की दोमेई खबर संस्था ने दुनिया को खबर दी, कि 18 अगस्त के दिन, नेताजी का हवाई जहाज ताइवान की भूमि पर दुर्घटनाग्रस्त हो गया था और उस दुर्घटना में बुरी तरह से घायल होकर नेताजी ने अस्पताल में अंतिम साँस ले ली थी। नेताजी की अस्थियाँ जापान की राजधानी तोकियो में रेनकोजी नामक बौद्ध मंदिर में रखी गयी।


स्वतंत्रता के पश्चात, भारत सरकार ने इस घटना की जाँच करने के लिए, 1956 और 1977 में दो बार एक आयोग को नियुक्त किये । दोनो बार यही नतीजा निकला, कि नेताजी उस विमान दुर्घटना में ही मारे गये थे। लेकिन, इन दोनो आयोगो ने ताइवान देश की सरकार से तो बात ही नहीं की। 1999 में मनोज कुमार मुखर्जी के नेतृत्व में तीसरा आयोग बनाया गया। 2005 में ताइवान सरकार ने मुखर्जी आयोग को बता दिया कि 1945 में ताइवान की भूमि पर कोई हवाई जहाज दुर्घटनाग्रस्त हुआ ही नहीं था। 2005 में मुखर्जी आयोग ने भारत सरकार को अपनी रिपोर्ट पेश की, जिस में उन्होने कहा, कि नेताजी की मृत्यु उस विमान दुर्घटना में होने का कोई सबूत नहीं हैं। लेकिन भारत सरकार ने मुखर्जी आयोग की रिपोर्ट को अस्वीकार कर दिया। देश के अलग-अलग हिस्सों में आज भी नेताजी को देखने और मिलने का दावा करने वाले लोगों की कमी नहीं है। कई जगहों पर नेताजी के होने को लेकर कई दावे हुये हैं लेकिन इनमें से सभी की प्रामाणिकता संदिग्ध है। 

18 अगस्त, 1945 के दिन नेताजी कहाँ लापता हो गए और उनका आगे क्या हुआ, यह भारत के इतिहास का सबसे बडा अनुत्तरित रहस्य बन गया हैं।

आज 18 अगस्त के दिन सुभाष बाबु को शत सहस्र नमन , वंदन ।


इस लेख में लिखी जानकारी इन्टरनेट से ली गयी है।  जहां तक मेरी जानकारी है, ये जानकारियाँ सही हैं .लेकिन यह एक प्रामाणिक जीवनी नहीं बल्कि मेरी तरफ से मेरे आदर्श व्यक्तित्व को एक निजी श्रद्धांजलि है।  सन्दर्भ : विकिपीडिया और अन्य अंतरजाल स्रोत ।

बुधवार, 15 अगस्त 2012

स्वतंत्रता दिवस की बधाईयाँ और शुभकामनाएं ।

स्वतंत्रता दिवस की बधाईयाँ और शुभकामनाएं ।

आज हमारे निस्वार्थ स्वतंत्रता सेनानियों के बलिदानों की आहुतियाँ उनके स्वप्न की सफलता की शुरुआत में बदली थीं ।

आइये उनके स्वप्न को आगे बढाएं । सिर्फ नाम के लिए स्वतंत्र न बने रहे स्वतंत्रता से जुडी जिम्मेदारियों को पूरा करें और उन देशभक्त शहीदों के स्वप्न को पूरा करने में अपना योगदान करें ।

स्व का अर्थ होता है अपना / स्वयं का / खुद का , और तंत्र का अर्थ होता है - system , प्रणाली, योजना 
इसी तरह से "स्वाधीन = स्व + अधीन", अर्थात अपने स्वयं के अनुशासन में ।

इसके विपरीत "पर = दूसरा " सो पराधीन और परतंत्र के अर्थ दूसरे के अनुशासन में दूसरों की प्रणालियों पर चलना 

तो स्व+तंत्र या स्व +अधीन का अर्थ उच्च्श्रन्खलता / गैर जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि स्वयं अपने discipline  से , अपनी प्रणाली को स्वयं सुचारू रूप से चलाना और प्रगति करना है ।

आइये हम सब इस प्रणाली को और मजबूत बनाएं ।
जय भारत, जय राष्ट्र , अमर रहे स्वतंत्रता ।

जय हिंद ।

रविवार, 12 अगस्त 2012

हिन्दू और हिन्दुइज्म - अक्सर पूछे जाने वाले कुछ सवाल

कई दिनों से मन में एक बात चल रही है, सो यह पोस्ट लिख रही हूँ |

जन्माष्टमी के दिन कई सारे विद्वानों के ब्लोग्स पर कई सारी पोस्ट्स पढ़ीं | इससे पहले भी कई कवितायेँ, कई लेख पढ़ती आई हूँ कृष्ण पर, महाभारत पर, मानस पर, राम पर, सीता पर ... |

कोई कृष्ण और राम को महान या असाधारण गुणों से युक्त मानव के रूप में दर्शाती हैं, जिन्होंने अपने सामर्थ्य और समझ के अनुसार धर्म स्थापना की | 

कोई उन्हें स्वार्थी शक्तिकेंद्रों के रूप में - जिन्होंने अपनी धर्म की परिभाषा निरीह जनता और आने वाली पीढ़ियों पर थोप दी | 

कोई तो खुले शब्दों में उनके चरित्र पर प्रश्न उठाती हैं, और कोई दबे ढंके शब्दों में | 

एक बहुत बड़ी संख्या में ऐसे भी व्यक्ति हैं, जो अपने आप को "हिंदुत्व" का रक्षक मानते और दर्शाते है, किन्तु वे भी "pick and choose" करते हैं - वे कहते हैं - मैं हिन्दू हूँ, राम / कृष्ण को भगवान के अवतार मानता हूँ - लेकिन ...

एक बहुत बड़ी संख्या में पोस्ट्स हैं जो "कृष्ण" की रासलीला / कई गोपियों से प्रेम / गोपियों के वस्त्रहरण / राधा से धोखा / अनेक स्त्रियों से दाम्पत्य सम्बन्ध आदि पर कई प्रश्न उठाती हैं |

इसी तरह से "राम" पर जो प्रश्न उठाये जाते हैं उनमे मुख्य हैं बाली को छिप कर मारना / सीता की अग्निपरीक्षा / सीता को गर्भिणी स्थिति में वनवास / लव कुश के बारे में जान लेने के बाद भी प्रश्न |

यह सब कई जगह कई तरह से लिखा जाता है | इनमे से हर प्रश्न के उत्तर हैं, दिए भी जाते हैं, किन्तु प्रश्न फिर भी हैं | उत्तर मेरे पास भी हैं, लेकिन यहाँ मैं प्रश्नों के समाधानों की बात ले कर नहीं आयी हूँ | यह पोस्ट मैं उत्तरों पर नहीं, तर्कों पर नहीं, बल्कि प्रश्नों पर लिख रही हूँ |

लिखने वाले विद्वान् /विदुषी जन अपनी अपनी व्याख्याएं लिखते हैं, इन सभी "पात्रों" की विचारधारा / उनके किये कर्मों को अपने अपने हिसाब से परिभाषित करते हुए | कुछ प्रश्न हैं मन में - कुछ सहमतियाँ तो कुछ असहमतियां हैं | इस पर चर्चा करना चाहती हूँ | पाठकों को अनुचित लगती हो मेरी बात, तो उनकी आपत्ति सर माथे पर |

यदि आप यह पोस्ट पढ़ कर यह कहना चाहें कि इस तरह की अवैज्ञानिक सोच रखने के कारण , मैं गंवार हूँ / अन्धविश्वासी हूँ - और अनपढ़ हूँ आदि आदि - तो ये सब आक्षेप मुझे स्वीकार्य होंगे | लेकिन मैं अपनी बात कहना चाहूंगी अवश्य |  जो अपील मैं कर रही हूँ, यह सिर्फ हिन्दू धर्म के अनुयायियों से एक चर्चा या अपील है |
(अंशुमाला जी और रचना जी के कमेंट्स के सन्दर्भ में यहाँ सुधार कर रही हूँ - यह पोस्ट सभी के लिए है, किन्तु इसमें मैंने जो अपील की है - वह सिर्फ  limited audience के लिए है)

जब हम छोटे थे, शायद हम से पहले के जनरेशंस में भी, बचपन से हम यह मानते थे कि श्री राम, श्री कृष्ण, माँ सीता, माँ राधा, ... ये कुछ ऐसे नाम थे जिन्हें श्रद्धेय और पूज्य माना जाता था | इसमें कोई प्रश्न नहीं उठाये जाते थे, न उनके चरित्र की लीलाओं में बाल की खाल निकाली जाती थे | हम मानते थे कि वे इश्वर हैं , और यदि इश्वर हैं तो, वे जो भी कर रहे हैं, उसके पीछे दिव्य कारण होंगे । जो बातें हमें समझ आ जाते थी, वे ठीक, और जो हमें अपने हिसाब से सही नहीं भी लगती हों, वे भी स्वीकार ली जाती थीं |

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फिर हम बड़े हो गए, समझदार हो गए | पढ़े लिखे विद्वान् विदुषी जन हो गए | अब हम उन बातों को स्वीकार नहीं पाए क्योंकि वह निश्छल प्रेम भक्ति नहीं रही | अब तीन या चार ऑप्शन थे हमारे पास |

१. या तो हम "श्रद्धा" रखें, और यह माने कि नहीं - हमारी परिभाषाएं यदि इश्वर को गलत बताएं, तो परिभाषाएं गलत होंगी, क्योंकि यदि वे इश्वर हैं तो वे गलती नहीं कर सकते |

२. या तो हम मान लें कि वे इश्वर के "अवतार" नहीं, शक्तिशाली ऐतिहासिक मानव भर थे, जिन्होंने यदि ५० अच्छाइयां कीं, तो १ बुराई भी | यदि उन्होंने 100 अच्छे काम किये तो 2-3 बुरे भी । लेकिन, यदि हम ऐसा मानें, तो हमें स्वीकार करना होगा कि हमारे शास्त्र झूठे हैं, क्योंकि शास्त्र इन्हें इश्वर के अवतार ही बताते हैं, वह भी इनके आगमन से पहले ही इनकी पूर्वसूचना देते हुए | शास्त्रों में से pick and choose नहीं किया जा सकता न ?

३. या फिर यह मान लें कि इश्वर कोई होता ही नहीं, दुनिया अपने आप ही बनती बिगडती रहती है | यदि हम ऐसा मानते हैं, तब तो हमें अपने आप को "हिन्दू" या "ब्राह्मण" नहीं कहना चाहिए, बल्कि खुले रूप से स्वीकार लेना चाहिए कि नहीं - हमें इश्वर के अस्तित्व पर विश्वास नहीं | यह कहने वाले लोगों का मैं सम्मान करती हूँ, कम से कम उनमे हिम्मत है साफ़ तौर पर अपनी स्थिति साफ़ करने की |

४. लेकिन सबसे ज्यादा जो ऑप्शन चुना गया देख रही हूँ, वह यह है कि - हम अपने को हिन्दू भी कहेंगे | शास्त्रों को मानने वाला भी कहेंगे | राम और कृष्ण को अवतार मानते हुए अपने घर में सारी प्रार्थनाएं भी करेंगे, उनके चित्र अपने घर के "मंदिर" कहलाने वाली जगह पर भी रखेंगे और अगरबत्ती भी घुमाएंगे, उनसे अपने promotions और घर के लोगों की स्वास्थय सम्बन्धी या अन्य परेशानियों से हमें निजात दिलाने को 101 रुपये के प्रसाद की घूस भी offer करेंगे | हम रामायण का परायण भी करेंगे और अदालतों में गीता जी की कसमें भी खायेंगे | लेकिन, जब हम ब्लॉग पर आयेंगे, या "पढ़े लिखे समझदार reasonable लोगों के बीच बैठेंगे - तो हम ऐसा दर्शाएंगे कि जी हम तो बिलकुल "दकियानूसी" नहीं हैं |

** हिन्दू हैं, लेकिन नासमझ हिन्दू नहीं | हम जानते हैं कि राम और कृष्ण कोई अवतार वगैरह नहीं थे - वे बस असामान्य रूप से gifted पुरुष भर थे |

** सीता बस रावण के genetic / test tube experiment से उपजी एक टेस्ट ट्यूब बेबी थी |

** कृष्ण एक lover बॉय थे जो राधा (lover girl ) से प्रेम का नाटक कर उसे छोड़ गए |

** सीता को राम से (इसी तर्ज पर राधा को कृष्ण से आदि )बड़ी शिकायतें थीं जो इतिहास की पुस्तकों में "पुरुष वादियों "" ने दबा दीं |

** तुलसी बस एक पत्नी से खार खाए, पुरुष अहंकार के मारे व्यक्ति भर थे, जिन्होंने जहाँ तहां स्त्रियों के लिए जाने क्या क्या लिखा ... 

और भी ऐसी ही कई "modern " विचारधारा की बातें |

short में - हमें अपने हिन्दू होने का , अपने विश्वासों को खुले रूप से स्वीकार करने का अर्थ, अपनी तौहीन लगने लगा है | हमें शर्म महसूस होती है यह कहने में कि - हाँ - मुझे विश्वास है कि मेरे धर्म के अनुसार मैं जो मंदिर जाता हूँ / राम आदि को इश्वर मानता हूँ, मूर्ती की पूजा करता हूँ, इस सब में मुझे विश्वास है | हम यह दर्शाते हैं कि "यह सब मैं सिर्फ "परम्परा " के चलते कर तो रहा हूँ, किन्तु मैं एक modern पढ़ा लिखा व्यक्ति हूँ - जो मन में तो जानता ही है कि यह सब मूर्खतापूर्ण है |

इससे अधिक दर्दनाक ( और खतरनाक ) बात तो यह कि - हम स्वयं तो खैर यह सब कह ही रहे हैं - लेकिन इसके साथ ही हमने एक ऐसा "modern " माहौल बना लिया है अपने आस पास, कि कोई यदि रोज़ मंदिर जाना चाहता है, राम को इश्वर मानना चाहता / ती है - तो उसे भी हमने इतना डरा दिया है कि वह भी यह कहने से पहले दस बार सोचे कि ऐसा कहूं / करूँ या न कहूं | एक ज़माना था जब सब आस्तिक थे और कोई एकाध व्यक्ति नास्तिक - तो वह बेचारा दूसरों के डर के मारे दर्शाता था कि वह भी आस्तिक है | आज की स्थिति इससे उलटी है - वह अकेला यह स्वीकारने में भयभीत है कि हाँ, मैं आस्तिक हूँ, मैं राम को ईश्वर मानता हूँ | दोनों ही स्थितियां बराबर रूप से गलत हैं - व्यक्ति की निजी विचारधारा यदि डर से भीतर दबा दी जानी पड़े - तो यह कोई अच्छी स्थिति नहीं है |
कुछ दिन पहले स्मार्ट इन्डियन जी के ब्लॉग पर एक पुराना लेख "यह लेखक बेचारा क्या करे? " पढ़ा, जिसमे उन्होंने कहा कि "नास्तिक हूँ परन्तु नास्तिक और धर्म-विरोधी का अंतर देख सकता हूँ. मुझे दूसरों के धर्म या आस्था को गाली देने की कोई ज़रुरत नहीं लगती है" यह ideal situation होगी कि सभी के साथ ऐसी ही स्थिति रहे | ..... किन्तु सब उतनी हिम्मत लेकर नहीं आये हैं | सब धारा के विरुद्ध तैरने का साहस नहीं रखते | हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि खुद हम कहीं ऐसा माहौल तो नहीं बना रहे कि, अपने ही धर्म के अनुयायियों को, अपने विश्वास सार्वजनिक रूप से स्वीकारने में डर लगे ?
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मैं यह पूछना चाहूंगी - सभी से - उत्तर मुझे नहीं अपने आप को ही दीजियेगा |

यदि हम इतने ही modern हैं, तो फिर हमें क्या तकलीफ है यदि "हिन्दू" संस्कृति ख़त्म हो रही है ? क्यों हम  श्रावण सोमवार / जन्माष्टमी / गणेशोत्सव / नवरात्रि / दशहरा / दीवाली आदि मानते हैं ? यदि सिर्फ राम के अयोध्या लौटने की ख़ुशी में दीवाली मन रही है - तो ऐसा क्या है सिर्फ (एक असाधारण रूप से गिफ्टेड) राजा के लौटने में जिसे हजारों साल बाद मनाया जाए ? यदि ऐसा नहीं है, हम सच ही मानते हैं कि वे अवतार हैं - तो फिर यह modern होने और उन्हें सिर्फ पुरुष कहने का दिखावा क्यों ?

मेरा मानना है कि यह जो हम कहते हैं कि हिन्दू धर्म को "conversion " आदि ने नुकसान पहुँचाया है - यह हमारे अपनी responsibility को दूसरों पर थोपने के आलावा और कुछ नहीं है | hinduism को यदि किसी ने नुकसान पहुंचाया है - तो वह हैं हम खुद |

** इस्लाम में प्रवेश का पहला वाक्य है "सिर्फ एक अल्लाह हैं - और कोई नहीं, कोई नहीं, कोई नहीं - और मुहम्मद उस एक अल्लाह के पैगम्बर हैं" मैंने आज तक कोई एक भी इस्लामी व्यक्ति नहीं देखा जो खुद को "modern " दर्शाने के लिए इस बात पर लेशमात्र भी संदेह दिखाए |

** क्रिस्चियानिती का मानना है कि "प्रभु एक हैं | जीज़स उनके पुत्र हैं, जिन्होंने हम मनुष्यों के पापों से हमें छुडवाने के लिए सूली पर अपनी प्राण दी " - मैंने आजतक एक भी क्रिस्चियन को इस पर शक शुबहा दिखाते नहीं देखा |

** कोई सिख यदि ग्रन्थ साहब के आदेशों के पालन में कोई गलती कर देता है - तो गुरूद्वारे में जा कर अपनी सेवा पश्चात्ताप के रूप में करता है | बड़े बड़े ओहदे पर बैठे व्यक्ति भी वहां जाकर जूते तक साफ़ करने की सेवा, झाडू लगाने की सेवा देते हैं |

.......

सिर्फ हम ही ऐसे हैं, जो अपने ही विश्वासों पर हमेशा डांवाडोल होते रहते हैं | चारदीवारी के भीतर तो सब ठीक है - लेकिन सामाजिक रूप से हमें अपने विश्वासों को स्वीकारने में शर्म आती है | सार्वजनिक मंच पर हम "समझदार" हो जाते हैं जिनके लिए हमारे अवतार सिर्फ स्त्री पुरुष रह जाते हैं, और लक्ष्मी जी चंचला धन की देवी | ऐसा क्यों ????

आपको शायद याद हो - मैंने न्यूरल नेटवर्क्स पर एक श्रंखला शुरू की थी - जिसमे मैंने पूर्वाग्रह पर बातचीत शुरू की थी | न्यूरल नेटवर्क हमारे सोचने / समझने / निर्णय लेने के तरीकों को copy करते हैं | उस में हम पढ़ते हैं कि न्यूरल नेटवर्क को अपनी पुरानी सीखी हुई बातें भुलाने का सबसे efficient तरीका है उसे लगातार यह कहते रहना कि उसने जो निर्णय लिया, जिसे जैसा समझा - वह गलत है | सही है उसका उल्टा | और धीरे धीरे वह न्यूरल नेटवर्क उससे उलट सोचना सीख जाएगा | यही हो रहा है हमारे साथ | यदि हम सच ही आज यह मानने लगे हैं कि our beliefs are flawed, आज हमें यदि अपने विश्वासों को स्वीकारने में शर्म आ रही है - तो यही अनिश्चितता कई गुना बढ़ा कर अगली पीढ़ी को देंगे हम, और २-३ पीढ़ियों में हम वह कर देंगे जो हमलावरों की कई पीढियां न कर सकीं | वह है - हिन्दू विश्वासों का पूरी तरह अंत |

अगली बार हमारे आराध्यों को सिर्फ युगपुरुष या साधारण स्त्री भर के रूप में सार्वजनिक मंच पर कहने , बल्कि कहने नहीं - हमेशा के लिए इस इन्तेर्नेट ब्लॉग के शिलालेख पर लिख देने से पहले सोचिये - क्या हम यही लिखना चाह रहे हैं ? क्या सच ही ऐसा है हमारे मन में ? क्या हम चाहते हैं कि हमारी अगली पीढ़ी हमारे आराध्यों को बस ऐसा ही सोचे कि वे युगपुरुष हैं ?

भगवद गीता से कहती हूँ - जब अर्जुन कृष्ण के सूर्य से पहले होने पर यह कह कर शंका जाहिर करते हैं कि आप तो अभी जन्मे हैं और सूर्य पुराने हैं तो कृष्ण कहते हैं :

मैं साधारण प्राणियों की तरह जन्म बंधन में / अज्ञान में नहीं, बल्कि अपनी मर्ज़ी से, किसी उद्देश्य को लेकर, अपनी प्रकृति को अपने अधीन कर कर जन्म लेता हूँ | जो मेरी दिव्यता को जानते हुए मुझमे शरणागत होते हैं, वे मुझे प्राप्त होते हैं | मैं इस संसार का रचयिता हूँ | मुझे कर्म affect नहीं करते - क्योंकि मैं उनमे लिप्त नहीं |

आगे यह भी कहा गया कि मैं तो अपनी दिव्यता को अपने अधीन कर के मानव रूप में आता हूँ, किन्तु मूर्ख जन मुझे मानव मात्र मान कर मेरी लीलाओं का (और मेरा) मज़ाक उड़ाते हैं |

क्या हम वैसे ही मूर्ख बनना चाहते हैं अपने आप को अपने आस पास के पढ़े लिखे समाज में समझदार स्थापित करने के लिए ?