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सोमवार, 12 नवंबर 2012

उपनिषद सन्देश 1 - प्रस्तावना 1

सभी को दीपोत्सव की हार्दिक शुभेच्छाएं , बधाईयाँ । यह पर्व आपके जीवन में रौशनी, सुख, शान्ति और सौहार्द्र की सौगात लाये
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आज से उपनिषदों पर यह शृंखला आरम्भ कर रही हूँ - कितनी नियमित रह पाऊंगी, पता नहीं ।

प्रस्तावना 1

भारत के इतिहास में, आत्म उत्थान के प्रयासों में , दर्शनशास्त्र, तत्त्वविज्ञान आदि के क्षेत्रों में , उपनिषदों के प्रबल प्रभाव रहा है । अलग अलग समयखंडों में, अनेक प्रकार के लोगों को, विविध प्रकार के कारणों से , उपनिषद अपनी अद्वितीय विविधता से आकर्षित करते रहे हैं । ये अगोचर, अव्यक्त, अप्रत्यक्ष, अविकारी परम सत्य के विषय में हमें सम्यक रूप से जानकारी देते हैं । मानव अस्तित्व, दर्शन, और धर्म के बारे में इनसे बेहतर ज्ञान देय, या इनके समानान्तर भी, इस जगत के किसी और ग्रन्थ / साहित्य आदि में मिलना असंभव सा लगता है ।

इन्हें कहने वाले निष्कपट महात्माओं के बारे में निर्विवाद छवि यही है कि इन्होने सत्य की खोज में ध्यानमग्न होकर परमसत्य को जाना और आत्मसात किया है, तब ही ये बातें कही हैं । वे इस व्यतीत होते  क्षणभंगुर संसार के पीछे के सत्य नित्य संसार को, ( जो है, किन्तु अव्यक्त है, अचिन्त्य है ) हम पर अभिव्यक्त करने के प्रयास करते हैं । वह संसार प्रतीत तो ऐसे होता है जैसे सिर्फ एक सुदूर संभावना हो, किन्तु वह हर सांसारिक सच्चाई को टिमटिमाता दिया सा दर्शा देने वाला सौर्य तेज सा प्रखर परम सत्य है ।  सैद्धांतिक स्पष्टीकरण की आध्यात्मिक जिज्ञासा , मुक्ति और सत्य की लालसा , प्रबुद्ध मन और आत्मा के उत्थान का पथ हैं हमारे दिव्य उपनिषद ।

यदि उपनिषद हमें इस स्थूल अस्तित्व से ऊपर उठाने का सन्देश दे रहे हैं, तो इसके पीछे कारण हैं वे महान लोग, जो हमेशा दिव्यता की और उद्यमरत रहे । उपनिषदों का आदर सिर्फ इसलिए नहीं है कि ये "श्रुति" का हिस्सा हैं । बल्कि यह इसलिए वन्दनीय एवं श्रद्धेय हैं , कि ये पीढ़ियों से सत्य मार्ग के पथिकों को प्रेरित करते रहे हैं, उन्हें राह दर्शाते रहे हैं । इनका महत्त्व अक्षय और अटूट है । भारतीय विचारधारा पथ प्रदर्शन के लिए हमेशा इन प्रकाश्पुन्जों की और देखती रही है । देखने और खोजने में मन रखने वालों के लिए ये परमज्ञान का स्रोत हैं ।

"उपनिषद्" शब्द को ज्ञानी महापुरुष जन अलग अलग व्याख्याएं देते हैं  ।
एक व्याख्या है : उप = near +नि = down +षद=sit  = sitting down near
तो दूसरी है : षद = loosen / reach /destroy , जिसमे 'उप' और 'नि' उपसर्ग रूप में जुड़े हैं  : वह ब्रह्म ज्ञान जिससे अन्धकार और अज्ञान विनष्ट हो जाए ।

उपनिषदों के लिए वेदांत शब्द भी प्रयुक्त होता रहा है, जिसका शाब्दिक का अर्थ है "वेदों के अंत में आने वाले" । वेदों में अन्तर्निहित ज्ञान और विज्ञान का निष्कर्ष हैं ये महान सन्देश । चार वेद हैं : ऋग्वेद , यजुर्वेद , सामवेद और अथर्व वेद । प्रत्येक में संहिताएं, ब्राह्मण, आरण्यक, और वेदान्त उपनिषद् हैं । जहां मन्त्र और ब्राह्मण "कर्म" काण्ड पर जोर देते हैं, वहीँ उपनिषद् "ज्ञान" काण्ड पर । वेदों में देवताओं की स्तुतियाँ हैं : इंद्र, सूर्य, सोम, अग्नि, द्यौस , मारुत, पृथ्वी , वायु, मित्र, वरुण, विष्णु, अश्विन, आदि जो प्राकृतिक शक्तियों के अधिष्ठाता देव हैं । इसके अतिरिक्त, अमूर्त भाव - जैसे श्रद्धा, मन्यु आदि, की भी स्तुतियाँ हैं । विद्या प्राप्त कर चुके शिष्य को परीक्षित करने के उपरांत गुरु द्वारा वेदान्त की गुप्त शिक्षा मिलती थी । यह विज्ञान सिर्फ वह सीख सकता था जो विशुद्ध ज्ञानपिपासु होता । प्रार्थनाएं, शुद्ध ज्ञानार्जन , त्याग बलिदान के कर्म (काण्ड) ये सब सीख लेने के बाद जब पात्र सत्य प्राप्ति का सच्चा पात्र बन सके, तब ही वह उपनिषद् सीखने की स्थिति में आता था ।

उपनिषद 200 से अधिक कहे जाते हैं,  लेकिन भारतीय परम्परा के अनुसार ये 108 कहे गए हैं । वैदिक सन्दर्भों में इन्हें श्रुति या प्रकट सत्य कहा  गया है । ये सनातन, स्मरणातीत, और कालातीत हैं । इन्हें परमात्मा के श्वास से ऋषियों को गोचर हुआ कहा गया है - जिन्होंने अपने देखे हुए "सत्य" को शब्दों में प्रकट किया, जिससे ये "ऋचा" कहाए । ये साधारण दृष्टि से दृश्य नहीं है, न ही ध्यान या सोच विचार से पहुंचे गए निष्कर्ष हैं । ये असंदिग्ध प्राकट्य हैं उन "सत्य" का , जो महान ऋषियों ने दिव्य दृष्टि से प्रत्यक्ष दृष्टिगोचर किये (देखे) और शिष्यों से कहे। ये व्यवस्थित सोच से निकाले गए निष्कर्ष नहीं , बल्कि आत्मिक प्रकाश के वाहक हैं । ये हमें एक समृद्ध और विविध आध्यात्मिक अनुभव देते हैं,  सिर्फ एक अमूर्त दार्शनिक श्रेणी का काल्पनिक विचरण भर नहीं । परम का सत्यापन व्यक्तिगत अनुभव, और तर्क दोनों ही कसौटियों पर हुआ है । उद्देश्य सिर्फ काल्पनिक नहीं, बल्कि व्यावहारिक है । ब्रह्म विद्या सिर्फ एक "दर्शन" भर नहीं, बल्कि जीवन का तरीका होना ही ज्ञान का उद्देश्य जाना गया है ।

गुरुवार, 25 अक्टूबर 2012

फेसबुक और ब्लॉगिंग

उफ़ यह फेसबुक
यह निखट्टू ब्लोगिंग
काम धरे रह जाते सारे
हो न पाती जॉगिंग :( :(

कंप्यूटर पर आते
करने को दो काम
फेसबुक अपडेट देखते
जाने कब हो जाती शाम

काम धरे रह जाते सारे
कुर्सी से फेविकोल का जोड़
फेसबुक और ब्लोगिंग ने
बना लिया गठजोड़

ट्रेडमिल बुला रही
बीप - बीप आवाजें मार
हम उसको कह रहे
तनिक ठहरो न यार  :)

"प्रोग्राम" काम का आधा ही बस
टाईप हुआ धरा है
रोज़ लगे कल पूरा होगा
बचा बस ज़रा ज़रा है

फिर आती सिस्टम पर
बैठकी लगाने
और समय बर्बाद करती
फेसबुक के बहाने ....
:) :)
:( :(

मंगलवार, 23 अक्टूबर 2012

नवरात्र : श्री दुर्गा सप्त शती और मधु कैटभ कथा

सभी को महानवमी की शुभकामनायें 

श्री दुर्गा सप्तशती हिंदी में - गीतापेस - पढने के लिए लिंक क्लिक करें 


आज महानवमी के शुभ दिन एक और कथा बांचते हैं  :)

प्राचीन समय में सुरथ नाम के एक राजा थे । ये राज्य के प्रति उदासीन थे, जिसका लाभ उठा कर शत्रुओं ने इनके राज्य पर हमला किया । लोभवश राजा के विश्वासपात्र मंत्री भी शत्रुओं से मिल गए, और राजा सुरथ की पराजय हुई । राज का मन अपने मंत्रियों के इस विश्वासघात से बहुत खिन्न था, और वे तपस्वी वेश में वन में वास करने लगे, किन्तु उनका मोह उन्हें कष्ट देता रहा ।

वन में उनकी भेंट समाधि नामक एक वणिक से हुई, जो अपने स्त्री और पुत्रों के दुर्व्यवहार से दुखी हो वहां रह रहा था । दोनों का परस्पर परिचय हुआ और एक दूसरे को उन्होंने अपनी कथा सुनाई । तब दोनों आपस में चर्चा करने लगे कि जिनके लिए मानव इतना मरता खपत है, जब वे ही अपने न हुए, तो मन को शान्ति कैसे मिलेगी ?

वे दोनों महर्षि मेधा की शरण में गए । महर्षि मेधा ने उनसे आने का कारण पूछा और उन्होंने अपने मन के अशांत होने के और इसके कारणों के विषय में उन्हें बताया । उन्होंने कहा कि हमारे स्वजनों ने हमें अपमानित किया, धोखा दिया फिर भी हमारा उनकी और मोह नहीं छूट पाटा - इसका कारण या है ? तब ऋषिवर ने उन दोनों को माता की आराधना करने को कहा और उनको माँ के वैभव की अनेक गाथाएं सुनाईं ।

इनमे से कई कथाएं पिछले नौ दिनों में हम सब पढ़ते आये हैं । आज मधु कैटभ वध की कथा पढ़ते हैं ।
"
राजा सुरथ ने पूछा : भगवन ! वह देवी कौन हैं जिन्हें आप महामाया कहते हैं ? उनके बारे में विस्तार से हमें बताइये प्रभु ।
महर्षि मेधा ने कहा " राजन ! वे तो नित्यस्वरूपा हैं, जिनसे संसार रचा गया है । फिर भी उनकी उत्पत्ति बारम्बार अनेक कारणों से प्रकार से होती है ।
एक बार भगवान् विष्णु क्षीर सागर शेष शैया पर योगनिद्रा में थे । संसार विलीन हो चूका था और धरती आदि सब कुछ चिर जल में जलमग्न हो चुका था । तब मधु कैटभ नामक दो दैत्य उनके कर्ण कुहरों से प्रकट हुए । वे श्री विष्णु के नाभि कमल पर स्थित ब्रह्मा जी को मारने दौड़े । ब्रह्मा जी जानते थे कि इन दोनों महाबलवान दैत्यों से सिर्फ विष्णु जी ही मुझे बचा सकते हैं । तब ब्रह्मा जी ने विष्णु जी की आँखों में बसने वाली योगनिद्रा से प्रार्थना की, तो वे स्त्री रूप में श्री विष्णु की आँखों से बाहर आ गयीं । मधु कीटाभ की मृत्यु सिर्फ श्री विष्णु के हाथों ही होनी थी । उन्होंने वर माँगा की यह जल में / जल पर न हो , क्योंकि सब और जल था, तो उन्होंने सोचा कि इस तरह हम बच जायेंगे । लेकिन श्री विष्णु ने उन्हें जाँघों पर लेकर उनका वध किया ।
फिर श्री महर्षि मेधा ने महिषासुर, चंड मुंड, रक्तबीज, और शुम्भ निशुम्भ वध की कथाएँ सुनाईं ।

यह सब उपाख्यान सुनकर सुरथ और वणिक  के मन शांत हुए, तब महर्षि ने उन्हें माँ की उपासना विधि बताईं । वे दोनों नदी के तट पर जाकर तपस्या करने लगे । तीन वर्ष बाद देवी ने उन्हें दर्शन और आशीर्वाद दिए । वणिक ने सांसारिक मोह से मुक्त हो कर आत्मचिंतन में मन लगाया और राजा सुरथ ने शत्रुओं को हरा कर अपना खोया राज्य वापस प्राप्त कर लिया । 

सोमवार, 22 अक्टूबर 2012

देवी कथाएँ 6 महिषासुर, शुम्भ निशुम्भ वध

पिछले भागो से आगे । अन्य भाग पढने के लिए ऊपर "पुराणों की कथाएँ" tab क्लीक करें ।

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महिषासुर वध 

रम्भासुर नामक दैत्य का महिषासुर नामक पुत्र था, जिसने अथक तपस्या कर ब्रह्मा जी को प्रसन्न किया, और उनसे वरदान लिए कि वह सिर्फ एक स्त्री के ही हाथों से मारा जा सकेगा । वरदान प्राप्त करने के बाद वह सभी देवताओं को परास्त कर इन्द्रासन पर चढ़ बैठा । देवता ब्रह्मा जी और विष्णु जी सहित शिव जी के पास आये । सब सुन कर शिव जी क्रोधित हुए  । शिव के क्रोधित मुखमंडल से एक तेज निकला, और तब ब्रह्मा जी और विष्णु जी सहित सब देवताओं से तेज उत्पन्न हुआ, जिसने स्त्री वेश धारण किया , जो दुर्गा देवी थीं ।  देवताओं ने अति हर्षित हो कर उन महाकाली को आयुध एवं आभूषण आदि प्रदान किये । शिव जी ने उन्हें अपना त्रिशूल दिया, विष्णु जी ने चक्र तो इंद्र ने वज्र ।

आयुध व् आभूषणों से सुसज्जित चंडिका ने परम अट्टहास किया जिसकी गर्जना सुन महिषासुर अपनी सेना ले युद्ध करने पहुंचा । राक्षसों ने वाण चलाने आरम्भ किये तो माँ ने सांस छोड़ी जिससे असंख्य सैनिक प्रकट हो राक्षसों से युद्ध करने लगे । माँ का वाहन सिंह गरज गरज कर सब और असुरों को मारने लगा । देवी ने असंख्य सैनिक संहार दिए और महिषासुर के दैत्य सेनापति भी मारे गए । तब महिषासुर भैंसे और फिर सिंह के रूप में परिवर्तित हुआ । देवी ने उसका गला काट दिया, तो असुर फिर अपने रूप में आकर दौड़ा । फिर वह हाथी में बदला, जिसकी माँ ने सूंड काट दी । आखिर फिर से भैसा बन कर जब महिषासुर हमला करने आया तो माँ उस के ऊपर चढ़ गयीं और इस बार गर्दन काटने पर जब वह भैसे के मुंह से निकलने लगा तो देवी ने उसकी ग्रीवा में त्रिशूल मार कर उसे संहारा ।

बची हुई असुर सेना भाग गयी और देवताओं गन्धर्वों ने देवी की विनयपूर्वक महादुर्गा जी की स्तुति की ।
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चंड , मुंड, धूम्राक्ष , रक्तबीज , शुम्भ - निशुम्भ वध 

एक बार शुम्भ निशुम्भ नामक पराक्रमी दैत्यों से त्रिलोक कम्पायमान था । दुखी देवता जगज्जननी के पास पहुंचे, और उनकी स्तुति की । भवानी महेश्वरी ने उनसे आगमन का कारन पूछा , तब उन्होंने अपनी व्यथा कही । तब गौरी के शरीर से एक कुमारी प्रकट हुई जो शरीर कोष से निकली होने से कौशिकी भी कहलाई , और माता के शरीर से प्रकट होने से मातंगी भी कहलाई । देवताओं को आश्वस्त कर उग्रतारा देवी सिंह पर स्वर हो कर हिमालय के शिखर पर स्थित हुईं ।

शुम्भ निशुम्भ के दो सेवकों - चंड और मुंड ने उस सुन्दर देवी अम्बिका को देखा तो अपने स्वामियों को जाकर कहा की हे महाराज, हिमालय पर अद्वितीय सुन्दर कन्या सिंहारूढ़ है - और वह आप के योग्य है ।

मदांध असुरों ने सुग्रीव नामक दैत्य को उसे लिवा लाने भेजा, तो देवी ने कहा की हे दूत, मैं प्रतिज्ञाबद्ध हूँ की मैं सिर्फ उससे ही विवाह करूंगी जो मुझे युद्ध में परास्त कर सके । जब दूत ने यह बात अपने स्वामियों को बताई तो क्रोधित हो उन्होंने धूम्राक्ष से युवती को बाँध कर घसीट लेन की आज्ञा दी । किन्तु वहां आने पर महोग्रतारा ने सिर्फ "हम्म" स्वर भर से उसे राख कर दिया ।सैनिक भागने लगे । चंड , मुंड फिर आये तो माँ ने भृकुटी टेढ़ी की, जिसमे से महाकालिका प्रकट हुईं । चंड और मुंड का वध करने से महाकालिका चामुंडी कहलाईं । यह हो जाने के उपरांत शुम्भ निशुम्भ स्वयं युद्ध भूमि में आये  ।

तब श्री ब्रह्मा जी के शरीर से ब्राह्मी, विष्णु से वैष्णवी , महेश से महेश्वरी, और अम्बिका से चंडिका प्रकट हुईं। पल भर में सारा आकाश असंख्य देवियों से आच्छादित हो उठा । ब्राह्मणी ने अपने कमंडल से जल छिड़का जिस से राक्षस तेजहीन होने लगे, वैष्णवी अपने चक्र , महेश्वरी अपने त्रिशूल से, इन्द्रानी वज्र से और सभी देवियाँ अपने अपने आयुधों से  आक्रमण कर रही थीं । राक्षस सेना भागने लगी ।

तब रक्तबीज ने राक्षसों को धिक्कारा कि वे स्त्रियों से डर कर भाग रहे हैं ? रक्तबीज हमला करने आया, तो इन्द्राणी ने उस पर शक्ति चलाई जिससे उसका सर कट गया और रक्त भूमि पर गिरा । किन्तु पूर्व वरदान के प्रभाव से उस रक्त से फिर एक रक्तबीज उठ खडा हुआ और अट्टहास करने लगा । जैसे ही शक्तियां उसे मारतीं, उसके रक्त से और असुर उठ खड़े होते । जल्द ही असंख्य रक्तबीज सब और दिखने लगे ।

श्री चंडिका ने श्री काली से कहा कि इसका रक्त भूमि पर इरने से रोकना होगा, जिससे और रक्तबीज न जन्में । देवी काली ने कहा की आप सब इन्हें मारें, मैं एक बूँद रक्त भी भूमि पर न पड़ने दूँगी । और ऐसा ही हुआ भी, जल्द ही सारे नए रक्तबीज युद्ध में मारे गए । तब रक्तबीज समझ गया की काली उसे पुनर्जीवित नहीं होने दे रही हैं, तो वह चंडिका को मारने दौड़ा । तब चंडिका ने उसे मार दिया और काली ने रक्त को भूमि पर न गिरने दिया । देवता चंडिका की जयजयकार करने लगे । जयकार सुन कर शुम्भ ने निशुम्भ को हमले की आज्ञा दी ।

 निशुम्भ देवी से बोला , की हे मालती के पल्लव सी सुकोमल तन्धारिणी, तुम यह विकट युद्ध क्यों कर रही हो ? तब देवी ने उसे वाचालता छोड़ कर युद्ध को ललकारा । निशुम्भ पर उन्होंने वाण वर्षा की , और निशुम्भ ने उन पर । काली देवी ने करोडो दैत्य संहार दिए, तब निशुम्भ उन पर लपका । उसके सभी आयुधों को काट कर देवी ने उसका वध कर दिया ।

भाई को गिरता देख शुम्भ देवी से युद्ध करने बढ़ा , तब चंडिका ने उसे भी त्रिशूल से संहारा । देवताओं ने पुष्पवर्षा करते हुए माँ की बड़ी स्तुति की ।

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जय माता दी  

रविवार, 21 अक्टूबर 2012

कथा 5 : शिव पार्वती विवाह


पिछले भाग से आगे
(बाकी भाग पढने के लिए ऊपर "पुराणों की कहानियाँ " tab क्लिक करें )

देवी रति को कामदेव के प्रद्युम्न रूप में लौटने के बारे में बता कर शिव जी वहां से अंतर्ध्यान हो गए । पार्वती बहुत दुखी हुईं और उन्होंने शिव जी को प्राप्त करने के लिए पंचाक्षरी नाम जाप के साथ तपस्या करना शुरू किया । माता ने उन्हें "उमा" कह कर रोका- जिससे उनका नाम उमा हुआ ।

उमा ने बड़ी कठिन तपस्या की , पहले भोजन त्यागा, फिर फल आदि भी त्याग दिए और बाद में पत्र पुष्प भी । पर्ण भी त्याग देने से उनका नाjम "अपर्णा" हुआ । 3 हज़ार साल से अधिक होने पर भी शिव प्रसन्न न हुए, तब पार्वती जी और भी लगन के साथ अपनी साधना में लग गयीं ।

उनके तप ताप के तेज से पृथ्वी संतप्त हो उठी और प्राणियों को अत्यंत पीड़ा होने लगी  । उधर ताड़कासुर ने सब और अपना राज्य विस्तारित किया और इन्द्रासन पर भी आसीन हो गया । तब देवगण विष्णु जी और ब्रह्मा जी सहित शिव जी के पास गये और पार्वती से ब्याह करने को कहा, । शिव जी ने कहा कि  मैं योगी हूँ, मुझे विवाह में कोई रूचि नहीं, और फिर से ध्यान मग्न हो गए । देवताओं ने उन्हें फिर पुकारा और धरा पर मची हाहाकार से मुक्ति के लिए उनसे तप स्वीकारने की प्रार्थना की । तब शिव जी ने कहा कि यद्यपि विवाह में हमारे रूचि नहीं है, तथापि आओ सब के लिए हम यह स्वीकार कर सकते हैं , आप सब प्रसन्न मन से प्रस्थान कीजिये ।

देवताओं के जाने के बाद शिव जी ने सप्तर्षियों से काली के प्रेम और समर्पण की परीक्षा लेने को कहा, जिन्होंने उमा के आगे आ कर शिव जी के अवगुणों की बातें  कहीं। भवानी ने तनिक भी विचलित हुए बिना अपनी तपस्या जारी राखी ।

फिर शिव जी खुद वृद्ध ब्राह्मण वेश में उनके पास आये और माँ ने उनका आदर सत्कार किया । उन्होंने पूछा की हे सुन्दर राजकुमारी, आप यह किस उद्देश्य से इतना कठोर तप कर रही हैं । उमा के कारण बताने पर वे शिव जी की बड़ी भर्त्सना करने लगे और कहा की ऐसे वर से विवाह करने से तो अच्छा हो की तुम कुंवारी ही रहो । शिव जी की बुराई पर माता भवानी क्रोधित हो गयीं और ब्राह्मण को वहां से जाने का आदेश दिया, अपनी सखी से कहा कि इसे यहाँ से दूर रखो और चुप रखो  । जितना पाप श्री महादेव की बुराई करने में है, ऐसा ही पाप उसे सुनने में भी है । मैं लज्जित हूँ कि मैंने इस शिवद्रोही का स्वागत सत्कार किया, और यह कह कर शिवा वहां से जाने लगीं  । इस पर शिव अपने निज रूप में आये और शिव का सारा क्लेश जाता रहा  । शिव जी ने कहा कि हे देवी, आपसे हम अति प्रसन्न हैं, और आपसे असीमित प्रेम भी करते हैं । आपके बिना अब हम भी नहीं रहना चाहते। आपको जो चाहिए है, मांग लीजिये । तब गिरिजा ने उनसे पिता हिमवान से अपना हाथ मांगने को कहा ।

शिव जी बोले , की मांगने में समर्थ पुरुष का तेज घट जाता है । जैसे ही "देहि" (मांगने के लिए संस्कृत शब्द - दो / दीजिये) शब्द मुंह से निकले, पुरुष भिक्षुक की तरह हीन हो जाता है  । किन्तु माता भवानी ने कहा कि पिता से पुत्री को स्त्री रूप में मांगना पुरुष का अपनी स्व प्रकृति को प्राप्त करने का कर्म है, और शास्त्र सम्मत है ।  तब शिव उन्हें पिता के घर प्रसन्न मन से लौट जाने को कह कर चले गए और गिरिजा प्रसन्नचित्त से घर आ गयीं ।

शिव नट रूप में डमरू लेकर हिमवान के घर आये और अत्यंत दिव्य नृत्य किया । अति प्रसन्न होकर राजा रानी ने उन्हें जो चाहें लेने को कहा, तो उन्होंने देवी काली का नाम लिया । राजा रानी नट की उद्दंडता पर अति क्रोधित हुए और सैनिकों से उसे बाहर निकालने को कहा, किन्तु उनके दिव्य तेज से कोई भी उनके सम्मुख न पहुँच सका  । नटराज ने फिर उमा का हाथ स्वयं को सौंपने को कहा, किन्तु मैना और हिमवान के न करने पर वे वहां से अंतर्ध्यान हो गए ।

फिर गिरिजेश वैष्णव ब्राह्मण रूप में हिमवान के घर गए और शिव जी की इतनी तीव्र निंदा की कि मैना और हिमवान ने कहा कि हम अपनी बेटी को कुंवारी भले ही रखेंगे, किन्तु ऐसे वर को उसे न सौंपेंगे । बाद में शंकर जी की प्रेरणा से सप्तर्षि वहां गए और हिमवान को मनाया । मैना देवी फिर भी न मानें, तो उन्हें अरुंधती जी ने समझाया (अरुंधती जी ब्रह्मा पुत्री संध्या हैं, जो कामदेव के साथ ही ब्रह्मा के ह्रदय में से उत्पन्न हुईं थीं  । ब्रह्मा की अनुमति पा कर कामदेव ने बाण संधान किया, जिससे सभा में उपस्थित सभी देवों की दृष्टि काम्पूर्ण हो उठी और संध्या पर सकाम दृष्टि पडी । इससे संध्या का मन व्यथित हुआ और वे पित्राज्ञा से श्री वशिष्ठ जी से मन्त्र ले कर तपस्या को चली गयीं । संध्या को सूर्य ने प्रातः और सायं संध्या में विभक्त किया था । बाद में वे तपस्या करने वे चंद्रभाग पर्वत पर चली गयीं, जहां से चंद्रभागा नदी उत्पन्न हुईं । अगले जन्म में वे ऋषि मेधातिथि की पुत्री अरुंधती हुईं, और उनका ब्याह वशिष्ठ जी से हुआ )

बरात आई तो शिव जी ने मैना जी के अहंकार को नष्ट करने के लिए इतना भयंकर वेश धारण किया कि मैना उन्हें देख कर बेहोश हो गयीं  । चेतना लौटने पर बेटी से कहा कि ऐसे कुलक्षणी अशुभ से मैं तुम्हे नहीं बांधूंगी ।
वे अपनी बेटी उमा, नारद, सप्तर्षियों, सबको अपशब्द कहने लगीं की धिक्कार है कि मेरी कोमलांगी पुत्री को ऐसे अमंगल दूल्हा चुना गया । उसी समय मेरा गर्भ नष्ट हो जाता तो भला होता । मैं उमा को अपने हाथों से विष दे दूँगी परन्तु इस से उसे न ब्याहूंगी । नारद ने उन्हें समझाया की शिव रूप सर्व शुभ है , यह रूप तो उन्होंने कौतुकवश धारण किया है । किन्तु वे न मानीं और नारद को कहा कि तुम दुष्टों और अधर्मियों के शिरोमणि हो कि तुमने हमारी बेटी का जीवन खराब कर दिया । देवताओं और सप्तर्षियों के समझाने पर भी मैना अपनी बात पर अड़ी रहीं । हिमवान स्वयं भी समझाने गए तो मैना ने कहा की वे सहर्ष बेटी को गले में रस्सी बाँध कर पर्वत से लटका दें , किन्तु वे उसका ब्याह शिव से न होने देंगी ।

अब पार्वती ने कहा कि "हे माते, तुम्हारी वाणी और बुद्धि तो सदैव मंगलकारी हुआ करती थी । आज यह धर्म का अवलंब न कर भटक गयी है । हे माँ, रूद्र सर्वोत्पत्ति के कारण और साक्षात इश्वर हैं । मनोहारी रूप धारी, कल्याणकारी महेश्वर परमेश्वर हैं । विष्णु ब्रह्मा द्वारा सेवित हैं और देवता गण इनकी आराधना करते हैं । ये निर्विकार, अविनाशी और सनातन हैं । शिव जी के ही कारण आज आपके द्वार पर ब्रह्मा विष्णु और समस्त देवगण और ऋषि मुनि जन पधारे हैं । मैं मन वचन कर्म से उन्हें पति मान चुकी हूँ, और आप मेरा विवाह न भी करेंगे, तो भी मैं आजीवन उनकी ही पत्नी बन कर कुंवारी रहूंगी " पुत्री की इन बातों से मैना देवी अति क्रोधित हुईं और उसे (निर्लज्जता के लिए ) डांटने लगीं । विष्णु जी भी मैना के पास आये और उन्हें समझाया , कि पितरों की कन्या और शैलप्रिया होने से उम्का सम्बन्ध ब्रह्मा जी के कुल से है । विष्णु जी के समझाने से मैना का आवेश कम तो हुआ, किन्तु उन्होंने जिद न छोड़ी । किन्तु जब शिव जी ने अपनी माया हटाई, तो मैना ने उन्हें उत्तम स्वीकार किया और नारायण से प्रार्थन की कि शिव जी से निज रूप में आने को कहें । तब शिव अपने स्वरुप में आये और उस रूप में अति सुन्दर प्रकट हुए  । मैना ने अपने व्यवहार पर क्षमा मांगी और फिर शिव और शिव का विवाह संपन्न हुआ ।

नव दंपत्ति के दर्शनों को सोलह श्री नारियां आयीं : सरस्वती, लक्ष्मी सावित्री, गंगा, अदिति, लोपामुद्रा, अरुंधती, अहल्या, तुलसी, स्वाहा, रोहिणी, पृथ्वी, शतरूपा, संज्ञा और रति । फिर और भी अनेक दिव्य देवपत्नियाँ, नाग कन्याएं, मुनि कन्याएं आदि वहां आईं   । रति ने कामदेव की भस्म को शिव के आगे किया और विवाह के शुभ अवसर पर अपने पति को पुनर्जीवित करने को कहा, और बहुत रोने लगीं । उनके रोने से अन्य देवपत्नियाँ भी रोने लगीं और प्रभु की दयादृष्टि पड़ते ही भस्म से कामदेव अपने पूर्व रूप में आ अगये और रतिकाम ने शिव शिव की मधुर स्तुतियाँ की । विदाई के समय माँ ने पुत्री को पतिव्रता नारी के धर्म समझाए । फिर गिरिजकुमारी अपने पति के साथ हिमवान के देश से विदा हो गयीं ।

शिव पार्वती सुत कार्तिकेय जन्म की गाथा 
शम्भु शक्ति सुत  श्री गणेश गाथा 


शिवरात्रि की शुभकामनाएं