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शनिवार, 20 अक्टूबर 2012

देवी कथाएँ 4

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दक्ष दत्त (सती का) शरीर त्याग कर माता भवानी स्वधाम को लौट गयीं । शिव बड़े संतप्त हुए और कैलाश पर तप को चले गए । समय गुज़रता गया ।

इधर देवतागण ब्रह्मा जी के पास गए, जहाँ उन्होंने बताया कि कुछ आसुरी शक्तियों का नाश विष्णु अवतार करेंगे, कुछ का शिव अवतार, तो कुछ और आसुरी शक्तियों का विनाश सिर्फ जगदम्बिका के अवतारों और शिव भवानी की संतति द्वारा ही हो सकता है । आदिशक्ति जगदम्बिका अब हिमवान और मैना जी के घर अवतार लेंगी । तब देवता गण मैना जी के परिवार ( पितरों ) के पास गए और उनसे मैना जी और हिमवान के विवाह का अनुरोध किया । विवाह के उपरांत मैना जी और हिमवान ने माता की कठोर तपस्या की । ताप फलित हुआ और माता जी ने मैना रानी को दर्शन दिए और वर मांगने को कहा ।

मैना जी ने कहा की हे मातेश्वरी, यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं तो मुझे वर दीजिये की मेरे सौ अत्योत्तम पुत्र हों, और स्वयं आप मेरी पुत्री के रूप में पधारें । माता ने वरदान दिया और अंतर्ध्यान हो गयीं । समयचक्र में मैना जी ने सौ बलवान पुत्रों को जन्म दिया । उमा महेश्वरी अपने पूर्ण अंश के साथ हिमालय के शरीर में प्रविष्ट हुईं , जिससे वे अद्वितीय आभा से संपन्न हो गए । फिर यथोचित समय पर गिरिराज हिमालय ने, शिवा के इस पूर्णांश को, अपनी प्रिया मैना जी के उदर में स्थापित किया ।जगदम्बा के गर्भ में होने से मैना अत्यंत तेजोमय हो उठीं और सभी देवताओं, ने विष्णु सहित उनकी स्तुति की । गर्भकाल पूर्ण होने पर जगदीश्वरी ने शिशु रूप में मैना जी के घर जन्म लिया । उनका शरीर नील श्याम कान्तियुक्त था । हिमवान जी ने अपनी पुत्री का नामकरण किया, और उन्हें काली इत्यादि सुन्दर नामों से बुलाया गया । सुशीलता के कारण परिवारजन उन्हें "पार्वती" भी बुलाते थे । माँ ने तप को रोकते हुए "उमा" कहा - जिससे उनका नाम उमा भी हुआ ।

दैवीय प्रेरणा से नारद हिमालय जी के घर आये और पुत्री का हाथ देख कर बोले की इनका विवाह ऐसे वर से होगा जो योगी, नंग-धडंग, निर्गुण, निष्काम, मात-पिता रहित , निस्पृह और अमंगल वेशधारी होगा । यह सुन कर भवानी मन ही मन प्रसन्न हुईं, किन्तु माता पिता चिंतित हो गए । उनके उपाय पूछने पर नारद ने कहा कि ब्रह्म लेख झूठा तो हो नहीं सकता, किन्तु अशुभ को शुभ करने का एक उपाय है , कि आपकी पुत्री का ब्याह महेश्वर के साथ हो - क्योंकि उनमे ये सब गुण अवगुण नहीं, बल्कि भव्यता के रूप में वास करते हैं । हिमालय ने कहा कि वे तो निर्मोही और तपरत हैं, वे कैसे मेरी कन्या से विवाह करेंगे, तब नारद ने भवानी को शिव आराधना करने की सलाह दी , और कहा की तुम्हारी पुत्री आदिशक्ति है । शिव इनके अतिरिक्त किसी से विवाह न करेंगे । इनसे संगम होकर ही वे अर्धनारीश्वर कहलायेंगे ।

जब उमा 8 वर्ष की आयु को पहुंची तब शिव को उनके अवतरण के विषय में समाचार आया, और वे अति प्रसन्न हुए, (वे जानते तो पहले ही थे) और लौकिक रीति निभाते हेतु अपने पार्षद गणों सहित गंगावतरण तीर्थ पर जा कर समाधिस्थ हो रहे ।

पुत्री को लेकर पर्वतराज वहां पहुंचे और उन्हें नमन कर के अपनी पुत्री को आगे कर के भगवान् से बोले, हे प्रभु , आप हमारे यहाँ उपस्थित हुए, यह आपकी हम पर असीम कृपा है । हम अपनी कन्या को आपकी सेवा में समर्पित कर रहे हैं, यह सखियों सहित यहीं रहेगी और आपकी सेवा करेगी । कृपया आज्ञा दें ।

महाप्रभु बोले, हे हिमवान शैलराज, आप हमारे दर्शन कर सकते हैं । किन्तु अपनी पुत्री को घर ही में छोड़ आइये , कि हम तो तपस्वी हैं, हमें इससे क्या सेवा लेनी है ? वेद पारंगत विद्वान् ऐसी अत्यंत सुन्दर, तन्वंगी,चंद्रमुखी और शुभ लक्षना युवास्त्री को मायारूपिणी कहते हैं । हे गिरिश्रेष्ठ, मैं योगी हूँ, और माया से सदा दूर रहता हूँ  ।इस पर हिमवान अत्यंत उदास हो उठे ।

अब पार्वती बोलीं, हे आप योगी और ज्ञान विशारद हैं, फिर भी हमारे पिता से ऐसी बात कही ? सभी कर्मो को करने की शक्ति, सर्व प्राकट्य प्रकृति (nature ) ही है । प्रकृति से ही सृष्टि , पालन, और संहार होता है ( जो ब्रह्मा, विष्णु और महादेव के अधीनस्थ लोक कर्म हैं )। प्रकृति बिना आप लिंग रूप महेश्वर कैसे हो सकते हैं ? आप प्राणीमात्र के वन्दनीय और चिंतनीय हैं, किन्तु आपके मूल में आपकी प्रकृति ही है ।

महेश जी हंस पड़े और बोले ,  मैं तप द्वारा प्रकृति का नाश करता हूँ और तत्वरूप प्रकृति रहित शम्भू रूप में स्थित और विद्यमान रहता हूँ । सत्पुरुष कभी प्रकृति के अधीन नहीं होते । 

माता महाकाली ने कहा, हे प्रभु । अभी जो आपने कहा, वह भी "वाणी" से कहा, और वाणी प्रकृति प्रदत्त है । तब आप प्रकृति से परे कैसे रहे ? जो आप प्रकृति से परे हैं, तो न आप को बोलना चाहिए, न कर्म करना, कि कर्म का किया जाना भी प्रकृति (nature ) है । जो आप प्रकृति से परे हैं, तो हिमालय पर तपस्या क्यों और  कैसे? प्राणियों की इन्द्रियों से सम्बंधित हर वास्तु प्रकृतिजन्य ही है । अधिक कहने से क्या प्रयोजन ? मैं प्रकृति हूँ, और आप पुरुष हैं । आप निराकार निर्गुण हैं और मेरे अनुग्रह से ही आप साकार सगुण होते हैं । आप इन्द्रियों को जीत कर जितेन्द्रिय कहलाते हैं, किन्तु इन्द्रियां मुझसे हैं । प्रकृति अधीन ही आप सब लीलाएं करते हैं । यदि आप प्रकृति से परे हैं, तो मेरे यहाँ रहने से आपको भय कैसा ?

इससे आगे शंकर जी तर्क न कर सके । उन्होंने हिमवान को घर जाने की अनुमति दे दी , और बोले कि हे गिरिजे, यदि तुम ऐसा कहती हो, तो प्रतिदिन मेरी शास्त्र सम्मत विधि से पूजा करो । हिमवान प्रतिदिन वहां आते और पार्वती शंकर जी की विधिसम्मत रूप से आराधना पूजा करतीं ।

इसी बीच ब्रह्मा जी की आज्ञा से इंद्र ने कामदेव को (दक्ष की पुत्री रति कामदेव की पत्नी हैं) शिव के पास भेजा, किन्तु जब कामदेव के वाण से शिव का ध्यान टूटा तो उनकी क्रोधमयी तीसरी दृष्टि से कामदेव पल में भस्म हो गए । रति ने शिव जी की बड़ी स्तुति की और कहा कि मेरे पति यहाँ अपने किसी स्वार्थ वश नहीं आये थे । वे तो देवताओं के कल्याण हेतु आपके और पार्वती जी के ब्याह के लिए अपना धर्म पूर्ण करने आये थे  ।तब शिव जी ने कहा कि भले ही मंतव्य शुभ हो, किन्तु कर्म तो अशुद्ध था, और मन भी उस समय अपने "काम्वेग के बाण" की शक्ति पर गर्वित था । इसलिए कामदेव कोयाह दैहिक क्षति हुई । लेकिन शुभ लक्ष्य होने से उन्होंने बड़ा सौभाग्य भी अर्जित किया है कि वे साक्षात श्री कृष्ण को अपने पिता के रूप में प्राप्त करेंगे । रति की प्रार्थना और निवेदन पर शिव जी ने वचन दिया की अब से कामदेव अनंग रहेंगे, और कृष्णावतार के समय कृष्ण और रुक्मिणी के पुत्र प्रद्युम्न के रूप में फिर से शरीर प्राप्त करेंगे ।

जारी ...

शुक्रवार, 19 अक्टूबर 2012

देवी कथाएँ 3


ब्रह्माण्डों  के होने से पूर्व , और ब्रह्माण्डों की समाप्तियों के बाद , जो दैवी शक्ति है (या रहती है) , वैष्णव इसे नारायण / नारायणी या राधकृष्ण का नाम देते हैं, तो शैव इन्हें सदाशिव और आदिशक्ति । ये सत चित और  आनंद हैं,  अव्यक्त, अचिन्त्य, अविकार्य हैं ।

जब शिव और शिवा के मन में यह इच्छा आई कि  सञ्चालन को एक और पुरुष हो, तो एक सत्त्वगुणी पुरुष का प्रादुर्भाव हुआ, जो व्यापक होने से "विष्णु" कहलाये ।वे तपस्या में विलीन हो गए, और उनके शरीर से अनेक जलधाराएं (जल = नीर) फूटीं और आकाश जलमय हो गया । विष्णु ने (स्वयं) नीर में स्वयं के शेष (भाग) पर शयन किया , जिससे उनका नाम शेषशायी या नारायण भी हुआ । उनसे ही सभी तत्त्व,गुण , त्रिविध अहंकार तन्मात्राएँ,  पञ्च भूत, ज्ञानेन्द्रियाँ और कर्मेन्द्रियाँ प्रकटीं ।

फिर शेषशायी नारायण की नाभि से कमल उगा, जिसपर ब्रह्मा का प्राकट्य हुआ ।ब्रह्मा के तप पर चतुर्भुज विष्णु प्रकटे, जिन्होंने उन्हें ज्ञान दिया । बाद में किसी तर्क के समाधान के लिए उन दोनों के बीच महान ज्योतिर्लिंग प्रकट हुए, जिन के आदि अंत का पता वे दोनों न लगा सके । दोनों की प्रार्थना पर ज्योतिर्लिंग से उमाशिव प्रकटे । ब्रह्मा को सृष्टि करने और विष्णु को सृष्टि पालने का कर्म मिला ।

ब्रह्मा ने अंजुली भर कर जल उछाला जो अंडे की आकृति में फ़ैल गया और ब्रह्माण्ड उत्पन्न हुआ, किन्तु चेतन न हुआ । फिर श्रीविष्णु ने उस अंड में अनंत रूप में प्रवेश किया जिस से वह चेतन हुआ । किसी बात पर क्रुद्ध होकर रोते हुए ब्रह्मा के माथे से रूद्र प्रकट हुए ।

ब्रह्मा के शरीर से (दायें अंगूठे से) दक्ष प्रजापति प्रकट हुए, जिनकी संगिनी हुईं प्रसूति 

ब्रह्मा के कहने पर (रूद्र की अर्धांगिनी बनने के लिए)  दक्ष ने सदाशिव की चिर संगिनी आदिशक्ति, की 3 हज़ार  वर्षों तक, तपस्या और आराधना की और जब माँ प्रकट हुईं तो उनसे कहा "हे जगन्माते, हे जगदम्बिके । सदाशिव ने ब्रह्मा पुत्र के रूप में (रूद्र) अवतार लिए है  । उनकी संगिनी होने के लिए आप मेरे घर पुत्री रूप में पधारें" । माँ ने उन्हें वरदान दिया की मैं तुम्हारी पुत्री तो बनूंगी, किन्तु यदि तुमने कभी भी मुझे अप्रसन्न किया, तो मैं तुरंत तुम्हारी दी हुई देह त्याग दूँगी । दक्ष ने यह शर्त स्वीकार की , और समय के साथ उनके घर में माँ ने सती के रूप में जन्म लिया ।

पति को पाने के लिए ताप करने के बाद सती का ब्याह शिव से हुआ , और एक बार शिव जी के साथ विहार करते सती ने श्री राम को सीता की खोज में पागलों की तरह रोते बिलखते देखा । सती माँ के मन में आया की मेरे पति जिन राम को ईश्वर मानते हैं, वे स्त्री के लिए ऐसे मोहित हैं ? और उन्होंने समयक्रम में श्री राम की परीक्षा लेने के लिए सीता का रूप लिया और उनके सामने गयीं । श्री राम उन्हें तुरंत पहचान गए और पूछा कि हे माते, आप यहाँ वन में अकेली क्या कर रही हैं , शम्भू कहाँ हैं । इसपर सती ने राम की सत्यता जान ली किन्तु दिव्य दृष्टि से यह सब जान लेने पर शिव शम्भू अपने आराध्य की पत्नी का रूप ले चुकी सती को पत्नी रूप में न देख पाए । सती मन में यह जान गयीं और उदास रहने लगीं ।

समयक्रम में  दक्ष ने एक यज्ञ आयोजित किया, जिसमे उन्होंने शिव को नहीं बुलाया । बिना बुलाये भी सती वहां जाना चाहती थीं और शिव जी के समझाने के बाद भी वे गयीं । वहां उन्हें बड़ा अपमानित महसूस हुआ, पिता और बहनों ने उन्हें मान न दिया,  और सिर्फ माँ ने ही उन्हें प्रेम और सम्मान दिया । यज्ञ में सब देवताओं के भाग थे, किन्तु शिव जी का न था, जिस पर सती माँ ने आपत्ति की और दक्ष ने शिव जी के लिए बड़े अपशब्द कहे । इससे कुपित होकर सती वहीं योगाग्नि में दक्ष से जन्मी अपनी देह को त्याग दिया ।

यह जान लेने पर शिव जी ने वीरभद्र को वहां भेजा, जिन्होंने यज्ञ ध्वंस कर दिया और दक्ष की गर्दन काट दी । शिव जी सती के जले हुए शरीर को हाथों में उठाये यहाँ वहां भटकने लगे  ।उनके मोह को तोड़ने के लिए विष्णु जी ने सुदर्शन चक्र से सती माँ के शरीर के टुकड़े कर दिए , जो धरती पर अलग अलग जगह गिरे ।

जिस जगह माँ की "जीभ" गिरी, वहां से अग्नि की जिव्हायें हमेशा निकलती रहती हैं, और वह स्थान ज्वालादेवी के नाम से प्रसिद्द है । मुग़ल सम्राट अकबर ने इस आग को बुझाने के लिए कई प्रयास किये, वहां मोटे मोटे लोहे ले ढक्कन भी ठोके गए, जिन सब को पिघला कर ज्वाला फिर ऊपर आ गयी । बाद में अकबर ने समझा, और प्रायश्चित्त के रूप में वहां सोने का छत्र चढ़ाया ।

किन्तु माना जाता है की माँ ने यह स्वीकार नहीं किया, क्योंकि वह एक अनजानी धातु में परिवर्तित हो गया ।

जय माता दी ।

गुरुवार, 18 अक्टूबर 2012

देवी की कथाएँ 2


नवरात्र पर्व के तीसरे दिन माँ को मेरा प्रणाम पहुंचे ।

आज वैष्णो देवी धाम से जुडी दो कथाएँ कहती हूँ । फिर एक बार दोहरा दूं, कि कथा मेरी नहीं है । जो जानती हूँ, बड़ों से सुना है - बस दोहरा भर रही हूँ ।

1.
कहते हैं कि त्रेता युग में दुष्ट राक्षसों से परेशान देवताओं की रक्षा के लिए एक दैवीय कन्या का अवतरण हुआ, जो "त्रिकुटा" कहलाई । उस कन्या ने वैष्णव धर्म का प्रसार किया , और कालान्तर में "वैष्णो" कहलाई । बाद में पिता की आज्ञा लेकर वे तपस्या को चली गयीं, और श्री विष्णु जी की आराधना करने लगीं । 

तब रामावतार का समय था । श्री राम अपनी पत्नी श्रीसीता जी की खोज में वहां पहुंचे, और उन्होंने त्रिकुटा से अपना नाम और तपस्या का उद्देश्य पूछा । तब उन्होंने श्री राम को बताया कि वे उन्हें मन से पति रूप में स्वीकार कर चुकी हैं , और उन्हें प्राप्त करने के लिए तपस्या कर रही हैं । श्री राम ने उस अवतार में एक पत्नीव्रत धारण किया था । फिर भी, उनके ताप को निरुद्देश्य न जाने देने के भाव से, श्री राम ने उन्हें कहा कि वे बदले रूप में उनके सम्मुख आयंगे और यदि वे उन्हें पहचान सकीं, तो उन्हें स्वीकार कर लेंगे । 

बाद में श्रीलंका से लौटते हुए श्री राम त्रिकुटा के आगे एक वृद्ध सन्यासी के रूप में आये, जब वे उन्हें न पहचान सकीं  । तब अपने असल रूप में आकर श्री राम ने उन्हें आशीर्वाद दिया कि वे कलियुग में कल्कि अवतार के रूप में प्रकट होंगे, और तब उनसे विवाह करेंगे । तब तक वे हिमालय के त्रिकूट पर्वत पर रहें , और भक्त जनों की मनोकामनाएं पूर्ण करें ।

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2.
श्रीधर नामक एक ब्राह्मण, श्री वैष्णो देवी के बहुत बड़े भक्त थे । वह कटरा के पास हंसाली नामक गाँव में रहते थे । एक बार माँ ने उन्हें एक सुन्दर कन्या के रूप में दर्शन दिए, और "भंडारा" करवाने के लिए कहा । ( भंडारा का अर्थ है भक्तों को भोजन करवाना) । श्रीधर धनवान नहीं थे, न ही उनमे भोज करवाने की आर्थिक क्षमता थी । किन्तु माँ के आदेश को सर माथे पर लेकर उन्होंने गाँव के सभी वासियों को आमंत्रित किया । 

उस समय वहां भैरवनाथ नामक एक तांत्रिक वास करते थे । श्रीधर जी ने उन्हें भी बुलाया, और उन्होंने चेतावनी दी कि उन्हें संतुष्ट न कर सकने का परिणाम बुरा होगा । श्रीधर के पास धन तो था नहीं , वे भोज को लेकर बड़े चिंतित थे । तब माँ उनके सामने फिर से प्रकट हुईं, और कहा कि वे चिंतित न हों, वे स्वयं सारा प्रबंध करेंगी । और ऐसा ही हुआ भी । श्रीधर जी की छोटी सी झोपडी में माँ ने 360 व्यक्तियों को बैठाया भी, और भरपेट भोजन भी परोसा । 

भोज में भैरवनाथ ने कहा कि  वे तो तांत्रिक हैं, और निरामिष भोजन उन्हें स्वीकार्य नही। उन्हें तो मांस आदि ही चाहिए। किन्तु कन्या ने इनकार करते हुए कहा कि वैष्णव भोज में सिर्फ सात्विक भोजन ही परोसा जाएगा, तामसिक भोजन नहीं । इस पर क्रोधित होकर तांत्रिक ने अपनी चेतावनी याद दिलाते हुए श्रीधर को डराया , और उसकी रक्षक कन्या पर हमला किया ।

ध्यान देने की बात है कि कई सम्प्रदायों में देवी के आगे पशुबलि का प्रचालन है - जिसका हम पुरजोर विरोध करते हैं । यहाँ माँ का भैरवनाथ को मांसाहार के लिए इनकार उसी विरोध का प्रामाणीकरण है मेरी नज़र में । भैरंव्नाथ तांत्रिक पद्धति के अनुगामी थे और देवी के आगे पशु बली के समर्थन की बात है यह मांसाहार की मांग ।

देवी जानती थीं कि भैरवनाथ एक भक्त है, और वे उसका वध नहीं करना थीं । वे वहां से त्रिकूट पर्वत की तरफ चली गयीं । भैरंव उनका पीछा करने लगा । 

** माँ ने उसकी तरफ एक बाण चलाया, जो धरती में धंस गया और वहां से "बाणगंगा" प्रकट हुई । कहते हैं कि बाणगंगा में स्नान करने वाले भक्त के सारे पाप धुल जाते हैं । नदी के किनारे पर माँ की "चरणपादुका" के निशान हैं ।

** फिर माँ यहाँ से आगे बढीं, और अर्धक्वारी के पास "गर्भ गुफा" में छुप गयीं । यहाँ वे नौ महीने तक रहीं । कहा जाता है कि इस बीच रामभक्त श्री बजरंगबली गुफा के बाहर पहरा देते रहे । 

[** इससे कुछ ऊपर और बढ़ने पर "सांझी छत" आता है , और आखिर में माँ की टेकरी आती है । ]

** यहाँ से निकल कर माँ और ऊपर को बढीं, और भैरंव के हमले करते रहने से उन्हें महा काली का रूप लेना पडा, और माँ ने भैरंव का वध कर दिया । 

सर कट जाने पर कटे हुए सर ने माँ से कहा कि वे जानते थे की माँ कौन हैं, और उन्होंने यह सब इसलिए किया , जिससे माँ के हाथों से मृत्यु होने पर उन्हें मोक्ष मिल जाए । किन्तु उन्होंने दुःख प्रकट किया कि माँ के भक्त उन्हें हमेशा इस शैतानी रूप के ही लिए याद करेंगे । 

इस पर माँ ने उन्हें वचन दिया , कि जो भक्त मेरे दर्शन को आयेंगे, उनके दर्शन तभी सम्पूर्ण माने जायंगे जब वे भैरंवनाथ के स्थान पर भी जाकर दर्शन करेंगे । आज भी भक्त वैष्णो माँ के दर्शनों के बाद भैरंवानाथ के दर्शनों को जाते हैं । 

फिर माँ पिंडियों के रूप में परिवर्तित होकर तपस्यारत हो गयीं । इधर माँ के इंतज़ार में अधीर श्रीधन ने स्वप्न में देखे हुए रास्ते पर उन्हें खोजना शुरू किया, और आखिर पिंडियों तक पहुँच गए । तब से श्रीधर पंडित और उनके वंशज यहाँ पूजा आराधना करते हैं ।
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आभार । जय माता दी ।

बुधवार, 17 अक्टूबर 2012

नवरात्र व्रत कथा : देवी कथाएँ 1


यह कहानी मेरी नहीं है ।

यह नवरात्र व्रत कथा व्रत करने वाले लोग आपस में एक दूसरे से कहते हैं । कहते हैं कि यह कथा बृहस्पति जी के पूछने पर ब्रह्मा जी ने उन्हें सुनाई थी

पीठत नाम के गाँव में अनाथ नामक एक ब्राह्मण रहता था । अवह भगवती दुर्गा का भक्त था और रोज़ उनकी पूजा मिया करता था । उस ब्राह्मण की सुमति नामक एक बेटी थी , जो रोज़ पिता की पूजा में शामिल होती थी।

एक दिन अपनी सहेलियों से खेलने लगी और समय का भान न होने से पूजा में नहीं आई । इस बात पर पिता अत्यधिक क्रुद्ध हुए, और उसे कहा, की हे दुष्ट पुत्री, तूने आज भगवती का पूजन नहीं किया, जिसके लिए मैं किसी कुष्ठी दरिद्र से तेरा ब्याह करूंगा ।

सुमति को बहुत दुःख हुआ, और उसने कहा, हे पिताजी, आपकी कन्या होने से मैं सब तरह से आपके अधीन हूँ । आप जिससे चाहें मेरा ब्याह कर सकते हैं, किन्तु होगा वही जो मेरे भाग्य में लिखा होगा । यह सुन कर पिता का क्रोध और बढ़ गया , जैसे आग में सूखे तिनके पड रहे हों  हो । उसने बेटी का ब्याह एक दरिद्र कुष्ठ रोगी से कर दिया ( यह कथा में है ) ।

वह रात उन दोनों ने जंगल में बड़े दुःख तकलीफ से गुजारी । उसकी ऐसी दशा देख भगवती पूर्व कर्म प्रताप से प्रकट हुईं , और उस से कहा, कि हे दीन ब्राह्मणी, मैं तुझ पर प्रसन्न हूँ, जो माँगना हो मांग ले । सुमति के पूछने पर देवी ने बताया की मैं ही आदि शक्ति माँ हूँ, ब्रह्मा, विद्या और सरस्वती हूँ । तुझ पर मैं पूर्व जन्म के पुण्य से प्रसन्न हूँ ।

पिछले जन्म में तू निषाद की स्त्री थी, और अति पतिव्रता थी । एक दिन तेरे पति निषाद ने चोरी की , और सिपाहियों ने तुम दोनों को जेलखाने में बंद कर दिया । वहां उन्होंने तुम दोनों को खाने को भी न दिया । तब नवरात्र  के दिन थे , और तुम दोनों का नौ दिन का व्रत हो गया। उस व्रत के प्रभाव से मैं तुम्हे मनोवांछित वास्तु दे रही हूँ, मांगो । तब सुमति ने अपने पति को स्वस्थ्य करने की कामना की । देवी ने उसे एक दिन के व्रत के प्रभाव को अर्पित करने को कहा, और सुमति ने "ठीक है" कहा । तुरंत ही उसका पति निरोगी हो गया और उन दोनों ने देवी की अत्यधिक स्तुति की । इसके पश्चात "उदालय"नामक पुत्र शीघ्र प्राप्त होने का आशीष देकर और व्रत विधि बता कर देवी अंतर्ध्यान हो गयीं । 

गुरुवार, 27 सितंबर 2012

शहीदे आज़म भगत सिंह जी

शहीदे आज़म श्री भगत सिंह जी
shaheed martyr shri bhagat singh ji


आज शहीदे आज़म भगत सिंह जी का जन्म दिन है । इनका जन्म 27 सितम्बर 1907 को नवांशहर पंजाब में हुआ था ।

भगत सिंह भारत के एक स्वतंत्रता संग्राम के एक प्रमुख और मुखर सेनानी थे। उनका साहस आज के भारतीय युवकों के लिए एक बहुत बड़ा आदर्श है। इन्होंने केन्द्रीय संसद (सेण्ट्रल असेम्बली) में बम फेंककर भी भागने से मना कर दिया, और अपनी गिरफ़्तारी दी । जिसके फलस्वरूप इन्हें २३ मार्च, १९३१ को (आयु 23 बरस 5 महीने ) इनके दो अन्य साथियों, राजगुरु तथा सुखदेव के साथ फाँसी पर लटका दिया गया। हमारा भारत देश उनके बलिदान को आज भी बड़ी गम्भीरता से याद करता है । उनके जीवन और चरित्र पर कई हिन्दी फिल्में बनी हैं । कुछ फ़िल्में तो उनके नाम से बनाई गयीं हैं । मनोज कुमार की सन् १९६५ में बनी फिल्म शहीद भगत सिंह के जीवन पर बनायीं गयी फिल्म काफी प्रामाणिक फिल्म मानी जाती है।

भगत सिंह का जन्म 27 सितंबर, 1907, शनिवार सुबह ९ बजे लायलपुर ज़िले के बंगा गाँव (चक नम्बर १०५ जो अब पाकिस्तान में है) में हुआ था। ( कहीं कहीं इनकी जन्म तिथि 28 सितम्बर भी बताई गयी है ) उनका पैतृक निवास आज भी भारतीय पंजाब के नवाँशहर ज़िले के खटकड़कलाँ गाँव में स्थित है। उनके पिता का नाम सरदार किशन सिंह और माता का नाम विद्यावती कौर था , यह एक सिख परिवार था जिसने आर्य समाज को अपना लिया था।

लाहौर के नेशनल कॉलेज़ की पढ़ाई छोड़कर भगत सिंह ने भारत की आज़ादी के लिये नौजवान भारत सभा की स्थापना की । काकोरी काण्ड में राम प्रसाद 'बिस्मिल' सहित ४ क्रान्तिकारियों को फाँसी व १६ अन्य को कारावास की सजाओं से भगत सिंह उद्विग्न हुए , और उन्होंने १९२८ में अपनी पार्टी "नौजवान भारत सभा" का श्री चंद्रशेखर आज़ाद जी के "हिन्दुस्तान रिपब्लिकन ऐसोसिएशन" में विलय कर दिया और उसे एक नया नाम दिया "हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन"। इस संगठन का उद्देश्य सेवा,त्याग और पीड़ा झेल सकने वाले नवयुवक तैयार करना था। पहले लाहौर में साण्डर्स-वध और उसके बाद दिल्ली की केन्द्रीय असेम्बली में चन्द्रशेखर आजाद व पार्टी के अन्य सदस्यों के साथ बम-विस्फोट करके ब्रिटिश साम्राज्य के विरुद्ध खुले विद्रोह को बुलन्दी प्रदान की।

भगत सिंह ने राजगुरु के साथ मिलकर १७ दिसम्बर १९२८ को लाहौर में सहायक पुलिस अधीक्षक रहे अंग्रेज़ अधिकारी जे० पी० सांडर्स को मारा था। इस कार्रवाई में क्रान्तिकारी चन्द्रशेखर आज़ाद ने उनकी पूरी सहायता की थी। क्रान्तिकारी साथी बटुकेश्वर दत्त के साथ मिलकर भगत सिंह ने अलीपुर रोड दिल्ली स्थित ब्रिटिश भारत की तत्कालीन सेण्ट्रल एसेम्बली के सभागार में ८ अप्रैल १९२९ को अंग्रेज़ सरकार को जगाने के लिये बम और पर्चे फेंके थे। बम फेंकने के बाद वहीं पर दोनों ने अपनी गिरफ्तारी भी दी।

भगत सिंह करीब १२ वर्ष के थे जब जलियाँवाला बाग हत्याकाण्ड हुआ था। इसकी सूचना मिलते ही भगत सिंह अपने स्कूल से १२ मील पैदल चलकर जलियाँवाला बाग पहुँच गये। इस उम्र में भगत सिंह अपने चाचाओं की क्रान्तिकारी किताबें पढ़ कर सोचते थे कि इनका रास्ता सही है कि नहीं ? गांधी जी का असहयोग आन्दोलन छिड़ने के बाद वे गान्धी जी के अहिंसात्मक तरीकों और क्रान्तिकारियों के हिंसक आन्दोलन में से अपने लिये रास्ता चुनने लगे। गान्धी जी के असहयोग आन्दोलन को रद्द कर देने के कारण देश के तमाम नवयुवकों की भाँति उनमें भी रोष हुआ और अन्ततः उन्होंने देश की स्वतन्त्रता के लिये क्रान्ति का मार्ग अपनाना अनुचित नहीं समझा। उन्होंने जुलूसों में भाग लेना प्रारम्भ किया तथा कई क्रान्तिकारी दलों के सदस्य बने। बाद में वे अपने दल के प्रमुख क्रान्तिकारियों के प्रतिनिधि भी बने। दल के प्रमुख क्रान्तिकारियों में चन्द्रशेखर आजाद, भगवतीचरण व्होरा, सुखदेव, राजगुरु, इत्यादि थे।

१९२८ में साइमन कमीशन के बहिष्कार के लिये भयानक प्रदर्शन हुए। इन प्रदर्शनों मे भाग लेने वालों पर अंग्रेजी शासन ने लाठी चार्ज भी किया। इसी लाठी चार्ज से आहत होकर लाला लाजपत राय की मृत्यु हो गयी। अब इनसे रहा न गया। एक गुप्त योजना के तहत इन्होंने पुलिस सुपरिण्टेण्डेण्ट स्काट को मारने की योजना सोची। सोची गयी योजना के अनुसार भगत सिंह और राजगुरु लाहौर कोतवाली के सामने व्यस्त मुद्रा में टहलने लगे। उधर बटुकेश्वर दत्तअपनी साइकिल को लेकर ऐसे बैठ गये जैसे कि वो ख़राब हो गयी हो । दत्त के इशारे पर दोनों सचेत हो गये। उधर चन्द्रशेखर आज़ाद पास के डी० ए० वी० स्कूल की चहारदीवारी के पास छिपकर घटना को अंजाम देने में रक्षक का काम कर रहे थे। १७ दिस्मबर १९२८ को करीब सवा चार बजे, स्काट की जगह, ए० एस० पी० सॉण्डर्स के आते ही राजगुरु ने एक गोली सीधी उसके सर में मारी जिसके तुरन्त बाद वह होश खो बैठा। इसके बाद भगत सिंह ने ३-४ गोली दाग कर उसके मरने का पूरा इन्तज़ाम कर दिया। ये दोनों जैसे ही भाग रहे थे कि एक सिपाही चनन सिंह ने इनका पीछा करना शुरू कर दिया। चन्द्रशेखर आज़ाद ने उसे सावधान किया - "आगे बढ़े तो गोली मार दूँगा।" नहीं मानने पर आज़ाद ने उसे गोली मार दी। इस तरह इन लोगों ने लाला लाजपत राय की मौत का बदला ले लिया ।

भगत सिंह यद्यपि रक्तपात के पक्षधर नहीं थे परन्तु वे कार्ल मार्क्स के सिद्धान्तों से प्रभावित थे। वे समाजवाद के पोषक भी थे। इसी कारण से उन्हें पूँजीपतियों की मजदूरों के प्रति शोषण की नीति पसन्द नहीं आती थी। लेकिन याद रखने की बात है कि "समाजवाद" और "साम्यवाद" अलग अलग धाराएं हैं, COMMUNISM एंड SOCIALISM ARE DIFFERENT - भगतसिंह जी ने कभी कम्युनिस्ट पार्टी को ज्वाइन नहीं किया | उनकी अपनी बनाई पार्टी का नाम भी "हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन" है,कम्युनिस्ट नहीं है ।  (The word socialist also appears in the preamble of our constitution) उस समय चूँकि अँग्रेज ही सर्वेसर्वा थे तथा बहुत कम भारतीय उद्योगपति उन्नति कर पाये थे, अतः अँग्रेजों के मजदूरों के प्रति अत्याचार से उनका विरोध स्वाभाविक था। मजदूर विरोधी ऐसी नीतियों को ब्रिटिश संसद में पारित न होने देना उनके दल का निर्णय था। सभी चाहते थे कि अँग्रेजों को पता चलना चाहिये कि हिन्दुस्तानी जाग चुके हैं और उनके हृदय में ऐसी नीतियों के प्रति आक्रोश है। ऐसा करने के लिये ही उन्होंने दिल्ली की केन्द्रीय एसेम्बली में बम फेंकने की योजना बनायी थी।

भगत सिंह चाहते थे कि इसमें कोई खून खराबा न हो और अँग्रेजों तक उनकी 'आवाज़' भी पहुँचे। हालाँकि प्रारम्भ में उनके दल के सब लोग ऐसा नहीं सोचते थे पर अन्त में सर्वसम्मति से भगत सिंह तथा बटुकेश्वर दत्त का नाम चुना गया। निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार ८ अप्रैल, १९२९ को केन्द्रीय असेम्बली में इन दोनों ने एक ऐसे स्थान पर बम फेंका जहाँ कोई मौजूद न था, अन्यथा उसे चोट लग सकती थी। पूरा हाल धुएँ से भर गया। भगत सिंह चाहते तो भाग भी सकते थे पर उन्होंने पहले ही सोच रखा था कि उन्हें दण्ड स्वीकार है चाहें वह फाँसी ही क्यों न हो; अतः उन्होंने भागने से मना कर दिया। उस समय वे दोनों खाकी कमीज़ तथा निकर पहने हुए थे। बम फटने के बाद उन्होंने "इंकलाब! - जिन्दाबाद!! साम्राज्यवाद! - मुर्दाबाद!!" का नारा लगाया और अपने साथ लाये हुए पर्चे हवा में उछाल दिये। इसके कुछ ही देर बाद पुलिस आ गयी और दोनों को ग़िरफ़्तार कर लिया गया।

जेल में भगत सिंह ने करीब २ साल रहे। इस दौरान वे लेख लिखकर अपने क्रान्तिकारी विचार व्यक्त करते रहे। जेल में रहते हुए उनका अध्ययन बराबर जारी रहा। उनके उस दौरान लिखे गये लेख व सगे सम्बन्धियों को लिखे गये पत्र आज भी उनके विचारों के दर्पण हैं। अपने लेखों में उन्होंने कई तरह से पूँजीपतियों को अपना शत्रु बताया है। उन्होंने लिखा कि मजदूरों का शोषण करने वाला चाहें एक भारतीय ही क्यों न हो, वह उनका शत्रु है। जेल में भगत सिंह व उनके साथियों ने ६४ दिनों तक भूख हडताल की। उनके एक साथी यतीन्द्रनाथ दास ने तो भूख हड़ताल में अपने प्राण ही त्याग दिये थे।

२३ मार्च १९३१ को शाम में करीब ७ बजकर ३३ मिनट पर भगत सिंह तथा इनके दो साथियों सुखदेव व राजगुरु को फाँसी दे दी गई । फाँसी पर जाने से पहले वे लेनिन की नहीं बल्कि राम प्रसाद 'बिस्मिल' की जीवनी पढ़ रहे थे । कहा जाता है कि जेल के अधिकारियों ने जब उन्हें यह सूचना दी कि उनके फाँसी का वक्त आ गया है तो उन्होंने कहा था- "ठहरिये! पहले एक क्रान्तिकारी दूसरे से मिल तो ले।" फिर एक मिनट बाद किताब छत की ओर उछाल कर बोले - "ठीक है अब चलो ।"

फाँसी पर जाते समय वे तीनों मस्ती से गा रहे थे -

मेरा रँग दे बसन्ती चोला, मेरा रँग दे;
मेरा रँग दे बसन्ती चोला। माय रँग दे बसन्ती चोला।।

फाँसी के बाद कहीं कोई आन्दोलन न भड़क जाये इसके डर से अंग्रेजों ने पहले इनके मृत शरीर के टुकड़े किये फिर इसे बोरियों में भरकर फिरोजपुर की ओर ले गये जहाँ घी के बदले मिट्टी का तेल डालकर ही इनको जलाया जाने लगा। गाँव के लोगों ने आग जलती देखी तो करीब आये। इससे डरकर अंग्रेजों ने इनकी लाश के अधजले टुकड़ों को सतलुज नदी में फेंका और भाग गये। [ अब यह कैसे माना जाए कि यह उनका शव था भी या नहीं - आखिर सुभाष बाबू की मौत को लेकर भी तो कई सवाल हैं | हमने बस मान लिया जो बताया गया :( ] जब गाँव वाले पास आये तब उन्होंने इनके मृत शरीर के टुकड़ो कों एकत्रित कर विधिवत दाह संस्कार किया । और भगत सिंह हमेशा के लिये अमर हो गये। इसके बाद लोग अंग्रेजों के साथ-साथ गान्धी को भी इनकी मौत का जिम्मेवार समझने लगे । इस कारण जब गान्धी कांग्रेस के लाहौर अधिवेशन में हिस्सा लेने जा रहे थे तो लोगों ने काले झण्डों के साथ गान्धीजी का स्वागत किया । एकाध जग़ह पर गान्धी पर हमला भी हुआ, किन्तु सादी वर्दी में उनके साथ चल रही पुलिस ने बचा लिया।

कहा जाता है कि जेल में रहने के दौरान भगतसिंह जी ने एक पत्र लिखा था "मैं नास्तिक क्यों हूँ" किन्तु ऐसा कोई सबूत नहीं है कि ऐसा कोई पत्र है भी | यह एक सोची समझी भ्रामक बात लगती है | इसी भ्रम को और अधिक मज़बूत बनाने के लिए उनकी पगड़ी को लाल रंग कर यह दिखाने के प्रयास करे जा रहे हैं की वे कम्युनिस्ट थे - जो सरासर झूठ है । इस  के बारे में अपने विचार रखते हुए जल्द ही एक पूरी पोस्ट लिखूंगी ।

भगत सिंह को विश्वास था कि उनकी शहादत से भारतीय जनता और उद्विग्न हो जायेगी और ऐसा उनके जिन्दा रहने से शायद ही हो पाये । इसी कारण उन्होंने मौत की सजा सुनाने के बाद भी माफ़ीनामा लिखने से साफ मना कर दिया था। पं० राम प्रसाद 'बिस्मिल' ने अपनी आत्मकथा में जो-जो दिशा-निर्देश दिये थे, भगत सिंह ने उनका अक्षरश: पालन किया। कहा जाता है कि उन्होंने अंग्रेज सरकार को एक पत्र भी लिखा, जिसमें कहा गया था कि उन्हें अंग्रेज़ी सरकार के ख़िलाफ़ भारतीयों के युद्ध का प्रतीक एक युद्धबन्दी समझा जाये तथा फाँसी देने के बजाय गोली से उड़ा दिया जाये।

आज भी भारत और पाकिस्तान की जनता भगत सिंह को आज़ादी के दीवाने के रूप में देखती है जिसने अपनी जवानी सहित सारी जिन्दगी देश के लिये समर्पित कर दी।

भगत सिंह जी के जन्म दिवस पर उन्हें प्रणाम, नमन ।

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In reference to a comment by Shri Gaurav Rajasthan ka: 

इस लेख में लिखी जानकारी इन्टरनेट से ली गयी है।  जहां तक मेरी जानकारी है, ये जानकारियाँ सही हैं .

लेकिन यह एक प्रामाणिक जीवनी नहीं बल्कि मेरी तरफ से मेरे आदर्श व्यक्तित्व को एक निजी श्रद्धांजलि है।  

सन्दर्भ : विकिपीडिया और अन्य अंतरजाल स्रोत